आजीविका

आजीविका निर्णय में सर्वाधिक विचारणीय है, कुण्डली का दशम भाव।

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

हर व्यक्ति के सामने यह समस्या है कि वह अपने बेटे-बेटियों को किस व्यवसाय में लगाये जिससे वे अपनी आजीविका कुशलता पूर्वक चला सकें। इससे पहले शिक्षा क्षेत्र निश्चित करना होता है। इसके लिए कुण्डली का द्वितीय भाव, पंचम भाव एवं नवम भाव विशेष विचारणी होते हैं। लेकिन आजीविका क्षेत्र निर्धारण में कुण्डली का दशम भाव (कर्म भाव) सर्वाधिक महत्व का होता है।

व्यापार मुद्रा नृपमान प्रयोजन चापि पितुस्तथैव।
महत फलांनि खलु सर्वमेतद्राज्यभिधाने भवने विचार्यम्।।

व्यापार मुद्रा, राजा से आदर राज्य प्रयोजन, पिता, बड़े कार्यों में सफलता आदि बातों का विचार दशम भाव से करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, आजीविका, पद प्राप्ति, पदोन्नति, क्रमोन्नति आदि का विचार तकनीकी कार्य भी दशम भाव से करना चाहिए।

1. लग्न या चन्द्रमा से दशम में मंगल हो या दशम का स्वामी मंगल के नवांश में स्थित हो तो व्यक्ति का व्यवसाय पुलिस, सेना आदि से संबंधित अथवा लाल रंग की वास्तुओं से संबंधित या भूमि खनिज आदि से होता है। अग्नि संबंधित कार्यों से भी व्यक्ति की आजीविका का होती है। जासूसी, नेता, दलाली, पहलवानी आदि से भी मंगल जोड़ता है।

2. जब लग्न या चन्द्रमा से दशम में सूर्य हो अथवा दशमेश सूर्य के नवमांश में स्थित हो तो जातक की आजीविका विचित्र प्रकार की होती है। जातक राज खजाने से लाभ पाता है। आचार्य वाराहमिहिर मानते हैं कि ऐसी स्थिति में व्यक्ति का व्यवसाय, दवाइयां, ऊन, घास, स्वर्णाभूषण आदि से संबंधित होता है लेकिन सर्वार्थ चिंतामणिका कहना है कि व्यक्ति का व्यवसाय राज्यकार्य से संबंधि होता है यथा दूत कर्म, संचार परिवहन आदि।

3. यदि चन्द्रमा दशम भाव में हो या चन्द्रमा के नवमांश दशम भाव का स्वामी ग्रहा हो तो यह व्यक्ति को औषधि से संबंधित व्यवसाय में लगाता है कारण चन्द्रमा वनस्पति एवं औषधियों का कारकग्रह है। इसके अतिरिक्त चन्द्रमा जल से पैदा होनेवाली वस्तुएं, खेती के काम-कपड़ों का व्यापार, खेल एवं कला कौशल से संबंधित व्यवसाय देता है।

4. यदि कर्म भाव में बुध हो अथवा कर्मेश बुध के नवांश में स्थित हो तो जातक का व्यावसायिक क्षेत्र बैंकिंग, रूपयों का लेन-देन, गणित, ज्योतिष, शिल्पकला, राजनीति, पुस्तक लेखन, संपादन एवं संबंधित आजीविका होती है। इसके अतिरिक्त यदि इस प्रकार के योग के साथ-साथ व्यापार के भी योग हों तो उनका व्यवसाय कपड़े आदि से संबंधित होता है। इस प्रकार का बुध व्यक्ति को व्याख्याता, उपदेशक, डाकतार विभाग तथा राजदूत के कार्यों से भी जोड़ता है।

5. यदि जन्मक कुण्डली के दशम भाव में गुरु स्थित हो या दशमेश नवांश कुण्डली में गुरु की राशि में हो तो गुरु व्यक्ति को पांडित्य कर्म, कथा वाचक देव उपासना, पूठा, पठन, पाठन, धर्माचार्य, मंत्रणा आदि देना आदि से जोड़ते हैं। इसके अतिरिक्त देव गुरु बृहस्पति व्यक्ति को न्यायधीश, वकील, शिक्षक, संपादक, कवि, लेखक, ज्योतिषी, कमीशन एजेन्ट, दूध एवं मिठाई का व्यापार आदि से जोड़ती हैं।

