कुबेर पूजन

धन त्रयोदशी तिथि पर किया जाता है- कुबेर पूजन।

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवलोक में वास करने वाले देवताओं के धनाध्यक्ष कुबेर हैं। कुबेर न केवल देवताओं के धनाध्यक्ष हैं, बल्कि समस्त यक्षों, गुह्यकों और किन्नरों, इन तीन देवयोनियों के अधिपति भी कहे गये हैं। ये नवनिधियों में पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और वर्चस् के स्वामी भी हैं। जब एक निधि भी अनन्त वैभवों को देने वाली मानी गयी है, और धनाध्यक्ष कुबेर तो गुप्त या प्रकट संसार के समस्त वैभवों के अधिष्ठाता देव हैं। यह देव उत्तर दिशा के अधिपति हैं, इसी लिये प्रायः सभी यज्ञ, पूजा उत्सवों तथा दस दिक्पालों के पूजन में उत्तर दिशा के अधिपति के रूप में कुबेर का पूजन होता है।

कुबेर कैसे बने धनाध्यक्ष ? :-
अधिकांश पुराण कथाओं के अनुसार पूर्वजन्म में कुबेर गुणनिधि नामक एक वेदज्ञ ब्राह्मण थे। उन्हें सभी शास्त्रों का ज्ञान था और सन्ध्या, देववंदन, पितृपूजन, अतिथि सेवा तथा सभी प्राणियों के प्रति सदा दया, सेवा एवं मैत्री का भाव रखते थे। वे बड़े धर्मात्मा थे, किंतु द्यूतकर्मियों की कुसंगति में पड़कर धीरे-धीरे अपनी सारी पैतृक सम्पत्ति गंवा बैठे थे। इतना ही नहीं, आदर्श आचरणों से भी च्युत हो गये थे। परंतु इनकी माता इनसे अत्यंत स्नेह करती थीं और इसी कारण वे इनके पिता से पुत्र के दुष्कर्मों की चर्चा न कर पाती थीं। एक दिन किसी अन्य माध्यम से उनके पिता को पता चला और उन्होंने गुणनिधि की माता से अपनी सम्पत्ति तथा पुत्र के विषय में पूछा तो पिता के कोपभय से गुणनिधि घर छोड़कर वन में चले गये। इधर-उधर भटकते हुये संध्या के समय वहां गुणनिधि को एक शिवालय दिखाई पड़ा। उस शिवालय में समीपवर्ती ग्राम के कुछ शिवभक्तों ने शिवरात्रिव्रत के लिए समस्त पूजन-सामग्री और नैवेद्यादि के साथ शिवाराधना का प्रबंध किया हुआ था। गुणनिधि भूखे तो थे ही, नैवेद्यादि देखकर उसकी भूख और तीव्र हो गयी। वह वहीं समीप में छुपकर उन भक्तों के सोने की प्रतीक्षा में उनके संपूर्ण क्रियाकलापों को बड़े ध्यान से देख रहे थे। रात्रि में उनके सो जाने पर जब एक कपड़े की बत्ती जलाकर पकवानों को लेकर भाग ही रहे थे कि उसका पैर एक सोये हुये पुजारी के पैर से टकरा गया और वह व्यक्ति चोर-चोर चिल्लाने लगा। गुणनिधि भागे जा रहे थे कि चोर-चोर की ध्वनि सुनकर नगर रक्षक ने उनके ऊपर बाण छोड़ा, जिससे उसी क्षण गुणनिधि के प्राण निकल गये। यमदूत जब उन्हेे लेकर जाने लगे तो भगवान् शंकर की आज्ञा से उनके गणों ने वहाँ पहुँचकर उन्हें यमदूतों से छुड़ा लिया और उन्हें कैलाशपुरी में ले आये। आशुतोष भगवान् शिव उनके अज्ञान में ही हो गये व्रतोपवास, रात्रि जागरण, पूजा-दर्शन तथा प्रकाश के निमित्त जलाये गये वस्त्रवर्तिका को आर्तिक्य मानकर उन पर पूर्ण प्रसन्न हो गये और उन्हें अपना शिवपद प्रदान किया। बहुत दिनों के पश्चात् वही गुणनिधि भगवान शंकर की कृपा से कलिंग नरेश होकर शिवाराधना करते रहे। पुनः पाद्मकल्प में वही गुणनिधि प्रजापति पुलस्त्य के पुत्र विश्रवामुनि की पत्नी और भारद्वाज मुनि की कन्या इडविडा (इलविला) के गर्भ से उत्पन्न हुये। विश्रवा के पुत्र होने से ये वैश्रवण कुबेर के नाम से प्रसिद्ध हुये तथा इडविडा के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण ऐडविड भी कहलाये। उत्तम कुल में उत्पन्न होने तथा जन्मान्तरीय शिवाराधना के अभ्यास योग के कारण वे बाल्यकाल से ही दिव्य तेज से सम्पन्न, सदाचारी एवं देवताओं के भक्त थे। उन्होंने दीर्घकाल तक ब्रह्माजी की तपस्या द्वारा आराधना की, इससे प्रसन्न होकर ब्रह्माजी देवताओं के साथ प्रकट हो गये और उन्होंने उसे लोकपाल पद, अक्षय निधियों का स्वामी, सूर्य के समान तेजस्वी पुष्पक विमान तथा देवपद प्रदान किया-

तग्दच्छ बत धर्मज्ञ निधीशत्वमपाप्रुहि।।
शक्राम्बुपयमानां च चतुर्थस्त्वं भविष्यसि।
एतच्च पुष्पकं नाम विमानं सूर्यसंनिभम्।।
प्रतिगृण्हीष्व यानार्थं त्रिदशैः समतां व्रज।
वा. रा. उ. 3। 18-20

वर देकर ब्रह्मादि देवगण चले गये। तब कुबेर ने अपने पिता विश्रवा से हाथ जोड़कर कहा कि ‘भगवन् ब्रह्माजी ने सब कुछ तो मुझे प्रदान कर दिया, किंतु मेरे निवास का कोई स्थान नियत नहीं किया। अतः आप ही मेरे योग्य कोई ऐसा सुखद स्थान बतलाइये, जहां रहने से किसी भी प्राणी को कोई कष्ट न हो।’ इस पर उनके पिता विश्रवा ने दक्षिण समुद्रतट पर त्रिकूट नामक पर्वत पर स्थित विश्वकर्मा द्वारा निर्मित, देवराज इन्द्र की अमरावती के समान अद्वितीय लंका नगरी कुबेर को प्रदान की और कहा कि वह नगरी स्वर्णनिर्मित है और वहां कोई कष्ट, बाधा नहीं है। पिता की आज्ञा से कुबेर लंकाध्यक्ष होकर बड़ी प्रसन्नता के साथ वहां निवास करने लगे। कुबेर शंकरजी के परम भक्त थे। बाद में इन्होंने भगवान शंकर की विशेष रूप में आराधना की तथा भगवान शंकर की कृपा से उन्होंने उत्तर दिशा का आधिपत्य, अलकानाम की दिव्यपुरी, नन्दनवन के समान दिव्य उद्यानयुक्त चैत्ररथ नामक वन तथा एक दिव्य सभा प्राप्त की। साथ ही वे माता पार्वती के कृपापात्र और भगवान शंकर के घनिष्ठ मित्र भी बन गये। भगवान शंकर ने कहा-

तत्सखित्वं मया सौम्य रोचयस्व धनेश्वर।
तपसा निर्जितश्चैव सखा भव ममानघ।।

‘हे सौम्य धनेश्वर! अब तुम मेरे साथ मित्रता का संबंध स्थापित करो, यह संबंध तुम्हें रूचिकर लगना चाहिये। तुमने अपने तप से मुझे जीत लिया है, अतः मेरा मित्र बनकर (यहां अलकापुरी में) रहो।’

पुराणों में कुबेर सभा का वर्णन:-
महाभारत, सभापर्व के 10वें अध्याय में राजाधिराज कुबेर की सभा का विस्तार से वर्णन है। तदनुसार उस सभा का विस्तार सौ योजन लम्बा और सत्तर योजन चौड़ा है। उसमें चन्द्रमा की शीतल श्वेतवर्ण की आभा उदित होती रहती है। इस सभा को कुबेर ने अपनी दीर्घ तपस्या के बलपर प्राप्त किया था। यह वैश्रवणी अथवा कौबेरी नाम की सभा कैलास के पार्श्रवभाग में स्थित है। इसमें अनेक दिव्य सुवर्णमय प्रासाद बने हुए हैं।
बीच-बीच में मणिजड़ित स्वर्णस्तम्भ बने हैं, जिसके मध्य में मणिमयमण्डित चित्र-विचित्र दिव्य सिंहासन पर ज्वलित कुण्डलमण्डित और दिव्य आभरणों से अलंकृत महाराज कुबेर सुशोभित रहते हैं। देवगण, यक्ष, गुह्यक, किन्नर तथा ऋषि-मुनि एवं दिव्य अप्सरायें उनकी महिमा का गान करते हुये वहाँ स्थित रहती हैं। इस सभा के चारों ओर मंदार, पारिजात और सौगन्धिक वृक्षों के उद्यान तथा उपवन हैं, जहां से सुगन्धित, सुखद शीतल, मंद हवा सभामंडप में प्रविष्ट होती रहती है। देवता, गंधर्व और अप्सरा के गण संगीत एवं नृत्य आदि से सभा को सुशोभित करते रहते हैं। इनकी सभा में रम्भा, चित्रसेना, मिश्रकेशी, घृताची, पुजिंकस्थला तथा उर्वशी आदि दिव्य अप्सरा नृत्य-गीत के द्वारा इनकी सेवा में तत्पर रहती हैं। यह सभा सदा ही नृत्य-वाद्य आदि से निनादित रहती है, कभी शून्य नहीं होती। कुबेर के सेवकों में मणिभद्र, श्वेतभद्र, प्रद्योत, कुस्तुम्बुरु, हंसचूड, विभीषण, पुष्पानन तथा पिंगलक आदि मुख्य सेवक हैं। राज्यश्री के रूप में साक्षात् महालक्ष्मी भी वहां नित्य निवास करती हैं। महाराज कुबेर के पुत्र मणिग्रीव और नलकूबर भी वहां स्थित होकर अपने पिता की उपासना करते हैं। साथ ही अनेक ब्रह्मर्षि, देवर्षि, राजर्षि भी महात्मा वैश्रवण की उपासना में रत रहते हैं।

गंधर्वों में तुम्बुरु, पर्वत, शैलूष, विश्वावसु, हाहा, हूहू, चित्रसेन तथा अनेक विद्याधर आदि भी अपने दिव्य गीतों द्वारा महाराज वैश्रवण की महिमा का गान करते रहते हैं। हिमवान्, पारियात्र, विन्ध्यादि पर्वत सेवा में प्रस्तुत रहते हैं तथा सभी देवयोनियाँ और शंख, पद्म आदि निधियां भी मूर्तिमान् रूप धारण कर उनकी सभा में नित्य उपस्थित रहती हैं। उमापति भगवान शिव भी महाराज कुबेर के अभिन्न मित्र होने के कारण त्रिशूल धारण किये हुये भगवती पार्वती के साथ वहां सुशोभित रहते हैं। इस प्रकार महाराज वैश्रवण की सभा ब्रह्मा तथा सभी लोकपाल की सभा से अति विचित्र एवं दिव्य है। राजाधिराज कुबेर इस सभा में स्थित होकर अपने वैभव का दान करते रहते हैं।

धनकुबेर और धन त्रयोदशी :-

धन त्रयोदशी तथा दीपावली के दिन धनाधिपति कुबेर के साथ साथ महालक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। देवताओं के धनाध्यक्ष महाराज कुबेर राजाओं के भी अधिपति हैं, क्योकि सभी निधियों, धनों के स्वामी यही देव हैं, अतः सभी प्रकार की निधियों या सुख, वैभव तथा वर्चस्व की कामना की पूर्ति, फल की वृष्टि करने में वैश्रवण कुबेर समर्थ हैं। सारांश में कहा जा सकता है कि धनाध्यक्ष कुबेर की साधना ध्यान करने से मनुष्य का दुःख-दारिद्रय दूर होता है और अनन्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। सनातन धर्म में गहरा विश्वास रखने वालों का अटल विश्वास है कि शिव के अभिन्न मित्र होने से कुबेर अपने भक्त की सभी विपत्तियों से रक्षा करते हैं, और उनकी कृपा से साधक में आध्यात्मिक ज्ञान-वैराग्य आदि के साथ-साथ उदारता, सौम्यता, शांति तथा तृप्ति आदि सात्त्विक गुण भी स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाते हैं।

राजाधिराज कुबेर की साधना-
महाराज वैश्रवण कुबेर की उपासना से संबंधित मंत्र, यंत्र, ध्यान एवं उपासना आदि की सारी प्रक्रियायें श्रीविद्यार्णव, मंत्रमहार्णव, मंत्रमहोदधि, श्रीतत्त्वनिधि तथा विष्णुधर्मोत्तरादि पुराणों में विस्तार से निर्दिष्ट हैं। तदनुसार इनके अष्टाक्षर, षोडशाक्षर तथा पंचत्रिंशदक्षरात्मक छोटे-बड़े अनेक मंत्र प्राप्त होते हैं। मंत्रों के अलग-अलग ध्यान भी निर्दिष्ट हैं। मंत्र साधना में गहन रूची रखने वाले साधक उपरोक्त ग्रन्थों का अवलोकन करें। यहाँ पाठकों के लिये धनाध्यक्ष कुबेर की एक सहज व सरल साधना पद्धति दी जा रही है। यह साधना धनत्रयोदशी के दिन की जानी चाहिये यदि कोई साधक इस साधना को दीपावली की रात्रि में करना चाहे तो उस महापर्व पर भी यह साधना कर सकते हैं। अथवा दोनो ही दिन (धनत्रयोदशी तथा दीपावली) यह साधना सम्पन्न की जा सकती है।

इस वर्ष धन त्रयोदशी 5 नवम्बर 2018 तथा दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है। यह साधना स्थिर लग्न में ही सम्पन्न की जाती है। क्योंकि स्थिर लग्न में जिस कार्य को किया जाता है वह स्थिरता को प्राप्त होता है, और लक्ष्मी को तो सभी स्थिर ही रखना चाहते हैं। अतः यह साधना तो अवश्य स्थिर लग्न में ही करनी चाहिये। ‘स्थिर लग्न’ इन दिनों में वृष तथा सिंह लग्न ही पढ रही हैं। वृषभ लग्न 5 नवम्बर 2018 धनत्रयोदशी के दिन सांयकाल 18 बजकर 05 मिनट से रात्रि 20 बजकर 00 मिनट तक रहेगी। तथा सिंह लग्न मध्य रात्रि में ठीक 24 बजकर 35 मिनट से 02 बजकर 52 मिनट तक रहेगी।

साधना पद्धति:- धनत्रयोदशी की रात्रि में उत्तर दिशा की ओर मुख करके पुरूष साधक पीले वस्त्र तथा महिलायें पीली साड़ी पहनकर बैठें सामने एक लकड़ी के पटरे पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाकर उस पर शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण प्राण प्रतिष्ठित श्री कुबेर यंत्र स्थापित करें, और साथ ही शुद्ध घी का दीपक जलाकर पंचोपचार पूजा करें मिठाई का भोग लगावें तथा विनियोगादि क्रिया करके 11 माला सप्तमुखी रूद्राक्ष की माला से कुबेर मंत्र का जप करें। जप सम्पूर्ण होने पर प्रसादरूप में मिठाई का परिजनों को वितरण करें और फिर रात्रि में उसी पूजा स्थल में ही निद्रा विश्राम करें। प्रातः शेष फूलादि सामग्री जल में विसर्जित कर दें तथा ‘शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण तथा प्राणप्रतिष्ठित श्री कुबेर यंत्र’ को पीले आसन सहित अपनी तिजोरी कैश बाॅक्स या अलमारी अथवा संदूक में रख दें। तथा रूद्राक्ष की जप माला को गले में धारण करें।

सम्पन्नता के लिये कुबेर मंत्र-
यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय स्वाहा।

