जब राहु खराब हो

क्या करें, कुंडली में जब राहु खराब हो:-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

ज्योतिष के जनक महर्षि पराशर के अनुसार राहु ग्रह को पितामह (दादा), समाज एवं जाती से अलग लोग (विद्रोही भी), सर्प, सामाजिक जहर का फैलाना, क्रानिक बीमारियां, भय, विधवा, दुर्वचन, तीर्थ यात्रायें, निष्ठुर वाणी, विदेश में जीवन, त्वचा पर दाग, सरीसृप, महामारी, किसी महिला से अनैतिक संबन्ध, नानी, व्यर्थ के तर्क, भडकाऊ भाषण, बनावटीपन, दर्द और सूजन, डूबना, अंधेरा, दु:ख पहुंचाने वाले शब्द, निम्न जाति, दुष्ट स्त्री, जुआरी, विधर्मी, चालाकी, संक्रीण सोच, पीठ पीछे बुराई करने वाले, पाखण्डी, बुरी आदतों के आदी, जहाज के साथ जलमग्न होना, डूबना, रोगी स्त्री के साथ आनन्द लेना, अंगच्छेदन होना, डूबना, पथरी, कोढ, बल, व्यय,आत्मसम्मान, शत्रु, मिलावट दुर्घटना, नितम्ब, देश निकाला, विकलांग, खोजकर्ता, शराब, झगडा, गैरकानूनी, तरकीब से सामान देश से अन्दर बाहर ले जाना, जासूसी करना, आत्महत्या, विषैला, विधवा, पहलवान, शिकारी, दासता, शीघ्र उत्तेजित होने इत्यादि का कारक होता है

कौन कौन से दोष आ जाते हैं, राहु खराब होने पर :-

जैसे की कहा जाता है, पीपल की छाया में सोने वाले को किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता परंतु यदि बबूल की छाया में सोते रहें तो श्वास रोग या चर्म रोग हो सकता है।

इसी प्रकार ग्रहों की छाया का भी हमारे जीवन पर प्रभाव पढ़ता है। नवग्रहों में राहु ग्रह हमारी बुद्धि भ्रमित करता है, लेकिन जो चतुराई हमारी बुद्धि में पैदा होती है, उसका कारक भी राहु ही है। ज्योतिष शास्त्र में राहु के दोषपूर्ण या खराब होने पर जातक चतुराई से घोटाले तो करता है, परंतु एक दिन अपने ही बुने जाल में बुरी तरह फंस जाता है।

क्यों होता है राहु खराब ? :-

1 :- यदि कोई व्यक्ति अपने गुरु या फिर अपने धर्म का अपमान करता है, तो उस व्यक्ति का राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

2 :- यदि कोई व्यक्ति शराब का सेवन नियमित करता है, या फिर पराई स्त्री के साथ सम्बन्ध बनाने की इच्छा रखता है, तो उसका राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

3 :- यदि कोई व्यक्ति ब्याज वाले पैसों का प्रयोग घर में करता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

4 :- यदि कोई व्यक्ति चतुराई से किसी को धोखा देता है, और झूठ बोलने की आदत को नहीं छोड़ता तो उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देता है।

5 :- यदि कोई व्यक्ति हमेशा तामसिक भोजन करता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देता है।

6 :- यदि कोई व्यक्ति खाना हमेशा घर से बाहर खाता है, या बाहर का खाना हमेशा खाता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देने लगता है।

खराब राहु को कैसे पहचानेगे ? :-

1 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके ससुर, साले या साली से झगडा बढ़ने लगेगा।

2 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके सोचने की ताकत कम हो जायेगी।

3 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके जीवन में शत्रु बढ़ जायेंगे, और सोचने की क्षमता कम होने लगती है।

4 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके साथ दुर्घटना, पुलिस केस, या पत्नी के साथ लड़ाई झगडे में बढ़ोत्तरी हो जायेगी।

5 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वो व्यक्ति छोटी छोटी बातों पर गुस्सा होने लगता है, और लोगों के साथ सही तालमेल नहीं बिठा पाता है।

6 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उस व्यक्ति का एक तरह से दिमाग खराब होने लगता है, और उस व्यक्ति के सर में फालतू में छोटी छोटी चोट लगने लगती है या चक्कर आते हैं।

7 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वह व्यक्ति अधिक मदिरापान या फिर सम्भोग/हस्तमैथुन की तरफ भागने लगता है।

8 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो व्यक्ति नीच हरकते करने लगता है, और निर्दयी हो जाता है।

राहु ग्रह खराब होने से होने वाले रोग :-

1 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो सबसे पहले उसको गैस से सम्बन्धित शिकायत बढ़ने लगती है।

2 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके बाल झड़ने लगते हैं, तथा बवासीर से सम्बन्धित भी समस्या होने लगती है।

3 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वो जातक पागलों की तरह व्यवहार करेगा और लगातार मानसिक तनाव में रहेगा।

4 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके नाखून अपने आप ही टूटने लगते हैं और व्यक्ति के सर में पीड़ा या दर्द बनी रहती है।

5 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उस व्यक्ति को अचानक पता चलेगा की मुझे कोई बीमारी है और उस पर पैसा भी खूब खर्चा होगा तथा व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।

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शनिदेव

शनि ग्रह हमेशा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं :-

Dr.R.B.Dhawan

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शनि ग्रह हमेशा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं होता। वह बुरे फलों के साथ-साथ अच्छा फल भी देता है। वास्तव में शनि के बारे में जितना भय और जितनी गलतफहमियां हैं उतना खराब वह है नहीं। काल पुरुष की जन्म कुण्डली में शनि कर्मेश दशम भाव का स्वामी एवं लाभेश एकादश भाव का स्वामी होकर स्थित है। कर्मेश होने के साथ-साथ लाभेश भी होने के कारण कर्म का फल है। नवम भाव भाग्य है। कर्म के फल को भाग्य भी कहते हैं। कर्म के व्यय होने पर भाग्य बनता है। कर्म का अगला भाव लाभ तथा कर्म का व्यय भाव भाग्य बनाता है। यदि कर्म अच्छा है तो भाग्य भी अच्छा होगा। यदि कर्म ही नहीं तो लाभ तथा भाग्य कहां से आएंगे। भाग्य भाव धर्म का भी है। अर्थात् कर्म को धर्म पर भी व्यय करें तो भाग्य जागृत होगा। शनि कर्मेश होने के कारण भाग्य विधाता भी है। वही एकादश भाव का स्वामी होकर कर्म फलों का लेखा-जोखा या वेलेन्स शीट के अनुसार न्याय करता है।

कुछ लोग शनि ग्रह को खोटा, बुरा, पापी ग्रह मानते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि भले को छोड़िए, खोटे ग्रह जप व दान। अर्थात पापी ग्रहों को ज्यादातर लोग पूजा, अर्चना, जप, तप से शांत करते हैं। उससे भयभीत व त्रस्त रहते हैं। जरा सा किसी को शनि के दुष्प्रभाव का ज्ञान होते ही वह शनि के दुष्प्रभाव के उपचार हेतु पूजा, अर्चना, जप, तप में लग जाता है। मेरे अनुभव के अनुसार शनि जब साढ़े साती से किसी को प्रभावित करता है तो उस को नया परिष्कृत रूप अपनी साढे़साती के बाद देता है। जितना उसको दंडित करता है। उससे ज्यादा देकर जाता है। अधिकतर शनि की साढ़े साती बरबाद हुए लोगों को जाते-जाते फिर से उन्हें धो-पोछकर चमकाकर जाती है। उनमें लगी जंग को छुड़ा जाती है। भले बुरे के भेद से शनि कोमल व कठोर भी है। शनि दोनों तरह के फल देता है। शनि ही इस भू मंडल का न्यायधीश है। शनि ग्रह को काल भैरव अर्थात् न्याय का स्वामी माना गया है। वह अपने दो सहयोगी ग्रहों राहु एवं केतु की सहायता से न्याय करता है। लेकिन जब जरूरत होती है तो सेनापति मंगल की भी सहायता लेता है। तब रक्तप्रद दंड का निधान करता है। तो सेनापति मंगल की सहायता से दंडित कर अंग-भंग करने का आदेश देता है

