कर्म और भाग्य

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant)

कर्म और भाग्य का सम्बन्ध अटूट है, कर्म जैसे रहे हों भाग्य भी वैसा ही होगा, कर्म कैसे किये हैं, जिस कारण भाग्य ऐसा बना है? यह जातक की जन्मकुंडली (कर्म कुंडली) से सांकेतिक भाषा से पता चलता है।
मनुष्य को सामान्य सफलतायें यद्यपि पुरूषार्थ से मिल जाती हैं। लेकिन असाधारण सफलतायें पुरूषार्थ के साथ-साथ भाग्य की देन हैं। जातक की जन्म पत्रिका उसके संचित कर्मो का अभिलेखा होती है। क्योंकि व्यक्ति का जन्म उसके पूर्व जन्मार्जित कर्म फल भोग के लिये होता है। व्यक्ति के जन्मांग के 12 भाव 12 राशियों का प्रतिनीधित्व करते हैं। तथा उनके स्वामी ग्रह (7 ग्रह) भावेश कहलाते हैं। वे कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार शुभाशुभ फल देते हैं। ये ग्रह क्रमशः लग्नेश, धनेश, पराक्रमेश, सुखेश, पंचमेश, ऋणेश, सप्तमेश, अष्टमेश, भाग्येश, कर्मेश (राज्येश) लाभेश एवं व्ययेश कहलाते हैं।
चन्द्र, बुध, गुरू, शुक्र को सौम्य ग्रह कहा गया है। सूर्य, मंगल, शनि एवं राहु, केतु को पाप ग्रह कहा गया है। सौम्य ग्रह केन्द्र एवं त्रिकोण में बैठकर जीवन को सुखद बनाते हैं। पाप ग्रह जहाँ बैठते हैं, वहाँ हानि करते हैं। प्रत्येक ग्रह अपने से सातवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है, लेकिन गुरू, राहु, केतु को पाँचवी, नौवीं भी पूर्ण दृष्टि होती है। इसी प्रकार मंगल की चौथी और आठवीं भी पूर्ण दृष्टि होती है। तथा शनि की तीसरी और दसवीं भी पूर्ण दृष्टि होती है। ज्योतिष के दो सिद्धान्त देखें, स्थान वृद्धि करे शनि, दृष्टि वृद्धि करो गुरू।‌ इस के अलावा जो भाव अपने स्वामी से दृष्ट होगा। वह ग्रह उस भाव की वृद्धि होगी। ग्रह स्वराशि, उच्च राशि, मित्र राशि, नीच राशि, एवं शत्रु राशि में स्थिति अनुसार अपना शुभाशुभ फल देते हैं। वक्री ग्रह भी अपनी प्रकृति अनुसार फल देते हैं। जन्म कुंडली में ग्रह जिस राशि में है, यदि नवांश कुंडली में भी वह ग्रह उसी राशि में हो तो श्रेष्ठ फल देता है। जन्म कुंडली के एक, चार, सात एवं दसवां भाव केन्द्र भाव कहलाते हैं। तथा पाँचवां एवं नौवां भाव त्रिकोण और छठा, आठवां एवं बारहवाँ भाव त्रिक भाव होते हैं। तृतीय एकादश भाव को उपचय कहा जाता है।
जन्म लग्न की भाँति चन्द्र लग्न एवं सूर्य लग्न को भी पृथक महत्व दिया गया है। चलित गोचर ग्रह फल के लिये तो चन्द्र लग्न ही प्रमुख है। इस प्रकार तीनो लग्नों, चलित ग्रह, नवांश, विंशोत्तरी महादशा आदि का समन्वय युक्त फल कथन ही सही बैठता है।
जन्म कुंडली का दूसरा भाव धन संचय का, चौथा भाव अचल सम्पति का दशम भाव कमाई का/तनख्वाह का, ग्यारहवां भाव दिन प्रतिदिन के लाभ का तथा पाँचवे एवं नौवे भाव एकाएक सम्पत्ति लाभ के माने जाते हैं। छठे भाव से रोग, ऋण एवं शत्रुता का विचार करते हैं। आठवें भाव से दरिद्रता एवं द्वादश भाव से व्यय तथा हानि देखते हैं। पाप ग्रह अपनी प्रकृति के अनुसार फलनाश करते हैं। वहीं सौम्य ग्रह केन्द्र एवं त्रिकोण