वैसे तो इस मंत्र की जप संख्या एक लक्ष (एक लाख) कही गयी है। परंतु धन त्रयोदशी की रात्रि में जितना हो सके विधि-विधान से इस मंत्र का जप करना ही पर्याप्त होता है। मंत्र का जप सम्पन्न होने पर तिल एवं शुद्ध घी से दशांश हवन करना चाहिये। यह साधना कार्तिक कृष्ण 13 अर्थात् धन त्रयोदशी पर की जाती है, पूरे भारतवर्ष के लोग धन त्रयोदशी के दिन धनाधिपति कुबेर के साथ महालक्ष्मी तथा आरोग्य प्रदान करने वाले देव धनवंतरि की पूजा-आराधना एवं साधना करते हैं, और सुख संपदा के अभिलाषी तो इस दिन कुछ विशेष प्रयोग सम्पन्न करते हैं जिससे कि अगले पूरे वर्ष तक घर के सभी सदस्य प्रसन्न व निरोगी रहें, और उनके घर में श्रीलक्ष्मी का निवास और प्रसन्नता बनी रहे।

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सौभाग्य लक्ष्मी प्रयोग

सौभाग्य-लक्ष्मी दीपावली सिद्ध प्रयोग-2018

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सौभाग्य लक्ष्मी उपनिषद में भगवान आदिनारायण देवताओं को सौभाग्यलक्ष्मी साधना का उपदेश देतु हुये कहते हैं- सौभाग्यलक्ष्मी स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण रूप तीनों अवस्थाओं से परे तुरियस्वरूपा हैं। सभी मंत्रों को अपना आसन बनाकर उन पर विराजमान हैं। इस प्रकार सौभाग्यलक्ष्मी के इस महत्वपूर्ण यंत्र की परिभाषा और निर्माण की पूर्ण प्रक्रिया पूर्णतः समझाई है, उनका कहना है कि ऐसा महायंत्र निर्माण करना अत्यंत ही कठिन है, क्योंकि इस महायंत्र का निर्माण केवल एक विशेष मुहूर्त में ही सम्पन्न किया जाना चाहिये। और फिर सौभाग्यलक्ष्मी का सिद्ध यंत्र यदि साधक के पास होता है, तो वास्तव में ही वह समस्त भू-सम्पदा का स्वामी होता है, केवल मात्र घर में यंत्र रखने से ही उसे धर्म-अर्थ-काम, और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यह यंत्र अन्धकार में प्रकाश की तरह है, मध्य रात्रि में सूर्य की तरह तेजस्वी है।

दीपावली के पर्व पर रात्रि काल में साधक अपने घर में पूजा स्थान में इस अद्वितीय महायंत्र की स्थापना कर सौभाग्यलक्ष्मी मंत्र से साधना करता है, तो वह साधक वास्तव में ही सौभाग्यशाली माना जाता है, सौभाग्यलक्ष्मी अवश्य उसके घर में निवास करती हैं, यह वास्तव में ही उसके घर में लक्ष्मी को आना ही पड़ता है, और जब तक वह महायंत्र घर में स्थापित होता है, तब तक उस घर में सौभाग्य सहित लक्ष्मी का निवास हमेशा बना रहता है।

दीपावली की रात्रि में मंत्रों द्वारा सिद्ध करके यह महायंत्र घर में स्थापित होने पर न केवल कर्ज, मिट जाता है, अपितु घर के लड़ाई झगड़े भी समाप्त हो जाते है, व्यापार में वृद्धि होने लगती है, आर्थिक उन्नति और राज्य से सम्मान प्राप्ति होती है, और उसके जन्म जन्म के दुःख और दारिद्रय समाप्त हो जाते हैं। इस महायंत्र की जितनी प्रशंसा सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद में की है, और आगे के ऋषियों ने इस महायंत्र की जितनी विशेषतायें बतलाई हैं, वे अपने आप में अन्यतम है वशिष्ठ, विश्वामित्र, आदि ऋषियों ने इस प्रकार के महायंत्र को कामधेनु की संज्ञा दी है। गौतम और कणाद जैसे ऋषियों ने इस महायंत्र को कल्पवृक्ष के समान फलदायक बताया है। स्वयं शंकराचार्यजी ने इस महायंत्र को स्थापित कर, इससे संबंधित मंत्र सिद्धि के द्वारा असीम लक्ष्मी भण्डार प्राप्त कर जीवन की पूर्णता प्राप्त की थी। स्वयं तंत्रगुरू गोरखनाथ ने स्वीकार किया है, कि इस यंत्र में तांत्रिक और मांत्रिक दोनों विधियों का पूर्ण रूप से समावेश है। यह महायंत्र अपने आप में देवताओं के समान फलदायक है। आगे के विद्वानों ने भी यह स्वीकार किया है कि यदि साधक इस साधना को सम्पन्न कर लें और घर में ऐसा महायंत्र स्थापित कर लें, तो फिर उसके जीवन में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं रह सकती, जीवन में किसी प्रकार का अभाव नहीं रह सकता, उसके जीवन में असफलता नहीं रह सकती।

महायंत्र की रचना- इस महायंत्र की रचना गुरुपुष्य योग में शुद्ध चांदी के पतरे पर करनी चाहिये। ऊपर की पंक्ति में 22 अंक से आरम्भ कर अंतिम पंक्ति में 4 अंक तक उत्कीर्ण करना चाहिये। और फिर रविपुष्य योग में इस यंत्र की प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिए।

दीपावली सिद्ध प्रयोग- 2018 :- यद्यपि शास्त्रों में बताया गया है, कि एक बार ऐसा महायंत्र सिद्ध करके स्थापित होने के बाद इससे संबंधित किसी भी प्रकार की साधना करने की आवश्यक नहीं होती। यह प्रयोग केवल एक ही दिन का है, जो कि दीपावली की रात्रि में सम्पन्न किया जाता है। सबसे पहले साधक दीपावली के दिन सांयकाल स्नानादि से शुद्ध होकर अपने पूजा स्थान में बैठ जाये और सामने एक लकड़ी के तख्ते पर पीला रेशमी वस्त्र बिछा कर उस पर प्राणप्रतिष्ठित महायंत्र स्थापित कर फूल, अक्षत्, नवैद्य, धूप-दीप से इसकी पूजा करें। पूजा के उपरांत इस महायंत्र को स्थापित कर दें। इससे पहले एक अलग पात्र में इस महायंत्र को जल से तथा दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान कराकर इसे पीले रेशमी वस्त्र पर स्थापित कर दें, और केसर से इस महायंत्र के बाहर नौ बिन्दियां लगायें जो नव निधि की प्रतीक हैं, इसके बाद हाथ में जल ले कर विनियोग करे-

विनियोग-
अस्य श्री सौभाग्यलक्ष्मी मंत्रस्य भृगु ऋषिः आद्यादि श्री महालक्ष्मी देवता, नीचृद्रगायत्रीछन्दांसि, श्रीं बीजम् श्रीं शक्तिः, श्रीं कीलकम् श्री महालक्ष्मी प्रसाद सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

इसके बाद साधक हाथ में जल ले कर संकल्प करें कि मैं अमुक गौत्र अमुक पिता का पुत्र, अमुक नाम का साधक दीपावली पर्व पर भगवती सौभाग्यलक्ष्मी को नवनिधियों के साथ अपने घर में स्थापित करने के लिये यह सिद्ध प्रयोग सम्पन्न कर रहा हूं, ऐसा कह कर हाथ में लिया हुआ जल भूमि पर छोड़ दे, और फिर प्राण प्रतिष्ठित यंत्र के सामने शुद्ध घृत के पांच दीपक लगावे, सुगन्धित अगरबत्ती प्रज्वलित करें, गुलाब तथा संभव हो तो कमल का भी एक पुष्प चढावें, थोडे चावल, रोली, कलावा, पान तथा साबुत सुपारी चढाकर पूजा करें, और दूध के बने हुए प्रसाद का नैवेद्य समर्पित करें, इसके बाद हाथ में जल लेकर अंगन्यास करें-

अंगन्यास-
श्रां हृदयायनमः। श्रीं शिरसे स्वाहा। श्रूं शिखाये वषट्। श्रैं कवचाय हुम्। श्रौं नेत्रत्रयाय वौष्ट्। श्रःअस्त्राय फट्। इसके बाद हाथ जोड़ कर ध्यान का पाठ करें-

ध्यान-
भुयादभुयो द्विपद्मभयवरदकरा तत्पकार्तस्वराभ शुभ्राभ्राभेभयुग्मद्वयकर धृतकुम्भादिभरासिच्यमाना।
रक्तौघाबद्धमौलिर्विमलतरदुकूलार्तवालेपनाढया पद्मक्षी पद्मनाभोरसि कृतवसतिः पद्मगा श्रीः श्रियै नः।।

इसके बाद साधक सिद्ध सौभाग्यलक्ष्मी माला (कमलगट्टे की सिद्ध माला) से एकाक्षरी मंत्र की 51 माला जप करें, इसमें सौभाग्यलक्ष्मी माला’ का ही प्रयोग होता है। एकाक्षरी महामंत्र- ‘श्रीं’ 51 माला मंत्र जप के बाद साधक सौभाग्यलक्ष्मी की आरती करें और यंत्र को प्रातः अपनी तिजोरी में रख दें या पूजा स्थान में रहने दें, तथा प्रसाद को घर के सभी सदस्यों में वितरित कर दे, इस प्रकार यह साधना सम्पन्न होती है जो कि वर्ष की श्रेष्ठतम और अद्वितीय साधना कही जाती है।

साधना सामग्री में:- एक प्राणप्रतिष्ठित सौभाग्यलक्ष्मी यंत्र जो कि शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण तथा प्राणप्रतिष्ठित हो और सौभाग्यलक्ष्मी माला (कमलगट्टे की सिद्ध माला) की आवश्यकता होगी।

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दीपावली 2018 (दीपावली पूजन)

दीपावली (महालक्ष्मी) पूजन मुहूर्त 2018 :-

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श्री महालक्ष्मी पूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल से आधी रात तक रहने वाली अमावस श्रेष्ठ होती है। यदि अर्धरात्रि काल में अमावस तिथि का आभाव हो, तो प्रदोषकाल में ही दीप प्रज्वलन, महालक्ष्मी पूजन, श्रीगणेश एवं कुबेर आदि पूजन करने का विधान है।

प्रदोषे दीपदानए लक्ष्मी पूजनादि विहितम्।
कार्तिक कृष्ण पक्षे च प्रदोषे भूतदर्शर्योः,
नरः प्रदोष समये दीपदान् दद्यात् मनोरमान्।।

इस वर्ष 2018 ई. कार्तिक अमावस 7 नवम्बर, बुधवार को प्रदोष व्यापिनी तथा रात्रि 21:22 तक निशीथ व्यापिनी होने से दीपावली पर्व इसी दिन होगा। दीपावली स्वाती तथा विशाखा नक्षत्र आयुष्मान तथा सौभाग्य योग एवं तुला के चन्द्रमा के समय होगी। सांय सूर्यास्त (प्रदोषकाल प्रारम्भ) के बाद मेष व वृष लग्न एवं स्वाती नक्षत्र विद्यमान होने से यह समयावधि श्रीगणेश, महालक्ष्मी पूजन आदि आरम्भ करने के लिये विशेष रूप से शुभ रहेगी। बही खातों एवं नवीन शुभ कार्यों के लिये भी यह मुहूर्त अत्यंत शुभ होगा। इस वर्ष बुधवार की दीपावली व्यापारियों, क्रय-विक्रय करने वालों के लिये विशेष रूप से शुभ मानी जायेगी।

लक्ष्मीपूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल की विशेषता :-
कार्तिके प्रदोषे तु विशेषण अमावस्या निशावर्धके।
तस्यां सम्पूज्येत् देवी भोगमोक्ष प्रदायिनीम्।।

दीपावली के दिन घर में प्रदोषकाल से महालक्ष्मी पूजन प्रारम्भ करके अर्धरात्रि तक जप अनुष्ठानादि करने का विशेष महात्मय होता है। प्रदोषकाल से कुछ समय पहले स्नानादि उपरांत धर्मस्थल पर मंत्रपूर्वक दीपदान करके अपने निवास स्थान पर श्रीगणेश सहित महालक्ष्मी, कुबेर पूजनादि करके अल्पाहार करना चाहिये। तदुपरांत यथोपलब्ध निशीथादि शुभ मुहूर्त में मंत्र-जप, यंत्र-सिद्धि आदि अनुष्ठान सम्पादित करने चाहियें।
दीपावली वास्तव में पांच पर्वों का महोत्सव है, जिसका आरम्भ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) से लेकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई-दूज) तक रहती है। दीपावली के पर्व पर धन की भरपूर प्राप्ति के लिये धन की अधिष्ठात्री भगवती लक्ष्मी का समारोह पूर्वक आवाहन, षोडशोपचार सहित पूजन किया जाता है। आगे दिये गये निर्दिष्ट शुभ मुहूर्तों में किसी पवित्र स्थान पर आटा, हल्दी, अक्षत एवं पुष्पादि से अष्टदल कमल बनाकर श्रीलक्ष्मी का आवाहन एवं स्थापन करके देवों की विधिवत् पूजा अर्चना करनी चाहिये।

आवाहन का मंत्र-
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामाद्र्रां ज्वलंती तृप्तां तर्पयंतीम।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप हव्ये श्रियम्। (श्रीसूक्तम्)।

पूजा मंत्र-
ॐ गं गणपतये नमः।। लक्ष्म्यै नमः।। नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात्।। से लक्ष्मी की, एरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः। शतयज्ञाधिपो देवस्तस्मा इन्द्राय ते नमः।

अग्रलिखित मंत्र से इन्द्र की और कुबेर की निम्न मंत्र से पूजा करें- कुबेराय नमः, धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्मधिपाय च। भवन्तु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादि सम्पदः।।
पूजन सामग्री में विभिन्न प्रकार की मिठाई, फल पुष्पादि, धूप, दीपादि सुगंधित वस्तुयें सम्मलित करनी चाहियें। दीपावली पूजन में प्रदोष, निशीथ एवं महानिशीथ काल के अतिरिक्त चौघड़िया मुहूर्त भी पूजन, बही-खाता पूजन, कुबेर पूजा, जपादि अनुष्ठान की दृष्टि से विशेष शुभ माने जाते हैं।

प्रदोषकाल-
7 नवम्बर 2018 को दिल्ली एवं निकटवर्ती नगरों में सूर्यास्त 17:30 से 02 घ. 41 मि. के लिये 20:11 तक प्रदोषकाल रहेगा। सांय 17:57 तक मेष (चर) लग्न तथा सांय 17:57 से 19:52 तक वृष (स्थिर) लग्न विशेष रहेगा। प्रदोषकाल में मेष व वृष लग्न स्वाती नक्षत्र 19:37 तक तथा तुला का चन्द्रमा होने से महालक्ष्मी पूजानादि के लिये शुभ समय होगा। प्रदोषकाल में ही 19:00 से 20:41 तक शुभ की चौघड़िया रहने से इस योग में दीपदान, महालक्ष्मी, गणेश-कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन, धर्मस्थल एवं घर पर दीप प्रज्वलित करना, ब्राह्मणों तथा आश्रितों को भेंट, मिठाई बांटना शुभ होगा।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़िया मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग। 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चौघड़िया
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चौघड़िया पूजन में होनी चाहियें।

निशीथ काल- 7 नवम्बर 2018 को दिल्ली व समीपस्थ नगरों में निशीथकाल रात्रि 20:01 से 22:41 तक रहेगा। इसी निशीथ काल में 19:43 से 21:57 तक मिथुन लग्न मध्यम मुहूर्त, तदुपरांत कर्क लग्न विशेष प्रशस्थ रहेगा। 19:00 से 20:41 तक शुभ की चौघड़िया भी शुभ रहेगी। तदुपरांत अमृत की चौघड़िया 20:41 से 22:22 तक भी शुभ रहेगी। इस अवधि तक पूजन समाप्त कर श्रीसूक्त, कनकधारा स्त्रोत्र तथा लक्ष्मी स्त्रोत्रादि का जप पाठ करना चाहिये।

