दीपावली 2018 (दीपावली पूजन)

दीपावली (महालक्ष्मी) पूजन मुहूर्त 2018 :-

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श्री महालक्ष्मी पूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल से आधी रात तक रहने वाली अमावस श्रेष्ठ होती है। यदि अर्धरात्रि काल में अमावस तिथि का आभाव हो, तो प्रदोषकाल में ही दीप प्रज्वलन, महालक्ष्मी पूजन, श्रीगणेश एवं कुबेर आदि पूजन करने का विधान है।

प्रदोषे दीपदानए लक्ष्मी पूजनादि विहितम्।
कार्तिक कृष्ण पक्षे च प्रदोषे भूतदर्शर्योः,
नरः प्रदोष समये दीपदान् दद्यात् मनोरमान्।।

इस वर्ष 2018 ई. कार्तिक अमावस 7 नवम्बर, बुधवार को प्रदोष व्यापिनी तथा रात्रि 21:22 तक निशीथ व्यापिनी होने से दीपावली पर्व इसी दिन होगा। दीपावली स्वाती तथा विशाखा नक्षत्र आयुष्मान तथा सौभाग्य योग एवं तुला के चन्द्रमा के समय होगी। सांय सूर्यास्त (प्रदोषकाल प्रारम्भ) के बाद मेष व वृष लग्न एवं स्वाती नक्षत्र विद्यमान होने से यह समयावधि श्रीगणेश, महालक्ष्मी पूजन आदि आरम्भ करने के लिये विशेष रूप से शुभ रहेगी। बही खातों एवं नवीन शुभ कार्यों के लिये भी यह मुहूर्त अत्यंत शुभ होगा। इस वर्ष बुधवार की दीपावली व्यापारियों, क्रय-विक्रय करने वालों के लिये विशेष रूप से शुभ मानी जायेगी।

लक्ष्मीपूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल की विशेषता :-
कार्तिके प्रदोषे तु विशेषण अमावस्या निशावर्धके।
तस्यां सम्पूज्येत् देवी भोगमोक्ष प्रदायिनीम्।।

दीपावली के दिन घर में प्रदोषकाल से महालक्ष्मी पूजन प्रारम्भ करके अर्धरात्रि तक जप अनुष्ठानादि करने का विशेष महात्मय होता है। प्रदोषकाल से कुछ समय पहले स्नानादि उपरांत धर्मस्थल पर मंत्रपूर्वक दीपदान करके अपने निवास स्थान पर श्रीगणेश सहित महालक्ष्मी, कुबेर पूजनादि करके अल्पाहार करना चाहिये। तदुपरांत यथोपलब्ध निशीथादि शुभ मुहूर्त में मंत्र-जप, यंत्र-सिद्धि आदि अनुष्ठान सम्पादित करने चाहियें।
दीपावली वास्तव में पांच पर्वों का महोत्सव है, जिसका आरम्भ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) से लेकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई-दूज) तक रहती है। दीपावली के पर्व पर धन की भरपूर प्राप्ति के लिये धन की अधिष्ठात्री भगवती लक्ष्मी का समारोह पूर्वक आवाहन, षोडशोपचार सहित पूजन किया जाता है। आगे दिये गये निर्दिष्ट शुभ मुहूर्तों में किसी पवित्र स्थान पर आटा, हल्दी, अक्षत एवं पुष्पादि से अष्टदल कमल बनाकर श्रीलक्ष्मी का आवाहन एवं स्थापन करके देवों की विधिवत् पूजा अर्चना करनी चाहिये।

आवाहन का मंत्र-
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामाद्र्रां ज्वलंती तृप्तां तर्पयंतीम।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप हव्ये श्रियम्। (श्रीसूक्तम्)।

पूजा मंत्र-
ॐ गं गणपतये नमः।। लक्ष्म्यै नमः।। नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात्।। से लक्ष्मी की, एरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः। शतयज्ञाधिपो देवस्तस्मा इन्द्राय ते नमः।

अग्रलिखित मंत्र से इन्द्र की और कुबेर की निम्न मंत्र से पूजा करें- कुबेराय नमः, धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्मधिपाय च। भवन्तु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादि सम्पदः।।
पूजन सामग्री में विभिन्न प्रकार की मिठाई, फल पुष्पादि, धूप, दीपादि सुगंधित वस्तुयें सम्मलित करनी चाहियें। दीपावली पूजन में प्रदोष, निशीथ एवं महानिशीथ काल के अतिरिक्त चौघड़िया मुहूर्त भी पूजन, बही-खाता पूजन, कुबेर पूजा, जपादि अनुष्ठान की दृष्टि से विशेष शुभ माने जाते हैं।

प्रदोषकाल-
7 नवम्बर 2018 को दिल्ली एवं निकटवर्ती नगरों में सूर्यास्त 17:30 से 02 घ. 41 मि. के लिये 20:11 तक प्रदोषकाल रहेगा। सांय 17:57 तक मेष (चर) लग्न तथा सांय 17:57 से 19:52 तक वृष (स्थिर) लग्न विशेष रहेगा। प्रदोषकाल में मेष व वृष लग्न स्वाती नक्षत्र 19:37 तक तथा तुला का चन्द्रमा होने से महालक्ष्मी पूजानादि के लिये शुभ समय होगा। प्रदोषकाल में ही 19:00 से 20:41 तक शुभ की चौघड़िया रहने से इस योग में दीपदान, महालक्ष्मी, गणेश-कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन, धर्मस्थल एवं घर पर दीप प्रज्वलित करना, ब्राह्मणों तथा आश्रितों को भेंट, मिठाई बांटना शुभ होगा।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़िया मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग। 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चौघड़िया
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चौघड़िया पूजन में होनी चाहियें।

निशीथ काल- 7 नवम्बर 2018 को दिल्ली व समीपस्थ नगरों में निशीथकाल रात्रि 20:01 से 22:41 तक रहेगा। इसी निशीथ काल में 19:43 से 21:57 तक मिथुन लग्न मध्यम मुहूर्त, तदुपरांत कर्क लग्न विशेष प्रशस्थ रहेगा। 19:00 से 20:41 तक शुभ की चौघड़िया भी शुभ रहेगी। तदुपरांत अमृत की चौघड़िया 20:41 से 22:22 तक भी शुभ रहेगी। इस अवधि तक पूजन समाप्त कर श्रीसूक्त, कनकधारा स्त्रोत्र तथा लक्ष्मी स्त्रोत्रादि का जप पाठ करना चाहिये।

महानिशीथ काल- रात्रि 22:41 से 24:20 तक महानिशीथ काल रहेगा। इस अवधि में 21:57 से 24:20 तक कर्क लग्न तदुपरांत सिंह लग्न विशेष शुभ रहेगा। 22:22 से 24:02 तक चर की चौघड़िया भी शुभ, परंतु तदुपरांत रोग की चौघड़िया अशुभ रहेगी। इस लिये 24:02 तक श्री गणेश-लक्ष्मी पूजन अवश्य कर लेना चाहिये। महानिशीथ काल में श्री महालक्ष्मी, काली उपासना, यंत्र मंत्र तंत्रादि की क्रियायें व काम्य प्रयोग, तंत्रानुष्ठान, साधनायें एवं यज्ञादि किये जाते हैं।

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सूर्य sun

ज्योतिष मतानुसार सूर्य से पृथ्वी की दूरी अनुमानित सवा करोड़ मील है। सूर्य ग्रह न होकर एक तारा है, जो कि स्थिर है, और अपने अक्ष पर निरन्तर घूमता है। अन्य सभी ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं। सूर्य सदैव मार्गी व उदित रहने वाला ग्रह है।

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ज्योतिष मतानुसार सूर्य नवग्रहों में से एक ग्रह है, ग्रहों में सूर्य आत्मा, आँख, हृदय, हड्डियों, शारीरिक संगठन, आरोग्यता, निजी व्यवहार, सत्वगुण, राज-कृपा, आविष्कार, अधिकार तथा सत्ता का कारक (अधिपति) ग्रह माना गया है, इसे लग्न, धर्म तथा कर्म 1, 9, 10 भाव का कारक भी माना जाता है, तथा इसके द्वारा विशेष रूप से पिता के सम्बंध का विचार किया जाता है।

कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर स्थित हो, गोचर काल में उससे छठे स्थान में किसी ग्रह के होने से सूर्य का वेध हो जाता है, वेधित सूर्य सदैव अशुभ फलदायक है, सूर्य के विद्व स्थान है – 1, 12, 4 तथा 5। सूर्य के शुभ स्थान 3-6-10 व 11 हैं, सूर्य तथा शनि में आपस में कभी वेध नहीं होता, यदि सूर्य विद्ध स्थान पर हो, तथा अन्य ग्रह सूर्य के स्थान शुभ पर ही हो तो उसे विलोम-वेध कहाँ जाता है। विलोम-वेध भी अशुभ फल देने वाला माना गया है।

अन्य:- निसर्ग बल में सूर्य को सब ग्रहों में बलवान माना गया है, यह सर्वाेच्च, स्वराशि, देष्काण, होरा, रविवार, नवांश, उत्तरायण, दिन में मध्य भाग, रात्रि के प्रवेश-काल, मित्र के नवांश तथा लग्न से दशम में (मतान्तर से सप्तम भाव) सदैव बलवान रहते हैं, मकर से 6 राशियों तक इसे चेष्टा बली माना गया है। जन्म कुण्डली में सूर्यदेव ऐसे कई योगों का निर्माण करते हैं, जो विशेष होते हैं, सूर्य समस्त ग्रहों में राजा होता है। अतः इसका जन्मपत्रिका में बलवान एवं योगकारक होना जातक के राजसी गुणों को प्रकट करता है। जातक परिजात, फलदीपिका, बृहत पाराशर होरा शास्त्र इत्यादि ज्योतिषीय ग्रंथों में योग बताये गये हैं जो निम्न प्रकार के हैं :-

1. जन्मपत्रिका में सूर्य से चन्द्रमा केन्द्र में है तो अधम योग से धन, सवारी, बुद्धि, ज्ञान, विद्या, उदारता, यश, मान-सम्मान, सुख-सुविधा के योग में कमी या कम फल प्राप्त करता है।

2. जन्मपत्रिका में सूर्य से द्वितीय मंगल, बुध व बृहस्पति, शुक्र या शनि में से कोई एक ग्रह या अधिक ग्रह हो तो शुभ वेसि योग व जब इनमें से कोई ग्रह या अधिक ग्रह द्वादश में तो शुभ वासि योग, इससे जातक विद्वान, धर्म पालक, प्रतिष्ठिता सुन्दर, धीर एवं अधिकार प्राप्त करने वाला होता है।

3. सूर्य यदि परम उच्च अर्थात मेष के दस अंश पर रहने से उसकी दशा में जातक की धर्म-कर्म में प्रीति बढ़े व पिता द्वारा संचय किया धन तथा भूमि का लाभ हो वहीं उच्चस्थ सूर्य में धन-अन्न व सम्मान की वृद्धि पर बंधु वर्गाें से झगड़ों के कारण परदेश वास की संभावना रहे, वाहनों का सुख प्राप्त होना सम्भव।

4. परम नीच सूर्य की दशा में पिता-माता की मृत्यु, स्त्री पुत्र, सम्पत्ति व स्वयं के गृह में हानि होती है, भय सदैव व्याप्त रहे जबकि नीचस्थ सूर्य से राजकोष से धन-मान की हानि, स्त्री-पुत्र-मित्रादि से क्लेश व किसी स्वजन की मृत्यु की आशंका रहे।

