Sex and Astrology

By Best Astrologer in India:- Dr.R.B.Dhawan

इस आलेख में कुछ ऐसे ज्योतिषीय योग दे रहा हूं, जो किसी जातक की कुंडली में यदि हैं तो उस योग को बनाने वाले ग्रह जातक को सामान्य से अधिक कामुक sexy होने का संकेत देते हैं –

1. किसी भी जातक की लग्न कुंडली में मंगल+शुक्र की युति 4 7 या 12वे में हो अथवा ई दोनों ग्रहों का संबंध बन रहा हो तो, यह जातक के अत्यंत कामी sexy होने का संकेत है। ये ग्रह अधिक बलवान हों तो, जातक समय और दिन-रात की मर्यादा भूलकर सदैव सेक्स sex को आतुर रहता है। मंगल जोश है, और शुक्र भोग अतः ये युति होने पर अधिकांश कुंडलियों में ये प्रभाव सही पाया गया है। ये बात वैध और अवैध दोनों संबंधो पर लागू होता है।

2. कुंडली का चतुर्थ भाव सुख का होता है, सातवा भाव गुप्तांग secret part को दर्शाता है और 12वा भाव शय्या सुख…अतः सप्तमेश और व्ययेश की युति 4 7 या 12 में हो तो जातक/जातिका अतिकामुक होते है।

3. जातिका की कुंडली में यदि सप्तम में शुक्र+राहू या चंद्र+राहू हो और 12वे में गुरु हो तो अधिकतर मामलो में पाया गया है कि शादी के बाद भी अवैध शारीरिक संबंध बनते हैं। तब संभावना और बड़ जाती है यदि वे सरकारी/प्राइवेट नौकरी में हो।

4. जातक/जातिका की कुंडली में गुरु और शुक्र समसप्तक हो तो भी वे अतिकामुक योग है, और ये योग वैवाहिक जीवन married life के निजी सुखो personal relationship में वृद्धि करता है। जातक के मामले में यदि मंगल और शुक्र समसप्तक हो तो ये योग की सार्थकता सिद्ध होती है।

5. नपुसंकता में सबसे बड़ा योगदान शनि और बुध का है, अतः यदि ये दोनों ग्रह सप्तम में हैं, या सप्तम पर दृष्टि दे रहे हैं तो, जातक/जातिका सेक्स sex के मामले में नीरस और अयोग्य होते हैं। जातक में उत्तेजना की कमी होती है। यदि 12वे भाव में ये युति हो या इन दोनों ग्रहों का दृष्टि संबंध हो तो जातक शीघ्रपतन का रोगी होता है। और जतिका के मामले में वे ठंडी होती है। ये स्थिति और भी गंभीर हो सकती है, यदि राहू 1 7 8 में हो तो,जातक व्यसन का आदि होकर अपनी जवानी धुएँ में उड़ा देता है।

6. जातक की कुंडली में यदि सप्तम में राहू+शुक्र हों तो जातक के शुक्राणु sperm तेजहीन होते हैं, और संतान प्राप्ति हेतु बहुत संघर्ष करना होता है। संतान “दिव्यांग” भी पैदा हो सकती है।

7. जातिका की कुंडली में यदि सप्तम में मंगल+राहू हो या इन दोनों का एक साथ दृष्टि संबंध सप्तम में हो तो, जातिका को श्वेतप्रदर और अनियमित माहवारी period का कष्ट होता है। यदि मंगल ज्यादा बलवान हो तो माहवारी period के दौरान बहुत अधिक रक्तश्राव bleeding होता है।

नोट- ये ज्योतिषीय योग हर मामले में लागू नहीं होते, ज्योतिष में भी कुछ मामले अपवाद होते हैं।

