Rajyoga in Kundli

यदा मुश्तरी कर्कटे वा कमाने, अगर चश्मखोरा पड़े आयुखाने।
भला ज्योतिषी क्या लिखेगा पढ़ेगा, हुआ बालका बादशाही करेगा।।

उत्तरकालामृत ग्रन्थ में उल्लेखित यह ज्योतिषीय खोज अब्दुल रहीम खानखाना की है जो की मुगल काल के विद्वान थे। सैकड़ो वर्ष के उपरांत आज भी यह खोज सत्य ही प्रतीत होती है। इस ज्योतिषीय योग से स्पष्ट है कि यदि 2, 3, 5, 6, 8, 9 तथा 11, 12 में से किसी स्थान में बृहस्पति की स्थिति हो, और शुक्र 8वें स्थान में हो तो ऐसी ग्रह स्थिति में जन्म लेने वाला जातक चाहे साधारण परिवार में ही क्यों न जन्मा हो, वह राज्याधिकारी ही बनता है। यही कारण है कि कभी-कभी अत्यंत साधारण परिवार के बालकों में भी राजसी लक्षण पायें जाते हैं और वे किसी न किसी दिन राज्य के अधिकारी घोषित किये जाते हैं। विभिन्न योगों के अनुसार ही मनुष्य की चेष्टायें और क्रियायें विकसित होती हैं इस विषय पर विभिन्न शास्त्रों का भी उल्लेख दर्शनीय है। सर्वप्रथम ज्योतिष शास्त्र को लीजिये उसमें राजयोग के लक्षण इस प्रकार बतलाये गये हैं।

  1. जिस व्यक्ति के पैर की तर्जनी उंगली में तिल का चिन्ह हो वह पुरूष राज्य-वाहन का अधिकारी होता है।
  2. जिसके हाथ की उंगलियांे के प्रथम पर्व ऊपर की ओर अधिक झुके हों वह जनप्रिय तथा नेतृत्व करने वाला होता है।
  3. जिसके हाथ मंे चक्र, दण्ड एवं छत्रयुक्त रेखायें हों वह व्यक्ति निसंदेह राजा अथवा राजतुल्य होता है।
  4. जिसके मस्तिष्क मंे सीधी रेखायें और तिलादि का चिन्ह हो वह राजा के समान ही सुख को प्राप्त करता है और उसमें बैद्धिक कुशलता भी पर्याप्त मात्रा में होती है।

