तीन मुखी रूद्राक्ष, 3 Mukhi Rudraksha

तीन मुखी रूद्राक्ष, 3 Mukhi Rudraksha Nepal, 3 Mukhi Original Nepal rudraksha –

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तीन मुखी रूद्राक्ष त्रिदेव बह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक है। तीन मुखी रूद्राक्ष में त्रिमूर्ति की शक्तियां समाहित होती हैं, और यह साधना में रूची रखने वाले या साधनाओं में संलग्न रहने वाले व्यक्तियों को शुभ फल देने वाला रूद्राक्ष है। यह रूद्राक्ष अग्नि स्वरूप रूद्राक्ष माना गया है। सत्व, रज और तम-इन तीनों गुणों का स्वामी हाने से यह त्रिगुणात्मक शक्तियों का स्वरूप है। यह रूद्राक्ष जातक को भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान देने वाला है। इसे धारण करने वाले मनुष्य की विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों का स्वयं ही दमन हो जाता है, और उसमें रचनात्मक प्रवृत्तियों को उदय होता है। जीवन धाराप्रवाह चलता है, और अल्पायु तथा मृत्यु का भय भी नहीं रहता। यह उच्च शिक्षा देता है, निम्न रक्तचाप से मुक्ति दिलाता है, मंदबुद्धि बालकों के लिये अधिक उपयोगी रूद्राक्ष है, शास्त्रों के अनुसार यह इच्छा शक्ति, ज्ञान और क्रिया शक्ति मिश्रित रूप है, अतः यह ब्रह्म शक्ति का द्योतक भी है। इसकी माला से शिव मंत्र का जप करने से साधक को यश और मान-सम्मान की प्राप्ति होती है, तथा उसकी सभी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।

चिकित्सक भी यह दावा करते हैं, कि तीन मुखी रूद्राक्ष कई बीमारियों और रोगों का निवारण कर सकता है। नेपाली तीन मुखी रूद्राक्ष को धारण करने वाला व्यक्ति कभी भी बीमारियों या कमजोरी से कष्ट नहीं उठाता है। तीन मुखी रूद्राक्ष पीलिया रोग का रामबाण इलाज है। तीन मुखी रूद्राक्ष नौकरी ढूंढने वाले व्यक्तियों को निश्चित ही शीघ्र सफलता देता है, और बेरोजगारी को टालता है। तीन मुखी रूद्राक्ष धारक को स्त्री के श्राप से भी मुक्ति मिलती है। शिवपुराण के अनुसार तीन मुखी रूद्राक्ष कठिन साधना से मिलने वाले फल के बराबर फल देने वाला बताया गया है। तीन मुखी रूद्राक्ष शौर्य और ऐश्वर्य को बढ़ाने वाला होता है। मंगल ग्रह से इस का सम्बंध होने के कारण सोचने की शक्ति और विषय पर एकाग्रता लाना इस रूद्राक्ष के प्रधान गुण हैं। त्रिमुखी अग्निदेव की तरह सब दोषों को शुद्ध करता है। धारक पूर्व जन्म के पापों से मुक्त होता है, और पवित्र होकर नया जीवन प्रारम्भ करता है। यह रचनात्मक बुद्धि की शक्ति को बढ़ा देता है। इसे धारण करने वाला रचनात्मक संसाधनों में स्वतः सफलता प्राप्त करने लगता है। इस रूद्राक्ष के देवता मंगल देव हैं। जिन लोगों को विद्या प्राप्ति में कठिनाई आ रही हो, उन्हें दो मुखी के साथ तीन मुखी रूद्राक्ष भी धारण करना चाहिये।

तीन मुखी रूद्राक्ष धारण करने का मंत्र- ॐ क्लीं नमः ॐ अग्नये नमः।
चैतन्य करने का मंत्र- ॐ रं इं हृीं हूं ॐ ।
उपयोग- जीवन की गूढ़ समस्याएँ और तीव्र रोष, उदासी, चिन्ता, दोष भावना एवं शैथिल्य से मुक्ति।

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पांच मुखी रूद्राक्ष, 5 Mukhi Rudraksha

