शनि ग्रह

प्राणियों के प्रति सृजनात्मक शक्ति हैं, शनिदेव।

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

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शनिग्रह के मूल लक्षण योग की अवस्था में ज्ञान चक्षु हैं। शनिग्रह में इस दैवीय ज्ञान के फलस्वरूप सृष्टि-क्रम को समूह में नष्ट करने अथवा जीव जगत के प्राणियों को दण्ड देने की क्षमता है। देव, असुर से लेकर मानव और अन्य समस्त जीव-जगत के प्राणी शनि की इस शक्ति के सामने अपने को निर्बल पाते हैं। ये सभी चेतन शक्तियां सृष्टि के विभिन्न स्तरों पर निरन्तर सृजनात्मक कार्य में व्यस्त रहती हैं, परन्तु उन सभी का अस्तित्व शनि की कृपा पर ही निर्भर रहता है।

शास्त्रों में शनि का एक गुण ‘सर्वभक्षक’ बताया गया है। शनि का शरीर इतना विकराल है कि, जिसमें सब कुछ समहित हो सकता है। शनि को प्रलयाग्नि के समान अनिष्टकारी भी कहा गया है। इन सब विशलेषणों से भी शनि के इसी रौद्र रूप को व्यक्त करने का प्रयास किया गया है। परन्तु सबसे मुख्य बात यही है कि इसी प्रक्रिया में ‘आत्मा’ के नवीनीकरण का रहस्य भी छिपा हुआ है। इसी लिए शनि को शास्त्रों में कृतांत अर्थात पूर्वजन्म के कर्म फलों को वर्तमान जन्म में देने वाला देव भी कहा गया है। शनि का यह तत्व सृष्टि के प्रत्येक कण-कण में सन्निहित दिखाई पड़ता है। इसी तत्व के कारण सृष्टि की आन्तरिक शक्तियां स्वयं के कर्म और उसके प्रतिफल को अनुकूल ढंग से अभिव्यक्त करके विकसित होती है। कृतांत होना शनि का, कर्म अधिदेव होने का सूचक है, परन्तु इसके फलस्वरूप होने वाला विकास क्रम बृहस्पति की कार्य प्रणाली का द्योतक है। प्रत्यक्षतः बृहस्पति विस्तार एवं सृजनात्मक कार्य में निरत रहते हैं, परन्तु शनि ही सृष्टि रूप में इसे संभव करते हैं। इस सृष्टि में पार्थिव सृजन एवं विभिन्न स्तरों पर प्रकट आकारों का नाश करना भी सन्निहित है। यम का यही स्वरूप शनि को विकराल, भयंकर और अनिष्टकारी बनाता है।

शनि के संबंध में आधुनिक ज्योतिषियों का मत – शनि का दायित्व इतना दुष्कर और कठिन है, और उनकी कार्यप्रणाली इतनी जटिल है कि, इनकी प्रकृति के संबध में अनेक तरह की धारणाएं एवं मान्यताएं समाज में प्रचलित हो गयी हैं। फलित ज्येातिष शास्त्र में शनि को अत्यंत क्रूर, प्रतिकारक, पीड़ा एवं संताप देनेवाला, दण्डकारक तथा मंद ग्रह कहा गया है। परन्तु इन गुणों से शनि की वास्तविक प्रकृति की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं होती।

