रूद्राक्ष धारण के लाभ

Dr.R.B.Dhawan

जब जब हम रूद्राक्ष के विषय में जानकारी चाहते हैं, तब तब कुछ शंकायें सामने आ खड़ी होती हैं, यह रुद्राक्ष असली है या नकली? रूद्राक्ष की जांच कैसे की जाये?

रूद्राक्ष के विषय में एक मिथक अधिक प्रचलित है :- “असली रूद्राक्ष को जल में डालने से वह डूब जाता है” रूद्राक्ष पानी में डालने पर वह डूब जाये तो असली अन्यथा नकली। वास्तव में यह परीक्षा है ही नहीं, यह परीक्षा मिथ्या है।

1. जो रूद्राक्ष का फल पूरा समय पेड़ पर नहीं रह पाता, पहले ही टूटकर गिर जाता है, एेसे फल की गुठली हल्की रह जाती है, और जो रूद्राक्ष अच्छी प्रकार पक कर गिरता वह रूद्राक्ष का दाना ठोस और भारी और कठोर रूद्राक्ष हो जाता है। इस प्रकार ठोस और भारी दाना पानी में नीचे बैठ जाता है। और जो दाना पूरा नहीं पक पाता वह हल्का रूद्राक्ष पानी में डालने पर तैर जाता है। इसलिए इस प्रक्रिया से रूद्राक्ष के पके या कच्चे होने का पता तो लग सकता है, परंतु असली या नकली होने का नहीं। हां कच्चा दाना हल्का रूद्राक्ष गुणवत्ता में इसलिये भी कमजोर होता है, क्योंकि यह पके दाने की तुलना में कम समय में टूट जाता है, अर्थात् इसकी कठोरता कम होने से इसकी आयु भी लम्बी नहीं होती। जबकि पूरा पका और भारी और कठोर दाना कच्चे दाने की तुलना में कहीं अधिक समय तक चलता है (शीघ्र टूटता नहीं)। इसी लिये इस का मूल्य भी कम पके रूद्राक्षों से दो-तीन गुना तक अधिक होता है। वैसे कम पके या अधिक पके रूद्राक्ष में से किसी को भी धारण किया जाये आध्यात्मिक लाभ दोनो से बराबर ही प्राप्त होता है।

2. तांबे का एक टुकड़ा नीचे रखकर उसके ऊपर रूद्राक्ष रखकर फिर दूसरा तांबे का टुकड़ा रूद्राक्ष के ऊपर रख दिया जाये और एक अंगुली से हल्के से दबाया जाये तो असली रूद्राक्ष नाचने लगता है। यह पहचान हमेशा प्रमाणिक है।

3. शुद्ध सरसों के तेल में रूद्राक्ष को डालकर 10 मिनट तक गर्म किया जाये तो असली रूद्राक्ष अधिक चमकदार हो जायेगा और यदि नकली (लकड़ी से बना रूद्राक्ष) है तो वह धूमिल हो जायेगा, या टूट जायेगा।

4. प्रायः गहरे रंग के रूद्राक्ष को अच्छा माना जाता है, और हल्के रंग वाले को नहीं। वास्तव में रूद्राक्ष का छिलका उतारने के बाद सभी रूद्राक्षों पर रंग चढ़ाया जाता है। बाजार में मिलने वाले रूद्राक्ष की मालाओं को पिरोने के बाद पीले रंग से रंगा जाता है। रंग कम होने से कभी-कभी हल्का रह जाता है। काले और गहरे भूरे रंग के दिखने वाले या फिर घिसे हुये रूद्राक्ष इस्तेमाल किए हुए हो सकते हैं।

5. नेपाली रूद्राक्षों में प्राकृतिक रूप से छेद होता है, नेपाली रूद्राक्ष बहुत शुभ माने जाते हैं। जबकि जावा या इन्डोनेशिया के ज्यादातर रूद्राक्षों में छेद करना पड़ता है। इंडोनेशिया के रूद्राक्षों का प्रभाव नेपाली की तुलना में कम शुभ माना जाता है।

6. नकली रूद्राक्ष के उपर उभरे पठार एकरूप हों तो वह नकली रूद्राक्ष है। असली रूद्राक्ष की उपरी सतह कभी भी एकरूप नहीं होगी। जिस तरह दो मनुष्यों के फिंगरप्रिंट एक जैसे नहीं होते, उसी प्रकार दो रूद्राक्षों के उपरी पठार समान नहीं होते। हां नकली रूद्राक्षों में कितनों के ही उपरी पठार समान होते हैं।

7. कुछ रूद्राक्षों पर शिवलिंग, त्रिशूल या सांप आदी बने होते हैं। यह प्राकृतिक रूप से नहीं बने होते बल्कि कुशल कारीगरी का नमूना होते हैं। अल्प मूल्य वाले रूद्राक्षों पर कलाकारी द्वारा यह आकृतियां बनाई जाती हैं।

8. कभी-कभी दो या तीन रूद्राक्ष प्राकृतिक रूप से जुड़े होते हैं। इन्हें गौरी शंकर रुद्राक्ष या गौरी पाठ रूद्राक्ष कहते हैं। इनका मूल्य काफी अधिक होता है इस कारण इनके नकली होने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है। कुशल कारीगर दो या अधिक रूद्राक्षों को मसाले से चिपकाकर इन्हें गौरी शंकर या गौरी पाठ रूद्राक्ष बना देते हैं।

9. कभी कभी पांच मुखी रूद्राक्ष के चार मुंहों को मसाला से बंद कर एक मुखी कह कर भी बेचा जाता है जिससे इनकी कीमत बहुत बढ़ जाती है। ध्यान से देखने पर मसाला भरा हुआ दिखायी दे जाता है। कभी-कभी पांच मुखी रूद्राक्ष को कुशल कारीगर और धारियां बना अधिक मुख का (7 या 8 मुख का) बना देते हैं। जिससे इनका मूल्य बढ़ जाता है।

10. प्रायः बेर की गुठली पर रंग चढ़ाकर उन्हें असली रूद्राक्ष की माला कहकर बेच दिया जाता है। रूद्राक्ष की मालाओं में बेर की गुठली का उपयोग बहुत किया जाता है।

11. रूद्राक्ष की पहचान का तरीका- एक कटोरे में पानी उबालें। इस उबलते पानी में 45 मिनट के लिए रूद्राक्ष डाल दें। कटोरे को चूल्हे से उतारकर ढक दें। दो चार मिनट बाद ढक्कन हटा कर रूद्राक्ष निकालकर ध्यान से देखें। यदि रूद्राक्ष में जोड़ लगाया होगा तो वह फट जाएगा। दो रूद्राक्षों को चिपकाकर गौरीशंकर रूद्राक्ष बनाया होगा या शिवलिंग, सांप आदी चिपकाए होंगे तो वह अलग हो जाएंगे। जिन रूद्राक्षों में सोल्यूशन भरकर उनके मुख बंद करे होंगे तो उनके मुंह खुल जाएंगे। यदि रूद्राक्ष प्राकृतिक तौर पर फटा होगा तो थोड़ा और फट जाएगा। बेर की गुठली होगी तो नर्म पड़ जाएगी, जबकि असली रूद्राक्ष में अधिक अंतर नहीं पड़ेगा। यदि रूद्राक्ष पर से रंग उतारना हो तो उसे नमक मिले पानी में डालकर गर्म करें उसका रंग हल्का पड़ जाएगा। वैसे रंग करने से रूद्राक्ष की गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पडता है।

रूद्राक्ष कितने मुखी तक मिलते हैं :-

रूद्राक्ष एकमुखी से लेकर सत्ताईस मुखी तक पाए जाते हैं। रूद्राक्ष पर पड़ी धारियों के आधार पर ही इनके मुखों की गणना की जाती है। रूद्राक्ष एकमुखी से लेकर सत्ताईस मुखी तक पाए जाते हैं, जिनके अलग-अलग महत्व व उपयोगिता हैं।

1. एक मुखी रुद्राक्ष:- को साक्षात शिव का रूप माना जाता है। इस एक मुखी रुद्राक्ष द्वारा सुख-शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। तथा भगवान आदित्य का आशिर्वाद भी प्राप्त होता है।

2. दो मुखी रुद्राक्ष:- या द्विमुखी रुद्राक्ष शिव और शक्ति का स्वरुप माना जाता है,वइस अर्धनारीश्व का स्वरूप समाहित है तथा चंद्रमा सी शीतलता प्रदान होती है।

3. तीन मुखी रुद्राक्ष:- को अग्नि देव तथा त्रिदेवों का स्वरुप माना गया है। तीन मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, तथा पापों का शमन होता है।

4. चार मुखी रुद्राक्ष:- ब्रह्म स्वरुप होता है। इसे धारण करने से नर हत्या जैसा जघन्य पाप समाप्त होता है। चतुर्थ मुखी रुद्राक्ष धर्म, अर्थ काम एवं मोक्ष को प्रदान करता है।

5. पांच मुखी रुद्राक्ष:- कालाग्नि रुद्र का स्वरूप माना जाता है। यह पंच ब्रह्म एवं पंच तत्वों का प्रतीक भी है। पांच मुखी को धारण करने से अभक्ष्याभक्ष्य एवं परस्त्रीगमन जैसे पापों से मुक्ति मिलती है। तथा सुखों की प्राप्ति होती है।

6. छह मुखी रुद्राक्ष:- को साक्षात कार्तिकेय का स्वरूप माना गया है। इसे शत्रुंजय रुद्राक्ष भी कहा जाता है, यह ब्रह्म हत्या जैसे पापों से मुक्ति तथा एवं संतान देने वाला होता है।

7. सात मुखी रुद्राक्ष:- या सप्तमुखी रुद्राक्ष दरिद्रता को दूर करने वाला होता है। इस सात मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।

8. आठ मुखी रुद्राक्ष:- को भगवान गणेश जी का स्वरूप माना जाता है। अष्टमुखी रुद्राक्ष राहु के अशुभ प्रभावों से मुक्ति दिलाता है, तथा पापों का क्षय करके मोक्ष देता है।

9. नौ मुखी रुद्राक्ष:- को भैरव का स्वरूप माना जाता है। इसे बाईं भुजा में धारण करने से गर्भहत्या जेसे पाप से मुक्ति मिलती है। नवम मुखी रुद्राक्ष को यम का रूप भी कहते हैं। यह केतु के अशुभ प्रभावों को दूर करता है।

10. दस मुखी रुद्राक्ष:- को भगवान विष्णु का स्वरूप कहा जाता है। दस मुखी रुद्राक्ष शांति एवं सौंदर्य प्रदान करने वाला होता है। इसे धारण करने से समस्त भय समाप्त हो जाते हैं।

11. एकादश मुखी रुद्राक्ष:- साक्षात भगवान शिव का रूप माना जाता है। एकादश मुखी रुद्राक्ष को भगवान हनुमान जी का प्रतीक माना गया है, इसे धारण करने से ज्ञान एवं भक्ति की प्राप्ति होती है।

