नक्षत्र और वनस्पति

 नक्षत्रों के लिए निर्धारित पेड़ पौधे :-


Dr.R.B.Dhawan

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक नक्षत्र के वृक्षों का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। उपाय की दृष्टि से जो जातक अपने जन्म नक्षत्र के वृक्षों  या पौधों को रोपित करता है, अथवा सींचता है, या उनका भरण पोषण करता है, उसकी आयु के साथ ऐश्वर्य व धन धान्य में भी वृद्धि होती है। ज्योतिष शास्त्र में 27 नक्षत्रों के जो वृक्ष बताए गये है, उसके अनुसार अश्वनी नक्षत्र के लिए कुचला का वृक्ष, भरणी नक्षत्र के लिए आंवला, कृतिका के लिए गूलर व स्वर्णशीरी, मृगशिरा के लिए खैर, आर्द्रा नक्षत्र का वृक्ष बहेडा, रोहणी के लिए जामुन व तुलसी बताया गया है । इसी प्रकार पुनर्वसु नक्षत्र के लिए बांस, पुष्य नक्षत्र के लिए पीपल, अश्लेशा के लिए नागकेसर, मघा के लिए बड़, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के लिए ढाक (पलास) का वृक्ष, तथा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के लिए रूद्राक्ष या पाकर लगाना उपयोगी माना जाता है। 13 वें स्थान के नक्षत्र हस्त में जन्में व्यक्ति रीठा व पाढ का वृक्ष, चित्रा नक्षत्र वाले बेल नारियल, स्वाती के लिए अर्जुन का वृक्ष, विशाखा नक्षत्र के लिए भटकटैया, अनुराधा नक्षत्र के लिए बकुल या मौलश्री, ज्येष्ठा नक्षत्र के लिए चीड़ या देवदारू व लोध का वृक्ष लगा सकते है। इसी प्रकार मूल नक्षत्र के लिए साल का वृक्ष, पूर्वाषाढ़ा के लिए अशोक या जलवेंत, उत्तराषाढा नक्षत्र के लिए कटहल या फालसा लगायें। श्रवण के लिए आक लगाये, धनिष्ठा नक्षत्र के लिए शमी लगाएं, शतभिषा नक्षत्र के लिए कदम्ब, पूर्वा भाद्रापदा नक्षत्र के लिए आम लगायें, उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र के लिए नीम तथा रेवती नक्षत्र के लिए महुआ का वृक्ष लगाना लाभकारी होता है। 

इस प्रकार सरल उपाय करके एक तरफ जहां हम पर्यावरण संरक्षण में सहायता करेंगे वहीं हम भौतिक, अध्यात्मिक तथा परलौकिक लाभ प्राप्त करने के लिए वृक्षारोपण कर अपने तथा समाज व देश के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे होंगे।

नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़-पौधे :-

1. अश्विनी –            कुचला

2. भरणी–               आंवला 

3. कृतिका –             गूलर

4. रोहिणी –             जामुन 

5. मृगशिरा –            खैर 

6. आर्द्रा–                शीशम 

7. पुनर्वसु –              बांस 

8. पुष्य –                  पीपल 

9. अश्लेषा –             नागकेसर

10. मघा –                  वट

11. पूर्वाफाल्गुनी –      पलास

12. उत्तराफाल्गुनी –    पाकड़

13. हस्त –                  रीठा

14. चित्रा –                 बेल

15. स्वाती-                 अर्जुन

16 विशाखा –            भटकटैया 

17. अनुराधा –            मौलसरी

18. ज्येष्ठा –                चीड़  

19. मूल –                   साल

20. पूर्वाषाढ़ा –            अशोक 

21. उत्तराषाढ़ –           फालसा

22. श्रवण –                मदार 

23. धनिष्ठा –               शमी

24. शतभिषा –            कदम्ब 

25. पूर्वभाद्रपद–          आम

26. उत्तराभाद्रपद –       नीम 

27. रेवती –                 महुआ


बारह राशि के पेड़-पौधे :-

मेष –        आंवला 

वृष –         जामुन

मिथुन –    शीशम

कर्क –       नागकेश्वर

सिंह –       पलास

कन्या –     रीठा

तुला –      अर्जुन

वृश्चिक –  मौलसरी

धनु –      जलवेतस

मकर –     अकोल

कुंभ –       कदम्ब 

मीन –       नीम

ग्रहों के पेड़ -पौधे :-

सूर्य –      अकोल

चन्द्रमा –  पलास

मंगल –    खैर

बुद्ध –     चिरचिरी

गुरु –      पीपल

शुक्र –     गुलड़

शनि –    शमी

राहु –      दुर्वा

केतु –     कुश

ग्रह, राशि, नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़ पौधे का प्रयोग करने से अंतश्चेतना में सकारात्मक सोच का संचार होता है, तत्पश्चात हमारी मनोकामनायें शनै शनै पूरी होती है ।

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​ज्योतिष रोग और उपाय

Dr.R.B.Dhawan

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर बीमारी का समबन्ध किसी न किसी ग्रह से है, जो आपकी कुंडली में या तो कमजोर है, या फिर दुसरे ग्रहों से बुरी तरह पीड़ित है। यहाँ इस लेख में मैं सभी रोगों की चर्चा नहीं कर पाऊंगा, इसके लिए मेरी पुस्तक “रोग एवं ज्योतिष” का अध्ययन करने की सलाह दूंगा। यहां केवल सामान्य रोग जो आजकल बहुत से लोगों को हैं, उन्ही की चर्चा संक्षेप में करने की कोशिश करता हूँ। यदि स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है तो, आज धनवान कोई नहीं है, हर किसी को कोई न कोई रोग होता ही है। हर व्यक्ति के शरीर की संरचना अलग होती है। किसे कब क्या कष्ट होगा? यह तो डाक्टर भी नहीं बता सकता, परन्तु ज्योतिष इसकी पूर्वसूचना अवश्य दे देता है कि जातक कब और किस रोग से पीड़ित हो सकता है, या क्या व्याधि आपको शीघ्र प्रभावित करने वाली है। आईये ग्रहों की कमजोर स्थिति से कौन कौन से रोग हो सकते हैं जाने :-

