रोग और ज्योतिष

आयुर्वेद के अनुसार कुछ जटिल रोग पूर्वजन्मों के दोष के कारण शरीर के लिए कष्टकारी होते हैं –

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in Delhi)

आयुर्वेद और ज्योतिष शास्त्र का चोली-दामन का संबंध रहा है, पूर्वकाल में हर वैद्य आयुर्वेद के साथ ग्रह-नक्षत्रों का भी अच्छा खासा ज्ञान रखता था। औषधि किस मुहूर्त में ग्रहण करनी है, और किस नक्षत्र में रोगी को सेवन करना आरम्भ करनी है? रोग किस नक्षत्र में आरम्भ हुआ है, वह साध्य होगा या असाध्य अथवा कष्ट साध्य होगा, इस का अच्छा-खासा ज्ञान वैद्य को होता था। वात-पित्त-कफ तीनों प्रकृतियों के साथ ग्रहों का सम्बन्ध, शरीरांगों में राशियों एवं ग्रहों का विनिवेश, बालारिष्ट, आयु आदि विषयों का ज्योतिषीय विश्लेषण, रोग की स्थिति में महत्वपूर्ण उपाय प्राप्त करने के लिए मंत्र-अनुष्ठान व दान अथवा रत्न धारण, यह सब औषधियों के सहायक अंग हैं। ज्योतिष में रोगों का वर्गीकरण, लक्षण (ग्रहयोग) तथा ज्योतिष शास्त्र ग्रहों की प्रकृति, धातु, रस, अंग, अवयव, स्थान, बल एवं अन्यान्य विशेषताओं के आधार पर रोगों का निर्णय करता है, तथा निदान के ज्योतिषीय उपाय भी इस शास्त्र में बताये गये हैं। ज्योतिष शास्त्र ही एक ऐसा शास्त्र है, जिसकी सहायता से भविष्य में होने वाले किसी भी रोग की सूचना प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार रोग का पूर्व ज्ञान प्राप्त कर तथा उसके लिये ग्रहोपचार द्वारा अथवा सावधान रहकर मनुष्य उस रोग के कष्ट से किसी सीमा तक सुरक्षित रह सकता है।

ब्रह्माण्ड और मानव शरीर की समानता पर पुराणों व अन्य धर्मग्रन्थों में व्यापक विचार हुआ है। जो ब्रह्माण्ड में है, वह मानव शरीर में भी है। ब्रह्माण्ड को समझने का श्रेष्ठ साधन मानव शरीर ही है। वैज्ञानिको ने भी सावययी-सादृश्यता के सिद्धांत को इसी आधार पर निर्मित किया है। मानव शरीर व संपूर्ण समाज को एक दूसरे का प्रतिबिंब माना गया है। आज का मानव सौर मंडल को भली-भांति जानता है, इसी सौरमंडल में व्याप्त पंचतत्वों को प्रकृति ने मानव निर्माण हेतु पृथ्वी को प्रदान किया है। मानव शरीर जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु व आकाश तत्व से निर्मित हुआ है। ज्योतिष ने सौरमंडल के ग्रहों, राशियों तथा नक्षत्रों में इन तत्वों का साक्षात्कार कर प्राकृतिक सिद्धांतो को समझा है।
ज्योतिष का फलित भाग इन ग्रह, नक्षत्रों व राशियों के मानव शरीर पर पढ़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करता है, जो पंचतत्व इन ग्रह नक्षत्र व राशियों में हैं। वही मानव शरीर में भी हैं, तो निश्चित ही इनका मानव शरीर पर गहरा प्रभाव होगा ही।
वैदिक ज्योतिष ने सात ग्रहों को प्राथमिकता दी है। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि। राहु व केतु छाया ग्रह हैं। पाश्चात्य ज्योतिष जगत में युरेनस, नेप्चयुन व प्लुटो का भी महत्व है। ज्योतिष ने पंचतत्वों में प्रधानता के आधार पर ग्रहों में इन तत्वों को अनुभव किया है, सूर्य व मंगल अग्नि तत्व प्रधान ग्रह हैं। अग्नि तत्व शरीर की ऊर्जा व जीने की शक्ति का कारक है। अग्नि तत्व की कमी शरीर के विकास को अवरूद्ध कर रोगों से लड़ने की शक्ति को कम करती है। शुक्र व चंद्रमा जल तत्व प्रधान ग्रह हैं, शरीर में व्याप्त जल पर चंद्रमा का आधिपत्य है। शरीर में स्थित जल शरीर का पोषण करता है। जल तत्व की कमी आलस्य या तनाव उत्पन्न कर, शरीर की संचार व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालती है। जल व मन दोनो की प्रकृति चंचल है, इसलिये चंद्रमा को मन का कारकत्व भी प्रदान किया गया है। उदाहारणार्थ देखें:- शुक्राणु जो तरल में ही जीवित रहते हैं, और यह सृष्टि के निर्माण में व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शुक्र काम जीवन का कारक है, यही कारण है कि, शुक्र के अस्त होने पर विवाह के मुहुर्त नहीें निकाले जाते। बृहस्पति व राहु आकाश तत्व से सम्बंध रखते हैं। यह व्यक्ति के पर्यावरण व आध्यात्मिक जीवन से सीधा सम्बंध रखते हैं। बुध पृथ्वी तत्व का कारक ग्रह है। यह बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति शरीर को देता है। इस तत्व की कमी बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति पर विपरीत असर डालती है। शनि वायु तत्व प्रधान ग्रह है। शरीर में व्याप्त वायु तत्व पर इसका पूर्ण आधिपत्य है। केतु को मंगल की तरह माना गया है।
मानव जीवन के कुछ गुण मूल प्रकृति के रूप में भी मौजूद होते हैं। प्रत्येक मनुष्य में प्राकृतिक रूप से आत्मा, मन, वाँणी, ज्ञान, काम, व दुखः विद्यमान होते हैं। यह उसके जन्म समय की ग्रहस्थिति पर निर्भर करता है, कि किस मानव में इनकी प्रबलता कितनी है? विशेष रूप से प्रथम दो तत्वों को छोड़कर क्योंकि आत्मा से ही शरीर है। यह सूर्य का अधिकार क्षेत्र है। मन चंद्रमा का, बल मंगल का, वाँणी बुध का, ज्ञान बृहस्पति का, काम शुक्र व दुखः पर शनि का आधिपत्य है। आधुनिक मनोविज्ञान मानव की चार मूल प्रवृत्तियाँ मानता है- भय, भूख, यौन व सुरक्षा। भय पर शनि व केतु का आधिपत्य है। भूख पर सूर्य व बृहस्पति का, यौन पर शुक्र तथा सुरक्षा पर चंद्र व मंगल का। मानव शरीर के विभिन्न धातु तत्वों का भी बह्माण्ड के ग्रहों से सीधा सम्बंध है। शरीर की हड्ढियों पर सूर्य, रक्त की तरलता पर चंद्रमा, शरीर के माँस व गर्मी पर मंगल, त्वचा पर बुध, चर्बी पर बृहस्पति, वीर्य पर शुक्र तथा स्नायुमंडल पर शनि का अधिपत्य है। राहु एवं केतु चेतना से सम्बंधित ग्रह हैं। शरीर क्रिया-विज्ञान के अनुसार मानव शरीर त्रिदोष से पीड़ित होता है, जो विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होते हैं। वात-पित्त-कफ, सूर्य, मंगल, पित्त, चंद्रमा व शुक्र कफ, शनि वायु तथा बुध त्रिदोष; यह प्रतीकात्मक हैं। नेत्र व्यक्ति को अच्छा या बुरा देखने व समझने का शक्तिशाली माध्यम है। आंतरिक व बाह्य रहस्यों को देखने में नेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्राचीन ज्योतिष के सभी सिद्धांत योगियों व ऋषियोें ने सिर्फ नेत्रों से देखकर व योगमार्ग से अनुभव करके बनाये हैं। बिना कोई वैज्ञानिक यंत्रों की सहायता से यह अपने आप में आंतरिक व बाह्य रहस्यों में ज्योतिष के महत्व को स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त हैं। सूर्य व चंद्रमा साक्षी हैं, अतः ज्योतिष के विज्ञान या सत्य होने में कोई संदेह नही है।

रोग निर्णय-
सूर्य- जब सूर्य रोगकारक ग्रह होता है, तब निम्नलिखित रोगों की संभावना होती है, या यह समझिये कि सूर्य निम्नलिखित रोग और क्लेशों का कारक है- पित्त, उष्ण ज्वर, शरीर में जलन रहना, अपस्मार (मिर्गी), हृदय रोग (हार्ट डिजीज), नेत्र रोग, नाभि से नीचे प्रदेश में या कोख में बीमारी, चर्मरोग, अस्थि श्रुति, शत्रुओं से भय, काष्ठ अग्नि, अस्त्र या विष से पीड़ा, स्त्री या पुत्रों से पीड़ा, चोर या चैपायों से भय, सर्प से भय, राजा, धर्मराज (यम) भगवान् भूतेश (रूद्र) से भय होता है।

चन्द्रमा- चन्द्रमा निम्नलिखित रोग या कष्ट उत्पन्न करता है- निद्रा रोग या तो नींद न आयेगी या बहुत नींद आयेगी, अथवा सोते सोते चलना इसे संन्यास रोग भी कहते हैं। आलस्य, कफवृद्धि, अतिसार (संग्रहणी), पिटक, कारबंकिल, शीतज्वर (ठंड देकर जो बुखार आता है) या ठंड के कारण जो बुखार हो। सींग वाले जानवर या जल में रहने वाले जानवर मगरमच्छ आदि से भय, मंदाग्नि (भूख न लगना), अरुचि (यह भी मन्दाग्नि का एक प्रकार है) जब जठराग्नि के मंद हो जाने से भूख नहीं लगती है तो, भोजन की इच्छा नहीं होती है। स्त्रियों से व्यथा, पीलिया, खून की खराबी, जल से भय, मन की थकावट, बाल ग्रह-दुर्गा-किन्नर-धर्मराज (यम) सर्प और यक्षिणी से भय होता है।

मंगल- जब मंगल रोग और क्लेश उत्पन्न करता है- तृष्णा (बहुत अधिक प्यास लगना) प्रकोप (वायु जनित या पित्त प्रकोप), पित्तज्वर, अग्नि, विष या शस्त्र से भय, कुष्ठ (कोढ़), नेत्र रोग, गुल्म (पेट में फोड़ा या एपिन्डिसाइटीज), अपस्मार (मिर्गी), मज्जा रोग (हड्डी के अन्दर मज्जा होती है, उसकी कमी से जो रोग हो जाते हैं), खुजली, चमड़ी में खुर्दरापन, देह-भंग (शरीर का कोई भाग टूट जाना), राजा, अग्नि और चोरों से भय, भाई, मित्र, पुत्रों से कलह, शत्रुओं से युद्ध, राक्षस, गन्धर्व घोर ग्रह से भय और शरीर के ऊपर के भाग में बीमारियाँ होती हैं।

बुध- बुध नीचे लिखे हुये रोग और कलेश उत्पन्न करता है- भ्रान्ति (बहम), सोचने में अव्यवस्था हो जाना, विचार में तर्क शक्ति का आभाव, व्यर्थ की चिंता से मन उलटा-पुलटा सोचने में लग जाना, मन में मिथ्या चिन्ता, बिना कारण भय, आशंका बनी रहे, जो बात यथार्थ हो उसको भूल कर गलत बात याद रहे या गलत धारणा हो जाती है, यह सब भ्रान्ति के लक्ष्ण हैं। दुर्वचन बोलना, नेत्र-रोग, गले का रोग, नासिका रोग, वात-पित्त-कफ इस त्रिदोष से उत्पन्न ज्वर, विष की बीमारी, चर्मरोग, पीलिया, दुःस्वप्न, खुजली, अग्नि में पड़ने का डर, (लोग जातक के साथ अपरुषता का व्यवहार करते हैं), श्रम (अधिक परिश्रम वाला काम करना पड़े), गन्धर्व आदि से उत्पन्न रोग। यह सब बुध के कारण होने वाले रोग हैं।

बृहस्पति- बृहस्पति के कारण जो रोग, क्लेश आदि होते हैं- गुल्म, पेट का फोड़ा-रसोली आदि का रोग, एपिन्डसाइटीज, अंतड़ियों का ज्वर (टायफाईड़), मूच्र्छा यह सब रोग कफ के दोष से होते हैं, क्योंकि कफ का अधिष्ठाता बृहस्पति है, कान के रोग, देव स्थान सम्बंधी पीड़ा अर्थात मंदिर आदि की जायदाद लेकर मुकद्दमेबाजी, ब्राह्मणों के शाप से कष्ट, किसी खजाने, ट्रस्ट या बैंक के मामलों के कारण कलह, या अदालती कार्रवाई, विद्याधर, यक्ष-किन्नर, देवता, सर्प आदि के द्वारा किया हुआ उपद्रव, अपने गुरुओं माननीयों तथा बड़ों के साथ किया हुआ अभद्र या अशिष्ट अव्यवहार या उनके प्रति कत्र्तव्य पालन न किया हो तो उस अपराध का दंड बृहस्पति की दशा, अन्तर्दशा में होता है, यह दैवी नियम हैं।

शुक्र- शुक्र ग्रह के कारण क्या रस-रक्त की कमी, ओजक्षय के कारण पीलापन, कफ और वायु के दोष से नेत्र रोग, प्रमेह, जननेन्द्रिय आदि में रोग, पेशाब करने में कठिनता या कष्ट (उपदंश, सुजाक आदि के कारण या प्रोस्टेट ग्लैण्ड बढ़ जाने की वजह से), वीर्य की कमी, संभोग में अक्षमता, अत्यंत संभोग के कारण शरीर में कमजोरी तथा चेहरे पर कान्ति हीनता, शोष (शरीर का सूखना), योगिनी, यक्षिणी एवं मातृगण से भय, शुक्र क्लेश कारक होने से मित्रों से मित्रता भी टूट जाती है।

रोग जो शनि के कारण उत्पन्न होते हैं- वात और कफ के द्वारा उत्पन्न रोग, टांग में दर्द या लंगड़ाना, अत्यधिक श्रम के कारण थकान, भ्रांति। कुक्षि (कांख के रोग), शरीर के भीतर बहुत उष्णता हो जाती है, नौकरों से कष्ट, नौकर नौकरी छोड़ कर चले जायें या धोखा या दगा दें, भार्या और पुत्र सम्बंधी विपत्ति, अपने शरीर के किसी भाग में चोट, हृदय ताप (मानसिक चिंता), पेड़ या पत्थर से चोट, पिशाच आदि की पीड़ा, आपत्ति।

राहु ग्रह के कारण होने वाले रोग- क्लेश, रोग व चिन्ता आदि- हृदय रोग, हृदय में ताप (जलन), कोढ़, दुर्मति, भ्रांति, विष के कारण उत्पन्न हुई बीमारियाँ, पैर में पीड़ा या चोट, स्त्री, पुत्र को कष्ट या उनके कारण कष्ट, सर्प और पिशाचों से भय।

केतु क्या कष्ट उत्पन्न करता है- ब्राह्मणों और क्षत्रियों से कलह के कारण कष्ट, शत्रुओं से भय।

गुलिक के कारण होने वाले कष्ट- गुलिक को ही मान्दि भी कहते हैं। गुलिक यदि छठे घर में हो या छठे ग्रह के स्वामी के साथ हो तो शरीर में पीड़ा, किसी स्वजन की मृत्यु और प्रेत से भय होता है।

रोगों के कुछ अन्य कारण हैं-
1. यदि चन्द्रमा और सूर्य बारहवें या दूसरे स्थान में हों, और उनको मंगल और शनि देखते हों तो, नेत्र रोग होता है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि यदि सूर्य, चन्द्र दोनों एक साथ या एक दूसरे के घर में हों, और उनको मंगल और शनि दोनों पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो, संभवतः उस आंख से दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जायेगा। दूसरा स्थान दाहिने नेत्र का है। इस कारण दाहिने नेत्र में रोग होगा। ऊपर जो योग बताया गया है, वह यदि बारहवें घर में होगा तो बायें नेत्र की दृष्टि नष्ट होगी। इसी प्रकार यदि सूर्य और चन्द्रमा इन दोनों में से कोई एक-दूसरे या बारहवें घर में बैठा हो, और उसको शनि या मंगल देखते हों तो, दूसरे में सूर्य या चन्द्र बैठने से दाहिने नेत्र का रोग होगा, और बारहवें घर में सूर्य या चन्द्र बैठने से और उसको मंगल या शनि के देखने से बायें नेत्र में रोग होगा। दूसरे और बारहवें घर को नेत्र स्थान कहते हैं। नेत्र स्थान में बैठे हुये सूर्य या चन्द्र को केवल मंगल या केवल शनि देखें तो थोड़ा कष्ट और यदि मंगल और शनि दोनों देखें तो, विशेष कष्ट समझाना चाहिये। यदि नेत्र स्थान में सूर्य, चन्द्र न भी बैठे हों अन्य पाप ग्रह बैठे हों या पाप ग्रह की दृष्टि भी हो तो भी नेत्र की दृष्टि में कमी हो जाती है।

