विषयोग

विष योग :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

ज्योतिषीय मतानुसार जन्म कुंडली में शनि और चंद्रमा का योग जातक के लिए कष्टकारी माना गया है। सिद्धांत यह है कि, शनिदेव अपनी धीमी गति के लिये जाने जाते हैं, और चन्द्रमा अपनी तीव्र गति के लिये, अर्थात शनि अधिक क्षमताशील होने के कारण अक्सर चंद्रमा को प्रताड़ित करते हैं। यदि चंद्र और शनि की युति कुंडली के किसी भी भाव में हो, तो ऐसी कुंडली में उनकी आपस में दशा-अंतर्दशा के दौरान विकट फल मिलने की संभावना होती है। (कुंडली में चंद्राराशि के अनुसार आप का प्रतिदिन ग्रह फल बदलता रहता है, इस ग्रह फल को जानने के लिये आप मेरी daily horoscope prediction app डाउनलोड कर सकते हैं। इससे आप प्रतिदिन अपना चंन्द्र राशि फल जान सकेंगे। Daily horoscope prediction app आपको गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध होगी।)
शनि:- धीमी गति, लंगड़ापन, शूद्रत्व, सेवक, चाकरी, पुराने घर, खपरैल, बंधन, कारावास, आयु, जीर्ण-शीर्ण अवस्था आदि का कारक ग्रह है।

जबकि चंद्रमा:- मन की चंचलता, माता, स्त्री का सहयोग, तरल पदार्थ, सुख, कोमलता, मोती, दिल से स्नेह सम्मान, आदि का कारक है।

इन दोनो की अपनी-अपनी गति और अपनी-अपनी प्रकृति है, जो कि एक-दूसरे से विपरीत है, उदाहरणार्थ एक साथ रहने वाले दो प्राणी हैं, उन्होंने मिलकर एक कार्य करना है, तो एक सामान्य से जल्दी करेगा ओर दूसरा सामान्य से भी धीरे करेगा। अब दोनों में इसी बात का झगडा हमेशा रहेगा। शनि और चंद्र की युति से बनने वाले योग को विषयोग के नाम से जाना जाता है। यह कुंडली का एक अशुभ योग है। ये विषयोग जातक के जीवन में यथा नाम विषाक्तता घोलने में पूर्ण सक्षम है। जिस भी जातक की कुण्डली में विषयोग का निर्माण होता है, उसे जीवन भर अशक्तता, मानसिक व्याधियां, भ्रम, रोग, बिगड़े दाम्पत्य सुख, आदि का सामना करना पड़ता है। हां, जिस भी भाव में ऐसा विषयोग निर्मित हो रहा हो, उस भाव के अनुसार ही अशुभ फल की प्राप्ति होती है।
जैसे यदि किसी जातक के लग्न चक्र में शनि-चंद्र की युति हो तो ऐसा जातक शारीरिक तौर पर बेहद अक्षम महसूस करता है। उसे जीवन के कुछ भाग में कंगाली और दरिद्रता का सामना करना पड़ सकता है।

लग्न में:- शनि-चंद्र की युति हो जाने से उसका प्रभाव सप्तम भाव पर बेहद नकारात्मक होता है, जिससे जातक का दाम्पत्य जीवन बेहद बुरा बीतता है। लग्न शरीर का प्रतिनिधि है, इसलिए इस पर चंद्र और शनि की युति बेहद नकारात्मक असर छोड़ती है। जातक जीवन भर रोग-व्याधि से पीड़ित रहता है।
द्वितीय भाव में:- शनि-चंद्र की युुति बने तो जातक जीवन भर धनाभाव से ग्रसित होता है।
तृतीय भाव में:- यह युति जातक के पराक्रम को कम कर देती है।
चतुर्थ भाव में:- सुख और मातृ सुख की न्यूनता तथा ।
पंचम भाव में:- संतान व विवेक का नाश होता है।
छठे भाव में:- ऐसी युति शत्रु-रोग-ऋण में बढ़ोत्तरी।
सप्तम भाव में:- शनि-चंद्र की युति संयोग पति-पत्नी के बीच सामंजस्य को खत्म करता है।
अष्टम भाव में:- आयु नाश।
नवम भाव में:- भाग्य हीन बनाता है।
दशम भाव में:- शनि-चंद्र की युति पिता से वैमनस्य व पद-प्रतिष्ठा में कमी करती है।
ग्यारहवें भाव में:- एक्सिडेंट की संभावना बढ़ाने के साथ लाभ में न्यूनता आती है।
बारहवें भाव में:- शनि-चंद्र की युति व्यय को आय से बहुत अधिक बढ़ाकर जातक का जीवन कष्टमय बना देने में सक्षम है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी ज्योतिषी से सलाह लेकर उचित उपाय किए जाये तो ‘विषयोग’ के दु:ष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। आगे की पंक्तियों में कुछ सरल उपाय दिए जा रहे हैं, इनका प्रयोग अवश्य ही लाभदायक रहेगा।

1. शनैश्नीचरी अमावस की रात्रि में नीली स्याही से 10 पीपल के पत्तों पर शनि का जाप करते हुए एक-एक अक्षर लिखें :- 1. ॐ, 2. शं, 3. श, 4. नै, 5. श (यह अक्षर आधा), 6. च, 7. रा, 8. यै, 9. न, 10. मः इस प्रकार 10 पत्तो में 10 अक्षर लिख कर फिर इन पत्तो को काले धागे में माला का रूप देकर, शनि देव की प्रतिमा या शिला में चढ़ाये। तब इस क्रिया को करते समय मन ही मन शनि मंत्र का जाप भी करते रहना चाहिए।

2. पीपल के पेड़ के ठीक नीचे एक पानी वाला नारियल सिर से सात बार उतार कर फोड़ दें और नारियल को प्रसाद के रूप में बॉट दें।

3. शनिवार के दिन या शनि अमावस्या के दिन संध्या काल सूर्यास्त के पश्चात् श्री शनिदेव की प्रतिमा पर या शिला पर तेल चढ़ाए, एक दीपक तिल के तेल का जलाए दीपक में थोड़ा काला तिल एवं थोड़ा काला उड़द डाल दें। इसके पश्चात् 10 आक के पत्ते लें, और काजल में थोड़ा तिल का तेल मिला कर स्याही बना लें, और लोहे की कील के माध्यम से प्रत्येक पत्ते में नीचे लिखे मंत्र को लिखे। यह पत्ते जल में प्रवाहित कर दें।
4. प्रतिदिन रूद्राक्ष की माला से कम से कम पाँच माला महामृत्युन्जय मंत्र का जाप करें। इस क्रिया को शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से आरम्भ करें।

5. माता एवं पिता या अपने से उम्र में जो अधिक हो अर्थात पिता माता समान हो उनका चरण छूकर आर्षीवाद ले।
6. सुन्दर कांड का 40 पाठ करें। किसी हनुमान जी के मंदिर में या पूजा स्थान में शुद्ध घी का दीपक जलाकर पाठ करें, पाठ प्रारम्भ करने के पूर्व अपने गुरू एवं श्री हनुमान जी का आवाहन अवश्य करें।

7. श्री हनुमान जी को शुद्ध घी एवं सिन्दूर का चोला चढ़ाये श्री हनुमान जी के दाहिने पैर का सिन्दूर अपने माथे में लगाए।

मेरे और लेख देखें :- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in, gurujiketotke.com,vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com

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