महानिशीथ काल- रात्रि 22:41 से 24:20 तक महानिशीथ काल रहेगा। इस अवधि में 21:57 से 24:20 तक कर्क लग्न तदुपरांत सिंह लग्न विशेष शुभ रहेगा। 22:22 से 24:02 तक चर की चौघड़िया भी शुभ, परंतु तदुपरांत रोग की चौघड़िया अशुभ रहेगी। इस लिये 24:02 तक श्री गणेश-लक्ष्मी पूजन अवश्य कर लेना चाहिये। महानिशीथ काल में श्री महालक्ष्मी, काली उपासना, यंत्र मंत्र तंत्रादि की क्रियायें व काम्य प्रयोग, तंत्रानुष्ठान, साधनायें एवं यज्ञादि किये जाते हैं।

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साढ़ेसाती,Sadesati

शनि की साढ़ेसाती और साढ़ेसाती का प्रभाव :-

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant), top best astrologer in delhi

नीलाम्बरः शूलाधरः किरीटी गघ्रस्थित स्त्रासकरो धनुष्ठाम्।
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रशान्तः सदाऽतु महां वरदोऽल्पगामी।।

शरीर पर नीले वस्त्राभूषण धारण करने वाले, सिर पर मुकुट को, हाथों में धनुष और शूल को धारण करने वाले, गीध पर विराजमान, प्राणियों को भय देने वाले, मंदगति से चलने वाले और चार भुजाओं से युक्त सूर्य के पुत्र शनिदेव हमारे प्रति शांत और शुभ वर देने वाले हों।

शनि ग्रह का परिचय-
भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया ने शनिदेव को जन्म दिया। शनिदेव का स्तवन काश्यपेयं महद्रद्युतिम कहकर किया जाता है। क्योंकि शनि को महर्षि कश्यप की वंश परम्पराओं में माना गया है। एक मत के अनुसार महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में संपन्न काश्यपेय यज्ञ का संबंध शनि की उत्पत्ति से है। भारतीय ज्योतिष के सात ग्रहों में शनिग्रह सबसे दूरस्थ है। यह सूर्य की एक परिक्रमा 29.5 वर्षों में पूरी करता है, तथा एक राशि में लगभग 2.5 वर्ष तक रहता है। शनि के दस चन्द्रमा हैं। शनि अस्त होने के 38 दिन बाद उदय होता है। तत्पश्चात 135 दिनों तक सामान्य गति से उसके बाद 105 दिनों तक वक्री गति से संचरणशील रहता है। वक्र गति से परिक्रमा करते हुए पश्चिम से अस्त होता है।

ज्योतिर्विदों एवं खगोलविदों ने शनि ग्रह को नीलनिलय का सुन्दरतम ग्रह स्वीकार किया है। विषय यहां साढ़ेसाती से सम्बध है, अतः शनि की साढ़ेसाती sadesati का मुख्यतः कारण उसके वलय हैं। शनिग्रह एक नीली गेंद की भांति प्रतीत होते हैं, ये तीन पीले वलयों के बीच स्थित हैं। यही वलय साढ़ेसाती का कारण है। क्योंकि शनिदेव जिस राशि पर भ्रमण करते हैं एक वलय उस राशि से आगे वाली राशि पर प्रभाव डालता है, तथा पीछे वाला वलय पीछे वाली राशि पर प्रभाव डालता है। मध्य राशि में शनिदेव स्वयं स्थित होते हैं। अतः गोचर में शनिदेव जिस राशि पर भ्रमण करते हैं, उसके आगे-पीछे की राशियों को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए वर्तमान में शनि धनु राशि में स्थित हैं, अतः धनु राशि वाले जातकों के लिए तो शनि की साढ़ेसाती चल ही रही है। वृश्चिक राशि वालों के लिए उतरती साढ़ेसाती तथा मकर राशि वालों के लिए चढ़ती हुई साढ़ेसाती लगी हुई है। चूंकि शनि ग्रह एक राशि में 2.5 वर्ष रहते हैं, तथा उसके वलय आगे पीछे रहते हैं अतः गोचर कालीन शनि से एक राशि 2.5×3=7.5 वर्ष तक प्रभावित होती है, इसे ही शनि की साढ़ेसाती कहते हैं।

जब एक जातक के जन्मकालीन चन्द्रमा से शनि 12वें हो तब साढ़ेसाती का प्रारंभ होता है। जन्मकालीन चन्द्रमा पर शनि का गोचर योग कहलाता है, तथा अन्यकालीन चन्द्रमा से द्वितीयस्थ शनि पाद कहलाता है। जिन जातकों की जन्मपत्रिका नहीं है। उनको साढ़ेसाती के प्रभाव उनकी मानसिक स्थिति से अनुमान द्वारा जाना जा जाता है।

ज्योतिष तत्व प्रकाश के अनुसार-
द्वादशे जन्मगे राशौ द्वितीये च शनैश्चरः।
सार्धानि सप्तवर्षाणि तदा दुःखेर्युतो भवेत्।। रिष्फ रूप धनमेषु भास्करिः संस्थितो भवति यस्य जन्मजात्।
लोचनोदरपदेषु संस्थितिः कथ्यते रविजलोकजैर्जनं।। (ज्योतिष तत्व प्रकाश)

शनि जन्म राशि से द्वादश भाव (12), जन्म राशि (1), एवं जन्मराशि से द्वितीयस्थ (2) हो तो, शनि की साढ़ेसाती आरोपित होती है। शनि के आगे वाले वलय को नेत्रों की संज्ञा दी गई है, स्वयं शनि देव जिस राशि में रहते हैं, उसे उदर की संज्ञा दी गई है, तथा शनिदेव के पीछे वाले वलय को पाद (पावो) की संज्ञा दी गई है। अर्थात लगती हुई साढ़ेसाती sadesati को नेत्रों पर, बीच वाली (मध्य) साढ़ेसाती को भोग तथा उतरती हुई साढ़ेसाती को पाद काल कहा जाता है। शनि की साढ़ेसाती स्वयं में भीषण भय तथा सघन संत्रास उत्पन्न करने वाले शब्द हैं। साढ़ेसाती के विषय में अनेकानेक भ्रांतियाँ भी प्रचलित हैं। लौकिक कथाओं में साढ़ेसाती विनाशक काल प्रहार के रूप में प्रस्तुत होती है। शनि की विकरालता में साढ़ेसाती की क्रूरता संयुक्त होकर प्रकम्पन उत्पन्न कर देती है। परंतु प्रत्येक जातक के लिए शनि की साढ़ेसाती विकरालता या क्रूरता लिये नहीं आती, अतः शनि की साढ़ेसाती के प्रभावों को समझने के लिए शनिदेव की प्रकृति को समझना आवश्यक है।

शनि देव की प्रकृतिः-
शनि के पर्याय नाम- शनि, मन्द, छायायुक्त-पंगु, पंगुकाय, कोण, तरणि, तनय, घुमणिसुत, पातंगी, मृदु, नील, कपिलाक्ष, कृशांग, दीर्घ, छायातज, यम, अर्कपुत्र, सौरि, क्रोड, क्रूरलोचन, दुःख।

शनि का सामान्य/विशेष स्वरूपः-
मन्दोऽलसः कपलिदृक कृश दीर्घगात्रः।
स्थूलद्विजः परुष रोम कचोऽनिलात्मा।।

शनि प्रधान पुरुष आलसी, पिंगलवर्ण, दृष्टियुक्त, दुबला तथा लम्बी देहवाला, मोटे दांतों वाला होता है। इसके रोम और केश रूखे होते हैं। यह वात प्रकृति प्रधान होता है। सूर्यपुत्र शनि दुःखदायक काले वर्ण का होता है। स्नायुतंत्र, कूड़ा करकट फेंकने की जगह, फटे पुराने कपड़े, लोहा, कबाड़, शिशिर तथा नमकीन रूचि पर शनि का अधिकार है।

कान्नियरोमावयवः कृशात्मा दुर्वासिताङ्ग कफ मारू मात्मा।
पीनद्विजश्चारूपिशङ्ग दृष्टिः सौरिस्तमो बुद्धि रतोऽलसः स्यात।। (वेधनाथ)

शनि प्रधान व्यक्ति के केश और अव्यव कठिन (मोटे) होते हैं। इसका शरीर दुर्बल होता है। शरीर का रंग दूर्वा जैसा (श्याम) होता है। इसकी प्रकृति कफ-वात होती है। इसके मोटे दांत होते है। दृष्टि पिंगलवर्ण की, यह तामसी बुद्धि वाला तथा आलसी होता है। शनि का उदय पृष्ठ भाग से होता है। यह चैपाया है पर्वत वनों में घूमने वाला, सौ वर्ष की आयु का मूल प्रधान होता है। इसके देवता ब्रह्मा है, इसका रत्न नीलम है। इसका प्रदेश गंगा से हिमालय तक है। यह वायु तत्व प्रधान कसैली रूचिवाला, निम्न दृष्टि वाला और तीक्ष्ण स्वभाव वाला होता है, तुला, मकर, कुम्भ राशि में, जाया स्थान (स्त्री स्थान) में, विषुव के दक्षिणायान में स्वग्रह (मकर कुम्भ) में, शनिवार में, अपनी दशा में, राशि के अन्त भाग में, युद्ध के समय में, कृष्ण पक्ष, वक्री होने पर किसी भी स्थान में शनि बलवान होता है।

श्यामलोऽति मालिनश्च शिरालः सालसश्च जटिलः कृश दीर्घ।
स्थूल नख पिगंल नेत्रोयुक् शनिश्च खलता निलकोपः। (टुण्डीराज)

शनि श्याम वर्ण, हृदय से अर्थात् अन्तरात्मा से मलिन, नसों से व्याप्त देह वाला, स्वभाव से आलसी, जटायुक्त, दुर्बल तथा लम्बा शरीर दांत और नाखून मोटे, पीतवर्ण की आंखों वाला, दुष्ट स्वभाव, क्रोधी तथा वायु प्रधान प्रकृति का होता है।
विद्वानों का मत है कि दशम तथा एकादश राशियों पर शनि का अधिकार है, अर्थात् मकर और कुम्भ राशियों का स्वामी शनि है। इसका उच्च स्थान सप्तम राशि तुला है। नीच राशि मेष है। यह सीमांतक ग्रह कहलाता है, क्योंकि यहां पर सूर्य का प्रभाव समाप्त हो जाता है, वहां पर शनि के प्रभाव का प्रारंभ होता है। शनि सूर्य से पराजित होता है, और मंगल को परास्त कर देता है। पाश्चात्य ज्योतिर्विद विलियम लिलि के अनुसार, शनि प्रधान व्यक्ति का शरीर साधारणतः शीतल और रूक्ष होता है, मझंला कद, फीका काला रंग, आंखें बारीक और काली, दृष्टि नीचे की ओर, भाल भव्य, केश काले और लहरीले तथा रूक्ष, कान बड़े लटकते जैसे, भौंहे झुकी हुई, होंठ और नाक मोटा, दाढ़ी पतली, इस प्रकार का स्वरूप बतलाया जा सकता है। इसका चेहरा देखने से प्रसन्नता नहीं होती। सिर झुका हुआ और चेहरा अटपटा सा लगता है। कंधे चौड़े, फैले, टेढ़े होते हैं। पेट पतला, जघाएं पतली तथा घुटने और पैर टेढे-मेढ़े होते हैं। चाल शराबी जैसी लड़खड़ाती प्रतीत होती है। घुटने एक-दूसरे से सटे रखकर चलते हैं। शनि पूर्व की ओर हो तो प्रमाण बद्धता और मृदुता कुछ हद तक होती है। कद मोटा होता है। पश्चिम की ओर हो तो कृश और अधिक काले रंग का होता है। शरीर पर केश बहुत कम होते हैं। शनि के शर कम हों तो कृशता ज्यादा होती है। शर अधिक हों तो मांसल शरीर होता है।

शनि का कारकत्वः-
प्रत्येक ग्रह किन-किन का कारक होता है। इसके संबंध में उतर कालामृत ज्योतिष ग्रंथ के रचयिता कालिदास ने सभी प्राचीन ग्रंथों से अधिक ग्रहों के कारकत्व का वर्णन किया है। अतः सर्वप्रथम शनि का कारकत्व उत्तर कालामृत से उद्धृत किया जा रहा है-

शनि से इन विषयों का विचार करना चाहिए-
जड़ता अथवा आलस्य, रूकावट, घोड़ा, हाथी, चमड़ा, आय, बहुत कष्ट, रोग, विरोध, दुःख, मरण, स्त्री से सुख, दासी, गधा अथवा खच्चर, चाण्डाल, विकृत अंगों वाले, वनों में भ्रमण करने वाले डरावनी सूरत, दान, स्वामी, आयु, नपुंसक, अन्त्यज, खग, तीन अग्नियां, दासता का कर्म करने वाले, अधार्मिक कृत्य, पौरुषहीन, मिथ्या भाषण, चिरस्थायी, वायु, वृद्धावस्था, नसें, दिन के अंतिम भाग में बलवान, शिशिर ऋतु, क्रोध, परिश्रम, नीच जन्मा, हरामी, गौलिक, गन्दा कपड़ा, घर, बुरे विचार, दुष्ट से मित्रता, काला, पाप कर्म, क्रूर कर्म, राख, काले धान्य, मणि, लोहा, उदारता, वर्ष, शूद्र, वैश्य, पिता का प्रतिनिधि, दूसरे के कुल की विद्या सीखने वाला, लंगड़ापन, उग्रता, कम्बल, पश्चिमाभिमुख, जिलाने के उपाय, नीचे देखना, कृषि द्वारा जीवन निर्वाह, शस्त्रागार, जाति से बाहर वाले स्थान, ईशान दिशा का प्रिय, नागलोक, पतन, युद्ध, भ्रमण, शल्यविद्या, सीसा धातु, शक्ति का दुरूपयोग, शुष्क, पुराना तेल, लकड़ी, ब्राह्मण, तामस गुण, विष, भूमि पर भ्रमण, कठोरता, इच्छुक, वस्त्रों से सजाना, यमराज का पुजारी, कुत्ता, चित्त, की कठोरता आदि शनि के कारकत्व है।

जैसे सौर मण्डल में शनि का स्थान सबसे अंत में है ऐसे ही गुणों आदि में भी शनि का स्थान अंत में अर्थात घटिया, निकृष्ट अधम है। यही कारण है कि शनि निम्न वर्ग का (मजदूरों का, सफाई कर्मचारियों का ग्रह) माना गया है। वर्णों में इसीलिए शूद्र की पदवी प्राप्त है। घर में नौकर, भ्रत्य की सी निम्न स्थिति है, सूर्य से दूर रहने के कारण इसमें प्रकाश कम है। यही कारण है कि शनि को विद्याहीन, प्रकाशहीन, काला, विद्याहीन माना गया है। प्रकाश की रश्मियों से जो पदार्थ वंचित हैं उनकी पूरी उन्नति नहीं हो पाती। अतः शनि अपूर्णता, हीनता, अभाव आदि का द्योतक है। इसी प्रकाश आदि के अभाव से कई रोगों की उत्पत्ति होती है। इसीलिए शनि को रोग का कारण माना गया है। नवग्रह परिवार में मंद गति से भ्रमण करने (शनैः शनैःश्चर) धीरे-धीरे चलाने वाला शनैश्चर कहा गया है। मन्द गति होने के कारण शनि को लंगड़े की उपाधि भी दी गई है। शनि की कुण्डली में स्थिति मनुष्य की टांगों की स्थिति को बतला देती है। प्रकाशहीन वनस्पति तथा अन्य जीवन, मृत पदार्थों, जैसे चमड़ा और पत्थर इनसे भी शनि का घनिष्ठ संबंध है। मन्दगति होने के कारण कार्यों का विलम्ब से सम्पादन होना स्वाभाविक ही है। अतः विलम्ब से, बहुत काल से, आयु से, दीर्घ रोग से, दीर्घ आकार से शनि का संबंध है और इन वस्तुओं का शनि इसलिए कारक भी है।

साढ़ेसाती sadesati स्वयं में भयप्रद शब्द है किन्तु संपूर्ण साढ़ेसाती काल विध्वंसक या खराब नहीं होता, कारण कि सभी राशियों पर शनि की साढेसाती का प्रभाव समान नहीं होता, क्योंकि साढ़ेसाती का संबंध गोचर से है। अतः गोचर में शनि जन्मांग में अपनी स्थिति प्रत्येक राशि में उसके अधिपति के साथ अपने संबंध के अनुसार ही फल प्रदान करेगा। जैसा कि विदित है, शनि मकर एवं कुम्भ राशि का स्वामी, कुम्भ राशि में मूल त्रिकोण, तुला राशि में उच्च के तथा मेष राशि में नीच के होते हैं। बुध एवं शुक्र, राहु ग्रह मित्र हैं। सूर्य चन्द्र मंगल शत्रु हैं, गुरु केतु सम है। अतः शनि जन्मागीय स्थिति के अनुसार फल प्रदान करता है। कुछ ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शनि जन्म राशि के अनुसार निम्नानुसार फल प्रदान करता हैं :-