12. द्वादश मुखी रुद्राक्ष:- बारह आदित्यों का आशीर्वाद प्रदान करता है। इस बारह मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान यह फल प्रदान करता है।

13. तेरह मुखी रुद्राक्ष:- को इंद्र देव का प्रतीक माना गया है इसे धारण करने पर व्यक्ति को समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।

14. चौदह मुखी रुद्राक्ष:- भगवान हनुमान का स्वरूप है। इसे धारण करने से व्यक्ति परमपद को पाता है।

15. पंद्रह मुखी रुद्राक्ष:- पशुपतिनाथ का स्वरूप माना गया है। यह संपूर्ण पापों को नष्ट करने वाला होता है।

16. सोलह मुखी रुद्राक्ष:- विष्णु तथा शिव का स्वरूप माना गया है। यह रोगों से मुक्ति एवं भय को समाप्त करता है।

17. सत्रह मुखी रुद्राक्ष:- राम-सीता का स्वरूप माना गया है, यह रुद्राक्ष विश्वकर्माजी का प्रतीक भी है, इसे धारण करने से व्यक्ति को भूमि का सुख एवं कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने का मार्ग प्राप्त होता है।

18. अठारह मुखी रुद्राक्ष:- को भैरव एवं माता पृथ्वी का स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।

19. उन्नीस मुखी रुद्राक्ष:- नारायण भगवान का स्वरूप माना गया है यह सुख एवं समृद्धि दायक होता है।

20. बीस मुखी रुद्राक्ष:- को जनार्दन स्वरूप माना गया है। इस बीस मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से व्यक्ति को भूत-प्रेत आदि का भय नहीं सताता।

21. इक्कीस मुखी रुद्राक्ष:- रुद्र स्वरूप है, तथा इसमें सभी देवताओं का वास है। इसे धारण करने से व्यक्ति ब्रह्महत्या जैसे पापों से मुक्त हो जाता है।

22. गौरी शंकर रुद्राक्ष:- यह रुद्राक्ष प्राकृतिक रुप से जुडा़ होता है शिव व शक्ति का स्वरूप माना गया है। इस रुद्राक्ष को सर्वसिद्धिदायक एवं मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। गौरी शंकर रुद्राक्ष दांपत्य जीवन में सुख एवं शांति लाता है।

23. गणेश रुद्राक्ष:- इस रुद्राक्ष को भगवान गणेश जी का स्वरुप माना जाता है। इसे धारण करने से ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है। यह रुद्राक्ष विद्या प्रदान करने में लाभकारी है विद्यार्थियों के लिए यह रुद्राक्ष बहुत लाभदायक है।

24. गौरीपाठ रुद्राक्ष:- यह रुद्राक्ष त्रिदेवों का स्वरूप है। इस रुद्राक्ष द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और महेश की कृपा प्राप्त होती है।

राशि के अनुसार रुद्राक्ष धारण :-

1. मेष राशि के स्वामी ग्रह मंगल है, इसलिए ऎसे जातक तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करें ।

2. वृषभ राशि के स्वामी ग्रह शुक्र है । अतः इस राशि के जातकों के लिए छह मुखी रुद्राक्ष फायदेमंद होता है ।

3. मिथुन राशि के स्वामी ग्रह बुध है । इस राशि वालों के लिए चार मुखी रुद्राक्ष है ।

4. कर्क राशि के स्वामी ग्रह चंद्रमा है । इस राशि के लिए दो मुखी रुद्राक्ष लाभकारी है ।

5. सिंह राशि के स्वामी ग्रह सूर्य है । इस राशि के लिए एक या बारह मुखी रुद्राक्ष उपयोगी होगा ।

6. कन्या राशि के स्वामी ग्रह बुध है । इनके लिए चार मुखी रुद्राक्ष लाभदायक है ।

7. तुला राशि के स्वामी ग्रह शुक्र है । इनके लिए छह मुखी रुद्राक्ष व तेरह मुखी रुद्राक्ष उपयोगी होगा ।

8. वृश्चिक राशि के स्वामी ग्रह मंगल है । इनके लिए तीन मुखी रुद्राक्ष लाभदायक होगा ।

9. धनु राशि के स्वामी ग्रह (गुरु )वृहस्पति है। ऎसे जातकों के लिए पांच मुखी रुद्राक्ष उपयोगी है ।

10. मकर राशि के स्वामी ग्रह शनि है । इनके लिए सात या चौदह मुखी रुद्राक्ष उपयोगी होगा ।

11. कुंभ राशि के स्वामी ग्रह शनि है । इनके लिए सात चौदह मुखी रुद्राक्ष लाभदायक होगा ।

12. मीन राशि के स्वामी ग्रह गुरु है । इस राशि के जातकों के लिए पांच मुखी रुद्राक्ष उपयोगी होगा ।

रूद्राक्षों की अधिक जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट देखें :- http://www.shukracharya.com

मेरे और लेख देखें :- aapkabhavishya.in, astroguruji.in, rbdhawan@wordpress.com पर।

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मानसिक रोग और ज्योतिष

मानसिक रोगों के ज्योतिषीय कारण :-

Dr.R.B.Dhawan

जन्मकुंडली में शरीर के सभी अंगों का विचार तथा उनमें होने वाले रोगों या विकारों का विचार भिन्न-भिन्न भावों से किया जाता है। रोग तथा शरीर के अंगों के लिये लग्न कुण्डली में मस्तिष्क का विचार प्रथम स्थान से, बुद्धि का विचार पंचम भाव से तथा मनःस्थिति का विचार चन्द्रमा से किया जाता है। इस के अतिरिक्त शनि, बुध, शुक्र तथा सूर्य का मानसिक स्थिति को सामान्य बनाये रखने में विशेष योगदान है। शरीर क्रिया विज्ञान के अनुसार मानव शरीर में मस्तिष्क एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है। यह शरीर का केन्द्रीय कार्यालय है, यहीं से सभी संदेश व आदेश प्रसारित होकर शरीर में बडे़ से लेकर सूक्षमातिसूक्ष्म अंगों तक को भेजे जाते हैं।

मानव मस्तिष्क को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, एक वह जिसमें बुद्धि कार्य करती है, सोचने-विचारने, तर्क विश्लेषण और निर्णय करने की क्षमता इसी में है, इसी को अवचेतन मस्तिष्क कहते हैं। ज्योतिष मतानुसार इसका कारक ग्रह सूर्य है। विचारशील (अवचेतन) मस्तिष्क रात्रि में सो जाता है, विश्राम ले लेता है, अथवा कभी-कभी नशा या बेहोशी की दवा लेने से मूर्छाग्रस्त हो जाता है। अवचेतन मस्तिष्क के इसी भाग के विकार ग्रस्त होने से जातक मूर्ख, मंद बुद्धि और अनपढ़ अविकसित मस्तिष्क वाला व्यक्ति या तो सुख के साधन प्राप्त नहीं कर पाता, और यदि कमाता भी है तो, उसका समुचित उपयोग करके सुखी नहीं रह पाता। सभी वस्तुयें उसके लिये जान का जंजाल बन जाती हैं। एेसे जातक मंदबुद्धि तो कहलाते हैं, परंतु इनमें शरीर के लिये भूख, मल-त्याग, श्वास-प्रश्वास, रक्तसंचार, तथा पलकों का झपकना आदि क्रियायें सामान्य ढंग से होती हैं। मस्तिष्क की इस विकृति का शरीर के सामान्य क्रम संचालन पर बहुत ही कम असर पड़ता है। मस्तिष्क का दूसरा भाग वह है, जिसमें आदतें संग्रहित रहती हैं, और शरीर के क्रियाकलापों का निर्देश निर्धारण किया जाता है। हमारी नाड़ियों में रक्त बहता है, ह्रदय धड़कता है, फेफड़े श्वास-प्रश्वास क्रिया में संलग्न रहते हैं, मांसपेशीयां सिकुड़ती-फैलती हैं, पलकें झपकती-खुलती हैं, सोने-जागने का खाने-पीने और मल त्याग का क्रम स्वयं संचालित होता है। पर यह सब अनायास ही नहीं होता, इसके पीछे सक्रिय (चेतन) मस्तिष्क की शक्ति कार्य करती है, इसे ही हम “मन” कहते हैं। ज्योतिष मतानुसार इस मन का कारक ग्रह चंद्रमा है। उपरोक्त सभी शक्तियां मस्तिष्क (मन) के इसी भाग से मिलती हैं, उन्माद, आवेश आदि विकारों से ग्रसित भी यही होता है, डाक्टर इसी को निद्रित करके आप्रेशन करते हैं। किसी अंग विशेष में सुन्न करने की सूई लगाकर भी मस्तिष्क तक सूचना पहुँचाने वाले ज्ञान तन्तुओं को संज्ञाशून्य कर देते हैं, फलस्वरूप पीड़ा का अनुभव नहीं होता, और आप्रेशन कर लिया जाता है। पागलखानों में इसी चेतन मस्तिष्क का ही ईलाज होता है। अवचेतन की तो एक छोटी सी परत ही मानसिक अस्पतालों की पकड़ मे आई है, वे इसे प्रभावित करने में भी थोड़ा-बहुत सफल हुये हैं, किन्तु इसका अधिकांश भाग अभी भी डाक्टरों की समझ से परे है।

यदि हम ज्योतिष की दृिष्टि से विचार करें तो मस्तिष्क (अवचेतन मस्तिष्क) Subconscious Mind का कारक ग्रह सूर्य है। जन्मकुण्डली में सूर्य तथा प्रथम स्थान पीड़ित हो तो, उस जातक में किसी हद तक गहरी सोच का आभाव होता है, अथवा वह गम्भीर प्रकृति का होता है, तथा मन (चेतन मस्तिष्क) Conscious Mind का कारक ग्रह चन्द्रमा है। ऐसा जातक मनमुखी होता है, जो भी मन में आता है वैसा ही करने लगता है। मन में आता है तो, नाचने लगता है, मन करता है तो गाने लगता है, परंतु उस समय की जरूरत क्या है? इसकी उसे फिक्र नहीं होती। विचित्र बाते करना, किसी एक ओर ध्यान जाने पर उसी प्रकार के कार्य करने लगता है। यह सब मनमुखी जातक के लक्षण हैं, ऐसे जातक की कुंडली में चन्द्रमा तथा कुण्डली के चतुर्थ व पंचम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है। इस के अलावा बुध विद्या देने वाला, गुरू ज्ञान देने वाला, तथा शनि वैराग्य देने वाले ग्रह हैं। किसी भी जातक की कुंडली में नवम् भाग्य का, तृतीय बल और पराक्रम का, एकादश लाभ का तथा सप्तम भाव वैवाहिक सुख के विचारणीय भाव होते हैं। यह सब ग्रहस्थितियाँ मन व मस्तिष्क पर किसी न किसी प्रकार से अपना प्रभाव ड़ालती हैं। आगे की पंक्तियों में मैं उन्माद (विक्षिप्त अवस्था) का कुंडली में कैसे विचार किया जाता है? यह बताऊँगा, जिससे ज्योतिष के विद्यार्थी लाभान्वित होंगे।