5. उच्च नवांशस्थ रवि जातक में साहस की वृद्धि कर झगड़े में विजय दिलाकर धन वृद्धि करवाता है (कोर्ट केस में विजय), पर पितृ कुल के जनों में बारम्बार क्षति होती रहे। नीचस्थ नवांश का बृहस्पति परदेश यात्रा में स्त्री-पुत्र, धन तथा पृथ्वी से हानि कराता है, मानसिक व्यथाकारी, ज्वरादि से पीड़ित व गुप्तेन्द्रियों की वेदना से कष्ट पाता है। उच्चस्थ सूर्य नवमांश में नीचस्थ हो जाये तो स्त्री, समीपी कुटुम्बियों की मृत्यु व संतान पर आपत्ति का कारण बनता है वहीं नीचस्थ सूर्य यदि नवमांश में उच्च हो तो वह महान सुख व सम्मान प्राप्त करवाता है परन्तु जब दशा का अंत हो रहा हो तो इसका फल विपरीत हो जाता है।

सूर्य महादशाः-
1. लग्नस्थ सूर्य की महादशा में जब मंगल, चंद्र, शनि या राहु की अंतर्दशा होती है तो दुःख राजकीय-अधिकार और गृह तथा धन का नाश हों, लग्नस्थ सूर्य को महादशा में जब गोचर मंगल, चन्द्रमा शनि अथवा राहु की अंतर्दशा आदि है तब सुख, राज्य, अधिकार और गृह तथा धन-सुख की प्राप्ति हो।

2. द्वितीयस्थ सूर्य की महादशा में जब पापग्रहों की अंतर्दशा आये तब धन क्षय, अपमानकारक शब्दों का श्रवण, मानसिक अशांति अकारण भय, नेत्र-रोग वहीं शुभ ग्रहों की अंतर्दशा में सुख, विद्या की प्राप्ति राजनेताओं से प्रेम व भूषण, वस्त्र वाहनादि का सुख मिले।

3. तृतीयस्थ सूर्य की महादशा में गोचर ग्रह की अंतर्दशा आने से सुख जबकि अगोचर ग्रह की अंतर्दशा आने से निकृष्ट फल।

4. चतुर्थस्थ सूर्य की महादशा में पापाग्रह की अंतर्दशा मानसिक अशांति राज, अग्नि, चोर भय व भ्राता की मृत्यु का भय रहें, शुभग्रह की अंतर्दशा में अत्यंत सुख, राज, धन, वस्त्र, सुंगधादि पदार्थ व स्त्री-पुत्रादि का सुख होता है।

5. पंचमस्थ सूर्य की महादशा में जब शनि, मंगल, केतु या राहु की अंतर्दशा चोर, अग्नि व राज पीड़ा दे, संतान को क्लेश रहें, शुभ ग्रह की अंतर्दशा में आनंद, राज्य भूषण व वाहन प्राप्ति व संतान सुख करवायें।

6. षष्ठस्थ सूर्य की महादश में पापग्रह की अंतर्दशा ऋण-ग्रस्त करवाये, शत्रुपक्ष से विशेष भय वहीं शुभ ग्रहान्र्तदशा में सुख व उत्तम फल पर अंत में दुखी होता है।

7. सप्तमस्थ सूर्य की महादशा में शुक्र, बृहस्पति, चन्द्रमा, बुध की जब अंतर्दशा आयें तो मन में उत्साह, भूषण, वस्त्र-वाहन की प्राप्ति स्त्री लाभ जबकि पाप ग्रह की अंतर्दशा ज्वर अतिसार, पित्त प्रकोप, प्रमेह, मूत्रकृच्छ इत्यादि रोग व शत्रु भय कराती है।

8. अष्ठमस्थ सूर्य की महादशा में जब शुभ ग्रह की अंतर्दशा आये तब भूषण-वस्त्रादि की प्राप्ति अधिक शुभ फल हो, पर किंचित दुख भी रहें, पाप ग्रह अंतर्दशा में नाना प्रकार के भय, पराधीनता, व्याधि, दुःख, पीड़ा व मरण भय।

9. नवमस्थ सूर्य की महादशा में शुभ ग्रह की अंतर्दशा दान की प्रवृत्ति, उत्सवादि सुख, यज्ञादि क्रिया की संभावना व उत्तम कार्यों को करने का अवकाश मिलता हैं, पाप ग्रह की अंतर्दशा में दुःख वृद्धि गुरू व पिता की मृत्यु हों।

10. दशमस्थ सूर्य की महादशा में पाप ग्रह की अंतर्दशा हो तो उत्तम कर्म की हानि, कर्म क्षेत्र में व्यवधान, अकारण संकट, चोर-भय वही शुभ ग्रह की महादशा में धन की प्राप्ति, आय के स्रोतों में वृद्धि, कर्म क्षेत्र में विस्तार की संभावना व अस्थायी कीर्ति हों।

11. एकादशस्थ सूर्य की महादशा में पाप ग्रह की अंतर्दशा आरम्भ में दुख अंत में सुख दें, शुभ ग्रह की अंतर्दशा राजकीय अनुग्रह की प्राप्ति, धन की उपलब्धि, स्त्री-पुत्र सुख दे।

12. द्वादशस्थ सूर्य की महादशा में पाप ग्रह की अंतर्दशा डिमोशन, पद-छूटना, प्रवास, राज-कोष से मानहानि करवायें, शुभ ग्रह की अंतर्दशा भूमि, पशु, धन-धान्य प्राप्त करायें।

जन्मराशि से सूर्य का गोचर का भ्रमण फल :

1. गोचर का सूर्य जब जन्म राशि पर से गुजरता है तो अशुभ स्वप्न, सिरदर्द, मस्से की तकलीफ, सम्मान में गिरावट पत्नी से तकरार संभव, रक्त-विकार, नेत्रपीड़ा, रिश्तेदारों व करीबी मित्रों से झगड़ा संभव। कार्यों के छूटने की संभावना रहें।

2. गोचर का सूर्य जन्मराशि से दूसरे स्थान पर से गुजरता है तो अशुभ कर्म में रत, आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से मिलना, कमजोर मन, दुश्मनी बढ़े वेगपीड़ा, कीमती वस्तु की चोरी संभव, बुरे परिणामों की अनुभूति।

3. गोचर का सूर्य जन्म राशि से तीसरे आवे तो धन लाभ, पराक्रम वृद्धि शत्रुओं पर विजय, सामाजिक कार्यों में व्यस्त, रोग कर्ज से मुक्ति दूसरो के हित संघर्ष, विजय, जातक के निर्णय सही होगें, स्थानान्तरण अथवा दूरस्थ यात्रायें संभव।

4. गोचर का सूर्य जन्मराशि से जब चैथे भ्रमण करता है तो घरेलू परेशानी, संतान कष्ट, मानसिक कलह, व्यसनी, निर्णय लेने में असफल, घर की स्त्रियाँ बीमार या दुर्घटनाग्रस्त, कृषि में हानि, अहं को ठेस पहुँचे, मित्र-परिजनों में टकराव सम्भव।

5. गोचर का सूर्य जन्मराशि से पंचम स्थान पर से गुजरे शारीरिक एवं मानसिक बैचेनी, आवक में कमी, संचित धन के खर्च की बढ़ोत्तरी, संतान अवज्ञाकारी-बीमार, सेक्स-प्रेम प्रसंग में असंतुष्टि, पेट की बीमारी, उच्च अधिकारियों या अच्छे सम्बंधों में गलतफहमियाँ।

6. गोचर का सूर्य जन्मराशि से छठे से भ्रमण करें तो रोगों का भय, शत्रुओं पर विजय, हाथ में लिये कार्यों में सफलता, उच्च अधिकारी प्रबल रहे, प्रतियोगिता में सभी प्रकार की सफलता, पंचम भावस्थ गोचर के अशुभ फलों का नाश हो शुभ फल मिलें।

7. गोचर का सूर्य जन्मराशि से सप्तम आये तो रोगों का प्रकोप, पेट व गुदामार्ग में रोगों का होना संभव, पत्नी-बच्चे बीमार, वैवाहिक जीवन में कटुता, यात्रायें नुकसानदायक, सम्मान हानि, नौकरी में अवनति, भागीदारी में तकरार संभव।

8. गोचर का सूर्य जन्मराशि से अष्टम आयें तो शत्रुओं से विवाद, बुरे परिणाम, राज भय संभव, पति पत्नी में तनाव, सरकार से आर्थिक दंड, धन हानि, आवक में रूकावट, स्वभाव में अस्थिरता।

9. गोचर का सूर्य जन्मराशि से नवें आये तो अशुभ, पिता से बिछोह, धन-सम्मान हानि, मिथ्या दोषारोपण, जातक अंहकार व पूर्वाग्रह से ग्रसित रहें, मन में निराशा संभव, पापनाश हेतु तीर्थयात्रा संभव।

10. गोचर का सूर्य जन्मराशि से दशम आये तो अभीष्ट कार्य हो, स्वास्थ्य लाभ, उच्च अधिकारियों का सहयोग मिले, पदोन्नति, भाग्योदय में सहायक।

11. गोचर का सूर्य जन्मराशि से एकादश आये तो अचानक उत्तम फल, आवक के जरियो में वृद्धि, धंधे-व्यापार में लाभ, चिंतायें समाप्त रोग नाश, मित्र-रिश्तेदार मदद करें, उत्तम वाहन, उत्तम भोजन मिलें।

12. गोचर का सूर्य जन्मराशि से द्वादश आये तो अशुभ समाचारों की प्राप्ति, धारा प्रवाह खर्च, बीमारी, मित्रों से कलह, नेत्र विकार पेट की समस्या, अदालती केस चलता हो तो उसमें हार, आराम का नाश।

अशुभ सूर्य के उपाय :-
1. प्रतिदिन उदित होते सूर्य को ताम्र पात्र में जल भरकर उसमें थोड़ा-सा कुकुम डालकर, लाल पुष्प सहित सूर्याध्य दें।

2. नेत्रों की व्याधियों में सूर्योपासना सहित नेत्रोपनिषद का नित्य पाठ करें।

3. रविवार को नमक रहित भोजन करें।

4. तांम्र पात्र, गेहूँ, गुड़, दक्षिणा सहित किसी ब्राह्मण को दान करें।

5. सूर्य कृत साधारण अरिष्टों में नवग्रह कवच सहित सूर्य कवच एवं शतनाम का पाठ भी पर्याप्त शुभफलप्रद रहे।

इस प्रकार सूर्य अपनी भिन्न-भिन्न स्थितियों से भिन्न-भिन्न फलों को देते हुये अपना प्रभाव देते हैं, यदि कोई विष्टि समस्या हो तो सविधिपूर्वक सूर्य योग अथवा वेदोक्त मंत्रों का अनुष्ठान रूप जप करवाना सवोत्तम रहता है।

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सिंह राशि और प्रेम सम्बन्ध

सिंह राशि वालों का प्रेम सम्बंध व वैवाहिक जीवन कैसा होता है, इस लेख के माध्यम से बताया गया है :-