पांच मुखी रूद्राक्ष- 5 Mukhi Rudraksha Nepal, 5 Mukhi Rudraksha Original Nepal –

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पाँच मुखी रूद्राक्ष पर पाँच धारियाँ होती हैं, पाँच मुखी रूद्राक्ष साक्षात् रूद्र स्वरूप है, इसे कालाग्नि के नाम से भी जाना जाता है। सधोजात्, ईशान, तत्पुरूष, अघोर तथा कामदेव, शिव के ये पाँचों रूप पंचमुखी रूद्राक्ष में निवास करते हैं। यह रूद्राक्ष अपनी रोगनिवारक क्षमता और आरोग्यता प्रदान करने के लिये विख्यात है। इस रूद्राक्ष को धारण करने से दीर्घायु और बेहतर स्वास्थ्य लाभ मिलता है। यह धारक को अपेक्षित अप्रिय घटनाओं से बचाता है, और आध्यात्मिक शक्तियों से आर्शिवाद प्राप्त होता है, धारक का मन सदा प्रसन्नता से परिपूर्ण रहता है। पंचमुखी रूद्राक्ष पंच देवों (विष्णु, शिव, गणेष, सूर्य और देवी) का स्वरूप है। पंचमुखी रूद्राक्ष का प्रयोग शिव-शक्ति के हर रूप की साधना व ध्यान के लिये किया जाता है। यह पंच तत्वों को नियंत्रित करता है। यह रूद्राक्ष भगवान शिव का पंचानन रूप है। भगवान के पाँच रूप अद्योजात, ईशान, तत्पुरूष, अघोर एवं वामदेव पंचमुखी रूद्राक्ष में निवास करते हैं। पंचवक्त्रः स्वयं रूद्राः कालाग्र्निाम नामतः। कुछ लोग इस रूद्राक्ष को रूद्र-कालाग्नि भी कहते हैं। जब रूद्राक्षों का संयोग करते हैं, तब पंचमुखी रूद्राक्ष का संयोजन आवश्यक होता है। अधिकतर मालायें पंचमुखी रूद्राक्ष की होती हैं। रूद्राक्ष कहीं के भी क्यों न हों, भारत, नेपाल या इंडोनेशिया, 60 से 70 प्रतिशत दाने पंचमुखी ही होते हैं। विशेष ऊर्जा प्राप्त करने के लिये पंच मुखी रूद्राक्ष के तीन दानों को (हर दाने की पूंछ के साथ दूसरे दाने मुख मिलाकर पिरोई गई माला) एक साथ पहनना चाहिये, इस प्रकार की 3 दानों की पंचमुखी रूद्राक्ष माला शत्रु को नष्ट करने या शत्रु पर नियंत्रण करने में अद्भुत परिणाम देती है। पंच मुखी रूद्राक्ष धारक को विषैले जानवर जैसे सर्प या बिच्छू से रक्षा करता है, और धारक को मन की शांति और समृद्धि प्रदान करता है। माना जाता है कि बृहस्पति के कुप्रभाव से मन की शांति नष्ट होती है, दारिद्रता आती है, सौहार्द्रता की कमी होती है, चर्बी संबधी, किडनी, कान की बीमारियां, रक्तचाप, मधुमेह आदि पैदा होते हैं। इसलिये पंचमुखी रूद्राक्ष बृहस्पति ग्रह के बुरे प्रभाव को कम करके शरीर की अग्नि धातु को परिशुद्ध करता है, और इसी सिद्धांत से पंचमुखी रूद्राक्ष का धारण मनुष्य के अवगुणों और उसकी सभी बुराईयों को दूर करता है, और उसे तन-मन से पवित्र बनाता है। धारक पशुभावों से मुक्त होकर एक उद्यत देव के समान जीवन व्यतीत करता है। इस प्रकार यह रूद्राक्ष सर्वकल्याणकारी, मंगलप्रदाता एवं आयुष्यवर्द्धक है। महामृत्युंजय इत्यादि अनुष्ठानों में इसका ही प्रयोग होता है। यह अभीष्ट सिद्धि प्रदाता रूद्राक्ष है। पंचमुखी रूद्राक्ष सबसे सुरक्षित तथा अल्मोली विकल्प है, यह रूद्राक्ष सभी प्रकार के पापों के प्रभाव को भी नष्ट करता है। यह ध्यान हेतु उत्तम धारणीय फल है, रक्तचाप को सामान्य बनाये रखता है, यह शैक्षिक उन्नति देता है, और मस्तिष्क पर शांत प्रभाव में लाता है। यह रूद्राक्ष स्मरण शक्ति को दुरूस्त करने में बहुत मददगार है, अर्थात जब व्यक्ति की स्मरण शक्ति क्षीण हो जाती है, तो यह रूद्राक्ष बहुत उपयोगी है। इस रूद्राक्ष के देवता सत्तारूढ़ गुरू ग्रह हैं।

रूद्राक्ष धारण का मंत्र- ॐ ह्यी नमः। ॐ नमः श्विाय। इस मंत्र के साथ पंचमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिये।
चैतन्य करने का मंत्र- ऊँ ह्यँ आ क्ष्म्यौं स्वाहा।
उपयोग- उच्च रक्तचाप, स्मृतिनाश, उदासी, चिंता मधुमेह।

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चार मुखी रुद्राक्ष, 4 Mukhi Rudraksha

चार मुखी रुद्राक्ष, 4 Mukhi Rudraksha Nepal, 4 Mukhi Rudraksha Original Nepal –

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चार मुखी रूद्राक्ष में ऊपर से नीचे तक चार धारीयाँ होती हैं, और ये इस रूद्राक्ष के जन्म ही बनना शुरू हो जाती हैं, और धीरे-धीरे अपना आकार लेती हैं। पुराणों में, चार मुखी रूद्राक्ष देवी सरस्वती और भगवान् ब्रह्मा की शक्ति से परिपूर्ण होता है, यह रूद्राक्ष ब्रह्माजी की सृजनात्मक बुद्धि से प्रभावित होता है। यह रूद्राक्ष धारक को सृजनात्मक शक्ति, ज्ञान एवं विद्वता प्रदान करता है, यह रूद्राक्ष धारक को चार लाभ प्रदान करता है- 1. धर्म का ज्ञान और विश्वास। 2. आर्थिक मजबूती। 3. स्वास्थ्य, शारीरिक हित और 4. अज्ञान का नाश तथा मोक्ष की प्राप्ति। चार मुखी रूद्राक्ष विद्यार्थीयों के लिये बहुत लाभदायक होता है। चार मुखी रूद्राक्ष ’कल्पतरू वृक्ष’ की तरह है- वह वृक्ष उन प्राणियों की सभी मनोकामनाओं को पूरा करता है, जो शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, या सार्वजनिक रूप से बात करने में सक्षम नहीं होते। जिनकी स्मरण शक्ति कमजोर है, या नकारात्मक विचारों से ग्रस्त है, उन्हें यह रूद्राक्ष धारण करने से अत्मविश्वास की वृद्धि के साथ सकारात्मक विचार भी प्राप्त हाने लगते हैं। महाभारत के अनुसार, वह व्यक्ति जो चार मुख वाला रूद्राक्ष धारण करता है, वह द्विज स्तर प्राप्त करता है, और वह स्वयं को बिल्कुल ऊर्जावान व्यक्तित्व में परिवर्तित कर लेता है, और जीवन में नई और बेहतर भूमिका अपना लेता है। चार मुखी रूद्राक्ष देवों के गुरू बृहस्पति का प्रतीक रूद्राक्ष है। बृहस्पति के गुणों जैसी ऊर्जा धारक को ज्ञान व विवेक के माध्यम से प्राप्त होती है। इस रूद्राक्ष में निहित गुरू ग्रह की ऊर्जा व चेतना के चारों स्तरों का लाभ प्राप्त होता है- जागृत अवस्था, स्वप्न अवस्था, सुशुप्ति या गहरी निद्रा की अवस्था और तुरिया या चेतना अथवा पराचेतना अवस्था। चार मुखी रूद्राक्ष इन सभी अवस्थाओं के ज्ञान को संचित करने में सहायक होता है, और अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करता है। चतुर्मुखी रूद्राक्ष से विद्या प्राप्ति में, बुद्धि को कुशाग्र करने में तथा सद्गुरू को प्राप्त करने में सहायता मिलती है। चार मुखी रूद्राक्ष को दूध में उबाल कर पीने से स्नायु विकार (नर्वस सिस्टम के विकार) दूर होते हैं। इसे धारण करने से विक्षिप्त मनुष्य के मानसिक रोग दूर होते हैं, मन में सात्विक विचार उत्पन्न होते हैं, एवं धर्म का ज्ञान व धर्म में रूचि बढ़ती है। शीघ्र सफलता पाने के लिये इस रूद्राक्ष को धारण करना चाहिये। इससे उदर, गर्भाशय, रक्तचाप व हृदय से सम्बन्धित अनेक रोग समाप्त होते देखे गये हैं। यह रूद्राक्ष मंद बुद्धि जातक को चतुर बनाता है, अर्थात चातुर्य बढ़ा कर कुशाग्र बुद्धि वाला बनाता है। इस रूद्राक्ष में सर्वोच्च रचनात्मक गतिविधि, परमात्मा के ध्यान के साथ तार्किक और ठोस संरचनात्मक सोच को नियंत्रित करने की शक्ति प्राप्त होती है। यह डाॅक्टर, अध्यापक, प्रोफेसर, इंजीनियर के लिये परम गुणकारी रूद्राक्ष है। इसका उपयोग सकारात्मक सोच, रचनात्मकता, कुशाग्र बुद्धि और खुफिया तंत्र, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, लेखकों और पत्रकारों, आत्मविश्वास के साथ बोलने वालों के लिये अधिक उपयुक्त है। यह नाड़ी, चर्म व हायपौथैमलस की बीमारियों से भी बचाता है। इस रूद्राक्ष के देवता सत्तारूढ़ बुध ग्रह हैं।