1. कुण्डली (Horoscope) में पंचम, नवम, लग्न व लाभ स्थान में से किसी भी एक स्थान पर पापयुक्त सूर्य, मंगल, शनि, पापी बुध अथवा राहु-केतु के साथ क्षीण चन्द्रमा जो की मन (चेतन मस्तिष्क) Conscious Mind का कारक है, की स्थिति पंचम अर्थात् बुद्धि के स्थान पर होकर शिक्षा के मामले में अल्पबुद्धि (Unintelligent) बनाती है। यही चन्द्रमा यदि किसी पापग्रह से दृष्ट अथवा युक्त होकर लग्न में हो तो, गहरी समझ वाला नहीं होता, और यदि यह नवम में हो तो, बार-बार भाग्य में रूकावटें होने से जातक विक्षिप्त अवस्था में आ जाता है। यही चन्द्रमा एकादश मे होने पर अनेक प्रकार के आरोप तथा उलझनों के कारण उन्माद ग्रस्त हो सकता है।

2. जन्मकुण्डली (Horoscope) में क्षीण चन्द्रमा और बुध का योग हो तो, जातक अल्पबुद्धि (Unintelligent) वाला होता है, इस योग में दो मुख्य तत्व क्षीण चन्द्रमा और बुध का योग अल्पबुद्धि (Unintlligent) बनाता है। चन्द्रमा जो की मन (चेतन मस्तिष्क) Conscious Mind का कारक है, यदि क्षीण होगा तो, वह जातक की सतत् सोच को दूषित करता है, तथा क्षीण बुध जो की बौद्धिक ज्ञान की कमी कर जातक को गहरी सोच वाला नहीं बनने देता। कुण्डली में यह सब विचार एक कुशल ज्योतिषी (Intelligent Astrologer) ही कर सकता है।

3. कुण्डली (Horoscope) के व्यय भाव में शनि युक्त क्षीण चन्द्रमा हो तो, व्यय स्थान में राहु तथा पाप युक्त चन्द्रमा हो, और अष्ठम में शुभ ग्रह हों तो, यह दोनो योग क्षीण तथा पापयुक्त चन्द्रमा को उन्माद का कारण बताते हैं। व्यय जो की कुण्डली में सैक्स का स्थान है, वहाँ वैराग्य कारक शनि की स्थिति क्षीण चन्द्रमा के साथ हो तो, पति या पत्नी के साथ सैक्स में असंतोष के कारण दुःखी होकर मानसिक रोगी हो जाता है। राहु तथा पापयुक्त चन्द्रमा की स्थिति भी एेसा ही योग बनाती है, परंतु यहां अंतर इतना होता है कि राहु के कारण जातक या जातिका स्वयं ही कामरोग से पीड़ित होकर जीवनसाथी से विमुख हो जाता है। ज्योतिष के विद्वानों (Intelligent Astrologer) ने इस प्रकार के पागलपन या उन्माद के अनेक ज्योतिषीय योगों का वर्णन अपने ग्रन्थों में किया है, ज्योतिष के विद्यार्थीयों (Students Of Astrology) को ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। इस प्रकार के योगों में मुख्य तत्व सूर्य अथवा चन्द्रमा अवश्य पीड़ित पाये जाते हैं। ज्योतिष के विद्यार्थीयों (Students Of Astrology) को विशेष ध्यान यह भी रखना चाहिए कि जातक की जनमकुंडली (Horoscope) में शनि के साथ सूर्य का सम्बंध होने से राज्याधिकारी के क्रोध से प्रमाद रोग का भय होता है, एवं वे दोनों ग्रह मंगल से युक्त हों तो, पित्तजन्य उन्माद का भय होता है।

ज्योतिषीय चिकित्सा (Madical Astrology) का नियम है कि, कालपुरुष के शरीर का कारक ग्रह सूर्य है, इस लिये सूर्य पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव दैहिक व्याधियाँ अर्थात् अधिभौतिक दुःख देता है। इस पर पाप प्रभाव मनुष्य को प्रेत, पितर आदि के द्वारा प्रदत्त व्याधियों के साथ-साथ पापी और क्रूर ग्रहों का उत्पीड़न, मानसिक व दीर्घकालिक व्याधियाें का जनक होता है। प्रेत-पितरों से जनित व्याधियों को असेव कहा जाता है। यह व्याधियाँ मनोचिकित्सक के कार्य क्षेत्र में आती हैं, ज्योतिषीय चिकित्सा (Madical Astrology) के द्वारा भी इसका उपचार सम्भव है, परंतु एलोपैथी चिकित्सा द्वारा 80 प्रतीशत रोगियों में मनोचिकित्सा असफल पाई गई है, इन रोगों का उपचार दो प्रकार से क्रमिक रूप से होता है। तंत्र और साथ-साथ आयुर्वैदिक औषधियों के द्वारा, प्रेतों या पितरों का प्रभाव पुच्छ भूत स्वरूप होता है। मुख्य 70 प्रतीशत प्रभाव को “क्लीं” मंत्र के सिद्ध तांत्रिक हटा देते हैं, और शेष 30 प्रतीशत का आयुर्वेदाचार्य अपने उपचार से ठीक कर देते हैं। इसमें इतना स्पष्ट है कि, इस प्रकार के रोगों के आरम्भ होने से पूर्व इनकी पहचान के लिये एकमात्र ज्योतिषीय चिकित्सा (Madical Astrology) ही कारगर सिद्ध हुई है। रोग आरम्भ होने के बाद सम्मोहन क्रिया Reiki या ईष्टमंत्र भी कारगक सिद्ध होते हैं, परंतु ध्यान रहे- प्रेत आवेशित व्यक्ति को स्वंय ईष्ट की पूजा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि आवेशित व्यक्ति की अपनी पूजा-अर्चना प्रेत को और भी शक्तिशाली बना देती है।

ग्रहों में चन्द्रमा मानसिक शक्ति से सम्बन्धित ग्रह है, चन्द्रमा और सूर्य मिलकर ही मंत्र साधक को संजीवनी शक्ति प्रदान करते हैं। संजीवनी साधना में सूर्य बीज “ह्रां” और चन्द्र बीज “वं” का समावेश होता है। स्वास्थ्य के लिये दोनों ग्रहों का पापी ग्रहों (राहु-केतु और शनि) के प्रभाव से बचा रहना आवश्यक है। मन के कारकत्व के अलावा चन्द्रमा को गले, छाती और ह्रदय का कारकत्व भी प्राप्त है। वृश्चिक राशि स्थित (नीच चन्द्रमा) का सम्बंध सूर्य से हो जैसे- सूर्य वृश्चिक राशि में या वृष राशि में तथा चन्द्रमा पर शनि और मंगल की पूर्ण दृष्टि हो तो, राजयक्ष्मा (tuberculosis) होने का पूरा भय रहता है।

यदि चन्द्रमा मंगल से सम्बंध बनाये या उस पर मंगल की सातवीं या आठवीं दृष्टि हो तो, जीवन में जीवन में अनेक दुर्घटनाओं का दुःख जातक को झेलना पड़ता है, ऐसे जातक को अनेक बीमारियां घेरे रहती हैं, उसका दाम्पत्य जीवन भी दुःख से भरा होता है। जातक को अनेक रूकावटों और अड़चनों का सामना अपने जीवन में करना पड़ता है। वराहमिहर ने एेसे जातक के लिये कहा है- चन्द के साथ यदि मंगल का संयोग हो जाये तो, जातक औरतों का व्यापारी होता है, या वे अपनी पत्नी के अन्य से सैक्स सम्बंधों के प्रति बेपरवाह होता है, घर के बर्तनों तक को बेच देता है, यह जातक अपनी माता के प्रति भी नीचता का व्यवहार करता है। चन्द्र-शनि का कुण्डली में साथ होना दुःख व विपत्ति का कारण बनता है, यह योग सन्यास या वैराग्य दायक भी होता है, परंतु यही योग वैराग्य होने पर दैव सानिध्य भी दिलाता है, अर्थात् जातक को अड़चनों में से गुजार कर वैरागी बना देता है, चन्द्र-शनि की युति हो, और मंगल की दृष्टि उन पर हो तो जातक राजयक्ष्मा रोग से पीड़ित होता है। एेसे जातक को सूखा रोग भी हो सकता है। छटे भाव में चंद्रमा पर रक्त सम्बंधी त्वचा रोग या पागलपन की बीमारी हो सकती है। ऐसे जातक को रति-जनित रोग सिफलिस या एड्स हो सकते हैं। यदि शनि-चन्द्र की युति सातवें भाव में हो तो, विवाह में बाधायें आती हैं, विवाह यदि होता भी है तो, दाम्पत्य जीवन दुःखमय होता है, न तो जीवन-साथी साथ ही रहता है, न ही संतान होती है, यदि विवाह सुख होता है तो वृद्ध या वृद्धा साथी से। यह योग सातवें भाव में कर्क या वृष राशि में होने पर निष्फल होता है, अर्थात् वृष या कर्क का चन्द्रमा जातक का बचाव कर देता है, इसके लिये मकर या वृश्चिक राशि लग्न में होनी चाहिए।

आठवें भाव का क्षीण चन्द्र यदि उच्च के शनि द्वारा देखा जाता हो, तो जातक को पागलपन या मिरगी का रोग होता है, शीण चन्द्र शनि के साथ हो, और उस पर मंगल की दृष्टि हो तो, जातक की मृत्यु बवासीर, पागलपन, आपरेशन या चोट के कारण होती है। चीरफाड़ का होना निश्चित है, या खुंखार जानवर के द्वारा भी मृत्यु हो सकती है। बारहवें भाव में चन्द्र-शनि की युति पागलपन का कारण बनती है। प्रायः मानसिक रोगों का कारक 5, 6, 8 या 12 भाव का चन्द्रमा शनि और मंगल के प्रभाव में आकर हो जाता है।