2. यदि तीसरे और ग्यारहवें घर और बृहस्पति-मंगल शनि से युक्त या दृष्ट हों तो, कान का रोग होता है। तीसरे से दाहिने कान का विचार किया जाता है, ग्याहरवें से बांये कान का। सुनना (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन पांचो गुणों में से) शब्द से सम्बंध रखता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश यह पांच तत्त्व हैं। सूर्य और मंगल ग्रह का अग्नि तत्त्व, चन्द्रमा और शुक्र का जल तत्त्व, बुध का पृथ्वी तत्त्व, शनि का वायु तत्त्व और बृहस्पति का आकाश तत्त्व है। शब्दगुण का अधिष्ठाता आकाश तत्त्व है। आकाश तत्त्व बृहस्पति से संबंधित होने के कारण यह कहा गया है कि, यदि बृहस्पति, मंगल, शनि से (मंगल से या शनि से या शनि, मंगल दोनों से) पूर्ण दृष्टि से देखा जाता हो, या मंगल, शनि के साथ हो तो कान के रोग अथवा बहरापन होता है। यहाँ तारतम्य से यह विचार कर लेना चाहिये कि तृतीय और एकादश घर जितने निर्बल होंगे, और जितनी अधिक पाप दृष्टि इन दोनों पर पड़ेगी-या जितने अधिक पाप ग्रहों के साथ ये तथा बृहस्पति (शब्द गुण का अधिष्ठाता होने के कारण), होंगे उतना ही तीव्र (अधिक) कान का रोग होगा। मंगल पित्त प्रधान है, इसलिये मंगल की युति या दृष्टि पित्त के कारण या फोड़ा-फुंसी, रक्त स्राव आदि का रोग कान में करेगा। शनि वायु प्रधान है, इस कारण, शनि जब कान के रोग उत्पन्न करेगा तो वात के कारण। वात, पित्त, कफ यही तीन दोष आयुर्वेद के अनुसार त्रिदोष हैं। जिनके कुपित हो जाने से या असांमजस्य से शरीर में रोग होते हैं।

(3) मंगल पंचम में होने से उदर (पेट के विकार) करता है। इनमें से कोई भी उग्र ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु पंचम में होने से पेट में पीड़ा करता है, पांचवा स्थान पेट का है।

(4) शुक्र यदि सप्तम या अष्टम स्थान में हो तो वीर्य सम्बंधी प्रमेहादि या मूत्ररोग करता है।

(5) यदि षष्ठेश या अष्टमेश, सप्तम में या षष्ठेश अष्टम में हो तो, गुदा रोग होता है। सप्तम स्थान गुह्य जननेन्द्रिय प्रदेश, अष्टम गुदा का स्थान है। यहाँ पाप ग्रह बैठे हों, या दुःस्थान (छठे आठवें) के स्वामी बैठे हों, तो शरीर के उस भाग में रोग उत्पन्न करते हैं।
यदि छठे या आठवें घर में सूर्य हो तो, ज्वर (बुखार) का भय, यदि छठे या आठवें घर मंे मंगल या केतु हों तो व्रण (घाव, चोट, जख्म), छठे या आठवें घर में शुक्र हो तो, जननेन्द्रिय प्रदेश में रोग (उदाहरण के लिये मूत्र रोग, वीर्य रोग, सुजाक, आतशक आदि), यदि छठे या आठवें घर में बृहस्पति हो तो (यक्ष्मा, टी. बी. आदि), यदि छठे या आठवें शनि हो तो वात (वायु रोग), यदि छठे या आठवें मंगल राहु हों, या उस पर मंगल की दृष्टि हो तो पिटिका (अदीठ आदि फोड़ा या सामान्य फोड़ा), यदि छठे या आठवें घर में चन्द्रमा और शनि एक साथ हों तो गुल्म (तिल्ली के कारण तथा तिल्ली बढ़ जाने के कारण पेट में पसलियों के नीचे-दाहिनी ओर यकृत (जिगर) और बाँयी और प्लीहा (तिल्ली होती है), यदि कृष्ण पक्ष का क्षीण चन्द्रमा पाप ग्रह के साथ हो, और जिस राशि में छठे या आठवें हों तो, अम्बुर्द रोग (पेट या शरीर के अन्य भाग में पानी भर जाना, जलोदर) या क्षय (यक्ष्मा टी. बी.) का रोग होता है।जो ग्रह अष्टम में होते हैं, या अष्टम को देखते हैं, उनमें जो बलवान होता है, उस ग्रह के रोग से जातक की मृत्यु होती है। आठवाँ आयु का स्थान है। ऊपर बताया जा चुका है कि, कौन-सा ग्रह किस रोग का कारक है। यदि आठवें भाव में ग्रह हों, या ग्रह देखते हों, तब किस प्रकार के रोग से मृत्यु होगी यह ऊपर बताया गया है, परन्तु आठवें घर में कोई ग्रह न हो, और न कोई ग्रह आठवें घर को देखता हो; ऐसी स्थिति में किस रोग से मृत्यु होगी? आठवें घर के जो रोग बताये गये हैं, उनसे या आठवें घर का मालिक जिस राशि या भाव में बैठा हो, उसके दोष से, उदाहरण के लिये आठवें घर का मालिक पांचवे घर में हो तो, उदर (पेट के) रोग से, चैथे घर में बैठा हो तो, हृदय रोग से यदि अष्टमेश सूर्य या मंगल हो तो, पित्तज रोग से, शनि हो तो वात रोग से इत्यादि। जन्म लग्न (द्रेष्काण) से जो 22वां द्रेष्काण होता है, उसका स्वामी भी मृत्यु कारक होता है। ऊपर जो योग अष्टम भाव संबंधी बताये गये हैं कि, वह लागू न हों तो जन्म द्रेष्काण से जो 22वां दे्रष्काण हो उस 22वें द्रेष्काण का जो स्वामी हो, उस स्वामी के जो रोेग हों, उनमें से किसी रोग के कारण मृत्यु होती है। जो ग्रह आठवें घर में हो, या आठवें घर को देखते हैं, उन ग्रहों में जो बलवान हो, उसके रोग या दोष से मृत्यु होती है। यदि कोई ऐसा ग्रह न हो, तो अष्टम भाव में जो राशि हो उसके रोग के कारण मृत्यु होती है।

सूर्य- अग्नि, उष्ण ज्वर, पित्त या शस्त्र से मृत्यु करता है।

चन्द्रमा- विषूचिका (हैजा), जलोदर (इस रोग में हाथ, पैर या अन्य स्थान में पानी इकट्ठा हो जाता है) जल की बीमारियाँ (प्ल्यूरेसी या अन्य बीमारी जिसमें जल कहीं इकट्ठा हो जावे, यक्ष्मा, टी. बी. आदि रोगों से आयु समाप्त करता है।)

मंगल- जलने से (अग्नि प्रकोप, बिजली आदि भी इसी के अन्तर्गत आ जाती है), रक्त विकार या रक्त बहने से, क्षुद्र अभिचार (जादू, टोना, मारण आदि के अनुष्ठानों आदि) के कारण, मृत्यु करता है।

बुध- पाण्डु (पीलिया) या रक्त की कमी, भ्रांति (स्नायु संबंधी विकार) आदि रोगों से जातक के प्राण हरण करता है। रक्त का कम बनना जिससे ‘पाण्डु’ आदि रोग होते हैं, यकृत की खराबी इत्यादि।

बृहस्पति- कफ का अधिष्ठाता है, और कफ से मृत्यु करता है। इसमें विशेष कष्ट नहीं होता।

शुक्र- जब प्राण हरण करता है, तो इसमें कारण अति स्त्री प्रसंग, वीर्य की कमी से शरीर निस्तेज हो जाना होता है। धातुक्षय इत्यादि बीमारी का शिकार होना, मूत्र रोग, जननेन्द्रिय सम्बंधी रोग शुक्र के अन्तर्गत आते हैं।

शनि- सन्निपात, वातरोग (लकवा आदि के द्वारा) आदि से मृत्यु करता है।

राहु- कुष्ठ (कोढ से) या, आंत्रशोथ, फूड प्रोसेसिंग विष या जम्र्स (रोग कीटाणु) युक्त वस्तु खाने से, सर्प आदि विषैले जन्तुओं के काटने से, जिस रोग में शरीर पर ददोड़े, फुंसियाँ हो जाते हैं, उसमें मृत्यु करता है।

केतु- मृत्यु का कारण दुर्मरण होता है, दुर्मरण का अर्थ है, अपमृत्यु (जैसा आकस्मिक मोटर, रेल आदि से, मकान के गिरने से, कुचल जाने से, कोई कर दे, यह सब दुर्मरण के उदाहरण हैं)। शत्रुओं के विरोध से, कीड़ों या शरीर में किसी कीड़े या जन्तु काटने से सेप्टिक हो जाने या भोजन आदि के द्वारा विषाक्त कीटाणु शरीर में प्रवेश कर जायें। कुण्डली के आठवें घर से जो दोष या रोग सूचित हों, उनसे (इसमें आठवें घर का मालिक, आठवें, घर को जो देखते हैं, वे सभी आ जाते हैं, या आठवें घर का मालिक जिस नवांश में बैठा हो, उस नवांश राशि के रोग स्वाभाविक हैं-

मेष- पित्त के कारण ज्वर, उष्णता (गर्मी के कारण उत्पन्न रोग लू लगना आदि, जठाराग्नि, पेट में भोजन पचाने वाली जो अग्नि है) के रोग।

वृष- त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के उत्पात से, शस्त्र से, अग्नि से जलने के कारण।

मिथुन- श्वास की बीमारी, दमा, उष्ण शूल (पित्त के कारण जो तीव्र दर्द होते हैं)।

कर्क- पागलपन, उन्माद, वात के कारण रोग, अरुचि (भोजन में अरुचि आदि लक्ष्ण वाले रोग, ऐनोरेक्सिया)।

सिंह- जंगली पशुओं के कारण, मृत्यु, ज्वर, स्फोट (फोड़ा) शत्रुओं के कारण।

कन्या- स्त्रियों के कारण, गुप्तरोग (मूत्रेन्द्रिय या जननेन्द्रिय सम्बंधी रोग), ऊपर से गिरने से।

तुला- मस्तिष्क ज्वर (ब्रेन फीवर) सन्निपात।

वृश्चिक- प्लीहा (तिल्ली) संग्रहणी, पाण्डु (पीलिया) रोग।

धनु- पेड़ के कारण (पेड़ से गिरने, या अपने ऊपर पेड़ गिर जाने से), जल लकड़ी के कारण (लकड़ी चीरते समय, या लकड़ी की चोट से), शस्त्र से।

मकर- शूल (पेट का दर्द, एपिण्डीसाइटिज आदि, पेट में फोड़ा, आदि, कोलिक दर्द) अरुचि, मंदाग्नि या बुद्धिभ्रम (नर्वस स्नायु मंडल की अव्यवस्था या रोग के कारण संयत विचार करने की शक्ति जब नष्ट हो जाती है) आदि से।

कुम्भ- खांसी, ज्वर, क्षय।

मीन- पानी से, पानी में डूबने से, जल रोगों से।
यदि आठवें घर का मालिक पापग्रह हो, और आठवें घर में पापग्रह बैठे भी हों (या एक भी पापग्रह अष्टम में हो) तो शस्त्र, अग्नि, व्याघ्र, सर्प आदि की पीड़ा होती है। यदि केन्द्र में बैठे हुये दो पाप ग्रह एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हों, तो सरकार की नाराजगी से, शस्त्र, विष, अग्नि आदि के कारण मृत्यु होती है।
यदि बारहवें घर का मालिक सौम्य ग्रह की राशि या सौम्य ग्रह के नवांश में हो, या सौम्य ग्रह के साथ बैठा हो, अथवा बारहवें घर में सौम्य ग्रह बैठा हो, और बारहवें घर का मालिक भी सौम्य ग्रह हो तो, मरते समय विशेष क्लेश या पीड़ा नहीं होती। यदि उसे उल्टा हो अर्थात बाहरवें घर का मालिक क्रूर ग्रह की राशि या क्रूर ग्रह के नवांश में बैठा हो या क्रूर ग्रह के साथ हो, अथवा बारहवें घर में क्रूर ग्रह बैठा हो, बारहवें घर को क्रूर देखते हों तो कष्ट, पीड़ा क्लेश के साथ मृत्यु होती है। कफ-वात-पित्त तीनों प्रकृतियों के साथ ग्रहों का सम्बन्ध, शरीरांगों में राशियों एवं ग्रहों का विनिवेश, बालारिष्ट, आयु आदि विषयों की प्राप्ति, रोग की स्थिति में महत्वपूर्ण उपाय प्राप्त हैं। ज्योतिष में रोगों का वर्गीकरण, लक्षण (ग्रहयोग) तथा ज्योतिष शास्त्र ग्रहों की प्रकृति, धातु, रस, अंग, अवयव, स्थान, बल एवं अन्यान्य विशेषताओं के आधार पर रोगों का निर्णय करता है, तथा निदान के ज्योतिषीय उपाय भी बताये गये हैं। लेख के अंत में यही कहना चाहूंगा कि ज्योतिष शास्त्र ही एक ऐसा शास्त्र है, जिसकी सहायता से भविष्य में होने वाले किसी भी रोग की सूचना प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार रोग का पूर्व ज्ञान प्राप्त कर तथा उसके लिये ग्रहोपचार द्वारा अथवा सावधान रहकर मनुष्य उस रोग के कष्ट से किसी सीमा तक बच सकता है।

मानव शरीर और ज्योतिष-
ब्रह्माण्ड और मानव शरीर की समानता पर पुराणों व अन्य धर्मग्रन्थों में व्यापक विचार हुआ है। जो ब्रह्माण्ड में है, वह मानव शरीर में भी है। ब्रह्माण्ड को समझने का श्रेष्ठ साधन मानव शरीर ही है। वैज्ञानिको ने भी सावययी-सादृश्यता के सिद्धांत को इसी आधार पर निर्मित किया है। मानव शरीर व संपूर्ण समाज को एक दूसरे का प्रतिबिंब माना गया है।

आज का मानव सौर मंडल को भली-भांति जानता है, इसी सौरमंडल में व्याप्त पंचतत्वों को प्रकृति ने मानव निर्माण हेतु पृथ्वी को प्रदान किया है। मानव शरीर जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु व आकाश तत्व से निर्मित हुआ है। ज्योतिष ने सौरमंडल के ग्रहों, राशियों तथा नक्षत्रों में इन तत्वों का साक्षात्कार कर प्राकृतिक सिद्धांतो को समझा है। ज्योतिष का फलित भाग इन ग्रह, नक्षत्रों व राशियों के मानव शरीर पर पढ़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करता है। जो पंचतत्व इन ग्रह नक्षत्र व राशियों में हैं। वही मानव शरीर में भी हैं, तो निश्चित ही इनका मानव शरीर पर गहरा प्रभाव होगा ही।

वैदिक ज्योतिष ने सात ग्रहों को प्राथमिकता दी है। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि। राहु व केतु छाया ग्रह हैं। पाश्चात्य ज्योतिष जगत में युरेनस, नेप्चयुन व प्लुटो का भी महत्व है। ज्योतिष ने पंचतत्वों में प्रधानता के आधार पर ग्रहों में इन तत्वों को अनुभव किया है, सूर्य व मंगल अग्नि तत्व प्रधान ग्रह हैं। अग्नि तत्व शरीर की ऊर्जा व जीने की शक्ति का कारक है। अग्नि तत्व की कमी शरीर के विकास को अवरूद्ध कर रोगों से लड़ने की शक्ति को कम करती है। शुक्र व चंद्रमा जल तत्व प्रधान ग्रह हैं। शरीर में व्याप्त जल पर चंद्रमा का आधिपत्य है। शरीर में स्थित जल शरीर का पोषण करता है। जल तत्व की कमी आलस्य या तनाव उत्पन्न कर, शरीर की संचार व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालती है। जल व मन दोनो की प्रकृति चंचल है, इसलिये चंद्रमा को मन का कारकत्व भी प्रदान किया गया है। उदाहारणार्थ देखें शुक्राणु जो तरल में ही जीवित रहते हैं, और यह सृष्टि के निर्माण में व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शुक्र काम जीवन का कारक है, यही कारण है कि, शुक्र के अस्त होने पर विवाह के मुहुर्त नहीें निकाले जाते। बृहस्पति व राहु आकाश तत्व से सम्बंध रखते हैं। यह व्यक्ति के पर्यावरण व आध्यात्मिक जीवन से सीधा सम्बंध रखते हैं। बुध पृथ्वी तत्व का कारक ग्रह है। यह बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति शरीर को देता है। इस तत्व की कमी बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति पर विपरीत असर डालती है। शनि वायु तत्व प्रधान ग्रह है। शरीर में व्याप्त वायु पर इसका पूर्ण आधिपत्य है। केतु को मंगल की तरह माना गया है।
मानव जीवन के कुछ गुण मूल प्रकृति के रूप में भी मौजूद होते हैं। प्रत्येक मनुष्य में प्राकृतिक रूप से आत्मा, मन, वाँणी, ज्ञान, काम, व दुखः विद्यमान होते हैं। यह उसके जन्म समय की ग्रहस्थिति पर निर्भर करता है, कि किस मानव में इनकी प्रबलता कितनी है? विशेष रूप से प्रथम दो तत्वों को छोड़कर क्योंकि आत्मा से ही शरीर है। यह सूर्य का अधिकार क्षेत्र है। मन चंद्रमा का, बल मंगल का, वाँणी बुध का, ज्ञान बृहस्पति का, काम शुक्र व दुखः पर शनि का आधिपत्य है।