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Shivling Pooja 

  • (शिवलिंग पूजा shivling pooja से मनेकामना manokamna सिद्धि)शिव के उस अपादान कारण को, जो अनादि और अनंत है, उसे लिंग कहते हैं। उसी गुणनात्मक मौलिक प्रकृति का नाम “माया” है, उसी से यह सम्पूर्ण जगत उत्पन्न हुआ है, होता रहेगा। जिसको जाना नहीं जा सकता, जो स्वंय ही कार्य के रूप में व्यक्त हुआ है, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है, और उसी में लीन हो जाना है, उसे ही लिंग कहते हैं। विश्व की उत्पत्ती और लय के हेतु (कारण) होने से ही उस परमपुरूष की लिंगता है। लिंग शिव का शरीर है, क्योंकि वह उसी रूप में अधिष्ठित हैं। लिंग के आधार रूप में जो तीन मेखला युक्त वेदिका है, वह भग रूप में कही जाने वाली जगतदात्री महाशक्ति हैं। इस प्रकार आधार सहित लिंग जगत का कारण है। यह उमा-महेश्वर स्वरूप है। भगवान शिव स्वयं ही ज्योतिर्लिंग स्वरूप तमस से परे हैं, लिंग और वेदी के समायोजन से ये अर्धनारीश्वर हैं।पूज्यो हरस्तु सर्वत्र लिंगे पूर्णोर्चनं भवेत।। (अग्निपुराण अध्याय ५४)
    संस्कृत में लिंग का अर्थ “चिन्ह” है। और इसी अर्थ में यह शिवलिंग shivling के लिये प्रयुक्त होता है। देवताओं की पूजा शरीर के रूप में हेती है, लेकिन परमपुरूष अशरीर हैं, इस लिये परम पुरूष की पूजा shivling Pooja दोनों प्रकार से होती है। जब पूजा शरीर के रूप मे होती है, तब वह शरीर अराधक की भावना के अनुरूप होता है। जब पूजा प्रतीक के रूप में होती है, तब यह प्रतीक अनंत होता है। क्यों की ब्रह्माण्ड की कल्पना ही अण्डाकर रूप में होती है, इस लिये कोई जब अनंत या ज्योति का स्वरूप बनाना चाहेगा, तब प्रकृति को अभिव्यक्त करने के लिये लिंग के साथ तीन मेखला वाली वेदी बनानी पड़ती है, क्योंकि प्रकृति त्रिगुणात्मक (सत्व-रज-तम) है, इस वेदी को भग कहते हैं। लेकिन यहां भग का अर्थ स्त्री जननेद्रीय नहीं है। भगवान शब्द में जो भग है उसका अर्थ है:- एेश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य है। सम्पूर्ण जगत में एकीभूत है। इस अर्थ में वेदिका निखिलेश्वर्यमयी महा शक्ति है।परमपुरूष शिव की सनातन (पौराणिक) मत में पांच रूपों में उपासना करने की परम्परा है, इसे ही पंचदेवोपासना कहते हैं:- शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश ओर सूर्य। इन पांचो का ही गोल प्रतीक आपने देखा है। शिवलिंग shivling पर चर्चा हम कर ही रहे हैं। विष्णु के प्रतीक शालिग्राम shaligram आपने सभी वैष्णव मंदिरों में देखा है। विष्णु के जितने अवतार हैं, लक्षणभेद से शालिग्राम shaligram शिला के साथ भी गोमती चक्र रखना पड़ता है। यह महाप्रकृति का एेश्वर्यमय भग स्वरूप है। जो शिवलिंगार्चन में वेदिका के रूप में है। इसी प्रकार शक्ति की गोल पिण्डियां देश के अनेक शक्ति स्थानों में विद्यमान हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो कालीपीठ पर   शक्ति केवल पिण्डियों के रूप में ही स्थापित होती हैं। गणेशजी की स्थापना प्राय: प्रत्येक पूजन के आरम्भ में सुपारी अथवा गोबर की गोल पिण्डियाें पर ब्राह्मणों को करवाते आपने देखा ही होगा। भगवान सूर्य का प्रत्यक्ष प्रतीक आकाश का सूर्य-मण्डल जैसा है। आप जानते हैं, जहां भी ग्रहों के चक्र बनाये जाते हैं, सूर्यमण्डल को अण्डाकर ही बनाना पड़ता है। इस प्रकार इन पंचदेवों की लिंग मानकर अर्थात् चिन्ह बनाकर ही इनकी उपासना होती है।पार्थिव लिंग की पूजा और महत्व:-जो लिंग बांबी, गंगा, तलाब, वैश्या के घर, घुड़साल की मिट्टी मक्खन या मिश्री से बनाये जाते हैं, उनका अलग-अलग मनेकामना के लिये उपासना, पूजा व अभिषेक करने के उपरांत उन्हें जल में विसर्जित करने का विधान है।पार्थिव लिंग के तांत्रिक प्रयोगों से प्रयोजन सिद्धियां:-1. भू सम्पत्ती प्राप्त करने के लिये- फूलों से बनाये गये शिवलिंग shivling का अभिषेक करें।2. स्वास्थ्य और संतान के लिये- जौ, गेहूं और चावल तीनों के आटे को बराबर मात्रा में लेकर, शिवलिंग shivling बनाकर उसकी पूजा करें।3. असाध्य रोग से छुटकारा पाने के लिये- मिश्री से बनाये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    4. सुख-शांति के लिये- चीनी की चाशनी से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    5. वंश वृद्धि के लिये- बांस के अंकुर से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    6. आर्थिक समृद्धि के लिये- दही का पानी कपडे से निचोड़ लें और उस बिना पानी वाली दही से जो शिवलिंग shivling बनेगा, उसका पूजन करने से समृद्धि प्राप्त होती है।