जन्मकुण्डली Horoscope में बुध का सम्बंध दांतों, श्वांसनली, फेफड़ों और कटि प्रदेश से है। बुध पर शनि और मंगल का प्रभाव निमोनिया (पसली चलने का रोग) श्वांस का रोग, बुध-मंगल की युति पर सूर्य और शनि का प्रभाव ज्वर और आंतों के रोग देता है। नजला-जुकाम भी बुध पर पापी ग्रहों के प्रभाव से होता है। बुध जब शनि क्षेत्रीय हो, या राहु के प्रभाव में हो, अर्थात् बुध पर पाप प्रभाव वाणी सम्बंधी रोग तथा हकलाहट देता है, बुध के पापी हो जाने पर बुद्धि जड़ हो जाती है। बुध पर क्रूर और पापी ग्रहों का प्रभाव जेल यात्रा करवा देता है। क्रूर एवं पापी ग्रहों का प्रभाव बुध पर होने से नपुंसकता या दिल के दौरे पड़ सकते हैं, शर्त यह है कि, बुध पर बृहस्पति की दृष्टि नहीं होनी चाहिए। ऐसा असर अधिक होता है, जब बुध तीसरे या छटे भाव में हो, और पाप प्रभाव इस पर पड़ रहा हो, मेष, कर्क या मकर लग्न वाले जातकों के लिये पाप प्रभाव वाला बुध अति दुःख दायक होता है। अपने शत्रु मंगल की राशियों (मेष व वृश्चिक) का पाप प्रभाव युक्त बुध क्रमशः मानसिक रोग और जननेन्द्रियों के रोग देने वाला होता है। पाप प्रभाव युक्त बुध यदि सिंह राशि में हो तो, टायफाईड जैसे रोग देता हेै। शनि से दृष्ट होने पर मकर-कुम्भ का बुध हकलाहट देता है। क्षीण चन्द्र और बुध की युति बांझपन देती है। मंगल के प्रभाव क्षेत्र में शनि की दृष्टि या युति बुध पर होने पर जब मंगल का प्रभाव बुध पर हो तो, हिस्टीरिया रोग हो सकता है, परंतु इसके लिये बुध पर राहु का प्रभाव भी होना चाहिए।

जन्मकुंडली Horoscope के लग्न, चौथे या पाँचवें भाव का बुध यदि मंगल और शनि के साथ हो तो, बांध्यत्व देता है। यदि बुध, शनि, मंगल की युति पर राहु का प्रभाव पड़े तो, गठियावात के रोग होते हैं। दाम्पत्य दुःख और अंग-भंग देने वाला हो सकता है, यदि यह ग्रह सातवें भाव में हो। आठवें भावस्थ पापी बुध चर्म और मानसिक रोग देता है।

बुध का सम्बंध बौद्धिकता से है, विज्ञानमय कोष से सम्बंधित पूर्वजन्मों के कर्मों का फल बुध से प्राप्त होता है। जब बुध नवम् भाव धनु राशि या गुरू से होता है, तो यह योग पितृऋण का परिचायक है। पिछली पीढ़ियों के पापकर्मों का फल वर्तमान पीढ़ी में इस ग्रहयोग से पता चलता है। इस का असर प्रायः जातक की वृद्धावस्था में दिखाई देता है। जब ग्रहजनित रोग परिलक्षित न हों, और जातक उलझनों परेशानियों में फंसा हो, तथा एेसे रोग सामने आ रहे हों, जो कुण्डली Horoscope में दिखाई न देते हों, उस समय कुण्डली में पितृऋण की खोज करनी चाहिए। पितृऋण का सम्बंध पूर्वजों के पापों से होता है, ये पाप पूर्वजों से विरासत में प्राप्त होते है। इस विषय में साधारण ज्योतिषी या कम्प्यूटर की बनी कुण्डली कोई सहायता नहीं कर सकते। इसी लिये ज्योतिष के माध्यम से जातक को कोई लाभ नहीं हो पाता, और अधिकतर रोग अबाधित रह जाते हैं। पितृऋण Pitrarin बृहस्पति के कारकत्व में आते हैं, और इसका सम्बंध विज्ञानमय कोश से होता है। पूर्वजन्म या पितृऋण Pitrarin सम्बंधित दोषों को मिटाने की क्षमता केवल भगवान शिव में है, और उनके बताये उपाय पितृऋण Pitrarin से पूर्णतः छुटकारा दिला सकते है।

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रोग और ज्योतिष शास्त्र

रोग और ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन :-

Dr.R.B.Dhawan

ज्योतिष शास्त्र ग्रह नक्षत्रों पर आधारित एक ऐसा विज्ञान है, जो अपने आप में परिपूर्ण शास्त्र है, यही एक ऐसी विद्या है, जिसका कथन शतप्रतिशत सही हो सकता है, इसमें संभावनाओं का कोई स्थान नहीं है, इस विद्या का वास्तविक जानकार बिलकुल सटीक भविष्यवाणी कर सकता है। इस शास्त्र की सहायता से जीवन के हर अंग, हर रंग, हर भाग में घटने वाली घटना, और हर मानवीय आवश्यकता, तथा मनुष्य के हर कष्ट का निवारण तथा घटना के घटने का समय पता लगाया जा सकता है। आयुर्वेद और ज्योतिष शास्त्र, तंत्र और ज्योतिष शास्त्र इन सब का परस्पर सम्बन्ध है, बल्कि यह कहना ठीक होगा कि इन का चोली-दामन का सम्बंध है। आज से 50-60 वर्ष पहले तक भारत में 90 प्रतीशत लोग आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति पर ही निर्भर थे, उस समय के सभी आयुर्वेदाचार्य ज्योतिष शास्त्र का समुचित ज्ञान रखते थे। दरअसल आयुर्वेद में औषधि निर्माण और औषधि सेवन के लिये सम्बंधित मंत्र और सम्बंधित नक्षत्र की जानकारी होना आवश्यक था। ज्योतिषाचार्य तो जातक की कुंडली देखकर भविष्य में होने वाले रोगों की जानकारी भी प्राप्त कर लेते थे। वे जानते थे कि जातक में किस तत्व की कमी या किस तत्व की अधिकता रहेगी। दरअसल मानव जीवन के साथ ही रोग का इतिहास भी आरम्भ हो जाता है, रोगों से रक्षा हेतु मानव ने प्रारम्भ से ही प्रयास आरम्भ कर दिया था। तथा आज तक इसके निदान एवं उपचार हेतु प्रयत्न कर रहा है। जब हैजा, प्लेग, टी. बी. आदि संक्रामक रोग से ग्रस्त होकर इनसे छुटकारा पाने के लिये विविध प्रकार का अन्वेषण हुआ तो कालांतर में पुनः कैंसर एड्स, डेंगू, स्वाईन फ्लू, ओर फिर ईबोला जैसे अनेक नये रोग पैदा हो गये हैं, जिनके समाधान एवं उपचार हेतु आज समस्त विश्व प्रयत्नशील है। विडंबना है कि मनुष्य जितना ही प्राकृतिक रहस्यों को खोजने का प्रयत्न करता है, प्रकृति उतना ही अपना विस्तार व्यापक करती चली जाती है। जिससे समाधान के समस्त प्रयास विश्व के लिये नगण्य पड़ जाते हैं, इसका एक कारण मनुष्य में सदाचार का आभाव भी प्रतीत होता है। हमारे ऋषियों ने जहां अणुवाद, प्रमाणुवाद को व्याखयायित किया, अध्यात्म की गहराइयों में गोता लगाया, सांख्य के प्रकृति एवं पुरूष से सृष्टि प्रक्रिया को जोड़ा, वहीं आकाशीय ग्रह नक्षत्रों को अपनी समाधि से कोसों दूर धरती पर बैठकर वेधित किया, तथा उनके धरती पर पड़ने वाले शुभाशुभ प्रभाव को मानव जीवन तथा रोगों के साथ जोड़कर व्याखयायित भी किया। विश्व के सर्वप्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद से रोगों का परिज्ञान आरम्भ हो जाता है। जिसमें पाण्डूरोग, ह्रदय रोग, उदररोग, एवं नेत्ररोग आदि की चर्चा प्राप्त होती है। पौराणिक कथाओं में तो विविध रोगों की चर्चा एवं उपचार के लिये औषधि, मंत्र एवं तंत्र आदि का प्रयोग प्राप्त होता है। आर्ष परम्परा में तो रोगों के विनिश्चयार्थ ज्योतिषीय, शास्त्रीय ग्रहयोगों सहित आयुर्वेदीय परम्परा का प्रयोग दर्शनीय है। विषय को अधिक न बढाते हुए आगे की पंक्तियों में पक्षाघात और पक्षाघात के ज्योतिषीय योग लिख रहा हूं, जो मेरी ही लिखी एक पुस्तक “रोग एवं ज्योतिष” के अंश हैं :- पक्षाघात, लकवा या फालिज़ एक ऐसा रोग है जिस में शरीर के दाहिने या बायें या फिर किसी पार्शव के कुछ या सब अंग क्रियाहीन या चेतनाहीन हो जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह रोग वायु के कूपित हो जाने के कारण होता है। अंग्रेजी भाषा में इसे paralysis कहा जाता है, इसमें तंत्रिका-तंत्र संस्थान nerves system के कार्य में बाधा या कार्यक्षमता की क्षीणता हो जाती है। फलित ज्योतिष की दृष्टि में तंत्रिका-तंत्र संस्थान nerves system से सम्बंधित रोगों का सूचक बुध ग्रह है। इस बुध ग्रह के कारकत्व में तंत्रिका-तंत्र तथा स्नायु प्रदेश के लिये कारक ग्रह शनि है, इस स्नायु संस्थान तथा तंत्रिका-तंत्र के बाधित होने के पीछे कुण्डली में बुध ग्रह पर शनि ग्रह का प्रभाव होता है। शनि ग्रह जब कुण्डली के बुध ग्रह पर अपना दूषित प्रभाव डाल रहा हो, तब शरीर के किसी अंग का संज्ञाहीन होना या अंगहीनता होती है। शनि ग्रह स्वंय लंगडा ग्रह माना गया है। इस के साथ-साथ कुण्डली में रोग का विचार छटे भाव या या उस भाव के कारक शनि एवं मंगल से किया जाता है। इसी प्रकार राशि वर्ग की छटी राशि कन्या भी इस रोग के निर्धारण में विचारणीय मानी जाती है। कुण्डली के आठवें और बारहवें भाव का विचार भी आवश्यक है, क्योकि इनसे यह जानने में सहायता मिलती है कि रोग दीर्घकाल तक चलेगा या अल्प काल तक? पक्षाघात paralysis या लकवा मुख्यतः एक जटिल रोग है, जातक की कुंडली मे इस रोग की कितनी संभावना है? यह जानने के लिये कुछ ज्योतिष के ग्रन्थों में ग्रहयोग वर्णित हैं- यदि कुण्डली का लग्न कन्या है, और लग्न व लग्नेश बुध अशुभ ग्रहों से पीड़ित है तो, तंत्रिका-तंत्र nerves system पर अवश्य इस रोग का आक्रमण संम्भव है। धनु या कुम्भ के मामले में भी इस रोग का आक्रमण हो सकता है। यह राशियां अशुभ ग्रहों द्वारा पीड़ित होने पर ही इस रोग की सूचना देती हैं। अशुभ शनि छटे भाव में पैर के रोग की ओर संकेत करता है, जातक लचक कर या लंगडाकर चलता है। यह पक्षाघात के अलावा जन्म से या फिर पैर में कोई गंभीर चोट लगने से भी हो सकता है। आयुर्वेद के मतानुसार इस रोग की गणना वात रोगों में की जाती है, आयुर्वेद में वात रोग लगभग 80 प्रकार के बताये गये हैं। यहां इस सम्बन्ध में अधिक न लिखकर यह कहना चाहूंगा की मेरी एक पुस्तक “रोग एवं ज्योतिष” (medical astrology) का अध्ययन अवश्य करें, जिसमें अधिकांश रोगों के ज्योतिषीय कारण या कह लीजिये रोगों के ग्रहयोग जो प्राचीन तथा नवीन खोजों पर आधारित हैं दिये गये हैं, साथ ही इन रोगों की शास्त्रीय मंत्रादि द्वारा उपचार भी यथासम्भव दिया गया है,‌ यह पुस्तक इस विषय की खोज करनेवाले विद्यार्थियों की बहुत सहायता कर सकती है। मेरे विचार से यह पुस्तक ज्योतिष का रोगात्मक अध्ययन करने वाले विद्वानों तथा खोज करने, अनुसंधान करने वालो के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।