वैद्यनाथ के अनुसार- लग्नस्थ शनि का जातक कई व्याधियों से ग्रस्त होता है। उसका कोई ना कोई अंग अवश्य दोष युक्त होता है। जबकि स्वगृही या उच्च का शनि जातक को यश वैभव से संपन्न करता है। शनि शुभ संयोग युक्त हो तो जातक संकल्पवान स्वयं परिश्रमी, शनैः शनैः उन्नतिशील, पराक्रमी, विजयी तथा दृढ़ निश्चयी होता है। तथा अथक प्रयास से उच्च पद, सफलता अर्जित करता है। अशुभ संयोग से शनि नीच कर्मरत, वह स्वयं कार्य बिगाड़ता है। अविश्वासी, भयभीत, इर्शालु, अविवेकी, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाला बना देता है। दूरस्थ ग्रह शनि के प्रभाव से एकांत आलसी तथा उदासीन का स्वाभाविक लक्षण होता है।

अरूण सहिंता के अनुसार- सूर्य को विष्णु, चन्द्रमा को शिव, मंगल को हनुमान, स्वामी कार्तिकेय षडानन, बुध को दुर्गा, गुरु को ब्रह्मा, शुक्र को लक्ष्मी जी, शनि को भैरव या काल भैरव राहु को सरस्वती, गायत्री तथा केतु को गणेश माना गया है। ये देवता तथा देवियां ही जातक की कुण्डली में कर्माें के अनुसार राशियों और भावों में आकर शुभ व अशुभ फल प्रदान करते हैं। इसी प्रकार 28 नक्षत्र होते हैं।

नक्षत्रों के नाम :- 1. अश्विनी, 2. भरणी, 3. कृत्तिका, 4. मृगशिरा, 6. आद्र्रा, 7. पुनर्वसु, 8. पुष्य, 9. आश्लेषा, 10. मघा, 11. पूर्वफाल्गुनी, 12. उत्तरफाल्गुनी, 13. हस्त, 14. चित्रा, 15. स्वाति, 16. विशाखा, 17. अनुराधा, 18. ज्येष्ठा, 19. मूल, 20. पूर्वाषाढ़ा, 21. उत्तराषाढ़ा, 22. श्रवण, 23. धनिष्ठा, 24. शतभिषा, 25. पूर्वाभाद्रपद, 26. उत्तराभाद्रपद, 27. रेवती। 28. अभिजित। इन नक्षत्रों के देवता नक्षत्रों तथा ग्रह क्र. नक्षत्र न. स्वामी क्र. नक्षत्र न. स्वामी देवता :-

1. अश्विनी अ. कुमार केतु, 2. भरणी काल शुक्र, 3. कृतिका अग्नि सूर्य, 4. रोहिणी ब्रह्मा चन्द्रमा, 5. मृगशिरा चन्द्रमा मंगल, 6. आद्र्रा रूद्र राहु, 7. पुनर्वसु अदिति बृहस्पति, 8. पुष्य बृहस्पति शनि, 9. आश्लेषा सर्प बुध, 10. मघा पितर केतु, 11. पू.फा भग शुक्र, 12. उ.फा. अर्यमा सूर्य, 13. हस्त सूर्य चन्द्रमा, 14. चित्रा विश्वकर्मा मंगल, 15. स्वाती पवन राहु, 16. विशाखा शुक्राग्नि बृहस्पति, 17. अनुराधा मित्र शनि, 18. ज्येष्ठा इन्द्र बुध, 19. मूल निर्ऋति केतु, 20. पू.आ जल शुक्र, 21. उ.आ. विश्वेदेव सूर्य, 22. श्रवण विष्णु चन्द्रमा, 23. धनिष्ठा वसु मंगल, 24. शतभिषा वरूण राहु, 25. पू.भा. अजैकपाद बृहस्पति, 26. उ.भा. अहिर्बुध्न्य शनि, 27. रेवती पू.षा. बुध, 28. अभिजित ब्रह्मा केतु।

अपने नक्षत्रों में ग्रहों अर्थात् देवताओं के गोचर (आगमन) पर एक दूसरे को प्रभावित कर फल प्रदान करते है। भृगु संहिता के अनुसार- लगनस्थ शनि हो तो जातक शत्रु का नाश करने वाला, समृद्ध, धन धान्य पुत्र, स्थूल शरीर दूर दृष्टि वाला एवं वात से पीड़ित होता है। उच्चस्थ शनि जातक को प्रधान या नगर का मुखिया बनाता है। मकरस्थ या कुम्भस्त शनि जातक को पैतृक धन दौलत का वारिस बनाता है। वृहद पवन में वाला बताया है। यदि शनि मूल त्रिकोणस्थ हो तो जातक को राष्ट्र प्रमुख या प्रांत प्रमुख की प्रतिष्ठा प्रदान करता है। जातक पारिजात में दुर्बल शनि हो तो जातक दुष्कर्मों का फल भोगता है। श्वास रोग, शरीर पीड़ा, पार्श्व, पार्श्व पीड़ा, गुदृ विकार, हृदय ताप, कंपन, संधि रोग तथा वात विकार से पीड़ित होता है। कुछ राशियों में जयदेव ने अच्छा बताया है। धनु, मीन, मकर, तुला, कुम्भ, राशि का शनि पांडित्य, ऐश्वर्य तथा सुदर्शन शरीर, कामावेग एवं आलसी होता है।

वारहमिहिर के अनुसार- स्वगृही शनि,उच्च मीन, धनु, मकर, तुला, कुम्भ, राशि गत शनि श्रेष्ठ फल प्रदान करना है। ऐसे जातक ज्ञान शिरोमणि, सुदर्शन, अग्रणी, नरपति एवं समृद्ध होते हैं।

मानसागरी के अनुसार- मकर तथा कुम्भ राशि लग्न में जातक शत्रुहन्ता सिद्ध करता है। अन्य राशियों में विरल केशी, नीच कर्मी, वासना युक्त, धूर्त एवं आलसी होता है।

जातक पर शनि का प्रभाव- रूखे-सूखे बाल, लम्बे बड़े अंग, दांत तथा वृद्ध शरीर काला रंग का दिखता है। यह अशुभ ग्रह है। मंद गति ग्रह है। नैतिक पतन का द्योतक है। वायु संबंधी बीमारियों का प्रतिनिधि है। यह दुःख, निराशा तथा जुआ का प्रतीक है। गंदा स्थान, अंधेरा स्थान का कारक ग्रह है।

शनि से प्रभावित वस्तुएं- लोहा, काला, चना, भांग, तेल, नीलम, दाह संस्कार गृह, कब्रिस्तान, जेल, बिस्तरे पर लिटाएं रखना, पुरानी बीमारियां, लाइलाज बीमारियां, वृद्धावस्था का स्वामी है। शनि से प्रभावित शरीर के अंग- दांत, वात, कलाई, पेशियां, पीठ, पैर।

शनि से प्रभावित रोग- गुदा के रोग, व्रण, जख्म व जोड़ों का और पुराने दर्द, लाइलाज रोग, दांत, सांस, क्षय, वातज यह शुद्र वर्ण, वायु तत्व, नपुंसक तथा पश्चिमी स्वामी है।

जन्मकुण्डली में शनि के लग्न भाव से स्थित का फल-
1 लग्न (प्रथम) भावस्थ शनि मकर, कुम्भ तथा तुला का हो तो धनाढ्य, सुखी, धनु और मीन राशियों में हो तो अत्यंत धनवान और सम्मानित एवं अन्य राशियों का हो तो अशुभ होता है।

2 द्वितीय भावस्थ शनि हो तो जातक, कटुभाषी, साधुद्वेषी, मुखरोगी और कुम्भ या तुला का शनि हो तो धनी, लाभवान् एवं कुटुम्ब तथा भातृवियोगी होता है।

3 तृतीय भावस्थ शनि हो तो जातक शीघ्रकार्यकर्ता, सभाचतुर, चंचल, भाग्यवान, शत्रुहन्ता, निरोगी, विद्वान योग, मल्ल एवं विवेकी होता हैै।

4 चतुर्थ भावस्थ शनि हो तो जातक अपयशी, बलहीन, धूर्त, कपटी, शीघ्रकोपी, कृशदेही, उदासीन, वातपित्तयुक्त एवं भाग्यवान होता है।

5 पंचम भावस्थ शनि हो तो जातक आलसी, संतानयुक्त, चंचल, उदासीन, विद्वान, भ्रमणशील एवं वातरोगी होता है।