    7. शिव सायुज्य के लिये- कस्तूरी और चंदन से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    8. वशीकरण के लिये- त्रिकुटा (सोंठ, मिर्च व पीपल के चूर्ण में नमक मिलाकर शिवलिंग shivling बनता है, उसकी पूजा की जाती है।

    10. अभिलाषा पूर्ति के लिये- भीगे तिलों को पीसकर बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    11. अभिष्ट फल की प्राप्ति के लिये- यज्ञ कुण्ड से ली गई भस्म का शिवलिंग shivling बनाकर उसकी पूजा करें। 

    12. प्रीति बढ़ाने के लिये- गुड़ की डली से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    13. कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये- गुड़ में अन्न चिपकाकर उस से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    14. फल वाटिका में फल की अधिक पैदावार के लिये- उसी फल को शिवलिंग shivling के समान रखकर उस फल की पूजा करें।

    15. मुक्ति प्राप्त करने के लिये- आंवले को पीसकर उस से बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    16. स्त्रीयों के लिये सौभाग्य प्रदाता- मक्खन को अथवा वृक्षों के पत्तों को पीसकर बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    17. आकाल मृत्यु भय दूर करने के लिये- दूर्वा को शिवलिंगाकार गूंथकर उस की पूजा करें।

    18. भक्ति और मुक्ति के लिये- कपूर से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    19. तंत्र में सिद्धि के लिये- लौह से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    20. स्त्रीयों के भाग्य में वृद्धि- मोती से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    21. सुख-समृद्धि के लिये- स्वर्ण से बने शिवलिंग shivling का पूजन करें।

    22. धन-धान्य वृद्धि के लिये- चांदी से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    23. दरिद्रता निवारण के लिये- पारद (पारा) के शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    24. शत्रुता निवारण के लिये- पीतल से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    25. कर्ज निवारण के लिये- कांस्य से निर्मित शिवलिंग shivling की पूजा करें।

    — Dr. R. B. Dhawan (Top Astrologer in Delhi), experience astrologer in Delhi, best Astrologer in India

Dr.R.B.Dhawan

जब मैंने पहली पुस्तक लिखी- “गुरूजी के टोटके” (यह मेरी पहली पुस्तक थी) जो मैंने 2005 में लिखी थी। इस पुस्तक के लिये मैने लेख “छोटे-छोटे कामयाब टोटके इक्ट्ठे करने थे, परंतु इसके लिये मुझे तलाश थी कम से कम 60 से 100 वर्ष पुरानें हिन्दी के पंचांगों की। मुझे पूरा यकीन था एैसे लेख “टोटके” पुराने पंचांगों में बेहतरीन मिल सकते हैं, परंतु इतने पुराने जमाने के पंचांग मिलेंगे कहां ? एक दिन अचानक मुझे एक कबाड़ी के गोदाम की ओर देखने से कुछ बहुत पुराने परंतु जिल्दों में सहेजे हुये पुराने पंचांगों के बहुत सारे अंक मिल गये। बस मन की इच्छा जैसे पूर्ण हो गई, कबाड़ी वाले ने बाद में बताया की एक विद्वान बुजुर्ग ब्राह्मण की मृत्यु के बाद उसकी पूरी लायब्रेरी को वह कबाड़ी खरीद लाया था। बस मेरे लिये तो वह एक खजाना साबित हुआ। एक वर्ष की मेहनत के बाद “गुरूजी के टोटके” 1500 शानदार तथा हर समस्या के लिये एक-से-एक लाजवाब टोटकों से युक्त यह पुस्तक छपकर तैयार थी।
अब इस पुस्तक को शानदार लुक मैं देना चाहता था। अनेक सुंदर जिल्दों में से लाल रंग की जिल्द पर गोल्डन कलर से पुस्तक का नाम लिखवाने के बाद तो जैसे इस पुस्तक को चार चांद लग गये हों। पुस्तक के बाजार मे उतारते ही भारी सफलता मिली। हाथों-हाथ 1000 पुस्तकें बिक गई, खूब ख्याति भी मिली, और उपयोगी ज्योतिषीय विषयों पर पुस्तकें लिखने की प्रेरणा भी मिली, आज 10 वर्ष के बाद ईश्वर कृपा से 10 अन्य पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, पाठकों से बहुत प्यार मिल रहा है।
मेरी सभी ज्योतिष और उपाय की पुस्तकें http://www.shukracharya.com पर उपलब्ध हैं।

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Critical Disease

“अच्युताय नमः, अनन्ताय नमः, गोविन्दाय नमः।
इस मंत्र का 40 दिन श्रद्धापूर्वक जप करने से असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं। (यह सफल प्रयोग है।)

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Vashikaran Tantra

By best Astrologer in India:- वशीकरण एक ऐसा शब्द है, जो रहस्यमय लगता है, शायद इसी लिए हर कोई इसका प्रयोग कर अपना कार्य सिद्ध करना चाहता है। आज के युग में अधिकांश लोग इसे बकवास मानते हैं।

