Sukh-Samriddhi

पौराणिक काल से ही भारतवर्ष में महालक्ष्मी साधना एवं पूजा की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित रही हैं, और हमारे ऋषियों ने भी अनेक गोपनीय अति-गोपनीय साधना पद्धतियाँ मानव जाति को दी हैं, परन्तु लगभग सभी ग्रन्थों में इस बात को स्वीकार किया है, कि शुक्राचार्य प्रणीत तांत्रोक्त महालक्ष्मी साधना पद्धति अपने आप में अद्वितीय, गोपनीय एवं दुर्लभ पद्धति रही है। यह एक ऐसी साधना पद्धति है, जिसकी खोज में अनेक तंत्रशास्त्रीयों का जीवन ही व्यतीत हो गया परंतु उन्हें इस पद्धति से महालक्ष्मी साधना का पूर्ण रहस्य कही नहीं मिला।
यूं तो महालक्ष्मी की यह साधना सम्पन्न करने के लिए उच्चकोटि के साधक हमेशा लालायित रहे हैं, सन्यासियों ने भी यह स्वीकार किया है कि विभिन्न साधना पद्धतियों में यह पद्धति उज्जवल रत्न की तरह है। अनेक समृद्ध मठों के योगियों (जिनके मठों में अतुलित सम्पत्ति विद्यमान है) ने भी एक स्वर से यह स्वीकार किया है कि महर्षि शुक्राचार्य ने ऐश्वर्य प्रदायिनी महालक्ष्मी की इस साधना पद्धति को स्पष्ट कर पूरे विश्व पर महान उपकार किया है।

Sukh samriddhi sadhna for diwali

Sukh Samriddhi sadhna of Lakshmi for diwali

महर्षि शुक्राचार्य की महालक्ष्मी सिद्धि-
शुक्राचार्य न केवल क्रांतिकारी और अद्वितीय महर्षि थे, अपितु आर्थिक दृष्टि से भी अत्यन्त ही सम्पन्न और समृद्ध एकमात्र संजीवनी विद्या से विभूषित ऋषि थे, इनका आश्रम हर प्रकार की सुख- सुविधाओं से सम्पन्न था, एक समय शुक्राचार्य के पास भी अनेक निर्धन ऋषियों की तरह धन और अन्न का अभाव था। और यह स्थिति उनके हृदय को बेध गई, उन्होंने मुट्ठी तान कर ऐलान किया कि मैं महालक्ष्मी की ऐसी साधना पद्धति को ढ़ूंढ़ निकालूंगा जिसके द्वारा लक्ष्मी को बरबस मजबूर हो कर मेरे आश्रम तथा मेरे शिष्यों के घर पर स्थायी रूप से निवास करना ही पड़ेगा; और जन्म-जन्म के लिये महालक्ष्मी को मुझे सम्पन्नता सौभाग्य और द्रव्य प्रदान करते ही रहना पड़ेगा। इस प्रकार शुक्राचार्य ने तांत्रोक्त महालक्ष्मी साधना पद्धति ढ़ूंढ़ निकाली जो कि अपने आप में अद्वितीय है, चाहे भाग्य में दरिद्रता लिखी हो, चाहे कितना ही दुर्भाग्य हो, चाहे घर में सात पीढ़ियों से दरिद्रता ने निवास कर रखा हो, परन्तु इस साधना के सम्पन्न करने पर गुरूमुख साधक आश्चर्यजनक रूप से सफलता और सम्पन्नता प्राप्त करता है; उसे यह विश्वास हो जाता है कि आज के युग में ऐसी गोपनीय तथा अचूक साधना पद्धतियाँ उपलब्ध हैं, शुक्राचार्य ने कहा था कि- चाहे इन्द्र का वज्र निष्फल हो जाये, चाहे रूद्र का त्रिशूल कुंठित हो जाये, और चाहे विष्णु का सुदर्शन चक्र कमजोर पड़ जाये, परन्तु इस साधना पद्धति का प्रभाव निष्फल नहीं हो सकता; जो साधक इस साधना पद्धति को पूर्णता के साथ सम्पन्न करता है, उसके जीवन में धन, यश, मान, पद, प्रतिष्ठा, और एैश्वर्य की अभिवृद्धि होती ही रहती है; वह चाहे कमजोर हो, अशक्त हो, और निर्धन हो, दरिद्र और अशिक्षित हो, परन्तु यदि दृढ़ता पूर्वक इस महालक्ष्मी साधना को सम्पन्न कर लेता है, तो वह निश्चय ही अतुलनीय धन और एैश्वर्य का स्वामी बन सकता है।