1. मेष राशि- मध्य भाग घातक।
2. वृष राशि- प्रारंभ घातक।
3. मिथुन राशि- अंत भाग घातक।
4. कर्क राशि- मध्य व अंत घातक।
5. सिंह राशि- प्रारंभ व मध्य घातक।
6. कन्या राशि- प्रारंभ घातक।
7. तुला राशि- अंत घातक।
8. वृश्चिक राशि- मध्य व अंत घातक।
9. धनु राशि- प्रारंभ व मध्य घातक।
10. मकर राशि- समस्त समय सम।
11. कुम्भ राशि- समस्त समय शुभ।
12. मीन राशि- अंत घातक।

इसके अतिरिक्त तीनों चरणों का समग्र परिणाम निम्नानुसार रहता है, व्यवहार में ऐसा पाया जाता है।

1. प्रथम चरण- जन्म राशि से 12वें भाव में आते ही शनि साढ़ेसाती का प्रथम चरण प्रारंभ हो जाता है। साढ़ेसाती के प्रथम चरण अर्थात् साढ़ेसाती sadesati के प्रथम ढ़ाई वर्ष में व्यक्ति आर्थिक रूप से अत्यंत पीड़ित होता है। आय की अपेक्षा व्यय की अधिकता होने से पूर्व नियोजित योजनाएं विघटित होती हैं। अप्रत्याशित आर्थिक हानि चकित करती है। शैय्या सुख में कमी आती है। जातक का स्वयं स्वास्थ्य बाधित रहता है। फलस्वरूप शारीरिक सुखों में कमी आती है। व्यक्ति निरूद्देश भटकता रहता है। यात्रा का सुफल प्राप्त नहीं होता। नेत्र व्याधि संभव है। चश्में का प्रयोग जातक के लिए अपेक्षित हो सकता है। जातक के पिता की माता अर्थात दादी को मारक कष्ट होता है। व्यक्ति का स्नायुतंत्र व्याधिग्रस्त रहता है। अभिभावक एवं आत्मीय जन कष्ट का अनुभव करते हैं। कुटुम्ब से वियोग या अलगाव (बंटवारा) होता है। पिता को कष्ट होता है। लाभ एवं आय नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।

2. द्वितीय चरण- साढे़साती का द्वितीय चरण तब प्रारंभ होता है जब शनि जन्मकालीन चन्द्रमा पर गोचर करता है। इसे उदर या पेट की या द्वितीय चरण साढे़साती sadesati कहते हैं। द्वितीय चरण का प्रभाव जातक को आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रभावित करता है। आर्थिक चिन्ताएं निरन्तर रहती हैं। शारीरिक सार्मथ्य, प्रभाव व गति आक्रान्त होती है। मानसिक स्तर पर प्रबल उद्वेलन रहता है। व्यर्थ का व्यय व्यथित करता है। कोई कार्य मनोनुकूल नहीं होता। अपूर्ण कार्य दु:खी करते हैं, व्यवधान एवं बाधाएं प्रबल रहती हैं। व्यक्तित्व मन्द होता है। गृहस्थ का पारिवारिक तथा व्यवसायिक जीवन अस्तव्यस्त रहता है। किसी सगे-संबंधी को मारक कष्ट होता है। दीर्घयात्राएं, शरीर से कष्ट, आत्मीयों से पृथक्य द्वारा कष्ट, संपत्ति की हानि, सामाजिक प्रतिष्ठा पर आंच, मित्रों का अभाव एवं कार्य में अवरोध द्वितीय चरण के फल हैं। प्रयास निष्फल होते हैं, अर्थात प्रत्यय फलीभूत नहीं होते।

3. तृतीय चरण- साढ़ेसाती का तृतीय चरण तब प्रारंभ होता है जब शनिदेव जन्मकालीन चन्द्रमा से द्वितीयस्थ होते हैं। यह उतरती साढ़ेसाती या पाद (पावों) पर साढ़ेसाती कही जाती है। इसका फल यह होता है कि आत्मीय जनों से निष्प्रयोजन संघर्ष होता है। इन्हें गंभीर व्याधि अथवा किसी को मारक होता है। व्यक्ति का स्वास्थ्य, सन्तति सुख एवं आयुबल प्रभावित होता है। सुखों का नाश होता है। पदाधिकार विलुप्त होता है, किन्तु धनागम होता रहता है। शारीरिक रूप से जड़ता अथवा निर्बलता का अनुभव होता है। आनन्द बाधित होता है। निम्न व्यक्ति से प्रवचना होती है। धन का व्यय एवं अपव्यय होता है।

साढ़ेसाती की आवृत्तियांः-
सामान्यता एक जातक को अपने जीवन काल में तीन बार शनि की साढ़ेसाती झेलनी होती है। चतुर्थ कोई बिरला जातक ही प्राप्त करता है। क्योंकि शनि एक चक्र लगभग 30 वर्ष में पूरा करता है। 30×3=90 वर्ष की आयु तक तीसरी आवृत्ति संभावित होती है। चतुर्थ आवृति दु:साध्य एवं अपवाद स्वरूप ही प्राप्त होती है। प्रत्येक आवृत्ति में शनि की साढ़ेसाती की सार्मथ्य अलग-अलग होती है। जीवन में साढ़ेसाती की प्रथम आवृत्ति अत्यंत प्रबल होती है। प्रभावित व्यक्ति कष्टों अवरोधों क्षतियों से आक्रांत होता है। जातक के जीवन में प्राप्त द्वितीय साढ़ेसाती का प्रभाव मारक न्यूनतम होता है। व्यक्ति थोडी सुविधा का अनुभव करता है। तृतीय आवृत्ति भीषण परिणामों से परिपूर्ण होती है। व्यक्ति अनेक अनापत्तियों से आक्रांत रहता है। शनि अपने क्रूर प्रभाव से जीवन का सर्वनाश करने पर आमादा होता है। आयुबल निर्बल हो तो जातक को जीवन हानि होती है। इस आक्रमण से कोई सौभाग्यशाली जातक ही अपने को सुरक्षित रख पाते हैं।

शनि की साढेसाती एक विश्लेषणः-
परम्परागत रूप से यह माना जाता है कि जन्मकालीन चन्द्रमा से द्वादश भाव में आते ही (शनि के) साढे़साती प्रारंभ हो जाती है। यह स्थूलरूप से सही हो सकती है किन्तु सूक्ष्म रूप से सही नहीं हो सकती। गोचर का शनि जब जन्मकालीन चन्द्रमा के आस-पास रहता है। तब साढ़ेसाती का प्रभाव जातक को प्रभावित करता है। गणितीय दृष्टि से जन्मकालीन चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला से 45 अंश पहले तथा 45 अंश बाद तक गोचर के शनि का भ्रमण साढ़ेसाती sadesati कहलायेगी। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है।

उदाहरण के लिए किसी जातक का चन्द्र स्पष्ट 4/10/18 है तो इस जातक के साढ़ेसाती कब प्रारंभ होगी।

राशि अंश कला
04 10 18’
01 15 00 (- 45 अंश = 1 राशि 15 अंश)

———————
02 25 18’

अर्थात मिथुन राशि में शनि के 25 अंश 18’ पर आते ही शनि की साढ़ेसाती प्रारंभ होगी। यह शनि की सा़ढ़ेसाती का प्रारंभ होगा। शनि की साढ़ेसाती कब तक रहेगी ? पुनः जन्मकालीन चन्द्रमा में 45 अंश जोड़कर गणना करेंगे :-

राशि अंश कला
04 10 18’
01 15 00 (+ 1 राशि 15 अंश)

————————
05 25 18’

अर्थात शनि जब तक कन्या राशि के 25 अंश 18’ तक गोचर करेंगे, तब तक शनि की साढ़ेसाती रहेगी।

किसी भी कुंडली के लिये शनि की साढे़साती sadesati का फलादेश बहुत कुछ जातक की कुंडली में शनि की स्थिति पर निर्भर करता है। कुंडली में शनि की स्थिति कैसी है, शनि उच्च है, नीच राशि में है, या मित्र, शत्रु, सम स्थिति का प्रभाव गोचर नियमों को प्रभावित करता है, अतः साढ़ेसाती फल कथन के समय अग्रलिखित नियमों को ध्यान में रखते हुए भविष्यवाणी की जाये तो फल कथन में उत्कृष्टता रहती है :-

✓ शनि जन्मांग में उच्चस्थ हो, स्वराशिस्थ हो, मित्र राशिस्थ हो या मूल त्रिकोणस्थ हो तो परिणामों में अपेक्षतया शुभता अधिक रहती है।

✓ जन्मांगीय शनि सबल और गोचरीय शनि दुर्बल हो तो परिणाम मध्यम रहता है।

✓ जन्मांगीय शनि निर्बल (नीचस्थ, शत्रुग्रही) हो और गोचरीय शनि भी दुर्बल हो तो अत्यधिक अप्रिय फल प्राप्त होते हैं।

✓ यदि गोचरीय शनि अवांछित अमंगल परिणाम प्रदान कर रहा हो तो अन्य ग्रहों से प्राप्त होने वाले शुभ फलों में भी न्यूनता होती है।

✓ यदि गोचरीय शनि अप्रिय फलदाता हो, और बृहस्पति सर्वदा शुभ फल प्रदाता हो तो अप्रिय फलों में कमी होती है।

✓ जिस समय गोचरीय शनि शुभ फल प्रदाता हो, और बृहस्पति अप्रिय फल प्रदाता हो तो-उसमें प्रायः अनुकूल परिणाम ही प्राप्त होते हैं।

✓ बृहस्पति एवं राहु के अप्रिय फल सूचित हों, और शनि अनुकूल परिणाम प्रदाता हो तो प्रिय फलों की मात्रा अधिक रहती है।

✓शनि की भीषणता जातकों को स्मरण मात्र से प्रकम्पित कर देती है। महाराजा दशरथ ने शनि की संहारक क्षमता का वर्णन इन शब्दों में किया है-

ब्रह्मा शक्रा हरिश्चैव ऋषयः सप्ततारकाः।
राज्यभ्रष्ट्राः पतन्त्येतो त्वया दृष्टयाऽवलोकिताः।।
देशाश्च नगर ग्राम द्वीपाश्चैव तथा दु्रमाः।
तव्या विलोकिताः सर्वे विनश्यन्ति समूलतः।।
प्रसादं कुरू हे सौरे! वरदो भव भास्करे।।

अर्थात :- ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु और सप्त ऋषि भी तुम्हारे दृष्टि निक्षेप से पदच्यूत हो जाते हैं। देश, नगर, गांव, द्वीप वृक्ष तुम्हारी दृष्टि से समूल विनष्ट हो जाते हैं। अतः हे सूर्यदेव के पुत्र शनिदेव! प्रसन्न होकर हमें मंगलमय वर प्रदान करो।

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अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

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गुरू की महिमा

जब महादेवजी ने बताई पार्वतीजी को गुरु की महिमा :-

(गुरू पूर्णिमा 27/07/2018 पर विशेष) :-

Dr.R.B.Dhawan, Astrological consultant, Top best Astrologer in Delhi, experience Astrologer in Delhi

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येनं तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

एक बार पार्वतीजी ने महादेवजी से गुरु की महिमा बताने के लिए कहा। तब महादेवजी ने कहा :-

गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही शिव और गुरु ही परमब्रह्म है; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है। अखण्ड मण्डलरूप इस चराचर जगत में व्याप्त परमात्मा के चरणकमलों का दर्शन जो कराते हैं; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति: पूजामूलं गुरो: पदम्। मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरो: कृपा।।

अर्थात्– गुरुमूर्ति का ध्यान ही सब ध्यानों का मूल है, गुरु के चरणकमल की पूजा ही सब पूजाओं का मूल है, गुरुवाक्य ही सब मन्त्रों का मूल है, और गुरु की कृपा ही मुक्ति प्राप्त करने का प्रधान साधन है। गुरु शब्द का अभिप्राय जो अज्ञान के अंधकार से बंद मनुष्य के नेत्रों को ज्ञानरूपी सलाई से खोल देता है, वह गुरु है। जो शिष्य के कानों में ज्ञानरूपी अमृत का सिंचन करता है, वह गुरु है। जो शिष्य को धर्म, नीति आदि का ज्ञान कराए, वह गुरु है। जो शिष्य को वेद आदि शास्त्रों के रहस्य को समझाए, वह गुरु है।

गुरुपूजा का अर्थ :-
गुरुपूजा का अर्थ किसी व्यक्ति का पूजन या आदर नहीं है वरन् उस गुरु की देह में स्थित ज्ञान का आदर है, ब्रह्मज्ञान का पूजन है।

गुरुपूर्णिमा मनाने का कारण :-
वैसे तो गुरू सदा पूजनीय हैं, परंतु आषाढ़ पूर्णिमा के दिन सभी अपने-अपने गुरु की पूजा विशेष रूप से करते हैं। यह सद्गुरु के पूजन का पर्व है, इसलिए इसे गुरुपूर्णिमा कहते हैं। जिन ऋषियों-गुरुओं ने इस संसार को इतना ज्ञान दिया, उनके प्रति कृतज्ञता दिखाने का, ऋषिऋण चुकाने का और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का पर्व है गुरुपूर्णिमा। यह श्रद्धा और समर्पण का पर्व है। गुरुपूर्णिमा का पर्व पूरे वर्षभर की पूर्णिमा मनाने के पुण्य का फल तो देता ही है, साथ ही मनुष्य में कृतज्ञता का सद्गुण भी भरता है। गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।।
माता-पिता जन्म देने के कारण पूजनीय हैं, किन्तु गुरु धर्म और अधर्म का ज्ञान कराने से अधिक पूजनीय हैं। इष्टदेव के रुष्ट हो जाने पर तो गुरु बचाने वाले हैं,‌ परन्तु गुरु के अप्रसन्न होने पर कोई भी बचाने वाला नहीं हैं। गुरुदेव की सेवा-पूजा से जीवन जीने की कला के साथ परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग भी दिखाई पड़ जाता है। कवच अभेद विप्र गुरु पूजा। एहि सम विजय उपाय न दूजा।।

अर्थात् :- वेदज्ञ ब्राह्मण ही गुरु है, उन गुरुदेव की सेवा करके, उनके आशीर्वाद के अभेद्य कवच से सुरक्षित हुए बिना संसार रूपी युद्ध में विजय प्राप्त करना मुश्किल है।