रूद्राक्ष धारण का मंत्र- ॐ हृी नमः। ॐ ब्रम्हणे नमः। इस मंत्र के साथ ही चारमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिये।
चैतन्य करने का मंत्र- वां क्रां तां हां ई।
उपयोग- एकाग्रता, अध्ययन में सफलता, अनुसंधान में यश।

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छ: मुखी रूद्राक्ष, 6 Mukhi Original Nepal rudraksha

छ: मुखी रूद्राक्ष- 6 Mukhi Rudraksha Nepal, 6 Mukhi Rudraksha Original Nepal –

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छः मुखी रूद्राक्ष पर छः धारियाँ होती हैं, छः मुखी रूद्राक्ष शिव पुत्र कार्तिकेय की भक्ति का केन्द्र बिन्दु है। कार्तिकेय भगवान् नेतृत्व गुण, ऊर्जा व साहस के देव हैं। इस रूद्राक्ष को धारण करने से धारक को भगवान कार्तिकेय की विशेष कृपा प्राप्त होती है, और सांसारिक दुःखों से लड़ने की क्षमता प्राप्त करके वे जीवन के स्तर को अति उत्तम बना सकता है। यह रूद्राक्ष विद्या प्राप्ति के लिये भी श्रेष्ठ है। विद्या, ज्ञान, बुद्धि का प्रदाता छः मुखी रूद्राक्ष पढ़ने वाले विद्यार्थीयों, बौद्धिक कार्य करने वालों को बौद्धिक बल प्रदान करता है। इससे गुप्त व प्रकट सभी प्रकारी के शत्रुओं की शत्रुता नष्ट हो जाती है, अतः इसे ’शत्रुंजय रूद्राक्ष’ भी कहते हैं। निसंदेह छः मुखी रूद्राक्ष को पहनने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। इसकी माला जपने से विपत्ति नष्ट होती हैं, व पीड़ाएँ कम होती हैं। छः मुखी रूद्राक्ष ऋिद्धि और सिद्धि प्राप्त करने में भी चमत्कारी परिणाम प्रकट करता है। कहा जाता है कि देवी अन्नपूर्णा छह मुखी रूद्राक्ष के धारण से घर में हमेशा विराजमान रहती हैं। यह व्यक्ति को अच्छे कर्म करने में मदद करता है, और वह व्यक्ति सदाचारी, संतुष्ट और गुणवान बनता है। इसे धारण करने से धारक की सोई हुई शक्तियां जागृत होती हैं। यह आत्म शक्ति, ज्ञान शक्ति व संकल्प शक्ति में वृद्धि करता है। छः मुखी रूद्राक्ष व्यक्ति की इच्छा शक्ति, अभिव्यक्ति की ताकत, ग्रहण करने शक्ति को बढ़ाता है, और फिर वह व्यक्ति मानसिक रूप से शक्तिशाली हो जाता है। इसलिये यह छात्रों के लिये बहुत उपयोगी रूद्राक्ष होता है। यह रूद्राक्ष धारक को वशीकरण की शक्ति भी प्रदान करता है, और उसे परिहास युक्त, सुशील व सुंदर बनाता है। इसलिये यह सार्वजनिक रूप से सक्रिय लोगों के लिये लाभदायक है, जैसे कलाकार और राजनीतिज्ञ। यह रूद्राक्ष सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत करने में सहायक सिद्ध होता है। छः मुखी रूद्राक्ष शुक्र ग्रह के अनुसार यौन संबधी व यौन अंगों की बीमारियों को दूर करने में सहायक होता है। आरोग्य के लिये इसे पंचमुखी रूद्राक्ष के साथ धारण करना चाहिये। मानसिक विकृति, मिर्गी और स्त्री रोगों को भी इस रूद्राक्ष के धारण से दूर किया जा सकता है। शिक्षा में उच्च सफलता के लिये इसे चमुर्मुखी रूद्राक्ष के साथ धारण करते हैं। यह आँखों को लाभ पहुँचाता है, और मुख के रोग, मूत्र संबधी रोग, गले के रोग एवं जलोदर में भी हितकारी है। निसंतान युगल संतान प्राप्ति हेतु इसे गौरी-शंकर रूद्राक्ष के साथ अथवा द्विमुखी रूद्राक्ष के साथ प्रयोग कर सकते हैं। हकलाने वाले जातक जैसे वाणी दोष वालों के लिये भी यह कारगर सिद्ध होता है। षट्मुखी रूद्राक्ष का दाना व त्रयोदशमुखी दाने को धारण करने वाला धारक मानसिक तौर पर सतर्क और जोश से भरपूर रहता है। इस रूद्राक्ष को धारण करने से छः प्रकार की बुराईयां- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर नष्ट होते हैं। इसके संचालक ग्रह शुक्र देव हैं।