किन्तु वृहज्जातक के अनुसार राजयोग के बारह प्रकार होते हैं-

  1. तीन ग्रह उच्च के होने पर जातक स्वकुलानुसार राजा होता है। यदि उच्चवर्ती तीन पापग्रह हों तो जातक क्रूर बुद्धि का राजा होता है और शुभ ग्रह होने पर सद्बुद्धि युक्त। उच्चवर्ती पाप-ग्रहों से राजा की समानता करने वाला होता है, किन्तु राजा नहीं होता।
  2. मंगल, शनि, सूर्य और गुरू चारों अपनी-अपनी उच्च राशियों में हों, और कोई एक ग्रह लग्न में उच्चराशि का हो तो चार प्रकार का राजयोग होता है। चन्द्रमा कर्क लग्न में हो और मंगल, सूर्य तथा शनि और गुरू में से कोई भी दो ग्रह उच्च हों तो, भी राजयोग होता है। जैसे- मेष लग्न में सूर्य, कर्क में गुरू, तुला का शनि और मकर राशि मंे मंगल भी प्रबल राजयोग कारक हैं। कर्क लग्न से दूसरा, तुला से तीसरा, मकर से चौथा जो तीन ग्रह उच्च के हों जैसे मेष में सूर्य, कर्क में गुरू, तुला में शनि तो भी राजयोग माना जाता है।
  3. शनि कुंभ में, सूर्य मेष में, बुध मिथुन में, सिंह का गुरू और वृश्चिक का मंगल तथा शनि सूर्य और चन्द्रमा में से एक ग्रह लग्न में हो तो भी पांच प्रकार का राजयोग माना जाता है। सूर्य बुध कन्या में हो, तुला का शनि, वृष का चंद्रमा और तुला में शुक्र, मेष में मंगल तथा कर्क में बृहस्पति भी राजयोगप्रद ही मानेजाते हैं। मंगल उच्च का सूर्य और चन्द्र धनु में और लग्न में मंगल के साथ यदि मकर का शनि भी हो तो मनुष्य निश्चित ही राजा होता है। शनि चन्द्रमा के साथ सप्तम में हो और बृहस्पति धनु का हो तथा सूर्य मेष राशि का हो और लग्न में हो तो भी मनुष्य राजा होता है। वृष का चन्द्रमा लग्न में हो और सिंह का सूर्य तथा वृश्चिक का बृहस्पति और कुंभ का शनि हो तो मनुष्य निश्चय ही राजा होता है। मकर का शनि, तीसरा चन्द्रमा, छठा मंगल, नवम् बुध, बारहवां बृहस्पति हो तो मनुष्य अनेक सुंदर गुणों से युक्त राजा होता है।
  4. धनु का बृहस्पति चंद्रमा युक्त क्र अपने-अपने उच्च में लग्न गत हों तो जातक गुणावान राजा होता है। और मंगल मकर का और बुध शुक्र अपने-अपने उच्च में लग्न गत हों तो जातक गुणावान राजा होता है।
  5. मंगल शनि पंचम गुरू और शुक्र चतुर्थ तथा कन्या लग्न में बुध हों तो जातक गुणावान राजा होता है।
  6. मीन का चंद्रमा लग्न में हो, कुंभ का शनि, मकर का मंगल, सिंह का सूर्य जिसके जन्म कुण्डली में हों वह जातक भूमि का पालन करने वाला गुणी राजा होता है।
  7. मेष का मंगल लग्न में, कर्क का बृहस्पति हो तो जातक शक्तिशाली राजा होता है। कर्क का गुरू लग्न में हो और मेष का मंगल हो तो जातक गुणवान राजा होता है।
  8. कर्क लग्न में बृहस्पति और ग्याहरवें स्थान में वृष का चंद्रमा शुक्र, बुध और मेष का सूर्य दशम स्थान में होने से जातक पराक्रमी राजा होता है।
  9. मकर लग्न में शनि, मेष लग्न में मंगल, कर्क का चन्द्र, सिंह का सूर्य, मिथुन का बुध और तुला का शुक्र होने से जातक यशस्वी व भूमिपति होता है।
  10. कन्या का बुध लग्न में और दशम शुक्र सप्तम् बृहस्पति तथा चन्द्र ो भी जातक राजा होता है। हो और शनि मंगल पंचम हों तो भी जातक राजा होता है। जितने भी राजयोग हैं इनके अन्तर्गत जन्म पाने पर मनुष्य चाहे जिस जाति स्वभाव और वर्ण का क्यों न हो वे राजा ही होता है। फिर राजवंश में जन्म प्राप्त करने वाले जातक तो चक्रवर्ती राजा तक हो सकते हैं। किन्तु अब कुछ इस प्रकार के योगों का वर्णन किया जा रहा है जिनमंे केवल राजा का पुत्र ही राजा होता है तथा अन्य जातियों के लोग राजा तुल्य होते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि राजा का पुत्र राजा ही हो उसके लिये निम्नलिखित में से किसी एक का होना नितांत आवश्यक है कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि राजवंश में जन्म पाने वाला जातक भी सामान्य व्यक्ति होता है और सामान्य वंश और स्थिति में जन्म पाने वाला महान हो जाता है उसका यही कारण है।
  11. यदि त्रिकोण में 3-4 ग्रह बलवान हों तो राजवंशीय राजा होते हैं। जब 5-6-7 भाव में ग्रह उच्च अथवा मूल त्रिकोण में हों तो अन्य वंशीय जातक भी राजा होते हैं। मेष के सूर्य चंद्र लग्नस्थ हों और मंगल मकर का तथा शनि कुंभ का बृहस्पति धनु का हो तो राजवंशीय राजा होता है। यदि शुक्र 2, 7 राशि का चतुर्थ भाव में और नवम स्थान में चंद्रमा हो और सभी ग्रह 3,1,11 भाव में ही हों तो ऐसा जातक राजवंशीय राजा होता है। बलवान बुध लग्न में और बलवान शुक्र तथा बृहस्पति नवम स्थान में हो और शेष ग्रह 4, 2, 3, 6, 10, 11 भाव में ही हों तो ऐसा राजपुत्र धर्मात्मा और धनी-मानी राजा होता है। यदि वृष का चंद्रमा लग्न में हो और मिथुन का बृहस्पति, तुला का शनि और मीन राशि में अन्य रवि, मंगल, बुध तथा शुक्र ग्रह हों तो राजपुत्र अत्यंत धनी होता है। दशम चन्द्रमा, ग्याहरवां शनि, लग्न का गुरू, दूसरा बुध और मंगल, से राजपुत्र राजा ही होेता है। किंतु यदि मंगल शनि लग्न में चतुर्थ चंद्रमा और सप्तम बृहस्पति, नवम, शुक्र, दशम सूर्य, ग्यारहवें बुध हो तो भी यही फल होता है। चतुर्थ में सूर्य और शुक्र होने से राजपुत्र राजा ही होेता है। किंतु यदि मंगल शनि लग्न में चतुर्थ चंद्रमा और सप्तम बृहस्पति, नवम, शुक्र, दशम सूर्य, ग्यारहवें बुध हो तो भी यही फल होता है। एक बात सबसे अधिक ध्यान देने की यह है कि राजयोग का निर्माण करने वाले समस्त ग्रहों में से जो ग्रह दशम तथा लग्न में स्थित हों तो, उनकी अन्तर्दशा में राज्य लाभ होगा जब दोनों स्थानों में ग्रह हों तो उनसे भी अधिक शक्तिशाली राज्य लाभ होगा, उसके अन्तर्दशा में जो लग्न दशम में हों अनेक ग्रह हों तो उनमें जो सर्वाेत्तम बली हो उसके प्रभाव के द्वारा ही राज्य का लाभ हो सकेगा। बलवान ग्रह द्वारा प्राप्त हुआ राज्य भी छिद्र दशा द्वारा समाप्त हो जाता है। यह जन्म कालिक शत्रु या नीच राशिगत ग्रह की अन्तर्दशा छिद्र दशा कहलाती है। जो राज्य को समाप्त करती है अथवा बाधायें उपस्थित करती है।
  12. यदि बृहस्पति, शुक्र और बुध की राशियां 4, 12, 6, 2, 3, 6 लग्न में हों और सातवां शनि तथा दशम सूर्य हो तो भी मनुष्य धन रहित होकर भी भाग्यवान होता है और अच्छे साधन उसके लिये सदा उपलब्ध होते हैं। यदि केन्द्रगत ग्रह पाप राशि में हों और सौम्य राशियों में पापग्रह होें तो ऐसा मनुष्य चोरों का राजा होता है। इस प्रकार से विभिन्न राजयोगों के होने पर मनुष्य सुख और ऐश्वर्य का भोग करता।    —  विख्यात् ज्योतिषाचर्य – Dr.R.B.Dhawan
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