गुरुपूर्णिमा को व्यासपूजा क्यों कहते हैं? :-
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को भगवान वेदव्यास का अवतरण पृथ्वी पर हुआ था इसलिए यह व्यासपूजा या व्यासपूर्णिमा कहलाती है। व्यासजी ऋषि वशिष्ठ के पौत्र व पराशर ऋषि के पुत्र हैं। व्यासदेवजी गुरुओं के भी गुरु माने जाते हैं। वेदव्यासजी ज्ञान, भक्ति, विद्वत्ता और अथाह कवित्व शक्ति से सम्पन्न थे। इनसे बड़ा कवि मिलना मुश्किल है। उन्होंने ब्रह्मसूत्र बनाया, संसार में वेदों का विस्तार करके ज्ञान, उपासना और कर्म की त्रिवेणी बहा दी, इसलिए उनका नाम ‘वेदव्यास’ पड़ा। पांचवा वेद ‘महाभारत’ और श्रीमद्भागवतपुराण की रचना व्यासजी ने की। अठारह पुराणों की रचना करके छोटी-छोटी कहानियों द्वारा वेदों को समझाने की चेष्टा की। संसार में जितने भी धर्मग्रन्थ हैं, चाहे वे किसी भी धर्म या पन्थ के हों, उनमें अगर कोई कल्याणकारी बात लिखी है तो वह भगवान वेदव्यास के शास्त्रों से ली गयी है। इसलिए कहा जाता है–‘व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्’ अर्थात् जगत में सब कुछ व्यासजी का ही उच्छिष्ट है।
विलक्षण गुरु समर्थ रामदास के अदम्य साहसी शिष्य छत्रपति शिवाजी छत्रपति शिवाजी महाराज समर्थ गुरु रामदास स्वामी के शिष्य थे। एक बार सभी शिष्यों के मन में यह बात आयी कि शिवाजी के राजा होने से समर्थ गुरु उन्हें ज्यादा प्यार करते हैं। स्वामी रामदास शिष्यों का भ्रम दूर करने के लिए सबको लेकर जंगल में गए और एक गुफा में जाकर पेटदर्द का बहाना बनाकर लेट गए। शिवाजी ने जब पीड़ा से विकल गुरुदेव को देखा तो पूछा– ‘महाराज! इसकी क्या दवा है?’
गुरु समर्थ ने कहा – शिवा! रोग असाध्य है। परन्तु एक दवा काम कर सकती है, पर जाने दो।
शिवा ने कहा ‘गुरुदेव दवा बताएं, मैं आपको स्वस्थ किए बिना चैन से नहीं रह सकता।’
गुरुदेव ने कहा इसकी दवा है– सिंहनी का दूध और वह भी ताजा निकला हुआ; परन्तु यह मिलना असंभव सा है।
शिवा ने पास में पड़ा गुरुजी का तुंबा उठाया और गुरुदेव को प्रणाम कर सिंहनी की खोज में चल दिए। कुछ दूर जाने पर उन्हें एक सिंहनी अपने दो शावकों (बच्चों) के साथ दिखायी पड़ी। अपने बच्चों के पास अनजान मनुष्य को देखकर वह शिवा पर टूट पड़ी और उनका गला पकड़ लिया। शूरवीर शिवा ने हाथ जोड़कर सिंहनी से विनती की– ‘गुरुदेव की दवा के लिए तुम्हारा दूध चाहिए’ उसे निकाल लेने दो। गुरुदेव को दूध दे आऊँ, फिर तुम मुझे खा लेना।’ ऐसा कहकर उन्होंने ममता भरे हाथों से सिंहनी की पीठ सहलाई। मूक प्राणी भी ममता की भाषा समझते हैं। सिंहनी ने शिवा का गला छोड़ा और बिल्ली की तरह शिवा को चाटने लगी। मौका देखकर शिवा ने उसका दूध निचोड़कर तुंबा में भर लिया और सिंहनी पर हाथ फेरते हुए गुरुजी के पास चल दिए।
उधर गुरुजी सभी शिष्यों को आश्चर्य दिखाने के लिए शिवा का पीछा कर रहे थे। शिवा जब सिंहनी का दूध लेकर लौट रहे थे तो रास्ते में गुरुजी को शिष्यों के साथ देखकर शिवा ने पूछा– ‘गुरुजी, पेटदर्द कैसा है?’
गुरु समर्थ ने शिवा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा– ‘आखिर तुम सिंहनी का दूध ले आए। तुम्हारे जैसे शिष्य के होते गुरु की पीड़ा कैसे रह सकती है?’
भारतीय परम्परा में गुरुसेवा से ही भक्ति की सिद्धि हो जाती है। गुरु की सेवा तथा प्रणाम करने से देवताओं की कृपा भी मिलने लगती है।
‘गुरु को राखौ शीश पर सब विधि करै सहाय।’
कलिकाल में सद्गुरु न मिलने पर भगवान शिव ही सभी के गुरु हैं क्योंकि ‘गुरु’ शब्द से जगद्गुरु परमात्मा ईश्वर का ही बोध होता है; इसलिए कहा भी गया है :-

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूर मर्दनम्। देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।।

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नारायण नागबली

नारायण नागबली (संतान बाधा निवारण हेतु पितृ दोष का प्रभावशाली उपाय):-

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नारायण नागबली छविनारायण नागबलि ये दोनो अनुष्ठान पद्धतियां संतान सुख की अपूर्ण इच्छा, कामना पूर्ति के उद्देश से किय जाते हैं, इसीलिए ये दोनो अनुष्ठान काम्य प्रयोग कहलाते हैं। वस्तुत: नारायणबलि और नागबलि ये अलग-अलग पूजा अनुष्ठान हैं। नारायण बलि का उद्देश मुखत: पितृदोष निवारण करना है। और नागबलि का उद्देश सर्प शाप, नाग हत्या का दोष निवारण करना है। इन में से केवल एक नारायण बलि या नागबलि अकेले नहीं कर सकते, इस लिए ये दोनो अनुष्ठान एक साथ ही करने पड़ते हैं।

पितृदोष निवारण के लिए ही नारायण नागबलि अनुष्ठान करने के लिये शास्त्रों मे निर्देशित किया गया है । प्राय: यह अनुष्ठान जातक के पूर्वजन्म के दुर्भाग्य संबधी दोषों से मुक्ति दिलाने के लिए किये जाते हैं। ये अनुष्ठान किस प्रकार व कौन इन्हें कर सकता है? इसकी पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है। ये अनुष्ठान जिन जातकों के माता पिता जिवित हैं, वे भी विधिवत सम्पन्न कर सकते हैं, यज्ञोपवीत धारण करने के बाद कुंवारा ब्राह्मण यह अनुष्ठान सम्पन्न करा सकता है। संतान प्राप्ति एवं वंशवृद्धि के लिए ये अनुष्ठान सपत्नीक करने चाहीयें। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी ये कर्म किये जा सकते हैं। यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पाचवें महीने तक यह अनुष्ठान किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये अनुष्ठान एक साल तक नही किये जाते हैं। माता या पिता की मृत्यु् होने पर भी एक साल तक ये अनुष्ठान करने निषिद्ध माने गये हैं।

दोनों प्रकार यह अनुष्ठान एक साथ और निम्नलिखित इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए किये जाते हैं :-

1. काला जादू के प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए।
2. संतान प्राप्ति के लिए।
3. भूत प्रेत से छुटकारा पाने के लिए।
4. घर के किसी व्यक्ति की दुर्घटना के कारण मृत्यु होती है (अपघात, आत्महत्या, पानी में डूबना) इस की वजह से अगर घर में कोई समस्याए आती है तो, उन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है।

संतान प्राप्ति के लिए :-
सनातन मान्यता के अनुसार प्रत्येक दम्पत्ती की कम से कम एक पुत्र संतान प्राप्ति की प्रबल इच्छा होती है, और इस इच्छा की पूर्ति न होना दम्पत्ती के लिए बहुत दुःखदाई होता है, हालांकि इस आधुनिक युग में टेस्ट ट्यूब बेबी जैसी उपचार पद्धतियां उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ जोड़ों की कमाई के हिसाब से यह बहुत खर्चीली होती हैं। इस लिये बहुत से लोग इन महेंगे उपचारों के कारण खर्च करने में समर्थ नहीं होते, और कुछ इस के लिए कर्जा लेते हैं, लेकिन जब कभी इस महेंगे उपचारों का भी कोई लाभ नहीं होता, तब यह जोड़े ज्योतिषीयों के पास जाते हैं, और एक अच्छा अनुभवी ज्योतिषी ही इस समस्या का समाधान और उपचारों की विफलता का कारण बता सकता है।

शास्त्र कहते हैं :- जहां रोग है, वहां उपचार भी है। इसी नियम को ध्यान में रखते हुऐ हमारे पूर्वज ऋषियों ने इन समस्याओं के समाधान हेतु ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशेष उपाय सुझाए हुए है, सब से पहेले ज्योतिषी यह देखते हैं की इस की पीड़ित दंपति की जन्म कुंडली में संतान प्राप्ति का योग है या नहीं? अगर है, तो गर्भधारण करने में समस्या का कारण क्या है? जैसे की पूर्व जन्म के पाप, पितरों का श्राप, कुलविनाश का योग, इनमें से कोई विशेष कारण पता चलने के बाद वह उस समस्या का निराकरण सुझाते खोजते हैं। इन उपायों में से नारायण नागबली सर्वश्रेष्ठ उपाय माना जाता है। यदि यह अनुष्ठान उचित प्रकार से और मनोभाव से किया जाए, तो संतानोत्पत्ति की काफी संभावनाए हो जाती हैं।

भूत-प्रेत बाधा के कारण संतानोत्पत्ति में रूकावटें :-
कोई स्थाई अस्थाई संपत्ति जैसे के, घर जमीन या पैसा किसी से जबरन या ठग कर हासिल की जाती है तो, मृत्यु पश्चात् उस व्यक्ति की आत्मा उसी संपत्ति के मोह रहती है, उस व्यक्ति को मृत्यु पश्चात् जलाया या दफनाया भी जाए तो भी उस की इच्छाओं की आपूर्ति न होने के कारण उस की आत्मा को माया से मुक्ति नहीं मिल पाती, और वह आत्मा प्रेत योनी में भटकती है, और उस के पतन के कारण व्यक्ति को वह पीड़ा देने लगती है, यदि किसी शापित व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उसकी अंतेष्ठि विधि शास्त्रों अनुसार संपन्न न हो, या श्राद्ध न किया गया हो, तब उस वजह से उस से सम्बंधित व्यक्तिओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि– संतति का आभाव, यदि संतान होती भी है, तो उस का अल्प जीवी होना
संतति का ना होना ही है।

1. काफी कष्टों के बावजूद आर्थिक अड़चनों का सामना करना
खेती में नुकसान।
2. व्यवसाय में हानि, नौकरी छूट जाना, कर्जे में डूब जाना,
परिवार में बिमारीयाँ।
3. मानसिक या शारीरिक परेशानी, विकलांग संतति का जन्म होना, या अज्ञात कारणों से पशुधन का विनाश।
4. परिवार के किसी सदस्यों को भूत बाधा होना।
5. परिवार के सदस्यों में झगड़े या तनाव होना।
6. महिलाओं में मासिक धर्म का अनियमित होना, या गर्भपात होना।
ऊपर लिखे हुये सभी या किसी भी परेशानी से व्यक्ति झूंज रहा हो तोतो, उसे नारायण-नागबली करने की सलाह दी जाती है।

श्राप सूचक स्वप्न :-
कोई व्यक्ति यदि निम्नलिखित स्वप्न देखता है, तो वह पिछले या इसी जन्म में श्रापित होता है :-
1. स्वप्न में नाग दिखना, या नाग को मारते हुवे दिखना, या टुकड़ो में कटा हुवा नाग दिखना।
2. किसी ऐसी स्त्री को देखना, जिसके बच्चे की मृत्यु हो गई है, वह उस बच्चे के प्रेत के पास बैठ कर अपने बच्चे को उठने को कह रही है, और लोग उसे उस प्रेत से दूर कर रहे है।
3. विधवा या किसी रोगी सम्बन्धी को देखना।
4. किसी ईमारत को गिरते हुए देखना।
5. स्वप्न में झगड़े देखना।
6. खुद को पानी में डूबते हुये देखना।
इस प्रकार के स्वप्नों से मुक्ति पाने के लिए नारायण-नागबली अनुष्ठान किया जाता है। धर्मसिंधु और धर्मनिर्णय इन प्राचीन ग्रंथो में इस अनुष्ठान के विषय में लिखा हुआ है।

दुर्मरण :-
किसी भी प्रकार से दुर्घटना यदि मृत्यु का कारण हो, और अल्पायु में मृत्यु होना दुर्मरण कहा जाता है। किसी मनुष्य की इस प्रकार से मृत्यु उस मनुष्य के परिवार के लिए अनेक परेशानियों का कारण बनती है। निम्नलिखित कारण से आने वाली मृत्यु दुर्मरण कहलाती है :-

1. विवाह से पहले मृत्यु होना।
2. परदेस में मृत्यु होना।
3. गले में अन्न अटक कर श्वास रुकने से मृत्यु होना।
4. पंचक, त्रिपाद या दक्षिणायन काल में मृत्यु होना।
5. आग में जल कर मृत्यु होना।
6. किसी खतरनाक जानवर के हमले से मृत्यु होना।
7. छोटे बच्चे का किसी के हाथों मारा जाना।
8. पानी में डूब जाने से मृत्यु होना।
9. आत्महत्या करना।
10. आकाशीय बिजली गिरने या बिजली के झटके से मृत्यु।
यह सब कारण हैं, जिसके कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो, परिवार में आर्थिक, मानसिक वा शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं, इं परेशानियों को दूर करने के लिए परिजनों को नारायण-नागबली करवाने की सलाह दी जाती ।

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शनिदेव

शनि ग्रह हमेशा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं :-

Dr.R.B.Dhawan

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शनि ग्रह हमेशा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं होता। वह बुरे फलों के साथ-साथ अच्छा फल भी देता है। वास्तव में शनि के बारे में जितना भय और जितनी गलतफहमियां हैं उतना खराब वह है नहीं। काल पुरुष की जन्म कुण्डली में शनि कर्मेश दशम भाव का स्वामी एवं लाभेश एकादश भाव का स्वामी होकर स्थित है। कर्मेश होने के साथ-साथ लाभेश भी होने के कारण कर्म का फल है। नवम भाव भाग्य है। कर्म के फल को भाग्य भी कहते हैं। कर्म के व्यय होने पर भाग्य बनता है। कर्म का अगला भाव लाभ तथा कर्म का व्यय भाव भाग्य बनाता है। यदि कर्म अच्छा है तो भाग्य भी अच्छा होगा। यदि कर्म ही नहीं तो लाभ तथा भाग्य कहां से आएंगे। भाग्य भाव धर्म का भी है। अर्थात् कर्म को धर्म पर भी व्यय करें तो भाग्य जागृत होगा। शनि कर्मेश होने के कारण भाग्य विधाता भी है। वही एकादश भाव का स्वामी होकर कर्म फलों का लेखा-जोखा या वेलेन्स शीट के अनुसार न्याय करता है।

कुछ लोग शनि ग्रह को खोटा, बुरा, पापी ग्रह मानते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि भले को छोड़िए, खोटे ग्रह जप व दान। अर्थात पापी ग्रहों को ज्यादातर लोग पूजा, अर्चना, जप, तप से शांत करते हैं। उससे भयभीत व त्रस्त रहते हैं। जरा सा किसी को शनि के दुष्प्रभाव का ज्ञान होते ही वह शनि के दुष्प्रभाव के उपचार हेतु पूजा, अर्चना, जप, तप में लग जाता है। मेरे अनुभव के अनुसार शनि जब साढ़े साती से किसी को प्रभावित करता है तो उस को नया परिष्कृत रूप अपनी साढे़साती के बाद देता है। जितना उसको दंडित करता है। उससे ज्यादा देकर जाता है। अधिकतर शनि की साढ़े साती बरबाद हुए लोगों को जाते-जाते फिर से उन्हें धो-पोछकर चमकाकर जाती है। उनमें लगी जंग को छुड़ा जाती है। भले बुरे के भेद से शनि कोमल व कठोर भी है। शनि दोनों तरह के फल देता है। शनि ही इस भू मंडल का न्यायधीश है। शनि ग्रह को काल भैरव अर्थात् न्याय का स्वामी माना गया है। वह अपने दो सहयोगी ग्रहों राहु एवं केतु की सहायता से न्याय करता है। लेकिन जब जरूरत होती है तो सेनापति मंगल की भी सहायता लेता है। तब रक्तप्रद दंड का निधान करता है। तो सेनापति मंगल की सहायता से दंडित कर अंग-भंग करने का आदेश देता है

वैद्यनाथ के अनुसार- लग्नस्थ शनि का जातक कई व्याधियों से ग्रस्त होता है। उसका कोई ना कोई अंग अवश्य दोष युक्त होता है। जबकि स्वगृही या उच्च का शनि जातक को यश वैभव से संपन्न करता है। शनि शुभ संयोग युक्त हो तो जातक संकल्पवान स्वयं परिश्रमी, शनैः शनैः उन्नतिशील, पराक्रमी, विजयी तथा दृढ़ निश्चयी होता है। तथा अथक प्रयास से उच्च पद, सफलता अर्जित करता है। अशुभ संयोग से शनि नीच कर्मरत, वह स्वयं कार्य बिगाड़ता है। अविश्वासी, भयभीत, इर्शालु, अविवेकी, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाला बना देता है। दूरस्थ ग्रह शनि के प्रभाव से एकांत आलसी तथा उदासीन का स्वाभाविक लक्षण होता है।