पौराणिक काल में इस विद्या का मानव जीवन पर कितना प्रभाव रहा है ? या इसका भी कोई विज्ञान है ? यही जानने का प्रयास करते है : – वशीकरण vashikaran क्रिया का ये रहस्य समझने के लिए सबसे पहले अपने शारीरिक, अपने मन तथा अपने मस्तिष्क की कार्यपद्धति के रहस्य को समझना होगा, जिसके द्वारा हम सोचने और समझने की शक्ति रखते है, और हम कल्पना करने की क्षमता रखते है, अपने मन में शुभ या अशुभ विचार लाते हैं। तो ऐसी कौन सी शक्ति या क्रिया है, जिसके द्वारा हम लोगों के मन पर अपना प्रभाव डाल सकते हैं, अथवा ऐसी क्षमता प्राप्त करके दूसरों को वशीभूत vashibhut कर सकते हैं। आइए इस विज्ञान को समझें :- 

पहले तो ये जान लीजिए “वशीकरण” शब्द अधूरा है, पूर्ण शब्द “वशीभूत” है, वशीकरण vashikran शब्द तो वशीभूत vashibhut क्रिया के लिए के लिए प्रयोग होता है। किसी दूसरे मनुष्य या प्राणी को वशीभूत करने के लिए पंचभूत सिद्धांत को समझना होगा, क्योंकि मनुष्य शरीर पांच भूतों से बना है, 1. पृथ्वी 2. अग्नि 3. वायु  4. जल और 5. आकाश, ये सभी पंचभूत हैं। ये सभी परस्पर बलवान हैं, इनमें सबसे बलवान आकाश भूत है, आकाश अर्थात आत्मा (आत्मा का निवास मस्तिष्क भाग में है)। वशीभूत vashikrat होने के पश्चात वशीभूत vashibhut होने वाले मनुष्य या प्राणी के मस्तिष्क पर वशीभूत करने वाले मनुष्य का आकाश भूत अपना अधिकार कर लेता है, और वे वशीभूत vashikrat करने वाले की किसी निश्चित समय के लिए संबंधित (केवल प्रयोजन से संबंधित) आज्ञा का पालन करने लगता है, अर्थात यह अधिकार वशीकृत करने वाले को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होता, अपितु जिस स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए वशीकृत किया जाता है, केवल उसी विशेष प्रयोजन के लिए जितना भाग (आकाश तत्व का भाग) ही वशीकृत होता है। किसी विशेष प्रयोजन, कर्म या क्रिया के लिए, और किसी निश्चित अवधि के लिए ही किसी को वशीकृत किया जा सकता है। पूरी तरह इस विज्ञान को (इस पद्धति को) बिना समझे हम वशीकरण vashikaran की क्रिया को नहीं समझ सकते है, ना ही इस क्रिया को सफल बना सकते है।

यहां वशीकरण vashikaran का एक ‘तंत्र प्रयोग’ प्रस्तुत कर रहे है, आवश्यकता होने पर इस तंत्र प्रयोग को आप सम्पन्न कर सकते हैं, और कभी-कभी एेसा प्रयोग करना जरूरी हो जाता है :-
यहां तंत्र का एक सरल vashikaran ‘वशीकरण प्रयोग’ दे रहा हूँ, यह प्रयोग बहुत प्रभावशाली है, इस प्रयोग का अन्य ‘तांत्रिक प्रयोग’ की तरह कोई दुष्प्रभाव भी नहीं है, परंतु यह सफल तभी होता है जब इस ‘तंत्र प्रयोग’ का नाजायज इस्तेमाल नहीं किया जाये।
सरल वशीकरण Easy vashikaran – जब कोई अधिकारी, मालिक, रिश्ते में सम्बंधी अथवा पति या पत्नी नाराज हो जायें, तब उन्हें मनाना जरूरी हो जाता है। एेसे में कठिनाइयां अधिक हो रही हों, तब यह ‘तंत्र प्रयोग’ प्रयोग जायज है।
प्रयोग व सामग्री-
एक पीपल का पत्ता, अनार की कलम, लाल चंदन की लकड़ी, एक थाली, एक आचमनी या चम्मच, और एक तांबे का लोटा।
रात्रि में पवित्र भाव से एक शुद्ध आसन पर उत्तराभिमुख होकर बैठें, सामने एक थाली में पीपल के पत्ते पर लाल चंदन की स्याही से अनार की कलम द्वारा जिसका वशीकरण करना हो, उसका नाम लिखकर पत्ता उल्टा करके रख दें। लोटा जो जल से भरा हो, उसमें से एक-एक आचमनी या चम्मच पानी लेकर पीपल के पत्ते पर एक-एक मंत्र का उच्चारण करते हुये डालते रहें, 108 बार जल मंत्र पढ़ते हुये डालना है। मंत्र पाठ के समय दुर्गा वेशधारी माता गायत्री का ध्यान करें।
साधारण अवस्था में यह प्रयोग एक सप्ताह (सात दिन) में ही अपना प्रभाव दिखा देता है, परंतु यदि समस्या गहरी हो तो, अधिक दिन भी करना पड़ता है।
मंत्र- ॐ क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