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सिंह राशि भचक्र में 120 अंश से 150 अंश तक होती है। यह अग्नि तत्व की स्थिर राशि है। सिंह राशि का प्रतीकात्मक चिन्ह भी सिंह (शेर) है। इस राशि का स्वामी ग्रह सूर्य होता है। सिंह राशि के पुरूषों की बात की जाय तो ये अपनी प्रेमिका को यह बात मनवाने में कामयाब होते हैं कि वे उसके लिये सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है। ये बनावटी प्रेम को पसंद नहीं करते बल्कि ये प्रेम में स्वाभाविक आनंद और खुशी तलाशते हैं। वैवाहिक और पारिवारिक जीवन में इनकी यही विशेषता इनको सबसे अलग व्यक्तित्व वाला सिद्ध करवाती है। ये अपने बच्चों और पत्नी के लिये सभी सुख सुविधाओं का प्रबंध करते हैं। ये भी परिवार के द्वारा मिलने वाले सुखों को ही अपने जीवन का आधार मानते हैं।

यदि कभी ऐसा हो कि इन्हें परिवार या प्रेमिका का प्रेम न मिले तो ये बड़े उदास हो जाते हैं। ये स्वाभाविक और उन्मुक्त प्रेम कि इच्छा रखते हैं। अतः एक पत्नी के रूप में इनका साथ निभाना आसान काम नहीं है। ऐसे में यदि इनकी पत्नी एक बार इनके गुणों और स्वभाव को अपने भीतर आत्मसात कर ले तो फिर जीवन भर वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है। यदि ये प्रेम में एक बार धोखा खा गये या असफल हो गये तो दोबारा प्रेम प्रसंगों में पड़ने से ये हिचकिचाते हैं, और कुछ हद तक प्रेम प्रसंगों के प्रति घृणा के भाव रखने लगते हैं।

सिंह राशि वाली स्त्रियाँ :- अपने प्रेमी के प्रति बड़ी उदारता का भाव रखती हैं। सिंह राशि वाली स्त्रियाँ बड़े सुलझे हुये विचारों वाली होती हैं, परन्तु प्रेम के मामलों में ये आसानी से फंस जाती हैं। अतः कुछ मामलों में इन्हें मायूसी भी हाथ लगती है। ये स्वच्छ हृदय, सरल और उदार स्वभाव, भावुक और उन्मुक्त स्वभाव वाली होती हैं। ये अपने प्रेमी के प्रति सदैव वफादार रहती हैं। अतः ये एक आदर्श प्रेमिका साबित होती हैं। ये एक उत्तम पत्नी भी होती हैं ये अपने चाहने वाले को उसकी चाहत से बढ़कर प्यार करने वाली होती हैं। इनके प्रेम में गहराई और विश्वसनीयता होती है। ये पूर्ण उत्साह के साथ सदैव सहयोग के लिये तत्पर रहती है। अपने पति के व्यापार व्यवसाय में ये सदैव सहयोग देने के लिये तैयार रहती हैं। ये अपने पति और परिवार दोनों से बहुत प्यार करती हैं। ये इनकी परेशानियों को भी अपने ऊपर लेने को तैयार रहती हैं। परन्तु फिर भी इन्हें कभी-कभी ऐसा लगता है कि इनके प्यार के बदले जो प्यार घर परिवार से इन्हें मिल रहा है वो कुछ कम है।

सिंह और मेष राशि प्रेम:- मेष राशि वाले आपके लिये एक अच्छे जीवन साथी सिद्ध हो सकते हैं। इनके साथ होने से आप स्वयं को गौरवान्ति अनुभव करेंगे। इनसे आपको सुख और उत्साह मिलेगा। विवाह के बाद ये आपके प्रतिपूर्ण जिम्मेदार रहेंगे। अतः ये आपके लिये अच्छे जीवन साथी हो सकते हैं।

सिंह और वृष राशि प्रेम:- वृष राशि वालोें के साथ आप स्वयं को अधिक सुखी अनुभव नहीं करेंगे। इनके साथ का वैवाहिक जीवन आपको संघर्ष पूर्ण लगेगा। इनके साथ रहते हुये आप अपने आपको पुराने और रूढ़िवादी विचारों से घिरा हुआ महसूस करेंगे। दोनों की पसंद न पसंद भी अलग हो सकती है अतः वैवाहिक जीवन को व्यवस्थित करने में आपको कठिनाई होगी।

सिंह और मिथुन राशि प्रेम:- मिथुन राशि वाले आपके लिये एक अच्छे जीवन साथ सिद्ध हो सकते हैं। इनकी आदत सदैव प्रसन्न रहने और हंसने खिलखिलाने की होती है, जो आपकी भी पसंद आयेगी। ये आपके आस-पास कुछ ऐसा माहौल निर्मित करेंगे जिससे आपको लगेगा कि ये आपसे बहुत प्यार करते हैं। इनका स्वभाव उतावला और शीघ्र निर्णय लेने वाला होता है। कभी-कभी आपको ऐसा भी लग सकता है कि इनका सम्बंध आपके अलावा भी कहीं है कि इनका सम्बंध आपके अलावा भी कहीं है परन्तु इसकी सत्यत, कुण्डली के अन्य योगों पर निर्भर करती है, फिर भी इनके साथ आपका वैवाहिक जीवन सफल रहेगा।

सिंह और कर्क राशि प्रेम:- इनके साथ आपका वैवाहिक जीवन सफल रहेगा इसमें संदेह है। इनके प्रति आपका आकर्षण जीवन साथी के रूप में न रहकर मित्रवत् रह सकता है। जब आप घर के अलावा अन्य बातों में रूचि लेंगे उस समय इनको आपत्ति रह सकती है। इन सब कारणों से बड़ी कठिनाई के बाद ही इनके साथ आपका वैवाहिक जीवन सफल हो पायेगा।

सिंह और सिंह राशि प्रेम:- एक-दूसरे की तकरीबन सभी आदतें समान होना ही अनेक कठिनाइयों का उद्गम स्रोत है। आप लोग एक-दूसरे से जल्दी ही ऊबने लगेंगे। दोनों में ही अभिमान और स्वतंत्र रहने की आदत पाई जायेगी अतः एक-दूसरे की बात आप लोग मानेंगे, इसमें संदेह है। दोनों ही मेहनत वाले कामों से बचना चाहेंगे। दोनों ही एक दूसरे पर हावी होना चाहेंगे अतः इन कारणों से आपके बीच एक वैचारिक खाई तैयार हो जायेगी। विवाह के बाद दोनों ही यदि संयमी और सहनशील हो जाते हैं तभी वैवाहिक जीवन सफल हो सकता है।

सिंह और कन्या राशि प्रेम:- कन्या राशि वालों के साथ आपके वैवाहिक जीवन को अधिक सुखी वही कहा जायेगा। आप उनके प्रति जितना आकर्षित रहेंगे वे आपके प्रति उससे बहुत कम आकर्षण रखेंगे। आपके अधिक प्यार के बदले आपको बहुत कम प्यार मिलेगा। इन सब कारणों से आपको आत्मिक कष्ट होगा। इतने पर भी आप उनकी आलोचना नहीं करेंगे जबकि वो आपको नसीहत देते रहेंगे। ये सब होने पर आप मायूस होकर गलत दिशा में भी सोच सकते हैं। इन सब कारणों से इनके साथ आपके वैवाहिक जीवन को सफल नहीं कहा जायेगा।

सिंह और तुला राशि प्रेम:- तुला राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा। ये आपके प्रति बहुत आकर्षण का भाव रखते हैं। इनके अंदर कई ऐसे गुण मौजूद होते हैं जिन्हें आप बहुत पसंद करते हैं। ये मृदुभाषी, स्नेही, सजग और सदैव प्रसन्न रहने वाले होते हैं। ये जीवन के प्रत्येक पहलू को ध्यान में रखकर काम करते हैं। जिसके कारण जीवन में आनन्द बना रहता है। प्रेम और अंतरंग सम्बंधों को ये जीवन का महत्वपूर्ण पहलू समझते हैं इन सब कारणों से आपका जीवन सुखी रहेगा।

सिंह और वृश्चिक राशि प्रेम:- वृश्चिक राशि वालों के साथ आपके वैवाहिक जीवन को अधिक सुखी नहीं कहा जायेगा। यद्यपि ये आपके प्रति अधिक आकर्षित रहते हैं परन्तु फिर भी आप में अभिमान या स्वाभिमान सम्बंधी पेरशानियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। जीवन की गाड़ी सहजता से चलेगी इसमें संदेह होता है। अतः आपका वैवाहिक जीवन उसी स्थिति में सुखी रह सकता है जब आप लोग अभिमान का त्याग कर एक दूसरे के आगे झुकना चाहेंगे।

सिंह और धनु राशि प्रेम:- धनु राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा। ये आपके प्रति सहजता से आकर्षित होते हैं। धनु राशि वाले बड़े संवेदनशील और उदार मन के होते हैं। इनकी आदत किसी पर धौंस जमाना या नुकसान पहुँचाना नहीं होती। इनकी आदतें आपको बहुत पसंद आयेगी। ये आप पर पूर्ण विश्वास करते हैं तथा ये यही चाहते हैं कि आप भी इन पर पूर्ण विश्वास करें। इस प्रकार आप इनके साथ सुखी और अनन्दमयी वैवाहिक जीवन प्राप्त कर सकेंगे।

सिंह और मकर राशि प्रेम:- मकर राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक जीवन तभी सफल होगा जब आप भी इसके लिये पूर्ण प्रयास करें। ये आपके प्रति बहुत कम आकर्षण रखते हैं, हाँ आपके अंदर वह योग्यता जरूर है जिसके कारण आप इन्हें अपने आकर्षण में बाँध सकते हैं। इनकी कुछ ऐसी पसंद या नापसंद भी हो सकती हैं जो आपके विपरीत होती है लेकिन ये उनको भी आपसे मनवाना चाहेंगे। ये सामाजिक कार्यों में भी रूचि नहीं लेते। इन सबको कारणों पर नियंत्रण पाकर ही आप इनके साथ सुखी रह सकते हैं।

सिंह और कुंभ राशि प्रेम:- कुंभ राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक जीवन पूर्णरूपेण सफल हो, इसमें संदेह होता है। विवाह के पहले तक ये आपके प्रति बड़ा अगाध प्रेम रखते हैं परन्तु विवाह के पश्चात ये प्रेम कम और अधिकार ज्यादा जताते हैं। ये आपके स्वतंत्र प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगाना चाहते हैं। इनका चरित्र और व्यवहार पूर्णरूपेण आपके विपरीत होता है। इन सब सफल नहीं कहा जायेगा।

सिंह और मीन राशि प्रेम:- मीन राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक सम्बंध सामान्य कहा जायेगा। यद्यपि ये आपके प्रति अधिक आकर्षण नहीं रखते फिर भी ये आपको भरपूर प्रेम देने का प्रयास करेंगे लेकिन इनके प्रेम में आपको गंभीरता या सापेक्षता का अभाव लगेगा। यदि आप इन्हें अपने प्रभाव में रखकर प्यार से दिशा निर्देश करते हैं तो ऐसी स्थित में आपके वैवाहिक जीवन के सफल होने की सम्भावनायें बढ़ जायेगी।

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साढ़ेसाती,Sadesati

शनि की साढ़ेसाती और साढ़ेसाती का प्रभाव :-

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant), top best astrologer in delhi

नीलाम्बरः शूलाधरः किरीटी गघ्रस्थित स्त्रासकरो धनुष्ठाम्।
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रशान्तः सदाऽतु महां वरदोऽल्पगामी।।

शरीर पर नीले वस्त्राभूषण धारण करने वाले, सिर पर मुकुट को, हाथों में धनुष और शूल को धारण करने वाले, गीध पर विराजमान, प्राणियों को भय देने वाले, मंदगति से चलने वाले और चार भुजाओं से युक्त सूर्य के पुत्र शनिदेव हमारे प्रति शांत और शुभ वर देने वाले हों।