सूर्य से संबंधित रोग  :-

सूर्य ग्रहों का राजा है, इसलिए यदि सूर्य आपका बलवान है तो बीमारियाँ कुछ भी हों आप कभी परवाह नहीं करेंगे, क्योंकि आपकी आत्मा बलवान होगी, और आप में आत्मबल भरपूर होगा। आप शरीर की मामूली व्याधियों की परवाह नहीं करेंगे। परन्तु सूर्य अच्छा नहीं है, कमजोर है तो, सबसे पहले आपके बाल झड़ेंगे, सर में दर्द अक्सर होगा और आपको अक्सर दर्द-निवारक का सहारा लेना ही पड़ेगा।

चन्द्रमा से सम्बन्धित रोग :-

चन्द्रमा संवेदनशील लोगों का अधिष्ठाता ग्रह है। यदि चन्द्रमा दुर्बल हुआ तो मन कमजोर होगा, और जातक भावुक अधिक होगा, कठोरता से तुरंत प्रभावित हो जाता है, और उसमें सहनशक्ति भी कम होगी। इसके बाद सर्दी जुकाम और खांसी कफ जैसी व्याधियों से शीग्र प्रभावित हो जायेगा, एसे लोगों को सलाह है कि संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में न आयें क्योंकि उनको भी संक्रमित होते देर नहीं लगेगी। चन्द्रमा अधिक कमजोर होने से नजला से पीड़ित होंगे, चन्द्रमा की वजह से नर्वस सिस्टम भी प्रभावित होता है।

मंगल से सम्बन्धित रोग :-

मंगल रक्त में ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है, परन्तु जिनका मंगल कमजोर होता है, रक्त की बीमारियों के अतिरिक्त जोश की कमी होगी। ऐसे व्यक्ति हर काम को धीरे-धीरे करेंगे, आपने देखा होगा कुछ लोग हमेशा सुस्त दिखाई देते हैं, और हर काम को भी उस ऊर्जा से नहीं कर पाते, अधिक खराब मंगल से चोट चपेट और एक्सीडेंट आदि का खतरा भी बना रहता है।

बुध से सम्बन्धित रोग :-

अच्छा बुध वाक्-चातुर्य और व्यक्ति को चालाक बनाता है, और कमजोर बुध बुद्धू या धूर्त बनाता है, आज के समय में यदि आप में वाक्-चातुर्य नहीं है तो दुसरे लोग आपका हर दिन फायदा उठाएंगे। भोले भाले लोगों का बुध अवश्य कमजोर होता है। अधिक खराब बुध से व्यक्ति को एलर्जी व चमड़ी के रोग अधिक होते हैं, नर्वसनेस, साँस की बीमारियाँ बुध के दूषित होने से होती हैं। बेहद खराब बुध से व्यक्ति के फेफड़े खराब होने का भय रहता है। व्यक्ति हकलाता है तो भी बुध के कारण और गूंगा बहरापन भी बुध के कारण ही होता है।

बृहस्पति से सम्बन्धित रोग :-

बृहस्पति जातक को ज्ञान देता है, विद्वान बनाता है, बुद्धिमान बनता है, परन्तु पढ़े लिखे लोग यदि मूर्खों जैसा व्यवहार करें तो, समझ लीजिये कि इस व्यक्ति का बृहस्पति कुंडली में खराब है। बृहस्पति सोचने समझने की शक्ति को प्रभावित करता है, और व्यक्ति जडमति हो जाता है। इसके अतिरिक्त बृहस्पति कमजोर होने से पीलिया या पेट के अन्य रोग होते हैं। बृहस्पति यदि दुष्ट ग्रहों से प्रभावित होकर लग्न को प्रभावित करता है तो, मोटापा देता है। अधिकतर लोग जो शरीर से काफी मोटे होते हैं, उनकी कुंडली में गुरु की स्थिति कुछ ऐसी ही होती है।

शुक्र से सम्बन्धित रोग :-

शुक्र मनोरंजन तथा एशो-आराम का कारक ग्रह है। शुक्र स्त्री, यौन सुख, वीर्य और हर प्रकार के सुख और सुन्दरता का कारक ग्रह है। यदि शुक्र की स्थिति कमजोर हो तो, जातक के जीवन से सुख के साधन तथा मनोरंजन को समाप्त कर देता है। नपुंसकता या सेक्स के प्रति अरुचि का कारण अधिकतर शुक्र ही होता है। मंगल की दृष्टि या प्रभाव निर्बल शुक्र पर हो तो, जातक को ब्लड शुगर हो जाती है। इसके अतिरिक्त शुक्र के अशुभ होने से व्यक्ति के शरीर को बेडोल बना देता है। बहुत अधिक पतला शरीर या ठिगना कद शुक्र की अशुभ स्थिति के कारण होते हैं।