6 षष्ठ भावस्थ शनि जातक को बलवान, आचारहीन, व्रणी, जाति विरोधी, श्वास रोगी, कण्ठ रोगी, योगी, शत्रु हन्ता भोगी एवं कवि बनता है।

7 सप्तम भावस्थ शनि हो तो जातक क्रोधी, कामी, विलासी, अविवाहित रहने वाला, या दुःखी अविवाहित जीवन, धन सुख हीन, भ्रमणशील, नीचकर्मरत, स्त्रीभक्त होता है।

8 अष्टम भावस्थ शनि जातक को विद्वान स्थूल शरीर, उदार प्रकृति, कपटी, गुप्तरोगी, वाचाल, डरपोक, कुष्ठरोगी एवं धूर्त बनाता है।

9 नवम भावस्थ शनि हो तो जातक धर्मात्मा, साहसी, प्रवासी, कृशदेही, भीरू, भ्रातृहीन, शत्रुनाशक वात रोगी, भ्रमणशील एवं वाचाल होता है।

10 दशम भावस्थ शनि हो तो जातक विद्वान, ज्योतिषी, राजयोगी, न्यायी, नेता, धनवान, राजमान्य, उदरविकारी, अधिकारी, चतुर, भाग्यवान, परिश्रमी, निरूद्पयोगी एवं महात्वाकांक्षी होता है।

11 ग्यारहवें भावस्थ शनि हो तो जातक बलवान विद्वान, दीर्घायु, शिल्पी, सुखी, चंचल, क्रोधी, योगाभ्यासी, नीतिवान, परिश्रमी, व्यवसायी, पुत्रहीन, कन्याप्रज्ञ एवं रोगहीन होता है

12 बारहवें भावस्थ शनि हो तो जातक आलसी, दुष्ट, व्यसनी, अपस्मार, उन्माद रोगी, मातुल कष्टदायक, अविश्वासी एवं कटुभाषी होता है।

शनि की दशा आ गयी हैः-
प्रत्येक ग्रह का अपना-अपना अस्तित्व है। यहां शनि ग्रह के बारे में कहना चाहूंगा कि शनि ग्रह सर्वथा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं होता। शनि बुरे फलों के साथ-साथ अच्छे फल भी बहुत देता है। शनि के बारे में जितना भय या जितनी भ्रांतियां लोगों को हैं, उतना खराब वह नहीं है। शनि का नाम आते ही लोग ज्यादातर डरने लगते हैं-‘शनि की दशा आ गयी है’ या ‘शनि की साढे़साती’ लघु ढैय्या है। इस कारण कुछ लोग डर या वहम बैठा देते हैं, जिसकी वजह से साधारण व्यक्ति तरह-तरह से भ्रमित होकर परेशान हो उठता है। ग्रहों को शुभ व अशुभ भागों में बांटा जाता है। जब शुभ ग्रह राशि परिवर्तित करते हैं तो उस समय गोचर का चन्द्रमा जन्म चन्द्रमा से किस भाव में स्थित है उसके अनुसार गोचर के शुभाशुभ ग्रह का फल बतलाते हैं।
कई अन्य मत भी प्रचलित हैं जिससे गोचर के ग्रह या ‘शनि की साढ़ेसाती’ का शुभाशुभ फल निकालते हैं। दैवज्ञ श्री काटवे, का कहना है कि जब शनि चन्द्रमा से 13 अंश 20 कला पीछे होता है शनि की साढ़ेसाती उस समय आरम्भ होती है, तथा जब तक वह 13 अंश 20 कला आगे रहते हैं, तब तक रहती है। इस प्रकार जन्म चन्द्रमा के अंशों में से 13 अंश 20 कला घटाओ तथा 13 अंश 20 कला जोड़ो। इससे प्राप्त होने वाली चाप पर जब तक शनि रहता है शनि की साढ़ेसाती रहती है। इस प्रकार ग्रह की राशि परिवर्तन समय कोई महत्व नहीं रखता। इस 13 अंश 20 कला मूर्ति निर्णय पद्धति महत्वहीन हो जाती है। परन्तु लग्न, सप्तशलाका, तारा तथा अष्टक वर्ग से ग्रह को शुभाशुभ उत्तम है।

पाठकों को याद दिला दूं कि जिस जन्म कुण्डली में योग नहीं वह दशा अन्तर दशा नहीं दे सकती। इसलिए फल के लिए योग का होना आवश्यक होता है। माना कि जातक की जन्म कुण्डली में शादी का योग ही नहीं हो, तो दशान्तर दशा सप्तमेश की हो, या कारक ग्रह की, शादी नहीं हो सकती। इसलिए फल के लिए योग का होना आवश्यक है इसी प्रकार जो ग्रह की दशान्तरदशा नहीं दे सकती, वह उस फल को देता है। यदि दशान्तर दशा ही हो तो गोचर कितना भी शुभाशुभ हो, फल नहीं दे सकता। पहले दशान्तर दशा का होना आवश्यक है फिर गोचर उस फल को देता है। यदि महादशा, अंतरदशा ही नहीं तो गोचर कितना भी शुभाशुभ हो वह फल नहीं दे सकता। इसको इस प्रकार भी कहा जा सकता है।

सबसे पहले जातक के लिए फल होना चाहिए। दशा अन्तरदशा उस फल को संदेश वाहक, गोचर को देती है। संदेश वाहक, गोचर वह फल जातक को देता है। यदि दशान्तर दशा संदेश वाहक को फल नहीं देगी तो संदेश वाहक जातक को फल कहां से देगा? इसलिए क्रम निश्चित है, पहले फल होना चाहिए। (योग) दूसरे उन ग्रहों की दशान्तर दशा होनी चाहिए तब गोचर जातक को फल देता है। अन्यथा फल प्राप्त नहीं होता गोचर केवल सहायक है। गोचर के फल को प्रभावित करने वाले भिन्न-भिन्न पहलुओं का अध्ययन करने के बाद साढ़े साती का अध्ययन करते हैं। जन्म राशि से 12वें स्थान जन्म राशि पर एवं द्वितीय भाव पर जब शनि गोचर करता है उसे शनि की साढ़ेसाती कहते हैं। शनि एक राशि पर लगभग 2.5 वर्ष रहता है। इस प्रकार तीन राशियों पर 7.5 वर्ष हुए। इसलिए इसे साढ़ेसाती कहते हैं। साढ़ेसाती अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी। यह सब जन्मकुण्डली में चन्द्रमा तथा शनि की स्थिति तथा बल पर निर्भर करता है। लग्न, सप्तशलाका, तारा तथा अष्टक वर्ग के बल पर भी निर्भर करता है। परन्तु फिर भी यह मानसिक कष्ट कारक हो सकती है। जब शनि चन्द्रमा से 13 अंश 20 कला कम पर 12वें भाव में रहता है तो, शनि का प्रभाव आरंभ हो जाता है। यदि शनि वक्री हो जाए तो 7.5 वर्ष से भी ज्यादा समय तक तीनों राशियों पर रह सकता है।

जिनका दीर्घ जीवन है उनके जीवन में 3 बार साढे़साती आती है। पहले फेरे में कुछ बुरा फल देती है, परन्तु आक्रमण बड़े वेग से होता है। दूसरे फेरे में वेग तो कम हो जाता है परन्तु फिर भी कष्ट तो मिलता ही है, परन्तु इतना हानिकारक नहीं होता तथा कुछ शुभ फल भी प्राप्त होता है। परन्तु तीसरे पर्याय में जातक की मृत्यु हो जाती है। बहुत कम भाग्यवान जातक ही इस तीसरे फेरे को झेल पाते हैं। साढे़साती में साधारणतया हम यह देखते हैं कि शनि किस राशि से गोचर कर रहा है। उस राशि के स्वामी से उसका कैसा संबंध है। यदि उसका संबंध मित्रता का है तो अशुभ फल नहीं होता। वैसा तो यह संबंध पंचधा मैत्री से देखना चाहिए। परन्तु पंचधा मैत्री तो कुण्डली के अनुसार बनेगी। समझाने के लिए हम लिखते हैं मित्र राशि की रााशि से गोचर कर रहा है। माना कि शनि गोचर कर रहा है। मेष राशि से प्रथम 2.5 वर्ष मीन, जिसका स्वामी बृहस्पति है तथा शनि के गुरु के साथ सम नैसर्गिक संबंध हैं तो प्रथम 2.5 वर्ष सम होंगे। द्वितीय 2.5 वर्ष मेष, जिसमें चन्द्रमा स्थित हैं उसका स्वामी मंगल है जो शनि का शत्रु है। अर्थात द्वितीय ढैय्या अशुभ। तीसरी ढैय्या में शनि वृष राशि मे गोचर करेगा। वृष के स्वामी शुक्र को शनि मित्र समझता है, इसलिए तीसरे ढैय्या शुभ अथात् मेष राशि वालों के लिए केवल दूसरे ढैय्या अशुभ हुई इस प्रकार इसको इस तालिका में लिख सकते हैं।
कुछ विशेष नियमः-