शनि ग्रह का परिचय-
भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया ने शनिदेव को जन्म दिया। शनिदेव का स्तवन काश्यपेयं महद्रद्युतिम कहकर किया जाता है। क्योंकि शनि को महर्षि कश्यप की वंश परम्पराओं में माना गया है। एक मत के अनुसार महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में संपन्न काश्यपेय यज्ञ का संबंध शनि की उत्पत्ति से है। भारतीय ज्योतिष के सात ग्रहों में शनिग्रह सबसे दूरस्थ है। यह सूर्य की एक परिक्रमा 29.5 वर्षों में पूरी करता है, तथा एक राशि में लगभग 2.5 वर्ष तक रहता है। शनि के दस चन्द्रमा हैं। शनि अस्त होने के 38 दिन बाद उदय होता है। तत्पश्चात 135 दिनों तक सामान्य गति से उसके बाद 105 दिनों तक वक्री गति से संचरणशील रहता है। वक्र गति से परिक्रमा करते हुए पश्चिम से अस्त होता है।

ज्योतिर्विदों एवं खगोलविदों ने शनि ग्रह को नीलनिलय का सुन्दरतम ग्रह स्वीकार किया है। विषय यहां साढ़ेसाती से सम्बध है, अतः शनि की साढ़ेसाती sadesati का मुख्यतः कारण उसके वलय हैं। शनिग्रह एक नीली गेंद की भांति प्रतीत होते हैं, ये तीन पीले वलयों के बीच स्थित हैं। यही वलय साढ़ेसाती का कारण है। क्योंकि शनिदेव जिस राशि पर भ्रमण करते हैं एक वलय उस राशि से आगे वाली राशि पर प्रभाव डालता है, तथा पीछे वाला वलय पीछे वाली राशि पर प्रभाव डालता है। मध्य राशि में शनिदेव स्वयं स्थित होते हैं। अतः गोचर में शनिदेव जिस राशि पर भ्रमण करते हैं, उसके आगे-पीछे की राशियों को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए वर्तमान में शनि धनु राशि में स्थित हैं, अतः धनु राशि वाले जातकों के लिए तो शनि की साढ़ेसाती चल ही रही है। वृश्चिक राशि वालों के लिए उतरती साढ़ेसाती तथा मकर राशि वालों के लिए चढ़ती हुई साढ़ेसाती लगी हुई है। चूंकि शनि ग्रह एक राशि में 2.5 वर्ष रहते हैं, तथा उसके वलय आगे पीछे रहते हैं अतः गोचर कालीन शनि से एक राशि 2.5×3=7.5 वर्ष तक प्रभावित होती है, इसे ही शनि की साढ़ेसाती कहते हैं।

जब एक जातक के जन्मकालीन चन्द्रमा से शनि 12वें हो तब साढ़ेसाती का प्रारंभ होता है। जन्मकालीन चन्द्रमा पर शनि का गोचर योग कहलाता है, तथा अन्यकालीन चन्द्रमा से द्वितीयस्थ शनि पाद कहलाता है। जिन जातकों की जन्मपत्रिका नहीं है। उनको साढ़ेसाती के प्रभाव उनकी मानसिक स्थिति से अनुमान द्वारा जाना जा जाता है।

ज्योतिष तत्व प्रकाश के अनुसार-
द्वादशे जन्मगे राशौ द्वितीये च शनैश्चरः।
सार्धानि सप्तवर्षाणि तदा दुःखेर्युतो भवेत्।। रिष्फ रूप धनमेषु भास्करिः संस्थितो भवति यस्य जन्मजात्।
लोचनोदरपदेषु संस्थितिः कथ्यते रविजलोकजैर्जनं।। (ज्योतिष तत्व प्रकाश)

शनि जन्म राशि से द्वादश भाव (12), जन्म राशि (1), एवं जन्मराशि से द्वितीयस्थ (2) हो तो, शनि की साढ़ेसाती आरोपित होती है। शनि के आगे वाले वलय को नेत्रों की संज्ञा दी गई है, स्वयं शनि देव जिस राशि में रहते हैं, उसे उदर की संज्ञा दी गई है, तथा शनिदेव के पीछे वाले वलय को पाद (पावो) की संज्ञा दी गई है। अर्थात लगती हुई साढ़ेसाती sadesati को नेत्रों पर, बीच वाली (मध्य) साढ़ेसाती को भोग तथा उतरती हुई साढ़ेसाती को पाद काल कहा जाता है। शनि की साढ़ेसाती स्वयं में भीषण भय तथा सघन संत्रास उत्पन्न करने वाले शब्द हैं। साढ़ेसाती के विषय में अनेकानेक भ्रांतियाँ भी प्रचलित हैं। लौकिक कथाओं में साढ़ेसाती विनाशक काल प्रहार के रूप में प्रस्तुत होती है। शनि की विकरालता में साढ़ेसाती की क्रूरता संयुक्त होकर प्रकम्पन उत्पन्न कर देती है। परंतु प्रत्येक जातक के लिए शनि की साढ़ेसाती विकरालता या क्रूरता लिये नहीं आती, अतः शनि की साढ़ेसाती के प्रभावों को समझने के लिए शनिदेव की प्रकृति को समझना आवश्यक है।

शनि देव की प्रकृतिः-
शनि के पर्याय नाम- शनि, मन्द, छायायुक्त-पंगु, पंगुकाय, कोण, तरणि, तनय, घुमणिसुत, पातंगी, मृदु, नील, कपिलाक्ष, कृशांग, दीर्घ, छायातज, यम, अर्कपुत्र, सौरि, क्रोड, क्रूरलोचन, दुःख।

शनि का सामान्य/विशेष स्वरूपः-
मन्दोऽलसः कपलिदृक कृश दीर्घगात्रः।
स्थूलद्विजः परुष रोम कचोऽनिलात्मा।।

शनि प्रधान पुरुष आलसी, पिंगलवर्ण, दृष्टियुक्त, दुबला तथा लम्बी देहवाला, मोटे दांतों वाला होता है। इसके रोम और केश रूखे होते हैं। यह वात प्रकृति प्रधान होता है। सूर्यपुत्र शनि दुःखदायक काले वर्ण का होता है। स्नायुतंत्र, कूड़ा करकट फेंकने की जगह, फटे पुराने कपड़े, लोहा, कबाड़, शिशिर तथा नमकीन रूचि पर शनि का अधिकार है।

कान्नियरोमावयवः कृशात्मा दुर्वासिताङ्ग कफ मारू मात्मा।
पीनद्विजश्चारूपिशङ्ग दृष्टिः सौरिस्तमो बुद्धि रतोऽलसः स्यात।। (वेधनाथ)

शनि प्रधान व्यक्ति के केश और अव्यव कठिन (मोटे) होते हैं। इसका शरीर दुर्बल होता है। शरीर का रंग दूर्वा जैसा (श्याम) होता है। इसकी प्रकृति कफ-वात होती है। इसके मोटे दांत होते है। दृष्टि पिंगलवर्ण की, यह तामसी बुद्धि वाला तथा आलसी होता है। शनि का उदय पृष्ठ भाग से होता है। यह चैपाया है पर्वत वनों में घूमने वाला, सौ वर्ष की आयु का मूल प्रधान होता है। इसके देवता ब्रह्मा है, इसका रत्न नीलम है। इसका प्रदेश गंगा से हिमालय तक है। यह वायु तत्व प्रधान कसैली रूचिवाला, निम्न दृष्टि वाला और तीक्ष्ण स्वभाव वाला होता है, तुला, मकर, कुम्भ राशि में, जाया स्थान (स्त्री स्थान) में, विषुव के दक्षिणायान में स्वग्रह (मकर कुम्भ) में, शनिवार में, अपनी दशा में, राशि के अन्त भाग में, युद्ध के समय में, कृष्ण पक्ष, वक्री होने पर किसी भी स्थान में शनि बलवान होता है।

श्यामलोऽति मालिनश्च शिरालः सालसश्च जटिलः कृश दीर्घ।
स्थूल नख पिगंल नेत्रोयुक् शनिश्च खलता निलकोपः। (टुण्डीराज)

शनि श्याम वर्ण, हृदय से अर्थात् अन्तरात्मा से मलिन, नसों से व्याप्त देह वाला, स्वभाव से आलसी, जटायुक्त, दुर्बल तथा लम्बा शरीर दांत और नाखून मोटे, पीतवर्ण की आंखों वाला, दुष्ट स्वभाव, क्रोधी तथा वायु प्रधान प्रकृति का होता है।
विद्वानों का मत है कि दशम तथा एकादश राशियों पर शनि का अधिकार है, अर्थात् मकर और कुम्भ राशियों का स्वामी शनि है। इसका उच्च स्थान सप्तम राशि तुला है। नीच राशि मेष है। यह सीमांतक ग्रह कहलाता है, क्योंकि यहां पर सूर्य का प्रभाव समाप्त हो जाता है, वहां पर शनि के प्रभाव का प्रारंभ होता है। शनि सूर्य से पराजित होता है, और मंगल को परास्त कर देता है। पाश्चात्य ज्योतिर्विद विलियम लिलि के अनुसार, शनि प्रधान व्यक्ति का शरीर साधारणतः शीतल और रूक्ष होता है, मझंला कद, फीका काला रंग, आंखें बारीक और काली, दृष्टि नीचे की ओर, भाल भव्य, केश काले और लहरीले तथा रूक्ष, कान बड़े लटकते जैसे, भौंहे झुकी हुई, होंठ और नाक मोटा, दाढ़ी पतली, इस प्रकार का स्वरूप बतलाया जा सकता है। इसका चेहरा देखने से प्रसन्नता नहीं होती। सिर झुका हुआ और चेहरा अटपटा सा लगता है। कंधे चौड़े, फैले, टेढ़े होते हैं। पेट पतला, जघाएं पतली तथा घुटने और पैर टेढे-मेढ़े होते हैं। चाल शराबी जैसी लड़खड़ाती प्रतीत होती है। घुटने एक-दूसरे से सटे रखकर चलते हैं। शनि पूर्व की ओर हो तो प्रमाण बद्धता और मृदुता कुछ हद तक होती है। कद मोटा होता है। पश्चिम की ओर हो तो कृश और अधिक काले रंग का होता है। शरीर पर केश बहुत कम होते हैं। शनि के शर कम हों तो कृशता ज्यादा होती है। शर अधिक हों तो मांसल शरीर होता है।

शनि का कारकत्वः-
प्रत्येक ग्रह किन-किन का कारक होता है। इसके संबंध में उतर कालामृत ज्योतिष ग्रंथ के रचयिता कालिदास ने सभी प्राचीन ग्रंथों से अधिक ग्रहों के कारकत्व का वर्णन किया है। अतः सर्वप्रथम शनि का कारकत्व उत्तर कालामृत से उद्धृत किया जा रहा है-