में स्थित होकर जीवन को सुखमय बनाते हैं। यदि स्थिति उल्टी हो अर्थात शुभ ग्रह त्रिक स्थानों मे हों और अशुभ ग्रह केन्द्र त्रिकोण मे हों तो निश्चित ही व्यक्ति का जीवन अत्यंत संघर्षमय हो जाता है। ज्योतिष विज्ञान इस तथ्य को प्रमाणित करता है। कि व्यक्ति उच्च ग्रहों की महादशा में जन्म जन्मांतर में किये गये सत्कर्मो का फल भोगता है। और नीच ग्रहों की दशा में पूर्व जन्मार्जित दुष्कर्मो का स्वराशि एवं वर्गोतमी ग्रहों की महादशा में उस जन्म के कर्मो का फल भी मिलता है। जन्मांग गत ग्रह हमारे कर्म फलभोग की सूचना देते हैं।
यदि चन्द्र लग्न एवं सूर्य लग्न पाप ग्रहों के मध्य पाप कर्तरी योग बनायें तो जीवन घोर संघर्ष युक्त रहता है। और वहीं यदि ये लग्ने शुभ मध्यत्व (अर्थात सूर्य लग्नः चन्द्र लग्न के दोनों ओर शुभ ग्रह हों) में हों तो जातक सामान्य परिश्रम प्रयास से ही अच्छी सफलता पा लेता है। यदि धनेश एवं लाभेश दोनों छठे भाव में स्थित हों तो व्यक्ति जीवन भर ऋण भार से दबा रहता है। यदि लग्नेश एवं नवमेश में भाव परिवर्तन हो तो व्यक्ति भौतिक उन्नति के साथ आध्यात्मिक उन्नत्ति भी करता है। चन्द्र एवं गुरू एक दूसरे से सम-सप्तक हों तो व्यक्ति दूसरे के धन का सुखोपभोग करता है। वैसे भी चन्द्र से गुरू का केन्द्र में होना गज केसरी राज योग देता है। और व्यक्ति शासकीय सेवा से जुड़ता है। यदि द्वितीय, पंचम, नवम, दशम एवं लाभ भाव में उच्च राशि के ग्रह विशेषतः शुक्र या केतु हों तो व्यक्ति को अचानक धन लाभ देते हैं। ये ग्रह अपनी दशा एवं महादशा तथा गोचर में श्रेष्ठ स्थिति बनने पर अवश्य लाभ देते हैं। ग्रहों का भाव परिवर्तन फलो में वृद्धि करता है, यथा लाभेश दूसरे भाव में हो और द्वितीयेश लाभ भाव में हो तो व्यक्ति की सुख-समृद्धि बढ़ती रहती है। छठे, आठवें, बारहवें भाव के स्वामियों की दशा में खर्चे अधिक एवं आय कम हो जाती है। केन्द्र एवं त्रिकोण स्थित ग्रहों की महादशा में आय-व्यय का श्रेष्ठ संतुलन बना रहता है। गुरू एवं शुक्र की महादशा उचित एवं न्यायिक मार्गों से धन देती है। वहीं शनि एवं राहु दो नम्बर के मार्ग से धन लाभ कराते हैं। यदि दशम भाव में राहु अपनी उच्च राशि में हो तो अपनी महादशा में व्यक्ति को करोड़ों रूपयों का लाभ देता है। महादशा के साथ अन्तर्दशा पर भी गौर करें यदि अन्तर्दशा का स्वामी ग्रह महादशा के स्वामी से छठा, आठवां, बारहवां हो तो धन प्राप्ति में बाधाये आती हैं। यदि अन्तर्दशा का स्वामी महादशा नाथ से दूसरा हो तो धन संग्रह होता है। चतुर्थ होने पर अचल संपत्ति का लाभ एवं वृद्धि देता है। त्रिकोण होने पर आकस्मिक लाभ तथा दसवें होने पर राज्य से लाभ देता है। लाभेश की महादशा प्रचुर धन लाभ देती है।
यज्जातकेषु द्रतिणं प्रदिष्टं या कर्म वार्ता कथिता ग्रहस्य। आलोक योगोद् भावंज, तत्सर्व कृतिन्योजय तद् दशायाम।।