साधना का समय-
यह साधना दीपावली के अवसर पर ही सम्पन्न की जाती है, और केवल एक दिन की साधना है; इस वर्ष दीपावली 13 नवम्बर 2012 को है, मंगलवार को दीपावली पर्व होने की वजह से अपने आप में अद्भुत् योग बन गया है, इसलिये इस साधना-पूजा को 13-11-2012 को रात्रि में ही सम्पन्न करना चाहिए।

सधारण साधना सामग्री-
सामान्यतः पूजन में जिस पूजा सामग्री का प्रयोग होता है, वह सामग्री तो पहले से ही तैयार रखनी चाहिये जिसमें-
1. जलपात्र 2. गंगाजल, 3. दूध, 4. दही, 5. घी, 6. शहद, 7. शक्कर, 8. पंचामृत, 9. चन्दन, 10. केसर, 11 चावल, 12. पुष्प एवं पुष्प मालाएं, 13. घ में बना हुआ मिष्ठान्न द्रव्य, 14. धूप, 15. दीप, 16. मौली, 17. नारियल, 18. सुपारी, 19. फल और  20. दक्षिणा।
इसकी तैयारी पहले से ही कर लेनी चाहिए, इसके साथ ही साथ महर्षि शुक्राचार्य के बताये अनुसार साधना सामग्री को भी पहले से ही तैयार करके रख देनी चाहिए।

विषेश साधना सामग्री-
शुक्राचार्य प्रणीत महालक्ष्मी का चित्र जो महालक्ष्मी पद्धति से मंत्र सिद्ध हो, 2. शुद्ध चाँदी पर अंकित सिद्ध श्री महालक्ष्मी सूर्य यंत्र, 3. गोमती चक्र 12 दाने, 4. बारह लघु मोती-शंख, 5. बारह लाल हकीक तथा 6. दुर्लभ शुक्राचार्य चैतन्य माला।
महर्षि शुक्राचार्य ने कहा है, कि तांत्रोक्त रूप से महालक्ष्मी को आबद्ध करने के लिये और अपने घर में स्थायित्व देने के लिए साधक को इस प्रकार की सामग्री एकत्र कर लेनी चाहिये। (यह सिद्ध सामग्री पत्रिका कार्यालय से प्राप्त की जा सकती है। सिद्ध सामग्री दीपावली से 20-25 दिन पूर्व ही मंगवा लें। इस वर्ष कार्याल्य में गुरूजी ने इस विशेष साधना सामग्री के कुछ पैकिट सिद्ध किये हैं। इसमें कई वस्तुयें तो अत्यन्त दुर्लभ और अप्राप्य हैं, परन्तु फिर भी 4-5 पैकेट तैयार किये गये हैं, जिससे कि साधकों को एक साथ प्रमाणिक सामग्री प्राप्त हो सके। सारा अतिरिक्त खर्च पत्रिका कार्यालय ने उठाकर यह पैकिट मात्र 3100/- रू. में भेजने की व्यवस्था की है।
आप यह न सोचें कि अभी समय पड़ा है, और विलम्ब होने पर भी यह साधना सामग्री मिल ही जायेगी। क्योंकि सिद्धियाँ एवं दुर्लभ वस्तुयें बहुत कठिनाई से ही प्राप्त हो पाती हैं; इसीलिये आप तुरंत ही सामग्री के लिये आर्डर कर दीजिये। और निश्चिन्त हो जाईये। अतः तुरंत ही न्यौक्षावर राशि जमा करवायें।)