आधुनिक मनोविज्ञान मानव की चार मूल प्रवृत्तियाँ मानता है- भय, भूख, यौन व सुरक्षा। भय पर शनि व केतु का आधिपत्य है। भूख पर सूर्य व बृहस्पति का, यौन पर शुक्र तथा सुरक्षा पर चंद्र व मंगल का। मानव शरीर के विभिन्न धातु तत्वों का भी बह्माण्ड के ग्रहों से सीधा सम्बंध है। शरीर की हड्ढियों पर सूर्य, रक्त की तरलता पर चंद्र्रमा, शरीर के माँस व गर्मी पर मंगल, त्वचा पर बुध, चर्बी पर बृहस्पति, वीर्य पर शुक्र तथा स्नायुमंडल पर शनि का अधिपत्य है। राहु एवं केतु चेतना से सम्बंधित ग्रह हंै। शरीर क्रिया-विज्ञान के अनुसार मानव शरीर त्रिदोष से पीड़ित होता है, जो विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होते हैं। वात, पित्त व कफ! सूर्य, मंगल, पित्त, चंद्रमा व शुक्र कफ, शनि वायु तथा बुध त्रिदोष; यह प्रतीकात्मक हैं। नेत्र व्यक्ति को अच्छा या बुरा देखने व समझने का शक्तिशाली माध्यम है। आंतरिक व बाह्य रहस्यों को देखने में नेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्राचीन ज्योतिष के सभी सिद्धांत योगियों व ऋषियोें ने सिर्फ नेत्रों से देखकर व योगमार्ग से अनुभव करके बनाये हैं। बिना कोई वैज्ञानिक यंत्रों की सहायता से यह अपने आप में आंतरिक व बाह्य रहस्यों में ज्योतिष के महत्व को स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त हैं। सूर्य व चंद्रमा साक्षी हैं, अतः ज्योतिष के विज्ञान या सत्य होने में कोई संदेह नही है।

यह थे, लेखक की पुस्तक :- “रोग एवं ज्योतिष” के कुछ अंश।

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दीपावली पूजन 2018

दीपावली पूजन के शुभ मुहूर्त:-

(Dr.R.B.Dhawan, Top best Astrologer in Delhi)

इस वर्ष दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, इस दिन अमावस्या तिथि दिल्ली की गणना अनुसार लगभग 20:32 तक रहेगी। महालक्ष्मी पूजन किसी स्थिर लग्न में होना उचित है, इस दिन वृषभ और सिंह दो स्थिर लग्न होंगी। वृषभ लग्न सांयकाल 17 बजकर 57 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। इन दोनो महूर्त में स्वाती नक्षत्र 19 बजकर 37 मिनट तक, इसके पश्चात विशाखा नक्षत्र पढेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन दोनो लग्नों का यह समय दिल्ली प्रदेश के लिये है। शेष भारत अथवा विदेशों में रहने वाले पाठक अपने देश या प्रदेश के लिये उपरोक्त स्थिर लग्नों का समय shukracharya कार्यालय से फोन द्वारा पता कर सकते हैं। इन्हीं दो स्थिर लग्न में से किसी लग्न में जब अनुकूल चौघड़िया भी हो तब महालक्ष्मी पूजन किया जा सकता है।

महालक्ष्मी पूजन के लिए पूजा स्थल एक दिन पहले से सजाना चाहिए पूजन के लिए सामग्री दिपावली से पहले ही एकत्रित कर लें। इसमें यदि माता लक्ष्मी के पसंद को ध्यान में रख कर पूजा की जाए तो शुभत्व की वृद्धि होती है। माता के पसंदीदा रंग लाल, व गुलाबी हैं, इसके बाद फूलों की बात करें, तो कमल और गुलाब माता लक्ष्मी के प्रिय फूल हैं। पूजा में फलों का भी खास महत्व होता है। फलों में उन्हें श्रीफल, सीताफल, बेर, अनार व सिंघाड़े पसंद हैं। आप इनमें से कोई भी फल पूजा के लिए प्रयोग कर सकते हैं। अनाज रखना हो तो चावल रखें, वहीं मिठाई में माता लक्ष्मी की पसंद शुद्ध केसर से बनी मिठाई या हलवा, शीरा और नैवेद्य हैं।

माता के स्थान को सुगंधित करने के लिए केवड़ा, गुलाब और चंदन के इत्र का प्रयोग करें। दीये के लिए आप गाय के घी, मूंगफली या तिल्ली के तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह माता लक्ष्मी को शीघ्र प्रसन्न करते हैं। पूजा के लिए महत्वपूर्ण दूसरी वस्तुओं में गन्ना, कमल गट्टा, खड़ी हल्दी, बिल्वपत्र, पंचामृत, गंगाजल, ऊन का आसन, रत्न आभूषण, गाय का गोबर, सिंदूर और भोजपत्र शामिल हैं।

चौकी सजाना :-

1. लक्ष्मी-गणेश की चांदी या फिर मिट्टी से बनी छोटी प्रतिमा, 2. चांदी पर उत्कीर्ण महालक्ष्मी यंत्र (पहले से प्राणप्रतिष्ठित)। 3. मिट्टी के बने हुए 21, 31 या 51 छोटे और 3 बड़े दीपक। 4. एक तांबे का कलश जिस पर नारियल रखेंगे, व आचमनी। 5. चांदी और तांबे के सिक्के, बहीखाता, कलम और दवात। 6. नकदी, थालियां, जल पात्र, चावल, फूल, सुपारी, रोली, कलावा, पानी वाला नारियल, लाल वस्त्र,।

1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।

सबसे पहले एक लकड़ी की चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें, कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम की ओर रहे। लक्ष्मीजी, गणेशजी की दाहिनी ओर रहें। पूजा करने वाले मूर्तियों के सामने की तरफ बैठें। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे, व इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुण का प्रतीक है। दो बड़े दीपक रखें, एक में घी भरें व दूसरे में तेल। एक दीपक चौकी के दाईं ओर रखें, व दूसरा मूर्तियों के चरणों में। इसके अलावा एक बड़ा दीपक गणेशजी के पास रखें।

मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से लाल वस्त्र पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां बनाएं। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह व षोडश मातृका के बीच स्वस्तिक का चिह्न बनाएं।
इसके बीच में सुपारी रखें, व चारों कोनों पर चावल की ढेरी। सबसे ऊपर बीचों बीच ॐ लिखें। छोटी चौकी के सामने तीन थाली व जल भरकर कलश रखें। थालियों की निम्नानुसार व्यवस्था करें- 1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।

इन थालियों के सामने पूजा करने वाला बैठे। आपके परिवार के सदस्य आपकी बाईं ओर बैठें। कोई आगंतुक हो तो वह आपके या आपके परिवार के सदस्यों के पीछे बैठे। हर वर्ष दीपावली पूजन में नया सिक्का लें, और पुराने सिक्को के साथ इकट्ठा रख कर दीपावली पर पूजन करें, और पूजन के बाद सभी सिक्को को तिजोरी में रख दें।

पूजा की संक्षिप्त विधि स्वयं पूजा करने के लिए :- हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा सा जल ले लें, और अब उसे मूर्तियों के ऊपर छिड़कें। साथ में नीचे दिया गया पवित्रीकरण मंत्र पढ़ें। इस मंत्र और पानी को छिड़ककर आप अपने आपको पूजा की सामग्री को और अपने आसन को भी पवित्र कर लें।

शरीर एवं पूजा सामग्री पवित्रीकरण मन्त्र :-

ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।
यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥

पृथ्वी पवित्रीकरण विनियोग:-

पृथ्वी देवता मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग षिः सुतलं छन्दः
कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥

अब पृथ्वी पर जिस जगह आपने आसन बिछाया है, उस जगह को पवित्र कर लें, और मां पृथ्वी को प्रणाम करके मंत्र बोलें-
पृथ्वी पवित्रीकरण मन्त्र :-

ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥ पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः।

अब आचमन करें :-

पुष्प, चम्मच या अंजुलि से एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ केशवाय नमः।

और फिर एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ नारायणाय नमः।

फिर एक तीसरी बूंद पानी की मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ वासुदेवाय नमः।

इसके बाद संभव हो तो किसी किसी ब्राह्मण द्वारा विधि विधान से पूजन करवाना अति लाभदायक रहेगा। ऐसा संभव ना हो तो सर्वप्रथम दीप प्रज्वलन कर गणेश जी का ध्यान कर अक्षत पुष्प अर्पित करने के पश्चात दीपक का गंधाक्षत से तिलक कर निम्न मंत्र से पुष्प अर्पण करें।

शुभम करोति कल्याणम, अरोग्यम धन संपदा, शत्रु-बुद्धि विनाशायः, दीपःज्योति नमोस्तुते !

पूजन हेतु संकल्प :-

इसके बाद बारी आती है संकल्प की। जिसके लिए पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, आदि सभी सामग्री थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें-

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ऊं तत्सदद्य श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय पराद्र्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मवर्तैकदेशे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2070, तमेऽब्दे शोभन नाम संवत्सरे दक्षिणायने/उत्तरायणे हेमंत ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे अमावस तिथौ (जो वार हो) रवि वासरे स्वाति नक्षत्रे आयुष्मान योग चतुष्पाद करणादिसत्सुशुभे योग (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया– श्रुतिस्मृत्यो- क्तफलप्राप्तर्थं— निमित्त महागणपति नवग्रहप्रणव सहितं कुलदेवतानां पूजनसहितं स्थिर लक्ष्मी महालक्ष्मी देवी पूजन निमित्तं एतत्सर्वं शुभ-पूजोपचारविधि सम्पादयिष्ये।

गणेश पूजन :-

किसी भी पूजन की शुरुआत में सर्वप्रथम श्री गणेश को पूजा जाता है। इसलिए सबसे पहले श्री गणेश जी की पूजा करें। इसके लिए हाथ में पुष्प लेकर गणेश जी का ध्यान करें। मंत्र पढ़े –

गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।

गणपति आवाहन:- ॐ गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ।। इतना कहने के बाद पात्र में अक्षत छोड़ दे।

इसके पश्चात गणेश जी को पंचामृत से स्नान करवाये पंचामृत स्नान के बाद शुद्ध जल से स्नान कराए अर्घा में जल लेकर बोलें- एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ऊं गं गणपतये नम:।

रक्त चंदन लगाएं:- इदम रक्त चंदनम् लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:। इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं। इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाएं :- इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ॐ गं गणपतये नम:। दूर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को अर्पित करें। उन्हें वस्त्र पहनाएं और कहें – इदं रक्त वस्त्रं ऊं गं गणपतये समर्पयामि।

पूजन के बाद श्री गणेश को प्रसाद अर्पित करें और बोले – इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। मिष्ठान अर्पित करने के लिए मंत्र:- इदं शर्करा घृत युक्त नैवेद्यं ॐ गं गणपतये समर्पयामि:। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें। इदं आचमनयं ऊं गं गणपतये नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। अब एक फूल लेकर गणपति पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं गं गणपतये नम:।
इसी प्रकार अन्य देवताओं का भी पूजन करें बस जिस देवता की पूजा करनी हो गणेश जी के स्थान पर उस देवता का नाम लें।

कलश पूजन:- इसके लिए लोटे या घड़े पर मोली बांधकर कलश के ऊपर आम के पत्ते रखें। कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत व् मुद्रा रखें। कलश के गले में मोली लपेटे। नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें। अब हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरुण देव का कलश में आह्वान करें।

ओ३म् त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि:। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि, ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥)

इसके बाद इस प्रकार श्री गणेश जी की पूजन की है उसी प्रकार वरुण देव की भी पूजा करें। इसके बाद इंद्र और फिर कुबेर जी की पूजा करें। एवं वस्त्र सुगंध अर्पण कर भोग लगाये इसके बाद इसी प्रकार क्रम से कलश का पूजन कर लक्ष्मी पूजन आरम्भ करें।

लक्ष्मी पूजन:-

सर्वप्रथम निम्न मंत्र कहते हुए माँ लक्ष्मी का ध्यान करें। ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी। गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।। लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि-गज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः।नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।

अब माँ लक्ष्मी की प्रतिष्ठा करें, हाथ में अक्षत लेकर मंत्र कहें – “ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।”

प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएं और मंत्र बोलें – ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।। इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं। इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं। ‘ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’

इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं। अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि कहकर लाल वस्त्र पहनाएं। इसके बाद मा लक्ष्मी के क्रम से अंगों की पूजा करें। माता लक्ष्मी की अंग पूजा बाएं हाथ में अक्षत लेकर दाएं हाथ से थोड़े थोड़े छोड़ते जाए और मंत्र कहें :–

ॐ चपलायै नम: पादौ पूजयामि ॐ चंचलायै नम: जानूं पूजयामि, ॐ कमलायै नम: कटि पूजयामि, ॐ कात्यायिन्यै नम: नाभि पूजयामि, ॐ जगन्मातरे नम: जठरं पूजयामि, ॐ विश्ववल्लभायै नम: वक्षस्थल पूजयामि, ॐ कमलवासिन्यै नम: भुजौ पूजयामि, ॐ कमल पत्राक्ष्य नम: नेत्रत्रयं पूजयामि, ॐ श्रियै नम: शिरं: पूजयामि।

अष्टसिद्धि पूजा :-

अंग पूजन की ही तरह हाथ में अक्षत लेकर मंतोच्चारण करते रहे। मंत्र इस प्रकर है – ॐ अणिम्ने नम:, ॐ महिम्ने नम:, ॐ गरिम्णे नम:, ॐ लघिम्ने नम:, ॐ प्राप्त्यै नम: ॐ प्राकाम्यै नम:, ॐ ईशितायै नम: ॐ वशितायै नम:।

अष्टलक्ष्मी अंग पूजन :-

अंग पूजन एवं अष्टसिद्धि पूजा की ही तरह हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें। ॐ आद्ये लक्ष्म्यै नम:, ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:, ॐ सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:, ॐ अमृत लक्ष्म्यै नम:, ॐ लक्ष्म्यै नम:, ॐ सत्य लक्ष्म्यै नम:, ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:, ॐ योग लक्ष्म्यै नम:।

नैवैद्य अर्पण :-

पूजन के बाद देवी को “इदं नानाविधि नैवेद्यानि ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें। मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” बालें। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें। इदं आचमनयं ऊं महालक्ष्मियै नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि। अब एक फूल लेकर लक्ष्मी देवी पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं महालक्ष्मियै नम:।
माँ को यथा सामर्थ वस्त्र, आभूषण, नैवेद्य अर्पण कर दक्षिणा चढ़ाए दूध, दही, शहद, देसी घी और गंगाजल मिलकर चरणामृत बनाये और गणेश लक्ष्मी जी के सामने रख दे। इसके बाद 5 तरह के फल, मिठाई खील-पताशे, चीनी के खिलोने लक्ष्मी माता और गणेश जी को चढ़ाये और प्राथना करे की वो हमेशा हमारे घरो में विराजमान रहे। इनके बाद एक थाली में विषम संख्या में दीपक 11, 21 अथवा यथा सामर्थ दीप रख कर इनको भी कुंकुम अक्षत से पूजन करे इसके बाद माता लक्ष्मी को श्री सूक्त अथवा ललिता सहस्त्रनाम का पाठ सुनाये पाठ के बाद माँ से क्षमा याचना कर माँ लक्ष्मी जी की आरती कर बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने के बाद थाली के दीपो को घर में सब जगह रखे। लक्ष्मी-गणेश जी का पूजन करने के बाद, सभी को जो पूजा में शामिल हो, उन्हें खील, पताशे, चावल दें। सब फिर मिल कर प्राथना करे की माँ लक्ष्मी हमने भोले भाव से आपका पूजन किया है ! उसे स्वीकार करें और गणेशा, माँ सरस्वती और सभी देवताओं सहित हमारे घरों में निवास करें, प्रार्थना करने के बाद जो सामान अपने हाथ में लिया था वो मिटटी के लक्ष्मी गणेश, हटड़ी और जो लक्ष्मी गणेश जी की फोटो लगायी थी उस पर चढ़ा दे।

लक्ष्मी पूजन के बाद आप अपनी तिजोरी की पूजा भी करें :- रोली को देसी घी में घोल कर स्वस्तिक बनाये और धुप दीप दिखा करें, मिठाई का भोग लगाए।

लक्ष्मी माता और सभी भगवानों को आपने अपने घर में आमंत्रित किया है, अगर हो सके तो पूजन के बाद शुद्ध बिना लहसुन-प्याज़ का भोजन बना कर गणेश-लक्ष्मी जी सहित सबको भोग लगाए। दीपावली पूजन के बाद आप मंदिर, गुरद्वारे और चौराहे में भी दीपक और मोमबतियां जलाएं।

रात को सोने से पहले पूजा स्थल पर मिटटी का चार मुहं वाला दिया सरसों के तेल से भर कर जगा दें, और उसमे इतना तेल हो की वो सुबह तक जग सके।

माँ लक्ष्मी जी की आरती :-

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता तुम को निस दिन सेवत, मैयाजी को निस दिन सेवत, हर विष्णु विधाता …..