शनि से इन विषयों का विचार करना चाहिए-
जड़ता अथवा आलस्य, रूकावट, घोड़ा, हाथी, चमड़ा, आय, बहुत कष्ट, रोग, विरोध, दुःख, मरण, स्त्री से सुख, दासी, गधा अथवा खच्चर, चाण्डाल, विकृत अंगों वाले, वनों में भ्रमण करने वाले डरावनी सूरत, दान, स्वामी, आयु, नपुंसक, अन्त्यज, खग, तीन अग्नियां, दासता का कर्म करने वाले, अधार्मिक कृत्य, पौरुषहीन, मिथ्या भाषण, चिरस्थायी, वायु, वृद्धावस्था, नसें, दिन के अंतिम भाग में बलवान, शिशिर ऋतु, क्रोध, परिश्रम, नीच जन्मा, हरामी, गौलिक, गन्दा कपड़ा, घर, बुरे विचार, दुष्ट से मित्रता, काला, पाप कर्म, क्रूर कर्म, राख, काले धान्य, मणि, लोहा, उदारता, वर्ष, शूद्र, वैश्य, पिता का प्रतिनिधि, दूसरे के कुल की विद्या सीखने वाला, लंगड़ापन, उग्रता, कम्बल, पश्चिमाभिमुख, जिलाने के उपाय, नीचे देखना, कृषि द्वारा जीवन निर्वाह, शस्त्रागार, जाति से बाहर वाले स्थान, ईशान दिशा का प्रिय, नागलोक, पतन, युद्ध, भ्रमण, शल्यविद्या, सीसा धातु, शक्ति का दुरूपयोग, शुष्क, पुराना तेल, लकड़ी, ब्राह्मण, तामस गुण, विष, भूमि पर भ्रमण, कठोरता, इच्छुक, वस्त्रों से सजाना, यमराज का पुजारी, कुत्ता, चित्त, की कठोरता आदि शनि के कारकत्व है।

जैसे सौर मण्डल में शनि का स्थान सबसे अंत में है ऐसे ही गुणों आदि में भी शनि का स्थान अंत में अर्थात घटिया, निकृष्ट अधम है। यही कारण है कि शनि निम्न वर्ग का (मजदूरों का, सफाई कर्मचारियों का ग्रह) माना गया है। वर्णों में इसीलिए शूद्र की पदवी प्राप्त है। घर में नौकर, भ्रत्य की सी निम्न स्थिति है, सूर्य से दूर रहने के कारण इसमें प्रकाश कम है। यही कारण है कि शनि को विद्याहीन, प्रकाशहीन, काला, विद्याहीन माना गया है। प्रकाश की रश्मियों से जो पदार्थ वंचित हैं उनकी पूरी उन्नति नहीं हो पाती। अतः शनि अपूर्णता, हीनता, अभाव आदि का द्योतक है। इसी प्रकाश आदि के अभाव से कई रोगों की उत्पत्ति होती है। इसीलिए शनि को रोग का कारण माना गया है। नवग्रह परिवार में मंद गति से भ्रमण करने (शनैः शनैःश्चर) धीरे-धीरे चलाने वाला शनैश्चर कहा गया है। मन्द गति होने के कारण शनि को लंगड़े की उपाधि भी दी गई है। शनि की कुण्डली में स्थिति मनुष्य की टांगों की स्थिति को बतला देती है। प्रकाशहीन वनस्पति तथा अन्य जीवन, मृत पदार्थों, जैसे चमड़ा और पत्थर इनसे भी शनि का घनिष्ठ संबंध है। मन्दगति होने के कारण कार्यों का विलम्ब से सम्पादन होना स्वाभाविक ही है। अतः विलम्ब से, बहुत काल से, आयु से, दीर्घ रोग से, दीर्घ आकार से शनि का संबंध है और इन वस्तुओं का शनि इसलिए कारक भी है।

साढ़ेसाती sadesati स्वयं में भयप्रद शब्द है किन्तु संपूर्ण साढ़ेसाती काल विध्वंसक या खराब नहीं होता, कारण कि सभी राशियों पर शनि की साढेसाती का प्रभाव समान नहीं होता, क्योंकि साढ़ेसाती का संबंध गोचर से है। अतः गोचर में शनि जन्मांग में अपनी स्थिति प्रत्येक राशि में उसके अधिपति के साथ अपने संबंध के अनुसार ही फल प्रदान करेगा। जैसा कि विदित है, शनि मकर एवं कुम्भ राशि का स्वामी, कुम्भ राशि में मूल त्रिकोण, तुला राशि में उच्च के तथा मेष राशि में नीच के होते हैं। बुध एवं शुक्र, राहु ग्रह मित्र हैं। सूर्य चन्द्र मंगल शत्रु हैं, गुरु केतु सम है। अतः शनि जन्मागीय स्थिति के अनुसार फल प्रदान करता है। कुछ ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शनि जन्म राशि के अनुसार निम्नानुसार फल प्रदान करता हैं :-

1. मेष राशि- मध्य भाग घातक।
2. वृष राशि- प्रारंभ घातक।
3. मिथुन राशि- अंत भाग घातक।
4. कर्क राशि- मध्य व अंत घातक।
5. सिंह राशि- प्रारंभ व मध्य घातक।
6. कन्या राशि- प्रारंभ घातक।
7. तुला राशि- अंत घातक।
8. वृश्चिक राशि- मध्य व अंत घातक।
9. धनु राशि- प्रारंभ व मध्य घातक।
10. मकर राशि- समस्त समय सम।
11. कुम्भ राशि- समस्त समय शुभ।
12. मीन राशि- अंत घातक।

इसके अतिरिक्त तीनों चरणों का समग्र परिणाम निम्नानुसार रहता है, व्यवहार में ऐसा पाया जाता है।

1. प्रथम चरण- जन्म राशि से 12वें भाव में आते ही शनि साढ़ेसाती का प्रथम चरण प्रारंभ हो जाता है। साढ़ेसाती के प्रथम चरण अर्थात् साढ़ेसाती sadesati के प्रथम ढ़ाई वर्ष में व्यक्ति आर्थिक रूप से अत्यंत पीड़ित होता है। आय की अपेक्षा व्यय की अधिकता होने से पूर्व नियोजित योजनाएं विघटित होती हैं। अप्रत्याशित आर्थिक हानि चकित करती है। शैय्या सुख में कमी आती है। जातक का स्वयं स्वास्थ्य बाधित रहता है। फलस्वरूप शारीरिक सुखों में कमी आती है। व्यक्ति निरूद्देश भटकता रहता है। यात्रा का सुफल प्राप्त नहीं होता। नेत्र व्याधि संभव है। चश्में का प्रयोग जातक के लिए अपेक्षित हो सकता है। जातक के पिता की माता अर्थात दादी को मारक कष्ट होता है। व्यक्ति का स्नायुतंत्र व्याधिग्रस्त रहता है। अभिभावक एवं आत्मीय जन कष्ट का अनुभव करते हैं। कुटुम्ब से वियोग या अलगाव (बंटवारा) होता है। पिता को कष्ट होता है। लाभ एवं आय नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।

2. द्वितीय चरण- साढे़साती का द्वितीय चरण तब प्रारंभ होता है जब शनि जन्मकालीन चन्द्रमा पर गोचर करता है। इसे उदर या पेट की या द्वितीय चरण साढे़साती sadesati कहते हैं। द्वितीय चरण का प्रभाव जातक को आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रभावित करता है। आर्थिक चिन्ताएं निरन्तर रहती हैं। शारीरिक सार्मथ्य, प्रभाव व गति आक्रान्त होती है। मानसिक स्तर पर प्रबल उद्वेलन रहता है। व्यर्थ का व्यय व्यथित करता है। कोई कार्य मनोनुकूल नहीं होता। अपूर्ण कार्य दु:खी करते हैं, व्यवधान एवं बाधाएं प्रबल रहती हैं। व्यक्तित्व मन्द होता है। गृहस्थ का पारिवारिक तथा व्यवसायिक जीवन अस्तव्यस्त रहता है। किसी सगे-संबंधी को मारक कष्ट होता है। दीर्घयात्राएं, शरीर से कष्ट, आत्मीयों से पृथक्य द्वारा कष्ट, संपत्ति की हानि, सामाजिक प्रतिष्ठा पर आंच, मित्रों का अभाव एवं कार्य में अवरोध द्वितीय चरण के फल हैं। प्रयास निष्फल होते हैं, अर्थात प्रत्यय फलीभूत नहीं होते।

3. तृतीय चरण- साढ़ेसाती का तृतीय चरण तब प्रारंभ होता है जब शनिदेव जन्मकालीन चन्द्रमा से द्वितीयस्थ होते हैं। यह उतरती साढ़ेसाती या पाद (पावों) पर साढ़ेसाती कही जाती है। इसका फल यह होता है कि आत्मीय जनों से निष्प्रयोजन संघर्ष होता है। इन्हें गंभीर व्याधि अथवा किसी को मारक होता है। व्यक्ति का स्वास्थ्य, सन्तति सुख एवं आयुबल प्रभावित होता है। सुखों का नाश होता है। पदाधिकार विलुप्त होता है, किन्तु धनागम होता रहता है। शारीरिक रूप से जड़ता अथवा निर्बलता का अनुभव होता है। आनन्द बाधित होता है। निम्न व्यक्ति से प्रवचना होती है। धन का व्यय एवं अपव्यय होता है।

साढ़ेसाती की आवृत्तियांः-
सामान्यता एक जातक को अपने जीवन काल में तीन बार शनि की साढ़ेसाती झेलनी होती है। चतुर्थ कोई बिरला जातक ही प्राप्त करता है। क्योंकि शनि एक चक्र लगभग 30 वर्ष में पूरा करता है। 30×3=90 वर्ष की आयु तक तीसरी आवृत्ति संभावित होती है। चतुर्थ आवृति दु:साध्य एवं अपवाद स्वरूप ही प्राप्त होती है। प्रत्येक आवृत्ति में शनि की साढ़ेसाती की सार्मथ्य अलग-अलग होती है। जीवन में साढ़ेसाती की प्रथम आवृत्ति अत्यंत प्रबल होती है। प्रभावित व्यक्ति कष्टों अवरोधों क्षतियों से आक्रांत होता है। जातक के जीवन में प्राप्त द्वितीय साढ़ेसाती का प्रभाव मारक न्यूनतम होता है। व्यक्ति थोडी सुविधा का अनुभव करता है। तृतीय आवृत्ति भीषण परिणामों से परिपूर्ण होती है। व्यक्ति अनेक अनापत्तियों से आक्रांत रहता है। शनि अपने क्रूर प्रभाव से जीवन का सर्वनाश करने पर आमादा होता है। आयुबल निर्बल हो तो जातक को जीवन हानि होती है। इस आक्रमण से कोई सौभाग्यशाली जातक ही अपने को सुरक्षित रख पाते हैं।

शनि की साढेसाती एक विश्लेषणः-
परम्परागत रूप से यह माना जाता है कि जन्मकालीन चन्द्रमा से द्वादश भाव में आते ही (शनि के) साढे़साती प्रारंभ हो जाती है। यह स्थूलरूप से सही हो सकती है किन्तु सूक्ष्म रूप से सही नहीं हो सकती। गोचर का शनि जब जन्मकालीन चन्द्रमा के आस-पास रहता है। तब साढ़ेसाती का प्रभाव जातक को प्रभावित करता है। गणितीय दृष्टि से जन्मकालीन चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला से 45 अंश पहले तथा 45 अंश बाद तक गोचर के शनि का भ्रमण साढ़ेसाती sadesati कहलायेगी। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है।

उदाहरण के लिए किसी जातक का चन्द्र स्पष्ट 4/10/18 है तो इस जातक के साढ़ेसाती कब प्रारंभ होगी।

राशि अंश कला
04 10 18’
01 15 00 (- 45 अंश = 1 राशि 15 अंश)

———————
02 25 18’

अर्थात मिथुन राशि में शनि के 25 अंश 18’ पर आते ही शनि की साढ़ेसाती प्रारंभ होगी। यह शनि की सा़ढ़ेसाती का प्रारंभ होगा। शनि की साढ़ेसाती कब तक रहेगी ? पुनः जन्मकालीन चन्द्रमा में 45 अंश जोड़कर गणना करेंगे :-