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astrology (ज्योतिष)

By Best Astrologer in India:- ज्योतिष (ज्योति+ईश= ज्योतिष) विज्ञान से बढ़कर पराविज्ञान है, कैसै ? आईये मैं बताता हूँ – ( विचार: Best Astrologer in Delhi)
सभी जानते हैं की ज्योतिष ग्रह-नक्षत्रों की विद्या है। ईसके तीन स्तम्भ (भाग) हैं, प्रथम भाग सिद्धांत जिसे ज्योतिषीय गणना कहा जा सकता है। दूसरा भाग संहिता जिस के सिद्धांत समझकर विद्वान पृथ्वी पर घटने वाली किसी भी भौगोलिक तथा राष्ट्रीय (किसी भी देश या विश्व में घटने वाली राजनैतिक) भविष्यवाणीयां कर सकता है। तीसरा और महत्वपूर्ण भाग “होरा” है, जिसका विशेषज्ञ विद्वान (Beat Astrologer in Delhi) व्यक्ति के जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति (जन्मकुण्डली) को देखकर भविष्यवाणी (फलादेश) करता है।
जन्मकुण्डली का फलादेश करने वाला विद्वान किसी भी व्यक्ति की कुण्डली देखकर उसके भूत-भविष्य और वर्तमान तीनो काल की घटित तथा घटने वाली घटनाओं का विवरण बता सकता है। केवल इतना ही नहीं इस के गहन अध्ययन व अभ्यास से पूर्व जन्म, वर्तमान तथा पुनर्जन्म के विषय में भी संकेत मिलते हैं।
क्या आज विज्ञान के युग में अभी तक भी ज्योतिष के अतिरिक्त कोई पद्धति है, जो भूत-भविष्य तथा वर्तमान तीन काल की जानकारी देती हो ? आधुनिक विज्ञान केवल भौतिक जगत के बारे में जानकारी दे सकता है। सूक्ष्म जगत में तो इसने अभी प्रवेश ही नहीं किया। जबकी वेदों की इस विद्या (ज्योतिष) के रचनाकार हमारे पूर्वज ऋषियों ने सूक्ष्म जगत में न केवल प्रवेश किया बल्कि सूक्ष्म जगत के करोड़ो रहस्यों को जाना समझा और उनके सिद्धांतों सहित हजारों रहस्यों को ग्रन्थों में लिखकर आगे की पीढियों को लाभान्वित किया है। आत्मा से परमात्मा का सम्बंध, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और विनाश के रहस्य, हर ग्रह-नक्षत्र का मनुष्य या धरती पर पढने वाला प्रभाव, खगोलिय घटनाओं तथा ग्रहणादि के सिद्धांत वेदों के रूप में हमें सौंप गये। वेद की 6 विद्याओं में एक महत्वपूर्ण विद्या ज्योतिष है, यह विद्या भौतिक और सूक्षम (लौकिक-पारलौकिक) दोनों के रहस्य अपने भीतर समेटे हुये है। इसी लिये यह विद्या विज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण (अलौकिक) है।

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paralysis (पक्षाघात भाग-1)