शनि से सम्बन्धित रोग :-

शनि दर्द या दुःख का करता  ग्रह है, जितने प्रकार की शारीरिक व्याधियां हैं, उनके परिणामस्वरूप व्यक्ति को जो दुःख और कष्ट प्राप्त होता है, उसका कारक शनि होता है। शनि का प्रभाव दुसरे ग्रहों पर हो तो शनि उसी ग्रह से सम्बन्धित रोग देता है। शनि की दृष्टि सूर्य पर हो तो जातक कुछ भी कर ले सर दर्द कभी पीछा नहीं छोड़ता। चन्द्र पर हो तो जातक को नजला-जुकाम रहता है। मंगल पर हो तो, रक्त में न्यूनता या ब्लडप्रेशर, बुध पर हो तो नपुंसकता, गुरु पर हो तो मोटापा, शुक्र पर हो तो वीर्य के रोग या प्रजनन क्षमता को कमजोर करता है, और राहू पर शनि के प्रभाव से जातक को उच्च और निम्न रक्तचाप दोनों से पीड़ित    होना पड़ता है। केतु पर शनि के प्रभाव से जातक को गम्भीर रोग होते हैं, परन्तु कभी रोग का पता नहीं चलता, और एक उम्र निकल जाती है, पर बीमारियों से जातक जूझता रहता है। दवाई असर नहीं करती, और अधिक विकट स्थिति में लाइलाज रोग शनि ही आकर देता है |

राहू से सम्बन्धित रोग:-

राहू एक रहस्यमय ग्रह है, इसलिए राहू से जातक को जो रोग होंगे वह भी रहस्यमय ही होते हैं। एक के बाद दूसरी तकलीफ राहू से ही होती है। राहू अशुभ हो तो जातक की दवाई चलती रहती है, और डाक्टर के पास आना जाना लगा रहता है। किसी दवाई से रिएक्शन या एलर्जी राहू से ही होती है। यदि डाक्टर पूरी उम्र के लिए दवाई निर्धारित कर दे तो वह राहू के अशुभ प्रभाव से ही होती है। वहम यदि एक बीमारी है तो यह राहू देता है। डर के मारे हार्ट-अटैक राहू से ही होता है। अचानक हृदय गति रुक जाना या स्ट्रोक राहू से ही होता है।

केतु से सम्बन्धित रोग :-

केतु का संसार अलग है। यह जीवन और मृत्यु से परे है। जातक को यदि केतु से कुछ होना है तो, उसका पता देर से चलता है, यानी केतु से होने वाली बीमारी का पता चलना मुश्किल हो जाता है। केतु थोडा सा खराब हो तो, फोड़े फुंसियाँ देता है, और यदि थोडा और खराब हो तो, घाव जो देर तक न भरे वह केतु की वजह से ही होता है। केतु मनोविज्ञान से सम्बन्ध रखता है। ऊपरी असर या भूत-प्रेत बाधा केतु के कारण ही होती है। असफल इलाज के बाद दुबारा इलाज केतु के कारण आरंभ होता है।

नोट :- “रोग एवं ज्योतिष” इस सम्बन्ध में गम्भीरता से विचार करके अधिक से अधिक कुंडलियों का अध्ययन करने के पश्चात् यह किताब लिखी है। ज्योतिष के विद्यार्थियों को इस पुस्तक का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।

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बेलपत्र और भगवान शिव

बेल का वृक्ष और भगवान शिव :- 

Dr.R.B.Dhawan

बेलपत्र को संस्कृत में ‘बिल्वपत्र’ कहा जाता है, यह औषधी गुणों से भरपूर वृक्ष भगवान शिव को प्रिय है, पौराणिक मान्यता है कि बेलपत्र और जल से भगवान शंकर का अभिषेक करने से और पूजा में इनका प्रयोग करने से शिव जल्द प्रसन्न होते हैं। बेलपत्र का तोड़ने के लिए पुराणों में ऐसे निर्देश दिए गए हैं, जिससे धर्म का पालन भी हो जाये और वृक्षों का संरक्षण भी हो जाए, यही कारण है कि देवी-देवताओं को अर्पित किए जाने वाले फूल और पत्रों को तोड़ने के कुछ नियम हैं, बेलपत्र तोड़ने के भी कुछ नियम हैं :-  

1. चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथ‍ियों को, सं‍क्रांति के समय और सोमवार को बेलपत्र न तोड़ें। 

2. भगवान शंकर को बेलपत्र चढ़ाने के लिए इन तिथ‍ियों या वार से पहले तोड़ा गया पत्र ही चढ़ाना चाहिए।  

3. शास्त्रों में कहा गया है कि अगर नया बेलपत्र न मिल सके, तो किसी दूसरे के चढ़ाए हुए बेलपत्र को भी धोकर कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है। 

अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:।
शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि क्वचित्।।
(स्कंदपुराण) 

4. टहनी से चुन-चुनकर सिर्फ बेलपत्र ही तोड़ना चाहिए, कभी भी पूरी टहनी नहीं तोड़नी चाहिए। पत्र सावधानी से तोड़ना चाहिए कि वृक्ष को कोई हानि न पहुंचे। 

5. बेलपत्र तोड़ने से पहले और बाद में वृक्ष को मन ही मन प्रणाम करना चाहिए।

कैसे चढ़ाएं बेलपत्र :- भगवान शिव को बेल पत्र प्रिय हैं ही। साथ ही भगवान शिव के अंशावतार हनुमान जी को भी बेलपत्र अर्पित किया जा सकता है, भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाने से घर की धन-दौलत में वृद्धि होने लगती है, अधूरी कामनाएं पूर्ण होती हैं।