1 जन्म कुण्डली में 6, 8, 12 भाव में शनि गोचर में अशुभ ग्रह से दृष्ट या युक्त हो तो अशुभ फल प्राप्त होता है।

2 जन्म चन्द्रमा यदि 2 या 12 भाव में अशुभ ग्रह से युक्त हो तो शनि की साढे़साती अशुभ होती है।

3 जन्म चन्द्रमा निर्बल हो तथा अशुभ भाव में स्थित हो तो शनि की साढे़साती अशुभ होती है।

4 जन्म चन्द्रमा से 2 या 12वें भाव में शुभ ग्रह हो तथा शुभ दृष्ट हो तो शनि की साढे़साती शुभ फल देती है।

5 जन्म चन्द्रमा शनि से युक्त हो, मंगल से दृष्ट न हो, तो साढे़ साती शुभ फल देती है।

6 जन्म कुण्डली में चन्द्रमा की स्थिति युत तथा दृष्टि साढे़साती शुभ फल देती है।

अष्टम शनि का ढैय्या- जब शनि चन्द्रमा से चतुर्थ भाव में जाता है तो चन्द्रमा को दशम दृष्टि से देखता है। उस समय पर भी चन्द्रमा शनि से पीड़ित हो। तो फल चन्द्र, शनि, लग्न, तारा, सप्तशलाका, दशान्तरदशा पर निर्भर करता है। इसको कष्टक शनि भी कहते हैं। इसी प्रकार शनि जब जन्म चन्द्रमा से अष्टम भाव में गोचर करता है तो शुभाशुभ फल देता है। शुभाशुभ फल का निर्णय अष्टक वर्ग, तथा तारा, दशान्तर दशा ही करेगी। यदि सर्वाष्टक वर्ग में 28 से ज्यादा शुभ बिन्दु हों तो शनि का उस भाव में गोचर, जातक को कष्ट न देकर आकस्मिक अच्छा फल देता है। कहावत है कि भले-भले को छोड़िये, खोटे ग्रह जप ध्यान वाली। बुरे दिन किसी को पूछ कर नहीं आते, जब समय अनुकूल रहता है। तब व्यक्ति प्रसन्न रहता है, परन्तु बुरा समय आने पर वह चारों ओर हाथ-पैर मारता है। येनकेन प्रकारेण अपनी स्थिति सुधरने के लिए हर संभव-असंभव प्रयास करता है। दान-दक्षिण, पूजा-पाठ, जप-तप, यंत्र-तंत्र-मंत्र करता है। साधु संन्यासी, ज्योतिषी, तांत्रिक, कोई भी हो, वह उन सब तक जा पहुंचता है। खेद! ग्रहों में शनि-मंगल-राहु पर प्रायः दोष दिया जाता है तो शनि की साढ़ेसाती को सुनकर सब का हृदय कांप उठता है। शनि, अकस्मात, कुप्रभाव देने वाला ग्रह है। अतः भय सहज स्वभाविक है। यह समय मृत्यु, रोग, भिन्न-भिन्न कष्ट, व्यवसाय हानि अपमान धोखा द्वेष, ईर्ष्या का माना जाता है।

कम श्रम अधिक लाभ, भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति, ऐश्वर्य लाभ, दीर्घायु होने व स्वस्थ रहने विघ्न-बाधाओं को नाश करने, ग्रह-शांति, कलह से मुक्ति, ईश-भक्ति, कुटुम्ब-वृद्धि, योग्य संतान उत्पन्न होने, संघर्ष से मुक्ति जैसी इच्छाएं मानव मात्र की सदैव से रही हैं। वह निरन्तर इसके लिए प्रयत्नशील रहता है। इस प्रकार शनि मानव जीवन हेतु अत्यंत ही पीड़ाकारक ग्रह है। हम चाहें तो शनि की पीड़ादायक दृष्टि से छुटकारा पा सकते हैं। कुछ तंत्र-मंत्र एवं टोटकों का उपयोग करें। शनि पीड़ितों को पुराने कम्बल या पुराने लोहे का दान, काला तिल दान, उडद दान करना चाहिए। लोहे का प्रयोग ज्यादा करना चाहिए।

शनैश्चर ग्रह की पूजन विधिः-
नवग्रहों में शनि देवता को सूर्य का पुत्र कहा जाता है। शनि देव विशाल शरीर तथा बड़े-बड़े नेत्रों वाले, कृष्ण वर्ण वाले हैं। शनि देव की साढ़े साती सभी के जीवन को प्रभावित करती है। जीवन की तीसरी साढ़े साती को पार करना बहुत भाग्य वाले को ही नसीब होता है। आरोग्य प्राप्ति, सुख शांति एवं समृद्धि के लिए शनि देव की पूजा करने से अशुभ प्रभाव नष्ट हो जाता है। शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से 21 शनिवार या कार्य पूर्ति न होने तक व्रत करें। गणेश पूजन करने के उपरान्त शनि देव का अवाह्न करना चाहिए। शनि देव की पूजा काले या नीले पुष्प से करें। शनि यंत्र की स्थापना कर शनि के मंत्रों व बीज मंत्रों से पूजन कर, शनि गायत्री मंत्र, शनि कवच व स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। अपनी श्रद्धा व सामर्थ के अनुसार काला वस्त्र, तिल, तेल, काली उड़द व स्वर्ण का दान करें। अाठ मुखी रूद्राक्ष धारण करें, पूजन करने के बाद काले उड़द की खिचड़ी भोजन एक बार करना चाहिए।
शनि ग्रह पीड़ा निवारक यंत्र :-

ध्यान मंत्र-
ऊँ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रहम्।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि श्नैश्चरम्।।

जप- ॐ शं श्नैश्चरायः नमः।
अथवा – ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः श्नैश्चराय नमः

जप संख्या – 23000

जप माला – रूद्राक्ष।

आसन – काला कम्बल।

दीपक – तिल के तेल का दीपक जलाएं।

जल पात्र – दीपक के साथ स्टील का जलपात्र रखें।

जप के लिए दिशा – पश्चिम की ओर मुख करके बैठें।

हवन करें- शमी की लकड़ी से ।

धारण करें – बिछुआ की जड़।

लाल किताब से शनि के उपचारः-

जिसके जन्मांग में चतुर्थ स्थान में शनि हो ऐसा जातक काले सांप को दूध पिलाये। भैंसे को चारा डालें। मजदूरों को भोजन खिलायें। आर्थिक अड़चन हमेशा रहती हो तो थोड़ा दूध कुएं में डालें। चतुर्थ स्थान में शनि हो तो ऐसा जातक रात को दूध न पिये दूध विषाक्त होकर शनि के द्वारा अधिक कष्ट पहुंचाता है

षष्ठ स्थान में शनि गुरु दोनों हों तो नारियल पानी में बहायें। ऐसी ग्रह स्थिति 28 वर्ष की उमर से पूर्व ही जातक का विवाह करायें। और 48 उम्र तक मकान न बनायें। संतति होने में बाधा हो तो काले सांप को दूध पिलायें और पूजा करें।

सप्तम स्थान में शनि हो, ऐसा जातक यदि मद्यपान करे तो यह मद्यपान तुरन्त बंद कर दें, अन्यथा उसका सर्वनाश कोई रोक नहीं सकता। कम से कम तीन सौ ग्राम हल्दी चालू कुएं में गुरुवार को डालें।