By best Astrologer in India, पक्षाघात, लकवा या फालिज़ में शरीर के दाहिने या बायें या फिर किसी पार्शव के कुछ या सब अंग क्रियाहीन या चेतनाहीन हो जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह रोग वायु के कूपित हो जाने के कारण होता है। अंग्रेजी भाषा में इसे paralysis कहा जाता है, इसमें तंत्रिका-तंत्र संस्थान nerves system के कार्य में बाधा या कार्यक्षमता की क्षीणता हो जाती है।
फलित ज्योतिष में तंत्रिका-तंत्र संस्थान nerves system से सम्बंधित रोगों का सूचक बुध ग्रह है। इस बुध ग्रह के कारकत्व में तंत्रिका-तंत्र तथा स्नायु प्रदेश के लिये कारक ग्रह शनि है, इस स्नायु प्रदेश तथा तंत्रिका-तंत्र के बाधित होने के पीछे कुण्डली में बुध ग्रह पर शनि ग्रह का प्रभाव होता है। शनि ग्रह जब कुण्डली के बुध ग्रह पर अपना दूषित प्रभाव डाल रहा हो तब शरीर के किसी अंग का संज्ञाहीन होना या अंगहीनता होती है। शनि ग्रह स्वंय लंगडा ग्रह माना गया है। इस के साथ-साथ कुण्डली में रोग का विचार छटे भाव या या उस भाव के कारक शनि एवं मंगल से किया जाता है। इसी प्रकार राशि वर्ग की छटी राशि कन्या भी इस रोग के निर्धारण में विचारणीय मानी जाती है। कुण्डली के आठवें और बारहवें भाव का विचार भी आवश्यक है, क्योकि इनसे यह जानने में सहायता मिलती है कि रोग दीर्घकाल तक चलेगा या अल्प काल तक? पक्षाघात paralysis या लकवा मुख्यतः एक जटिल रोग है, जातक की कुंडली मे इस रोग की कितनी संभावना है? यह जानने के लिये कुछ ज्योतिष के ग्रन्थों में ग्रहयोग वर्णित हैं- यदि कुण्डली का लग्न कन्या है, और लग्न व लग्नेश बुध अशुभ ग्रहों से पीड़ित है तो, तंत्रिका-तंत्र nerves system पर अवश्य इस रोग का आक्रमण संम्भव है। धनु या कुम्भ के मामले में भी इस रोग का आक्रमण हो सकता है। यह राशियां अशुभ ग्रहों द्वारा पीड़ित होने पर ही इस रोग की सूचना देती हैं। अशुभ शनि छटे भाव में पैर के रोग की ओर संकेत करता है, जातक लचक कर या लंगडाकर चलता है। यह पक्षाघात के अलावा जन्म से या फिर पैर में कोई गंभीर चोट लगने से भी हो सकता है।
(Dr.R.B.Dhawa द्वारा लिखित नई प्रकाशित पुस्तक के अंश।)
क्रमशः           

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depression

By best Astrologer in India:- सभी जानते हैं- वर्तमान युग भागदौड़ और कशमकश भरा है। आज के युग में हर इंसान मशीन के जैसे जीवनयापन करने के लिये मजबूर है। कारण हर इंसान की आकांक्षाएं और महत्वकांशायें इतनी हो गई हैं कि, वह किसी भी तरह से अपने आप से संतुष्ट नहीं हो पा रहा है, और इस कारण आम आदमी भारी तनाव में जीवन जीने के लिये मजबूर हो रहा है।
डाक्टरों एवं वर्तमान मेडिकल साइंस के रिसर्च को मानें तो, प्रति दस व्यक्ति में से दो व्यक्ति मानसिक अवसाद dipreshan से घिरे हैं, और सीधी बात डिप्रेशन के शिकार हैं, एेसा क्यूं? कारण स्पष्ट है कि मानसिक संतुष्टि का न होना। अब यह मानसिक संतुष्टि कैसे हो सकती है? परंतु मानसिक असंतुष्टि किसी भी प्रकार से हो सकती है। किसी को अपने काम से संतोष नहीं है, तो किसी को पारिवारिक क्लेश है, किसी को पैसे की कमी खलती है, तो कोई अपने शरीर से दुःखी है, और कोई सिर्फ इसलिये दुःखी है कि उसके रिश्तेदार या पड़ोसी क्यों सुखी हैं। कुल मिलाकर सभी के दुःखों का अपना-अपना कोई न कोई कारण है। अगर हम किसी के दुःख या dipreshan का कारण जानें तो, हमें यह ज्ञात होगा कि, जिसे वह अपना दुःख समझ रहा है, वह दरअसल उसका दुःख है ही नहीं, मात्र उसके मन का भ्रम अथवा जीवन की वह कमजोरी है जिसे वह सही तरीके से अभिव्यक्त नहीं कर पाता और धीरे-धीरे मानसिक अवसाद dipreshan का शिकार हो जाता है।
देखने मे आता है कि उच्च प्रतिष्ठित परिवारों के सदस्य भी, जिनके जीवन में कहीं किसी प्रकार की भौतित सुखों की कमी नहीं होती है, और वह भी उच्च पदासीन होते हैं, बावजूद इसके वह आत्महत्या जैसा जघन्य कार्य कर लेते हैं, अथवा किसी की हत्या जैसा घृणित कार्य भी कर देते हैं, कारण सिर्फ मानसिक अवसाद, मानसिक उत्तेजना।
अब अगर हम मानसिक अवसाद dipreshan का ज्योतिषीय कारण देखें तो, स्पष्ट है कि चन्द्रमा को ज्योतिष में मन का कारक माना गया है, और चन्द्रमा सभी ग्रहों में शीघ्र चलायमान ग्रह है, क्योंकि यह हमारी पृथ्वी के सबसे नजदीकी ग्रह है, इसलिए चन्दमा का हमारे मन-मस्तिष्क पर सबसे पहले और सब से अधिक प्रभाव पड़ता है। ज्योर्तिविज्ञान के अनुसार चन्द्रमा मन का कारक होने के साथ-साथ बड़ा सौम्य (नाजुक)  ग्रह है, जिस किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में चन्द्रमा पाप ग्रह से पीड़ित होगा, वह किसी-न-किसी प्रकार से मानसिक अवसाद dipreshan का शिकार होगा। पाप ग्रह ससे पीड़ित होने का तात्पर्य है- किसी कुण्डली में चन्द्रमा राहु, केतु या शनि के साथ बैठा है, या इनमें से किसी की चन्द्रमा पर पूर्ण दृष्टि है तो, एेसा व्यक्तित्व अपने जीवनकाल में निश्चित रूप से मानसिक अवसाद का शिकार होता है। एेसे में यदि दो पाप ग्रहों- राहु व शनि अथवा केतु-शनि के साथ चन्द्रमा स्थित हो या दो पाप ग्रहों की चन्द्रमा पर पूर्ण दृष्टि हो, अथवा एक पापग्रह के साथ बैठा हो और दूसरे की पूर्ण दृष्टि हो, एेसी स्थिति में भी समस्या विकट हो जाती है। ज्योर्तिविज्ञान के अनुसार चन्द्रमा बुध के लिये शत्रु ग्रह है, मेरे अनुभव मे आया है कि जिस किसी जातक की जन्मकुंडली में चन्द्रमा बुध के साथ अथवा बुध से ग्रसित होगा और एेसी कुण्डली में चन्द्रमा पूर्णतः क्षीण होगा, या चन्द्रमा के आगे-पीछे कोई सौम्य ग्रह नहीं होता, या आगे-पीछे एक अथवा दो पापग्रह हों, कहने का तात्पर्य यह है कि दो पाप ग्रहों के मध्य चन्द्रमा अकेला हो तो, एेसा व्यक्ति मानसिक अवसाद dipreshan का शिकार हो जाता है।
                                           क्रमशः
पुस्तक- “रोग एवं ज्योतिष” पृष्ठ संख्या- 84 