6. जब शुक्र कर्म भाव में बैठा हो या कर्म भाव का स्वामी शुक्र के नवांश में स्थित हो तो व्यक्ति की आजीविका निम्न व्यवसायों से संबंधित होगी। नाचना गाना, फिल्म अभिनय, लेख, कविता, पशुओं का व्यापार या पशुपालन, सौन्दर्य प्रसाधन, रत्न सोना आदि, गुड़, चावल, फल, कृषि के कार्य, दूध, दही, वकालत, अध्यापन एवं वाहन आदि अर्थात् इन्हीं व्यवसायों से धन कमाने में सफल हो सकेगा।

7. दशमस्थ शनि अथवा दशमेश शनि के नवांश में हो तो व्यक्ति का धन कमाने का साधन निम्न व्यवसायों से होगा। यदि शनि की स्थिति कुण्डली में बलयुक्त हुई तो आजीविका उच्च स्तर की होगी और शनि कुण्डली में निर्बल हुआ तो आजीविका सामान्य स्तर की होगी। कारीगरी, हस्तकला, नौकरी,दौड़ना, लोहे के यंत्रा, यंत्र निर्माण, भट्टियों का काम, ताप, बिजली, प्लास्टिक उद्योग, रबर उद्योग, जूट, ऊन आद के उद्योग कालीन निर्माण, वस्त्र बुनने की छोटी मशीनें, ड्राइविंग, चिकित्सा। पाद रोग, अस्थिरोग, हृदय रोग, वायु रोग, कैंसर, टी.वी. तथा सभी संक्रामक रोग शल्यक्रिया, पुस्तकालय विज्ञान, जिल्दसाजी, कागज उद्योग, भवन निर्माण सामग्री का निर्माण और व्यवसाय, ट्रांसपोर्ट, सामान का भेना, पोस्टमैन, कुली, सेवक, जेल के अधिकार, शस्त्र निर्माण, शीशा, रांगा, एल्मुीनियम आदि विविध धातु की वस्तुओं का निर्माण, भैंस, बकरी, पशुपालन, मद्य निर्माण, शिकार, वन-जंतु रक्षा आदि।
राहु-केतु के बारे में विद्वान एक मत नहीं है। राहु मकर का स्वामी है। उच्च स्थान वृश्चिक राशि है तो नीचस्थान वृषभराशि है। केतु मेष राशि का स्वामी है। उच्च स्थान वृषभ तथा नीच स्थान वृश्चिक है। कुछ विद्वानों के कुम्भ मूल त्रिकोण राशि हैं। सामान्यतः राहु मिथुन में उच्च राशि में तथा धनु ने नीच का होता है। केतु धनु में उच्च का तथा मिथुन में नीच का होता है।

8. यदि राहु दशम में हो या दशमेश राहु की राशि में नवांश कुण्डली में हो तो व्यक्ति का व्यवसाय तकनीकी कार्य, टाइपिंग, कम्प्यूटर आॅपरेटर, स्टोनोग्राफर, कुली, मजदूर, शिल्पी, ठेकेदार, जासूस, ड्राफ्ट्स मैन, वायुयान या डाकतार विभाग, उपन्यासकार, पुरातत्व विभाग, तांत्रिक, कम्पोजिटर, मैकेनिक, उपदेशक, ड्राइवर, बिजली, टेलीफोन, खेल, जेवर, जल्लाद, राजनीति आदि में कोई भी हो सकता है।

9. केतु यदि दशमभावस्थ हो या दशमेश केतु के नवांश में हो तो व्यक्ति की आजीविका निम्नवत होती है। गणित, धर्मशास्त्र, योग, मनोविज्ञान चिकित्सा, क्षय रोग, बुखार, पशुओं के जहर की चिकित्सा, शिकार, पाषाण कला, सींगों वाले पशुओं का व्यापार, दलाली, संपत्ति का आदान-प्रदान, रबर प्लास्टिक व्यवसाय, जासूसी, कैमिकल आदि।

दशम भाव के अतिरिक्त लग्न, लग्नेश, चन्द्र लग्न, चन्द्र लग्नेश, सूर्य लग्न, सूर्य लग्नेश पर सब ग्रही के प्रभाव निकालकर देखे कि कुण्डली पर सर्वाधिक प्रभाव किस ग्रह का है। व्यक्ति की आजीविका उसी ग्रह से संबंधित होगी। यह गणना भी अनुभव मे बिल्कुल सही पाई गई है।

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Dr.R.B.Dhawan द्वारा Uncategorized में प्रकाशित किया गया

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