प्रेम रोग, Prem rog

प्रेम रोग और शुक्र ग्रह (ज्योतिष में प्रेम का कारक ग्रह शुक्र को माना गया है।

Dr.R.B.Dhawan, top best astrologer in Delhi, astrological consultant.

आजकल चारों ओर योग की चर्चा हो रही है। इसके ठीक विपरीत भोग के लिए भी कानून सरल हो गये हैं, विपरीत लिंग के प्रेम पाश में बंधे कुछ युवक-युवती पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर दैहिक सुख के भंवर में फंस जाते हैं, उन्हें लगता है कि जीवन में उसे आत्मसंतुष्टि प्राप्त हो यही जीवन का उद्देश्य है। कुछ लोगों का कहना है की भोग भी इसी योग का ही एक स्वरूप प्रेम है। तर्क दिया जाता है कि भगवत प्राप्ति के लिए भी प्रेम आवश्यक है, कहा भी है –

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा।
किये जोग तप ग्मान विराग।।

योग, तप, ज्ञान और वैराग्य में भी यदि प्रेम का पुट नहीं हो तो, भगवद् प्राप्ति नहीं होती। प्रेम का जब प्रथम बार हृदय में प्रवेश होता है तो, प्रत्येक जीव एक विशेष ऊर्जा से आहत हो जाता है। अपने प्रेमी के दर्शन न होने पर वह इतना व्याकुल हो जाता है कि, उसे कहीं भी चैन सुख नहीं मिल पाता। चाहे प्रेम का स्वरूप कोई भी हो। मीरा के प्रेम का स्वरूप पूर्णतः आध्यात्मिकता से प्रेरित था फिर भी मीरा कहती थी-

हे री मैं तो प्रेम दिवानी मेरो दरद न जाने कोय।
घायल की गति घायल जाने और न जाने कोय।
मीरा री प्रभु परी मिटेगी जब वैध सांवरो होय।

वर्तमान में भी इस प्रकार के प्रेम का स्वरूप कहीं-कहीं प्रतीत होता है, लेकिन अधिकांश तथा मात्र धोखा ही नजर आता है। पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति के प्रभाव के कारण वर्तमान में प्रेम सिर्फ दिल्लगी बनकर रह गया है। अर्थात एक से बिछुड़ना दूसरे से जुड़ना, (अफेयर्स और ब्रेकप) इस प्रकार से क्रम चलता रहता है, एवं जिंदगी गुजरती रहती है। पुराने वस्त्र उतार कर जिस प्रकार नये वस्त्र धारण किये जाते हैं, उसी प्रकार इसका स्वरूप भी बन गया है। इसी प्रेम के स्वरूप को समझने हेतु हम ज्योतिष शास्त्र की शरण में जाए तो हमें कुछ संकेत अवश्य प्राप्त होंगे कि जातक का प्रेम स्वच्छ एवं निर्मल है, अर्थात पूर्णतः पवित्र मन से प्रेरित है, या कामवासना से प्रेरित है।
ज्योतिष में शुक्र को प्रेम का स्थायी कारक माना गया है। जन्मांग चक्र का पंचम भाव प्रेम का आधिपत्य की सूचना देता है, पंचम से पंचम अर्थात नवम भी प्रेम का भाव है। चतुर्थ भाव हृदय का, तृतीय भाव जातक की इच्छा का तो एकादश भाव सर्वविधि लाभ का एवं अष्टम कामेन्द्रियों का और द्वादश स्थान काम वासना की संतुष्टि का भाव माना जाता है। ग्रहों में चन्द्र को चंचल एवं मन का कारक भाव माना जाता है। शुक्र प्रेम तथा कामेच्छा को पैदा एवं मंगल काम वासना को ऊर्जा देता है, बृहस्पति शुद्ध आध्यात्मिकता का एवं शनि ग्रह वैराग्य व राहु, केतु विजातीय स्वभाव के ग्रह होने से विजातीय संबंधों को दर्शाते हैं। इन कारकों और कुंडली के ग्रहों की परस्पर युति एवं दृष्टि पर ही शु़क्र अर्थात प्रेम का स्वरूप निर्धारित होता है। शुक्र की युति किस भाव में एवं किस ग्रह के साथ है, शुक्र पर किस ग्रह की दृष्टि है, आदि स्थितियां प्रेम के स्वरूप को नियंत्रित एवं नियमित करती है।

