त्राटक

त्राटक एक यौगिक क्रिया या साधना है, त्राटक कहते हैं- बिना पलक झपके एकटक किसी वस्तु या व्यक्ति की ओर देखते रहने को, यह साधना मन को एकाग्र और केन्द्रित करने के लिये बहुत उपयोगी है। वस्तुत: मन को एकाग्र करना ही मनुष्य के लिये सब से कठिन कार्य है। मन की शक्ति आपार है, इस शक्ति को यदि ठीक प्रकार से समझकर (संंगठित करके) सही दिशा में प्रयोग किया जाये तो मनुष्य ऐसे-ऐसे आश्चर्यजनक कार्य करने लगता है, जिनके परिणाम भौतिक अविष्कारों से भी अधिक महत्व के होते हैं, तथा लौकिक व अलौकिक सिद्धियाँ भी प्राप्त हो सकती हैं, जिनका प्रयोग कर साधक एक महान विभूति की तरह सम्मानित हो सकता है।

कैसे करें त्राटक साधना- मनुष्य के मन में एक पल में सैकडों विचार आते हैं (यह मानव मस्तिष्क की कार्य प्रणाली है।) और वे सैकडों विचारों पर एक समय में कार्य नहीं कर सकता। अतः उनमें से अधिकांश विचार निरर्थक हो जाते हैं, यदि उनमें से मस्तिष्क दो चार विचार चुन लेता है, तो फिर यह निर्णय करता है कि इनमें से कौन सा विचार उत्तम है? कौन सा गलत है? परंतु आमतौर पर इसमें भी वह सही या गलत का चुनाव नहीं कर पाता, तब वह असमजस की स्थिति में रहता है, और परिणाम स्वरूप कोई भी कार्य नहीं कर पाता। क्योकि उसका आज्ञाचक्र सक्रीय नहीं होता, और यदि उसका आज्ञाचक्र सक्रीय हो, तब क्या हो? तब वह हर उस विचार और उसके परणाम की बखूबी पहचान कर लेगा जो उसके लिये विशेष उपयोगी हो सकता है। यदि ऐसा करने में साधक सफल होता है तो एक दिन वह साधारण साधक से एक ऐसी विभूति के रूप में परिवर्तित होगा कि लाखों लोगों को मार्गदर्शन करेगा। और यह तभी संभव है जब वे अभ्यास के द्वारा अपना आज्ञाचक्र सक्रीय कर ले, इसके लिये सर्वोंत्तम यौगिक क्रिया है- त्राटक त्राटक साधना। त्राटक एकमात्र वह यौगिक क्रिया है, जिससे द्वारा साधक आज्ञाचक्र पर तो विजय पा ही सकता है, साथ ही साथ वह प्रकृति के अनेक रहस्यों का ज्ञान भी अर्जित कर सकता है। यह आज्ञाचक्र मानव शरीर में दोनो भ्रकुटियों के मध्य में एक महत्वपूर्ण ग्रन्थि है, जो कि अन्य चक्रों की तरह
लगभग सुप्तावस्था में ही रहती है, जिसके सक्रीय हो
जाने पर साधक न केवल अपने ही नहीं अपितु दूसरों के भविष्य में भी झाँक सकता है। वे जान सकता है कि उसके सामने वाले व्यक्ति के मन में क्या चल रहा है? वे जान सकता है कि कौन उसके लिये भविष्य में कैसे काम आ सकता है। कौन उसके प्रति कैसे विचार रखता है। आने वाले समय में किस प्रकार की योजना उसे सफलता के शिखर तक ले जा सकती है। यहां तक की उसके आस-पास किस प्रकार की विचार धारायें अथवा अशरीरी आत्मायें भ्रमण कर रही हैं, वह उसके लिये किस प्रकार से सहायक हो सकती हैं? अथवा उनसे किस प्रकार कोई जनहित का कार्य करवाया जा सकता है? यह सभी कुछ तभी संभव है