प्राचीन ऋषियों ने शनि को सूर्य पुत्र माना है, और देवगुरु बृहस्पति को शनि का गुरु बताया है। इस तरह शनि सृष्टि के मुख्य आधार और जीवन के प्रमुख सूत्रधार सूर्य के पुत्र हुए और इस तरह शनि को प्रतिकार, संताप एवं कष्ट देने वाला, युक्ति संगत प्रतीत नहीं होता। ज्योतिषियों ने शनि को दुःख, पीड़ा, निराशा, मानसिक संताप एवं कष्ट देनेवाला, दुर्भाग्यशाली तथा असफलता आदि प्रदान करने वाला ग्रह भी माना है, परन्तु सृष्टि की आत्मा के पुत्र से अपने सहजीवी प्राणियों के ऊपर दुःखों का कहर बरसाने की बात पुनः युक्ति संगत प्रतीत नहीं होती। इतना ही नहीं शनि की शिक्षा-दीक्षा भी देवगुरु बृहस्पति के हाथों हुई मानी गयी है, ओर देवगुरु बृहस्पति से ऐसी आशा रखना कि वह अपने शिष्य को एैसे कामों से संस्कारित करेंगे कतई युक्ति संगत नहीं लगता। क्योंकि बृहस्पति ग्रह मण्डल के सर्वश्रेष्ठ शुभ ग्रह माने गये हैं। अतः सोचने की बात यही है कि क्या सूर्यदेव के कर्म इतने निकृष्ट रहे थे कि उनका पुत्र क्रूर और ग्रह मण्डल में सबसे अहम एवं अनिष्ट फल करने वाला माना जाएगा? क्या देवगुरु बृहस्पति इतने अयोग्य और निष्फल शिक्षक थे कि वे अपने विषय में किसी अच्छाई की जगह बुराइयों की नींव ही रखेंगे।
इस नियम विरोध का रहस्य इस ग्रह के गूढ़ लक्षणों के सूक्ष्म विश्लेषण और इसके प्रतिपादित वाह्य संबंधों को जान लेने से पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है।

दरअसल शनि के निगूढ़ रहस्यों को समझे बिना फलित ज्योतिष के गुह्य सिद्धांतों के मूल रूप को समझना प्रायः असंभव ही है। विभिन्न धर्मग्रंथों में शनिदेव और उनकी शक्तियों के संबंध में सैकड़ों कहानियां पढ़ने को मिलती हैं। इन कहानियों में शनि की मूलभूत प्रकृति के अनेक संकेत प्राप्त होते हैं। किन्तु यह विषय फिर पूर्णतः दार्शनिक विषय बन जाता है। यद्यपि इन प्राचीन आख्यानों में उल्लिखित संकेतों को अगर ठीक तरह से समझ लिया जाए, तो शनि के अनेक गुह्य रहस्यों से सहज ही पर्दा उठ जाता है और फिर उन गुह्य रहस्यों के आधार पर शनि को सृजनात्मक या विध्वंसात्मक देव के रूप में प्रतिपादित करना ज्योतिषियों के लिए काफी मुश्किल हो जाएगा। शनि के इन गुह्य रहस्यों पर फिर कभी चर्चा करने का प्रयास करूंगा।

ज्योतिष शास्त्र में शनि का लक्षण- ज्योतिष शास्त्र में शनि को लम्बा व भूरा-काला वर्ण, रक्त आंखें, शरीर से विकलांग, बड़े-बड़े दांत, कड़े बाल, भयानक आकृति, नपुंसक ग्रह, वृद्धावस्था वाला, पश्चिम दिशा का अधिपति, श्रमिक वर्ग व दस्यु प्रवृत्ति आदि गुणों वाला माना गया है। शनि शूद्र जाति का नायक है। शनि का निवास क्रीड़ा स्थल, श्मशान घाट, शराब खाना है। इनको काल पुरुष का दुःख व कष्ट माना जाता है। धातुओं में लोहा, जगहों में पहाड़ी, कूड़ों का ढेर तथा उपेक्षित स्थान, वस्त्रों में फटे चिथड़े आदि का संबंध शनि के साथ जोड़ा जाता है।

शनि मकर और कुम्भ राशि का स्वामी है। मकर पृथ्वी तत्त्व तथा कुम्भ वायु तत्त्व राशि है। मकर स्त्री वर्ण और कुम्भ पुरुष वर्ण राशि है। शनि तुला में उच्च तथा मेष राशि में नीच होता है। शुक्र जो क्रियात्मक ग्रह है, उसके शनि मित्रवत् हैं और ऐसा ही संबंध इसका बुध के साथ भी है जो तीव्र गति वाला स्वर्ग लोक का दूत तथा मस्तिष्क को तीव्र बुद्धि देने वाला ग्रह माना जाता है। देवगुरु के प्रति शनि उदासीन रहता है। सूर्य, मंगल तथा चन्द्रमा शनि के शत्रु हैं।

