शिवलिंग

(शिवलिंग पूजा से मनेकामना सिद्धि)

शिव के उस अपादान कारण को, जो अनादि और अनंत है, उसे लिंग कहते हैं। उसी गुणनात्मक मौलिक प्रकृति का नाम “माया” है, उसी से यह सम्पूर्ण जगत उत्पन्न हुआ है, होता रहेगा। जिसको जाना नहीं जा सकता, जो स्वंय ही कार्य के रूप में व्यक्त हुआ है, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है, और उसी में लीन हो जाना है, उसे ही लिंग कहते हैं। विश्व की उत्पत्ती और लय के हेतु (कारण) होने से ही उस परमपुरूष की लिंगता है। लिंग शिव का शरीर है, क्योंकि वह उसी रूप में अधिष्ठित हैं।

लिंग के आधार रूप में जो तीन मेखला युक्त वेदिका है, वह भग रूप में कही जाने वाली जगतदात्री महाशक्ति हैं। इस प्रकार आधार सहित लिंग जगत का कारण है। यह उमा-महेश्वर स्वरूप है। भगवान शिव स्वयं ही ज्योतिर्लिंग स्वरूप तमस से परे हैं, लिंग और वेदी के समायोजन से ये अर्धनारीश्वर हैं।

पूज्यो हरस्तु सर्वत्र लिंगे पूर्णोर्चनं भवेत।। (अग्निपुराण अध्याय ५४)
संस्कृत में लिंग का अर्थ “चिन्ह” है। और इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिये प्रयुक्त होता है। देवताओं की पूजा शरीर के रूप में हेती है, लेकिन परमपुरूष अशरीर हैं, इस लिये परम पुरूष की पूजा दोनों प्रकार से होती है। जब पूजा शरीर के रूप मे होती है, तब वह शरीर अराधक की भावना के अनुरूप होता है। 

जब पूजा प्रतीक के रूप में होती है, तब यह प्रतीक अनंत होता है। क्यों की ब्रह्माण्ड की कल्पना ही अण्डाकर रूप में होती है, इस लिये कोई जब अनंत या ज्योति का स्वरूप बनाना चाहेगा, तब प्रकृति को अभिव्यक्त करने के लिये लिंग के साथ तीन मेखला वाली वेदी बनानी पड़ती है, क्योंकि प्रकृति त्रिगुणात्मक (सत्व-रज-तम) है, इस वेदी को भग कहते हैं। लेकिन यहां भग का अर्थ स्त्री जननेद्रीय नहीं है। भगवान शब्द में जो भग है उसका अर्थ है:- एेश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य है। सम्पूर्ण जगत में एकीभूत है। इस अर्थ में वेदिका निखिलेश्वर्यमयी महा शक्ति है।

परमपुरूष शिव की सनातन (पौराणिक) मत में पांच रूपों में उपासना करने की परम्परा है, इसे ही पंचदेवोपासना कहते हैं:- शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश ओर सूर्य। इन पांचो का ही गोल प्रतीक आपने देखा है। शिवलिंग पर चर्चा हम कर ही रहे हैं। विष्णु के प्रतीक शालिग्राम आपने सभी वैष्णव मंदिरों में देखा है। विष्णु के जितने अवतार हैं, लक्षणभेद से शालिग्राम शिला के साथ भी गोमती चक्र रखना पड़ता है। यह महाप्रकृति का एेश्वर्यमय भग स्वरूप है। जो शिवलिंगार्चन में वेदिका के रूप में है। इसी प्रकार शक्ति की गोल पिण्डियां देश के अनेक शक्ति स्थानों में विद्यमान हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो कालीपीठ पर   शक्ति केवल पिण्डियों के रूप में ही स्थापित होती हैं। गणेशजी की स्थापना प्राय: प्रत्येक पूजन के आरम्भ में सुपारी अथवा गोबर की गोल पिण्डियाें पर ब्राह्मणों को करवाते आपने देखा ही होगा। भगवान सूर्य का प्रत्यक्ष प्रतीक आकाश का सूर्य-मण्डल जैसा है। आप जानते हैं, जहां भी ग्रहों के चक्र बनाये जाते हैं, सूर्यमण्डल को अण्डाकर ही बनाना पड़ता है। इस प्रकार इन पंचदेवों की लिंग मानकर अर्थात् चिन्ह बनाकर ही इनकी उपासना होती है।