ॐ जय लक्ष्मी माता …
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता ओ मैया तुम ही जग माता, सूर्य चन्द्र माँ ध्यावत, नारद ऋषि गाता…

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
दुर्गा रूप निरन्जनि, सुख सम्पति दाता ओ मैया सुख सम्पति दाता …. जो कोई तुम को ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता।

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभ दाता ओ मैया तुम ही शुभ दाता …. कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भव निधि की दाता …

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
जिस घर तुम रहती तहँ सब सद्गुण आता ओ मैया सब सद्गुण आता … सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता…

ॐ जय लक्ष्मी माता …
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता ओ मैया वस्त्र न कोई पाता … ख़ान पान का वैभव, सब तुम से आता..

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
शुभ गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता.. ओ मैया क्षीरोदधि जाता … रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता..

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
महा लक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता ओ मैया जो कोई जन गाता … उर आनंद समाता, पाप उतर जाता

ॐ जय लक्ष्मी माता ..।।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़िया मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया:-
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग। 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चौघड़िया:-
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चौघड़िया पूजन के समय होनी चाहिये। इस प्रकार शुद्ध ज्योतिषीय गणनाओं तथा विशेष दृष्टिकोंण से यह स्पष्ट होता है, कि साधना व पूजन के लिये 7 नवम्बर 2018 की रात्रि 19:00 से 19:52 वृषभ लग्न के साथ साथ शुभ का चौघडिया भी अत्यन्त विशेष फलदायक तथा सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त हैं। अतः सभी गृहस्थ तथा साधक-साधिकाओं से मेरा यही आग्रह है की वे इस वर्ष इसी मुहूर्त में दीपावली पूजन अथवा तंत्र-मंत्र सम्बंधी साधनायें सम्पन्न करें।

शुभ स्थिर लग्न :-

महालक्ष्मी पूजन किसी स्थिर लग्न में होना उचित है, इस दिन वृषभ और सिंह दो स्थिर लग्न होंगी। वृषभ लग्न सांयकाल 19 बजकर 00 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी।

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दीपावली 2018 (दीपावली पूजन)

दीपावली (महालक्ष्मी) पूजन मुहूर्त 2018 :-

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श्री महालक्ष्मी पूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल से आधी रात तक रहने वाली अमावस श्रेष्ठ होती है। यदि अर्धरात्रि काल में अमावस तिथि का आभाव हो, तो प्रदोषकाल में ही दीप प्रज्वलन, महालक्ष्मी पूजन, श्रीगणेश एवं कुबेर आदि पूजन करने का विधान है।

प्रदोषे दीपदानए लक्ष्मी पूजनादि विहितम्।
कार्तिक कृष्ण पक्षे च प्रदोषे भूतदर्शर्योः,
नरः प्रदोष समये दीपदान् दद्यात् मनोरमान्।।

इस वर्ष 2018 ई. कार्तिक अमावस 7 नवम्बर, बुधवार को प्रदोष व्यापिनी तथा रात्रि 21:22 तक निशीथ व्यापिनी होने से दीपावली पर्व इसी दिन होगा। दीपावली स्वाती तथा विशाखा नक्षत्र आयुष्मान तथा सौभाग्य योग एवं तुला के चन्द्रमा के समय होगी। सांय सूर्यास्त (प्रदोषकाल प्रारम्भ) के बाद मेष व वृष लग्न एवं स्वाती नक्षत्र विद्यमान होने से यह समयावधि श्रीगणेश, महालक्ष्मी पूजन आदि आरम्भ करने के लिये विशेष रूप से शुभ रहेगी। बही खातों एवं नवीन शुभ कार्यों के लिये भी यह मुहूर्त अत्यंत शुभ होगा। इस वर्ष बुधवार की दीपावली व्यापारियों, क्रय-विक्रय करने वालों के लिये विशेष रूप से शुभ मानी जायेगी।

लक्ष्मीपूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल की विशेषता :-
कार्तिके प्रदोषे तु विशेषण अमावस्या निशावर्धके।
तस्यां सम्पूज्येत् देवी भोगमोक्ष प्रदायिनीम्।।

दीपावली के दिन घर में प्रदोषकाल से महालक्ष्मी पूजन प्रारम्भ करके अर्धरात्रि तक जप अनुष्ठानादि करने का विशेष महात्मय होता है। प्रदोषकाल से कुछ समय पहले स्नानादि उपरांत धर्मस्थल पर मंत्रपूर्वक दीपदान करके अपने निवास स्थान पर श्रीगणेश सहित महालक्ष्मी, कुबेर पूजनादि करके अल्पाहार करना चाहिये। तदुपरांत यथोपलब्ध निशीथादि शुभ मुहूर्त में मंत्र-जप, यंत्र-सिद्धि आदि अनुष्ठान सम्पादित करने चाहियें।
दीपावली वास्तव में पांच पर्वों का महोत्सव है, जिसका आरम्भ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) से लेकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई-दूज) तक रहती है। दीपावली के पर्व पर धन की भरपूर प्राप्ति के लिये धन की अधिष्ठात्री भगवती लक्ष्मी का समारोह पूर्वक आवाहन, षोडशोपचार सहित पूजन किया जाता है। आगे दिये गये निर्दिष्ट शुभ मुहूर्तों में किसी पवित्र स्थान पर आटा, हल्दी, अक्षत एवं पुष्पादि से अष्टदल कमल बनाकर श्रीलक्ष्मी का आवाहन एवं स्थापन करके देवों की विधिवत् पूजा अर्चना करनी चाहिये।

आवाहन का मंत्र-
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामाद्र्रां ज्वलंती तृप्तां तर्पयंतीम।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप हव्ये श्रियम्। (श्रीसूक्तम्)।

पूजा मंत्र-
ॐ गं गणपतये नमः।। लक्ष्म्यै नमः।। नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात्।। से लक्ष्मी की, एरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः। शतयज्ञाधिपो देवस्तस्मा इन्द्राय ते नमः।

अग्रलिखित मंत्र से इन्द्र की और कुबेर की निम्न मंत्र से पूजा करें- कुबेराय नमः, धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्मधिपाय च। भवन्तु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादि सम्पदः।।
पूजन सामग्री में विभिन्न प्रकार की मिठाई, फल पुष्पादि, धूप, दीपादि सुगंधित वस्तुयें सम्मलित करनी चाहियें। दीपावली पूजन में प्रदोष, निशीथ एवं महानिशीथ काल के अतिरिक्त चौघड़िया मुहूर्त भी पूजन, बही-खाता पूजन, कुबेर पूजा, जपादि अनुष्ठान की दृष्टि से विशेष शुभ माने जाते हैं।

प्रदोषकाल-
7 नवम्बर 2018 को दिल्ली एवं निकटवर्ती नगरों में सूर्यास्त 17:30 से 02 घ. 41 मि. के लिये 20:11 तक प्रदोषकाल रहेगा। सांय 17:57 तक मेष (चर) लग्न तथा सांय 17:57 से 19:52 तक वृष (स्थिर) लग्न विशेष रहेगा। प्रदोषकाल में मेष व वृष लग्न स्वाती नक्षत्र 19:37 तक तथा तुला का चन्द्रमा होने से महालक्ष्मी पूजानादि के लिये शुभ समय होगा। प्रदोषकाल में ही 19:00 से 20:41 तक शुभ की चौघड़िया रहने से इस योग में दीपदान, महालक्ष्मी, गणेश-कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन, धर्मस्थल एवं घर पर दीप प्रज्वलित करना, ब्राह्मणों तथा आश्रितों को भेंट, मिठाई बांटना शुभ होगा।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़िया मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग। 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चौघड़िया
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चौघड़िया पूजन में होनी चाहियें।

निशीथ काल- 7 नवम्बर 2018 को दिल्ली व समीपस्थ नगरों में निशीथकाल रात्रि 20:01 से 22:41 तक रहेगा। इसी निशीथ काल में 19:43 से 21:57 तक मिथुन लग्न मध्यम मुहूर्त, तदुपरांत कर्क लग्न विशेष प्रशस्थ रहेगा। 19:00 से 20:41 तक शुभ की चौघड़िया भी शुभ रहेगी। तदुपरांत अमृत की चौघड़िया 20:41 से 22:22 तक भी शुभ रहेगी। इस अवधि तक पूजन समाप्त कर श्रीसूक्त, कनकधारा स्त्रोत्र तथा लक्ष्मी स्त्रोत्रादि का जप पाठ करना चाहिये।

महानिशीथ काल- रात्रि 22:41 से 24:20 तक महानिशीथ काल रहेगा। इस अवधि में 21:57 से 24:20 तक कर्क लग्न तदुपरांत सिंह लग्न विशेष शुभ रहेगा। 22:22 से 24:02 तक चर की चौघड़िया भी शुभ, परंतु तदुपरांत रोग की चौघड़िया अशुभ रहेगी। इस लिये 24:02 तक श्री गणेश-लक्ष्मी पूजन अवश्य कर लेना चाहिये। महानिशीथ काल में श्री महालक्ष्मी, काली उपासना, यंत्र मंत्र तंत्रादि की क्रियायें व काम्य प्रयोग, तंत्रानुष्ठान, साधनायें एवं यज्ञादि किये जाते हैं।

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सूर्य sun

ज्योतिष मतानुसार सूर्य से पृथ्वी की दूरी अनुमानित सवा करोड़ मील है। सूर्य ग्रह न होकर एक तारा है, जो कि स्थिर है, और अपने अक्ष पर निरन्तर घूमता है। अन्य सभी ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं। सूर्य सदैव मार्गी व उदित रहने वाला ग्रह है।

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ज्योतिष मतानुसार सूर्य नवग्रहों में से एक ग्रह है, ग्रहों में सूर्य आत्मा, आँख, हृदय, हड्डियों, शारीरिक संगठन, आरोग्यता, निजी व्यवहार, सत्वगुण, राज-कृपा, आविष्कार, अधिकार तथा सत्ता का कारक (अधिपति) ग्रह माना गया है, इसे लग्न, धर्म तथा कर्म 1, 9, 10 भाव का कारक भी माना जाता है, तथा इसके द्वारा विशेष रूप से पिता के सम्बंध का विचार किया जाता है।

कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर स्थित हो, गोचर काल में उससे छठे स्थान में किसी ग्रह के होने से सूर्य का वेध हो जाता है, वेधित सूर्य सदैव अशुभ फलदायक है, सूर्य के विद्व स्थान है – 1, 12, 4 तथा 5। सूर्य के शुभ स्थान 3-6-10 व 11 हैं, सूर्य तथा शनि में आपस में कभी वेध नहीं होता, यदि सूर्य विद्ध स्थान पर हो, तथा अन्य ग्रह सूर्य के स्थान शुभ पर ही हो तो उसे विलोम-वेध कहाँ जाता है। विलोम-वेध भी अशुभ फल देने वाला माना गया है।

अन्य:- निसर्ग बल में सूर्य को सब ग्रहों में बलवान माना गया है, यह सर्वाेच्च, स्वराशि, देष्काण, होरा, रविवार, नवांश, उत्तरायण, दिन में मध्य भाग, रात्रि के प्रवेश-काल, मित्र के नवांश तथा लग्न से दशम में (मतान्तर से सप्तम भाव) सदैव बलवान रहते हैं, मकर से 6 राशियों तक इसे चेष्टा बली माना गया है। जन्म कुण्डली में सूर्यदेव ऐसे कई योगों का निर्माण करते हैं, जो विशेष होते हैं, सूर्य समस्त ग्रहों में राजा होता है। अतः इसका जन्मपत्रिका में बलवान एवं योगकारक होना जातक के राजसी गुणों को प्रकट करता है। जातक परिजात, फलदीपिका, बृहत पाराशर होरा शास्त्र इत्यादि ज्योतिषीय ग्रंथों में योग बताये गये हैं जो निम्न प्रकार के हैं :-

1. जन्मपत्रिका में सूर्य से चन्द्रमा केन्द्र में है तो अधम योग से धन, सवारी, बुद्धि, ज्ञान, विद्या, उदारता, यश, मान-सम्मान, सुख-सुविधा के योग में कमी या कम फल प्राप्त करता है।

2. जन्मपत्रिका में सूर्य से द्वितीय मंगल, बुध व बृहस्पति, शुक्र या शनि में से कोई एक ग्रह या अधिक ग्रह हो तो शुभ वेसि योग व जब इनमें से कोई ग्रह या अधिक ग्रह द्वादश में तो शुभ वासि योग, इससे जातक विद्वान, धर्म पालक, प्रतिष्ठिता सुन्दर, धीर एवं अधिकार प्राप्त करने वाला होता है।

3. सूर्य यदि परम उच्च अर्थात मेष के दस अंश पर रहने से उसकी दशा में जातक की धर्म-कर्म में प्रीति बढ़े व पिता द्वारा संचय किया धन तथा भूमि का लाभ हो वहीं उच्चस्थ सूर्य में धन-अन्न व सम्मान की वृद्धि पर बंधु वर्गाें से झगड़ों के कारण परदेश वास की संभावना रहे, वाहनों का सुख प्राप्त होना सम्भव।

4. परम नीच सूर्य की दशा में पिता-माता की मृत्यु, स्त्री पुत्र, सम्पत्ति व स्वयं के गृह में हानि होती है, भय सदैव व्याप्त रहे जबकि नीचस्थ सूर्य से राजकोष से धन-मान की हानि, स्त्री-पुत्र-मित्रादि से क्लेश व किसी स्वजन की मृत्यु की आशंका रहे।

5. उच्च नवांशस्थ रवि जातक में साहस की वृद्धि कर झगड़े में विजय दिलाकर धन वृद्धि करवाता है (कोर्ट केस में विजय), पर पितृ कुल के जनों में बारम्बार क्षति होती रहे। नीचस्थ नवांश का बृहस्पति परदेश यात्रा में स्त्री-पुत्र, धन तथा पृथ्वी से हानि कराता है, मानसिक व्यथाकारी, ज्वरादि से पीड़ित व गुप्तेन्द्रियों की वेदना से कष्ट पाता है। उच्चस्थ सूर्य नवमांश में नीचस्थ हो जाये तो स्त्री, समीपी कुटुम्बियों की मृत्यु व संतान पर आपत्ति का कारण बनता है वहीं नीचस्थ सूर्य यदि नवमांश में उच्च हो तो वह महान सुख व सम्मान प्राप्त करवाता है परन्तु जब दशा का अंत हो रहा हो तो इसका फल विपरीत हो जाता है।

सूर्य महादशाः-
1. लग्नस्थ सूर्य की महादशा में जब मंगल, चंद्र, शनि या राहु की अंतर्दशा होती है तो दुःख राजकीय-अधिकार और गृह तथा धन का नाश हों, लग्नस्थ सूर्य को महादशा में जब गोचर मंगल, चन्द्रमा शनि अथवा राहु की अंतर्दशा आदि है तब सुख, राज्य, अधिकार और गृह तथा धन-सुख की प्राप्ति हो।

2. द्वितीयस्थ सूर्य की महादशा में जब पापग्रहों की अंतर्दशा आये तब धन क्षय, अपमानकारक शब्दों का श्रवण, मानसिक अशांति अकारण भय, नेत्र-रोग वहीं शुभ ग्रहों की अंतर्दशा में सुख, विद्या की प्राप्ति राजनेताओं से प्रेम व भूषण, वस्त्र वाहनादि का सुख मिले।

3. तृतीयस्थ सूर्य की महादशा में गोचर ग्रह की अंतर्दशा आने से सुख जबकि अगोचर ग्रह की अंतर्दशा आने से निकृष्ट फल।

4. चतुर्थस्थ सूर्य की महादशा में पापाग्रह की अंतर्दशा मानसिक अशांति राज, अग्नि, चोर भय व भ्राता की मृत्यु का भय रहें, शुभग्रह की अंतर्दशा में अत्यंत सुख, राज, धन, वस्त्र, सुंगधादि पदार्थ व स्त्री-पुत्रादि का सुख होता है।