शिव पुराण के अनुसार सावन के सोमवार को शिवालय में बेलपत्र चढ़ाने से एक करोड़ कन्यादान के बराबर फल मिलता है।
बेलपत्र का वृक्ष हर कामना को पूरी करता है। यही नहीं उसके पत्तों को गंगा जल से धोकर उन्हें बजरंगबली पर अर्पित करने से अनेक तीर्थों का फल मिलता है।

बिल्व वृक्ष (बेल के पेड़) की जड़ सफेद धागे में पिरोकर रविवार को गले में धारण करने से रक्तचाप, क्रोध और असाध्य रोगों से रक्षा होती है। 
बिल्व वृक्ष का पूजन पाप व दरिद्रता का अंत कर वैभवशाली बनाने वाला माना गया है। घर में बेल पत्र लगाने से देवी महालक्ष्मी बहुत प्रसन्न होती हैं।

बेल पत्तों को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। इन्हें अपने पास रखने से कभी धन-दौलत का अभाव नहीं होता।

शिव पुराण के अनुसार :-  1. बिल्व वृक्ष के आसपास सर्प नहीं आते ।  

2. यदि किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर
गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है ।

3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता
सबसे अधिक बिल्व वृक्ष में होती है ।

4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला
परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल
मिलता है ।

5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल
वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है। 

6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता
है। 

7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।

8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट
लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। 

9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि
स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे । 

10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी
शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त
हो जाते है । 

11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव
से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को
चढ़ाने से क्या फल मिलता है :-

1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।

3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।यह सभी अन्न भगवान
को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए। 

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन सा रस
(द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है :-

1. ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से
शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी
जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2. नपुंसक व्यक्ति अगर शुद्ध घी से भगवान शिव का अभिषेक
करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो
उसकी समस्या का निदान संभव है।

3. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को
चढ़ाएं।

4. सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में
वृद्धि होती है।

5. शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों
की प्राप्ति होती है।

6. शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति
होती है।

7. मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा
(टीबी) रोग में आराम मिलता है।

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन का फूल
चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है :-

1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने
पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।

3. अलसी के फूल से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान
विष्णु को प्रिय होता है।

4. शमी पत्र (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती
है।

6. जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की
कमी नहीं होती।

7. कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।

8. हारसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि
होती है।

9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र
प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशनकरता है।

10. लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है। 

11. दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

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Aap Ka Bhavishya

Aap ka bhavishya एक एंड्रॉयड मोबाइल ऐप है, इस ऐप को लांच करने का प्रयोजन ज्योतिषीय मासिक “ई-पत्रिका” का प्रचार-प्रसार करना है। क्योंकि एक मासिक ज्योतिषीय पत्रिका के माध्यम से वैदिक विद्याओं या विषयों का प्रचार-प्रसार करना सरल है। यह प्रचार-प्रसार ज्ञानवर्धक लेखों‌ के रूप में पाठकों तक पहुंचाने का कार्य Aap Ka Bhavishya मासिक ज्योतिषीय “ई-पत्रिका” कर सकती है, इस ऐप के माध्यम से “Aap Ka Bhavishya” e-magazine के 12 अंक एक वर्ष में प्रकाशित लिए जाते हैं, इस लिए कोई भी Subscriber’s  एक वर्ष के लिए इस Astrological Magazine की Subscription ले सकता हैं। 

गुरुजी (Dr.R.B.Dhawan) ने “आप का भविष्य” हिन्दी मासिक ज्योतिषीय पत्रिका का प्रकाशन एवम् संपादन 2000 ईसवी सन् के जनवरी महिने से आरंभ किया था। 2000 से 2016 तक यह मैगजीन प्रिंट करके publish की जाती रही है, जो कि अब वर्ष 2017 से e-magazine के रूप में हर माह प्रकाशित हो रही है। गुरुजी का मानना है की “ज्योतिष विद्या” मनुष्य को भविष्य के लिए उपयोगी मार्गदर्शन देती रही है, साथ ही साथ ज्योतिष विज्ञान की सहायता से मनुष्य अपने भविष्य के लिए ठीक से planning भी कर सकता है। देखा जाए तो ज्योतिष ही एकमात्र ऐसा विज्ञान है, जो हमें हमारे भविष्य का संकेत देते हुए भविष्य के लिए उचित मार्गदर्शन देकर हमारी सहायता कर सकता है। ये विद्या हमारे ऋषियों-मुनियों के सैकड़ों वर्षों की खोज का परिणाम या उपलब्धि है। हमारे इन भविष्य-दृष्टा ऋषियों-मुनियों ने मानव जाति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने मानव जाति के विकास के लिए सैकड़ों विद्याओं को विकसित किया है, जिन्हें हम आज भी किसी ना किसी रूप में प्रयोग कर रहे हैं।