राशि अंश कला
04 10 18’
01 15 00 (+ 1 राशि 15 अंश)

————————
05 25 18’

अर्थात शनि जब तक कन्या राशि के 25 अंश 18’ तक गोचर करेंगे, तब तक शनि की साढ़ेसाती रहेगी।

किसी भी कुंडली के लिये शनि की साढे़साती sadesati का फलादेश बहुत कुछ जातक की कुंडली में शनि की स्थिति पर निर्भर करता है। कुंडली में शनि की स्थिति कैसी है, शनि उच्च है, नीच राशि में है, या मित्र, शत्रु, सम स्थिति का प्रभाव गोचर नियमों को प्रभावित करता है, अतः साढ़ेसाती फल कथन के समय अग्रलिखित नियमों को ध्यान में रखते हुए भविष्यवाणी की जाये तो फल कथन में उत्कृष्टता रहती है :-

✓ शनि जन्मांग में उच्चस्थ हो, स्वराशिस्थ हो, मित्र राशिस्थ हो या मूल त्रिकोणस्थ हो तो परिणामों में अपेक्षतया शुभता अधिक रहती है।

✓ जन्मांगीय शनि सबल और गोचरीय शनि दुर्बल हो तो परिणाम मध्यम रहता है।

✓ जन्मांगीय शनि निर्बल (नीचस्थ, शत्रुग्रही) हो और गोचरीय शनि भी दुर्बल हो तो अत्यधिक अप्रिय फल प्राप्त होते हैं।

✓ यदि गोचरीय शनि अवांछित अमंगल परिणाम प्रदान कर रहा हो तो अन्य ग्रहों से प्राप्त होने वाले शुभ फलों में भी न्यूनता होती है।

✓ यदि गोचरीय शनि अप्रिय फलदाता हो, और बृहस्पति सर्वदा शुभ फल प्रदाता हो तो अप्रिय फलों में कमी होती है।

✓ जिस समय गोचरीय शनि शुभ फल प्रदाता हो, और बृहस्पति अप्रिय फल प्रदाता हो तो-उसमें प्रायः अनुकूल परिणाम ही प्राप्त होते हैं।

✓ बृहस्पति एवं राहु के अप्रिय फल सूचित हों, और शनि अनुकूल परिणाम प्रदाता हो तो प्रिय फलों की मात्रा अधिक रहती है।

✓शनि की भीषणता जातकों को स्मरण मात्र से प्रकम्पित कर देती है। महाराजा दशरथ ने शनि की संहारक क्षमता का वर्णन इन शब्दों में किया है-

ब्रह्मा शक्रा हरिश्चैव ऋषयः सप्ततारकाः।
राज्यभ्रष्ट्राः पतन्त्येतो त्वया दृष्टयाऽवलोकिताः।।
देशाश्च नगर ग्राम द्वीपाश्चैव तथा दु्रमाः।
तव्या विलोकिताः सर्वे विनश्यन्ति समूलतः।।
प्रसादं कुरू हे सौरे! वरदो भव भास्करे।।

अर्थात :- ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु और सप्त ऋषि भी तुम्हारे दृष्टि निक्षेप से पदच्यूत हो जाते हैं। देश, नगर, गांव, द्वीप वृक्ष तुम्हारी दृष्टि से समूल विनष्ट हो जाते हैं। अतः हे सूर्यदेव के पुत्र शनिदेव! प्रसन्न होकर हमें मंगलमय वर प्रदान करो।

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नारायण नागबली

नारायण नागबली (संतान बाधा निवारण हेतु पितृ दोष का प्रभावशाली उपाय):-

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नारायण नागबली छविनारायण नागबलि ये दोनो अनुष्ठान पद्धतियां संतान सुख की अपूर्ण इच्छा, कामना पूर्ति के उद्देश से किय जाते हैं, इसीलिए ये दोनो अनुष्ठान काम्य प्रयोग कहलाते हैं। वस्तुत: नारायणबलि और नागबलि ये अलग-अलग पूजा अनुष्ठान हैं। नारायण बलि का उद्देश मुखत: पितृदोष निवारण करना है। और नागबलि का उद्देश सर्प शाप, नाग हत्या का दोष निवारण करना है। इन में से केवल एक नारायण बलि या नागबलि अकेले नहीं कर सकते, इस लिए ये दोनो अनुष्ठान एक साथ ही करने पड़ते हैं।

पितृदोष निवारण के लिए ही नारायण नागबलि अनुष्ठान करने के लिये शास्त्रों मे निर्देशित किया गया है । प्राय: यह अनुष्ठान जातक के पूर्वजन्म के दुर्भाग्य संबधी दोषों से मुक्ति दिलाने के लिए किये जाते हैं। ये अनुष्ठान किस प्रकार व कौन इन्हें कर सकता है? इसकी पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है। ये अनुष्ठान जिन जातकों के माता पिता जिवित हैं, वे भी विधिवत सम्पन्न कर सकते हैं, यज्ञोपवीत धारण करने के बाद कुंवारा ब्राह्मण यह अनुष्ठान सम्पन्न करा सकता है। संतान प्राप्ति एवं वंशवृद्धि के लिए ये अनुष्ठान सपत्नीक करने चाहीयें। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी ये कर्म किये जा सकते हैं। यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पाचवें महीने तक यह अनुष्ठान किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये अनुष्ठान एक साल तक नही किये जाते हैं। माता या पिता की मृत्यु् होने पर भी एक साल तक ये अनुष्ठान करने निषिद्ध माने गये हैं।

दोनों प्रकार यह अनुष्ठान एक साथ और निम्नलिखित इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए किये जाते हैं :-

1. काला जादू के प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए।
2. संतान प्राप्ति के लिए।
3. भूत प्रेत से छुटकारा पाने के लिए।
4. घर के किसी व्यक्ति की दुर्घटना के कारण मृत्यु होती है (अपघात, आत्महत्या, पानी में डूबना) इस की वजह से अगर घर में कोई समस्याए आती है तो, उन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है।

संतान प्राप्ति के लिए :-
सनातन मान्यता के अनुसार प्रत्येक दम्पत्ती की कम से कम एक पुत्र संतान प्राप्ति की प्रबल इच्छा होती है, और इस इच्छा की पूर्ति न होना दम्पत्ती के लिए बहुत दुःखदाई होता है, हालांकि इस आधुनिक युग में टेस्ट ट्यूब बेबी जैसी उपचार पद्धतियां उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ जोड़ों की कमाई के हिसाब से यह बहुत खर्चीली होती हैं। इस लिये बहुत से लोग इन महेंगे उपचारों के कारण खर्च करने में समर्थ नहीं होते, और कुछ इस के लिए कर्जा लेते हैं, लेकिन जब कभी इस महेंगे उपचारों का भी कोई लाभ नहीं होता, तब यह जोड़े ज्योतिषीयों के पास जाते हैं, और एक अच्छा अनुभवी ज्योतिषी ही इस समस्या का समाधान और उपचारों की विफलता का कारण बता सकता है।

शास्त्र कहते हैं :- जहां रोग है, वहां उपचार भी है। इसी नियम को ध्यान में रखते हुऐ हमारे पूर्वज ऋषियों ने इन समस्याओं के समाधान हेतु ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशेष उपाय सुझाए हुए है, सब से पहेले ज्योतिषी यह देखते हैं की इस की पीड़ित दंपति की जन्म कुंडली में संतान प्राप्ति का योग है या नहीं? अगर है, तो गर्भधारण करने में समस्या का कारण क्या है? जैसे की पूर्व जन्म के पाप, पितरों का श्राप, कुलविनाश का योग, इनमें से कोई विशेष कारण पता चलने के बाद वह उस समस्या का निराकरण सुझाते खोजते हैं। इन उपायों में से नारायण नागबली सर्वश्रेष्ठ उपाय माना जाता है। यदि यह अनुष्ठान उचित प्रकार से और मनोभाव से किया जाए, तो संतानोत्पत्ति की काफी संभावनाए हो जाती हैं।

भूत-प्रेत बाधा के कारण संतानोत्पत्ति में रूकावटें :-
कोई स्थाई अस्थाई संपत्ति जैसे के, घर जमीन या पैसा किसी से जबरन या ठग कर हासिल की जाती है तो, मृत्यु पश्चात् उस व्यक्ति की आत्मा उसी संपत्ति के मोह रहती है, उस व्यक्ति को मृत्यु पश्चात् जलाया या दफनाया भी जाए तो भी उस की इच्छाओं की आपूर्ति न होने के कारण उस की आत्मा को माया से मुक्ति नहीं मिल पाती, और वह आत्मा प्रेत योनी में भटकती है, और उस के पतन के कारण व्यक्ति को वह पीड़ा देने लगती है, यदि किसी शापित व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उसकी अंतेष्ठि विधि शास्त्रों अनुसार संपन्न न हो, या श्राद्ध न किया गया हो, तब उस वजह से उस से सम्बंधित व्यक्तिओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि– संतति का आभाव, यदि संतान होती भी है, तो उस का अल्प जीवी होना
संतति का ना होना ही है।

1. काफी कष्टों के बावजूद आर्थिक अड़चनों का सामना करना
खेती में नुकसान।
2. व्यवसाय में हानि, नौकरी छूट जाना, कर्जे में डूब जाना,
परिवार में बिमारीयाँ।
3. मानसिक या शारीरिक परेशानी, विकलांग संतति का जन्म होना, या अज्ञात कारणों से पशुधन का विनाश।
4. परिवार के किसी सदस्यों को भूत बाधा होना।
5. परिवार के सदस्यों में झगड़े या तनाव होना।
6. महिलाओं में मासिक धर्म का अनियमित होना, या गर्भपात होना।
ऊपर लिखे हुये सभी या किसी भी परेशानी से व्यक्ति झूंज रहा हो तोतो, उसे नारायण-नागबली करने की सलाह दी जाती है।

श्राप सूचक स्वप्न :-
कोई व्यक्ति यदि निम्नलिखित स्वप्न देखता है, तो वह पिछले या इसी जन्म में श्रापित होता है :-
1. स्वप्न में नाग दिखना, या नाग को मारते हुवे दिखना, या टुकड़ो में कटा हुवा नाग दिखना।
2. किसी ऐसी स्त्री को देखना, जिसके बच्चे की मृत्यु हो गई है, वह उस बच्चे के प्रेत के पास बैठ कर अपने बच्चे को उठने को कह रही है, और लोग उसे उस प्रेत से दूर कर रहे है।
3. विधवा या किसी रोगी सम्बन्धी को देखना।
4. किसी ईमारत को गिरते हुए देखना।
5. स्वप्न में झगड़े देखना।
6. खुद को पानी में डूबते हुये देखना।
इस प्रकार के स्वप्नों से मुक्ति पाने के लिए नारायण-नागबली अनुष्ठान किया जाता है। धर्मसिंधु और धर्मनिर्णय इन प्राचीन ग्रंथो में इस अनुष्ठान के विषय में लिखा हुआ है।

दुर्मरण :-
किसी भी प्रकार से दुर्घटना यदि मृत्यु का कारण हो, और अल्पायु में मृत्यु होना दुर्मरण कहा जाता है। किसी मनुष्य की इस प्रकार से मृत्यु उस मनुष्य के परिवार के लिए अनेक परेशानियों का कारण बनती है। निम्नलिखित कारण से आने वाली मृत्यु दुर्मरण कहलाती है :-

