करवा चौथ

करवा चौथ 27 अक्तूबर 2018

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

करवा चौथ भारतीय नारियों के लिए एक मंगल पर्व है। इस दिन विवाहित स्त्रीयाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए निर्जल व्रत रखती हैं। इस व्रत को सौभाग्यवती स्त्रियाँ एवं उसी वर्ष विवाहित हुई लड़कियाँ करती हैं। इस व्रत में प्रमुखतः गौरी व गणेश का पूजन किया जाता है। शिव-कार्तिकेय व चंद्रमा का पूजन भी प्रशस्य है। करवा चौथ के व्रत में कथा कहने या सुनने का विधान है। हांलाकि क्षेत्र के अनुसार कथाओं में थोड़ा बहुत परिवर्तन होता है, लेकिन सभी कथाओं का सार सौभाग्य वृद्धि से जुड़ा है। हम यहाँ करवा चौथ की अलग-अलग क्षेत्रों में कही जाने वाली प्रमुख कथाओं का उल्लेख कर रहे हैं।

करवा चौथ कथा -(1):-
बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद करके घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे लेकिन बहन ने बताया कि आज उसका करवा चौथ का निर्जल व्रत है, और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घय देकर ही खा सकती है। चूँकि अभी चंद्रमा नहीं निकला है, इसलिये वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है। सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं गई और दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता जैसे चतुर्थी का चाँद निकल रहा हो। इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घय देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घय देकर खाना खाने बैठ जाती है। वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है, तो उसमें बाल निकल आता है, और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है। उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है। कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टुटने के कारण देवता उससे नाराज हो गये हैं, उन्होंने ऐसा किया है। सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुर्नजीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है। एक साल बाद फिर करवा चैथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो’ मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने को कहकर चली जाती है। इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिये जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे तब तक उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कहकर वह चली जाती है। सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है लेकिन वह टाल-मटोल करने लगती है। इसे देख करवा उसे जोर से पकड़ लेती है, और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिये कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिये नोचती-खसोटती है लेकिन करवा नहीं छोड़ती है। अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है, और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभुकृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

करवा चौथ कथा – (2) :-
एक के सात लड़के और एक लड़की थी। सेठानी सहित उसकी बहुओं और बेटी ने करवा चौथ का व्रत रखा था। रात्रि को साहूकार के लड़के भोजन करने लगे तो उन्होंने अपनी बहन से भोजन के लिये कहा। इस पर बहन ने उत्तर दिया भाई ! चाँद नहीं निकला है। उसके निकलने पर अर्घ्य देकर भोजन करूँगी, बहन की बात सुनकर भाईयों ने नगर के बाहर जाकर अग्नि जला दी और छलनी लेकर उसमें से प्रकाश दिखाते हुए उन्होंने बहन से कहा बहन! चाँद निकल आया है। अर्घ्य देकर भोजन कर लो। यह सुन उसने अपनी भाभियों से कहा कि आओ तुभ भी चंद्रमा को अर्घ्य दे लो, परंतु वे इस काण्ड को जानती थीं। उन्होंने कहा बहनजी! अभी चाँद नहीं निकला, तेरे भाई तेरे साथ धोखा करते हुए अग्नि का प्रकाश छलनी से दिखा रहे हैं। भाभियों की बात सुनकर भी उसने कुछ ध्यान न दिया और भाइयों द्वारा दिखाए प्रकाश को ही अध्र्य देकर भोजन कर लिया। इस प्रकार व्रत भंग करने से गणेशजी उस पर अप्रसन्न हो गये। इसके बाद उसका पति बीमार हो गया और जो कुछ घर में था, उसकी बीमारी में लग गया। जब उसे अपने किये हुए दोषों का पता लगता है, तो उसने पश्चाताप किया। गणेशजी की प्रार्थना करते हुए। विधि-विधान से पुनः चतुर्थी का व्रत करना आरंभ कर दिया। श्रद्धानुसार सबका आदर करते हुए सबसे आशीर्वाद ग्रहण करने में ही मन को लगा दिया। इस प्रकार उसके श्रद्धा-भक्ति सहित कर्म को देखकर भगवान गणेश उस पर प्रसन्न हो गये और उसके पति को जीवनदान देकर उसे आरोग्य प्रदान करने के पश्चात् धन-संपत्ति से युक्त कर दिया। इस प्रकार जो कोई छल-कपट को त्यागकर श्रद्धा-भक्ति से चतुर्थी का व्रत करेंगे, वे सब प्रकार से सुखी होते हुये क्लेशों से मुक्त हो जायेंगे।

श्री गणेश विनायकजी की कथाः-
एक अंधी बुढ़िया थी, जिसका एक लड़का और बहू थी। वह बहुत गरीब थी। वह अंधी बुढ़िया नित्य प्रति गणेशजी की पूजा किया करती थी। गणेशजी साक्षात् सम्मुख आकर कहते थे कि बुढ़िया माई तू जो चाहे माँग ले। बुढ़िया कहती है मुझे माँगना नहीं आता सो कैसे और क्या माँगू। तब गणेशजी बोले कि अपने बहू-बेटे से पूछकर माँग ले। तब बुढ़िया ने अपने पुत्र और बहू से पूछा तो बेटा बोला कि धन माँग ले और बहू ने कहा कि पोता माँग ले। तब बुढ़िया ने सोचा कि बेटा-बहू तो अपने-अपने मतलब कि बातें कर रहे हैं। अतः उस बुढ़िया ने पड़ोसियों से पूछा तो पड़ोसियों ने कहा कि बुढ़िया तेरी थोड़ी-सी जिंदगी है। क्यों माँगे धन और पोता, तू तो केवल अपने नेत्र माँग ले, जिससे तेरी शेष जिंदगी सुख से व्यतीत हो जाए। उस बुढ़िया ने बेटे, बहू तथा पड़ोसियों की बात सुनकर घर में जाकर सोचा, जिससे बेटा-बहू और मेरा सबका ही भला हो वह भी माँग लूँ और अपने मतलब की चीज भी माँग लूँ। जब दूसरे दिन गणेशजी आये और बोले, बोल बुढ़िया क्या माँगती है। हमारा वचन है जो तू माँगेगी सो ही पाऐगी। गणेशजी के वचन सुनकर बुढ़िया बोली हे गणराज यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आँखों में प्रकाश दें, नाती-पोता दें और समस्त परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दें। बुढ़िया की बात सुनकर गणेशजी बोले बुढ़िया माँ तूने तो मुझे ठग लिया। खैर, जो कुछ तूने माँग लिया वह सब तुझे मिलेगा। ये कहकर गणेशजी अंर्तध्यान हो गये। हे गणेशजी जैसे बुढ़िया माँ के माँगने पर आपने सब कुछ दिया है। वैसे ही सबको देना और हमको भी देने की कृपा करना।

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