पार्थिव लिंग की पूजा और महत्व:-

जो लिंग बांबी, गंगा, तलाब, वैश्या के घर, घुड़साल की मिट्टी मक्खन या मिश्री से बनाये जाते हैं, उनका अलग-अलग मनेकामना के लिये उपासना, पूजा व अभिषेक करने के उपरांत उन्हें जल में विसर्जित करने का विधान है।

पार्थिव लिंग के तांत्रिक प्रयोगों से प्रयोजन सिद्धियां:-

1. भू सम्पत्ती प्राप्त करने के लिये- फूलों से बनाये गये शिवलिंग का अभिषेक करें।

2. स्वास्थ्य और संतान के लिये- जौ, गेहूं और चावल तीनों के आटे को बराबर मात्रा में लेकर, शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करें।

3. असाध्य रोग से छुटकारा पाने के लिये- मिश्री से बनाये शिवलिंग की पूजा करें।

4. सुख-शांति के लिये- चीनी की चाशनी से बने शिवलिंग की पूजा करें।

5. वंश वृद्धि के लिये- बांस के अंकुर से बने शिवलिंग की पूजा करें।

6. आर्थिक समृद्धि के लिये- दही का पानी कपडे से निचोड़ लें और उस बिना पानी वाली दही से जो शिवलिंग बनेगा, उसका पूजन करने से समृद्धि प्राप्त होती है।

7. शिव सायुज्य के लिये- कस्तूरी और चंदन से बने शिवलिंग की पूजा करें।

8. वशीकरण के लिये- त्रिकुटा (सोंठ, मिर्च व पीपल के चूर्ण में नमक मिलाकर शिवलिंग बनता है, उसकी पूजा की जाती है।

10. अभिलाषा पूर्ति के लिये- भीगे तिलों को पीसकर बनाये गये शिवलिंग की पूजा करें।

11. अभिष्ट फल की प्राप्ति के लिये- यज्ञ कुण्ड से ली गई भस्म का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करें। 

12. प्रीति बढ़ाने के लिये- गुड़ की डली से बने शिवलिंग की पूजा करें।

13. कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये- गुड़ में अन्न चिपकाकर उस से बने शिवलिंग की पूजा करें।

14. फल वाटिका में फल की अधिक पैदावार के लिये- उसी फल को शिवलिंग के समान रखकर उस फल की पूजा करें।

15. मुक्ति प्राप्त करने के लिये- आंवले को पीसकर उस से बनाये गये शिवलिंग की पूजा करें।

16. स्त्रीयों के लिये सौभाग्य प्रदाता- मक्खन को अथवा वृक्षों के पत्तों को पीसकर बनाये गये शिवलिंग की पूजा करें।

17. आकाल मृत्यु भय दूर करने के लिये- दूर्वा को शिवलिंगाकार गूंथकर उस की पूजा करें।