पूजा व्यवस्था-
दीपावली के दिन पूजा गृह को स्वच्छ करें, द्वार पर कुंकुम से स्वस्तिक बनावें, और साधना द्वार को पुष्प मालाओं की बन्दनवार से सजायें, उत्तर की ओर मुँह करते हुए सफेद आसन बिछायें और सामने पूजन एवं साधना सामग्री को रख दें। साधक स्वयं या अपनी पत्नी और परिवार के साथ यह पूजा और साधना करें तो ज्यादा उचित होगा।
सबसे पहले भूमि पर स्वास्तिक बना कर उस पर तांबे के कलश को स्थापित करें या पीतल अथवा मिट्टी के कलश को स्थापित कर सकते हैं, स्टील का प्रयोग न करें, फिर एक पूजा की थाली में शुक्राचार्य प्रणीत महालक्ष्मी का चित्र जो महालक्ष्मी पद्धति से मंत्र सिद्ध हो, को एक छोटे पीले रेशमी वस्त्र को तह करके छोटा आसन बना लें जिसे पूजा की थाली में रख कर उस पर स्थापित करें तथा एक स्थायी दीपक प्रज्जवलित करें। सुगधित धूप-अगरबत्ती जलायें, गन्ध अक्षत पुष्प से चित्र और यंत्र की विधिवत् पूजा करें।

ऊँ ऐं हृीं श्रीं अखण्ड मण्डलाकारं विश्व व्याप्यं व्यवस्थितम्। त्र्यैलोक्य मण्डितं येन मण्डलं तत् सदाशिवम्।।

इसके बाद फट् शब्द का उच्चारण करते हुये कलश को धो कर उसे स्वस्तिक पर रखें, और उसमें शुद्ध जल भरें, यदि गंगाजल हो तो थोड़ा सा गंगाजल भी डालें, फिर इसमें समस्त तीर्थो को आवाहान करें-
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी; जले स्मिन् सन्निधि करू।

फिर इस कलश में थोड़े से चावल, सुपारी सवा रूपया या दक्षिणा डालें, और इसमें पुष्प डालकर पांच पीपल के पत्ते बिछा कर उस पर पानी वाला नारियल रखें। नारियल पर पहले से ही लाल वस्त्र बांध दें या मौली लपेट दें, इसके बाद नारियल नीचे रख कर उस का पूजन करें, और कलश का जल छिड़कते हुए उसे पवित्र करें। फिर अपने सामने बारह कुंकुम की बिन्दियाँ एक पंक्ति में लगावें और उन सभी पर 1-1 मुट्ठी चावल की ढ़ेरी बनावें; तथा उन सभी ढ़ेरीयों पर- 1. एक-एक लघु मोती शंख, 2. एक-एक लाल हकीक तथा 3. एक-एक गोमती चक्र स्थापित करें, इस सभी ढ़ेरीयों की पूजा गंध, पुष्प, रोली, कलावा तथा मिष्ठान चढ़ाकर करें पूजा के समय इन मंत्रों का उच्चारण करें-
1. ऊँ ऐं हृीं क्लीं श्रीं अविध्नाय नमः। 2. मं महालक्ष्म्यै नमः 3. सं सरस्वत्यै नमः। 4. गं गणपतये नमः 5. क्षें क्षेत्रपालाय नमः। 6. विं विधात्र्यै नमः। 7. शं शंख-निधये नमः। 8. पं पदन निधये नमः। 9. आं वाहभ्यै नमः। 10. हं माहेश्वर्यै नमः। 11. ऊँ चामुण्डायै नमः। 12. ऊँ विजयायै नमः।

इन बारह ढ़ेरियों की पूजा कर गन्ध, अक्षत, पुष्प चढ़ा कर इनके सामने बारह तेल के दीपक जलायें, प्रत्येक ढ़ेरी के सामने एक दीपक लगावें, इसमें किसी भी प्रकार का खाने वाला तेल प्रयोग किया जा सकता है। इसके बाद भावना करते हुए कि मेरे सभी विध्न-बाधायें दूर हों, हाथ में चावल ले कर अपने और अपने परिवार के ऊपर घुमाते हुये दसों दिशाओं की ओर फेंक दें। चावल फेंकते समय यह मंत्र पाठ करें- अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमि-संस्थिता; ये भूता विघ्न-कर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञा। फिर पृथ्वी की प्रार्थना करते हुये उसे गन्ध, पुष्प, अक्षत समर्पित करें और आसन पर केसर की बिन्दी लगावें। पूजा करते समय इस मंत्र का उच्चारण करें-