अरूण सहिंता के अनुसार- सूर्य को विष्णु, चन्द्रमा को शिव, मंगल को हनुमान, स्वामी कार्तिकेय षडानन, बुध को दुर्गा, गुरु को ब्रह्मा, शुक्र को लक्ष्मी जी, शनि को भैरव या काल भैरव राहु को सरस्वती, गायत्री तथा केतु को गणेश माना गया है। ये देवता तथा देवियां ही जातक की कुण्डली में कर्माें के अनुसार राशियों और भावों में आकर शुभ व अशुभ फल प्रदान करते हैं। इसी प्रकार 28 नक्षत्र होते हैं।

नक्षत्रों के नाम :- 1. अश्विनी, 2. भरणी, 3. कृत्तिका, 4. मृगशिरा, 6. आद्र्रा, 7. पुनर्वसु, 8. पुष्य, 9. आश्लेषा, 10. मघा, 11. पूर्वफाल्गुनी, 12. उत्तरफाल्गुनी, 13. हस्त, 14. चित्रा, 15. स्वाति, 16. विशाखा, 17. अनुराधा, 18. ज्येष्ठा, 19. मूल, 20. पूर्वाषाढ़ा, 21. उत्तराषाढ़ा, 22. श्रवण, 23. धनिष्ठा, 24. शतभिषा, 25. पूर्वाभाद्रपद, 26. उत्तराभाद्रपद, 27. रेवती। 28. अभिजित। इन नक्षत्रों के देवता नक्षत्रों तथा ग्रह क्र. नक्षत्र न. स्वामी क्र. नक्षत्र न. स्वामी देवता :-

1. अश्विनी अ. कुमार केतु, 2. भरणी काल शुक्र, 3. कृतिका अग्नि सूर्य, 4. रोहिणी ब्रह्मा चन्द्रमा, 5. मृगशिरा चन्द्रमा मंगल, 6. आद्र्रा रूद्र राहु, 7. पुनर्वसु अदिति बृहस्पति, 8. पुष्य बृहस्पति शनि, 9. आश्लेषा सर्प बुध, 10. मघा पितर केतु, 11. पू.फा भग शुक्र, 12. उ.फा. अर्यमा सूर्य, 13. हस्त सूर्य चन्द्रमा, 14. चित्रा विश्वकर्मा मंगल, 15. स्वाती पवन राहु, 16. विशाखा शुक्राग्नि बृहस्पति, 17. अनुराधा मित्र शनि, 18. ज्येष्ठा इन्द्र बुध, 19. मूल निर्ऋति केतु, 20. पू.आ जल शुक्र, 21. उ.आ. विश्वेदेव सूर्य, 22. श्रवण विष्णु चन्द्रमा, 23. धनिष्ठा वसु मंगल, 24. शतभिषा वरूण राहु, 25. पू.भा. अजैकपाद बृहस्पति, 26. उ.भा. अहिर्बुध्न्य शनि, 27. रेवती पू.षा. बुध, 28. अभिजित ब्रह्मा केतु।

अपने नक्षत्रों में ग्रहों अर्थात् देवताओं के गोचर (आगमन) पर एक दूसरे को प्रभावित कर फल प्रदान करते है। भृगु संहिता के अनुसार- लगनस्थ शनि हो तो जातक शत्रु का नाश करने वाला, समृद्ध, धन धान्य पुत्र, स्थूल शरीर दूर दृष्टि वाला एवं वात से पीड़ित होता है। उच्चस्थ शनि जातक को प्रधान या नगर का मुखिया बनाता है। मकरस्थ या कुम्भस्त शनि जातक को पैतृक धन दौलत का वारिस बनाता है। वृहद पवन में वाला बताया है। यदि शनि मूल त्रिकोणस्थ हो तो जातक को राष्ट्र प्रमुख या प्रांत प्रमुख की प्रतिष्ठा प्रदान करता है। जातक पारिजात में दुर्बल शनि हो तो जातक दुष्कर्मों का फल भोगता है। श्वास रोग, शरीर पीड़ा, पार्श्व, पार्श्व पीड़ा, गुदृ विकार, हृदय ताप, कंपन, संधि रोग तथा वात विकार से पीड़ित होता है। कुछ राशियों में जयदेव ने अच्छा बताया है। धनु, मीन, मकर, तुला, कुम्भ, राशि का शनि पांडित्य, ऐश्वर्य तथा सुदर्शन शरीर, कामावेग एवं आलसी होता है।

वारहमिहिर के अनुसार- स्वगृही शनि,उच्च मीन, धनु, मकर, तुला, कुम्भ, राशि गत शनि श्रेष्ठ फल प्रदान करना है। ऐसे जातक ज्ञान शिरोमणि, सुदर्शन, अग्रणी, नरपति एवं समृद्ध होते हैं।

मानसागरी के अनुसार- मकर तथा कुम्भ राशि लग्न में जातक शत्रुहन्ता सिद्ध करता है। अन्य राशियों में विरल केशी, नीच कर्मी, वासना युक्त, धूर्त एवं आलसी होता है।

जातक पर शनि का प्रभाव- रूखे-सूखे बाल, लम्बे बड़े अंग, दांत तथा वृद्ध शरीर काला रंग का दिखता है। यह अशुभ ग्रह है। मंद गति ग्रह है। नैतिक पतन का द्योतक है। वायु संबंधी बीमारियों का प्रतिनिधि है। यह दुःख, निराशा तथा जुआ का प्रतीक है। गंदा स्थान, अंधेरा स्थान का कारक ग्रह है।

शनि से प्रभावित वस्तुएं- लोहा, काला, चना, भांग, तेल, नीलम, दाह संस्कार गृह, कब्रिस्तान, जेल, बिस्तरे पर लिटाएं रखना, पुरानी बीमारियां, लाइलाज बीमारियां, वृद्धावस्था का स्वामी है। शनि से प्रभावित शरीर के अंग- दांत, वात, कलाई, पेशियां, पीठ, पैर।

शनि से प्रभावित रोग- गुदा के रोग, व्रण, जख्म व जोड़ों का और पुराने दर्द, लाइलाज रोग, दांत, सांस, क्षय, वातज यह शुद्र वर्ण, वायु तत्व, नपुंसक तथा पश्चिमी स्वामी है।

जन्मकुण्डली में शनि के लग्न भाव से स्थित का फल-
1 लग्न (प्रथम) भावस्थ शनि मकर, कुम्भ तथा तुला का हो तो धनाढ्य, सुखी, धनु और मीन राशियों में हो तो अत्यंत धनवान और सम्मानित एवं अन्य राशियों का हो तो अशुभ होता है।

2 द्वितीय भावस्थ शनि हो तो जातक, कटुभाषी, साधुद्वेषी, मुखरोगी और कुम्भ या तुला का शनि हो तो धनी, लाभवान् एवं कुटुम्ब तथा भातृवियोगी होता है।

3 तृतीय भावस्थ शनि हो तो जातक शीघ्रकार्यकर्ता, सभाचतुर, चंचल, भाग्यवान, शत्रुहन्ता, निरोगी, विद्वान योग, मल्ल एवं विवेकी होता हैै।

4 चतुर्थ भावस्थ शनि हो तो जातक अपयशी, बलहीन, धूर्त, कपटी, शीघ्रकोपी, कृशदेही, उदासीन, वातपित्तयुक्त एवं भाग्यवान होता है।

5 पंचम भावस्थ शनि हो तो जातक आलसी, संतानयुक्त, चंचल, उदासीन, विद्वान, भ्रमणशील एवं वातरोगी होता है।

6 षष्ठ भावस्थ शनि जातक को बलवान, आचारहीन, व्रणी, जाति विरोधी, श्वास रोगी, कण्ठ रोगी, योगी, शत्रु हन्ता भोगी एवं कवि बनता है।

7 सप्तम भावस्थ शनि हो तो जातक क्रोधी, कामी, विलासी, अविवाहित रहने वाला, या दुःखी अविवाहित जीवन, धन सुख हीन, भ्रमणशील, नीचकर्मरत, स्त्रीभक्त होता है।

8 अष्टम भावस्थ शनि जातक को विद्वान स्थूल शरीर, उदार प्रकृति, कपटी, गुप्तरोगी, वाचाल, डरपोक, कुष्ठरोगी एवं धूर्त बनाता है।

9 नवम भावस्थ शनि हो तो जातक धर्मात्मा, साहसी, प्रवासी, कृशदेही, भीरू, भ्रातृहीन, शत्रुनाशक वात रोगी, भ्रमणशील एवं वाचाल होता है।

10 दशम भावस्थ शनि हो तो जातक विद्वान, ज्योतिषी, राजयोगी, न्यायी, नेता, धनवान, राजमान्य, उदरविकारी, अधिकारी, चतुर, भाग्यवान, परिश्रमी, निरूद्पयोगी एवं महात्वाकांक्षी होता है।

11 ग्यारहवें भावस्थ शनि हो तो जातक बलवान विद्वान, दीर्घायु, शिल्पी, सुखी, चंचल, क्रोधी, योगाभ्यासी, नीतिवान, परिश्रमी, व्यवसायी, पुत्रहीन, कन्याप्रज्ञ एवं रोगहीन होता है

12 बारहवें भावस्थ शनि हो तो जातक आलसी, दुष्ट, व्यसनी, अपस्मार, उन्माद रोगी, मातुल कष्टदायक, अविश्वासी एवं कटुभाषी होता है।

शनि की दशा आ गयी हैः-
प्रत्येक ग्रह का अपना-अपना अस्तित्व है। यहां शनि ग्रह के बारे में कहना चाहूंगा कि शनि ग्रह सर्वथा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं होता। शनि बुरे फलों के साथ-साथ अच्छे फल भी बहुत देता है। शनि के बारे में जितना भय या जितनी भ्रांतियां लोगों को हैं, उतना खराब वह नहीं है। शनि का नाम आते ही लोग ज्यादातर डरने लगते हैं-‘शनि की दशा आ गयी है’ या ‘शनि की साढे़साती’ लघु ढैय्या है। इस कारण कुछ लोग डर या वहम बैठा देते हैं, जिसकी वजह से साधारण व्यक्ति तरह-तरह से भ्रमित होकर परेशान हो उठता है। ग्रहों को शुभ व अशुभ भागों में बांटा जाता है। जब शुभ ग्रह राशि परिवर्तित करते हैं तो उस समय गोचर का चन्द्रमा जन्म चन्द्रमा से किस भाव में स्थित है उसके अनुसार गोचर के शुभाशुभ ग्रह का फल बतलाते हैं।
कई अन्य मत भी प्रचलित हैं जिससे गोचर के ग्रह या ‘शनि की साढ़ेसाती’ का शुभाशुभ फल निकालते हैं। दैवज्ञ श्री काटवे, का कहना है कि जब शनि चन्द्रमा से 13 अंश 20 कला पीछे होता है शनि की साढ़ेसाती उस समय आरम्भ होती है, तथा जब तक वह 13 अंश 20 कला आगे रहते हैं, तब तक रहती है। इस प्रकार जन्म चन्द्रमा के अंशों में से 13 अंश 20 कला घटाओ तथा 13 अंश 20 कला जोड़ो। इससे प्राप्त होने वाली चाप पर जब तक शनि रहता है शनि की साढ़ेसाती रहती है। इस प्रकार ग्रह की राशि परिवर्तन समय कोई महत्व नहीं रखता। इस 13 अंश 20 कला मूर्ति निर्णय पद्धति महत्वहीन हो जाती है। परन्तु लग्न, सप्तशलाका, तारा तथा अष्टक वर्ग से ग्रह को शुभाशुभ उत्तम है।

पाठकों को याद दिला दूं कि जिस जन्म कुण्डली में योग नहीं वह दशा अन्तर दशा नहीं दे सकती। इसलिए फल के लिए योग का होना आवश्यक होता है। माना कि जातक की जन्म कुण्डली में शादी का योग ही नहीं हो, तो दशान्तर दशा सप्तमेश की हो, या कारक ग्रह की, शादी नहीं हो सकती। इसलिए फल के लिए योग का होना आवश्यक है इसी प्रकार जो ग्रह की दशान्तरदशा नहीं दे सकती, वह उस फल को देता है। यदि दशान्तर दशा ही हो तो गोचर कितना भी शुभाशुभ हो, फल नहीं दे सकता। पहले दशान्तर दशा का होना आवश्यक है फिर गोचर उस फल को देता है। यदि महादशा, अंतरदशा ही नहीं तो गोचर कितना भी शुभाशुभ हो वह फल नहीं दे सकता। इसको इस प्रकार भी कहा जा सकता है।

सबसे पहले जातक के लिए फल होना चाहिए। दशा अन्तरदशा उस फल को संदेश वाहक, गोचर को देती है। संदेश वाहक, गोचर वह फल जातक को देता है। यदि दशान्तर दशा संदेश वाहक को फल नहीं देगी तो संदेश वाहक जातक को फल कहां से देगा? इसलिए क्रम निश्चित है, पहले फल होना चाहिए। (योग) दूसरे उन ग्रहों की दशान्तर दशा होनी चाहिए तब गोचर जातक को फल देता है। अन्यथा फल प्राप्त नहीं होता गोचर केवल सहायक है। गोचर के फल को प्रभावित करने वाले भिन्न-भिन्न पहलुओं का अध्ययन करने के बाद साढ़े साती का अध्ययन करते हैं। जन्म राशि से 12वें स्थान जन्म राशि पर एवं द्वितीय भाव पर जब शनि गोचर करता है उसे शनि की साढ़ेसाती कहते हैं। शनि एक राशि पर लगभग 2.5 वर्ष रहता है। इस प्रकार तीन राशियों पर 7.5 वर्ष हुए। इसलिए इसे साढ़ेसाती कहते हैं। साढ़ेसाती अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी। यह सब जन्मकुण्डली में चन्द्रमा तथा शनि की स्थिति तथा बल पर निर्भर करता है। लग्न, सप्तशलाका, तारा तथा अष्टक वर्ग के बल पर भी निर्भर करता है। परन्तु फिर भी यह मानसिक कष्ट कारक हो सकती है। जब शनि चन्द्रमा से 13 अंश 20 कला कम पर 12वें भाव में रहता है तो, शनि का प्रभाव आरंभ हो जाता है। यदि शनि वक्री हो जाए तो 7.5 वर्ष से भी ज्यादा समय तक तीनों राशियों पर रह सकता है।

जिनका दीर्घ जीवन है उनके जीवन में 3 बार साढे़साती आती है। पहले फेरे में कुछ बुरा फल देती है, परन्तु आक्रमण बड़े वेग से होता है। दूसरे फेरे में वेग तो कम हो जाता है परन्तु फिर भी कष्ट तो मिलता ही है, परन्तु इतना हानिकारक नहीं होता तथा कुछ शुभ फल भी प्राप्त होता है। परन्तु तीसरे पर्याय में जातक की मृत्यु हो जाती है। बहुत कम भाग्यवान जातक ही इस तीसरे फेरे को झेल पाते हैं। साढे़साती में साधारणतया हम यह देखते हैं कि शनि किस राशि से गोचर कर रहा है। उस राशि के स्वामी से उसका कैसा संबंध है। यदि उसका संबंध मित्रता का है तो अशुभ फल नहीं होता। वैसा तो यह संबंध पंचधा मैत्री से देखना चाहिए। परन्तु पंचधा मैत्री तो कुण्डली के अनुसार बनेगी। समझाने के लिए हम लिखते हैं मित्र राशि की रााशि से गोचर कर रहा है। माना कि शनि गोचर कर रहा है। मेष राशि से प्रथम 2.5 वर्ष मीन, जिसका स्वामी बृहस्पति है तथा शनि के गुरु के साथ सम नैसर्गिक संबंध हैं तो प्रथम 2.5 वर्ष सम होंगे। द्वितीय 2.5 वर्ष मेष, जिसमें चन्द्रमा स्थित हैं उसका स्वामी मंगल है जो शनि का शत्रु है। अर्थात द्वितीय ढैय्या अशुभ। तीसरी ढैय्या में शनि वृष राशि मे गोचर करेगा। वृष के स्वामी शुक्र को शनि मित्र समझता है, इसलिए तीसरे ढैय्या शुभ अथात् मेष राशि वालों के लिए केवल दूसरे ढैय्या अशुभ हुई इस प्रकार इसको इस तालिका में लिख सकते हैं।
कुछ विशेष नियमः-