अष्टम स्थान में शनि हो एवं द्वितीय स्थान में अन्य कोई ग्रह न हो तो, जातक ब्याज का धंधा, कारखाना, छापाखाना, प्रिंटिंग प्रेस, तेल का व्यापार, लोहे की चीजों का व्यापार, वकालत, चमड़ा, पेट्रोल, आॅयल, मोबाइल, ग्रीस बेचने का व्यापार चुने। व्यापार से पूर्व एक मिट्टी के मटके में राई का तेल भरकर काले कपड़े से मुंह बंद करके तालाब या नदी में प्रवाहित करें। उसके बाद कृष्ण पक्ष के मध्य रात्रि में व्यवसाय का शुभ आरंभ करें। काफी धन मिलेगा।

एकादश स्थान में शनि एवं सप्तम स्थान में शुक्र हो तो ऐसा जातक बहुत ही भाग्यवान होता है। किसी भी कार्यारम्भ के पूर्व पानी से भरा घड़ा दान करें। हर शनिवार को पानी में काली हल्दी डाल कर उस पानी से स्नान करें।

जन्म कुण्डली में शनि शुभ हो, या अधिक शुभ हो तो घर में लोहे का फर्नीचर इस्तेमाल करें। भोजन में काला नमक एवं काली मिर्च का प्रयोग करें आखों में काजल या सुरमा डालें

अनिष्ट शनि की पीड़ा दूर करने के लिए एवं शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या का कष्ट निवारण के लिए भोजन के पूर्व भोजन में सब चीजें थोड़ी-थोड़ी अलग निकाल कर कौआ को खिलाओ

अनिष्ट शनि की पीड़ा दूर करने के लिए राई या तिल का तेल दान करें। शनि संतान की दृष्टि से बाधक होता हो तो, गर्भपात होता है तो, ऐसी स्त्री भोजन की थाली में से भोजन के पूर्व सब चीजें थोड़ी-थोड़ी अलग निकाल कर काले कुत्ते को खिलाये।

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चैत्र नवरात्रि 2018, कलश स्थापन मुहूर्त

घट स्थापना मुहूर्त 18 मार्च 2018 (दिल्ली, एन. सी. आर.) :-

Dr.R.B.Dhawan

प्रातः 09-30 से दिन 11-00 तक लाभ एवं 11:00 से 12:29 तक अमृत की चौघडीया में तथा दिन 12:05 से 12:53 तक अभिजीत वेला में घट स्थापना विशेष पुण्यदायक माना गया है। लाभ की चौघडीया एवं अमृत की चौघड़ीया में कलश (घट) स्थापना करना शुभ एवं श्रीकर है।

नवरात्र में कलश स्थापना

नवरात्रि में कलश स्थापना का भी एक विधि-विधान होता है :-

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इस वर्ष :- चैत्र नवरात्र 2018, मार्च में 18 तारीख से आरम्भ हो रहे हैं। सनातन मत अनुसार चैत्र या शरद् दोनों नवरात्र के प्रथम दिन अर्थात् शुक्ल प्रतिपदा (प्रथम नवरात्र) के दिन सर्वप्रथम कलश स्थापना की जाती है।

कलश स्थापना का भी एक विधि-विधान होता है। यदि कोई परिवार इस विधि को नहीं जानता तो, नवरात्रों में किसी विद्वान पुजारी को बुलाकर भी स्थापना करवा सकते हैं। 9 दिन के इस शक्ति पर्व नवरात्रो में दुर्गा माँ के नव रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्र के आरंभ में प्रतिपदा तिथि को उत्तम मुहर्त में कलश की स्थापना की जाती है। कलश को भगवान गणेश का रूप माना गया है जो की किसी भी पूजा में प्रथम पूजनीय हैं, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित भविष्य पुराण में बताया गया है की कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को साफ-सुथरा करके शुद्ध किया जाना चाहिए। उसके उपरान्त एक लकड़ी का पाटे पर लाल कपडा बिछाकर उस पर थोड़े अक्षत् (चावल) गणेश भगवान को याद करते हुए रखने चाहिए, फिर जिस जगह कलश को स्थापित करना है, उस जगह बालु मिश्रित मिट्टी रख कर उसमे जौ बो देने चाहियें, फिर इसी मिट्टी पर कलश स्थापना करनी चाहिए। कलश में पवित्र (शुद्ध) जल भरकर रोली से स्वास्तिक और ॐ बनाकर कलश के मुख पर मोली से रक्षा सूत्र बांध दें, कलश में सुपारी, और एक सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रख दें, और फिर कलश के मुख को ढक्कन से ढक देना चाहिए। ढक्कन को चावल से भर दें, ढक्कन के ऊपर या पास में ही एक नारियल लाल चुनरी से लपेटकर रक्षा सूत्र से बांध देना चाहिए। इस नारियल को कलश के ढक्कन रखते समय सभी देवी देवताओं का आवाहन करें, और अंत में दीपक जलाकर कलश की पूजा करें। अंत में कलश पर फूल और मिठाइयां चढ़ा दे। इस प्रकार हर दिन नवरात्रों में इस कलश की पूजा करें।

किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य के लिए देव पूजा में साधक द्वारा पूजा सामग्री के साथ-साथ अन्य कई वस्तुओं का उपयोग भी किया जाता है। जैसे-जल, पुष्प, दीपक, घंटी, शंख, आसन, कलश आदि, जिनका अलग-अलग एक विशिष्ट महत्व एवं प्रतीकात्मक अर्थ होता है। इनमें कलश या कुंभ की भारतीय संस्कृति में एक कल्पना की गई है। कुंभ को समस्त, ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना गया है, क्योंकि ब्रह्माण्ड या आकाश भी घट के समान है। इसको इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि घट में समस्त सृष्टि का समावेश है। इसी में सभी देवी-देवता, नदी-पर्वत, तीर्थ आदि उपस्थित रहते हैं-

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रूद्रः समाश्रितः। मूले तवस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।। कुक्षौ तु सागराः सर्वे, सप्तद्वीपाः वसुन्धरा।

ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः।।
अंगैश्च सहिताः सर्वे कलशन्तु समाश्रिताः।
अत्र गायत्री सावित्री, शांति-पुष्टिकरी सदा।।
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि, त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः।
शिवः स्वयं त्वमेवासि, विष्णुस्तवं च प्रजापतिः।।
आदित्या वसवो रूद्रा, विश्वेदेवाः सपैतृकाः।
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि, यतः कामफलप्रदा।।
त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं, कर्तुमीहे जलोद्भव।
सान्निध्यं कुरू मे देव! प्रसन्नो भव सर्वदा।।

अतः नवरात्र के अतिरिक्त भी (किसी भी) पूजा, पर्व व संस्कार में सबसे पहले कलश स्थापना करने का विधान है। कलश स्थापना तथा पूजन के बिना कोई भी मंगल कार्य प्रारंभ नहीं किया जाता है। कलश स्थापना का भी एक विधान है। इसे पूजा स्थल पर ईशान कोण में स्थापित किया जाना चाहिए। प्रायः कलश ताम्बे का ही सर्वोत्तम माना गया है। यदि यह उपलब्ध न हो तो मिट्टी का भी प्रयोग में लिया जा सकता है। सोने व चांदी का भी कलश प्रयोग में ले सकते हैं। शास्त्रों में कलश कितना बडा या छोटा हो इसका भी वर्णन मिलता है। मध्य में पचास अंगुल चौडा और सोलह अंगुल ऊंचा, नीचे बारह अंगुल चौडा और ऊपर से आठ अंगुल का मुख रखें तो यह कलश सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सामान्यता कलश को जल से भरा जाता है, परन्तु विशेष प्रयोजन में किए जाने वाले अनुष्ठानों में विशेष वस्तुए भी रखे जाने का विधान है:-

धर्म लाभ हेतु अनुष्ठान किया जा रहा हो तो कलश में जल के स्थान में यज्ञ भस्म का प्रयोग होता है। धन के लाभ हेतु मोती व कमल का प्रयोग करते है, विषय भोग हेतु गोरोचन, मोक्ष हेतु वस्त्र, युद्ध अथवा मुकदमें में विजय के लिए अपराजिता का प्रयोग करते हैं। किसी का उच्चाटन करना हो तो व्याघ्री (छोटी कटेरी), वशीकरण के लिए मोर पंखी, मारण हेतु काली मिर्च तथा आकर्षण करने हेतु धतूरा भरने का विधान है।