शुक्राचार्य संस्थान द्वारा ज्योर्तिविज्ञान के साथ साथ सरल उपाय की कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित की गई हैं, जिन में प्रमुख हैं – 

  1. गुरूजी के टोटके 
  2. गुरूजी की साधनाएँ
  3. वास्तु सूत्र
  4. कैसे बदलें भाग्य
  5. दुर्लभ समृद्धि प्रदायक वस्तुयें
  6. भृगु संहिता योग एंव फलादेश
  7. लाल किताब योग एंव उपाय
  8. ज्योतिष के योग एवं फलादेश
  9. रोग एवं ज्योतिष
  10. विवाह एवं दाम्पत्य सुख

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मानसिक स्वास्थ्य

मानसिक तनाव और ग्रह :-

Dr.R.B.Dhawan

सभी जानते हैं- वर्तमान युग भागदौड़ और कशमकश भरा है। आज के युग में हर इंसान मशीन के जैसे जीवनयापन करने के लिये मजबूर है। कारण हर इंसान की आकांक्षाएं और महत्वकांशायें इतनी हो गई हैं कि, वह किसी भी तरह से अपने आप से संतुष्ट नहीं हो पा रहा है, और इस कारण आम आदमी भारी तनाव में जीवन जीने के लिये मजबूर हो रहा है। कुण्ठा, हताशा, फ्रस्टेशन, टेंशन और डिप्रेशन एक भावनात्मक प्रतिक्रिया है, जो किसी व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ति न होने पर प्रतिरोध स्वरूप प्रकट होती है।

डाक्टरों एवं वर्तमान मेडिकल साइंस के रिसर्च को मानें तो, प्रति दस व्यक्ति में से दो व्यक्ति मानसिक अवसाद dipreshan से घिरे हैं, और सीधी बात डिप्रेशन के शिकार हैं, एेसा क्यूं हो रहा है। कारण स्पष्ट है कि मानसिक संतुष्टि का न होना। अब यह मानसिक संतुष्टि कैसे हो सकती है? परंतु मानसिक असंतुष्टि किसी भी प्रकार से हो सकती है। किसी को अपने काम से संतोष नहीं है, तो किसी को पारिवारिक क्लेश है, किसी को पैसे की कमी खलती है, तो कोई अपने शरीर से दुःखी है, और कोई सिर्फ इसलिये दुःखी है कि उसके रिश्तेदार या पड़ोसी क्यों सुखी हैं। कुल मिलाकर सभी के दुःखों का अपना-अपना कोई न कोई कारण है। अगर हम किसी के दुःख या dipreshan का कारण जानें तो, हमें यह ज्ञात होगा कि, जिसे वह अपना दुःख समझ रहा है, वह दरअसल उसका दुःख है ही नहीं, मात्र उसके मन का भ्रम अथवा जीवन की वह कमजोरी है जिसे वह सही तरीके से अभिव्यक्त नहीं कर पाता और धीरे-धीरे मानसिक अवसाद dipreshan का शिकार हो जाता है।
देखने मे आता है कि उच्च प्रतिष्ठित परिवारों के सदस्य भी, जिनके जीवन में कहीं किसी प्रकार की भौतित सुखों की कमी नहीं होती है, और वह भी उच्च पदासीन होते हैं, बावजूद इसके वह आत्महत्या जैसा जघन्य कार्य कर लेते हैं, अथवा किसी की हत्या जैसा घृणित कार्य भी कर देते हैं, कारण सिर्फ मानसिक अवसाद, मानसिक उत्तेजना।

अाज डिप्रेशन इतना आम हो चुका है कि अधिकांश लोग इसे बीमारी की तरह नहीं लेते और नजर-अंदाज कर देते हैं। यह हो क्यों रहा है?- यदि विचार किया जाये तो, किसी वस्तु या किसी कार्य की सफलता, अथवा मन की इच्छा के पूर्ण होने की जब प्रबल आशा हो, और वह आशा टूट जाये, तब एक बार निराशा का दौर आ प्रकट होता है, बस यही वह समय है जब हिम्मत दिलाने वालों की आवश्यकता होती है। हिम्मत या हौसला दिलाने वाला कोई अपना हो तो, बहुत जल्दी व्यक्ति निराशा के दौर से निकल जाता है।

किसी-किसी मामले में एेसे समय में निराशा होती ही नहीं तब ? तब एक विचित्र भाव पैदा होता है, और यह भाव होता है ‘ईर्ष्या’ भाव! ईर्ष्या भी जब नियंत्रित न की जाये, तब चिढचिढापन, फ्रस्टेशन, टेंशन और फिर डिप्रेशन। मेरा कार्य क्यों नहीं हुआ? दूसरे का वही कार्य हो गया। “मेरी तो किस्मत ही खराब है” एेसे समय में सकारात्मक वातावरण बनाने की आवश्यकता होती है, अन्यथा वह व्यक्ति मानसिक कुण्ठा का शिकार होने लगता है,

कुण्ठा, फ्रस्टेशन, टेंशन और फिर डिप्रेशन (अवसाद)। यह सब मानसिक अवसाद में आ जाता है। आजकल ऐसा होना आम बात है, लेकिन कई बार डिप्रेशन इतना अधिक बड़ जाता है कि मनुष्य कुछ समय के लिए अपनी सुध-बुध खो बैठता है। कुछ लोग डिप्रेशन के कारण पागलपन का शिकार भी हो जाते हैं।

आज अवसाद (डिप्रेशन) शब्द से लगभग सभी लोग परिचित हैं, और साथ ही एक बड़ी संख्या में लोग इसका शिकार भी हो रहे हैं। अवसाद, हताशा, उदासी गहरी निराशा और इनसे सम्बंधित रोग चिकित्सा जगत में मेजर डिप्रेशन (Major depression), डिस्थाइमिया (Dysthymia), बायपोलर डिसऑर्डर या मेनिक डिप्रेशन (Bipolar disorder or manic depression), पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum depression), सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर (Seasonal affective disorder), आदि नामों से जाने जाते हैं।

वैसे हर किसी के जीवन में कभी-न-कभी ऐसे पल आते ही हैं, जब उसका मन बहुत उदास होता है। इसलिए शायद हर एक को लगता है कि हम गहरी निराशा के विषय में सब कुछ जानते हैं। परन्तु ऐसा नहीं है। कुछ के लिए तो यह निराशावादी स्थिति एक लंबे समय तक बनी रहती है। जिंदगी में अचानक, बिना किसी विशेष कारण के निराशा के काले बादल छा जाते हैं और लाख प्रयासों के बाद भी वे बादल छंटने का नाम नहीं लेते। अंततः हिम्मत जवाब दे जाती है और बिलकुल समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों हो रहा है।

इन परिस्थितियों में जीवन बोझ सा लगने लगता है, और निराशा की भावना से पूरा शरीर दर्द से कराह उठता है। कुछ का तो बाद में बिस्तर से उठ पाना भी लगभग असंभव सा हो जाता है। इसलिए प्रारंभिक अवस्था में ही ध्यान रखा जाना चाहिए कि, व्यक्ति हद से अधिक उदासी में न डूब जाये। समय रहते लक्षणों को पहचान कर किसी विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए व तदनुसार उपचार करवाना चाहिए।

दिनचर्या में बदलाव लाने, खानपान में फेरबदल करने तथा व्यायाम, ध्यान (Meditation) आदि से अच्छे परिणाम मिलते हैं। ध्यान रहे, डॉक्टर की सलाह के बिना दवाई लेने के भी बुरे परिणाम हो सकते हैं, तथा बीमारी जटिल हो सकती है। जरूरी नहीं की दवाई की आवश्यकता ही हो, अधिकांश मामलों में काऊँसलिंग की ही आवश्यकता होती है। सकारात्मक भाव पैदा करना ही सही उपचार है।

डिप्रेशन मानसिक लक्षणों के अतिरिक्त शारीरिक लक्षण भी प्रकट करता है, जिनमे दिल की धडकन में तेजी, कमजोरी, आलस्य तथा सिर दर्द प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त इस रोग से ग्रसित व्यक्ति का मन किसी काम में नहीं लगता, स्वभाव में चिडचिडापन आने लगता है, उदासी रहने लगती है, और वह शारीरिक स्तर पर भी थका-थका सा अनुभव करता है।

वैसे तो यह बीमारी किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति को हो सकती है, किन्तु देखने में आता है कि इस परिस्थितियों से पीडित किशोरावस्था के जातक तथा स्त्रियां अधिक होती हैं। कारण, कि इस रोग का केद्रबिन्दु मानव मन है, ओर मनमुखी व्यक्ति इसकी चपेट में जल्दी आ जाता है।

देखने में आता है कि किशोरावस्था एवं युवावस्था के जातक इस की चपेट में अधिक आते हैं, क्यों कि उनका मन अपने आगामी भविष्य के अकल्पनीय स्वप्न संजोने में तेजी से लगा रहता है। स्वप्नों की असीमित उड़ान, प्रेम में असफलता, प्यार में, व्यापार में अथवा नौकरी में धोखा होने के पश्चात जब किसी दूसरी वास्तविकता से उनका सामना होता है तो, मन अवसादग्रस्त होने लगता है।

क्या है इसका ईलाज और बचाव?- यद्यपि अध्यात्म शास्त्र कोई शारीरिक चिकित्सा शास्त्र नहीं है, तदापि मन और मस्तिष्क की बेहतर खुराक अवश्य है।

अध्यात्म शास्त्रीयों का मानना है कि, जिस प्रकार पेट की खुराक अन्न है, इसी प्रकार मन-बुद्धि की बेहतर खुराक आध्यात्मिक दर्शन शास्त्र है। स्वंय का ज्ञान (आत्मज्ञान) और ईश्वर को जानना ही बेहतर मानसिक उपचार है। इससे मनोदैहिक एवं मानसिक रोग या विकार शांत हो जाते हैं। मेरा तात्पर्य यहाँ ऐसे ज्ञानरूपी उपचार से है जो वेदान्त व भगवत्गीता आदि में उल्लेखित तथा स्वामी विवेकानंद, श्रीराम शर्मा आचार्य सरीखे वर्तमानकाल के विद्वानों द्वारा बताई गयी आत्मा, परमात्मा, कर्म, कर्मफल, पुनर्जन्म, संचित, प्रारब्ध, मोक्ष जैसे शब्दों की व्याख्या पर पूर्ण विश्वास करने से है। एवं पूर्ण आस्था के साथ जीवन के प्रत्येक प्रसंग को इन सिद्धांतों के साथ जोड़कर देखने से है।