अर्थात् ग्रहों के जो द्रव्य, आजीविका, वर्ण, स्वभाव, दृष्टि तथा योगज फल कहे गये हैं। वे सब फल उन ग्रहों की दशा अन्तर्दशा में धटित होते हैं। यदि लग्नेश छठे, आठवें, बारहवें, भाव को छोड़कर कहीं विद्यमान हो तो मनुष्य राजाओं द्वारा सम्मानित होता है। लग्नेश की स्थिति शुक्र के साथ होना अनिवार्य है। दशमेश से लग्नेश का सम्बन्ध राजयोगकारी कहा गया है। यदि दोनों ही बलशाली हों, क्रूर ग्रहों के प्रभाव से मुक्त हों तो अवश्य ही राज पद की प्राप्ति होती है। दशम भाव में लग्नेश तथा लग्न में दशमेश होने से व्यक्ति बहुत सी भूमि का स्वामी धन एवं सौन्दर्य के कारण विख्यात् तथा बहुत धन सम्पत्ति का स्वामी होता है। एकादश स्थान में लग्नेश तथा लग्न में एकादशेश व्यक्ति को राजा एवं दीर्घायु बनाता है।
लग्नाधीशेऽर्थगेचेद् धन भवन पतौ लग्नयातेऽर्थवान् स्यात्। बुध्या चार प्रवीणः परम सूकृत्कृत्सारभृद् भोग शलीः जातकंलकार।।
लग्नेश धन भाव में धनेश लग्न में होने पर जातक धनी, बुद्धि से आचरण करने वाला धार्मिक अच्छे कार्य करने वाला यथार्थवान एवं भोगी होता है। राहु-केतु के नाम से लोग भयभीत रहते हैं। लेकिन:-
केन्द्रऽथवा कोण गृहे वसेतां, तमोग्रहावन्य तरेज चाँदि। नाथेन सम्बन्धवशाद् भवेतां, तौ कारकावुक्तमि हेति विज्ञै।।
यदि राहु-केतु केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो तथा उनका दूसरे केन्द्र से या त्रिकोण से सम्बन्ध हो अथवा केन्द्र में होते हुये त्रिकोणेश से या त्रिकोण में रहते हुये केन्द्रेश से सम्बन्ध हो तो ये उत्तम योग कारक होते हैं। या तीसरे, छठे, ग्यारहवें भाव में हो तो इनकी दशा शुभ फल देती है। वक्री ग्रह की दशा में धन, स्थान और सुख हानि होती है। व्यर्थ भ्रमण एवं सम्मान हानि भी होती है। मार्गी ग्रह की महादशा धन, सम्मान, सुख, यशवृद्धि एवं श्रेष्ठ आजीविका दायक होती है। यदि पंचमेश एवं नवमेश केन्द्र में हो तथा बुध, चन्द्र व गुरू द्वारा दृष्ट हो तो जातक धनी, सुखी, संतुष्ट एवं धर्मात्मा होता है। लग्न के नवांश का स्वामी और नवमेश दोनों परम उच्चांश में हो, और लाभेश बलवान हो तो, व्यक्ति के पास अटूट सम्पत्ति होती है। नवम भाव में सूर्य, गुरू तथा दशम भाव में मंगल बुध हो तो जातक राज्य में सर्वोच्च पद पाता है। सर्व दृष्टि से सुखी एवं सम्पन्न रहता है। यदि लग्न को छोड़कर सभी ग्रह परस्पर त्रिकोण भाव में स्थित हो या लग्नेश बली होकर केन्द्र में हो तथा चतुर्थेश लग्न में हो और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक भूमिपति बनता है। भूमि से ही अथाह लाभ पाता है।
इस प्रकार व्यक्ति के जन्मांग में अनेकानेक सूयोग्य- कूयोग उसके जीवन का संचालन करते हैं। हमारे शुभ कर्म हमें सुयोग्य तथा अशुभ कर्म कुयोग प्रदान करते हैं। कर्म ही हमारे भाग्य का निर्माण करते हैं। कर्म फल भोग का सिद्धान्त होने से व्यक्ति के पूर्व जन्मार्जित कर्म ही वर्तमान भाग्य का निर्धारण करते हैं। रीति-नीति धर्माचरणा तथा देवी-देव पूजा, जप, अनुष्ठान दानादि के द्वारा कुयोगों के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है। तथा सूयोगों को बलवान बनाकर पूर्ण लाभ लिया जा सकता है।

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