18. भक्ति और मुक्ति के लिये- कपूर से बने शिवलिंग की पूजा करें।

19. तंत्र में सिद्धि के लिये- लौह से बने शिवलिंग की पूजा करें।

20. स्त्रीयों के भाग्य में वृद्धि- मोती से बने शिवलिंग की पूजा करें।

21. सुख-समृद्धि के लिये- स्वर्ण से बने शिवलिंग का पूजन करें।

22. धन-धान्य वृद्धि के लिये- चांदी से बने शिवलिंग की पूजा करें।

23. दरिद्रता निवारण के लिये- पारद (पारा) के शिवलिंग की पूजा करें।

24. शत्रुता निवारण के लिये- पीतल से बने शिवलिंग की पूजा करें।

25. कर्ज निवारण के लिये- कांस्य से निर्मित शिवलिंग की पूजा करें।

​मांस-भक्षण-निषेध : संक्षिप्त प्रमाण

महाभारत में कहा है-

धनेन क्रयिको हन्ति खादकश्चोपभोगतः।

घातको वधबन्धाभ्यामित्येष त्रिविधो वधः॥

आहर्ता चानुमन्ता च विशस्ता क्रयविक्रयी ।

संस्कर्ता चोपभोक्ता च खादकाः सर्व एव ते॥ 

       –महा० अनु० ११५/४०, ४९
’मांस खरीदनेवाला धन से प्राणी की हिंसा करता है, खानेवाला उपभोग से करता है और मारनेवाला मारकर और बाँधकर हिंसा करता है, इस पर तीन तरह से वध होता है । जो मनुष्य मांस लाता है, जो मँगाता है, जो पशु के अंग काटता है, जो खरीदता है, जो बेचता है, जो पकाता है और जो खाता है, वे सभी मांस खानेवाले (घातकी) हैं ।’

    अतएव मांस-भक्षण धर्म का हनन करनेवाला होने के कारण सर्वथा महापाप है । धर्म के पालन करनेवाले के लिये हिंसा का त्यागना पहली सीढ़ी है । जिसके हृदय में अहिंसा का भाव नहीं है वहाँ धर्म को स्थान ही कहाँ है?

 भीष्मपितामह राजा युधिष्ठिर से कहते हैं-

मां स भक्षयते यस्माद्भक्षयिष्ये तमप्यहम ।

एतन्मांसस्य मांसत्वमनुबुद्ध्यस्व भारत ॥

       –महा० अनु० ११६/३५
‘ हे युधिष्ठिर ! वह मुझे खाता है इसलिये मैं भी उसे खाऊँगा यह मांस शब्द का मांसत्व है ऐसा समझो ।’ 
इसी प्रकार की बात मनु महाराज ने कही है-
मां स भक्षयितामुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम् ।

एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्तिं मनीषणः

 ॥ 
                    –मनु0 ५/५५
’ मैं यहाँ जिसका मांस खाता हूँ, वह परलोक में मुझे (मेरा मांस) खायेगा। मांस शब्द का यही अर्थ विद्वान लोग किया करते हैं ।’
आज यहाँ जो जिस जीव के मांस खायेगा किसी समय वही जीव उसका बदला लेने के लिये उसके मांस को खानेवाला बनेगा । जो मनुष्य जिसको जितना कष्ट पहुँचाता है समयान्तर में उसको अपने किये हुए कर्म के फलस्वरुप वह कष्ट और भी अधिक मात्रा में (मय व्याज के) भोगना पड़ता है, इसके सिवा यह भी युक्तिसंगत बात है कि जैसे हमें दूसरे के द्वारा सताये और मारे जाने के समय कष्ट होता है वैसा ही सबको होता है । परपीड़ा महापातक है, पाप का फल सुख कैसे होगा?  इसलिये पितामह भीष्म कहते हैं-
कुम्भीपाके च पच्यन्ते तां तां योनिमुपागताः ।

आक्रम्य मार्यमाणाश्च भ्राम्यन्ते वै पुनः पुनः ॥ 

          –महा० अनु० ११६/२१
’ मांसाहारी जीव अनेक योनियों में उत्पन्न होते हुए अन्त में कुम्भीपाक नरक में यन्त्रणा भोगते हैं और दूसरे उन्हें बलात दबाकर मार डालते हैं और इस प्रकार वे बार- बार भिन्न-भिन्न योनियों में भटकते रहते हैं ।’
इमे वै मानवा लोके नृशंस मांसगृद्धिनः ।