कलश को भूमि पर नहीं रखना चाहिए। इसको रखने से पूर्व भूमि की शुद्धि करना आवश्यक है। फिर बिन्दू षटकोण अष्टदल आदि बना कर उसके ऊपर कलश की स्थापना करनी चाहिये अथवा इसे धान्य (जौ) के ऊपर भी रखा जा सकता है। कलश उपरोक्त में से किसी भी पदार्थ से भरकर विभिन्न देवताओं का कलश में आवाहन किया जाता है। इसके पश्चात प्रधान देवता (जिसकी आराधना या अनुष्ठान किया जाना है) का आवाहन किया जाता है। साथ ही नवग्रहों एवं पितरों की स्थापना की जाती है, तत्पश्चात ही मांगलिक कार्य का शुभारम्भ किया जाता है।

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नवरात्रि पूजा

नवरात्र पूजा और कलश स्थापना

Dr.R.B.Dhawan

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नवरात्र के 9 दिनों में नवदुर्गा की आराधना पूजा की जाती है। नवरात्र चाहे चैत्र के हों, या आषाढ़, अथवा आश्विन तथा माघ के हों, इन चार नवरात्रि (दो प्रत्यक्ष – चैत्र और आश्विन तथा दो गुप्त नवरात्र – आषाढ़ तथा माघ) महिनों में आते हैं। चैत्र नवरात्र के समय देवशयन तथा आश्विन नवरात्र के समय देव बोधन कहा गया है। आश्विन माह शुक्ल पक्ष में प्रथम 9 दिनों में पड़नें वाले नवरात्र शारदीय नवरात्रि भी कहलाते हैं। सभी नवरात्रि का अपना-अपना विशेष महत्व है। दुर्गा पूजा का वार्षिकोत्सव शारदीय नवरात्र में सम्पन्न किया जाता है। शास्त्रों में नवरात्र की विशेष महिमा बताई गई है। चैत्र और आश्विन मास शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तक (जो नवदुर्गा का समय है) यह समय साधना उपासना द्वारा शक्ति का संचय करने के लिए सबसे उत्तम समय है। नवरात्र नव शक्तियों से संयुक्त हैं, इस की एक-एक तिथि को एक-एक शक्ति के पूजन का विधान है। मार्कण्डेय पुराण में इन शक्तियों का नाम इस प्रकार बताया गया है :-

प्रथमं शैलपुत्रीति, द्वितीयं ब्रह्मचारिणी, तृतीयं चन्द्र-घण्टेति कुष्माणडेति चतुर्थकम् । पंचमम् स्कन्द मातेति, षष्ठं कात्यायनी तथा, सप्तम कालरात्रिति महागौरी चाष्टमम्।। नवमं सिद्धिदात्रिति नव दुर्गाः प्रर्कीर्तिताः।

सनातन मत के प्राचीन शास्त्रों के अनुसार दुर्गा देवी नौ रूपों में प्रकट हुई हैं। उन सब रूपों की अलग-अलग कथा इस प्रकार है :-
1. महाकाली- एक बार पूरा संसार प्रलय ग्रस्त हो गया था। चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देता था। उस समय ‘भगवान विष्णु’ की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ उस कमल में से ‘ब्रह्मा जी’ प्रकट हुए इसके अतिरिक्त भगवान नारायण के कानों से कुछ मैल भी निकला, उस मैल से कैटभ और मधु नाम के दो दैत्य उत्पन्न हुये। जब उन दोनों दैत्यों ने इधर-उधर देखा तो ब्रह्माजी के अलावा उन्हें कोई नहीं दिखाई दिया, तब ब्रह्माजी को देखकर वे दैत्य उनको मारने दौड़े। उस समय भयभीत ब्रह्माजी ने विष्णु भगवान की स्तुति की, स्तुति से विष्णु भगवान की आँखों में जो महामाया योग निद्रा के रूप में निवास करती थी वह लोप हो गई और विष्णु भगवान की नींद खुल गई उनके जागते ही दोनों दैत्य भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे और पांच हजार वर्ष तक युद्ध चलता रहा, अंत में भगवान विष्णु की रक्षा के लिए महामाया ने असुरों की बुद्धि को परिवर्तित कर दिया। जब असुरों तथा देवताओं का युद्ध हुआ, तब असुर विष्णु भगवान से बोले, ‘‘हम आपके युद्ध से प्रसन्न हैं, जो चाहो वर मांग लो’’ भगवान ने मौका पाया और कहने लगे, ‘‘यदि हमें वर देना है तो यह वर दो कि दैत्यों का नाष हो।’’ दैत्यों ने कहा ‘‘ऐसा ही होगा’’ ऐसा कहते ही दैत्यों का नाश हो गया। जिसने असुरों की बुद्धि को बदला था वह ‘महाकाली’ थीं।

2. महालक्ष्मी- एक समय में महिषासुर नाम का दैत्य हुआ। उसने पृथ्वी और पाताल पर अपना अधिकार जमा लिया। तो देवता भी उस युद्ध में पराजित होकर भागने लगे। वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उस दैत्य से बचने के लिए भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। देवताओं की स्तुति से भगवान विष्णु और शंकर जी प्रसन्न हुए, तब उनके शरीर से एक तेज निकला, जिसने महालक्ष्मी जी का रूप धारण किया। इन्हीं महालक्ष्मी जी ने महिषासुर को युद्ध में मारकर देवताओं के कष्ट को दूर किया।

3. चामुण्डा- एक समय था जब शुम्भ-निषुम्भ नाम के दो दैत्य बहुत बलशाली हुए थे, उनसे युद्ध में देवता हार मान गए जब देवताओं ने देखा कि अब युद्ध नहीं जीता जा सकता तब वह स्वर्ग छोड़कर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे उस समय भगवान विष्णु के शरीर से एक ज्योति प्रकट हुई जो कि ‘महासरस्वती’ या ‘चामुण्डा’ थी। महासरस्वती अत्यन्त रूपवान थी, उनका रूप देख कर दैत्य मुग्ध हो गए और अपनी इच्छा प्रकट करने के लिए अपना दूत उस देवी के पास भेजा, उस दूत को देवी ने वापिस कर दिया। इसके पश्चात् बाद उन दोनों ने अपने सेनापति धूम्राक्ष को सेना सहित भेजा, जो देवी द्वारा सेना सहित मार दिया गया और फिर चण्ड-मुण्ड लड़ने आए और वह भी मार दिए गये इसके पश्चात् रक्तबीज आया जिसके रक्त की बूँद जमीन पर गिरने से एक और रक्तबीज पैदा होता था, उसे भी देवी ने मार दिया। अन्त में शुम्भ-निषुम्भ स्वयं लड़ने आये और देवी के हाथों मारे गए। सभी देवता दैत्यों की मृत्यु से प्रसन्न हुए।

4. योगमाया – जब कंस ने वासुदेव-देवकी के छः पुत्रों का वध कर दिया था और सातवें गर्भ में शेषनाग बलराम जी आये, जो रोहिणी के गर्भ में प्रविष्ट होकर प्रकट हुए। तब आठवाँ जन्म श्री कृष्ण जी का हुआ। साथ ही साथ गोकुल में यशोदा जी के गर्भ में योगमाया का जन्म हुआ जो वासुदेव जी के द्वारा कृष्ण के बदले मथुरा लाई गई। जब कंस ने कन्या स्वरूप उस योगमाया को मारने के लिए पटकना चाहा, तब वह हाथ से छूट आकाश में चली गई आकाश में जाकर उसने देवी का रूप धारण कर लिया। आगे चलकर इसी योगमाया ने श्री कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बन कर कंस, चाणूर आदि शक्तिशाली असुरों का संहार करवाया।

5. रक्त दन्तिका – एक बार वैप्रचित्ति नाम के असुर ने बहुत से कुकर्म करके देव तथा मानवों को आतंकित कर दिया। देवताओं और पृथ्वी की प्रार्थना पर उस समय दुर्गा देवी ने रक्तदन्तिका नाम से अवतार लिया और वैप्रचित्ति आदि असुरों का मान मर्दन कर डाला। यह देवी असुरों को मारकर उनका रक्तपान किया करती थी, इस कारण से इनका नाम ‘‘रक्तदन्तिका’’ हुआ।