इस ज्योतिषीय पत्रिका Aap Ka Bhavishya में इन सभी वैदिक विद्याओं के आलेख प्रकाशित किए जाते रहे हैं, वे विद्या चाहे ज्योतिष हो, या आयुर्वेद अथवा मंत्र शास्त्र मनुष्य के आर्थिक-मानसिक-शारीरिक विकास में इनका एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है, और इस क्रम का बने रहना आवश्यक है, इसी लिए गुरुजी का मानना है कि, जब तक जीवन है, तब तक मानव जाति को ऋषियों-मुनियों की इस धरोहर का लाभ पहुंचना एक श्रेष्ठ कार्य होगा। और अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए गुरुजी Dr.R.B.Dhawan निरंतर इस प्रकाशन-संपादन के कार्य में अपना अधिकतम समय देते हैं। गुरुजी का मानना है कि अब समय आ गया है कि, इन सभी विद्याओं को नई Tachnology से जोड़ा जाए। “आप का भविष्य” को “ई-पत्रिका” में परिवर्तित करना इसी श्रंखला की एक कड़ी है, गुरुजी के इस पुनीत कार्य में Para Digital Technologies के सहयोग को कभी भुलाया नही जा सकता। जिस कम्पनी ने Aap Ka Bhavishya ज्योतिषीय पत्रिका को “ई-पत्रिका” का रूप देते हुए इस App की रचना और डिजाइन किया है, इस कार्य के लिए Mr. Pradeep Dhawan द्वारा की गई मेहनत सराहनीय है। इन्होंने अथक परिश्रम करते हुए अपना कीमती समय लगाया है। Para Digital Tachnology और Mr.Pradeep Dhawan जी के इस विशेष योगदान के लिए Shukracharya संस्थान सदा आभारी रहेगा।

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सैक्स और ज्योतिष

Dr.R.B.Dhawan

इस आलेख में कुछ ऐसे ज्योतिषीय योगों का उल्लेख कर रहा हूं, जो किसी जातक की कुंडली में यदि हैं, तो उस योग को बनाने वाले ग्रह जातक को सामान्य से अधिक कामुक sexy होने का संकेत देते हैं –

1. किसी भी जातक की लग्न कुंडली में मंगल+शुक्र की युति काम वासना को उग्र कर देती है, जन्म के ग्रह जन्मजात प्रवृति की ओर इशारा करते हैं, और वह जातक इस के प्रभाव से आजीवन प्रभावित-संचालित होता है। किसी व्यक्ति में इस भावना का प्रतिशत कम हो सकता है, और किसी में ज्यादा हो सकता है। ज्योतिष के विश्लेषण के अनुसार यह पता लगाया जा सकता है की जातक में काम भावना किस मात्रा में विद्यमान है। 

लग्न / लग्नेश :
1. यदि लग्न और बारहवें भाव के स्वामी एक हो कर केंद्र /त्रिकोण में बैठ जाएँ या एक दूसरे से केंद्रवर्ती हो या आपस में स्थान परिवर्तन कर रहे हों तो पर्वत योग का निर्माण होता है । इस योग के चलते जहां व्यक्ति भाग्यशाली , विद्या -प्रिय ,कर्म शील , दानी , यशस्वी , घर जमीन का अधिपति होता है, वहीं अत्यंत कामी और कभी कभी पर स्त्री गमन करने वाला भी होता है ।

2. यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो, तो ऐसे व्यक्ति की रूचि विपरीत सेक्स के प्रति अधिक होती है । उस व्यक्ति का पूरा चिंतन मनन ,विचार व्यवहार का केंद्र बिंदु उसका प्रिय ही होता है । 

3.तुला राशि में चन्द्रमा और शुक्र की युति जातक की काम वासना को कई गुणा बड़ा देती है । अगर इस युति पर राहु/मंगल की दृष्टि भी तो जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। 

4 तुला राशि में चार या अधिक ग्रहों की उपस्थिति भी  is baat का कारण बनती है ।  

5 सप्तम भाव में शुक्र की उपस्थिति जातक को कामुक बना देती है ।
शुक्र के ऊपर मंगल /राहु का प्रभाव जातक को काफी लोगों से शरीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए उकसाता है । 

6.शुक्र/मंगल के साथ युति जातक में काम वासना को काफी बड़ा देती है । 

7 शुक्र मंगल की उपस्थिति 8 /12 भाव में हो तो, जातक कामुक होता है । 

8. कामवासना बढ़ाने में द्वादश भाव के स्वामी का मुख्य रोल होता है अगर इस का स्वामी सप्तम भाव में आए या लग्न में आजाये और वह मुख्यत: शुक्र या मंगल हो, ऐसा जातक स्वभाव से लंपट और  बहुत सारी स्त्रियों से रिश्ता रखता है 4 7 या 12वे में हो, अथवा ईन दोनों ग्रहों का संबंध बन रहा हो तो, यह जातक के अत्यंत कामी sexy होने का संकेत है। ये ग्रह अधिक बलवान हों तो, जातक समय और दिन-रात की मर्यादा भूलकर सदैव सेक्स sex को आतुर रहता है। मंगल जोश है, और शुक्र भोग अतः इन दोनों की युति होने पर अधिकांश कुंडलियों में ये प्रभाव सही पाया गया है। ये बात वैध और अवैध दोनों संबंधो पर लागू होती है। 

9. कुंडली का चतुर्थ भाव सुख का होता है, सातवा भाव गुप्तांग secret part को दर्शाता है और 12वां भाव शय्या सुख…! अतः सप्तमेश और व्ययेश की युति 4, 7 या 12 में हो तो, जातक/जातिका अतिकामुक होते हैं। 

10. जातिका की कुंडली में यदि सप्तम में शुक्र+राहू या चंद्र+राहू हो और 12वें में गुरु हो तो, अधिकतर मामलो में पाया गया है कि शादी के बाद भी अवैध शारीरिक संबंध बनते हैं। तब संभावना और बड़ जाती है यदि वे सरकारी/प्राइवेट नौकरी में हो। 