विभिन्न ग्रहों की शुक्र से युति एवं प्रेम का स्वरूप :-

सूर्य एवं शुक्र की युति होने पर जातक अपने प्रेम में प्रतिष्ठा को महत्वपूर्ण मानता है। उसका प्रेम हमेशा अपने से उच्च स्तर के लोगों से प्रेरित होता है, उनसे सुख प्राप्त करने की कोशिश भी करता है। लग्न से पंचम, नवम या दशम से युति होने पर प्रेमी से मान- सम्मान एवं सुख की प्राप्ति बिना किसी परेशानी के प्राप्त हो जाती है, लेकिन अन्य भावों में युति होने पर संघर्ष प्रेम प्राप्ति हेतु बना रहता है।
चन्द्र एव शुक्र की युति होने पर जातक प्रेम के मामले में चंचल रहता है। विशेष रूप से जब दोनों में से कोई एक लग्नेश हो या लाभ भाव में युति हो। लाभ भाव में युति होने एवं दोनों में से कोई एक अष्टम या द्वादश का स्वामी भी हो तो ऐसा जातक शारीरिक सुखी की प्राप्ति होने तक ही प्रेम संबंध रखता है। अन्य भावों में युति होने पर भी जातक प्रेम संबंधाें को स्थायी नहीं रख पाता दशम या द्वादश से युति हो तो, विदेशी स्त्रियों से प्रेम करवाकर आर्थिक सुख भी देता है।
मंगल व शुक्र की युति होने पर जातक का प्रेम वासना से युक्त होता है। वासना पूर्ति हेतु प्रेम परिवर्तन होता रहता है, लग्न में यदि युति बन रही हो तो, ऐसा जातक सभी सीमाएं पार कर व्याभिचारी बन जाता है। सप्तम या अष्टम में होने पर वासना पूर्ति हेतु अपने चारित्रिक पतन को बढ़ाता है एवं दु:ख प्राप्त करता है।
बुध व शुक्र की युति होने पर जातक-जातिका का प्रेम राजकुमार की भांति होता है। ऐसा जातक प्रेम के मामले में किसी की दखलांदाजी पसंद नहीं करता है, एवं प्रेम की स्थिति अनुसार परिवर्तित भी कर लेता है। ऐसे जातक रोमांटिक प्रेमी होते हैं। प्रेम को रोमांच मानकर चलना इनकी नियति बन जाती है। सप्तम में युति होने पर जातक अपनी महिला मित्र का पूर्णतया सुखोपभोग करने में कुशल रहता है।
बृहस्पति एवं शुक्र की युति होने पर प्रेम में सौंदर्य, सौशिष्यता, आध्यात्मिकता व दार्शनिकता का प्रभाव देखने को मिलता है। बृहस्पति व शुक्र दोनों धन के कारक हैं। इसलिए आर्थिक स्तर, ज्ञान से प्रभावित होकर प्रेम का आविर्भाव होता है। इस प्रकार की युति जातक को पूर्णतः धन, मान, सम्मान एवं आत्म स्वाभिमान को जागृत करने वाली होती है।
शनि, राहु व केतु से यदि शुक्र की युति बन रही हो तो, प्रेम अन्य वर्गों से होता है। प्रेम विजातीय स्वरूप का हो जाता है। ऐसा जातक भोगी एवं व्याभिचारी होता है। विषय लाभ की प्राप्ति के लिए हमेशा आतुर रहता है। उसका प्यार बिना द्वंद्व वाला एवं जल्दी ही प्रचारित हो जाता है। राहु की युति प्रेम के लिए पृथक्कता का वातावरण निर्मित करवाती है, तो केतु से युति होने पर प्रेम संबंध घनिष्ठ बनाने हेतु जातक को प्रेरित करती है।
इन युतियों के होने पर भी पूर्णतः प्रभाव कभी कभार नहीं दिखता क्योंकि जब शुक्र से युति कारक ग्रह की शुक्र से अंशात्मक दूरी अधिक हो तो, जातक के प्रेम में उस ग्रह संबंधी भावों, विशेषताओं का स्पष्ट एवं पूर्णतः प्रभाव दृष्टिगोचर होगा। लेकिन दूरी होने पर प्रभाव का असर तो रहेगा, लेकिन जातक की प्रेम को अभिव्यक्त करने की क्षमता कम होगी। प्रेम के स्वरूप को पूर्णतया प्रकट करने की जातक की अभिलाषा मूर्त रूप नहीं ले पाएगी। जातक के अन्तर्मन पर ही इसका प्रभाव अधिक होगा। बाह्य मन पर एवं व्यवहार पर नहीं।

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