विसृज्य विविधान भक्ष्यान महारक्षोगणा इव ॥

अपूपान विविधाकारान शाकानि विविधानि च ।

खाण्डवान रसयोगान्न तथेच्छन्ति यथामिषम ॥ 

      –महा० अनु० ११६/१-२
’ शोक है कि जगत में क्रूर मनुष्य नाना प्रकार के पवित्र खाद्य पदार्थों को छोड़कर महान राक्षस की भाँति मांस के लिये लालायित रहते हैं तथा भाँति-भाँति की मिठाईयों, तरह-तरह के शाकों, खाँड़ की बनी हुई वस्तुओं और सरस पदार्थों को भी वैसा पसन्द नहीं करते जैसा मांस को।’
इससे यह सिद्ध हो गया कि मांस मनुष्य का आहार कदापि नहीं है।

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कर्म एवं भाग्य

अनेक लोग कुण्डली दिखाते समय प्रश्न करते है कि मेरी किस्मत खराब है, कब और कैसे अच्छी होगी, कब अच्छा समय आयेगा ॽ

इसके लिये दो सिद्धांत कार्य करते है-1. एक तरफ कर्मफल “भाग्य” का चक्र। 2. दूसरा जीवन का चक्र। 

कर्म फल “भाग्य” का चक्र अनंतकाल का तथा जीवन चक्र सीमित वर्ष का होता है।

मित्रो हम जो भी कर्म करते हैं, प्रकृति उस कर्म की प्रतिक्रिया करती है, इसी को कर्मफल कहते हैं। “क्रिया की प्रतिक्रिया” या कर्म और कर्म का फल।

इस प्रकार मनुष्य अपने जीवनकाल में कुछ कर्मों का फल इस जीवन तथा शेष कर्मों का फल पुनर्जन्म प्राप्त होने पर भोगता है।

एक तरफ मनुष्य कर्म करता है, दूसरी ओर भाग्य (कर्मफल) भोगता है। अर्थात् कर्म भी करता चला जाता है, दूसरी और भाग्य का भोग भोगता है।

इस लिये मनुष्य यदि भाग्य को जानकर कर्म करे तभी हर प्रकार से सफल जीवन व्यतीत करता है।

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काली हल्दी ( Kali Haldi)

सामान्य हल्दी को तोडने से वह अंदर से पीली दिखाई देती है, परंतु काली हल्दी को तोडने पर वह अंदर हल्की काली दिखाई देती है। वास्तव में हल्दी की एक जाति काले रंग की भी होती है, इसे ही काली हल्दी कहते हैं। सामान्य (पीली) हल्दी के ढेर में भी 10-20 गांठ काली हल्दी निकल ही आती है। आजकल काली हल्दी की खेती अलग से भी की जा रही है।

जहां पीली हल्दी रसोईघर के अतिरिक्त औषधि निर्माण, पूजा-पाठ तथा उबटनादि में प्रयोग होती है, वहीं काली हल्दी तंत्र शास्त्र के अनुसार धन-वृद्धिकारक वस्तु के नाम से प्रसिद्ध है। काली हल्दी को प्रयोग में लाने के लिये इसे किसी शुभ मुहूर्त में विधिवत पूजन करवा लेना चाहिये। कायदा तो यह है की काली हल्दी के पौधे को पहले गुरूपुष्य योग में हाथ में चावल लेकर विधिवत निमंत्रण देकर आना और फिर दूसरे दिन प्रात: एक लकडी के टुकडे द्वारा भूमि से खोदकर शुद्ध जल से धो कर गंगाजल से शुद्ध कर लें, फिर इसे एक पीले कपडे में रखकर घर ले आयें। इसे किसी शुद्ध मुहूर्त में विधिवत पूजन करके प्रयोग में ला सकते हैं। इस प्रकार पीले वस्त्र में अक्षत् के साथ गांठ बांधकर अपनी तिजोरी में रखने से धन व सौभाग्य की वृद्धि होती है। इस का पूरा-पूरा लाभ तभी होता है, जब इस की प्राप्ति से लेकर पूजा और फिर मंत्र के प्रयोग का पूरा-पूरा ध्यान रखा जायेगा। 