इसका धारण मंत्र है- ॐ हृीं हुं नमः। ॐ षडाननाय नमः। इस मंत्र के साथ यह रूद्राक्ष धारण करें।
चैतन्य करने का मंत्र- ॐ ह्यूं नमः। ॐ ह्यूं। ॐ हृीं श्रीं क्लीं सौं ऐं।।
उपयोग- प्रशासनिक कौशल्य, शोध कार्य में सफलता। कानूनी समस्यायें, व्यक्तिगत संबध।

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सात मुखी रूद्राक्ष, 7 Mukhi Rudraksha

सात मुखी रूद्राक्ष, 7 Mukhi Rudraksha Nepal, 7 Mukhi Rudraksha Original Nepal –

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सात मुखी रूद्राक्ष के ऊपर सात धारियाँ होती हैं, सप्तमुखी रूद्राक्ष अनन्त नाम से विख्यात है। यह रूद्राक्ष सप्तऋषियों का प्रतीक है। ऋषिजन हमेशा संसार के कल्याण में कार्यरत् रहते हैं, अतः सात मुखी रूद्राक्ष धारण करने से सप्त ऋषियों का सदा आशीर्वाद बना रहता है। जाबलोपनिषद के अनुसार सप्तमुखी रूद्राक्ष में सप्त ऋषियों का आशीर्वाद समाहित है। सप्तमुखी रूद्राक्ष को सप्तामातृकाओं का प्रतिनिधि माना गया है। यह रूद्राक्ष सूर्यदेव, सप्तर्षि, अनंग, अनंत (सर्पराज वासुकी), एवं नाग राज को भी समर्पित है। पùपुराण के अनुसार निम्नलिखित दिव्य सर्प इस रूद्राक्ष के सात मुखों में रहते हैं अनंत, कर्कट, पुंडरीक, तक्षक, व शोशिंबन, करोआश और शंखचूड़। इसीलिये इसका धारण किसी प्रकार के विष से प्रभावित नहीं होता। इस रूद्राक्ष के धारण से शरीर पर किसी भी प्रकार के विष का प्रभाव नहीं होता है। जन्म कुण्डली में यदि पूर्ण या आंशिक कालसर्प योग विद्यमान हो तो, सातमुखी रूद्राक्ष धारण करने से पूर्ण अनुकूलता प्राप्त होती है। इसे धारण करने से विपुल वैभव और उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती है। इसे धारण करने से मनुष्य स्त्रियों के आकर्षण का केन्द्र बना रहता है। इस रूद्राक्ष का संचालक तथा नियंत्रक ग्रह शनि है, यह रोग तथा मृत्यु का कारक है। यह ग्रह ठंडक, श्रम, नपुसंकता, पैरो के बीच तथा नीचे वाले भाग, गतिरोध, वायु, विष और अभाव का नियामक है। यह लोहा पेट्रोल, चमड़ा आदि का प्रतिनिधित्व करने वाला ग्रह है। शनि के प्रभाव से दुर्बलता, उदर पीड़ा, पक्षाघात, मानसिक चिंता, अस्थि रोग, क्षय आदि रोग हो सकते हैं। इस रूद्राक्ष को धारण करने से चोरी, व्यभिचार और नशीली औषधियों का सेवन से छुटकारा मिलता है। इसके धारण करने वाले को गुप्त धन प्राप्त होता है, विपरीत लिंग के व्यक्ति का ध्यान आकर्षित करने की शक्ति इस में समाहित है। यह रूद्राक्ष सप्तमातृका को समर्पित होने से महालक्ष्मी को भी प्रसन्न करता है। अनेक देवी-देवताओं का आशीर्वाद इसे प्राप्त होने के कारण यह रूद्राक्ष कीर्ति, धन और जीवन में प्रगति लाने वाला माना गया है। सप्तमुखी रूद्राक्ष आकृति में प्रायः गोल होता है, तथा इसका इंडोनेशियाई दाना आकार में थोडा छोटा होता है। अधिक दुर्लभ होने के उपरांत भी यह सरलता से मिल जाता है। यह रूद्राक्ष उत्तम स्वास्थ्य और संपत्ति प्रदान करता है। सैकड़ों पाप, सोने की चोरी व गौ वध जैसे पाप इस रूद्राक्ष को धारण करने से नष्ट होते हैं। सभी साधक इसे अवश्य पहनते थे। शास्त्रों में इसे सात आवरण, पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि व अंधकार का स्वरूप माना गया है। इससे धारक को भूमि व लक्ष्मी प्राप्त होती है। यह धनागम व व्यापार व उन्नति में सहायक है, अविवाहित का विवाह हो जाता है, जातक के सहयोग, सम्मान व प्रेम में वृद्धि होती है, इसे धारण करने से पौरूष शक्ति में वृद्धि होती है। सप्तमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति अपने व्यापार एवं नौकरी में तरक्की करता है, और जीवन में सब प्रकार के सुखो को प्राप्त करता है। इसे तिजोरी, लाॅकर या नगद पेटी में भी रख सकते हैं। शनि ग्रह का प्रतिनिधि होने से शनि को प्रसन्न कर दरिद्रता दूर करने के लिये, प्रसिद्धि सफलता, सम्मान न्याय, प्रेम, ज्ञान, तेज, बल, प्राधिकार व्यापार में प्रगति और लंबी उम्र के लिये इस रूद्राक्ष को धारण करना चाहिये। सप्तमुखी रूद्राक्ष ऐसे व्यक्तियों को अवश्य पहनना चाहिये जिनको शारीरिक व्याधि सर्दी, खांसी, ब्रोंकाइटिस, गठिया व टी. बी. जैसे रोगों के कष्ट हैं। चाहे आर्थिक अथवा मानसिक किसी भी प्रकार का कष्ट हो, सप्तमुखी रूद्राक्ष पीड़ा कम करने में बहुत सहायक है। यह सब प्रकार के स्नायु संबधी दर्द, महिलाओं के जननांग सम्बंधी रोग (बंध्यत्व भी), हृदय रोग, गले के रोग और ल्यूकोरिया में विशेष सहायक है। हड्डियों के रोग एवं जोडों में दर्द से पीड़ित लोग रोग एवं कष्ट निवारण में इसे बहुत उपयोगी पाते हैं। सप्तमुखी रूद्राक्ष के नियामक ग्रह शनि हैं।