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प्रकाशन- शुक्राचार्य, दिल्ली।
पुस्तक प्राप्ति स्थान- http://www.shukracharya.com

medical astrology

By best Astrologer in India:- ज्योतिषीय उपचार-  मानव जीवन के साथ ही रोग का इतिहास भी आरम्भ हो जाता है, रोगों से रक्षा हेतु मानव ने प्रारम्भ से ही प्रयास आरम्भ कर दिया था। तथा आज तक इसके निदान एवं उपचार हेतु प्रयत्न कर रहा है। जब हैजा, प्लेग, टी. बी. आदि संक्रामक रोगों से ग्रस्त होकर इनसे छुटकारा पाने के लिये विविध प्रकार का अन्वेषण हुआ तो कालांतर में पुनः कैंसर एड्स, डेंगू,  स्वाईन फ्लू, ओर फिर ईबोला जैसे अनेक नये रोग पैदा हो गये हैं, जिनके समाधान एवं उपचार हेतु आज समस्त विश्व प्रयत्नशील है। विडंबना है कि मनुष्य जितना ही प्राकृतिक रहस्यों को खोजने का प्रयत्न करता है, प्रकृति उतना ही अपना विस्तार व्यापक करती चली जाती है। जिससे समाधान के समस्त प्रयास विश्व के लिये नगण्य पड़ जाते हैं, इसका एक कारण मनुष्य में सदाचार का आभाव भी प्रतीत होता है।
हमारे ऋषियों ने जहां अणुवाद, प्रमाणुवाद को  व्याखयायित किया, अध्यात्म की गहराइयों में गोता लगाया, सांख्य के प्रकृति एवं पुरूष से सृष्टि प्रक्रिया को जोड़ा, वहीं आकाशीय ग्रह नक्षत्रों को अपनी समाधी से कोसों दूर धरती पर बैठकर वेधित किया, तथा उनके धरती पर पड़ने वाले शुभाशुभ प्रभाव को मानव जीवन तथा रोगों के साथ जोड़कर व्याखयायित भी किया। विश्व के सर्वप्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद से रोगों का परिज्ञान आरम्भ हो जाता है। जिसमें पाण्डूरोग, ह्रदय रोग, उदररोग, एवं नेत्ररोग की चर्चा प्राप्त होती है। पौराणिक कथाओं में तो विविध रोगों की चर्चा एवं उपचार के लिये औषधि, मंत्र एवं तंत्र आदि का प्रयोग प्राप्त होता है। आर्ष परम्परा में तो रोगों के विनिश्चयार्थ ज्योतिषीय, शास्त्रीय ग्रहयोगों सहित आयुर्वेदीय परम्परा का प्रयोग दर्शनीय है।
मेरी यह पुस्तक “रोग एवं ज्योतिष” (medical astrology) जिसमें अधिकांश रोगों के ज्योतिषीय कारण या कह लीजिये रोगों के ग्रहयोग जो प्राचीन तथा नवीन खोजों पर आधारित हैं दिये गये हैं, साथ ही इन रोगों की शास्त्रीय मंत्रादि द्वारा उपचार भी यथासम्भव दिया गया है। मेरे विचार से यह पुस्तक ज्योतिष का रोगात्मक अध्ययन करने वाले विद्वानों तथा खोज करने, अनुसंधान करने वालो के लिये बहुत सहायक होगी।