काली हल्दी के सौभाग्य वृद्धि के अतिरिक्त भी कुछ तांत्रिक प्रयोग हैं:- 1. अदृश्य शैतानी शक्ति को नष्ट करने के लिये। 2. सौंदर्य साधना। 3. वशीकरण प्रयोग। 4. आकर्षण प्रयोग। 5. उन्माद नाशक प्रयोग। इन सभी की जानकारी गोपनीय है।

Deepawli Pooja muhurat 2016

इस वर्ष 2016 में 30 अक्तूबर के दिन दीपावली पर्व है। हर वर्ष दीपावली पर्व कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है।दीपावली की रात्रि प्रदोषकाल में महालक्ष्मी पूजन की परम्परा आदिकाल से चली आ रहा है। इस दिन का ज्योतिषीय महत्व है यह है की दो प्रमुख ग्रह सूर्य व चन्द्रमा इस दिन तुला (शुक्र की राशि) में विचरण कर रहे होते हैं।

कार्तिक अमावस्या की रात्रि स्थिर लग्न (वृष या सिंह) में महानिशीथ काल में महालक्ष्मी का पूजन करने से माता लक्ष्मी साधक के घर स्थाई निवास करती हैं।

इस वर्ष यह दीपावली महालक्ष्मी पूजन का शुभ तथा विशेष मुहूर्त 30 अक्तूबर 2016 के दिन सॉय 18:28 से आरम्भ होकर 20:22 तक रहेगा।

इस दिन सॉय 18:28 से 20:22 तक के समय में अमावस्या तिथि अंतर्गत वृष लग्न तथा शुभ, अमृत तथा चर का चौघडिया का शुभ योग बना है।

स्थिर लग्न के मुहूर्त में महालक्ष्मी पूजन करने से धन-धान्य स्थिर रहता है। इस मुहूर्त में दीपदान, गणपति सहित महालक्ष्मी पूजन, कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन तथा धर्मस्थलों में और अपने घर में दीपदान प्रज्जवलित करना चाहिये।

दीपावली पूजन तथा इस रात्रि में की जाने वाली विशेष साधनाओं का विस्तार पूर्वक विवरण जानने के लिये देखें गुरूजी द्वारा प्रकाशित अॉनलाईन ज्योतिषीय मासिक पत्रिका aapkabhavishya यह पत्रिका http://www.shukracharya.com पर नि:शुल्क उपलब्ध है।

इस के अतिरिक्त AapKaBhavishya.in पर भी गुरूजी (डा. आर.बी.धवन) के ज्योतिषीय लेख आप पढ़ सकते हैं।

Deepawli Tantra (आकर्षण-सम्मोहन कवच)