6. शाकुम्भरी देवी – एक समय पृथ्वी पर लगातार सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, जिसके के कारण चारों ओर हा-हाकार मच गयी, सभी जीव भूख और प्यास से व्याकुल हो मरने लगे। उस समय मुनियों ने मिलकर देवी भगवती की उपासना की, तब जगदम्बा ने ‘‘शाकुम्भरी’’ नाम से स्त्री रूप में अवतार लिया और उनकी कृपा से जल की वर्षा हुई जिससे पृथ्वी के समस्त जीवों को नया जीवन प्राप्त हुआ।

7. श्री दुर्गा जी – एक समय धरती पर दुर्गम नाम का राक्षस हुआ, उसके अत्याचार से पृथ्वी ही नहीं, स्वर्ग और पाताल के निवासी भी भयभीत रहते थे। ऐसे समय भगवान की शक्ति ने दुर्गा या दुर्गसेनी के नाम से अवतार लिया और दुर्गम राक्षस को मारकर ब्राह्मणों और भक्तों की रक्षा की। दुर्गम राक्षस को मारने के कारण ही इनका नाम ‘‘दुर्गा देवी’’ प्रसिद्ध हुआ।

8. भ्रामरी देवी – एक बार महा अत्याचारी अरूण नाम का एक असुर पैदा हुआ, उसने स्वर्ग में जाकर उपद्रव करना शुरू कर दिया, देवताओं की पत्नियों का सतीत्व नष्ट करने की कुचेष्टा करने लगा, अपने सतीत्व की रक्षा के लिए देव-पत्नियों ने भौरों का रूप धारण कर लिया और दुर्गा देवी की प्रार्थना करने लगीं। देव पत्नियों को दुःखी देखकर माँ दुर्गा ने ‘‘भ्रामरी’’ का रूप धारण कर उन असुरों का उनकी सेना सहित संहार किया और देव-पत्नियों के सतीत्व की रक्षा की।

9. चण्डिका देवी – एक बार पृथ्वी पर चण्ड-मुण्ड नाम के दो राक्षस पैदा हुए, वे दोनों इतने बलवान थे कि पृथ्वी पर अपना राज्य फैला, देवताओं को हराकर स्वर्ग पर भी अपना अधिकार जमा लिया। तब देवता बहुत दुःखी हुए और देवी की स्तुति करने लगे, देवी ‘‘चण्डिका’’ के रूप में अवतरित हुई और चण्ड-मुण्ड नामक राक्षसों को मारकर संसार का दुःख दूर किया। देवताओं का स्वर्ग पुनः उन्हें प्राप्त हुआ। इस प्रकार चारों और प्रसन्नता का वातावरण छा गया।

नवरात्र की महिमा :-
चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक नवरात्र व्रत होता है। नवरात्र मुख्य रूप से दो होते हैं- वासन्तिक और शारदीय। वासन्तिक में विष्णु की उपासना की प्राधानता रहती है, और शारदीय में शक्ति की उपासना का। वस्तुतः दोनों नवरात्र मुख्य एवं व्यापक हैं, और दोनों में दोनों की उपासना उचित है। इस उपासना में वर्ण, जाति का वैशिष्ट्य अपेक्षित नहीं है, अतः सभी वर्ण एवं जाति के लोग अपने इष्टदेव की उपासना करते हैं। देवी की उपासना व्यापक है। दुर्गा पूजक प्रतिपदा से नवमी तक व्रत रहते हैं। कुछ लोग अन्न त्याग देते हैं। कुछ एक भुक्त रहकर शक्ति उपासना करते हैं। कुछ ‘श्री दुर्गा सप्तशती’ का सकाम या निष्काम भाव से पाठ करते हैं। संयत रहकर पाठ करना आवश्यक है, अतः यम-नियम का पालन करते हुए भगवती दुर्गा की आराधना या पाठ करना चाहिये। नवरात्र व्रत का अनुष्ठान करने वाले जितने संयत, नियमित, अन्तर्बाह्य शुद्धि रखेंगे उतनी ही मात्रा में उन्हें सफलता मिलेगी, यह निःसंदिग्ध है।

प्रतिपदा से नवरात्र प्रारम्भ होता है। प्रारम्भ करते समय यदि चित्रा और वैधृतियोग हो तो उनकी समाप्ति होने के बाद व्रत प्रारम्भ करना चाहिये, परंतु देवी का आवाह्न, स्थापन और विसर्जन-ये तीनों प्रातःकाल में होने चाहिये। अतः यदि चित्रा, वैधृति अधिक समय तक हों तो उसी दिन अभिजित् मुहूर्त (दिन के आठवें मुहूर्त यानी दोपहर के एक घड़ी पहले से एक घड़ी बाद तक के समय) में आरम्भ करना चाहिये।

आरम्भिक कर्तव्य- आरम्भ में पवित्र स्थान की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूँ बोयें। फिर उनके ऊपर अपनी शक्ति के अनुसार बनवाये गये सोने, ताँबे आदि अथवा मिट्टी के कलश को विधिपूर्वक स्थापित करें। कलश के ऊपर सोना, चाँदी, ताँबा, मृत्तिका, पाषाण अथवा चित्रमयी मूर्ति की प्रतिष्ठा करें। मूर्ति यदि कच्ची मिट्टी, कागज या सिंदूर आदि से बनी हो और स्नानादि से उसमें विकृति होने की आशंका हो तो उसके ऊपर शीशा लगा दें। मूर्ति न हो तो कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके दोनों पार्शवों में त्रिशूल बनाकर दुर्गाजी का चित्र पुस्तक तथा शालिग्राम को विराजित कर विष्णु पूजन करें।

नवरात्र व्रत के आरम्भ में स्वस्तिवाचन-शान्ति पाठ करके संकल्प करें और तब सर्वप्रथम गणपति की पूजा कर मातृका, लोकपाल नवग्रह एवं वरूण का सविधि पूजन करें। फिर प्रधान मूर्ति का षोडशोपचार पूजन करना चाहिये। अपने इष्टदेव-राम, कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण या भगवती दुर्गादेवी आदि की मूर्ति ही प्रधानमूर्ति कही जाती है। पूजन वेद-विधि या सम्प्रदाय-निर्दिष्ट विधि से होना चाहिये। दुर्गा देवी की आराधना अनुष्ठान में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन तथा मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत निहित ‘श्रीदुर्गा सप्तशती’ का पाठ मुख्य अनुष्ठेय कर्तव्य है।

पाठ विधि:-

‘श्रीदुर्गासप्तशती’ पुस्तक का – नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्।।

इस मंत्र से पंचोपचार पूजन कर यथाविधि पाठ करें, देवी व्रत में कुमारी-पूजन परम आवश्यक माना गया है। सामर्थ्य हो तो, नवरात्र भर प्रतिदिन, अन्यथा समाप्ति के दिन सौ कुमारियों के चरण धोकर उन्हें देवीरूप मानकर गंध-पुष्पादि से अर्चन कर आदर के साथ यथारूचि मिष्टान्न भोजन कराना चाहिये एवं वस्त्रादि से सत्कृत करना चाहिये।

शास्त्रों में वर्णित है कि एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य की, दो की पूजा से भोग और मोक्ष की, तीन की अर्चना से धर्म, अर्थ, काम-त्रिवर्ग की, चार की अर्चना से राज्य पद की, पाँच की पूजा से विद्या की, छः की पूजा से षट्कर्म सिद्धि की, सात की पूजा से राज्य की, आठ की अचर्ना से सम्पदा की और नौ कुमारी कन्याओं की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।

कुमारी-पूजन में दस वर्ष तक की कन्याओं का अर्चन विहित है। दस वर्ष से ऊपर की आयु वाली कन्या का पूजन वर्जित किया गया है। दो वर्ष की कन्या कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्तिनी, चार वर्ष की कल्याणी, पाँच वर्ष की रोहिणी, छः वर्ष की काली, सात वर्ष की चण्डिका, आठ वर्ष की शाम्भवी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष वाली सुभद्रा-स्वरूपा होती है।