इसका धारण मंत्र है- ॐ हुं नमः। ॐ अनन्ताय नमः। ॐ ह्यीं नमः। ॐ ह्यीं श्रीं क्लीं सौं नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ ह कों हृीं सौ।
उपयोग- आर्थिक हानि, सफलता में विलम्ब होना, शारीरिक स्वास्थ्य, हानि और निराशा।

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आठ मुखी रूद्राक्ष, 8 Mukhi Rudraksha

आठ मुखी रूद्राक्ष, 8 Mukhi Rudraksha Nepal, 8 Mukhi Rudraksha Original Nepal –

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आठ मुखी या अष्टमुखी रूद्राक्ष पर आठ धारियाँ होती हैं। आठ मुखी रूद्राक्ष अष्टभुजाधारी देवी माँ का प्रतीक है। श्रीमद्ेवीभागवत पुराण, पùपुराण और मंत्रमहार्णव के अनुसार यह दाना श्रीगणेशजी को समर्पित है। ’अष्टवक्त्रो महासेन साक्षाद्ेवो विनायकः अष्टमुखी रूद्राक्ष गणेश जी का स्वरूप भी माना जाता है, यह अष्ट सिद्धि प्रदाता है। मनुष्य सदा भगवान की बनायी आठ प्रकृति (भूमि, आकाश, जल, अग्नि, वायु, मन, बुद्धि और अहंकार) के आधीन रहता है। अष्टमुखी रूद्राक्ष धारण करने से आठों महादोष (अष्ठपाश) धारक के नियंत्रण में रहते हैं, इसमें स्वयं की गुप्त एवं सुप्त शक्तियां जागृत साधक का सहयोग प्रदान करती हैं, जिससे आठों दिशाओं में विजय प्राप्त होती है। अष्टमुखी रूद्राक्ष थोडा दुर्लभ है। अष्टमुखी की आकृति अन्य रूद्राक्षों की तरह गोलाकार होता है, परंतु कभी-कभी ज्यादा मुख होने पर दाने थोडे अण्डाका आकृति के भी होते हैं। इस रूद्राक्ष को धारण करने से बुद्धि के विकार दूर होते हैं, व स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है। यह धारक को विशाल आकलन शक्ति और लेखन का कौशल्य प्रदान करता है। इससे यश, कला में निपुणता, नेतृत्व गुण एवं समृद्धि प्राप्त होते हैं। इसे धारण करने से आठों दिशाओं में विजय प्राप्त होती है, व कोर्ट कचहरी के मामलों में सफलता मिलती है। इसे धारण करने से परमपद की प्राप्ति होती है, दुर्घटनाओं एवं प्रबल शत्रुओं से रक्षा होती है। वैद्यकीय दृष्टि से, इससे नाड़ी संस्थान, प्रोस्टेªट एवं पित्ताशय के रोग मिटते हैं। दुष्ट स्त्री गमन के पापों से मुक्ति मिलती है, तथा यह मनुष्य को अन्तर्मुखी बनाकर उसके जीवन की समस्त उथल-पुथल को समाप्त कर नीचे से ऊपर उठने का मार्ग प्रशस्त करता है, जिससे धारक को परम ज्ञान सुख प्राप्त होता है। जो लोग इस रूद्राक्ष को धारण करते हैं, वे अकाल मृत्यु से शरीर का त्याग नहीं करते हैं। ऐसे लोग पूर्ण आयु जीते हैं। इस रूद्राक्ष के धारणकर्ता पर गणेशजी की पूर्ण कृपा दृष्टि रहती है, इसलिये इसे धारण करने से बाधाओं का अंत होता है, व्यक्ति की ब्रह्मविद्या में रूचि जाग्रत होती है, उत्थान का मार्ग प्रश्स्त होता है, न्यायिक मामलों में विजय प्राप्त होती है।, शत्रु वश में होते हैं। गणेश स्वरूप होने के कारण यह रूद्राक्ष ऋद्धि-सिद्धि और लक्ष्मी प्रदान करने वाला है। इसको धारण करने से अन्न, धन, और स्वर्ण की वृद्धि होती है। आठमुखी रूद्राक्ष का नियंत्रक और संचालक ग्रह राहू है, जो छाया ग्रह है। इसमें शनि ग्रह की भांति तथा शनि ग्रह से भी बढ़कर प्रकाश हीनता है। यह शनि की तरह लम्बा, पीड़ादायक, अभाव, योजनाओं में विलम्ब करने वाला एवं रोगकारक ग्रह है। राहू ग्रह घटनाओं को अकस्मात ही घटित कर देता है। चर्मरोग, फेफड़े की बीमारी, पैरों का कष्ट मोतियाबिन्द आदि रोगों का कारक राहू ग्रह है। आठमुखी रूद्राक्ष धारण करने से उक्त सभी रोगों एवं राहू की पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है। राहु ग्रह से संबधित होने के कारण इसे धारण करने से राहु जनित कष्ट तथा समस्त दैविय बाधायें दूर हो जाती हैं। साधारणतः अष्टमुखी रूद्राक्ष को सप्तमुखी के साथ पहनते हैं। जिनके जीवन में बाधा या अपयश आते हैं, वह इसे अवश्य धारण करें। शनिग्रह का दोष मिटाने के लिये इसे सप्तमुखी के साथ धारण करना चाहिये। राहु ग्रह की किसी भी विपरीत स्थिति को अष्टमुखी रूद्राक्ष अनुकूलता में बदल देता है।