5. पंचमस्थ सूर्य की महादशा में जब शनि, मंगल, केतु या राहु की अंतर्दशा चोर, अग्नि व राज पीड़ा दे, संतान को क्लेश रहें, शुभ ग्रह की अंतर्दशा में आनंद, राज्य भूषण व वाहन प्राप्ति व संतान सुख करवायें।

6. षष्ठस्थ सूर्य की महादश में पापग्रह की अंतर्दशा ऋण-ग्रस्त करवाये, शत्रुपक्ष से विशेष भय वहीं शुभ ग्रहान्र्तदशा में सुख व उत्तम फल पर अंत में दुखी होता है।

7. सप्तमस्थ सूर्य की महादशा में शुक्र, बृहस्पति, चन्द्रमा, बुध की जब अंतर्दशा आयें तो मन में उत्साह, भूषण, वस्त्र-वाहन की प्राप्ति स्त्री लाभ जबकि पाप ग्रह की अंतर्दशा ज्वर अतिसार, पित्त प्रकोप, प्रमेह, मूत्रकृच्छ इत्यादि रोग व शत्रु भय कराती है।

8. अष्ठमस्थ सूर्य की महादशा में जब शुभ ग्रह की अंतर्दशा आये तब भूषण-वस्त्रादि की प्राप्ति अधिक शुभ फल हो, पर किंचित दुख भी रहें, पाप ग्रह अंतर्दशा में नाना प्रकार के भय, पराधीनता, व्याधि, दुःख, पीड़ा व मरण भय।

9. नवमस्थ सूर्य की महादशा में शुभ ग्रह की अंतर्दशा दान की प्रवृत्ति, उत्सवादि सुख, यज्ञादि क्रिया की संभावना व उत्तम कार्यों को करने का अवकाश मिलता हैं, पाप ग्रह की अंतर्दशा में दुःख वृद्धि गुरू व पिता की मृत्यु हों।

10. दशमस्थ सूर्य की महादशा में पाप ग्रह की अंतर्दशा हो तो उत्तम कर्म की हानि, कर्म क्षेत्र में व्यवधान, अकारण संकट, चोर-भय वही शुभ ग्रह की महादशा में धन की प्राप्ति, आय के स्रोतों में वृद्धि, कर्म क्षेत्र में विस्तार की संभावना व अस्थायी कीर्ति हों।

11. एकादशस्थ सूर्य की महादशा में पाप ग्रह की अंतर्दशा आरम्भ में दुख अंत में सुख दें, शुभ ग्रह की अंतर्दशा राजकीय अनुग्रह की प्राप्ति, धन की उपलब्धि, स्त्री-पुत्र सुख दे।

12. द्वादशस्थ सूर्य की महादशा में पाप ग्रह की अंतर्दशा डिमोशन, पद-छूटना, प्रवास, राज-कोष से मानहानि करवायें, शुभ ग्रह की अंतर्दशा भूमि, पशु, धन-धान्य प्राप्त करायें।

जन्मराशि से सूर्य का गोचर का भ्रमण फल :

1. गोचर का सूर्य जब जन्म राशि पर से गुजरता है तो अशुभ स्वप्न, सिरदर्द, मस्से की तकलीफ, सम्मान में गिरावट पत्नी से तकरार संभव, रक्त-विकार, नेत्रपीड़ा, रिश्तेदारों व करीबी मित्रों से झगड़ा संभव। कार्यों के छूटने की संभावना रहें।

2. गोचर का सूर्य जन्मराशि से दूसरे स्थान पर से गुजरता है तो अशुभ कर्म में रत, आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से मिलना, कमजोर मन, दुश्मनी बढ़े वेगपीड़ा, कीमती वस्तु की चोरी संभव, बुरे परिणामों की अनुभूति।

3. गोचर का सूर्य जन्म राशि से तीसरे आवे तो धन लाभ, पराक्रम वृद्धि शत्रुओं पर विजय, सामाजिक कार्यों में व्यस्त, रोग कर्ज से मुक्ति दूसरो के हित संघर्ष, विजय, जातक के निर्णय सही होगें, स्थानान्तरण अथवा दूरस्थ यात्रायें संभव।

4. गोचर का सूर्य जन्मराशि से जब चैथे भ्रमण करता है तो घरेलू परेशानी, संतान कष्ट, मानसिक कलह, व्यसनी, निर्णय लेने में असफल, घर की स्त्रियाँ बीमार या दुर्घटनाग्रस्त, कृषि में हानि, अहं को ठेस पहुँचे, मित्र-परिजनों में टकराव सम्भव।

5. गोचर का सूर्य जन्मराशि से पंचम स्थान पर से गुजरे शारीरिक एवं मानसिक बैचेनी, आवक में कमी, संचित धन के खर्च की बढ़ोत्तरी, संतान अवज्ञाकारी-बीमार, सेक्स-प्रेम प्रसंग में असंतुष्टि, पेट की बीमारी, उच्च अधिकारियों या अच्छे सम्बंधों में गलतफहमियाँ।

6. गोचर का सूर्य जन्मराशि से छठे से भ्रमण करें तो रोगों का भय, शत्रुओं पर विजय, हाथ में लिये कार्यों में सफलता, उच्च अधिकारी प्रबल रहे, प्रतियोगिता में सभी प्रकार की सफलता, पंचम भावस्थ गोचर के अशुभ फलों का नाश हो शुभ फल मिलें।

7. गोचर का सूर्य जन्मराशि से सप्तम आये तो रोगों का प्रकोप, पेट व गुदामार्ग में रोगों का होना संभव, पत्नी-बच्चे बीमार, वैवाहिक जीवन में कटुता, यात्रायें नुकसानदायक, सम्मान हानि, नौकरी में अवनति, भागीदारी में तकरार संभव।

8. गोचर का सूर्य जन्मराशि से अष्टम आयें तो शत्रुओं से विवाद, बुरे परिणाम, राज भय संभव, पति पत्नी में तनाव, सरकार से आर्थिक दंड, धन हानि, आवक में रूकावट, स्वभाव में अस्थिरता।

9. गोचर का सूर्य जन्मराशि से नवें आये तो अशुभ, पिता से बिछोह, धन-सम्मान हानि, मिथ्या दोषारोपण, जातक अंहकार व पूर्वाग्रह से ग्रसित रहें, मन में निराशा संभव, पापनाश हेतु तीर्थयात्रा संभव।

10. गोचर का सूर्य जन्मराशि से दशम आये तो अभीष्ट कार्य हो, स्वास्थ्य लाभ, उच्च अधिकारियों का सहयोग मिले, पदोन्नति, भाग्योदय में सहायक।

11. गोचर का सूर्य जन्मराशि से एकादश आये तो अचानक उत्तम फल, आवक के जरियो में वृद्धि, धंधे-व्यापार में लाभ, चिंतायें समाप्त रोग नाश, मित्र-रिश्तेदार मदद करें, उत्तम वाहन, उत्तम भोजन मिलें।

12. गोचर का सूर्य जन्मराशि से द्वादश आये तो अशुभ समाचारों की प्राप्ति, धारा प्रवाह खर्च, बीमारी, मित्रों से कलह, नेत्र विकार पेट की समस्या, अदालती केस चलता हो तो उसमें हार, आराम का नाश।

अशुभ सूर्य के उपाय :-
1. प्रतिदिन उदित होते सूर्य को ताम्र पात्र में जल भरकर उसमें थोड़ा-सा कुकुम डालकर, लाल पुष्प सहित सूर्याध्य दें।

2. नेत्रों की व्याधियों में सूर्योपासना सहित नेत्रोपनिषद का नित्य पाठ करें।

3. रविवार को नमक रहित भोजन करें।

4. तांम्र पात्र, गेहूँ, गुड़, दक्षिणा सहित किसी ब्राह्मण को दान करें।

5. सूर्य कृत साधारण अरिष्टों में नवग्रह कवच सहित सूर्य कवच एवं शतनाम का पाठ भी पर्याप्त शुभफलप्रद रहे।

इस प्रकार सूर्य अपनी भिन्न-भिन्न स्थितियों से भिन्न-भिन्न फलों को देते हुये अपना प्रभाव देते हैं, यदि कोई विष्टि समस्या हो तो सविधिपूर्वक सूर्य योग अथवा वेदोक्त मंत्रों का अनुष्ठान रूप जप करवाना सवोत्तम रहता है।

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सिंह राशि और प्रेम सम्बन्ध

सिंह राशि वालों का प्रेम सम्बंध व वैवाहिक जीवन कैसा होता है, इस लेख के माध्यम से बताया गया है :-

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सिंह राशि भचक्र में 120 अंश से 150 अंश तक होती है। यह अग्नि तत्व की स्थिर राशि है। सिंह राशि का प्रतीकात्मक चिन्ह भी सिंह (शेर) है। इस राशि का स्वामी ग्रह सूर्य होता है। सिंह राशि के पुरूषों की बात की जाय तो ये अपनी प्रेमिका को यह बात मनवाने में कामयाब होते हैं कि वे उसके लिये सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है। ये बनावटी प्रेम को पसंद नहीं करते बल्कि ये प्रेम में स्वाभाविक आनंद और खुशी तलाशते हैं। वैवाहिक और पारिवारिक जीवन में इनकी यही विशेषता इनको सबसे अलग व्यक्तित्व वाला सिद्ध करवाती है। ये अपने बच्चों और पत्नी के लिये सभी सुख सुविधाओं का प्रबंध करते हैं। ये भी परिवार के द्वारा मिलने वाले सुखों को ही अपने जीवन का आधार मानते हैं।

यदि कभी ऐसा हो कि इन्हें परिवार या प्रेमिका का प्रेम न मिले तो ये बड़े उदास हो जाते हैं। ये स्वाभाविक और उन्मुक्त प्रेम कि इच्छा रखते हैं। अतः एक पत्नी के रूप में इनका साथ निभाना आसान काम नहीं है। ऐसे में यदि इनकी पत्नी एक बार इनके गुणों और स्वभाव को अपने भीतर आत्मसात कर ले तो फिर जीवन भर वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है। यदि ये प्रेम में एक बार धोखा खा गये या असफल हो गये तो दोबारा प्रेम प्रसंगों में पड़ने से ये हिचकिचाते हैं, और कुछ हद तक प्रेम प्रसंगों के प्रति घृणा के भाव रखने लगते हैं।

सिंह राशि वाली स्त्रियाँ :- अपने प्रेमी के प्रति बड़ी उदारता का भाव रखती हैं। सिंह राशि वाली स्त्रियाँ बड़े सुलझे हुये विचारों वाली होती हैं, परन्तु प्रेम के मामलों में ये आसानी से फंस जाती हैं। अतः कुछ मामलों में इन्हें मायूसी भी हाथ लगती है। ये स्वच्छ हृदय, सरल और उदार स्वभाव, भावुक और उन्मुक्त स्वभाव वाली होती हैं। ये अपने प्रेमी के प्रति सदैव वफादार रहती हैं। अतः ये एक आदर्श प्रेमिका साबित होती हैं। ये एक उत्तम पत्नी भी होती हैं ये अपने चाहने वाले को उसकी चाहत से बढ़कर प्यार करने वाली होती हैं। इनके प्रेम में गहराई और विश्वसनीयता होती है। ये पूर्ण उत्साह के साथ सदैव सहयोग के लिये तत्पर रहती है। अपने पति के व्यापार व्यवसाय में ये सदैव सहयोग देने के लिये तैयार रहती हैं। ये अपने पति और परिवार दोनों से बहुत प्यार करती हैं। ये इनकी परेशानियों को भी अपने ऊपर लेने को तैयार रहती हैं। परन्तु फिर भी इन्हें कभी-कभी ऐसा लगता है कि इनके प्यार के बदले जो प्यार घर परिवार से इन्हें मिल रहा है वो कुछ कम है।

सिंह और मेष राशि प्रेम:- मेष राशि वाले आपके लिये एक अच्छे जीवन साथी सिद्ध हो सकते हैं। इनके साथ होने से आप स्वयं को गौरवान्ति अनुभव करेंगे। इनसे आपको सुख और उत्साह मिलेगा। विवाह के बाद ये आपके प्रतिपूर्ण जिम्मेदार रहेंगे। अतः ये आपके लिये अच्छे जीवन साथी हो सकते हैं।

सिंह और वृष राशि प्रेम:- वृष राशि वालोें के साथ आप स्वयं को अधिक सुखी अनुभव नहीं करेंगे। इनके साथ का वैवाहिक जीवन आपको संघर्ष पूर्ण लगेगा। इनके साथ रहते हुये आप अपने आपको पुराने और रूढ़िवादी विचारों से घिरा हुआ महसूस करेंगे। दोनों की पसंद न पसंद भी अलग हो सकती है अतः वैवाहिक जीवन को व्यवस्थित करने में आपको कठिनाई होगी।

सिंह और मिथुन राशि प्रेम:- मिथुन राशि वाले आपके लिये एक अच्छे जीवन साथ सिद्ध हो सकते हैं। इनकी आदत सदैव प्रसन्न रहने और हंसने खिलखिलाने की होती है, जो आपकी भी पसंद आयेगी। ये आपके आस-पास कुछ ऐसा माहौल निर्मित करेंगे जिससे आपको लगेगा कि ये आपसे बहुत प्यार करते हैं। इनका स्वभाव उतावला और शीघ्र निर्णय लेने वाला होता है। कभी-कभी आपको ऐसा भी लग सकता है कि इनका सम्बंध आपके अलावा भी कहीं है कि इनका सम्बंध आपके अलावा भी कहीं है परन्तु इसकी सत्यत, कुण्डली के अन्य योगों पर निर्भर करती है, फिर भी इनके साथ आपका वैवाहिक जीवन सफल रहेगा।

सिंह और कर्क राशि प्रेम:- इनके साथ आपका वैवाहिक जीवन सफल रहेगा इसमें संदेह है। इनके प्रति आपका आकर्षण जीवन साथी के रूप में न रहकर मित्रवत् रह सकता है। जब आप घर के अलावा अन्य बातों में रूचि लेंगे उस समय इनको आपत्ति रह सकती है। इन सब कारणों से बड़ी कठिनाई के बाद ही इनके साथ आपका वैवाहिक जीवन सफल हो पायेगा।

सिंह और सिंह राशि प्रेम:- एक-दूसरे की तकरीबन सभी आदतें समान होना ही अनेक कठिनाइयों का उद्गम स्रोत है। आप लोग एक-दूसरे से जल्दी ही ऊबने लगेंगे। दोनों में ही अभिमान और स्वतंत्र रहने की आदत पाई जायेगी अतः एक-दूसरे की बात आप लोग मानेंगे, इसमें संदेह है। दोनों ही मेहनत वाले कामों से बचना चाहेंगे। दोनों ही एक दूसरे पर हावी होना चाहेंगे अतः इन कारणों से आपके बीच एक वैचारिक खाई तैयार हो जायेगी। विवाह के बाद दोनों ही यदि संयमी और सहनशील हो जाते हैं तभी वैवाहिक जीवन सफल हो सकता है।

सिंह और कन्या राशि प्रेम:- कन्या राशि वालों के साथ आपके वैवाहिक जीवन को अधिक सुखी वही कहा जायेगा। आप उनके प्रति जितना आकर्षित रहेंगे वे आपके प्रति उससे बहुत कम आकर्षण रखेंगे। आपके अधिक प्यार के बदले आपको बहुत कम प्यार मिलेगा। इन सब कारणों से आपको आत्मिक कष्ट होगा। इतने पर भी आप उनकी आलोचना नहीं करेंगे जबकि वो आपको नसीहत देते रहेंगे। ये सब होने पर आप मायूस होकर गलत दिशा में भी सोच सकते हैं। इन सब कारणों से इनके साथ आपके वैवाहिक जीवन को सफल नहीं कहा जायेगा।

सिंह और तुला राशि प्रेम:- तुला राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा। ये आपके प्रति बहुत आकर्षण का भाव रखते हैं। इनके अंदर कई ऐसे गुण मौजूद होते हैं जिन्हें आप बहुत पसंद करते हैं। ये मृदुभाषी, स्नेही, सजग और सदैव प्रसन्न रहने वाले होते हैं। ये जीवन के प्रत्येक पहलू को ध्यान में रखकर काम करते हैं। जिसके कारण जीवन में आनन्द बना रहता है। प्रेम और अंतरंग सम्बंधों को ये जीवन का महत्वपूर्ण पहलू समझते हैं इन सब कारणों से आपका जीवन सुखी रहेगा।

सिंह और वृश्चिक राशि प्रेम:- वृश्चिक राशि वालों के साथ आपके वैवाहिक जीवन को अधिक सुखी नहीं कहा जायेगा। यद्यपि ये आपके प्रति अधिक आकर्षित रहते हैं परन्तु फिर भी आप में अभिमान या स्वाभिमान सम्बंधी पेरशानियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। जीवन की गाड़ी सहजता से चलेगी इसमें संदेह होता है। अतः आपका वैवाहिक जीवन उसी स्थिति में सुखी रह सकता है जब आप लोग अभिमान का त्याग कर एक दूसरे के आगे झुकना चाहेंगे।