हर महिला चाहती है की उस में “आकर्षण-सम्मोहन” तथा “वशीकरण” की एेसी शक्ति हो जिससे वह सुन्दरता तो दिखाई दे ही साथ ही अपने पति को किसी अन्य स्त्री के मोहजाल में फंसने से भी रोक सकती हो। यह सब तभी सम्भव है, जब वह महिला स्वयं सुन्दर आकर्षक व स्वास्थ्य हो। साथ में वह आवश्यक होने पर ‘वशीकरण’ का प्रयोग भी कर सके। क्योंकि जब किसी महिला में आकर्षण का आभाव होता है, तब ही उसके पति का किसी अन्य सुन्दरी की ओर झुकाव पैदा होता है। अर्थात तभी उसके पति किसी सुन्दरी के मोहजाल में उलझ सकते हैं। क्योंकि एक व्यवस्थित व संतुलित शरीर वाली स्त्री किसी सामान्य पुरूष को सहज ही आकर्षित कर सकती है। यह बात दूसरी है की कभी-कभी सांवली सलोनी नैन नक्श वाली व्यवस्थित स्त्री का मुस्कुराता चेहरा भी पुरूषों को आकर्षित करता है।
तंत्र-शास्त्रों में ऐसे प्रयोग भी मिलते हैं, जिन्हें करने से स्त्रीयां स्वयं में “आकर्षण-सम्मोहन” की शक्ति का विकास कर सकती हैं, और हीनभावना को निकालकर अपने पति के साथ सुखपूर्वक रह सकती हैं।
इसके लिये है- “आकर्षण-सम्मोहन कवच”। इस कवच की रचना दीपावली की रात्रि में की जाती है। अर्थात दीपावली की रात्रि में “गोपनीय तंत्र प्रयोग” द्वारा ही सिद्ध किया जाता है। यह कवच उन स्त्रीयों के लिये प्रयोग करने योग्य है, जो किसी प्रकार से पति की प्रेमिका से परेशान हैं। जो वह प्रेमिका या मित्र बनकर उनके पति पर डोरे डालती हैं, और पति का झुकाव निरंतर उस महिला की ओर आवश्यकता से अधिक हो गया है।
“आकर्षण-सम्मोहन कवच” का निर्माण करने के लिये गुरूजी ‘डा. आर. बी. धवन ‘ विशेष मुहूर्त का चुनाव करते हैं। इस की विधि तथा प्रयोग गोपनीय रखे जाते हैं। इस लिये “गोपनीय तंत्र प्रयोग” (तांत्रिक मंत्रो) द्वारा ही इस कवच को सिद्ध किया जाता है, यह कार्य गुरूजी स्वयं करते हैं। यह कवच सिद्ध करने के पश्चात सोने के सुन्दर लॉकेट में छिपाकर रखा होता है, और एक वर्ष तक महिला को अपने गले में धारण करना होता है।

“आकर्षण-सम्मोहन कवच” के लिये गुरूजी से सम्पर्क करें।

इसके अतिरिक्त डा. आर. बी. धवन (गुरूजी) द्वारा सम्पादित “दीपावली तंत्र-मंत्र विशेषांक” आप का भविष्य (मासिक ज्योतिषीय पत्रिका) की free membership भी प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिये http://www.shukracharya.com पर लॉगिन करें।

टोटके (Totke) आर्थिक संकट दूरी करने के लिये

यदि आप अपना घर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, कोशिश करने के बाद भी घर नहीं बना पा रहे, और आपके सभी प्रयत्न असफल हो रहे हैं, तो हर शुक्रवार को नियम से किसी भूखे व्यक्ति को भरपेट भोजन करवायें और रविवार के दिन गाय को गुड़ खिलायें। एेसा करने से अचल सम्पत्ति की प्राप्ति या कोई पैत्रिक सम्पत्ति प्राप्त होगी।

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भाग्योदय

भाग्योदय के लिये यह उपाय अवश्य आजमाईये- कुण्डली के ग्रह कितने भी प्रतिकूल हों, जिन्हें अपने भाग्योदय की प्रबल इच्छा हो, वह इन नियमों का सदा पालन करें तो, उसके बुरे दिन भी भाग जायेंगे।
1. नित्य सूर्योदय से कम-से-कम आधा घंटा पूर्व उठना चाहिए।
2. प्रातः उठने के समय बिस्तर पर आँख खुलते ही, जिस ओर की नासिका छिद्र से श्वांस चल रही हो, उस ओर का हाथ मुखपर फेर कर बैठें। इसके बाद उसी ओर का पैर पहले भूमि पर रख कर बिस्तर से नीचे उतरें।
3. माता-पिता/सास-श्वसुर के नित्य प्रातः चरण स्पर्श करें।
इन नियमों का सदा श्रद्धा पूर्वक पालन करने से हर प्रकार से ग्रहदोष स्वंय दूर होते हैं।