11. जातक/जातिका की कुंडली में गुरु और शुक्र समसप्तक हो तो भी वे अतिकामुक योग है, और ये योग वैवाहिक जीवन married life के निजी सुखो personal relationship में वृद्धि करता है। जातक के मामले में यदि मंगल और शुक्र समसप्तक हो तो ये योग की सार्थकता सिद्ध होती है। 

12. नपुसंकता में सबसे बड़ा योगदान शनि और बुध का है, अतः यदि ये दोनों ग्रह सप्तम में हैं, या सप्तम पर दृष्टि दे रहे हैं तो, जातक/जातिका सेक्स sex के मामले में नीरस और अयोग्य होते हैं। जातक में उत्तेजना की कमी होती है। यदि 12वे भाव में ये युति हो या इन दोनों ग्रहों का दृष्टि संबंध हो तो, जातक शीघ्रपतन का रोगी होता है। और जतिका के मामले में वे ठंडी होती है। ये स्थिति और भी गंभीर हो सकती है, यदि राहू 1,7, 8 में हो तो,जातक व्यसन का आदि होकर अपनी जवानी धुएँ में उड़ा देता है। 

13. जातक की कुंडली में यदि सप्तम में राहू+शुक्र हों तो जातक के शुक्राणु sperm तेजहीन होते हैं, और संतान प्राप्ति हेतु बहुत संघर्ष करना होता है। संतान “दिव्यांग” भी पैदा हो सकती है।

14. जातिका की कुंडली में यदि सप्तम में मंगल+राहू हो या इन दोनों का एक साथ दृष्टि संबंध सप्तम में हो तो, जातिका को श्वेतप्रदर और अनियमित माहवारी period का कष्ट होता है। यदि मंगल ज्यादा बलवान हो तो माहवारी period के दौरान बहुत अधिक रक्तश्राव bleeding होता है। 

नोट- ये ज्योतिषीय योग हर मामले में लागू नहीं होते, ज्योतिष में भी कुछ मामले अपवाद होते हैं।
मेरे और लेख देखें :- aapkabhavishya.in तथा astroguruji.in पर।

Dr.R.B.Dhawan

जब मैंने पहली पुस्तक लिखी- “गुरूजी के टोटके” (यह मेरी पहली पुस्तक थी) जो मैंने 2005 में लिखी थी। इस पुस्तक के लिये मैने लेख “छोटे-छोटे कामयाब टोटके इक्ट्ठे करने थे, परंतु इसके लिये मुझे तलाश थी कम से कम 60 से 100 वर्ष पुरानें हिन्दी के पंचांगों की। मुझे पूरा यकीन था एैसे लेख “टोटके” पुराने पंचांगों में बेहतरीन मिल सकते हैं, परंतु इतने पुराने जमाने के पंचांग मिलेंगे कहां ? एक दिन अचानक मुझे एक कबाड़ी के गोदाम की ओर देखने से कुछ बहुत पुराने परंतु जिल्दों में सहेजे हुये पुराने पंचांगों के बहुत सारे अंक मिल गये। बस मन की इच्छा जैसे पूर्ण हो गई, कबाड़ी वाले ने बाद में बताया की एक विद्वान बुजुर्ग ब्राह्मण की मृत्यु के बाद उसकी पूरी लायब्रेरी को वह कबाड़ी खरीद लाया था। बस मेरे लिये तो वह एक खजाना साबित हुआ। एक वर्ष की मेहनत के बाद “गुरूजी के टोटके” 1500 शानदार तथा हर समस्या के लिये एक-से-एक लाजवाब टोटकों से युक्त यह पुस्तक छपकर तैयार थी।
अब इस पुस्तक को शानदार लुक मैं देना चाहता था। अनेक सुंदर जिल्दों में से लाल रंग की जिल्द पर गोल्डन कलर से पुस्तक का नाम लिखवाने के बाद तो जैसे इस पुस्तक को चार चांद लग गये हों। पुस्तक के बाजार मे उतारते ही भारी सफलता मिली। हाथों-हाथ 1000 पुस्तकें बिक गई, खूब ख्याति भी मिली, और उपयोगी ज्योतिषीय विषयों पर पुस्तकें लिखने की प्रेरणा भी मिली, आज 10 वर्ष के बाद ईश्वर कृपा से 10 अन्य पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, पाठकों से बहुत प्यार मिल रहा है।
मेरी सभी ज्योतिष और उपाय की पुस्तकें http://www.shukracharya.com पर उपलब्ध हैं।

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Vashikaran Tantra

By best Astrologer in India:- वशीकरण एक ऐसा शब्द है, जो रहस्यमय लगता है, शायद इसी लिए हर कोई इसका प्रयोग कर अपना कार्य सिद्ध करना चाहता है। आज के युग में अधिकांश लोग इसे बकवास मानते हैं।

पौराणिक काल में इस विद्या का मानव जीवन पर कितना प्रभाव रहा है ? या इसका भी कोई विज्ञान है ? यही जानने का प्रयास करते है : – वशीकरण vashikaran क्रिया का ये रहस्य समझने के लिए सबसे पहले अपने शारीरिक, अपने मन तथा अपने मस्तिष्क की कार्यपद्धति के रहस्य को समझना होगा, जिसके द्वारा हम सोचने और समझने की शक्ति रखते है, और हम कल्पना करने की क्षमता रखते है, अपने मन में शुभ या अशुभ विचार लाते हैं। तो ऐसी कौन सी शक्ति या क्रिया है, जिसके द्वारा हम लोगों के मन पर अपना प्रभाव डाल सकते हैं, अथवा ऐसी क्षमता प्राप्त करके दूसरों को वशीभूत vashibhut कर सकते हैं। आइए इस विज्ञान को समझें :- 