शनि अपने पिता सूर्य से अत्यंत दूरी पर स्थित है। इसी कारण यह विद्याहीन, काला, प्रकाशहीन व क्रूर ग्रह माना गया है। शायद इस कारण से ही जिनके जन्मांग में यह कमजोर अथवा पापी होता है, वह अक्सर विद्याहीन व मजदूर वर्ग से संबंधित देखे जाते हैं। प्रकाश के अभाव से कई रोगों की उत्पत्ति होती है। इसीलिए शनि को रोगों का भी कारक माना गया है। शनि की मंद गति के कारण इसको ‘मंद’ व ‘पंगु’ ग्रह भी कहा गया है। मनुष्य चलता पैरों से है। इसीलिए शनि का पैरों से भी बहुत घनिष्ट संबंध रहता है। इसी आधार पर लोगों के पैरों का अध्ययन करके उनके शनि की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। शनि के निर्बल और क्षीण होने की स्थिति में जातक के पैरों में कष्ट रहता है। जन्मांग में शनि के अध्ययन से जातक के दुःख, दर्द, सुख, रोग, निरोगी आदि बातें का भी सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त जातक की आयु, मृत्यु, चोरी, मुकद्दमा, राजदण्ड, नफा-नुकसान, दिवाला, निकलना, शत्रुता आदि बातों का पता लगाया जा सकता है।

शनि के विभिन्न भावों में बैठने से शनि अलग-अलग फल प्रदान करते हुए देखे जाते हैं। लग्नस्थ शनि के फल कथन में तो विशेष सर्तकता बरतने की जरूरत रहती है। लग्न के द्वारा सार्वभौतिक चेतना जातक की व्यक्तिगत आत्मा से संयुक्त होती है और उसके वर्तमान जन्म के आवास की स्थिति निर्धारित करती है। सामान्य रूप से लग्नस्थ शनि का प्रभाव विशेषकर जातक की आयु तथा उसकी भौतिक संपत्ति पर पड़ता है। जीवन की कोई भी अवस्था हो या जीवन क्रम कैसा भी हो यदि शनि लग्नस्थ है तो आत्मा की दृृष्टि से जन्म बहुत महत्वपूर्ण होता है।

सामान्यतः लग्नस्थ शनि जातक को नीच, दुष्ट, जड़वादी, व्यभिचारी, पर-स्त्रीगामी, शराबी तथा मादक द्रव्य सेवन का अभ्यस्त बनाता है। ऐसी स्थिति में जातक प्रवृत्ति मार्ग पर जड़ता के निम्नतम स्तर पर अज्ञान में जकड़ा हुआ रहता है। एैसे जातक को जब निराशा, दुःख, मानसिक संताप व्यथित कर देता है तो वह धीरे-धीरे भोग विलास से दूर भागना शुरू कर देता है और अन्ततः वैराग्य धारण कर लेता है।

द्वितीय स्थान पर शनि भू-संपत्ति तथा ऐश्वर्य की हानि तथा वाणी दोष देता है। शनि तृतीय स्थान में भाई बहनों को अनिष्ट करता है। चतुर्थस्थ शनि माता, निवास स्थान, शिक्षा एवं भावनात्मक जीवन में अनिष्ट लाता है। माता की असामयिक मृत्यु भी हो सकती है। पंचम स्थान में निर्बल और अशुभ शनि जातक की शारीरिक एवं मानसिक क्रियात्मक क्षमता के लिए अनिष्टकारी सिद्ध होता है। इससे वैवाहिक जीवन में भी कठिनाइयां आती है।

षष्ठस्थ शनि जातक के शत्रुओं का नाश करता है। परन्तु उसे असाध्य रोगी बना देता है। सप्तम भाव में शनि पुनः वैवाहिक सुख में कठिनाइयां खड़ी करने वाला सिद्ध होता है। अष्टम भाव में शनि जातक को मानसिक रोगी बनाता है। नवम भाव में शनि जातक को निगूढ़ विद्या में निपुण बनाता है।

दशमस्थ भाव में शनि उच्च पदाधिकारी तथा मान-प्रतिष्ठा बढ़ाने का कार्य करता है। यह जातक को उन्नति की पराकाष्ठा पर पहुंचा देता है। एकादश भाव में शनि जातक को अत्यंत संपन्न एवं समृद्धिशाली बनाता है। राजनैतिक सम्मान की प्राप्ति भी करा देता है। द्वादशस्थ शनि जातक को अनेक कलाओं में निपुण करता है।