r. b. dhawan

जब मैंने पहली पुस्तक लिखी- “गुरूजी के टोटके” (यह मेरी पहली पुस्तक थी) जो मैंने 2005 में लिखी थी। इस पुस्तक के लिये मैने लेख “छोटे-छोटे कामयाब टोटके इक्ट्ठे करने थे, परंतु इसके लिये मुझे तलाश थी कम से कम 60 से 100 वर्ष पुरानें हिन्दी के पंचांगों की। मुझे पूरा यकीन था एैसे लेख “टोटके” पुराने पंचांगों में बेहतरीन मिल सकते हैं, परंतु इतने पुराने जमाने के पंचांग मिलेंगे कहां ? एक दिन अचानक मुझे एक कबाड़ी के गोदाम की ओर देखने से कुछ बहुत पुराने परंतु जिल्दों में सहेजे हुये पुराने पंचांगों के बहुत सारे अंक मिल गये। बस मन की इच्छा जैसे पूर्ण हो गई, कबाड़ी वाले ने बाद में बताया की एक विद्वान बुजुर्ग ब्राह्मण की मृत्यु के बाद उसकी पूरी लायब्रेरी को वह कबाड़ी खरीद लाया था। बस मेरे लिये तो वह एक खजाना साबित हुआ। एक वर्ष की मेहनत के बाद “गुरूजी के टोटके” 1500 शानदार तथा हर समस्या के लिये एक-से-एक लाजवाब टोटकों से युक्त यह पुस्तक छपकर तैयार थी।
अब इस पुस्तक को शानदार लुक मैं देना चाहता था। अनेक सुंदर जिल्दों में से लाल रंग की जिल्द पर गोल्डन कलर से पुस्तक का नाम लिखवाने के बाद तो जैसे इस पुस्तक को चार चांद लग गये हों। पुस्तक के बाजार मे उतारते ही भारी सफलता मिली। हाथों-हाथ 1000 पुस्तकें बिक गई, खूब ख्याति भी मिली, और उपयोगी ज्योतिषीय विषयों पर पुस्तकें लिखने की प्रेरणा भी मिली, आज 10 वर्ष के बाद ईश्वर कृपा से 10 अन्य पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, पाठकों से बहुत प्यार मिल रहा है।
मेरी सभी ज्योतिष और उपाय की पुस्तकें http://www.shukracharya.com पर उपलब्ध हैं।

महान व्यक्ति

आप भी महान व्यक्तित्व के स्वामी बन सकते हैं, यदि पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी के इन सिद्धांतों को अपनी जीवनशैली में उतार लें-
1. ईश्वर को सर्वव्यापी व न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को स्वीकार करें।
2. अपने शरीर को परमात्मा का मंदिर मानकर (क्योंकि परमात्मा के अंश “आत्मा” का आपके शरीर में भी निवास है।) आत्मसंयम, और नियमितता द्वारा अपने शरीर की रोगों और बुराईयों से रक्षा करें।
3. मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाये रखने के लिये संस्कारी लोगों की संगति करें।
4. इन्द्रियों का नियंत्रण, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सदा अभ्यास करें।
5. मर्यादाओं का पालन करें, वर्जनाओं से बचें तथा समाजनिष्ठ बनें।
6. अनिति से प्राप्त उपलब्धियों और सफलताओं की उपेक्षा करें।
7. रूढ़िवादी परम्पराओं की तुलना में विवेक से फैसले लें।
8. मनुष्य का मूल्यांकन उसकी सफलताओं और योग्यताओं से न करके, उसके सद्द्विचारों और सत्कर्मों को महत्व दें।
9. “मनुष्य अपने अच्छे-बुरे कर्मो के द्वारा अपने भाग्य का निर्माण स्वयं ही करता है” इस विश्वास पर चलते हुये आजीवन सद्कर्म करते चलें।