पहले तो ये जान लीजिए “वशीकरण” शब्द अधूरा है, पूर्ण शब्द “वशीभूत” है, वशीकरण vashikran शब्द तो वशीभूत vashibhut क्रिया के लिए के लिए प्रयोग होता है। किसी दूसरे मनुष्य या प्राणी को वशीभूत करने के लिए पंचभूत सिद्धांत को समझना होगा, क्योंकि मनुष्य शरीर पांच भूतों से बना है, 1. पृथ्वी 2. अग्नि 3. वायु  4. जल और 5. आकाश, ये सभी पंचभूत हैं। ये सभी परस्पर बलवान हैं, इनमें सबसे बलवान आकाश भूत है, आकाश अर्थात आत्मा (आत्मा का निवास मस्तिष्क भाग में है)। वशीभूत vashikrat होने के पश्चात वशीभूत vashibhut होने वाले मनुष्य या प्राणी के मस्तिष्क पर वशीभूत करने वाले मनुष्य का आकाश भूत अपना अधिकार कर लेता है, और वे वशीभूत vashikrat करने वाले की किसी निश्चित समय के लिए संबंधित (केवल प्रयोजन से संबंधित) आज्ञा का पालन करने लगता है, अर्थात यह अधिकार वशीकृत करने वाले को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होता, अपितु जिस स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए वशीकृत किया जाता है, केवल उसी विशेष प्रयोजन के लिए जितना भाग (आकाश तत्व का भाग) ही वशीकृत होता है। किसी विशेष प्रयोजन, कर्म या क्रिया के लिए, और किसी निश्चित अवधि के लिए ही किसी को वशीकृत किया जा सकता है। पूरी तरह इस विज्ञान को (इस पद्धति को) बिना समझे हम वशीकरण vashikaran की क्रिया को नहीं समझ सकते है, ना ही इस क्रिया को सफल बना सकते है।

यहां वशीकरण vashikaran का एक ‘तंत्र प्रयोग’ प्रस्तुत कर रहे है, आवश्यकता होने पर इस तंत्र प्रयोग को आप सम्पन्न कर सकते हैं, और कभी-कभी एेसा प्रयोग करना जरूरी हो जाता है :-
यहां तंत्र का एक सरल vashikaran ‘वशीकरण प्रयोग’ दे रहा हूँ, यह प्रयोग बहुत प्रभावशाली है, इस प्रयोग का अन्य ‘तांत्रिक प्रयोग’ की तरह कोई दुष्प्रभाव भी नहीं है, परंतु यह सफल तभी होता है जब इस ‘तंत्र प्रयोग’ का नाजायज इस्तेमाल नहीं किया जाये।
सरल वशीकरण Easy vashikaran – जब कोई अधिकारी, मालिक, रिश्ते में सम्बंधी अथवा पति या पत्नी नाराज हो जायें, तब उन्हें मनाना जरूरी हो जाता है। एेसे में कठिनाइयां अधिक हो रही हों, तब यह ‘तंत्र प्रयोग’ प्रयोग जायज है।
प्रयोग व सामग्री-
एक पीपल का पत्ता, अनार की कलम, लाल चंदन की लकड़ी, एक थाली, एक आचमनी या चम्मच, और एक तांबे का लोटा।
रात्रि में पवित्र भाव से एक शुद्ध आसन पर उत्तराभिमुख होकर बैठें, सामने एक थाली में पीपल के पत्ते पर लाल चंदन की स्याही से अनार की कलम द्वारा जिसका वशीकरण करना हो, उसका नाम लिखकर पत्ता उल्टा करके रख दें। लोटा जो जल से भरा हो, उसमें से एक-एक आचमनी या चम्मच पानी लेकर पीपल के पत्ते पर एक-एक मंत्र का उच्चारण करते हुये डालते रहें, 108 बार जल मंत्र पढ़ते हुये डालना है। मंत्र पाठ के समय दुर्गा वेशधारी माता गायत्री का ध्यान करें।
साधारण अवस्था में यह प्रयोग एक सप्ताह (सात दिन) में ही अपना प्रभाव दिखा देता है, परंतु यदि समस्या गहरी हो तो, अधिक दिन भी करना पड़ता है।
मंत्र- ॐ क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

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paralysis (पक्षाघात भाग-1)