अब अगर हम मानसिक अवसाद dipreshan का ज्योतिषीय कारण देखें तो, स्पष्ट है कि चन्द्रमा को ज्योतिष में मन का कारक माना गया है, और चन्द्रमा सभी ग्रहों में शीघ्र चलायमान ग्रह है, क्योंकि यह हमारी पृथ्वी के सबसे नजदीकी ग्रह है, इसलिए चन्दमा का हमारे मन-मस्तिष्क पर सबसे पहले और सब से अधिक प्रभाव पड़ता है। ज्योर्तिविज्ञान के अनुसार चन्द्रमा मन का कारक होने के साथ-साथ बड़ा सौम्य (नाजुक) ग्रह है, जिस किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में चन्द्रमा पाप ग्रह से पीड़ित होगा, वह किसी-न-किसी प्रकार से मानसिक अवसाद dipreshan का शिकार होगा। पाप ग्रह ससे पीड़ित होने का तात्पर्य है- किसी कुण्डली में चन्द्रमा राहु, केतु या शनि के साथ बैठा है, या इनमें से किसी की चन्द्रमा पर पूर्ण दृष्टि है तो, एेसा व्यक्तित्व अपने जीवनकाल में निश्चित रूप से मानसिक अवसाद का शिकार होता है। एेसे में यदि दो पाप ग्रहों- राहु व शनि अथवा केतु-शनि के साथ चन्द्रमा स्थित हो या दो पाप ग्रहों की चन्द्रमा पर पूर्ण दृष्टि हो, अथवा एक पापग्रह के साथ बैठा हो और दूसरे की पूर्ण दृष्टि हो, एेसी स्थिति में भी समस्या विकट हो जाती है। ज्योर्तिविज्ञान के अनुसार चन्द्रमा बुध के लिये शत्रु ग्रह है, मेरे अनुभव मे आया है कि जिस किसी जातक की जन्मकुंडली में चन्द्रमा बुध के साथ अथवा बुध से ग्रसित होगा और एेसी कुण्डली में चन्द्रमा पूर्णतः क्षीण होगा, या चन्द्रमा के आगे-पीछे कोई सौम्य ग्रह नहीं होता, या आगे-पीछे एक अथवा दो पापग्रह हों, कहने का तात्पर्य यह है कि दो पाप ग्रहों के मध्य चन्द्रमा अकेला हो तो, एेसा व्यक्ति मानसिक अवसाद dipreshan का शिकार हो जाता है।

पुस्तक- “रोग एवं ज्योतिष”

लेखक :- Dr.R.B.Dhawan

प्राप्ति स्थान :- http://www.shukracharya.com

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नक्षत्र और वनस्पति

 नक्षत्रों के लिए निर्धारित पेड़ पौधे :-


Dr.R.B.Dhawan

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक नक्षत्र के वृक्षों का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। उपाय की दृष्टि से जो जातक अपने जन्म नक्षत्र के वृक्षों  या पौधों को रोपित करता है, अथवा सींचता है, या उनका भरण पोषण करता है, उसकी आयु के साथ ऐश्वर्य व धन धान्य में भी वृद्धि होती है। ज्योतिष शास्त्र में 27 नक्षत्रों के जो वृक्ष बताए गये है, उसके अनुसार अश्वनी नक्षत्र के लिए कुचला का वृक्ष, भरणी नक्षत्र के लिए आंवला, कृतिका के लिए गूलर व स्वर्णशीरी, मृगशिरा के लिए खैर, आर्द्रा नक्षत्र का वृक्ष बहेडा, रोहणी के लिए जामुन व तुलसी बताया गया है । इसी प्रकार पुनर्वसु नक्षत्र के लिए बांस, पुष्य नक्षत्र के लिए पीपल, अश्लेशा के लिए नागकेसर, मघा के लिए बड़, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के लिए ढाक (पलास) का वृक्ष, तथा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के लिए रूद्राक्ष या पाकर लगाना उपयोगी माना जाता है। 13 वें स्थान के नक्षत्र हस्त में जन्में व्यक्ति रीठा व पाढ का वृक्ष, चित्रा नक्षत्र वाले बेल नारियल, स्वाती के लिए अर्जुन का वृक्ष, विशाखा नक्षत्र के लिए भटकटैया, अनुराधा नक्षत्र के लिए बकुल या मौलश्री, ज्येष्ठा नक्षत्र के लिए चीड़ या देवदारू व लोध का वृक्ष लगा सकते है। इसी प्रकार मूल नक्षत्र के लिए साल का वृक्ष, पूर्वाषाढ़ा के लिए अशोक या जलवेंत, उत्तराषाढा नक्षत्र के लिए कटहल या फालसा लगायें। श्रवण के लिए आक लगाये, धनिष्ठा नक्षत्र के लिए शमी लगाएं, शतभिषा नक्षत्र के लिए कदम्ब, पूर्वा भाद्रापदा नक्षत्र के लिए आम लगायें, उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र के लिए नीम तथा रेवती नक्षत्र के लिए महुआ का वृक्ष लगाना लाभकारी होता है। 

इस प्रकार सरल उपाय करके एक तरफ जहां हम पर्यावरण संरक्षण में सहायता करेंगे वहीं हम भौतिक, अध्यात्मिक तथा परलौकिक लाभ प्राप्त करने के लिए वृक्षारोपण कर अपने तथा समाज व देश के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे होंगे।

नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़-पौधे :-

1. अश्विनी –            कुचला

2. भरणी–               आंवला 

3. कृतिका –             गूलर

4. रोहिणी –             जामुन 

5. मृगशिरा –            खैर 

6. आर्द्रा–                शीशम 

7. पुनर्वसु –              बांस 

8. पुष्य –                  पीपल 

9. अश्लेषा –             नागकेसर

10. मघा –                  वट

11. पूर्वाफाल्गुनी –      पलास

12. उत्तराफाल्गुनी –    पाकड़

13. हस्त –                  रीठा

14. चित्रा –                 बेल

15. स्वाती-                 अर्जुन

16 विशाखा –            भटकटैया 

17. अनुराधा –            मौलसरी

18. ज्येष्ठा –                चीड़  

19. मूल –                   साल

20. पूर्वाषाढ़ा –            अशोक 

21. उत्तराषाढ़ –           फालसा

22. श्रवण –                मदार 

23. धनिष्ठा –               शमी

24. शतभिषा –            कदम्ब 

25. पूर्वभाद्रपद–          आम

26. उत्तराभाद्रपद –       नीम 

27. रेवती –                 महुआ


बारह राशि के पेड़-पौधे :-

मेष –        आंवला 

वृष –         जामुन

मिथुन –    शीशम

कर्क –       नागकेश्वर

सिंह –       पलास

कन्या –     रीठा

तुला –      अर्जुन

वृश्चिक –  मौलसरी

धनु –      जलवेतस

मकर –     अकोल

कुंभ –       कदम्ब 

मीन –       नीम

ग्रहों के पेड़ -पौधे :-

सूर्य –      अकोल

चन्द्रमा –  पलास

मंगल –    खैर

बुद्ध –     चिरचिरी

गुरु –      पीपल

शुक्र –     गुलड़

शनि –    शमी

राहु –      दुर्वा

केतु –     कुश

ग्रह, राशि, नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़ पौधे का प्रयोग करने से अंतश्चेतना में सकारात्मक सोच का संचार होता है, तत्पश्चात हमारी मनोकामनायें शनै शनै पूरी होती है ।

​ज्योतिष रोग और उपाय

Dr.R.B.Dhawan

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर बीमारी का समबन्ध किसी न किसी ग्रह से है, जो आपकी कुंडली में या तो कमजोर है, या फिर दुसरे ग्रहों से बुरी तरह पीड़ित है। यहाँ इस लेख में मैं सभी रोगों की चर्चा नहीं कर पाऊंगा, इसके लिए मेरी पुस्तक “रोग एवं ज्योतिष” का अध्ययन करने की सलाह दूंगा। यहां केवल सामान्य रोग जो आजकल बहुत से लोगों को हैं, उन्ही की चर्चा संक्षेप में करने की कोशिश करता हूँ। यदि स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है तो, आज धनवान कोई नहीं है, हर किसी को कोई न कोई रोग होता ही है। हर व्यक्ति के शरीर की संरचना अलग होती है। किसे कब क्या कष्ट होगा? यह तो डाक्टर भी नहीं बता सकता, परन्तु ज्योतिष इसकी पूर्वसूचना अवश्य दे देता है कि जातक कब और किस रोग से पीड़ित हो सकता है, या क्या व्याधि आपको शीघ्र प्रभावित करने वाली है। आईये ग्रहों की कमजोर स्थिति से कौन कौन से रोग हो सकते हैं जाने :-

सूर्य से संबंधित रोग  :-

सूर्य ग्रहों का राजा है, इसलिए यदि सूर्य आपका बलवान है तो बीमारियाँ कुछ भी हों आप कभी परवाह नहीं करेंगे, क्योंकि आपकी आत्मा बलवान होगी, और आप में आत्मबल भरपूर होगा। आप शरीर की मामूली व्याधियों की परवाह नहीं करेंगे। परन्तु सूर्य अच्छा नहीं है, कमजोर है तो, सबसे पहले आपके बाल झड़ेंगे, सर में दर्द अक्सर होगा और आपको अक्सर दर्द-निवारक का सहारा लेना ही पड़ेगा।

चन्द्रमा से सम्बन्धित रोग :-

चन्द्रमा संवेदनशील लोगों का अधिष्ठाता ग्रह है। यदि चन्द्रमा दुर्बल हुआ तो मन कमजोर होगा, और जातक भावुक अधिक होगा, कठोरता से तुरंत प्रभावित हो जाता है, और उसमें सहनशक्ति भी कम होगी। इसके बाद सर्दी जुकाम और खांसी कफ जैसी व्याधियों से शीग्र प्रभावित हो जायेगा, एसे लोगों को सलाह है कि संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में न आयें क्योंकि उनको भी संक्रमित होते देर नहीं लगेगी। चन्द्रमा अधिक कमजोर होने से नजला से पीड़ित होंगे, चन्द्रमा की वजह से नर्वस सिस्टम भी प्रभावित होता है।

मंगल से सम्बन्धित रोग :-

मंगल रक्त में ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है, परन्तु जिनका मंगल कमजोर होता है, रक्त की बीमारियों के अतिरिक्त जोश की कमी होगी। ऐसे व्यक्ति हर काम को धीरे-धीरे करेंगे, आपने देखा होगा कुछ लोग हमेशा सुस्त दिखाई देते हैं, और हर काम को भी उस ऊर्जा से नहीं कर पाते, अधिक खराब मंगल से चोट चपेट और एक्सीडेंट आदि का खतरा भी बना रहता है।