सिंह और धनु राशि प्रेम:- धनु राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा। ये आपके प्रति सहजता से आकर्षित होते हैं। धनु राशि वाले बड़े संवेदनशील और उदार मन के होते हैं। इनकी आदत किसी पर धौंस जमाना या नुकसान पहुँचाना नहीं होती। इनकी आदतें आपको बहुत पसंद आयेगी। ये आप पर पूर्ण विश्वास करते हैं तथा ये यही चाहते हैं कि आप भी इन पर पूर्ण विश्वास करें। इस प्रकार आप इनके साथ सुखी और अनन्दमयी वैवाहिक जीवन प्राप्त कर सकेंगे।

सिंह और मकर राशि प्रेम:- मकर राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक जीवन तभी सफल होगा जब आप भी इसके लिये पूर्ण प्रयास करें। ये आपके प्रति बहुत कम आकर्षण रखते हैं, हाँ आपके अंदर वह योग्यता जरूर है जिसके कारण आप इन्हें अपने आकर्षण में बाँध सकते हैं। इनकी कुछ ऐसी पसंद या नापसंद भी हो सकती हैं जो आपके विपरीत होती है लेकिन ये उनको भी आपसे मनवाना चाहेंगे। ये सामाजिक कार्यों में भी रूचि नहीं लेते। इन सबको कारणों पर नियंत्रण पाकर ही आप इनके साथ सुखी रह सकते हैं।

सिंह और कुंभ राशि प्रेम:- कुंभ राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक जीवन पूर्णरूपेण सफल हो, इसमें संदेह होता है। विवाह के पहले तक ये आपके प्रति बड़ा अगाध प्रेम रखते हैं परन्तु विवाह के पश्चात ये प्रेम कम और अधिकार ज्यादा जताते हैं। ये आपके स्वतंत्र प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगाना चाहते हैं। इनका चरित्र और व्यवहार पूर्णरूपेण आपके विपरीत होता है। इन सब सफल नहीं कहा जायेगा।

सिंह और मीन राशि प्रेम:- मीन राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक सम्बंध सामान्य कहा जायेगा। यद्यपि ये आपके प्रति अधिक आकर्षण नहीं रखते फिर भी ये आपको भरपूर प्रेम देने का प्रयास करेंगे लेकिन इनके प्रेम में आपको गंभीरता या सापेक्षता का अभाव लगेगा। यदि आप इन्हें अपने प्रभाव में रखकर प्यार से दिशा निर्देश करते हैं तो ऐसी स्थित में आपके वैवाहिक जीवन के सफल होने की सम्भावनायें बढ़ जायेगी।

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साढ़ेसाती,Sadesati

शनि की साढ़ेसाती और साढ़ेसाती का प्रभाव :-

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant), top best astrologer in delhi

नीलाम्बरः शूलाधरः किरीटी गघ्रस्थित स्त्रासकरो धनुष्ठाम्।
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रशान्तः सदाऽतु महां वरदोऽल्पगामी।।

शरीर पर नीले वस्त्राभूषण धारण करने वाले, सिर पर मुकुट को, हाथों में धनुष और शूल को धारण करने वाले, गीध पर विराजमान, प्राणियों को भय देने वाले, मंदगति से चलने वाले और चार भुजाओं से युक्त सूर्य के पुत्र शनिदेव हमारे प्रति शांत और शुभ वर देने वाले हों।

शनि ग्रह का परिचय-
भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया ने शनिदेव को जन्म दिया। शनिदेव का स्तवन काश्यपेयं महद्रद्युतिम कहकर किया जाता है। क्योंकि शनि को महर्षि कश्यप की वंश परम्पराओं में माना गया है। एक मत के अनुसार महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में संपन्न काश्यपेय यज्ञ का संबंध शनि की उत्पत्ति से है। भारतीय ज्योतिष के सात ग्रहों में शनिग्रह सबसे दूरस्थ है। यह सूर्य की एक परिक्रमा 29.5 वर्षों में पूरी करता है, तथा एक राशि में लगभग 2.5 वर्ष तक रहता है। शनि के दस चन्द्रमा हैं। शनि अस्त होने के 38 दिन बाद उदय होता है। तत्पश्चात 135 दिनों तक सामान्य गति से उसके बाद 105 दिनों तक वक्री गति से संचरणशील रहता है। वक्र गति से परिक्रमा करते हुए पश्चिम से अस्त होता है।

ज्योतिर्विदों एवं खगोलविदों ने शनि ग्रह को नीलनिलय का सुन्दरतम ग्रह स्वीकार किया है। विषय यहां साढ़ेसाती से सम्बध है, अतः शनि की साढ़ेसाती sadesati का मुख्यतः कारण उसके वलय हैं। शनिग्रह एक नीली गेंद की भांति प्रतीत होते हैं, ये तीन पीले वलयों के बीच स्थित हैं। यही वलय साढ़ेसाती का कारण है। क्योंकि शनिदेव जिस राशि पर भ्रमण करते हैं एक वलय उस राशि से आगे वाली राशि पर प्रभाव डालता है, तथा पीछे वाला वलय पीछे वाली राशि पर प्रभाव डालता है। मध्य राशि में शनिदेव स्वयं स्थित होते हैं। अतः गोचर में शनिदेव जिस राशि पर भ्रमण करते हैं, उसके आगे-पीछे की राशियों को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए वर्तमान में शनि धनु राशि में स्थित हैं, अतः धनु राशि वाले जातकों के लिए तो शनि की साढ़ेसाती चल ही रही है। वृश्चिक राशि वालों के लिए उतरती साढ़ेसाती तथा मकर राशि वालों के लिए चढ़ती हुई साढ़ेसाती लगी हुई है। चूंकि शनि ग्रह एक राशि में 2.5 वर्ष रहते हैं, तथा उसके वलय आगे पीछे रहते हैं अतः गोचर कालीन शनि से एक राशि 2.5×3=7.5 वर्ष तक प्रभावित होती है, इसे ही शनि की साढ़ेसाती कहते हैं।

जब एक जातक के जन्मकालीन चन्द्रमा से शनि 12वें हो तब साढ़ेसाती का प्रारंभ होता है। जन्मकालीन चन्द्रमा पर शनि का गोचर योग कहलाता है, तथा अन्यकालीन चन्द्रमा से द्वितीयस्थ शनि पाद कहलाता है। जिन जातकों की जन्मपत्रिका नहीं है। उनको साढ़ेसाती के प्रभाव उनकी मानसिक स्थिति से अनुमान द्वारा जाना जा जाता है।

ज्योतिष तत्व प्रकाश के अनुसार-
द्वादशे जन्मगे राशौ द्वितीये च शनैश्चरः।
सार्धानि सप्तवर्षाणि तदा दुःखेर्युतो भवेत्।। रिष्फ रूप धनमेषु भास्करिः संस्थितो भवति यस्य जन्मजात्।
लोचनोदरपदेषु संस्थितिः कथ्यते रविजलोकजैर्जनं।। (ज्योतिष तत्व प्रकाश)

शनि जन्म राशि से द्वादश भाव (12), जन्म राशि (1), एवं जन्मराशि से द्वितीयस्थ (2) हो तो, शनि की साढ़ेसाती आरोपित होती है। शनि के आगे वाले वलय को नेत्रों की संज्ञा दी गई है, स्वयं शनि देव जिस राशि में रहते हैं, उसे उदर की संज्ञा दी गई है, तथा शनिदेव के पीछे वाले वलय को पाद (पावो) की संज्ञा दी गई है। अर्थात लगती हुई साढ़ेसाती sadesati को नेत्रों पर, बीच वाली (मध्य) साढ़ेसाती को भोग तथा उतरती हुई साढ़ेसाती को पाद काल कहा जाता है। शनि की साढ़ेसाती स्वयं में भीषण भय तथा सघन संत्रास उत्पन्न करने वाले शब्द हैं। साढ़ेसाती के विषय में अनेकानेक भ्रांतियाँ भी प्रचलित हैं। लौकिक कथाओं में साढ़ेसाती विनाशक काल प्रहार के रूप में प्रस्तुत होती है। शनि की विकरालता में साढ़ेसाती की क्रूरता संयुक्त होकर प्रकम्पन उत्पन्न कर देती है। परंतु प्रत्येक जातक के लिए शनि की साढ़ेसाती विकरालता या क्रूरता लिये नहीं आती, अतः शनि की साढ़ेसाती के प्रभावों को समझने के लिए शनिदेव की प्रकृति को समझना आवश्यक है।

शनि देव की प्रकृतिः-
शनि के पर्याय नाम- शनि, मन्द, छायायुक्त-पंगु, पंगुकाय, कोण, तरणि, तनय, घुमणिसुत, पातंगी, मृदु, नील, कपिलाक्ष, कृशांग, दीर्घ, छायातज, यम, अर्कपुत्र, सौरि, क्रोड, क्रूरलोचन, दुःख।

शनि का सामान्य/विशेष स्वरूपः-
मन्दोऽलसः कपलिदृक कृश दीर्घगात्रः।
स्थूलद्विजः परुष रोम कचोऽनिलात्मा।।

शनि प्रधान पुरुष आलसी, पिंगलवर्ण, दृष्टियुक्त, दुबला तथा लम्बी देहवाला, मोटे दांतों वाला होता है। इसके रोम और केश रूखे होते हैं। यह वात प्रकृति प्रधान होता है। सूर्यपुत्र शनि दुःखदायक काले वर्ण का होता है। स्नायुतंत्र, कूड़ा करकट फेंकने की जगह, फटे पुराने कपड़े, लोहा, कबाड़, शिशिर तथा नमकीन रूचि पर शनि का अधिकार है।

कान्नियरोमावयवः कृशात्मा दुर्वासिताङ्ग कफ मारू मात्मा।
पीनद्विजश्चारूपिशङ्ग दृष्टिः सौरिस्तमो बुद्धि रतोऽलसः स्यात।। (वेधनाथ)

शनि प्रधान व्यक्ति के केश और अव्यव कठिन (मोटे) होते हैं। इसका शरीर दुर्बल होता है। शरीर का रंग दूर्वा जैसा (श्याम) होता है। इसकी प्रकृति कफ-वात होती है। इसके मोटे दांत होते है। दृष्टि पिंगलवर्ण की, यह तामसी बुद्धि वाला तथा आलसी होता है। शनि का उदय पृष्ठ भाग से होता है। यह चैपाया है पर्वत वनों में घूमने वाला, सौ वर्ष की आयु का मूल प्रधान होता है। इसके देवता ब्रह्मा है, इसका रत्न नीलम है। इसका प्रदेश गंगा से हिमालय तक है। यह वायु तत्व प्रधान कसैली रूचिवाला, निम्न दृष्टि वाला और तीक्ष्ण स्वभाव वाला होता है, तुला, मकर, कुम्भ राशि में, जाया स्थान (स्त्री स्थान) में, विषुव के दक्षिणायान में स्वग्रह (मकर कुम्भ) में, शनिवार में, अपनी दशा में, राशि के अन्त भाग में, युद्ध के समय में, कृष्ण पक्ष, वक्री होने पर किसी भी स्थान में शनि बलवान होता है।

श्यामलोऽति मालिनश्च शिरालः सालसश्च जटिलः कृश दीर्घ।
स्थूल नख पिगंल नेत्रोयुक् शनिश्च खलता निलकोपः। (टुण्डीराज)

शनि श्याम वर्ण, हृदय से अर्थात् अन्तरात्मा से मलिन, नसों से व्याप्त देह वाला, स्वभाव से आलसी, जटायुक्त, दुर्बल तथा लम्बा शरीर दांत और नाखून मोटे, पीतवर्ण की आंखों वाला, दुष्ट स्वभाव, क्रोधी तथा वायु प्रधान प्रकृति का होता है।
विद्वानों का मत है कि दशम तथा एकादश राशियों पर शनि का अधिकार है, अर्थात् मकर और कुम्भ राशियों का स्वामी शनि है। इसका उच्च स्थान सप्तम राशि तुला है। नीच राशि मेष है। यह सीमांतक ग्रह कहलाता है, क्योंकि यहां पर सूर्य का प्रभाव समाप्त हो जाता है, वहां पर शनि के प्रभाव का प्रारंभ होता है। शनि सूर्य से पराजित होता है, और मंगल को परास्त कर देता है। पाश्चात्य ज्योतिर्विद विलियम लिलि के अनुसार, शनि प्रधान व्यक्ति का शरीर साधारणतः शीतल और रूक्ष होता है, मझंला कद, फीका काला रंग, आंखें बारीक और काली, दृष्टि नीचे की ओर, भाल भव्य, केश काले और लहरीले तथा रूक्ष, कान बड़े लटकते जैसे, भौंहे झुकी हुई, होंठ और नाक मोटा, दाढ़ी पतली, इस प्रकार का स्वरूप बतलाया जा सकता है। इसका चेहरा देखने से प्रसन्नता नहीं होती। सिर झुका हुआ और चेहरा अटपटा सा लगता है। कंधे चौड़े, फैले, टेढ़े होते हैं। पेट पतला, जघाएं पतली तथा घुटने और पैर टेढे-मेढ़े होते हैं। चाल शराबी जैसी लड़खड़ाती प्रतीत होती है। घुटने एक-दूसरे से सटे रखकर चलते हैं। शनि पूर्व की ओर हो तो प्रमाण बद्धता और मृदुता कुछ हद तक होती है। कद मोटा होता है। पश्चिम की ओर हो तो कृश और अधिक काले रंग का होता है। शरीर पर केश बहुत कम होते हैं। शनि के शर कम हों तो कृशता ज्यादा होती है। शर अधिक हों तो मांसल शरीर होता है।

शनि का कारकत्वः-
प्रत्येक ग्रह किन-किन का कारक होता है। इसके संबंध में उतर कालामृत ज्योतिष ग्रंथ के रचयिता कालिदास ने सभी प्राचीन ग्रंथों से अधिक ग्रहों के कारकत्व का वर्णन किया है। अतः सर्वप्रथम शनि का कारकत्व उत्तर कालामृत से उद्धृत किया जा रहा है-

शनि से इन विषयों का विचार करना चाहिए-
जड़ता अथवा आलस्य, रूकावट, घोड़ा, हाथी, चमड़ा, आय, बहुत कष्ट, रोग, विरोध, दुःख, मरण, स्त्री से सुख, दासी, गधा अथवा खच्चर, चाण्डाल, विकृत अंगों वाले, वनों में भ्रमण करने वाले डरावनी सूरत, दान, स्वामी, आयु, नपुंसक, अन्त्यज, खग, तीन अग्नियां, दासता का कर्म करने वाले, अधार्मिक कृत्य, पौरुषहीन, मिथ्या भाषण, चिरस्थायी, वायु, वृद्धावस्था, नसें, दिन के अंतिम भाग में बलवान, शिशिर ऋतु, क्रोध, परिश्रम, नीच जन्मा, हरामी, गौलिक, गन्दा कपड़ा, घर, बुरे विचार, दुष्ट से मित्रता, काला, पाप कर्म, क्रूर कर्म, राख, काले धान्य, मणि, लोहा, उदारता, वर्ष, शूद्र, वैश्य, पिता का प्रतिनिधि, दूसरे के कुल की विद्या सीखने वाला, लंगड़ापन, उग्रता, कम्बल, पश्चिमाभिमुख, जिलाने के उपाय, नीचे देखना, कृषि द्वारा जीवन निर्वाह, शस्त्रागार, जाति से बाहर वाले स्थान, ईशान दिशा का प्रिय, नागलोक, पतन, युद्ध, भ्रमण, शल्यविद्या, सीसा धातु, शक्ति का दुरूपयोग, शुष्क, पुराना तेल, लकड़ी, ब्राह्मण, तामस गुण, विष, भूमि पर भ्रमण, कठोरता, इच्छुक, वस्त्रों से सजाना, यमराज का पुजारी, कुत्ता, चित्त, की कठोरता आदि शनि के कारकत्व है।