1. विवाह से पहले मृत्यु होना।
2. परदेस में मृत्यु होना।
3. गले में अन्न अटक कर श्वास रुकने से मृत्यु होना।
4. पंचक, त्रिपाद या दक्षिणायन काल में मृत्यु होना।
5. आग में जल कर मृत्यु होना।
6. किसी खतरनाक जानवर के हमले से मृत्यु होना।
7. छोटे बच्चे का किसी के हाथों मारा जाना।
8. पानी में डूब जाने से मृत्यु होना।
9. आत्महत्या करना।
10. आकाशीय बिजली गिरने या बिजली के झटके से मृत्यु।
यह सब कारण हैं, जिसके कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो, परिवार में आर्थिक, मानसिक वा शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं, इं परेशानियों को दूर करने के लिए परिजनों को नारायण-नागबली करवाने की सलाह दी जाती ।

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धूम उपग्रह

वृहत्पराशर होरा शास्त्र, आलेख- 1

धूम उपग्रह (भावस्थिति अनुसार फलादेश)

1. कुंडली में धूम यदि – प्रथम स्थान में हो तो, वह जातक निर्मल (सुंदर) नेत्र वाला, शूरवीर, हठी परंतु घृणा रहित, दुष्ट बुद्धि वाला और महाक्रोधी होता है।

2. कुंडली में धूम यदि – द्वितीय स्थान में हो तो, वह जातक धनवान परंतु रोगी, किसी अंग से हीन, राजपक्ष से चिंतित, मूर्खतापूर्ण व्यवहार वाला और कुछ मात्रा में नपुंसक होता है।

3. कुंडली में धूम यदि – तृतीय स्थान में हो तो, वह जातक बुद्धिमान, युद्ध की स्थिति में विचारपूर्ण नीति तय करने वाला, मिष्ठभाषी, शांतचित्त वाला और धनवान होता है।

4. कुंडली में धूम यदि – चतुर्थ स्थान में हो तो, वह जातक स्त्री से रति के समय निढाल या रतिरहित, चिंतनशील, शास्त्र अध्ययन में रूचि रखने वाला होता है।

5. कुंडली में धूम यदि – पंचम स्थान में हो तो, वह जातक कम संतान वाला, अल्पधनी, भारी शरीर वाला, शाकाहारी और मांसाहारी भी होता है, इसे मित्रता में अधिक रूचि नहीं होती।

6. कुंडली में धूम यदि – षष्ठ स्थान में हो तो, वह जातक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला, तेजस्वी, निरोगी और विख्यात् होता है।

7. कुंडली में धूम यदि – सप्तम स्थान में हो तो, वह जातक अल्प धनी, धोखाधड़ी में विश्वास रखने वाला और रूखे चेहरे वाला होता है।

8. कुंडली में धूम यदि – अष्टम स्थान में हो तो, वह जातक कठिनाई के समय हिम्मत हीन, दूसरे समय उत्साहित, सत्य में विश्वास रखने वाला तथा निष्ठुर या कठोर होता है।

9. कुंडली में धूम यदि – नवम स्थान में हो तो, वह जातक धनवान, मान-सम्मान वाला, प्रसिद्ध व्यक्तित्व, अपनों से स्नेह रखने वाला और एेशवर्यशाली होता है।

10. कुंडली में धूम यदि – दशम स्थान में हो तो, वह जातक संतान सुख तथा ऐश्वर्य से सम्पन्न, बुद्धिमान, सुखी और सत्य में विश्वास रखने वाला होता है।

11. कुंडली में धूम यदि – एकादश स्थान में हो तो, वह जातक धन और प्रचूर सम्पत्ति युक्त, कलाप्रेमी और गायन विद्या या वाद्य में निपुण होता है।

12. कुंडली में धूम यदि – द्वादश स्थान में हो तो, वह जातक दोषी, अपराध करने वाला, धोखाधड़ी वाला, दूसरी स्त्रीयों में रूचि वाला, नशे के वशीभूत और दुष्टप्रवृती वाला होता है।

(आलेख- 19-07-2018)

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दो मुखी रुद्राक्ष, 2 Mukhi Rudraksh

दो मुखी रूद्राक्ष, 2 Mukhi Rudraksh Nepal, 2 Mukhi Rudraksh Original Nepal,

Dr.R.B.Dhawan,Astrological Consultant, specialist: marriage problems, top best astrologer in delhi

असुराचार्य shukracharya का कथन है कि- दो मुखी रूद्राक्ष अर्धनारिश्वर स्वरूप है, यह शिव तथा शक्ति दोनो का संयुक्त रूप है। इसे धारण करने से भगवान शिव तथा पार्वती दोनों ही प्रसन्न होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष गोहत्या के पाप से मुक्ति दिलाता है, तथा यह मन और मस्तिष्क को सन्तुलित रखता है, Dr.R.B.Dhawan अपने अनुभवों के आधार पर कहते हैं- इसको धारण करने से मनुष्य की बुद्धि सक्रिय होती है, तथा घर में हर प्रकार की सुख-सुविधा उपलब्ध होती है। इसको धारण करने से पति-पत्नी में एकात्मय भाव उत्पन्न होता है, यह रूद्राक्ष श्रद्धा एवं विश्वास का स्वरूप है। यह व्यापार में सफलता दिलाता है। आचार्य shukracharya लिखते हैं- दो मुखी रूद्राक्ष सांसारिक ऐश्वर्य व उपलब्धियां कराता है, तथा घर से क्लेश की जड़ को दूर करता है। दो मुखी रूद्राक्ष शिव और पार्वती का सम्मिलित स्वरूप है। इस रूद्राक्ष को धारण करने वाले व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। इस रूद्राक्ष की अद्भुत शक्ति से धारक का मन मस्तिष्क संतुलित रहता है। Dr.R.B.Dhawan के अनुसार शिवपुराण में दो मुखी रूद्राक्ष के लिए कहा गया है कि यह बेहद दुर्लभ और कल्याणकारी रूद्राक्ष है। नेपाल के द्विमुखी रूद्राक्ष चपटे, आँख की आकृति के होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष नेपाल में काफी कम होता है, तथा बहुत मँहगा भी होता है, इसलिये दो मुखी रूद्राक्ष रामेश्वरम का ही अधिक देखने को मिलता है। दो मुखी रूद्राक्ष को धारण करने से भगवान् शिव तथा माता पार्वती दोनों ही प्रसन्न होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष गोहत्या के पाप से मुक्ति दिलाता है, तथा यह मन मस्तिष्क दोनों को सन्तुलित रखता है। दो मुखी रूद्राक्ष अर्ध-नारीश्वर स्वरूप है, इसे शिव-शिवा रूप भी कह सकते हैं, दोमुखी रूद्राक्ष साक्षात् अग्नि स्वरूप हैं, जिसके शरीर पर ये प्रतिष्ठित करके धारण किया होता है, आचार्य shukracharya का मानना है कि उसके जन्म जन्मांतर के पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे अग्नि ईंधन को जला डालती है।

इस रूद्राक्ष के धारण करने से कुंडली में चन्द्रमा से उत्पन्न सभी दोषों का निवारण हो जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से चन्द्रमा हृदय, फेफडा, मन, वामनेत्र, गुर्दा, भोजन नली इत्यादि का कारक है। चन्द्रमा की प्रतिकूल स्थिति तथा दुष्प्रभाव के कारण हृदय तथा फेफड़ों के रोग हो सकते हैं। बांयी आँख की खराबी, खून की कमी, जल सम्बन्धी रोग, गुर्दा कष्ट, मासिक धर्म के रोग, स्मृति-भ्रंश इत्यादि रोग भी हो सकते हैं। इसके दुष्प्रभाव से दरिद्रता तथा मन मस्तिष्क विकार भी होते हैं। गुणों के हिसाब से यह मोती से कई गुना अधिक प्रभावी है। दो मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाले धारक के परिजन परस्पर आदर व श्रद्धा की सतत् वृद्धि अनुभव करते हैं। द्विमुखी रूद्राक्ष शिक्षक व छात्र के बीच, पिता व पुत्र के बीच, पति व पत्नी के बीच या मित्रों में मतभेद मिटाता है, और एकात्मता उत्पन्न करता है। धारक शांतिमय पारिवारिक जीवन जीने के लिये सक्षम बन जाता है। इस रूद्राक्ष में अंर्तगर्भित ऐसी विद्युत तरंगें होती हैं कि जिन के प्रभाव से यह रूद्राक्ष सभी शारीरिक व्याधियों से रक्षा करता है, गुरू जी (Dr.R.B.Dhawan) अपने अनुभव लिखते हुए आगे कहते हैं- इस रूद्राक्ष को धारण करने से इनकम/सेल्स टैक्स अधिकारी व्यापारी को व सरकारी नौकरी वालों को उनके अधिकारी बेकार परेशान नहीं करते इस लिये इन्हें यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिये। यह शरीर की गर्मी को निकालता है, इससे रक्तचाप नियंत्रण में रहता है। मन मस्तिष्क की बीमारी भी सही हो जाती हैं। दो मुखी रूद्राक्ष को देवेश्वर भी कहा जाता है। दो मुखी रूद्राक्ष दांपत्य जीवन सुखमय बनाने के लिये अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। शिव और शक्ति की उपासना करने वाले को यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिये। इस रूद्राक्ष के स्वामी ग्रह चंद्रदेव हैं।

दो मुखी रूद्राक्ष धारण मंत्र- ॐ नमः ॐ शिव शक्तिभ्यां नमः।
चैतन्य करने का मंत्र- ॐ क्षी हृो क्षौं वो ॐ।।
उपयोग- आदर्श पारिवारिक जीवन, शांतिपूर्ण व स्थाई संबधों के लिये।

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पंद्रह मुखी रूद्राक्ष, 15 Mukhi Rudraksh

पंद्रह मुखी रूद्राक्ष, 15 Mukhi Rudraksh Nepal, 15 Mukhi Rudraksh Original Nepal,

Dr.R.B.Dhawan (गुरूजी) astrologer, Astrological Consultant, specialist : marriage problems, top best astrologer in delhi