    ऊँ भूमि त्वया धृता लोका देवि; त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरू चासनम्।।
भूमि पूजन के उपरांत अपने सामने अपने गुरूदेव का चित्र रख कर ऊँ गुं गुरूभ्यो नमः मंत्र से गुरू पूजन करें; इस प्रकार गं गणपतये नमः मंत्र से देव पूजा करें, और फिर अपने सामने एक पात्र में आठ बिन्दियाँ कुंकुम की लगावें और उन बिन्दियों पर चावलों की ढ़ेरी बनायें तथा प्रत्येक ढ़ेरी पर निम्न देव शक्तियों की स्थापना करें-

1. वास्तु पुरूषाय नमः। 2. भद्रकाल्यै नमः। 3. भैरवाय नमः। 4. द्वां द्वार देवताभ्यो नमः। 5. रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा। 6. पवित्र बृज भूम्यै हँु फट् स्वाहा। 7. श्रीं हृीं श्रीं हुँ फट् स्वाहा। 8. आं आधार शक्त्यै नमः।

फिर इन सब की यथोचित गन्ध, अक्षत, पुष्प, से पूजा करें; इसके बाद अपनी चोटी को गांठ लगावें और यदि चोटी नहीं हो तो चोटी वाले स्थान पर जल से पांचों अंगुलियों का स्पर्श करें, और फिर तीन बार दाहिने हाथ में जल ले कर आचमन करें, फिर अपने पूरे शरीर पर हाथ फेरते हुये अमृतीकरण न्यास करें-

यह उपरोक्त शरीर का अमृतीकरण न्यास है, जिससे कि पूरा शरीर अमृतमय हो जाता है, और साधना में पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। इसके बाद जो महालक्ष्मी साधना के लिये शुद्ध चाँदी पर अंकित सिद्ध श्री महालक्ष्मी सूर्य यंत्र मंगवाया है, इसको लकड़ी का एक पट्टा बिछा कर उस पर पीला वस्त्र बिछा कर कुंकुम से स्वास्तिक बनावें और उन पर चावल की ढ़ेरी बनाकर, फिर उस चावल की ढ़ेरी पर यह यंत्र रख दें। इसके बाद प्राणायाम, करें, और तीन बार गायत्री मंत्र का उच्चारण करें, और हाथ में जल ले कर न्यास विनियोग करें- अस्य श्री मातृका-न्यासस्य ब्रह्मा ऋृषिः। मातृका-सरस्वती देवता। हृीं बीजानि। स्वराः शक्तयः। अर्व्यवर्ते कीलक। श्री महालक्ष्मी-पूजनांगेत्वे न्यासे विनियोगः।

फिर ऋष्यिादि न्यास करते हुये अपने शरीर पर उच्चारण करते हुये दाहिने हाथ से शरीर का स्पर्श करें- ब्रह्मा ऋषिये नमः। शिरसि। गायत्री छन्दसे नमः मुखे। मातृका सरस्वती देवतायै नमः। हृदि। हृीं बीजेभ्यो नमः गुह्ये। स्वर शक्तिभ्यो नमः पादयो। अव्यक्त कीलकाय नमः नाभौ। श्री महालक्ष्मी पूजनांगत्वे न्यासे विनियोगाय नमः सर्वांगे।

इसके बाद गोपनीय कर न्यास अंग न्यास करें- हृीं अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः। श्रीं तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा। क्लीं मध्यमाभ्यां नमः। शिखायै वषट्। हृीं अनामिकाभ्यांम नमः कवचाय हुं। श्रीं कनिष्ठाभ्यां नमः। नेत्र-त्रयाय वौषट्। क्लीं करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः। अस्त्राय फट। इसके बाद भगवती महालक्ष्मी का ध्यान करें- कांत्या कांचन सन्निभां हिम गिरि प्रख्यैश्चतुर्भि र्गजेर्हस्तोत्क्षिप्त हिरण्मयामृत घटैरासिच्यमानां श्रियम्। विप्राणां वरमब्ज युग्ममभयं हस्तैः किरिटोज्ज्व लाम्; क्षेमौबद्ध नितम्ब बिम्ब लसितां वन्दे रविन्द स्थित।।

इसके बाद लकड़ी के पट्टे पर जो साधना के लिये बारह ढेरीयाँ तथा आठ ढेरीयाँ रखी हैं, उनमें से प्रत्येक को पुनः नमस्कार करें, और फिर पीले रंग के रेशमी आसन पर बैठकर शांत चित्त से, उत्तर दिशा की ओर मुख करके दुर्लभ शुक्राचार्य चैतन्य माला। से 11 माला मंत्र का जप करें।