जैसे सौर मण्डल में शनि का स्थान सबसे अंत में है ऐसे ही गुणों आदि में भी शनि का स्थान अंत में अर्थात घटिया, निकृष्ट अधम है। यही कारण है कि शनि निम्न वर्ग का (मजदूरों का, सफाई कर्मचारियों का ग्रह) माना गया है। वर्णों में इसीलिए शूद्र की पदवी प्राप्त है। घर में नौकर, भ्रत्य की सी निम्न स्थिति है, सूर्य से दूर रहने के कारण इसमें प्रकाश कम है। यही कारण है कि शनि को विद्याहीन, प्रकाशहीन, काला, विद्याहीन माना गया है। प्रकाश की रश्मियों से जो पदार्थ वंचित हैं उनकी पूरी उन्नति नहीं हो पाती। अतः शनि अपूर्णता, हीनता, अभाव आदि का द्योतक है। इसी प्रकाश आदि के अभाव से कई रोगों की उत्पत्ति होती है। इसीलिए शनि को रोग का कारण माना गया है। नवग्रह परिवार में मंद गति से भ्रमण करने (शनैः शनैःश्चर) धीरे-धीरे चलाने वाला शनैश्चर कहा गया है। मन्द गति होने के कारण शनि को लंगड़े की उपाधि भी दी गई है। शनि की कुण्डली में स्थिति मनुष्य की टांगों की स्थिति को बतला देती है। प्रकाशहीन वनस्पति तथा अन्य जीवन, मृत पदार्थों, जैसे चमड़ा और पत्थर इनसे भी शनि का घनिष्ठ संबंध है। मन्दगति होने के कारण कार्यों का विलम्ब से सम्पादन होना स्वाभाविक ही है। अतः विलम्ब से, बहुत काल से, आयु से, दीर्घ रोग से, दीर्घ आकार से शनि का संबंध है और इन वस्तुओं का शनि इसलिए कारक भी है।

साढ़ेसाती sadesati स्वयं में भयप्रद शब्द है किन्तु संपूर्ण साढ़ेसाती काल विध्वंसक या खराब नहीं होता, कारण कि सभी राशियों पर शनि की साढेसाती का प्रभाव समान नहीं होता, क्योंकि साढ़ेसाती का संबंध गोचर से है। अतः गोचर में शनि जन्मांग में अपनी स्थिति प्रत्येक राशि में उसके अधिपति के साथ अपने संबंध के अनुसार ही फल प्रदान करेगा। जैसा कि विदित है, शनि मकर एवं कुम्भ राशि का स्वामी, कुम्भ राशि में मूल त्रिकोण, तुला राशि में उच्च के तथा मेष राशि में नीच के होते हैं। बुध एवं शुक्र, राहु ग्रह मित्र हैं। सूर्य चन्द्र मंगल शत्रु हैं, गुरु केतु सम है। अतः शनि जन्मागीय स्थिति के अनुसार फल प्रदान करता है। कुछ ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शनि जन्म राशि के अनुसार निम्नानुसार फल प्रदान करता हैं :-

1. मेष राशि- मध्य भाग घातक।
2. वृष राशि- प्रारंभ घातक।
3. मिथुन राशि- अंत भाग घातक।
4. कर्क राशि- मध्य व अंत घातक।
5. सिंह राशि- प्रारंभ व मध्य घातक।
6. कन्या राशि- प्रारंभ घातक।
7. तुला राशि- अंत घातक।
8. वृश्चिक राशि- मध्य व अंत घातक।
9. धनु राशि- प्रारंभ व मध्य घातक।
10. मकर राशि- समस्त समय सम।
11. कुम्भ राशि- समस्त समय शुभ।
12. मीन राशि- अंत घातक।

इसके अतिरिक्त तीनों चरणों का समग्र परिणाम निम्नानुसार रहता है, व्यवहार में ऐसा पाया जाता है।

1. प्रथम चरण- जन्म राशि से 12वें भाव में आते ही शनि साढ़ेसाती का प्रथम चरण प्रारंभ हो जाता है। साढ़ेसाती के प्रथम चरण अर्थात् साढ़ेसाती sadesati के प्रथम ढ़ाई वर्ष में व्यक्ति आर्थिक रूप से अत्यंत पीड़ित होता है। आय की अपेक्षा व्यय की अधिकता होने से पूर्व नियोजित योजनाएं विघटित होती हैं। अप्रत्याशित आर्थिक हानि चकित करती है। शैय्या सुख में कमी आती है। जातक का स्वयं स्वास्थ्य बाधित रहता है। फलस्वरूप शारीरिक सुखों में कमी आती है। व्यक्ति निरूद्देश भटकता रहता है। यात्रा का सुफल प्राप्त नहीं होता। नेत्र व्याधि संभव है। चश्में का प्रयोग जातक के लिए अपेक्षित हो सकता है। जातक के पिता की माता अर्थात दादी को मारक कष्ट होता है। व्यक्ति का स्नायुतंत्र व्याधिग्रस्त रहता है। अभिभावक एवं आत्मीय जन कष्ट का अनुभव करते हैं। कुटुम्ब से वियोग या अलगाव (बंटवारा) होता है। पिता को कष्ट होता है। लाभ एवं आय नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।

2. द्वितीय चरण- साढे़साती का द्वितीय चरण तब प्रारंभ होता है जब शनि जन्मकालीन चन्द्रमा पर गोचर करता है। इसे उदर या पेट की या द्वितीय चरण साढे़साती sadesati कहते हैं। द्वितीय चरण का प्रभाव जातक को आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रभावित करता है। आर्थिक चिन्ताएं निरन्तर रहती हैं। शारीरिक सार्मथ्य, प्रभाव व गति आक्रान्त होती है। मानसिक स्तर पर प्रबल उद्वेलन रहता है। व्यर्थ का व्यय व्यथित करता है। कोई कार्य मनोनुकूल नहीं होता। अपूर्ण कार्य दु:खी करते हैं, व्यवधान एवं बाधाएं प्रबल रहती हैं। व्यक्तित्व मन्द होता है। गृहस्थ का पारिवारिक तथा व्यवसायिक जीवन अस्तव्यस्त रहता है। किसी सगे-संबंधी को मारक कष्ट होता है। दीर्घयात्राएं, शरीर से कष्ट, आत्मीयों से पृथक्य द्वारा कष्ट, संपत्ति की हानि, सामाजिक प्रतिष्ठा पर आंच, मित्रों का अभाव एवं कार्य में अवरोध द्वितीय चरण के फल हैं। प्रयास निष्फल होते हैं, अर्थात प्रत्यय फलीभूत नहीं होते।

3. तृतीय चरण- साढ़ेसाती का तृतीय चरण तब प्रारंभ होता है जब शनिदेव जन्मकालीन चन्द्रमा से द्वितीयस्थ होते हैं। यह उतरती साढ़ेसाती या पाद (पावों) पर साढ़ेसाती कही जाती है। इसका फल यह होता है कि आत्मीय जनों से निष्प्रयोजन संघर्ष होता है। इन्हें गंभीर व्याधि अथवा किसी को मारक होता है। व्यक्ति का स्वास्थ्य, सन्तति सुख एवं आयुबल प्रभावित होता है। सुखों का नाश होता है। पदाधिकार विलुप्त होता है, किन्तु धनागम होता रहता है। शारीरिक रूप से जड़ता अथवा निर्बलता का अनुभव होता है। आनन्द बाधित होता है। निम्न व्यक्ति से प्रवचना होती है। धन का व्यय एवं अपव्यय होता है।

साढ़ेसाती की आवृत्तियांः-
सामान्यता एक जातक को अपने जीवन काल में तीन बार शनि की साढ़ेसाती झेलनी होती है। चतुर्थ कोई बिरला जातक ही प्राप्त करता है। क्योंकि शनि एक चक्र लगभग 30 वर्ष में पूरा करता है। 30×3=90 वर्ष की आयु तक तीसरी आवृत्ति संभावित होती है। चतुर्थ आवृति दु:साध्य एवं अपवाद स्वरूप ही प्राप्त होती है। प्रत्येक आवृत्ति में शनि की साढ़ेसाती की सार्मथ्य अलग-अलग होती है। जीवन में साढ़ेसाती की प्रथम आवृत्ति अत्यंत प्रबल होती है। प्रभावित व्यक्ति कष्टों अवरोधों क्षतियों से आक्रांत होता है। जातक के जीवन में प्राप्त द्वितीय साढ़ेसाती का प्रभाव मारक न्यूनतम होता है। व्यक्ति थोडी सुविधा का अनुभव करता है। तृतीय आवृत्ति भीषण परिणामों से परिपूर्ण होती है। व्यक्ति अनेक अनापत्तियों से आक्रांत रहता है। शनि अपने क्रूर प्रभाव से जीवन का सर्वनाश करने पर आमादा होता है। आयुबल निर्बल हो तो जातक को जीवन हानि होती है। इस आक्रमण से कोई सौभाग्यशाली जातक ही अपने को सुरक्षित रख पाते हैं।

शनि की साढेसाती एक विश्लेषणः-
परम्परागत रूप से यह माना जाता है कि जन्मकालीन चन्द्रमा से द्वादश भाव में आते ही (शनि के) साढे़साती प्रारंभ हो जाती है। यह स्थूलरूप से सही हो सकती है किन्तु सूक्ष्म रूप से सही नहीं हो सकती। गोचर का शनि जब जन्मकालीन चन्द्रमा के आस-पास रहता है। तब साढ़ेसाती का प्रभाव जातक को प्रभावित करता है। गणितीय दृष्टि से जन्मकालीन चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला से 45 अंश पहले तथा 45 अंश बाद तक गोचर के शनि का भ्रमण साढ़ेसाती sadesati कहलायेगी। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है।

उदाहरण के लिए किसी जातक का चन्द्र स्पष्ट 4/10/18 है तो इस जातक के साढ़ेसाती कब प्रारंभ होगी।

राशि अंश कला
04 10 18’
01 15 00 (- 45 अंश = 1 राशि 15 अंश)

———————
02 25 18’

अर्थात मिथुन राशि में शनि के 25 अंश 18’ पर आते ही शनि की साढ़ेसाती प्रारंभ होगी। यह शनि की सा़ढ़ेसाती का प्रारंभ होगा। शनि की साढ़ेसाती कब तक रहेगी ? पुनः जन्मकालीन चन्द्रमा में 45 अंश जोड़कर गणना करेंगे :-

राशि अंश कला
04 10 18’
01 15 00 (+ 1 राशि 15 अंश)

————————
05 25 18’

अर्थात शनि जब तक कन्या राशि के 25 अंश 18’ तक गोचर करेंगे, तब तक शनि की साढ़ेसाती रहेगी।

किसी भी कुंडली के लिये शनि की साढे़साती sadesati का फलादेश बहुत कुछ जातक की कुंडली में शनि की स्थिति पर निर्भर करता है। कुंडली में शनि की स्थिति कैसी है, शनि उच्च है, नीच राशि में है, या मित्र, शत्रु, सम स्थिति का प्रभाव गोचर नियमों को प्रभावित करता है, अतः साढ़ेसाती फल कथन के समय अग्रलिखित नियमों को ध्यान में रखते हुए भविष्यवाणी की जाये तो फल कथन में उत्कृष्टता रहती है :-

✓ शनि जन्मांग में उच्चस्थ हो, स्वराशिस्थ हो, मित्र राशिस्थ हो या मूल त्रिकोणस्थ हो तो परिणामों में अपेक्षतया शुभता अधिक रहती है।

✓ जन्मांगीय शनि सबल और गोचरीय शनि दुर्बल हो तो परिणाम मध्यम रहता है।

✓ जन्मांगीय शनि निर्बल (नीचस्थ, शत्रुग्रही) हो और गोचरीय शनि भी दुर्बल हो तो अत्यधिक अप्रिय फल प्राप्त होते हैं।

✓ यदि गोचरीय शनि अवांछित अमंगल परिणाम प्रदान कर रहा हो तो अन्य ग्रहों से प्राप्त होने वाले शुभ फलों में भी न्यूनता होती है।

✓ यदि गोचरीय शनि अप्रिय फलदाता हो, और बृहस्पति सर्वदा शुभ फल प्रदाता हो तो अप्रिय फलों में कमी होती है।

✓ जिस समय गोचरीय शनि शुभ फल प्रदाता हो, और बृहस्पति अप्रिय फल प्रदाता हो तो-उसमें प्रायः अनुकूल परिणाम ही प्राप्त होते हैं।

✓ बृहस्पति एवं राहु के अप्रिय फल सूचित हों, और शनि अनुकूल परिणाम प्रदाता हो तो प्रिय फलों की मात्रा अधिक रहती है।

✓शनि की भीषणता जातकों को स्मरण मात्र से प्रकम्पित कर देती है। महाराजा दशरथ ने शनि की संहारक क्षमता का वर्णन इन शब्दों में किया है-

ब्रह्मा शक्रा हरिश्चैव ऋषयः सप्ततारकाः।
राज्यभ्रष्ट्राः पतन्त्येतो त्वया दृष्टयाऽवलोकिताः।।
देशाश्च नगर ग्राम द्वीपाश्चैव तथा दु्रमाः।
तव्या विलोकिताः सर्वे विनश्यन्ति समूलतः।।
प्रसादं कुरू हे सौरे! वरदो भव भास्करे।।

अर्थात :- ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु और सप्त ऋषि भी तुम्हारे दृष्टि निक्षेप से पदच्यूत हो जाते हैं। देश, नगर, गांव, द्वीप वृक्ष तुम्हारी दृष्टि से समूल विनष्ट हो जाते हैं। अतः हे सूर्यदेव के पुत्र शनिदेव! प्रसन्न होकर हमें मंगलमय वर प्रदान करो।

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नारायण नागबली

नारायण नागबली (संतान बाधा निवारण हेतु पितृ दोष का प्रभावशाली उपाय):-

Dr.R.B.Dhawan astrological consultant, top Best Astrologer in Delhi,

नारायण नागबली छविनारायण नागबलि ये दोनो अनुष्ठान पद्धतियां संतान सुख की अपूर्ण इच्छा, कामना पूर्ति के उद्देश से किय जाते हैं, इसीलिए ये दोनो अनुष्ठान काम्य प्रयोग कहलाते हैं। वस्तुत: नारायणबलि और नागबलि ये अलग-अलग पूजा अनुष्ठान हैं। नारायण बलि का उद्देश मुखत: पितृदोष निवारण करना है। और नागबलि का उद्देश सर्प शाप, नाग हत्या का दोष निवारण करना है। इन में से केवल एक नारायण बलि या नागबलि अकेले नहीं कर सकते, इस लिए ये दोनो अनुष्ठान एक साथ ही करने पड़ते हैं।

पितृदोष निवारण के लिए ही नारायण नागबलि अनुष्ठान करने के लिये शास्त्रों मे निर्देशित किया गया है । प्राय: यह अनुष्ठान जातक के पूर्वजन्म के दुर्भाग्य संबधी दोषों से मुक्ति दिलाने के लिए किये जाते हैं। ये अनुष्ठान किस प्रकार व कौन इन्हें कर सकता है? इसकी पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है। ये अनुष्ठान जिन जातकों के माता पिता जिवित हैं, वे भी विधिवत सम्पन्न कर सकते हैं, यज्ञोपवीत धारण करने के बाद कुंवारा ब्राह्मण यह अनुष्ठान सम्पन्न करा सकता है। संतान प्राप्ति एवं वंशवृद्धि के लिए ये अनुष्ठान सपत्नीक करने चाहीयें। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी ये कर्म किये जा सकते हैं। यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पाचवें महीने तक यह अनुष्ठान किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये अनुष्ठान एक साल तक नही किये जाते हैं। माता या पिता की मृत्यु् होने पर भी एक साल तक ये अनुष्ठान करने निषिद्ध माने गये हैं।

दोनों प्रकार यह अनुष्ठान एक साथ और निम्नलिखित इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए किये जाते हैं :-

1. काला जादू के प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए।
2. संतान प्राप्ति के लिए।
3. भूत प्रेत से छुटकारा पाने के लिए।
4. घर के किसी व्यक्ति की दुर्घटना के कारण मृत्यु होती है (अपघात, आत्महत्या, पानी में डूबना) इस की वजह से अगर घर में कोई समस्याए आती है तो, उन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है।

संतान प्राप्ति के लिए :-
सनातन मान्यता के अनुसार प्रत्येक दम्पत्ती की कम से कम एक पुत्र संतान प्राप्ति की प्रबल इच्छा होती है, और इस इच्छा की पूर्ति न होना दम्पत्ती के लिए बहुत दुःखदाई होता है, हालांकि इस आधुनिक युग में टेस्ट ट्यूब बेबी जैसी उपचार पद्धतियां उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ जोड़ों की कमाई के हिसाब से यह बहुत खर्चीली होती हैं। इस लिये बहुत से लोग इन महेंगे उपचारों के कारण खर्च करने में समर्थ नहीं होते, और कुछ इस के लिए कर्जा लेते हैं, लेकिन जब कभी इस महेंगे उपचारों का भी कोई लाभ नहीं होता, तब यह जोड़े ज्योतिषीयों के पास जाते हैं, और एक अच्छा अनुभवी ज्योतिषी ही इस समस्या का समाधान और उपचारों की विफलता का कारण बता सकता है।

शास्त्र कहते हैं :- जहां रोग है, वहां उपचार भी है। इसी नियम को ध्यान में रखते हुऐ हमारे पूर्वज ऋषियों ने इन समस्याओं के समाधान हेतु ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशेष उपाय सुझाए हुए है, सब से पहेले ज्योतिषी यह देखते हैं की इस की पीड़ित दंपति की जन्म कुंडली में संतान प्राप्ति का योग है या नहीं? अगर है, तो गर्भधारण करने में समस्या का कारण क्या है? जैसे की पूर्व जन्म के पाप, पितरों का श्राप, कुलविनाश का योग, इनमें से कोई विशेष कारण पता चलने के बाद वह उस समस्या का निराकरण सुझाते खोजते हैं। इन उपायों में से नारायण नागबली सर्वश्रेष्ठ उपाय माना जाता है। यदि यह अनुष्ठान उचित प्रकार से और मनोभाव से किया जाए, तो संतानोत्पत्ति की काफी संभावनाए हो जाती हैं।