1 जन्म कुण्डली में 6, 8, 12 भाव में शनि गोचर में अशुभ ग्रह से दृष्ट या युक्त हो तो अशुभ फल प्राप्त होता है।

2 जन्म चन्द्रमा यदि 2 या 12 भाव में अशुभ ग्रह से युक्त हो तो शनि की साढे़साती अशुभ होती है।

3 जन्म चन्द्रमा निर्बल हो तथा अशुभ भाव में स्थित हो तो शनि की साढे़साती अशुभ होती है।

4 जन्म चन्द्रमा से 2 या 12वें भाव में शुभ ग्रह हो तथा शुभ दृष्ट हो तो शनि की साढे़साती शुभ फल देती है।

5 जन्म चन्द्रमा शनि से युक्त हो, मंगल से दृष्ट न हो, तो साढे़ साती शुभ फल देती है।

6 जन्म कुण्डली में चन्द्रमा की स्थिति युत तथा दृष्टि साढे़साती शुभ फल देती है।

अष्टम शनि का ढैय्या- जब शनि चन्द्रमा से चतुर्थ भाव में जाता है तो चन्द्रमा को दशम दृष्टि से देखता है। उस समय पर भी चन्द्रमा शनि से पीड़ित हो। तो फल चन्द्र, शनि, लग्न, तारा, सप्तशलाका, दशान्तरदशा पर निर्भर करता है। इसको कष्टक शनि भी कहते हैं। इसी प्रकार शनि जब जन्म चन्द्रमा से अष्टम भाव में गोचर करता है तो शुभाशुभ फल देता है। शुभाशुभ फल का निर्णय अष्टक वर्ग, तथा तारा, दशान्तर दशा ही करेगी। यदि सर्वाष्टक वर्ग में 28 से ज्यादा शुभ बिन्दु हों तो शनि का उस भाव में गोचर, जातक को कष्ट न देकर आकस्मिक अच्छा फल देता है। कहावत है कि भले-भले को छोड़िये, खोटे ग्रह जप ध्यान वाली। बुरे दिन किसी को पूछ कर नहीं आते, जब समय अनुकूल रहता है। तब व्यक्ति प्रसन्न रहता है, परन्तु बुरा समय आने पर वह चारों ओर हाथ-पैर मारता है। येनकेन प्रकारेण अपनी स्थिति सुधरने के लिए हर संभव-असंभव प्रयास करता है। दान-दक्षिण, पूजा-पाठ, जप-तप, यंत्र-तंत्र-मंत्र करता है। साधु संन्यासी, ज्योतिषी, तांत्रिक, कोई भी हो, वह उन सब तक जा पहुंचता है। खेद! ग्रहों में शनि-मंगल-राहु पर प्रायः दोष दिया जाता है तो शनि की साढ़ेसाती को सुनकर सब का हृदय कांप उठता है। शनि, अकस्मात, कुप्रभाव देने वाला ग्रह है। अतः भय सहज स्वभाविक है। यह समय मृत्यु, रोग, भिन्न-भिन्न कष्ट, व्यवसाय हानि अपमान धोखा द्वेष, ईर्ष्या का माना जाता है।

कम श्रम अधिक लाभ, भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति, ऐश्वर्य लाभ, दीर्घायु होने व स्वस्थ रहने विघ्न-बाधाओं को नाश करने, ग्रह-शांति, कलह से मुक्ति, ईश-भक्ति, कुटुम्ब-वृद्धि, योग्य संतान उत्पन्न होने, संघर्ष से मुक्ति जैसी इच्छाएं मानव मात्र की सदैव से रही हैं। वह निरन्तर इसके लिए प्रयत्नशील रहता है। इस प्रकार शनि मानव जीवन हेतु अत्यंत ही पीड़ाकारक ग्रह है। हम चाहें तो शनि की पीड़ादायक दृष्टि से छुटकारा पा सकते हैं। कुछ तंत्र-मंत्र एवं टोटकों का उपयोग करें। शनि पीड़ितों को पुराने कम्बल या पुराने लोहे का दान, काला तिल दान, उडद दान करना चाहिए। लोहे का प्रयोग ज्यादा करना चाहिए।

शनैश्चर ग्रह की पूजन विधिः-
नवग्रहों में शनि देवता को सूर्य का पुत्र कहा जाता है। शनि देव विशाल शरीर तथा बड़े-बड़े नेत्रों वाले, कृष्ण वर्ण वाले हैं। शनि देव की साढ़े साती सभी के जीवन को प्रभावित करती है। जीवन की तीसरी साढ़े साती को पार करना बहुत भाग्य वाले को ही नसीब होता है। आरोग्य प्राप्ति, सुख शांति एवं समृद्धि के लिए शनि देव की पूजा करने से अशुभ प्रभाव नष्ट हो जाता है। शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से 21 शनिवार या कार्य पूर्ति न होने तक व्रत करें। गणेश पूजन करने के उपरान्त शनि देव का अवाह्न करना चाहिए। शनि देव की पूजा काले या नीले पुष्प से करें। शनि यंत्र की स्थापना कर शनि के मंत्रों व बीज मंत्रों से पूजन कर, शनि गायत्री मंत्र, शनि कवच व स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। अपनी श्रद्धा व सामर्थ के अनुसार काला वस्त्र, तिल, तेल, काली उड़द व स्वर्ण का दान करें। अाठ मुखी रूद्राक्ष धारण करें, पूजन करने के बाद काले उड़द की खिचड़ी भोजन एक बार करना चाहिए।
शनि ग्रह पीड़ा निवारक यंत्र :-

ध्यान मंत्र-
ऊँ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रहम्।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि श्नैश्चरम्।।

जप- ॐ शं श्नैश्चरायः नमः।
अथवा – ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः श्नैश्चराय नमः

जप संख्या – 23000

जप माला – रूद्राक्ष।

आसन – काला कम्बल।

दीपक – तिल के तेल का दीपक जलाएं।

जल पात्र – दीपक के साथ स्टील का जलपात्र रखें।

जप के लिए दिशा – पश्चिम की ओर मुख करके बैठें।

हवन करें- शमी की लकड़ी से ।

धारण करें – बिछुआ की जड़।

लाल किताब से शनि के उपचारः-

जिसके जन्मांग में चतुर्थ स्थान में शनि हो ऐसा जातक काले सांप को दूध पिलाये। भैंसे को चारा डालें। मजदूरों को भोजन खिलायें। आर्थिक अड़चन हमेशा रहती हो तो थोड़ा दूध कुएं में डालें। चतुर्थ स्थान में शनि हो तो ऐसा जातक रात को दूध न पिये दूध विषाक्त होकर शनि के द्वारा अधिक कष्ट पहुंचाता है

षष्ठ स्थान में शनि गुरु दोनों हों तो नारियल पानी में बहायें। ऐसी ग्रह स्थिति 28 वर्ष की उमर से पूर्व ही जातक का विवाह करायें। और 48 उम्र तक मकान न बनायें। संतति होने में बाधा हो तो काले सांप को दूध पिलायें और पूजा करें।

सप्तम स्थान में शनि हो, ऐसा जातक यदि मद्यपान करे तो यह मद्यपान तुरन्त बंद कर दें, अन्यथा उसका सर्वनाश कोई रोक नहीं सकता। कम से कम तीन सौ ग्राम हल्दी चालू कुएं में गुरुवार को डालें।

अष्टम स्थान में शनि हो एवं द्वितीय स्थान में अन्य कोई ग्रह न हो तो, जातक ब्याज का धंधा, कारखाना, छापाखाना, प्रिंटिंग प्रेस, तेल का व्यापार, लोहे की चीजों का व्यापार, वकालत, चमड़ा, पेट्रोल, आॅयल, मोबाइल, ग्रीस बेचने का व्यापार चुने। व्यापार से पूर्व एक मिट्टी के मटके में राई का तेल भरकर काले कपड़े से मुंह बंद करके तालाब या नदी में प्रवाहित करें। उसके बाद कृष्ण पक्ष के मध्य रात्रि में व्यवसाय का शुभ आरंभ करें। काफी धन मिलेगा।

एकादश स्थान में शनि एवं सप्तम स्थान में शुक्र हो तो ऐसा जातक बहुत ही भाग्यवान होता है। किसी भी कार्यारम्भ के पूर्व पानी से भरा घड़ा दान करें। हर शनिवार को पानी में काली हल्दी डाल कर उस पानी से स्नान करें।

जन्म कुण्डली में शनि शुभ हो, या अधिक शुभ हो तो घर में लोहे का फर्नीचर इस्तेमाल करें। भोजन में काला नमक एवं काली मिर्च का प्रयोग करें आखों में काजल या सुरमा डालें

अनिष्ट शनि की पीड़ा दूर करने के लिए एवं शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या का कष्ट निवारण के लिए भोजन के पूर्व भोजन में सब चीजें थोड़ी-थोड़ी अलग निकाल कर कौआ को खिलाओ

अनिष्ट शनि की पीड़ा दूर करने के लिए राई या तिल का तेल दान करें। शनि संतान की दृष्टि से बाधक होता हो तो, गर्भपात होता है तो, ऐसी स्त्री भोजन की थाली में से भोजन के पूर्व सब चीजें थोड़ी-थोड़ी अलग निकाल कर काले कुत्ते को खिलाये।

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चैत्र नवरात्रि 2018, कलश स्थापन मुहूर्त

घट स्थापना मुहूर्त 18 मार्च 2018 (दिल्ली, एन. सी. आर.) :-

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प्रातः 09-30 से दिन 11-00 तक लाभ एवं 11:00 से 12:29 तक अमृत की चौघडीया में तथा दिन 12:05 से 12:53 तक अभिजीत वेला में घट स्थापना विशेष पुण्यदायक माना गया है। लाभ की चौघडीया एवं अमृत की चौघड़ीया में कलश (घट) स्थापना करना शुभ एवं श्रीकर है।

नवरात्र में कलश स्थापना

नवरात्रि में कलश स्थापना का भी एक विधि-विधान होता है :-

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इस वर्ष :- चैत्र नवरात्र 2018, मार्च में 18 तारीख से आरम्भ हो रहे हैं। सनातन मत अनुसार चैत्र या शरद् दोनों नवरात्र के प्रथम दिन अर्थात् शुक्ल प्रतिपदा (प्रथम नवरात्र) के दिन सर्वप्रथम कलश स्थापना की जाती है।

कलश स्थापना का भी एक विधि-विधान होता है। यदि कोई परिवार इस विधि को नहीं जानता तो, नवरात्रों में किसी विद्वान पुजारी को बुलाकर भी स्थापना करवा सकते हैं। 9 दिन के इस शक्ति पर्व नवरात्रो में दुर्गा माँ के नव रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्र के आरंभ में प्रतिपदा तिथि को उत्तम मुहर्त में कलश की स्थापना की जाती है। कलश को भगवान गणेश का रूप माना गया है जो की किसी भी पूजा में प्रथम पूजनीय हैं, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित भविष्य पुराण में बताया गया है की कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को साफ-सुथरा करके शुद्ध किया जाना चाहिए। उसके उपरान्त एक लकड़ी का पाटे पर लाल कपडा बिछाकर उस पर थोड़े अक्षत् (चावल) गणेश भगवान को याद करते हुए रखने चाहिए, फिर जिस जगह कलश को स्थापित करना है, उस जगह बालु मिश्रित मिट्टी रख कर उसमे जौ बो देने चाहियें, फिर इसी मिट्टी पर कलश स्थापना करनी चाहिए। कलश में पवित्र (शुद्ध) जल भरकर रोली से स्वास्तिक और ॐ बनाकर कलश के मुख पर मोली से रक्षा सूत्र बांध दें, कलश में सुपारी, और एक सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रख दें, और फिर कलश के मुख को ढक्कन से ढक देना चाहिए। ढक्कन को चावल से भर दें, ढक्कन के ऊपर या पास में ही एक नारियल लाल चुनरी से लपेटकर रक्षा सूत्र से बांध देना चाहिए। इस नारियल को कलश के ढक्कन रखते समय सभी देवी देवताओं का आवाहन करें, और अंत में दीपक जलाकर कलश की पूजा करें। अंत में कलश पर फूल और मिठाइयां चढ़ा दे। इस प्रकार हर दिन नवरात्रों में इस कलश की पूजा करें।

किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य के लिए देव पूजा में साधक द्वारा पूजा सामग्री के साथ-साथ अन्य कई वस्तुओं का उपयोग भी किया जाता है। जैसे-जल, पुष्प, दीपक, घंटी, शंख, आसन, कलश आदि, जिनका अलग-अलग एक विशिष्ट महत्व एवं प्रतीकात्मक अर्थ होता है। इनमें कलश या कुंभ की भारतीय संस्कृति में एक कल्पना की गई है। कुंभ को समस्त, ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना गया है, क्योंकि ब्रह्माण्ड या आकाश भी घट के समान है। इसको इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि घट में समस्त सृष्टि का समावेश है। इसी में सभी देवी-देवता, नदी-पर्वत, तीर्थ आदि उपस्थित रहते हैं-

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रूद्रः समाश्रितः। मूले तवस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।। कुक्षौ तु सागराः सर्वे, सप्तद्वीपाः वसुन्धरा।

ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः।।
अंगैश्च सहिताः सर्वे कलशन्तु समाश्रिताः।
अत्र गायत्री सावित्री, शांति-पुष्टिकरी सदा।।
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि, त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः।
शिवः स्वयं त्वमेवासि, विष्णुस्तवं च प्रजापतिः।।
आदित्या वसवो रूद्रा, विश्वेदेवाः सपैतृकाः।
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि, यतः कामफलप्रदा।।
त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं, कर्तुमीहे जलोद्भव।
सान्निध्यं कुरू मे देव! प्रसन्नो भव सर्वदा।।

अतः नवरात्र के अतिरिक्त भी (किसी भी) पूजा, पर्व व संस्कार में सबसे पहले कलश स्थापना करने का विधान है। कलश स्थापना तथा पूजन के बिना कोई भी मंगल कार्य प्रारंभ नहीं किया जाता है। कलश स्थापना का भी एक विधान है। इसे पूजा स्थल पर ईशान कोण में स्थापित किया जाना चाहिए। प्रायः कलश ताम्बे का ही सर्वोत्तम माना गया है। यदि यह उपलब्ध न हो तो मिट्टी का भी प्रयोग में लिया जा सकता है। सोने व चांदी का भी कलश प्रयोग में ले सकते हैं। शास्त्रों में कलश कितना बडा या छोटा हो इसका भी वर्णन मिलता है। मध्य में पचास अंगुल चौडा और सोलह अंगुल ऊंचा, नीचे बारह अंगुल चौडा और ऊपर से आठ अंगुल का मुख रखें तो यह कलश सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सामान्यता कलश को जल से भरा जाता है, परन्तु विशेष प्रयोजन में किए जाने वाले अनुष्ठानों में विशेष वस्तुए भी रखे जाने का विधान है:-

धर्म लाभ हेतु अनुष्ठान किया जा रहा हो तो कलश में जल के स्थान में यज्ञ भस्म का प्रयोग होता है। धन के लाभ हेतु मोती व कमल का प्रयोग करते है, विषय भोग हेतु गोरोचन, मोक्ष हेतु वस्त्र, युद्ध अथवा मुकदमें में विजय के लिए अपराजिता का प्रयोग करते हैं। किसी का उच्चाटन करना हो तो व्याघ्री (छोटी कटेरी), वशीकरण के लिए मोर पंखी, मारण हेतु काली मिर्च तथा आकर्षण करने हेतु धतूरा भरने का विधान है।

कलश को भूमि पर नहीं रखना चाहिए। इसको रखने से पूर्व भूमि की शुद्धि करना आवश्यक है। फिर बिन्दू षटकोण अष्टदल आदि बना कर उसके ऊपर कलश की स्थापना करनी चाहिये अथवा इसे धान्य (जौ) के ऊपर भी रखा जा सकता है। कलश उपरोक्त में से किसी भी पदार्थ से भरकर विभिन्न देवताओं का कलश में आवाहन किया जाता है। इसके पश्चात प्रधान देवता (जिसकी आराधना या अनुष्ठान किया जाना है) का आवाहन किया जाता है। साथ ही नवग्रहों एवं पितरों की स्थापना की जाती है, तत्पश्चात ही मांगलिक कार्य का शुभारम्भ किया जाता है।