       शुक्राचार्य संस्थान द्वारा ज्योर्तिविज्ञान के साथ साथ सरल उपाय की कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित की गई हैं, जिन में प्रमुख हैं —
1. गुरूजी के टोटके
2. गुरूजी की साधनाएँ
3. वास्तु सूत्र
4. कैसे बदलें भाग्य
5. दुर्लभ समृद्धि प्रदायक वस्तुयें
6. भृगु संहिता योग एंव फलादेश
7. लाल किताब योग एंव उपाय
8. ज्योतिष के योग फलादेश
9. रोग एवं ज्योतिष
10. विवाह एवं दाम्पत्य सुख

 Experience astrologer in Delhi:- Dr.R.B.Dhawan,

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Laxmi

By best Astrologer in India:-   यह साधना प्रयोग एक तांत्रिक प्रयोग हैं, जिसको सम्पन्न करने के पश्चात कोई भी साधक स्वयं में तथा अपनी आर्थिक स्थिति में भारी परिवर्तन महसूस करने लगता है। इस प्रयोग से न केवल लक्ष्मी (Laxmi) की वर्षा (आमदनी आश्चर्य जनक ढंग से बढ़ जाना) होती है, बल्कि व्यक्तित्व में, आकर्षक परिवर्तन भी होने लगता है। कर लीजिये यह प्रयोग फिर देखीये कैसे “छम्-छम् बरसेगी लक्ष्मी” ।
साधना विधि- यह दीपावली (Deepawali) की विशेष साधना है, और यह साधना एक दिवसीय रात्रिकालीन साधना है, दीपावली (Deepawali) की रात्रि में यह प्रयोग सम्पन्न करने से माता लक्ष्मी अत्यधिक प्रसन्न होती हैं। यदि महिलायें भी इस साधना को सम्पन्न कर लेती हैं तो, उनके चेहरे पर आश्चर्यजनक ढ़ग से आकर्षण का प्रभाव प्रकट होने लगता है। दीपावली (Deepawali) की रात्रि मे साधक या साधिका नहा धो कर नये वस्त्र धारण कर लें और एक नीले आसन पर नीली धोती पहनकर, यदि महिला हैं तो नीली साडी या सूट पहन लीजिये। सामने एक लकडी की चौकी पर नीला ही वस्त्र बिछाकर नीले रंग से पांच बिंदियां लगा दें, इन पांच बिंदियों के मध्य वाली बिन्दी पर हरे रंग के रत्नीय पत्थर से बनी लधु आकार के गणपति की प्रतिमा स्थापित करनी है, यह गणपति प्रतीमा हिडम्ब मंत्र से अभिमंत्रित होनी चाहिए। इसी के पास अलग से एक चावल की ढेरी पर 100 मनके की एक हकीक की जप माला स्थापित कर दें। शुद्ध घी का एक दीपक जलायें, इन सभी की धूप-दीप से पूजा करें, और एक घटी (24 मिनट) तक प्रज्जवलित दीपक की लौ को एक-टक देखते रहना है। इस के उपरांत हकीक की माला से 11 माला अग्रलिखित मंत्र को जप करना है, मंत्र- ॐ क्रीं लक्ष्मी आकर्षय-आकर्षय वश्यं क्रीं फट्। जप के बाद गणपति जी को मिष्ठान्न का भोग लगाकर हरितमणि गणपति को कामनापूर्ति की प्रार्थना करें और पूजा सम्पन्न करें। प्रतिदिन 24 मिनट की पूजा में हरितमणि गणपति की लघु प्रतिमा पर त्राटक करना आवश्यक है, फिर देखे कैसे “छम्-छम् बरसेगी लक्ष्मी”।
यह प्रयोग दीपावली (Deepawali) की मध्यरात्रि (इस वर्ष 12 बजकर 24 मिनट में) से प्रारम्भ करना है और कार्तिक पूर्णिमा तक करते रहना है। इस प्रयोग को सम्पन्न कर लीजिये और फिर देखिये- “छम्-छम् बरसेगी लक्ष्मी”। यदि यह प्रयोग आप नहीं सकते तब मेरे से बात करें मैं आपको कोई दूसरा सरल मार्ग सुझाऊंगा। या फिर मेरी लिखी पुस्तक “गुरूजी के टोटके” खरीद लें, इसमें 1500 सरल टोटके दिये गये हैं। लक्ष्मी (Laxmi) को प्रसन्न करने के भी अनेक टोटके दिये हैं।

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