रक्ष जाति के आचार्य shukracharya का वचन है कि- पंद्रहमुखी रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ रूद्राक्षों की श्रेणी में आता है। यह रूद्राक्ष परम प्रभावशाली तथा अल्प कालावधि में ही शिवजी को प्रसन्न करने वाला रूद्राक्ष है, यह रूद्राक्ष साक्षात् देवमणि है। गुरू जी (Dr.R.B.Dhawan) और पुराणों के अनुसार पंद्रह विद्या, का साक्षात रूप है। इसमें महादेव की विशेष शक्ति निहित होती है, इसलिये नवग्रहों से उत्पन्न दोष इसे धारण करने मात्र से शांत होते हैं। यह रूद्राक्ष कठिन से कठिन परिस्थितियों में धारण करने वाले का मार्गदर्शन करता है। जो व्यक्ति इस रूद्राक्ष को कंठ के मध्य में धारण करते हैं, वह सर्वत्र पूजित होते हैं, और अंत समय वे स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। चमड़ी के जटिल से जटिल रोगों को दूर करने की इसमें शक्ति है। धारक को आत्मरक्षा करने में समर्थ बनाता है। यह रूद्राक्ष धारक को हानि, दुर्घटना, जटिल रोग, आर्थिक चिन्ता से मुक्त रखकर धारक को सुरक्षा-समृद्धि देता है। वैसे तो यह रूद्राक्ष सभी जटिल रोगों को दूर करने वाला माना गया है, फिर भी Dr.R.B.Dhawan के अनुभव अनुसार इस रूद्राक्ष में पौरुष रोग को दूर करने की महान शक्ति है। इसी लिए दुर्बल पुरुष के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, और इसीलिये इस की मांग अधिक होने से यह अधिक मूल्यावान भी होता है। वैसे भी यह रूद्राक्ष बहुत ही कम मात्रा में उत्पन्न होता है, और इसकी मांग इसकी उपलब्धता से कहीं अधिक है। पंद्रहमुखी रूद्राक्ष स्वास्थ्य लाभ, रोगमुक्ति और शारीरिक तथा मानसिक-व्यापारिक उन्नति में सहायक होता है। धारण करने पर आध्यात्मिक तथा भौतिक सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इस रूद्राक्ष को धारण करने से शत्रुओं का नाश होता है, इस लिए यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक है, यह समस्त रोगों का हरण करने वाला, सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला है। इसके धारण करने से कुल की मर्यादा और कुल वृद्धि अवश्य होती है। इससे बल और उत्साह का वर्धन होता है, और निर्भयता प्राप्त होती है, तथा संकट काल में सरंक्षण भी प्राप्त होता है। पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति सदा सही निर्णय लेता है, और संकटों, कुपरिस्थितियों एवं चिंताओं से छुटकारा पाता है, धारणकर्ता में विशेष ओजस गुणों का विकास होने लगते हैं। यह शास्त्रोक्त सत्य है कि जिसने पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण कर लिया, उसेे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है, और गृहस्थ जीवन भी अच्छा होता है। गर्भपात रूक जाता है, व गुणवान संतान उत्पन्न होती है।

पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण का मंत्र है- ॐ पशुपतय नम:’ मंत्र का 108 बार जाप करते हुए धारण करें।
लाभ- अलौकिक मार्गदर्शन, जटिल और पौरुष रोगों की शांति।

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चौदह मुखी रूद्राक्ष, 14 Mukhi Rudraksh

चौदह मुखी रूद्राक्ष, 14 Mukhi Rudraksh Nepal, 14 Mukhi Rudraksh Original Nepal,

Dr.R.B.Dhawan (गुरूजी) Astrologer, Astrological Consultant, specialist : marriage problems, top best astrologer in delhi

असुराचार्य shukracharya के अनुसार- चौदह मुखी रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ रूद्राक्षों की श्रेणी में आता है। परम प्रभावशाली तथा अल्प समय में ही शिवजी को प्रसन्न करने वाला यह चौदह मुखी रूद्राक्ष साक्षात् देवमणि है। Dr.R.B.Dhawana जी का कथन है कि- पुराणों में वर्णित है कि यह रूद्राक्ष चौदह विद्या, 14 लोक, 14 मनु का साक्षात् रूप है। इसमें हनुमानजी की शक्ति भी निहित होती है, इसलिये शनि से संबंधित सभी दोष इसे धारण करने मात्र से शांत होते हैं। यह रूद्राक्ष आज्ञाचक्र का नियन्ता है। जो व्यक्ति इस रूद्राक्ष को कपाल के मध्य में धारण करते हैं, उनकी पूजा देवता और ब्राह्यण करते हैं, और वे निर्वाण (स्वर्ग) को प्राप्त हो जाते हैं। यह शिवजी तीसरे नेत्र के समान है, और धारक को आत्म रक्षा एवं कार्य के सही नियोजन में सहायक बनाता है। यह रूद्राक्ष धारक को हानि, दुर्घटना, रोग, चिन्ता से मुक्त रखकर साधक को सुरक्षा-समृद्धि देता है, यह रूद्राक्ष सभी रूद्राक्षों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, और इसीलिये यह अधिक मूल्यावान होता है। ये बहुत ही कम संख्याओं में उत्पन्न होता है, और इसकी मांग इसकी उपलब्धता से कहीं अधिक होती है। चौदह मुखी रूद्राक्ष shukracharya संस्थान में उपलब्ध है, क्योंकि इस रूद्राक्ष को स्वयं भगवान शिव ने धारण किया था, इसे धारण करने से परिवार का कल्याण होता है, चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष स्वास्थ्य लाभ, रोगमुक्ति और शारीरिक तथा मानसिक-व्यापारिक उन्नति में सहायक होता है। 14 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से आध्यात्मिक लाभ तथा भौतिक सुख तथा सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इस रूद्राक्ष को मस्तक पर धारण करना चाहिये। जो मनष्य इसे मंत्र सिद्ध करके धारण करते हैं, वह रूद्रलोक में जाकर बसते हैं। इससे परमपद की प्राप्ति होती है, शत्रुओं का नाश होता है, बैकुंठ की प्राप्ति होती है। यह जेल भय से मुक्ति भी दिलाता है। यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक है, यह समस्त रोगों का हरण करने वाला सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला है। इसके धारण करने से वंशवृद्धि अवश्य होती है। इससे बल और उत्साह का वर्धन होता है। इससे निर्भयता प्राप्त होती है, और संकट काल में सरंक्षण प्राप्त होता है। विपत्ति और दुर्घटना से बचाव के लिये हनुमान जी (रूद्र) के प्रतीक माने जाने वाले इस 14 मुखी रूद्राक्ष को अवश्य प्रयोग करना चाहिये। चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष धारक को भविष्य देखने की दृष्टि प्रदान करता है, यह ‘देवमणि’ रूद्राक्ष है। चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति सदा सही निर्णय लेता है, और संकटों, कुपरिस्थितियों एवं चिंताओं से छुटकारा पाता है, तथा भूत-पिशाच, डाकिनी, शाकिनी का प्रकोप उसके निकट भी नहीं आता। धारणकर्ता में विशेष गुण विकसित होने लगते हैं। यह आचार्य shukracharya द्वारा शास्त्रोक्त सिद्ध है कि जिसने 14 मुखी रूद्राक्ष धारण कर लिया, शनि जैसा प्रतिकूल ग्रह भी अनुकूल हो जाता है। चौदह मुखी रूद्राक्ष की माला पुरूष या स्त्री द्वारा धारण करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है, और गृहस्थ जीवन भी अच्छा होता है। ग्यारह मुखी तथा चौदह मुखी दोनों रूद्राक्ष की माला को पेट पर बांधने से बार-बार हो जाने वाला गर्भपात नहीं होता। और उच्च कोटि की संतान उत्पन्न होती है।

14 मुखी रूद्राक्ष धारण का मंत्र है- ॐ नमः ॐ हनुमते नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ औं हस्फ्रें हसख्फ्रें। इस मंत्र से रूद्राक्ष को चैतन्य कर धारण करना चाहिये।
उपयोग- यह रूद्राक्ष भविष्य दर्शन, कल्पना शक्ति एवं ध्यान में सहायक है।

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गणेश रूद्राक्ष, Ganesh Rudraksh

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गणेश रूद्राक्ष की पहचान यह है कि उस पर प्राकृतिक रूप से एक उभरी हुई सूंड की आकृति बनी रहती है, जैसा कि भगवान गणेश के मुख पर होती है।

सृष्टि का नियम है कि हमेशा से पढ़ने लिखने का युग रहा है, जिसके पास विद्या है, वह सम्माननीय होता है, एवं जिसके पास ज्ञान है वही पूजनीय होता है। समाज में लोग उसे आदर की दृष्टि से देखते हैं, Ganesh Rudraksha की यह विशेषता है की पढ़ने-लिखने वालों के लिये यह वरदान साबित होता है, तथा बच्चों के लिये भी अद्भुत रूप से लाभदायक होता है। आसुर गुरु shukracharya का कथन है कि गणेश रुद्राक्ष को धारण करने से स्मरण शक्ति तीव्र होती है, इस विषय में Dr.R.B.Dhawan का मानना है कि ganesh Rudraksha को धारण करने से विद्यार्थी को पढ़ा-लिखा याद रहता है, तथा बच्चों का पढ़ाई में मन लगता है, जिससे कि वह अच्छे अंकों से पास हो सकते हैं, तथा प्रतियोगिता परीक्षा में भी अद्भुत रूप से सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

जो बच्चे प्रतियोगिता परीक्षा में या फिर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें गणेश रूद्राक्ष ganesh Rudraksha अवश्य ही धारण करना चाहिये, ताकि वे अपने लक्ष्य तक पहुँच सकें, जिससे कि वह अपने जीवन में उच्च पद की प्राप्ति कर सकने में समर्थ हों। Ganesh Rudraksha धारण करने वाले पर श्री गणेश की विशेष अनुकम्पा होती है। धारण करने वाले व्यापारियों को यह बुद्धि, रिद्धि-सिद्धि प्रदान कर व्यापार में आश्चर्यजनक प्रगति देते हैं। यह रूद्राक्ष विघ्न-बाधाओं से रक्षा करता है। गणेश रूद्राक्ष ganesh Rudraksha को धारण करने से धारक का भाग्योदय होता है। सन्तान प्राप्ति में बाधा एवं वैवाहिक विलम्ब दूर हो जाते हैं। गणेश रूद्राक्ष के धारक को इसके चमत्कारी प्रभाव शीघ्र ही दिखाई देते हैं। विघ्न विनाशक गणेश माँ पार्वती एवं देवाधि देव भगवान शंकर की पूर्ण कृपा प्रदायक ये रूद्राक्ष दिव्य है, परम दुर्लभ भी है, विशेष रूप से संतान बाधा child problems एवं पुत्र-पुत्री के विवाह में आ रही बाधा को निश्चित रूप से दूर करके अविलम्ब कार्य सिद्धि प्रदान करता है। यह ‘गणेश रूद्राक्ष’ दुर्लभ होता है। इस रूद्राक्ष में 4, 5, 6, 7 या 8 धारियों के बीच में गणेश जी की शूंड की तरह का आकार बना होता है, अष्टमुखी और एकादश मुखी गणेश रूद्राक्ष का महत्व अधिक है, और इसे विशेष परिस्थितियों में ही धारण किया जाता है। व्यापार के लिए इसे बहुत शुभ मानते हैं। इसलिये यह अष्टमुखी गणेश रूद्राक्ष कहलाता है। इस रूद्राक्ष में अष्टसिद्धियों का एवं अष्टमातृकाओं का वास होता है, एवं नौ ग्रह में राहु देव का प्रतीक होता है, अतः जिस किसी जातक का जब राहु अशुभ हो, अथवा राहु की महादशा चल रही हो, उसे इस अष्टमुखी गणेश रूद्राक्ष को गले में धारण करना चाहिये इससे राहु अनुकूल प्रभाव देने लगता है।

देवगुरु बृहस्पति ओर आसुर गुरु shukracharya के अनुसार – अष्ठ मुखी गणेश रूद्राक्ष अत्यंत ही दुर्लभ एवं अद्भुत रूप से भाग्योदय कारक रूद्राक्ष होता है। अष्टमुखी रूद्राक्ष में गणेश रूद्राक्ष मिलना काफी कठिन होता है, अगर जिस किसी को यह प्राप्त हो जाये तो समझो उसके सौभाग्य का द्वार खोलने से उसे कोई नहीं रोक करता है तथा अद्भुत रूप से भाग्य उसका साथ देने लगता है। गणेश जी की कृपा से धारक को ऋद्धि-सिद्धि, बुद्धि, बल, चतुर्य की प्राप्ति एवं समस्त शत्रुओं का नाश होता है। पर सभी रूद्राक्ष उपलब्ध हैं।

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