    मंत्र- ऊँ हृीं हृीं क्लीं क्लीं श्रीं श्रीं मम् गृह आगच्छ आगच्छ सूर्यरूपी महालक्ष्मी नमः।।

मंत्र जप करने के बाद कपूर से देवी भगवती सूर्यरूपी महालक्ष्मी की आरती करें; और आरती के ऊपर हाथ घुमा कर पूरे शरीर को स्पर्श करें, इसके बाद एक कटोरी में गुड़ और घी मिलाकर देवी को बलि दें, (यह कटोरी पूजा सम्पन्न होने पर घर के बाहर चौराहे पर रख दें) जिससे कि घर की सारी दरिद्रता, दुःख, अभाव और दैन्य समाप्त हो सकें, उन द्वादश गोमती चक्र आदि ढेरीयों के सामने यह उच्छिष्ट बलि पात्र रखते हुये यह उच्चारण करें-

ऊँ ऐं नमः उच्छिष्ट-चाण्डालिनी मातंगि सर्व-जन-वशंकरि स्वाहा।

इसके बाद प्रज्जवलित दीपक से महालक्ष्मी की आरती करें और फिर श्री गणपति तथा देवी सूर्यरूपी महालक्ष्मी को अपने घर में स्थायी निवास करने की प्रार्थना करें और हाथ पैर धो कर सभी परिवार के साथ सुख पूर्वक भोजन करें, और विहार करते हुये वह बलि पदार्थ वाली कटोरी किसी चौराहे पर रख दें। जो स्थायी दीपक जल रहा है उसे सुबह तक जलने दें। सिद्ध श्री महालक्ष्मी सूर्य यंत्र एवं दुर्लभ शुक्राचार्य चैतन्य माला तथा शुक्राचार्य प्रणीत महालक्ष्मी के चित्र को दूसरे दिन प्रातः एक पीले रेशमी वस्त्र में लपेटकर या बांधकर अपने कोष में रख लें। शेष सभी पदार्थ (गोमती चक्र आदि द्वादश ढेरीयों वाले पदार्थ तथा पूजा से बची सामग्री) दूसरे दिन सुबह इकट्ठी करके जल में विसर्जित करें या भूमि में दबा दें। इस प्रकार यह सूर्यरूपी महालक्ष्मी साधना प्रयोग संसार की सर्वश्रेष्ठ साधना एवं पूजा पद्धतियों में एक है, जिसे इस वर्ष प्रत्येक साधक को सम्पन्न करना ही चाहिये।
शिष्य, पाठकों और साधकों के लिये यह सुविधा प्रदान की जाती है, कि वे पत्रिका कार्यालय से विशेष साधना सामग्री पैकिट जिसमें- शुक्राचार्य प्रणीत महालक्ष्मी का चित्र जो महालक्ष्मी पद्धति से मंत्र सिद्ध हो, 2. शुद्ध चाँदी पर अंकित सिद्ध श्री महालक्ष्मी सूर्य यंत्र, 3. गोमती चक्र 12 दाने,  4. बारह लघु मोती-शंख, 5. बारह लाल हकीक  तथा 6. दुर्लभ शुक्राचार्य चैतन्य माला। होंगे। प्राप्त करने के लिये शीघ्र सम्पर्क कर लें, क्योकि यह विशेष साधना सामग्री पैकिट सीमित मात्रा में ही उपलब्ध होंगे। इसके लिये न्यौक्षावर राशि 3100/-रू अग्रिम जमा करनी होगी। कम-से-कम 10-15 दिन पूर्व ही न्यौक्षावर राशि का डी.डी. Shukracharya Astro Pvt. Ltd. के नाम से दिल्ली के लिये बनवाकर पत्रिका कार्यालय के पते पर भेज, अथवा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के हमारे कम्पनी के खाते-Shukracharya Astro Pvt. Ltd. खाता नः 31810709561 में कैश जमा करवा कर भी मंगवा सकते हैं।

विख्यात् ज्योतिषाचर्य – Dr.R.B.Dhawan
कार्यालय का पता-

Shukracharya Astro Pvt. Ltd.
F- 265, Gali No 22, Laxmi Nagar, Delhi-110092.
Tel. 011-22455184, 9810143516
Web: shukracharya.com

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