बुध से सम्बन्धित रोग :-

अच्छा बुध वाक्-चातुर्य और व्यक्ति को चालाक बनाता है, और कमजोर बुध बुद्धू या धूर्त बनाता है, आज के समय में यदि आप में वाक्-चातुर्य नहीं है तो दुसरे लोग आपका हर दिन फायदा उठाएंगे। भोले भाले लोगों का बुध अवश्य कमजोर होता है। अधिक खराब बुध से व्यक्ति को एलर्जी व चमड़ी के रोग अधिक होते हैं, नर्वसनेस, साँस की बीमारियाँ बुध के दूषित होने से होती हैं। बेहद खराब बुध से व्यक्ति के फेफड़े खराब होने का भय रहता है। व्यक्ति हकलाता है तो भी बुध के कारण और गूंगा बहरापन भी बुध के कारण ही होता है।

बृहस्पति से सम्बन्धित रोग :-

बृहस्पति जातक को ज्ञान देता है, विद्वान बनाता है, बुद्धिमान बनता है, परन्तु पढ़े लिखे लोग यदि मूर्खों जैसा व्यवहार करें तो, समझ लीजिये कि इस व्यक्ति का बृहस्पति कुंडली में खराब है। बृहस्पति सोचने समझने की शक्ति को प्रभावित करता है, और व्यक्ति जडमति हो जाता है। इसके अतिरिक्त बृहस्पति कमजोर होने से पीलिया या पेट के अन्य रोग होते हैं। बृहस्पति यदि दुष्ट ग्रहों से प्रभावित होकर लग्न को प्रभावित करता है तो, मोटापा देता है। अधिकतर लोग जो शरीर से काफी मोटे होते हैं, उनकी कुंडली में गुरु की स्थिति कुछ ऐसी ही होती है।

शुक्र से सम्बन्धित रोग :-

शुक्र मनोरंजन तथा एशो-आराम का कारक ग्रह है। शुक्र स्त्री, यौन सुख, वीर्य और हर प्रकार के सुख और सुन्दरता का कारक ग्रह है। यदि शुक्र की स्थिति कमजोर हो तो, जातक के जीवन से सुख के साधन तथा मनोरंजन को समाप्त कर देता है। नपुंसकता या सेक्स के प्रति अरुचि का कारण अधिकतर शुक्र ही होता है। मंगल की दृष्टि या प्रभाव निर्बल शुक्र पर हो तो, जातक को ब्लड शुगर हो जाती है। इसके अतिरिक्त शुक्र के अशुभ होने से व्यक्ति के शरीर को बेडोल बना देता है। बहुत अधिक पतला शरीर या ठिगना कद शुक्र की अशुभ स्थिति के कारण होते हैं।

शनि से सम्बन्धित रोग :-

शनि दर्द या दुःख का करता  ग्रह है, जितने प्रकार की शारीरिक व्याधियां हैं, उनके परिणामस्वरूप व्यक्ति को जो दुःख और कष्ट प्राप्त होता है, उसका कारक शनि होता है। शनि का प्रभाव दुसरे ग्रहों पर हो तो शनि उसी ग्रह से सम्बन्धित रोग देता है। शनि की दृष्टि सूर्य पर हो तो जातक कुछ भी कर ले सर दर्द कभी पीछा नहीं छोड़ता। चन्द्र पर हो तो जातक को नजला-जुकाम रहता है। मंगल पर हो तो, रक्त में न्यूनता या ब्लडप्रेशर, बुध पर हो तो नपुंसकता, गुरु पर हो तो मोटापा, शुक्र पर हो तो वीर्य के रोग या प्रजनन क्षमता को कमजोर करता है, और राहू पर शनि के प्रभाव से जातक को उच्च और निम्न रक्तचाप दोनों से पीड़ित    होना पड़ता है। केतु पर शनि के प्रभाव से जातक को गम्भीर रोग होते हैं, परन्तु कभी रोग का पता नहीं चलता, और एक उम्र निकल जाती है, पर बीमारियों से जातक जूझता रहता है। दवाई असर नहीं करती, और अधिक विकट स्थिति में लाइलाज रोग शनि ही आकर देता है |

राहू से सम्बन्धित रोग:-

राहू एक रहस्यमय ग्रह है, इसलिए राहू से जातक को जो रोग होंगे वह भी रहस्यमय ही होते हैं। एक के बाद दूसरी तकलीफ राहू से ही होती है। राहू अशुभ हो तो जातक की दवाई चलती रहती है, और डाक्टर के पास आना जाना लगा रहता है। किसी दवाई से रिएक्शन या एलर्जी राहू से ही होती है। यदि डाक्टर पूरी उम्र के लिए दवाई निर्धारित कर दे तो वह राहू के अशुभ प्रभाव से ही होती है। वहम यदि एक बीमारी है तो यह राहू देता है। डर के मारे हार्ट-अटैक राहू से ही होता है। अचानक हृदय गति रुक जाना या स्ट्रोक राहू से ही होता है।

केतु से सम्बन्धित रोग :-

केतु का संसार अलग है। यह जीवन और मृत्यु से परे है। जातक को यदि केतु से कुछ होना है तो, उसका पता देर से चलता है, यानी केतु से होने वाली बीमारी का पता चलना मुश्किल हो जाता है। केतु थोडा सा खराब हो तो, फोड़े फुंसियाँ देता है, और यदि थोडा और खराब हो तो, घाव जो देर तक न भरे वह केतु की वजह से ही होता है। केतु मनोविज्ञान से सम्बन्ध रखता है। ऊपरी असर या भूत-प्रेत बाधा केतु के कारण ही होती है। असफल इलाज के बाद दुबारा इलाज केतु के कारण आरंभ होता है।

नोट :- “रोग एवं ज्योतिष” इस सम्बन्ध में गम्भीरता से विचार करके अधिक से अधिक कुंडलियों का अध्ययन करने के पश्चात् यह किताब लिखी है। ज्योतिष के विद्यार्थियों को इस पुस्तक का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।

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बेलपत्र और भगवान शिव

बेल का वृक्ष और भगवान शिव :- 

Dr.R.B.Dhawan

बेलपत्र को संस्कृत में ‘बिल्वपत्र’ कहा जाता है, यह औषधी गुणों से भरपूर वृक्ष भगवान शिव को प्रिय है, पौराणिक मान्यता है कि बेलपत्र और जल से भगवान शंकर का अभिषेक करने से और पूजा में इनका प्रयोग करने से शिव जल्द प्रसन्न होते हैं। बेलपत्र का तोड़ने के लिए पुराणों में ऐसे निर्देश दिए गए हैं, जिससे धर्म का पालन भी हो जाये और वृक्षों का संरक्षण भी हो जाए, यही कारण है कि देवी-देवताओं को अर्पित किए जाने वाले फूल और पत्रों को तोड़ने के कुछ नियम हैं, बेलपत्र तोड़ने के भी कुछ नियम हैं :-  

1. चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथ‍ियों को, सं‍क्रांति के समय और सोमवार को बेलपत्र न तोड़ें। 

2. भगवान शंकर को बेलपत्र चढ़ाने के लिए इन तिथ‍ियों या वार से पहले तोड़ा गया पत्र ही चढ़ाना चाहिए।  

3. शास्त्रों में कहा गया है कि अगर नया बेलपत्र न मिल सके, तो किसी दूसरे के चढ़ाए हुए बेलपत्र को भी धोकर कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है। 

अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:।
शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि क्वचित्।।
(स्कंदपुराण) 

4. टहनी से चुन-चुनकर सिर्फ बेलपत्र ही तोड़ना चाहिए, कभी भी पूरी टहनी नहीं तोड़नी चाहिए। पत्र सावधानी से तोड़ना चाहिए कि वृक्ष को कोई हानि न पहुंचे। 

5. बेलपत्र तोड़ने से पहले और बाद में वृक्ष को मन ही मन प्रणाम करना चाहिए।

कैसे चढ़ाएं बेलपत्र :- भगवान शिव को बेल पत्र प्रिय हैं ही। साथ ही भगवान शिव के अंशावतार हनुमान जी को भी बेलपत्र अर्पित किया जा सकता है, भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाने से घर की धन-दौलत में वृद्धि होने लगती है, अधूरी कामनाएं पूर्ण होती हैं।

शिव पुराण के अनुसार सावन के सोमवार को शिवालय में बेलपत्र चढ़ाने से एक करोड़ कन्यादान के बराबर फल मिलता है।
बेलपत्र का वृक्ष हर कामना को पूरी करता है। यही नहीं उसके पत्तों को गंगा जल से धोकर उन्हें बजरंगबली पर अर्पित करने से अनेक तीर्थों का फल मिलता है।

बिल्व वृक्ष (बेल के पेड़) की जड़ सफेद धागे में पिरोकर रविवार को गले में धारण करने से रक्तचाप, क्रोध और असाध्य रोगों से रक्षा होती है। 
बिल्व वृक्ष का पूजन पाप व दरिद्रता का अंत कर वैभवशाली बनाने वाला माना गया है। घर में बेल पत्र लगाने से देवी महालक्ष्मी बहुत प्रसन्न होती हैं।

बेल पत्तों को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। इन्हें अपने पास रखने से कभी धन-दौलत का अभाव नहीं होता।

शिव पुराण के अनुसार :-  1. बिल्व वृक्ष के आसपास सर्प नहीं आते ।  

2. यदि किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर
गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है ।

3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता
सबसे अधिक बिल्व वृक्ष में होती है ।

4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला
परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल
मिलता है ।

5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल
वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है। 

6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता
है। 

7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।

8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट
लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। 

9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि
स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे । 

10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी
शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त
हो जाते है । 

11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव
से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को
चढ़ाने से क्या फल मिलता है :-

1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।

3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।यह सभी अन्न भगवान
को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए। 

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन सा रस
(द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है :-

1. ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से
शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी
जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2. नपुंसक व्यक्ति अगर शुद्ध घी से भगवान शिव का अभिषेक
करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो
उसकी समस्या का निदान संभव है।

3. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को
चढ़ाएं।

4. सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में
वृद्धि होती है।

5. शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों
की प्राप्ति होती है।

6. शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति
होती है।

7. मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा
(टीबी) रोग में आराम मिलता है।

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन का फूल
चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है :-

1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने
पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।

3. अलसी के फूल से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान
विष्णु को प्रिय होता है।

4. शमी पत्र (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती
है।

6. जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की
कमी नहीं होती।

7. कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।

8. हारसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि
होती है।

9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र
प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशनकरता है।

10. लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है। 

11. दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

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Aap Ka Bhavishya

Aap ka bhavishya एक एंड्रॉयड मोबाइल ऐप है, इस ऐप को लांच करने का प्रयोजन ज्योतिषीय मासिक “ई-पत्रिका” का प्रचार-प्रसार करना है। क्योंकि एक मासिक ज्योतिषीय पत्रिका के माध्यम से वैदिक विद्याओं या विषयों का प्रचार-प्रसार करना सरल है। यह प्रचार-प्रसार ज्ञानवर्धक लेखों‌ के रूप में पाठकों तक पहुंचाने का कार्य Aap Ka Bhavishya मासिक ज्योतिषीय “ई-पत्रिका” कर सकती है, इस ऐप के माध्यम से “Aap Ka Bhavishya” e-magazine के 12 अंक एक वर्ष में प्रकाशित लिए जाते हैं, इस लिए कोई भी Subscriber’s  एक वर्ष के लिए इस Astrological Magazine की Subscription ले सकता हैं। 

गुरुजी (Dr.R.B.Dhawan) ने “आप का भविष्य” हिन्दी मासिक ज्योतिषीय पत्रिका का प्रकाशन एवम् संपादन 2000 ईसवी सन् के जनवरी महिने से आरंभ किया था। 2000 से 2016 तक यह मैगजीन प्रिंट करके publish की जाती रही है, जो कि अब वर्ष 2017 से e-magazine के रूप में हर माह प्रकाशित हो रही है। गुरुजी का मानना है की “ज्योतिष विद्या” मनुष्य को भविष्य के लिए उपयोगी मार्गदर्शन देती रही है, साथ ही साथ ज्योतिष विज्ञान की सहायता से मनुष्य अपने भविष्य के लिए ठीक से planning भी कर सकता है। देखा जाए तो ज्योतिष ही एकमात्र ऐसा विज्ञान है, जो हमें हमारे भविष्य का संकेत देते हुए भविष्य के लिए उचित मार्गदर्शन देकर हमारी सहायता कर सकता है। ये विद्या हमारे ऋषियों-मुनियों के सैकड़ों वर्षों की खोज का परिणाम या उपलब्धि है। हमारे इन भविष्य-दृष्टा ऋषियों-मुनियों ने मानव जाति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने मानव जाति के विकास के लिए सैकड़ों विद्याओं को विकसित किया है, जिन्हें हम आज भी किसी ना किसी रूप में प्रयोग कर रहे हैं।

इस ज्योतिषीय पत्रिका Aap Ka Bhavishya में इन सभी वैदिक विद्याओं के आलेख प्रकाशित किए जाते रहे हैं, वे विद्या चाहे ज्योतिष हो, या आयुर्वेद अथवा मंत्र शास्त्र मनुष्य के आर्थिक-मानसिक-शारीरिक विकास में इनका एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है, और इस क्रम का बने रहना आवश्यक है, इसी लिए गुरुजी का मानना है कि, जब तक जीवन है, तब तक मानव जाति को ऋषियों-मुनियों की इस धरोहर का लाभ पहुंचना एक श्रेष्ठ कार्य होगा। और अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए गुरुजी Dr.R.B.Dhawan निरंतर इस प्रकाशन-संपादन के कार्य में अपना अधिकतम समय देते हैं। गुरुजी का मानना है कि अब समय आ गया है कि, इन सभी विद्याओं को नई Tachnology से जोड़ा जाए। “आप का भविष्य” को “ई-पत्रिका” में परिवर्तित करना इसी श्रंखला की एक कड़ी है, गुरुजी के इस पुनीत कार्य में Para Digital Technologies के सहयोग को कभी भुलाया नही जा सकता। जिस कम्पनी ने Aap Ka Bhavishya ज्योतिषीय पत्रिका को “ई-पत्रिका” का रूप देते हुए इस App की रचना और डिजाइन किया है, इस कार्य के लिए Mr. Pradeep Dhawan द्वारा की गई मेहनत सराहनीय है। इन्होंने अथक परिश्रम करते हुए अपना कीमती समय लगाया है। Para Digital Tachnology और Mr.Pradeep Dhawan जी के इस विशेष योगदान के लिए Shukracharya संस्थान सदा आभारी रहेगा।

Aap Ka Bhavishya App :- “आप का भविष्य” एप जो कि “ई-पत्रिका” है, आप गूगल प्ले स्टोर से अपने एन्ड्रोएड फोन में डाउनलोड कर सकते हैं। डाउनलोड करके आप तीन महीने के अंक फ्री देख सकते हैं, शेष सभी अंकों को देखने के लिए आपको Subscription लेनी होगी।  Subscribe करने के लिए 180/- वार्षिक फीस आनलाइन पे करने की सुविधा इस एप में है। एक वर्ष की मेम्बरशिप लेकर हर माह (12 माह तक) नया और पहले सभी अंकों को रीड कर सकते हैं।

Shukracharya

सैक्स और ज्योतिष

Dr.R.B.Dhawan

इस आलेख में कुछ ऐसे ज्योतिषीय योगों का उल्लेख कर रहा हूं, जो किसी जातक की कुंडली में यदि हैं, तो उस योग को बनाने वाले ग्रह जातक को सामान्य से अधिक कामुक sexy होने का संकेत देते हैं –

1. किसी भी जातक की लग्न कुंडली में मंगल+शुक्र की युति काम वासना को उग्र कर देती है, जन्म के ग्रह जन्मजात प्रवृति की ओर इशारा करते हैं, और वह जातक इस के प्रभाव से आजीवन प्रभावित-संचालित होता है। किसी व्यक्ति में इस भावना का प्रतिशत कम हो सकता है, और किसी में ज्यादा हो सकता है। ज्योतिष के विश्लेषण के अनुसार यह पता लगाया जा सकता है की जातक में काम भावना किस मात्रा में विद्यमान है। 

लग्न / लग्नेश :
1. यदि लग्न और बारहवें भाव के स्वामी एक हो कर केंद्र /त्रिकोण में बैठ जाएँ या एक दूसरे से केंद्रवर्ती हो या आपस में स्थान परिवर्तन कर रहे हों तो पर्वत योग का निर्माण होता है । इस योग के चलते जहां व्यक्ति भाग्यशाली , विद्या -प्रिय ,कर्म शील , दानी , यशस्वी , घर जमीन का अधिपति होता है, वहीं अत्यंत कामी और कभी कभी पर स्त्री गमन करने वाला भी होता है ।

2. यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो, तो ऐसे व्यक्ति की रूचि विपरीत सेक्स के प्रति अधिक होती है । उस व्यक्ति का पूरा चिंतन मनन ,विचार व्यवहार का केंद्र बिंदु उसका प्रिय ही होता है । 

3.तुला राशि में चन्द्रमा और शुक्र की युति जातक की काम वासना को कई गुणा बड़ा देती है । अगर इस युति पर राहु/मंगल की दृष्टि भी तो जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। 

4 तुला राशि में चार या अधिक ग्रहों की उपस्थिति भी  is baat का कारण बनती है ।  

5 सप्तम भाव में शुक्र की उपस्थिति जातक को कामुक बना देती है ।
शुक्र के ऊपर मंगल /राहु का प्रभाव जातक को काफी लोगों से शरीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए उकसाता है । 

6.शुक्र/मंगल के साथ युति जातक में काम वासना को काफी बड़ा देती है । 

7 शुक्र मंगल की उपस्थिति 8 /12 भाव में हो तो, जातक कामुक होता है । 

8. कामवासना बढ़ाने में द्वादश भाव के स्वामी का मुख्य रोल होता है अगर इस का स्वामी सप्तम भाव में आए या लग्न में आजाये और वह मुख्यत: शुक्र या मंगल हो, ऐसा जातक स्वभाव से लंपट और  बहुत सारी स्त्रियों से रिश्ता रखता है 4 7 या 12वे में हो, अथवा ईन दोनों ग्रहों का संबंध बन रहा हो तो, यह जातक के अत्यंत कामी sexy होने का संकेत है। ये ग्रह अधिक बलवान हों तो, जातक समय और दिन-रात की मर्यादा भूलकर सदैव सेक्स sex को आतुर रहता है। मंगल जोश है, और शुक्र भोग अतः इन दोनों की युति होने पर अधिकांश कुंडलियों में ये प्रभाव सही पाया गया है। ये बात वैध और अवैध दोनों संबंधो पर लागू होती है। 

9. कुंडली का चतुर्थ भाव सुख का होता है, सातवा भाव गुप्तांग secret part को दर्शाता है और 12वां भाव शय्या सुख…! अतः सप्तमेश और व्ययेश की युति 4, 7 या 12 में हो तो, जातक/जातिका अतिकामुक होते हैं। 

10. जातिका की कुंडली में यदि सप्तम में शुक्र+राहू या चंद्र+राहू हो और 12वें में गुरु हो तो, अधिकतर मामलो में पाया गया है कि शादी के बाद भी अवैध शारीरिक संबंध बनते हैं। तब संभावना और बड़ जाती है यदि वे सरकारी/प्राइवेट नौकरी में हो। 

11. जातक/जातिका की कुंडली में गुरु और शुक्र समसप्तक हो तो भी वे अतिकामुक योग है, और ये योग वैवाहिक जीवन married life के निजी सुखो personal relationship में वृद्धि करता है। जातक के मामले में यदि मंगल और शुक्र समसप्तक हो तो ये योग की सार्थकता सिद्ध होती है। 

12. नपुसंकता में सबसे बड़ा योगदान शनि और बुध का है, अतः यदि ये दोनों ग्रह सप्तम में हैं, या सप्तम पर दृष्टि दे रहे हैं तो, जातक/जातिका सेक्स sex के मामले में नीरस और अयोग्य होते हैं। जातक में उत्तेजना की कमी होती है। यदि 12वे भाव में ये युति हो या इन दोनों ग्रहों का दृष्टि संबंध हो तो, जातक शीघ्रपतन का रोगी होता है। और जतिका के मामले में वे ठंडी होती है। ये स्थिति और भी गंभीर हो सकती है, यदि राहू 1,7, 8 में हो तो,जातक व्यसन का आदि होकर अपनी जवानी धुएँ में उड़ा देता है। 

13. जातक की कुंडली में यदि सप्तम में राहू+शुक्र हों तो जातक के शुक्राणु sperm तेजहीन होते हैं, और संतान प्राप्ति हेतु बहुत संघर्ष करना होता है। संतान “दिव्यांग” भी पैदा हो सकती है।

14. जातिका की कुंडली में यदि सप्तम में मंगल+राहू हो या इन दोनों का एक साथ दृष्टि संबंध सप्तम में हो तो, जातिका को श्वेतप्रदर और अनियमित माहवारी period का कष्ट होता है। यदि मंगल ज्यादा बलवान हो तो माहवारी period के दौरान बहुत अधिक रक्तश्राव bleeding होता है। 

नोट- ये ज्योतिषीय योग हर मामले में लागू नहीं होते, ज्योतिष में भी कुछ मामले अपवाद होते हैं।
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