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नवरात्रि पूजा

नवरात्र पूजा और कलश स्थापना

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नवरात्र के 9 दिनों में नवदुर्गा की आराधना पूजा की जाती है। नवरात्र चाहे चैत्र के हों, या आषाढ़, अथवा आश्विन तथा माघ के हों, इन चार नवरात्रि (दो प्रत्यक्ष – चैत्र और आश्विन तथा दो गुप्त नवरात्र – आषाढ़ तथा माघ) महिनों में आते हैं। चैत्र नवरात्र के समय देवशयन तथा आश्विन नवरात्र के समय देव बोधन कहा गया है। आश्विन माह शुक्ल पक्ष में प्रथम 9 दिनों में पड़नें वाले नवरात्र शारदीय नवरात्रि भी कहलाते हैं। सभी नवरात्रि का अपना-अपना विशेष महत्व है। दुर्गा पूजा का वार्षिकोत्सव शारदीय नवरात्र में सम्पन्न किया जाता है। शास्त्रों में नवरात्र की विशेष महिमा बताई गई है। चैत्र और आश्विन मास शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तक (जो नवदुर्गा का समय है) यह समय साधना उपासना द्वारा शक्ति का संचय करने के लिए सबसे उत्तम समय है। नवरात्र नव शक्तियों से संयुक्त हैं, इस की एक-एक तिथि को एक-एक शक्ति के पूजन का विधान है। मार्कण्डेय पुराण में इन शक्तियों का नाम इस प्रकार बताया गया है :-

प्रथमं शैलपुत्रीति, द्वितीयं ब्रह्मचारिणी, तृतीयं चन्द्र-घण्टेति कुष्माणडेति चतुर्थकम् । पंचमम् स्कन्द मातेति, षष्ठं कात्यायनी तथा, सप्तम कालरात्रिति महागौरी चाष्टमम्।। नवमं सिद्धिदात्रिति नव दुर्गाः प्रर्कीर्तिताः।

सनातन मत के प्राचीन शास्त्रों के अनुसार दुर्गा देवी नौ रूपों में प्रकट हुई हैं। उन सब रूपों की अलग-अलग कथा इस प्रकार है :-
1. महाकाली- एक बार पूरा संसार प्रलय ग्रस्त हो गया था। चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देता था। उस समय ‘भगवान विष्णु’ की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ उस कमल में से ‘ब्रह्मा जी’ प्रकट हुए इसके अतिरिक्त भगवान नारायण के कानों से कुछ मैल भी निकला, उस मैल से कैटभ और मधु नाम के दो दैत्य उत्पन्न हुये। जब उन दोनों दैत्यों ने इधर-उधर देखा तो ब्रह्माजी के अलावा उन्हें कोई नहीं दिखाई दिया, तब ब्रह्माजी को देखकर वे दैत्य उनको मारने दौड़े। उस समय भयभीत ब्रह्माजी ने विष्णु भगवान की स्तुति की, स्तुति से विष्णु भगवान की आँखों में जो महामाया योग निद्रा के रूप में निवास करती थी वह लोप हो गई और विष्णु भगवान की नींद खुल गई उनके जागते ही दोनों दैत्य भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे और पांच हजार वर्ष तक युद्ध चलता रहा, अंत में भगवान विष्णु की रक्षा के लिए महामाया ने असुरों की बुद्धि को परिवर्तित कर दिया। जब असुरों तथा देवताओं का युद्ध हुआ, तब असुर विष्णु भगवान से बोले, ‘‘हम आपके युद्ध से प्रसन्न हैं, जो चाहो वर मांग लो’’ भगवान ने मौका पाया और कहने लगे, ‘‘यदि हमें वर देना है तो यह वर दो कि दैत्यों का नाष हो।’’ दैत्यों ने कहा ‘‘ऐसा ही होगा’’ ऐसा कहते ही दैत्यों का नाश हो गया। जिसने असुरों की बुद्धि को बदला था वह ‘महाकाली’ थीं।

2. महालक्ष्मी- एक समय में महिषासुर नाम का दैत्य हुआ। उसने पृथ्वी और पाताल पर अपना अधिकार जमा लिया। तो देवता भी उस युद्ध में पराजित होकर भागने लगे। वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उस दैत्य से बचने के लिए भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। देवताओं की स्तुति से भगवान विष्णु और शंकर जी प्रसन्न हुए, तब उनके शरीर से एक तेज निकला, जिसने महालक्ष्मी जी का रूप धारण किया। इन्हीं महालक्ष्मी जी ने महिषासुर को युद्ध में मारकर देवताओं के कष्ट को दूर किया।

3. चामुण्डा- एक समय था जब शुम्भ-निषुम्भ नाम के दो दैत्य बहुत बलशाली हुए थे, उनसे युद्ध में देवता हार मान गए जब देवताओं ने देखा कि अब युद्ध नहीं जीता जा सकता तब वह स्वर्ग छोड़कर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे उस समय भगवान विष्णु के शरीर से एक ज्योति प्रकट हुई जो कि ‘महासरस्वती’ या ‘चामुण्डा’ थी। महासरस्वती अत्यन्त रूपवान थी, उनका रूप देख कर दैत्य मुग्ध हो गए और अपनी इच्छा प्रकट करने के लिए अपना दूत उस देवी के पास भेजा, उस दूत को देवी ने वापिस कर दिया। इसके पश्चात् बाद उन दोनों ने अपने सेनापति धूम्राक्ष को सेना सहित भेजा, जो देवी द्वारा सेना सहित मार दिया गया और फिर चण्ड-मुण्ड लड़ने आए और वह भी मार दिए गये इसके पश्चात् रक्तबीज आया जिसके रक्त की बूँद जमीन पर गिरने से एक और रक्तबीज पैदा होता था, उसे भी देवी ने मार दिया। अन्त में शुम्भ-निषुम्भ स्वयं लड़ने आये और देवी के हाथों मारे गए। सभी देवता दैत्यों की मृत्यु से प्रसन्न हुए।

4. योगमाया – जब कंस ने वासुदेव-देवकी के छः पुत्रों का वध कर दिया था और सातवें गर्भ में शेषनाग बलराम जी आये, जो रोहिणी के गर्भ में प्रविष्ट होकर प्रकट हुए। तब आठवाँ जन्म श्री कृष्ण जी का हुआ। साथ ही साथ गोकुल में यशोदा जी के गर्भ में योगमाया का जन्म हुआ जो वासुदेव जी के द्वारा कृष्ण के बदले मथुरा लाई गई। जब कंस ने कन्या स्वरूप उस योगमाया को मारने के लिए पटकना चाहा, तब वह हाथ से छूट आकाश में चली गई आकाश में जाकर उसने देवी का रूप धारण कर लिया। आगे चलकर इसी योगमाया ने श्री कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बन कर कंस, चाणूर आदि शक्तिशाली असुरों का संहार करवाया।

5. रक्त दन्तिका – एक बार वैप्रचित्ति नाम के असुर ने बहुत से कुकर्म करके देव तथा मानवों को आतंकित कर दिया। देवताओं और पृथ्वी की प्रार्थना पर उस समय दुर्गा देवी ने रक्तदन्तिका नाम से अवतार लिया और वैप्रचित्ति आदि असुरों का मान मर्दन कर डाला। यह देवी असुरों को मारकर उनका रक्तपान किया करती थी, इस कारण से इनका नाम ‘‘रक्तदन्तिका’’ हुआ।

6. शाकुम्भरी देवी – एक समय पृथ्वी पर लगातार सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, जिसके के कारण चारों ओर हा-हाकार मच गयी, सभी जीव भूख और प्यास से व्याकुल हो मरने लगे। उस समय मुनियों ने मिलकर देवी भगवती की उपासना की, तब जगदम्बा ने ‘‘शाकुम्भरी’’ नाम से स्त्री रूप में अवतार लिया और उनकी कृपा से जल की वर्षा हुई जिससे पृथ्वी के समस्त जीवों को नया जीवन प्राप्त हुआ।

7. श्री दुर्गा जी – एक समय धरती पर दुर्गम नाम का राक्षस हुआ, उसके अत्याचार से पृथ्वी ही नहीं, स्वर्ग और पाताल के निवासी भी भयभीत रहते थे। ऐसे समय भगवान की शक्ति ने दुर्गा या दुर्गसेनी के नाम से अवतार लिया और दुर्गम राक्षस को मारकर ब्राह्मणों और भक्तों की रक्षा की। दुर्गम राक्षस को मारने के कारण ही इनका नाम ‘‘दुर्गा देवी’’ प्रसिद्ध हुआ।

8. भ्रामरी देवी – एक बार महा अत्याचारी अरूण नाम का एक असुर पैदा हुआ, उसने स्वर्ग में जाकर उपद्रव करना शुरू कर दिया, देवताओं की पत्नियों का सतीत्व नष्ट करने की कुचेष्टा करने लगा, अपने सतीत्व की रक्षा के लिए देव-पत्नियों ने भौरों का रूप धारण कर लिया और दुर्गा देवी की प्रार्थना करने लगीं। देव पत्नियों को दुःखी देखकर माँ दुर्गा ने ‘‘भ्रामरी’’ का रूप धारण कर उन असुरों का उनकी सेना सहित संहार किया और देव-पत्नियों के सतीत्व की रक्षा की।

9. चण्डिका देवी – एक बार पृथ्वी पर चण्ड-मुण्ड नाम के दो राक्षस पैदा हुए, वे दोनों इतने बलवान थे कि पृथ्वी पर अपना राज्य फैला, देवताओं को हराकर स्वर्ग पर भी अपना अधिकार जमा लिया। तब देवता बहुत दुःखी हुए और देवी की स्तुति करने लगे, देवी ‘‘चण्डिका’’ के रूप में अवतरित हुई और चण्ड-मुण्ड नामक राक्षसों को मारकर संसार का दुःख दूर किया। देवताओं का स्वर्ग पुनः उन्हें प्राप्त हुआ। इस प्रकार चारों और प्रसन्नता का वातावरण छा गया।

नवरात्र की महिमा :-
चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक नवरात्र व्रत होता है। नवरात्र मुख्य रूप से दो होते हैं- वासन्तिक और शारदीय। वासन्तिक में विष्णु की उपासना की प्राधानता रहती है, और शारदीय में शक्ति की उपासना का। वस्तुतः दोनों नवरात्र मुख्य एवं व्यापक हैं, और दोनों में दोनों की उपासना उचित है। इस उपासना में वर्ण, जाति का वैशिष्ट्य अपेक्षित नहीं है, अतः सभी वर्ण एवं जाति के लोग अपने इष्टदेव की उपासना करते हैं। देवी की उपासना व्यापक है। दुर्गा पूजक प्रतिपदा से नवमी तक व्रत रहते हैं। कुछ लोग अन्न त्याग देते हैं। कुछ एक भुक्त रहकर शक्ति उपासना करते हैं। कुछ ‘श्री दुर्गा सप्तशती’ का सकाम या निष्काम भाव से पाठ करते हैं। संयत रहकर पाठ करना आवश्यक है, अतः यम-नियम का पालन करते हुए भगवती दुर्गा की आराधना या पाठ करना चाहिये। नवरात्र व्रत का अनुष्ठान करने वाले जितने संयत, नियमित, अन्तर्बाह्य शुद्धि रखेंगे उतनी ही मात्रा में उन्हें सफलता मिलेगी, यह निःसंदिग्ध है।

प्रतिपदा से नवरात्र प्रारम्भ होता है। प्रारम्भ करते समय यदि चित्रा और वैधृतियोग हो तो उनकी समाप्ति होने के बाद व्रत प्रारम्भ करना चाहिये, परंतु देवी का आवाह्न, स्थापन और विसर्जन-ये तीनों प्रातःकाल में होने चाहिये। अतः यदि चित्रा, वैधृति अधिक समय तक हों तो उसी दिन अभिजित् मुहूर्त (दिन के आठवें मुहूर्त यानी दोपहर के एक घड़ी पहले से एक घड़ी बाद तक के समय) में आरम्भ करना चाहिये।

आरम्भिक कर्तव्य- आरम्भ में पवित्र स्थान की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूँ बोयें। फिर उनके ऊपर अपनी शक्ति के अनुसार बनवाये गये सोने, ताँबे आदि अथवा मिट्टी के कलश को विधिपूर्वक स्थापित करें। कलश के ऊपर सोना, चाँदी, ताँबा, मृत्तिका, पाषाण अथवा चित्रमयी मूर्ति की प्रतिष्ठा करें। मूर्ति यदि कच्ची मिट्टी, कागज या सिंदूर आदि से बनी हो और स्नानादि से उसमें विकृति होने की आशंका हो तो उसके ऊपर शीशा लगा दें। मूर्ति न हो तो कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके दोनों पार्शवों में त्रिशूल बनाकर दुर्गाजी का चित्र पुस्तक तथा शालिग्राम को विराजित कर विष्णु पूजन करें।

नवरात्र व्रत के आरम्भ में स्वस्तिवाचन-शान्ति पाठ करके संकल्प करें और तब सर्वप्रथम गणपति की पूजा कर मातृका, लोकपाल नवग्रह एवं वरूण का सविधि पूजन करें। फिर प्रधान मूर्ति का षोडशोपचार पूजन करना चाहिये। अपने इष्टदेव-राम, कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण या भगवती दुर्गादेवी आदि की मूर्ति ही प्रधानमूर्ति कही जाती है। पूजन वेद-विधि या सम्प्रदाय-निर्दिष्ट विधि से होना चाहिये। दुर्गा देवी की आराधना अनुष्ठान में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन तथा मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत निहित ‘श्रीदुर्गा सप्तशती’ का पाठ मुख्य अनुष्ठेय कर्तव्य है।

पाठ विधि:-

‘श्रीदुर्गासप्तशती’ पुस्तक का – नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्।।

इस मंत्र से पंचोपचार पूजन कर यथाविधि पाठ करें, देवी व्रत में कुमारी-पूजन परम आवश्यक माना गया है। सामर्थ्य हो तो, नवरात्र भर प्रतिदिन, अन्यथा समाप्ति के दिन सौ कुमारियों के चरण धोकर उन्हें देवीरूप मानकर गंध-पुष्पादि से अर्चन कर आदर के साथ यथारूचि मिष्टान्न भोजन कराना चाहिये एवं वस्त्रादि से सत्कृत करना चाहिये।

शास्त्रों में वर्णित है कि एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य की, दो की पूजा से भोग और मोक्ष की, तीन की अर्चना से धर्म, अर्थ, काम-त्रिवर्ग की, चार की अर्चना से राज्य पद की, पाँच की पूजा से विद्या की, छः की पूजा से षट्कर्म सिद्धि की, सात की पूजा से राज्य की, आठ की अचर्ना से सम्पदा की और नौ कुमारी कन्याओं की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।

कुमारी-पूजन में दस वर्ष तक की कन्याओं का अर्चन विहित है। दस वर्ष से ऊपर की आयु वाली कन्या का पूजन वर्जित किया गया है। दो वर्ष की कन्या कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्तिनी, चार वर्ष की कल्याणी, पाँच वर्ष की रोहिणी, छः वर्ष की काली, सात वर्ष की चण्डिका, आठ वर्ष की शाम्भवी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष वाली सुभद्रा-स्वरूपा होती है।

दुर्गा-पूजा में प्रतिदिन का वैशिष्ट्य रहना चाहिये। प्रतिपदा को केश संस्कारक द्रव्य – आँवला, सुगन्धित तैल आदि केश प्रसाधन संभार, द्वितीया को बाल बाँधने-गूँथने वाले रेशमी सूत, फीते आदि, तृतीया को सिंदूर और दर्पण आदि, चतुर्थी को मधुपर्क, तिलक और नेत्राजंन, पंचमी को अंगराग-चंदनादि एवं आभूषण, षष्ठी को पुष्प तथा पुष्पमालादि समर्पित करें। सप्तमी को गृह मध्य पूजा, अष्टमी को उपवास पूर्वक पूजन, नवमी को महापूजा और कुमारी पूजा करें। दशमी को पूजन के अनन्तर पाठकर्ता की पूजा कर दक्षिणा दें एवं आरती के बाद विसर्जन करें। श्रवण-नक्षत्र में विसर्जनांग पूजन प्रशस्त कहा गया है। दशमांश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण-भोजन कराकर व्रत की समाप्ति करें।

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