इसका धारण मंत्र है- ॐ हुं नमः। ॐ श्री महागणाधिपतये नमः। ॐ हुं नमः। ॐ सः हुं नमः। ॐ हृीं ग्रीं लीं।
चैतन्य मंत्र- ॐ हृीं ग्रीं लं आं श्री।
उपयोग- जीवन की प्रगति में अड़चन, हार, निराशा और प्रगति के आभाव एवं समस्याओं की वजह से उत्पन्न खीझ।

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नौ मुखी रूद्राक्ष, 9 Mukhi Rudraksha

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नौ मुखी रूद्राक्ष में नौ धारियाँ होती हैं। नौ मुखी रुद्राक्ष भैरव देव को समर्पित है, जो मनुष्य अपनी वाम भुजा में इसको धारण करते हैं, वे भैरव तुल्य हो जाते हैं, वस्तुतः भैरव नामक नौ मुखी रूद्राक्ष नवकार की निधियों का प्रदाता है। इसको धारण करने से वीरता, धीरता, साहस, कर्मठता, पराक्रम, सहन शीलता, तथा यश की वृद्धि होती है। इसे धारण करने से नौ तीर्थों का फल प्राप्त होता है, द्वारका, वैद्यनाथ, पारसनाथ, सोमनाथ, पशुपति, मुक्तिनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ व जगन्नाथ। नौ मुखी रूद्राक्ष आदि शक्ति विश्व जननी माँ महामाया जगदम्बा का भी प्रतीक है। नवदुर्गा का प्रतिनिधि प्रतीक यह रूद्राक्ष शक्ति के उपासकों को यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिये। यह धारक को अलौकिक दिव्य शक्तियाँ प्रदान करता है। नवरात्रि के दौरान इस रूद्राक्ष की शक्ति और महत्व और भी अधिक बढ़ जाती है। नवमुखी रूद्राक्ष दुर्लभ है। इसकी आकृति अष्टमुखी से चपटी और कुछ-कुछ अण्डाकृति वाली होती है। इसका मूल्य अष्टमुखी रूद्राक्ष से ज्यादा होता है। इसको धारण करने वाला व्यक्ति निर्भय एवं तनावमुक्त रहता है, तथा इसको धारण करने से अन्तर्मन की अग्नि द्वारा शुद्धि होती है। यह धारक को बलशाली और आत्म विश्वासी बनाता है। रूद्राक्ष जाबालोपनिषद् के अनुसार इस दाने में नौ प्रकार की शक्तियाँ निहित हैं। यह धारक को अकाल मृत्यु से बचाता है, क्योंकि इसे भैरव का आशीष प्राप्त है, जिनका नाम ही कालभैरव है। मृत्यु के देवता यमराज को भी काल कहते हैं, अतः काल और काल भैरव दोनों ही नवमुखी रूद्राक्ष के धारक की रक्षा करते हैं। इस कारण इसे कालभय निवारक कहते हैं। इसे कपिल मुनि का प्रतीक भी माना गया है। इसे धारण करने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है, तथा धारणकर्ता को ब्रह्महत्या या भूर्ण हत्या का दोष नहीं लगता है। यह धारक की नौ ग्रहों से रक्षा करता है, तथा उन ग्रहों के परिणाम, धारक के पक्ष में करवाता है। यह भू्र्ण-हत्या के पाप से पूर्ण मुक्ति प्रदान करता है, नवग्रह बाधा निवारण में लाभकारी होने के साथ ही इसे धारण करने से उदर पीड़ा, नेत्र, ज्वर आदि शारीरिक रोगों का निवारण होता है, पिशाच, बेताल, ब्रह्म-राक्षस, सर्प आदि का भय नहीं रहता है। इसके धारण से वीरता, साहस, कर्मठता की वृद्धि होती है। यह रूद्राक्ष अभीष्ट व अभिलषित वस्तुओं का प्रदाता है। यह रूद्राक्ष जातक को तांत्रिक शक्तियाँ भी देता है।

धारक को यह माँ दुर्गा का कवच प्रदान करता है। यह स्त्रियों के लिये अत्यंत उपयोगी रूद्राक्षों में से एक है, क्योंकि माँ दुर्गा का कवच अभेद्य है। दुर्गा स्वरूप नवमुखी रूद्राक्ष आत्मबल में वृद्धि कर सबल व आत्मनिर्भर बनाता है। इसे धारण कर धारक जगन्माता शक्ति का आर्शीवाद, सहन शक्ति, शौर्य, साहस प्राप्त करता है, उसका नाम व यश सर्वत्र फैलता है। शक्ति बढ़ती है, और इच्छा शक्ति प्रबल होती है। इसका प्रतिनिधि ग्रह केतु है। यदि नौ मुखी दाने को दश मुखी एवं एकादश मुखी दानों के साथ संयोग करके धारण किया जाये तो आत्मरक्षा का जबरदस्त साधन बन जाता है।

इसका धारण मंत्र है- ॐ हृीं हुं नमः। ॐ महाभैरवाय नमः। इसी मंत्र के साथ यह रूद्राक्ष धारण करें।
चैतन्य मंत्र- ॐ हृीं वं यं लं रं।
उपयोग- भय, शारीरिक दुर्बलता, एकाग्रता का अभाव और आत्मिक बल, मानसिक शांति एवं आत्मविश्वास प्राप्ति के लिये।

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दस मुखी रूद्राक्ष, 10 Mukhi Rudraksha