जब सुप्त आज्ञाचक्र को सक्रिय किया जाये। जब इस
चक्र को सिद्ध (स्क्रीय) कर लिया जाये तब त्राटक का अभ्यास सहज है, और इस चक्र को सिद्ध करने के लिये यह बहुत ही उपयोगी और सरल मार्ग है, सरल यौगिक क्रिया है।
कैसे करें त्राटक का अभ्यास?- एक सफेद रंग के कागज में एक रूपये के सिक्के जितना बडा और गोल छेद कर लें, इस छेद को कागज के पीछे से एक पीले कागज को चिपकाकर बंद कर दें, आगे से देखने पर पीले रंग की एक गोल बिन्दी दिखाई देगी, अब इस गोल पीली बिन्दी में बीचोबीच एक काली मिर्च के आकार का काले रंग से निशान बना लें बस इसी काले निशान पर ही आप की दृष्टि रहेगी। एक दूसरे प्रकार के अभ्यास में यही काले निशान वाली पीली बिन्दी एक दर्पण पर भी चिपका सकते हैं, इस सफेद कागज अथवा दर्पण को अपने से दो फुट के फासले पर ऐसे टांग दें कि काला बिन्दु बिल्कुल आपकी आंखों के सामने पड़े और इस काले बिन्दु को पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर स्थिर दृष्टि से देखने का अभ्यास करें।
दाहिने नेत्र में काल का, बायें नेत्र ने शक्ति का और शिव नेत्र (त्रिकुटी में) ब्रह्म का निवास है। शिव नेत्र से विचार उत्पन्न होता है। दाहिने नेत्र से इच्छा पैदा होती है और बांये नेत्र से क्रिया उत्पन्न होती है। पद्मासन से बैठो, नेत्रों को बंद करो, जीभ को तालु की ओर चढ़ा लो, अपने ध्यान को दोनों भृकुटियों के मेल के स्थान से (अर्थात् नाक की जड़ से) दो अंगुल ऊपर भू्रमध्य पर जमाओ, यह ध्यान सिर के बाहरी भाग पर न होना चाहिए। (आज्ञाचक्र पर) ध्यान के समय शिवमंत्र (ऊँ नमः शिवाय) का मन से जाप करना चाहिए। ऐसा करने से धीरे-धीरे मन स्वयं एकाग्र हो जाता है, और साधक का दिव्यचक्षु खुल जाता है, उसको सब स्थानों की घटनाएं दिखलाई पड़ने लगती हैं, और देव-दर्शन प्राप्त होता है। अभ्यास के समय जो विचार या दृश्य ध्यान में आये उसे प्रभु का छद्मवेश समझो, उसे भी प्रभु ही मानों, ब्रह्ममय मानो जो कुछ भी लीलायें आप ध्यान में देखें या समझें ऐसा समझें कि वह क्रियाएं आप प्रभु के साथ ही कर रहे हैं। ऐसा करने से प्राण स्थिर होकर ब्रह्मनाद भी सुनाई देगा, ब्रह्मनाद दाहिने कर्ण में सुनाई देता है, सद्गुरु भी दाहिने ही कान में मंत्र फूंकते हैं, ब्रह्मनाद का दूसरा नाम परा है।
त्राटक करने से आरम्भ में उष्णता के कारण आंखों से गरम पानी जायेगा, उसे जाने दे, बंद न करें लगभग एक सप्ताह के अंदर ही पानी का जाना बंद हो जावेगा, पानी से यदि आंखें बीच में ही बंद हो जायें तो कोई हर्ज नहीं, आंखें पोंछकर फिर से अभ्यास आरंभ करे, चित्त-वृत्ति को स्थिर करके बिना पलक गिराये, जितनी अधिक देर तक अभ्यास किया जा सके उतना ही अधिक लाभप्रद होगा। पहले प्रतिदिन