Ninth house

सदा से ही मनुष्य की यह जानने की इच्छा रही है कि उसका भाग्य कब व कैसे उदय होगा? भविष्य कैसा होगा? वर्तमान की स्थिति क्या है? जीवन में सफलता व असफलता कब-कब व किस-किस मात्रा में प्राप्त होगी?

गृहस्थ जीवन, आर्थिक स्थिति, नौकरी या व्यापार, लॉटरी आदि ऐसे भी प्रश्न हैं जिनका हल मनुष्य चाहता है, और इसके लिये वह यहाँ-वहाँ भटकता है। परन्तु इन सभी समस्याओं का हल यदि है तो वह केवल ज्योतिष के पास।
ज्योतिषी के पास जाकर मनुष्य दो बातें जानने को विशेष ही उत्सुक रहता है- एक अर्थ व दूसरा भाग्य। मैं यहाँ इन्हीं दो भावों पर अर्थात् नवम एवं द्वितीय भाव पर ही इस लेख को केन्द्रित रखना चाहूँगा।
द्वितीय भाव से वह द्रव्य जो पैत्रिक संपत्ति के रूप में प्राप्त होता है, का ज्ञान प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त इस भाव से कुटुम्ब, स्नेही, भाषण कला, सुखभोग, मृत्यु के कारण, प्रारम्भिक शिक्षा आदि का ज्ञान भी प्राप्त किया जाता है। हर उस विद्वान को जो ज्योतिष विषय में रुचि रखता हो, सर्वप्रथम निम्न बातों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिये –

  1. दूसरे भाव की राशि।
  2. द्वितीय स्वामी व उसकी स्थिति।
  3. दूसरे भाव में स्थित ग्रह।
  4.  द्वितीय या द्वितीयेश पर दृष्टि।
  5.  कारक, अकारक एवं तटस्थ ग्रह।
  6.  विशेष योग।
  7.  मैत्री व शत्रुता।

यदि इस स्थान में मेष राशि है तो वह व्यक्ति आर्थिक मामलों में अनिश्चित रहता है। धन जिस प्रकार आता है उसी प्रकार खर्च भी हो जाता है। भाग्योदय विवाह के उपरांत होता है, परन्तु स्त्री से अनबन सदैव रहती है। इनकी प्रवृत्ति प्रदर्शनमय रहती है।
द्वितीय स्थान में वृषभ राशि होने पर अर्थ संचय होता है, पर टिकता नहीं। जीवन में कठिनाइयाँ कभी साथ नहीं छोड़तीं। जीवन में 18, 22, 24, 33, तथा 35वाँ वर्ष सफल कहा जा सकता है।
मिथुन राशि आर्थिक स्थिति को कमजोर बनाती है। जातक की भावुकता अर्थ लाभ में बाधक बनी रहती है। ये जातक व्यापार में सफल रहते हैं तथा छोटे लघु उद्योग, शिक्षा आदि के क्षेत्रों में ही सफलता प्राप्त करते हैं।
कर्क राशि कजूंसी की सूचक है। परिश्रम के अनुपात में जातक को लाभ नहीं मिलता। 20, 26, 27, 33, 34, 36, 45, 53, एवं 54वाँ वर्ष महत्वपूर्ण रहता है।
सिंह राशि द्वितीय भाव में होने पर बाल्यकाल आनन्दमय निकलता है। मध्यआयु में ये धन उड़ा देते हैं या व्यापार आदि में हानि होती है तथा भाग्य हमेशा इन्हें साथ देता है।
कन्या राशि होने पर जातक सम्पन्न नहीं होता। प्रारंभिक काल अर्थ संकट में गुजारते हुये परिश्रम से अर्थोपार्जन करते हैं। गर्म मिजाज व शीघ्र निर्णय हानि करवाता है। इन्हें व्यापार विशेष कर श्रृंगारिक वस्तुओं से लाभ होता है।
तुला राशि होने पर जातक शानो-शौकत में धन अधिक खर्च करता है, व्यापार इन्हें लाभ देता है। ये च्संद बना सकते हैं, पर निभा नहीं सकते। धन अनुचित कार्यों में व्यय होता है पर भाग्य फिर भी साथ देता है।
इस भाव में वृश्चिक राशि हो तो जातक के जीवन को डावांडोल कर देती है। नौकरी इन्हें हितकर नहीं होती। प्रवृत्ति वाणिज्य प्रधान होती है। कुटुम्ब व स्नेही ही इन्हें हानि देते हैं।
धनु राशि दूसरे घर में हो तो जातक लापरवाह होता है। साझेदारी इन्हें हानिकारक होती है। सहयोगी सदैव धोखा देते हैं। जीवन में कई उजार-चढ़ाव आते हैं। 24, 27, 28, 32, से 34, 37, 42, 48, 52, 54 तथा 58वाँ वर्ष उत्तम रहता है।
मकर राशि द्वितीय भाव में होने पर जातक सौभाग्यशाली होते हैं। ये हर योजना में सफल रहते हैं, इन्हें चाहिये कि ये स्वतन्त्र व्यापार करें।
कुंभ राशि होने पर भी जातक सम्पन्न होता है। इनकी आय के स्त्रोत कई होते हैं। पत्रकारिता, लेखन, प्रकाशन, व्यापार, राजनीति के कार्यों में लाभ प्राप्त करते हैं। अधिक विश्वासी इन्हें धोखा देता है, उत्तरार्ध जीवन को बनाता है।
मीन राशि दूसरे भाव में होने पर 22, 24, 28, 32, 33, 34, 37, 42, 48, 52, 54 एवं 55 वाँ वर्ष महत्वपूर्ण होता है। इन्हें अपने मनोभावों व विचारों पर नियंत्रण नहीं होता। ये जातक डॉक्टरी, वैद्यक दवाइयों के विक्रेता बनकर धन प्राप्त कर सकते हैं। यह धन संग्रह करने में सिद्ध हस्त होते हैं।