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दस मुखी रूद्राक्ष में दस धारियाँ होती हैं, यह श्री विष्णु का स्वरूप है, इस रूद्राक्ष को धारण करने से सर्व ग्रह शांत रहते हैं। यह नवग्रह व ब्रह्मराक्षसों के कुप्रभाव को मिटाता है। ब्रह्य, राक्षस, पिशाच व सर्प इत्यादि का भय नहीं होता है। इसमें विष्णु के दस अवतारों मत्स्य, कृष्ण, राम, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, बुद्ध और कल्कि की शक्ति सन्निहित है। इस रूद्राक्ष को धारण करने से भगवान विष्णु के सभी दस अवतारों का आह्वान किया जा सकता है। दसमुखी रूद्राक्ष दस दिशायें दस इन्द्रियों, दस दिग्गपाल का प्रतीक है। दसमुखी रूद्राक्ष दुर्लभ प्रका के रूद्राक्षें में से एक है। यह गोल व अण्डाकृति दोनों आकारों में मिलता है। इसे यमराज एवं दस दिग्पाल कुबेर, इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरूण, वायु, ईषान, अन्नत तथा ब्रह्मा सन्तुष्ट रहते हैं, और इनका वरदान भी प्राप्त होता है। रूद्राक्ष वैष्णव एवं शैव संप्रदायों को जोड़ता है, और भूत-प्रेत, जादू-टोना, ईष्र्या इत्यादि संकटों से मुक्ति दिलाता है। इसे धारण करने वाला समाज में प्रभाव शाली होता है, इसका सर्वत्र सम्मान होता है। यह रूद्राक्ष विशेषकर राजनीतिज्ञों, कलाकारों व समाज सेवियों के लिये लाभकारी है। इसे धारण करने से सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। शत्रु द्वारा मारे जाने का भय भी नहीं रहता। मारण, उच्चाटन, वशीकरण आदि का प्रयोग भी धारक पर निष्फल हो जाता है। यह सभी बाधाओं का नाश कर सुख, शांति व समृद्धि का प्रदाता है। दसमुखी के 10 दाने और एकमुखी के एक दाने का बना नारायण कवच किसी भी विरोधी को परास्त करने का एक प्रभावशाली साधन है। दसमुखी रूद्राक्ष वास्तुदोष, प्रतिकूलतायें इत्यादि के प्रभाव से भी मुक्ति दिलाता है। अनिद्रा, चित्त की चंचलता, जीवन में दिशाहीनता, अस्थिरता, इत्यादि अवस्था में दसमुखी रूद्राक्ष भारी सहायक है। इसे पूजा में रखकर हरि एवं हर दोनों की कृपा प्राप्त हो जाती है।

इस मंत्र के साथ यह रूद्राक्ष धारण करें- ॐ हृीं नमः। ॐ नमो नारायणाय। ॐ हृीं नमः नमः। ॐ क्षीं।
चैतन्य मंत्र- ॐ हृीं क्लीं व्रीं ॐ ।।
उपयोग- नवग्रह शांति, कष्ट का निवारण, कानूनी झंझटें। इस रूद्राक्ष को सभी ग्रहों का शासक होने की मान्यता प्राप्त है। सभी ग्रहों के उपर नियंत्रण करने वाला यह विशेष रूद्राक्ष है। अतः किसी भी ग्रह की पीड़ा से बचने के लिये यह रूद्राक्ष धारण किया जाता है।

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तेरह मुखी रूद्राक्ष, 13 Mukhi Rudraksha

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तेरह मुखी रूद्राक्ष में तेरह धारियाँ होती हैं, तेरह मुखी रूद्राक्ष, साक्षात इंद्र का स्वरूप है, तथा सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाला है, कहा गया है कि इन्द्र देव ने अपना साम्राज्य खोने के बाद बृहस्पति देव और ब्रह्माणों की सलाह पर त्रयोदश मुखी रूद्राक्ष धारण किया, और अपना राज्य और सम्मान वापस पाया। हिमालय में स्थित तपस्वी और योगीगण तेरहमुखी रूद्राक्ष की अध्यात्मिक उपलब्धियों से वशीभूत होकर इस रूद्राक्ष को अवश्य धारण करते हैं। यह रूद्राक्ष सभी प्रकार के अर्थ तथा सिद्धियों की पूर्ति करता है, जिससे हर प्रकार की मनोकामनायें पूर्ण होती हैं, तथा यश की प्राप्ति होती है। देवराज इंद्र का प्रिय व समस्त मनोंकामनाओं को पूर्ण करने वाला यह रूद्राक्ष साक्षात् कामदेव का प्रतीक भी है। इस रूद्राक्ष को धारण कर देवराज इंद्र को प्रसन्न किया जा सकता है, जो अपने उपासकों को तेज, वैभव, प्रतिष्ठा और अद्वितीय सफलता प्रदान करते हैं। धारक का स्वभाव निर्मल और दयावान हो जाता है, और मानसिक अवरोध, या दूसरों के लिये बुरे विचार या कपट भावना उनके मन में नहीं आती। इस रूद्राक्ष के प्रभाव से धारक अपने परिजनों का विश्वास भी जीत लेता है। यह रूद्राक्ष साक्षात् विश्वेश्वर का स्वरूप है।

इस 13 mukhi rudraksh से कीमियागिरी, सुधा-रसायन (कैमिकल या ऐलौपैथिक औषधीयां) के अनुसंधान और औषधि में ख्याती अर्थात् पूर्णत्व भी मिलता है। जीवन के पूर्ण सुख-साधन मिलते हैं। कामदेव का यह प्रतीक होने के कारण शारीरिक सुंदरता बनाये रख कर पूर्ण यौवन प्रदान करता है। इसको धारण् करने से इन्द्र तथा कामदेव प्रसन्न होकर सभी प्रकार की सांसारिक कामनायें पूर्ण करते हैं, यह परम प्रतापी तथा तेजस्वी रूद्राक्ष माना गया है। इसको धारण करने से राज्य की ओर से सम्मान में वृद्धि होती है, समाज में मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है, मन चाहे स्त्री-पुरूष को वशीकरण करने की शक्ति देता है। इसको पहनने से विपरीत लिंगी धारक की तरफ आकर्षित होता है। इस रूद्राक्ष पर कामदेव के साथ उनकी पत्नी रति का भी निवास है, इसी कारण ये रूद्राक्ष दाम्पत्य जीवन की सभी खुशियाँ प्रदान कराने में सक्षम है। यह लक्ष्मी प्राप्ति में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। इसके धारणकर्ता को कार्तिकेय के समान माना गया है। धारणकर्ता इंद्र के समान ऐश्वर्य का भोगी बनता है। तंत्र क्रिया में इसे वशीकरण के लिये काफी महत्वपूर्ण माना गया है। निःसंतान वालों को संतान प्रदान कराता है, यह अतुल संपत्ति दिलाता है, यह मेडिकल केमेस्ट्री से जुड़े लोगों के लिये विशेष धन व वैभव देने वाला रूद्राक्ष है। इससे आकर्षण तथा विश्वसीनयता में वृद्धि होती है, यह यौन शक्ति का प्रदाता है।