शनि के अशुभ फल से बचाव के उपाय- यह तो प्रायः अनुभव आधारित बात है ही कि शनि का अशुभ फल अति प्रभावशील होता है। जब शनि क्रोधित होते हैं तो उनके प्रकोप से बचना सहज संभव नहीं हो पाता। शनि के कोप से देव भी अपने को नहीं बचा पाए, फिर हम मनुष्यों की बात बहुत दूर है। परन्तु शनि ही एक मात्र ऐसे ग्रह भी हैं जो विभिन्न उपायों से प्रसन्न भी शीघ्र हो जाते हैं। न केवल वह अपनी उपासनाओं से विघ्न-बाधाओं को ही शीघ्र दूर कर देते हैं, वरन् समुचित वरदान भी दे डालते हैं। इस संबंध में पद्मपुराण में एक बहुत ही रोचक कथा का वर्णन किया गया है।

कहते हैं कि एक बार महाराज दशरथ के राज्य में शनि प्रकोप के कारण भयंकर अकाल पड़ गया। भोजन, पानी की कमी और बीमारियों के फलस्वरूप प्रजा अत्यंत व्याकुल हो गई। महाराज अपनी प्रजा का कष्ट देख बहुत व्यथित रहने लगे। महाराज जब प्रजा की पीड़ा से चिंतित रहने लगे तो गुरु वशिष्ठ से उनकी पीड़ा देखी नहीं गई। महाराज दशरथ ने गुरु आज्ञा को शिरोधार्य करके शनि को प्रसन्न करने के लिए उनकी आराधना शुरू कर दी। उनकी आराधना से शनि शीघ्र प्रसन्न हो गये और उनके राज्य का दुर्भिक्ष समाप्त हो गया।

महाराज दशरथ ने शनिदेव की आराधना स्वरूप ‘शनिश्चर स्त्रोत’ का सृजन किया था, इस शनिश्चर स्त्रोत में उन्होंने शनि के अनेक गुणों का विस्तार पूर्वक वर्णन किया है। शनि का यह स्त्रोत अब भी वैसा ही प्रभावशील एवं तत्क्षण फलप्रद होते देखा जाता है, जैसी कि इसके विषय में प्राचीन समय में विश्वास किया गया। इस शनि स्त्रोत का स्वयं मैंने भी अनेक बार चमत्कार होते हुए देखा है।

दशरथकृत इस ‘श्नैश्चर स्त्रोत’ का एक विशेष अनुष्ठान क्रम है। इस अनुष्ठान क्रम को किसी भी शनिवार से प्रारंभ किया जा सकता है। इस स्त्रोत का प्रतिदिन ग्यारह से इक्कीस बार तक पाठ करना होता है। पाठ के दौरान त्रिकोणाकृति वालेे हवन कुण्ड में भूतकेषी, गंधवाला, पीली सरसों, नीलोफर, काले तिल, काली हल्दी, पारिजात पुष्प, सर्पगंधा, रूद्रवन्ती, धूप लकड़ी, श्वेत चंदन, शतपुष्पी, लोध्र, नागरमोथा आदि से युक्त समिधा अग्नि को समर्पित करते हुए स्त्रोत पाठ करना होता है।

साधना काल में एक तांबे का पात्र लेकर उसमें काले वस्त्र में पांच लौंग, पांच सुपारी, पांच इलायची, थोड़ी सी काली उड़द और पांच सुलेमानी हकीक पत्थर बांधकर रखने होते हैं। इस सामग्री को 21 दिन का अनुष्ठान पूरा करने के बाद बहते हुए पानी में प्रवाहित करना होता है।

शनि द्वारा अलग-अलग राशियों को प्रभावित करने के अनुसार इस अनुष्ठान के समय और समिधा की सामग्रियों में थोड़ा बहुत बदलाव करना होता है, जैसे कि शनि के अष्टम भावस्थ पीड़ित होकर बैठने से इस अनुष्ठान को रात्रि के दौरान सम्पन्न करना पड़ता है, जबकि लग्न भाव के शनि द्वारा पीड़ित होने पर इस अनुष्ठान को प्रातःकाल संपन्न करना होता है।

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