By best Astrologer in India, पक्षाघात, लकवा या फालिज़ में शरीर के दाहिने या बायें या फिर किसी पार्शव के कुछ या सब अंग क्रियाहीन या चेतनाहीन हो जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह रोग वायु के कूपित हो जाने के कारण होता है। अंग्रेजी भाषा में इसे paralysis कहा जाता है, इसमें तंत्रिका-तंत्र संस्थान nerves system के कार्य में बाधा या कार्यक्षमता की क्षीणता हो जाती है।
फलित ज्योतिष में तंत्रिका-तंत्र संस्थान nerves system से सम्बंधित रोगों का सूचक बुध ग्रह है। इस बुध ग्रह के कारकत्व में तंत्रिका-तंत्र तथा स्नायु प्रदेश के लिये कारक ग्रह शनि है, इस स्नायु प्रदेश तथा तंत्रिका-तंत्र के बाधित होने के पीछे कुण्डली में बुध ग्रह पर शनि ग्रह का प्रभाव होता है। शनि ग्रह जब कुण्डली के बुध ग्रह पर अपना दूषित प्रभाव डाल रहा हो तब शरीर के किसी अंग का संज्ञाहीन होना या अंगहीनता होती है। शनि ग्रह स्वंय लंगडा ग्रह माना गया है। इस के साथ-साथ कुण्डली में रोग का विचार छटे भाव या या उस भाव के कारक शनि एवं मंगल से किया जाता है। इसी प्रकार राशि वर्ग की छटी राशि कन्या भी इस रोग के निर्धारण में विचारणीय मानी जाती है। कुण्डली के आठवें और बारहवें भाव का विचार भी आवश्यक है, क्योकि इनसे यह जानने में सहायता मिलती है कि रोग दीर्घकाल तक चलेगा या अल्प काल तक? पक्षाघात paralysis या लकवा मुख्यतः एक जटिल रोग है, जातक की कुंडली मे इस रोग की कितनी संभावना है? यह जानने के लिये कुछ ज्योतिष के ग्रन्थों में ग्रहयोग वर्णित हैं- यदि कुण्डली का लग्न कन्या है, और लग्न व लग्नेश बुध अशुभ ग्रहों से पीड़ित है तो, तंत्रिका-तंत्र nerves system पर अवश्य इस रोग का आक्रमण संम्भव है। धनु या कुम्भ के मामले में भी इस रोग का आक्रमण हो सकता है। यह राशियां अशुभ ग्रहों द्वारा पीड़ित होने पर ही इस रोग की सूचना देती हैं। अशुभ शनि छटे भाव में पैर के रोग की ओर संकेत करता है, जातक लचक कर या लंगडाकर चलता है। यह पक्षाघात के अलावा जन्म से या फिर पैर में कोई गंभीर चोट लगने से भी हो सकता है।
(Dr.R.B.Dhawa द्वारा लिखित नई प्रकाशित पुस्तक के अंश।)
क्रमशः           

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medical astrology

By best Astrologer in India:- ज्योतिषीय उपचार-  मानव जीवन के साथ ही रोग का इतिहास भी आरम्भ हो जाता है, रोगों से रक्षा हेतु मानव ने प्रारम्भ से ही प्रयास आरम्भ कर दिया था। तथा आज तक इसके निदान एवं उपचार हेतु प्रयत्न कर रहा है। जब हैजा, प्लेग, टी. बी. आदि संक्रामक रोगों से ग्रस्त होकर इनसे छुटकारा पाने के लिये विविध प्रकार का अन्वेषण हुआ तो कालांतर में पुनः कैंसर एड्स, डेंगू,  स्वाईन फ्लू, ओर फिर ईबोला जैसे अनेक नये रोग पैदा हो गये हैं, जिनके समाधान एवं उपचार हेतु आज समस्त विश्व प्रयत्नशील है। विडंबना है कि मनुष्य जितना ही प्राकृतिक रहस्यों को खोजने का प्रयत्न करता है, प्रकृति उतना ही अपना विस्तार व्यापक करती चली जाती है। जिससे समाधान के समस्त प्रयास विश्व के लिये नगण्य पड़ जाते हैं, इसका एक कारण मनुष्य में सदाचार का आभाव भी प्रतीत होता है।
हमारे ऋषियों ने जहां अणुवाद, प्रमाणुवाद को  व्याखयायित किया, अध्यात्म की गहराइयों में गोता लगाया, सांख्य के प्रकृति एवं पुरूष से सृष्टि प्रक्रिया को जोड़ा, वहीं आकाशीय ग्रह नक्षत्रों को अपनी समाधी से कोसों दूर धरती पर बैठकर वेधित किया, तथा उनके धरती पर पड़ने वाले शुभाशुभ प्रभाव को मानव जीवन तथा रोगों के साथ जोड़कर व्याखयायित भी किया। विश्व के सर्वप्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद से रोगों का परिज्ञान आरम्भ हो जाता है। जिसमें पाण्डूरोग, ह्रदय रोग, उदररोग, एवं नेत्ररोग की चर्चा प्राप्त होती है। पौराणिक कथाओं में तो विविध रोगों की चर्चा एवं उपचार के लिये औषधि, मंत्र एवं तंत्र आदि का प्रयोग प्राप्त होता है। आर्ष परम्परा में तो रोगों के विनिश्चयार्थ ज्योतिषीय, शास्त्रीय ग्रहयोगों सहित आयुर्वेदीय परम्परा का प्रयोग दर्शनीय है।
मेरी यह पुस्तक “रोग एवं ज्योतिष” (medical astrology) जिसमें अधिकांश रोगों के ज्योतिषीय कारण या कह लीजिये रोगों के ग्रहयोग जो प्राचीन तथा नवीन खोजों पर आधारित हैं दिये गये हैं, साथ ही इन रोगों की शास्त्रीय मंत्रादि द्वारा उपचार भी यथासम्भव दिया गया है। मेरे विचार से यह पुस्तक ज्योतिष का रोगात्मक अध्ययन करने वाले विद्वानों तथा खोज करने, अनुसंधान करने वालो के लिये बहुत सहायक होगी।

       शुक्राचार्य संस्थान द्वारा ज्योर्तिविज्ञान के साथ साथ सरल उपाय की कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित की गई हैं, जिन में प्रमुख हैं —
1. गुरूजी के टोटके
2. गुरूजी की साधनाएँ
3. वास्तु सूत्र
4. कैसे बदलें भाग्य
5. दुर्लभ समृद्धि प्रदायक वस्तुयें
6. भृगु संहिता योग एंव फलादेश
7. लाल किताब योग एंव उपाय
8. ज्योतिष के योग फलादेश
9. रोग एवं ज्योतिष
10. विवाह एवं दाम्पत्य सुख

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