इसका धारण मंत्र है- ॐ हृी नमः। ॐ इन्द्राय नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ ई या आपः ॐ। इस मंत्र से रूद्राक्ष को चैतन्य कर धारण करना चाहिये।
उपयोग- नाम और यश, आकर्षण, ललित कला में प्रवीणता की आवश्यकता हो तो पूर्ति होती है।

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बारह मुखी रूद्राक्ष, 12 Mukhi Rudraksha

बारह मुखी रूद्राक्ष, 12 Mukhi Rudraksha Nepal, 12 Mukhi Rudraksha Original Nepal –

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बारह मुखी रूद्राक्ष में बारह धारियाँ होती हैं, बारह मुखी रूद्राक्ष भगवान सूर्य के बारह रूपों के ओज, तेज और शक्ति तथा सामथ्र्य का केन्द्र बिन्दु है। यह रूद्राक्ष इस सृष्टि को चलाने वाले तेजस्वी और प्रभावशाली सूर्यदेव का प्रतीक है। 12 आदित्य का वास इसमें होता है, यह सभी बाधाओं का निवारण करने वाला ‘आदित्य रूद्राक्ष’ के नाम से जाना जाता है। बारह मुखी रूद्राक्ष धारण करने से मनुष्य को शासक का पद प्राप्त होता है, यह शादी-विवाह सम्बन्धों की विवशताओं को दूर करता है। 12 mukhi rudraksha बारह मुखी रूद्राक्ष धारण करने वाले धारक के भीतर जीवनदायी व जीवन को श्रेष्ठ बनाने की क्षमताओं का विकास होता है। धारक का जीवन उज्जवलित हो उठता है, और हर दिशा में प्रकाशमय ज्ञान का विचरण प्रचार करने योग्य बन जाता है। पद्म पुराण के अनुसार इसके धारक को गरीबी कभी नहीं सताती। इसको धारण करने से हमेशा चेहरे पर प्रसन्नता, समाज में मान-सम्मान तथा वांणी में चातुर्यता उत्पन्न होती है। बारह मुखी रूद्राक्ष बहुत शक्तिशाली और तेजस्वी रूद्राक्ष होता है, उसे पशु और जानवर तो क्या आत्म रक्षा में मनुष्य की हत्या का पाप भी नहीं लगता। धारक को कभी शारीरिक या मानसिक पीड़ा नहीं होती। बारह मुखी रूद्राक्ष महाविष्णु का स्वरूप हैं। इस दाने को पहनने से विष्णु भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है। पृथ्वी के सभी प्राणियों के प्राण-रक्षक सूर्य भगवान हैं। जिस प्रकार सूर्य पूरी दुनिया को ऊर्जा प्रदान करते हैं, उसी प्रकार बारह मुखी रूद्राक्ष के धारक की ख्याति सूर्य की किरणों की तरह सभी दिशाओं में प्रकाशित होती है।

बारह मुखी रूद्राक्ष, बारह ज्योर्तिलिंगों महाकाल, रामेश्वरम्, सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, ओंकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमाशंकर, नागेश्वर, विश्वेशवर, त्रयम्बकेश्वर, केदारेश्वर, धुष्मेश्वर का प्रतीक माना जाता है। इसको धारण करने वाला कभी रोग, चिन्ता, भय, भ्रम से परेशान नहीं होता है। धन, वैभव, ज्ञान और अन्य भौतिक सुखों का प्रदाता यह रूद्राक्ष अद्भुत रूप से प्रभावशाली है। बारह मुखी रूद्राक्ष ब्रह्मचर्य की रक्षा कर, चेहरे का तेज और ओज बनाये रखता है। यह सूर्य के समान कर्मशील तथा प्रखर तेजस्वी है। इसे धारण करने वाला राजा जैसा सम्मान प्राप्त करता है। बारह मुखी रूद्राक्ष विशेष रूप से बालों में धारण करने से विशेष लाभ प्रदान करता है, इसे कान में धारण करने से द्वादश आदित्य प्रसन्न होते हैं। धारणकर्ता समाज में सम्मानित होता है, तथा वाणी चातुर्य से किसी को भी वश में कर लेने की अद्भुत क्षमता प्राप्त कर लेता है। बारह मुखी रूद्राक्ष धारण करने से चोरों का एवं अग्नि का भय नहीं रहता, निराश रोगियों के लिये यह अत्यंत लाभदायक औषधि माना गया है। इसकी माला गले मे धारण करने से मानसिक व शारीरिक पीड़ा से छुटकारा मिलता है। सूर्य देवता का आशीर्वाद प्राप्त द्वादशमुखी रूद्राक्ष तेजस्विता, चमक और शक्ति का केन्द्र है। धारक को असीम प्रशासनिक क्षमता मिलती है, क्योंकि इसमें सूर्य का गुण है, सतत तेजस्वी प्रकाश व ऊर्जा प्रदान करना।

इसका धारण हेतु मंत्र है- ॐ क्रौं क्षौं रौं नमः। ॐ द्वादश आदित्येभ्यो नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ हृीं क्षौं घृणिः श्रीं।। अतः इस मंत्र से रूद्राक्ष को चैतन्य कर धारण करना चाहिये।
उपयोग- जीवन में यश, आदर, आनंद, तृप्ति प्रदान करता है, व मित्रता के अभाव को दूर करता है।

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