भूत-प्रेत बाधा के कारण संतानोत्पत्ति में रूकावटें :-
कोई स्थाई अस्थाई संपत्ति जैसे के, घर जमीन या पैसा किसी से जबरन या ठग कर हासिल की जाती है तो, मृत्यु पश्चात् उस व्यक्ति की आत्मा उसी संपत्ति के मोह रहती है, उस व्यक्ति को मृत्यु पश्चात् जलाया या दफनाया भी जाए तो भी उस की इच्छाओं की आपूर्ति न होने के कारण उस की आत्मा को माया से मुक्ति नहीं मिल पाती, और वह आत्मा प्रेत योनी में भटकती है, और उस के पतन के कारण व्यक्ति को वह पीड़ा देने लगती है, यदि किसी शापित व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उसकी अंतेष्ठि विधि शास्त्रों अनुसार संपन्न न हो, या श्राद्ध न किया गया हो, तब उस वजह से उस से सम्बंधित व्यक्तिओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि– संतति का आभाव, यदि संतान होती भी है, तो उस का अल्प जीवी होना
संतति का ना होना ही है।

1. काफी कष्टों के बावजूद आर्थिक अड़चनों का सामना करना
खेती में नुकसान।
2. व्यवसाय में हानि, नौकरी छूट जाना, कर्जे में डूब जाना,
परिवार में बिमारीयाँ।
3. मानसिक या शारीरिक परेशानी, विकलांग संतति का जन्म होना, या अज्ञात कारणों से पशुधन का विनाश।
4. परिवार के किसी सदस्यों को भूत बाधा होना।
5. परिवार के सदस्यों में झगड़े या तनाव होना।
6. महिलाओं में मासिक धर्म का अनियमित होना, या गर्भपात होना।
ऊपर लिखे हुये सभी या किसी भी परेशानी से व्यक्ति झूंज रहा हो तोतो, उसे नारायण-नागबली करने की सलाह दी जाती है।

श्राप सूचक स्वप्न :-
कोई व्यक्ति यदि निम्नलिखित स्वप्न देखता है, तो वह पिछले या इसी जन्म में श्रापित होता है :-
1. स्वप्न में नाग दिखना, या नाग को मारते हुवे दिखना, या टुकड़ो में कटा हुवा नाग दिखना।
2. किसी ऐसी स्त्री को देखना, जिसके बच्चे की मृत्यु हो गई है, वह उस बच्चे के प्रेत के पास बैठ कर अपने बच्चे को उठने को कह रही है, और लोग उसे उस प्रेत से दूर कर रहे है।
3. विधवा या किसी रोगी सम्बन्धी को देखना।
4. किसी ईमारत को गिरते हुए देखना।
5. स्वप्न में झगड़े देखना।
6. खुद को पानी में डूबते हुये देखना।
इस प्रकार के स्वप्नों से मुक्ति पाने के लिए नारायण-नागबली अनुष्ठान किया जाता है। धर्मसिंधु और धर्मनिर्णय इन प्राचीन ग्रंथो में इस अनुष्ठान के विषय में लिखा हुआ है।

दुर्मरण :-
किसी भी प्रकार से दुर्घटना यदि मृत्यु का कारण हो, और अल्पायु में मृत्यु होना दुर्मरण कहा जाता है। किसी मनुष्य की इस प्रकार से मृत्यु उस मनुष्य के परिवार के लिए अनेक परेशानियों का कारण बनती है। निम्नलिखित कारण से आने वाली मृत्यु दुर्मरण कहलाती है :-

1. विवाह से पहले मृत्यु होना।
2. परदेस में मृत्यु होना।
3. गले में अन्न अटक कर श्वास रुकने से मृत्यु होना।
4. पंचक, त्रिपाद या दक्षिणायन काल में मृत्यु होना।
5. आग में जल कर मृत्यु होना।
6. किसी खतरनाक जानवर के हमले से मृत्यु होना।
7. छोटे बच्चे का किसी के हाथों मारा जाना।
8. पानी में डूब जाने से मृत्यु होना।
9. आत्महत्या करना।
10. आकाशीय बिजली गिरने या बिजली के झटके से मृत्यु।
यह सब कारण हैं, जिसके कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो, परिवार में आर्थिक, मानसिक वा शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं, इं परेशानियों को दूर करने के लिए परिजनों को नारायण-नागबली करवाने की सलाह दी जाती ।

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धूम उपग्रह

वृहत्पराशर होरा शास्त्र, आलेख- 1

धूम उपग्रह (भावस्थिति अनुसार फलादेश)

1. कुंडली में धूम यदि – प्रथम स्थान में हो तो, वह जातक निर्मल (सुंदर) नेत्र वाला, शूरवीर, हठी परंतु घृणा रहित, दुष्ट बुद्धि वाला और महाक्रोधी होता है।

2. कुंडली में धूम यदि – द्वितीय स्थान में हो तो, वह जातक धनवान परंतु रोगी, किसी अंग से हीन, राजपक्ष से चिंतित, मूर्खतापूर्ण व्यवहार वाला और कुछ मात्रा में नपुंसक होता है।

3. कुंडली में धूम यदि – तृतीय स्थान में हो तो, वह जातक बुद्धिमान, युद्ध की स्थिति में विचारपूर्ण नीति तय करने वाला, मिष्ठभाषी, शांतचित्त वाला और धनवान होता है।

4. कुंडली में धूम यदि – चतुर्थ स्थान में हो तो, वह जातक स्त्री से रति के समय निढाल या रतिरहित, चिंतनशील, शास्त्र अध्ययन में रूचि रखने वाला होता है।

5. कुंडली में धूम यदि – पंचम स्थान में हो तो, वह जातक कम संतान वाला, अल्पधनी, भारी शरीर वाला, शाकाहारी और मांसाहारी भी होता है, इसे मित्रता में अधिक रूचि नहीं होती।

6. कुंडली में धूम यदि – षष्ठ स्थान में हो तो, वह जातक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला, तेजस्वी, निरोगी और विख्यात् होता है।

7. कुंडली में धूम यदि – सप्तम स्थान में हो तो, वह जातक अल्प धनी, धोखाधड़ी में विश्वास रखने वाला और रूखे चेहरे वाला होता है।

8. कुंडली में धूम यदि – अष्टम स्थान में हो तो, वह जातक कठिनाई के समय हिम्मत हीन, दूसरे समय उत्साहित, सत्य में विश्वास रखने वाला तथा निष्ठुर या कठोर होता है।

9. कुंडली में धूम यदि – नवम स्थान में हो तो, वह जातक धनवान, मान-सम्मान वाला, प्रसिद्ध व्यक्तित्व, अपनों से स्नेह रखने वाला और एेशवर्यशाली होता है।

10. कुंडली में धूम यदि – दशम स्थान में हो तो, वह जातक संतान सुख तथा ऐश्वर्य से सम्पन्न, बुद्धिमान, सुखी और सत्य में विश्वास रखने वाला होता है।

11. कुंडली में धूम यदि – एकादश स्थान में हो तो, वह जातक धन और प्रचूर सम्पत्ति युक्त, कलाप्रेमी और गायन विद्या या वाद्य में निपुण होता है।

12. कुंडली में धूम यदि – द्वादश स्थान में हो तो, वह जातक दोषी, अपराध करने वाला, धोखाधड़ी वाला, दूसरी स्त्रीयों में रूचि वाला, नशे के वशीभूत और दुष्टप्रवृती वाला होता है।

(आलेख- 19-07-2018)

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दो मुखी रुद्राक्ष, 2 Mukhi Rudraksh

दो मुखी रूद्राक्ष, 2 Mukhi Rudraksh Nepal, 2 Mukhi Rudraksh Original Nepal,

Dr.R.B.Dhawan,Astrological Consultant, specialist: marriage problems, top best astrologer in delhi

असुराचार्य shukracharya का कथन है कि- दो मुखी रूद्राक्ष अर्धनारिश्वर स्वरूप है, यह शिव तथा शक्ति दोनो का संयुक्त रूप है। इसे धारण करने से भगवान शिव तथा पार्वती दोनों ही प्रसन्न होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष गोहत्या के पाप से मुक्ति दिलाता है, तथा यह मन और मस्तिष्क को सन्तुलित रखता है, Dr.R.B.Dhawan अपने अनुभवों के आधार पर कहते हैं- इसको धारण करने से मनुष्य की बुद्धि सक्रिय होती है, तथा घर में हर प्रकार की सुख-सुविधा उपलब्ध होती है। इसको धारण करने से पति-पत्नी में एकात्मय भाव उत्पन्न होता है, यह रूद्राक्ष श्रद्धा एवं विश्वास का स्वरूप है। यह व्यापार में सफलता दिलाता है। आचार्य shukracharya लिखते हैं- दो मुखी रूद्राक्ष सांसारिक ऐश्वर्य व उपलब्धियां कराता है, तथा घर से क्लेश की जड़ को दूर करता है। दो मुखी रूद्राक्ष शिव और पार्वती का सम्मिलित स्वरूप है। इस रूद्राक्ष को धारण करने वाले व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। इस रूद्राक्ष की अद्भुत शक्ति से धारक का मन मस्तिष्क संतुलित रहता है। Dr.R.B.Dhawan के अनुसार शिवपुराण में दो मुखी रूद्राक्ष के लिए कहा गया है कि यह बेहद दुर्लभ और कल्याणकारी रूद्राक्ष है। नेपाल के द्विमुखी रूद्राक्ष चपटे, आँख की आकृति के होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष नेपाल में काफी कम होता है, तथा बहुत मँहगा भी होता है, इसलिये दो मुखी रूद्राक्ष रामेश्वरम का ही अधिक देखने को मिलता है। दो मुखी रूद्राक्ष को धारण करने से भगवान् शिव तथा माता पार्वती दोनों ही प्रसन्न होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष गोहत्या के पाप से मुक्ति दिलाता है, तथा यह मन मस्तिष्क दोनों को सन्तुलित रखता है। दो मुखी रूद्राक्ष अर्ध-नारीश्वर स्वरूप है, इसे शिव-शिवा रूप भी कह सकते हैं, दोमुखी रूद्राक्ष साक्षात् अग्नि स्वरूप हैं, जिसके शरीर पर ये प्रतिष्ठित करके धारण किया होता है, आचार्य shukracharya का मानना है कि उसके जन्म जन्मांतर के पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे अग्नि ईंधन को जला डालती है।

इस रूद्राक्ष के धारण करने से कुंडली में चन्द्रमा से उत्पन्न सभी दोषों का निवारण हो जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से चन्द्रमा हृदय, फेफडा, मन, वामनेत्र, गुर्दा, भोजन नली इत्यादि का कारक है। चन्द्रमा की प्रतिकूल स्थिति तथा दुष्प्रभाव के कारण हृदय तथा फेफड़ों के रोग हो सकते हैं। बांयी आँख की खराबी, खून की कमी, जल सम्बन्धी रोग, गुर्दा कष्ट, मासिक धर्म के रोग, स्मृति-भ्रंश इत्यादि रोग भी हो सकते हैं। इसके दुष्प्रभाव से दरिद्रता तथा मन मस्तिष्क विकार भी होते हैं। गुणों के हिसाब से यह मोती से कई गुना अधिक प्रभावी है। दो मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाले धारक के परिजन परस्पर आदर व श्रद्धा की सतत् वृद्धि अनुभव करते हैं। द्विमुखी रूद्राक्ष शिक्षक व छात्र के बीच, पिता व पुत्र के बीच, पति व पत्नी के बीच या मित्रों में मतभेद मिटाता है, और एकात्मता उत्पन्न करता है। धारक शांतिमय पारिवारिक जीवन जीने के लिये सक्षम बन जाता है। इस रूद्राक्ष में अंर्तगर्भित ऐसी विद्युत तरंगें होती हैं कि जिन के प्रभाव से यह रूद्राक्ष सभी शारीरिक व्याधियों से रक्षा करता है, गुरू जी (Dr.R.B.Dhawan) अपने अनुभव लिखते हुए आगे कहते हैं- इस रूद्राक्ष को धारण करने से इनकम/सेल्स टैक्स अधिकारी व्यापारी को व सरकारी नौकरी वालों को उनके अधिकारी बेकार परेशान नहीं करते इस लिये इन्हें यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिये। यह शरीर की गर्मी को निकालता है, इससे रक्तचाप नियंत्रण में रहता है। मन मस्तिष्क की बीमारी भी सही हो जाती हैं। दो मुखी रूद्राक्ष को देवेश्वर भी कहा जाता है। दो मुखी रूद्राक्ष दांपत्य जीवन सुखमय बनाने के लिये अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। शिव और शक्ति की उपासना करने वाले को यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिये। इस रूद्राक्ष के स्वामी ग्रह चंद्रदेव हैं।

दो मुखी रूद्राक्ष धारण मंत्र- ॐ नमः ॐ शिव शक्तिभ्यां नमः।
चैतन्य करने का मंत्र- ॐ क्षी हृो क्षौं वो ॐ।।
उपयोग- आदर्श पारिवारिक जीवन, शांतिपूर्ण व स्थाई संबधों के लिये।

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पंद्रह मुखी रूद्राक्ष, 15 Mukhi Rudraksh

पंद्रह मुखी रूद्राक्ष, 15 Mukhi Rudraksh Nepal, 15 Mukhi Rudraksh Original Nepal,

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रक्ष जाति के आचार्य shukracharya का वचन है कि- पंद्रहमुखी रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ रूद्राक्षों की श्रेणी में आता है। यह रूद्राक्ष परम प्रभावशाली तथा अल्प कालावधि में ही शिवजी को प्रसन्न करने वाला रूद्राक्ष है, यह रूद्राक्ष साक्षात् देवमणि है। गुरू जी (Dr.R.B.Dhawan) और पुराणों के अनुसार पंद्रह विद्या, का साक्षात रूप है। इसमें महादेव की विशेष शक्ति निहित होती है, इसलिये नवग्रहों से उत्पन्न दोष इसे धारण करने मात्र से शांत होते हैं। यह रूद्राक्ष कठिन से कठिन परिस्थितियों में धारण करने वाले का मार्गदर्शन करता है। जो व्यक्ति इस रूद्राक्ष को कंठ के मध्य में धारण करते हैं, वह सर्वत्र पूजित होते हैं, और अंत समय वे स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। चमड़ी के जटिल से जटिल रोगों को दूर करने की इसमें शक्ति है। धारक को आत्मरक्षा करने में समर्थ बनाता है। यह रूद्राक्ष धारक को हानि, दुर्घटना, जटिल रोग, आर्थिक चिन्ता से मुक्त रखकर धारक को सुरक्षा-समृद्धि देता है। वैसे तो यह रूद्राक्ष सभी जटिल रोगों को दूर करने वाला माना गया है, फिर भी Dr.R.B.Dhawan के अनुभव अनुसार इस रूद्राक्ष में पौरुष रोग को दूर करने की महान शक्ति है। इसी लिए दुर्बल पुरुष के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, और इसीलिये इस की मांग अधिक होने से यह अधिक मूल्यावान भी होता है। वैसे भी यह रूद्राक्ष बहुत ही कम मात्रा में उत्पन्न होता है, और इसकी मांग इसकी उपलब्धता से कहीं अधिक है। पंद्रहमुखी रूद्राक्ष स्वास्थ्य लाभ, रोगमुक्ति और शारीरिक तथा मानसिक-व्यापारिक उन्नति में सहायक होता है। धारण करने पर आध्यात्मिक तथा भौतिक सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इस रूद्राक्ष को धारण करने से शत्रुओं का नाश होता है, इस लिए यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक है, यह समस्त रोगों का हरण करने वाला, सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला है। इसके धारण करने से कुल की मर्यादा और कुल वृद्धि अवश्य होती है। इससे बल और उत्साह का वर्धन होता है, और निर्भयता प्राप्त होती है, तथा संकट काल में सरंक्षण भी प्राप्त होता है। पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति सदा सही निर्णय लेता है, और संकटों, कुपरिस्थितियों एवं चिंताओं से छुटकारा पाता है, धारणकर्ता में विशेष ओजस गुणों का विकास होने लगते हैं। यह शास्त्रोक्त सत्य है कि जिसने पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण कर लिया, उसेे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है, और गृहस्थ जीवन भी अच्छा होता है। गर्भपात रूक जाता है, व गुणवान संतान उत्पन्न होती है।

पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण का मंत्र है- ॐ पशुपतय नम:’ मंत्र का 108 बार जाप करते हुए धारण करें।
लाभ- अलौकिक मार्गदर्शन, जटिल और पौरुष रोगों की शांति।

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