अब आगे की पक्तियों में द्वितीय भावस्थ ग्रहों का फल स्पष्ट करने का प्रयास करूंगा-
द्वितीय भाव में सूर्य – घन के संबंध में चिन्तित, पितृअर्जित धन नहीं मिलता, उत्तरार्ध-पूर्वाद्ध से सफल होता है। मध्यकाल में रोग, व्यापारिक कार्यों में सफल होते हैं।
द्वितीय भाव में चंद्र – सुखी, सम्पन्न, वृहद परिवार, स्त्रीपक्ष से सौभाग्यशाली, स्त्रीपक्ष के सम्पर्क से धनोपार्जन। चंद्रमा व्यक्ति को पत्रकार या लेखक बनाता है। पुस्तक व्यवसाय, प्रकाशन या लेखन से भाग्योदय होता है।
द्वितीय भाव में मंगल – दूसरे भाव में मंगल कमजोर आर्थिक स्थिति, धन गतिमान, कमजोर विद्या क्षेत्र, वार्तालाप मे पटु बनाता है। ऐसे जातक सेल्समेन बन सकते हैं।
द्वितीय भाव में बुध – कट्टर धर्म प्रिय, अर्थ संचय में प्रवीण, भाषण कला में दक्ष।
द्वितीय भाव में गुरू – दूसरे भाव में गुरू हो तो जातक धार्मिक नेता बनता है। कवि, लेखक या धर्मोपदेशक। लेखन कार्य से अर्थाेंपार्जन। सफल वैज्ञानिक हो सकता है। स्त्री पक्ष प्रबल ससुराल से अर्थ लाभ।
द्वितीय भाव में शुक्र – बड़ा परिवार, काम निकालने में चतुर, अर्थाभाव इन्हें कभी नहीं होता। ऐसे व्यक्ति डॉक्टर, वैद्य, पत्रकार या व्यवसायी होते हैं।
द्वितीय भाव में शनि – यह शुभ सूचक नहीं होता। यदि शनि स्वग्रही न हो तो जातक को धनहीन, परेशान व दुःखी करता है। धन के लिये संघर्ष करना पड़ता है। पर शनि स्वग्रही बन द्वितीय स्थानस्थ हो तो जातक का बाल्यकाल दुःख व अभाव में व्यतीत होता है परंतु युवावस्था तथा वृद्धावस्था शुभ सूचक होती है। अर्थ का आभाव नहीं रहता है।
द्वितीय भाव में राहु – जातक रोगी, स्वभाव से चिड़चिड़ा, कष्टप्रद, छोटे परिवार की स्थिति वाला होता है।
द्वितीय भाव में केतु – कटुभाषी धोखा देने वाला, दृढ़ निश्चयी। पिता की संपत्ति इन्हें कभी प्राप्त नहीं होती। उत्तरार्द्ध सुन्दर व धन सूचक। यदि सूर्य उच्च का होकर 11 वें भाव में हो तो जातक लखपति बनता है।

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नोट: व्यक्तिगत समस्या या कुंडली का विश्लेषण नहीं बताया जायेगा |

लेखक विख्यात ज्योतिषाचार्य— Dr.R.B.Dhawan

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