दस पन्द्रह मिनट ही अभ्यास करें, पीछे धीरे-धीरे घंटा सवा घंटे तक का अभ्यास बढ़ा लें, जब आधे घंटे तक चित्त को स्थिर रखकर बिना पलक गिराये एकाग्र दृष्टि से देखने का अभ्यास हो जाता है तब इष्टदेवता के दर्शन होते हैं और अनेक चमत्कार दीखाई पड़ने लगते हैं, लेकिन साधक को चाहिए कि इन चमत्कारों में न पड़कर भगवत्स्वरूप की भावना को ही दृढ़ रखकर उसका प्रत्यक्ष होते ही उसमें तन्मय हो जायें, उसी में लीन हो जायें। यदि पलकों पर अधिक तनाव प्रतीत हो तो पलकों पर जोर देकर भौंहाें को कस दें, इससे आंखें अधिक देर तक खुली रहेंगी।
बहुत अभ्यास हो जाने के पश्चात् बिन्दु-ज्योतिर्बन्दु, त्रिकुटि (भ्रुमध्य) या नासाग्र पर स्थिर दृष्टि से अभ्यास करना बहिर्मुख (बाह्य) त्राटक कहलाता है। हृदय अथवा भू्रमध्य में नेत्र बंद रखकर एकाग्रता पूर्वक चक्षुवृत्ति की भावना करने को अन्तरत्राटक कहते हैं। इन अन्तत्राटक और ध्यान में बहुत समानता है। भ्रुमध्य में त्राटक करने से आरंभ में कुछ दिनों तक सिर में दर्द हो जाता है, तथा नेत्र को बरौनी में चंचलता प्रतीत होने लगती है, परन्तु कुछ दिनों के पश्चात् नेत्रवृत्ति में स्थिरता आ जाती है, हृदय प्रदेश में वृत्ति की स्थिरता के लिए प्रयत्न करने वालों को ऐसी प्रतिकूलता नहीं होती।
त्राटक के बाद आंखों को इधर-उधर ऊपर नीचे घुमाकर कुच्छ समय तक देखने का अभ्यास करना चाहिए ताकि आपकी दृष्टि बाईं और स्थिर रहे, बाईं ओर देखने से दिमाग कमजोर नहीं होता, त्राटक के बाद अंखों को गुलाब जल से धो लिया करें, इससे नेत्रों को तरावट मिलती है। प्रारंभ में त्राटक करने से शीघ्र थकावट हो जाती है, थक जाने पर आंखें बंद कर लें और त्राटक करें, अंतर त्राटक से संयम सिद्ध होती है, यह षटचक्रों पर, इष्ट पर, बीजमंत्र या यंत्र पर भी किया जाता है। इस त्राटक में संयम सिद्धि का लक्षण है। वास्तव में त्राटक का अनुकूल समय रात्रि के दो से पांच बजे तक है शांति के समय चित्त की एकाग्रता बहुत शीघ्र होने लगती है। त्राटक के अभ्यास के समय मुुंह बंद रखिये, परन्तु दांत छू न जाये, जीभ न ऊपर लगे न नीचे, मुख के अंदर उसकी नोंक खड़ी कर दीजिए, आपका मन स्थिर हो जायेगा।
सुखासन में (जिसे जिस आसन का अभ्यास हो) बैठकर मस्तक, गर्दन, पीठ और उदर बराबर सीधे रख, अपने शरीर को सीधा करके बैठें, इसके बाद नाभि-मण्डल में (तोंद की जगह) दृष्टि जमाकर कुछ देर तक पलक न झपकें। नाभि स्थान में दृष्टि और मन रखने से मन स्थिर होता जायेगा। इसी भाव में नाभि के ऊपर दृष्टि और मन लगाकर बैठने से कुछ दिन के बाद मन स्थिर होगा, मन स्थिर करने का त्राटक जैसा सरल उपाय दूसरा और नहीं है।

Dr. R.B.Dhawan, best astrologer in india

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