दुर्गा-पूजा में प्रतिदिन का वैशिष्ट्य रहना चाहिये। प्रतिपदा को केश संस्कारक द्रव्य – आँवला, सुगन्धित तैल आदि केश प्रसाधन संभार, द्वितीया को बाल बाँधने-गूँथने वाले रेशमी सूत, फीते आदि, तृतीया को सिंदूर और दर्पण आदि, चतुर्थी को मधुपर्क, तिलक और नेत्राजंन, पंचमी को अंगराग-चंदनादि एवं आभूषण, षष्ठी को पुष्प तथा पुष्पमालादि समर्पित करें। सप्तमी को गृह मध्य पूजा, अष्टमी को उपवास पूर्वक पूजन, नवमी को महापूजा और कुमारी पूजा करें। दशमी को पूजन के अनन्तर पाठकर्ता की पूजा कर दक्षिणा दें एवं आरती के बाद विसर्जन करें। श्रवण-नक्षत्र में विसर्जनांग पूजन प्रशस्त कहा गया है। दशमांश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण-भोजन कराकर व्रत की समाप्ति करें।

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विवाह और ज्योतिष

ज्योतिष शास्त्र में पति ओर पत्नी का महत्व :-

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विवाह मानव जीवन का एक प्रमुख संस्कार है। विवाह के बाद एक युवक ओर युवती को आजीवन एक साथ रहना होता है। शास्त्रों में पत्नी को “अर्द्धांगिनी” कहा गया है । पति का दुःख ओर सुख पत्नी का भी दु:ख, सुख होता है, क्यों की विवाह के बाद दोनों का भाग्य एक दूसरे से जुड जाता है। कई बार देखने में आया है कि, पति कि कुण्डली में राजयोग नहीं हो ओर पत्नी कि कुण्डली में राजयोग हो तो, पत्नी के राजयोग का सुख पति को मिलता है। पति कि कुण्डली में राजयोग हो ओर पत्नी कि कुण्डली में ना हो, तथा दरिद्रता के योग बने हुये हो तो, पति कि कुण्डली का राजयोग अपना प्रभाव नहीं दिखाता है। तथा विवाह के बाद व्यक्ति कि अवनति होने लगति लगति है । क्यों कि पत्नी “अर्द्धांगिनी” है ।

पति ओर पत्नी में प्रमुख स्थान पति का है । पत्नी के लिये पति ही परमेश्वर है, लेकिन पति के लिये पत्नी परमेश्वरी नहीं है। बल्कि घर की लक्ष्मी बनती है। पत्नी को गृहलक्ष्मी इसलिये ही कहा गया है । क्यों कि विवाह के बाद पत्नी का 100% भाग्य पति से ही जुड जाता है । ज्योतिष शास्त्र में अनेक स्थान पर “स्त्री सुख” के योग बताये गये हैं। लेकिन “पति सुख” नाम का कोई योग कहीं नहीं है । स्त्री का जब पुरूष के जीवन में प्रवेश होता है, तब पुरूष के जीवन में बहुत तेजी से आश्चर्यजनक परिवर्तन होते हैं, यह स्त्री दोस्त, प्रेमिका, ओर पत्नी इन तीन रूपों में पुरूष के भाग्य को प्रभावित करती है । लेकिन पुरूष का भाग्य पत्नी के भाग्य को प्रभावित नहीं करता है । क्यों कि पति को पत्नी कि प्राप्ति भाग्य से ही होती है । इस के पीछे पौराणिक सिद्धांत यह है कि, पत्नी पति को दान में मिलती है । शास्त्रों में पत्नी को गृहलक्ष्मी तो कहा है, लेकिन पुरूष को नारायण नहीं कहा गया। (वेसे तो यह सारा संसार ही नारायण स्वरूप है, परंतु यहाँ चर्चा केवल पति ओर पत्नी कि है) उपरोक्त बातों का सार यही है कि, पत्नी का भाग्य पति को प्रभावित करता है, लेकिन पति का भाग्य पत्नी को प्रभावित नहीं करता है। कन्या के भाग्य में अगर राजयोग है, ओर उसका विवाह किसी दरिद्र से भी कर दिया जाये तो, वह दरिद्र 100% पत्नी के राजयोग का सुख भोगेगा, क्यों कि वह पति के लिये लक्ष्मी बनकर आई है, और यदि पत्नी कि कुण्डली में दु:ख लिखा है तो, वह राजा के घर में जाकर भी सुख नहीं भोग पायेगी। हमने बहुत बार देखा है :–

1. कन्या कि सगाई लडके से होते ही लडके का भाग्योदय होते हुए देखा है ।
2. विवाह के 1-2 दिन बाद ही पति कि मृत्यु भी देखी है ।
3. कन्या कि सगाई लडके से होते ही लडके को राजकीय नौकरी मिलते भी देखा है ।
4. विवाह के बाद पति के पतन ओर उन्नति दोनों को देखा है ।
या तो पति कि लाइफ बन जाती है, या खराब हो जाती है ।
अगर दोनों कि कुण्डली में साधारण ही योग हों तो दोनों साधारण स्तर का जीवन व्यतीत करते हैं।

पत्नी अगर धन कमाने में सक्षम मिलति है तो, पत्नी का कमाया हुआ सारा धन पति के ही काम आता है । अगर पत्नी एकाधिकार जमाये तो रिश्ता खराब हो जायेगा । पति का स्वयं के धन से केवल पत्नी कि जरूरतों को पूरा करता है । पति के बिना पत्नी का कोई अस्तित्व नहीं है, लेकिन पत्नी के बिना पति पर कोई विशेष फर्क नहीं पडता है । क्यों कि प्राचीन समाज में विधवा स्त्री को हेय कि दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन विधुर पुरूष को दूसरा विवाह करने का अधिकार था । पत्नी के लिये पति ही परमेश्वर है, ओर जहाँ जहाँ पत्नी ने परमेश्वरी बनने का प्रयत्न अर्थात स्वयं को पति से श्रेष्ठ साबित करने का प्रयत्न किया है, उस स्थान कि सुख-शान्ति, चैन छिनकर उस कुल का विनाश हुआ है, ओर इसी प्रकार जब जब पति ने निर्दोष पत्नी पर अत्याचार किया है, तब तब पति कि दुर्गति होकर वह निर्धनता को प्राप्त हुआ है। तथा जिवित रहते हुए तथा मृत्यु के बाद ऐसा पति घोर नरक कि यातनाओं को भोगता है ।
नोट:– यह उपरोक्त्त विचार लेखक के अपने विचार नहीं हैं, यह पौराणिक विचार हैं।

मंगल और मांगलिक :-

वर या वधु किसी एक की कुंडली में मंगल का सप्तम में होना और दूसरे की कुंडली में 1,4,7,8 या 12 में से किसी एक में मंगल का नहीं होना पति या पत्नी के लिये हानिकारक माना जाता है, उसका कारण होता है कि पति या पत्नी के बीच की दूरिया केवल इसलिये हो जाती हैं क्योंकि पति या पत्नी के परिवार वाले जिसके अन्दर माता या पिता को यह मंगल जलन या गुस्सा देता है, और अक्सर पारिवारिक मामलों के कारण रिस्ते खराब हो जाते हैं, पति की कुंडली में सप्तम भाव मे मंगल होने से पति का झुकाव घर की बजाय बाहर वालो में अधिक होता है, पति के अन्दर अधिक गर्मी के कारण किसी भी प्रकार की जाने वाली बात को धधकते हुये अंगारे की तरह माना जाता है, जिससे पत्नी का ह्रदय बातों को सुनकर विदीर्ण होता है, कभी कभी तो वह मानसिक बीमारी की शिकार हो जाती है, उससे न तो पति को छोडा जा सकता है, और ना ही ग्रहण किया जा सकता है, पति की माता और पिता को अधिक परेशानी हो जाती है, माता को तो कितनी ही बुराइयां पत्नी के अन्दर दिखाई देने लगती है, वह बात बात में पत्नी को ताने मारने लगती है, और घर के अन्दर इतना गृहक्लेश बढ जाता है कि पिता के लिये असहनीय हो जाता है, पत्नी के परिवार वाले सम्पूर्ण जिन्दगी के लिये पत्नी को अपने साथ ले जाते है। पति की दूसरी शादी होती है, और दूसरी शादी का सम्बन्ध अक्सर कुंडली के बारहवें भाव से होने के कारण बारहवें से सप्तम् ‘षष्ठ’ शत्रु भाव होने के कारण दूसरी पत्नी का परिवार पति के लिये चुनौती भरा हो जाता है, और पति के लिये दूसरी पत्नी के परिजनों के द्वारा किये जाने वाले व्यवहार के कारण वह धीरे धीरे अपने कार्यों से अपने व्यवहार से पत्नी से दूरियां बनाना शुरु कर देता है, और एक दिन ऐसा आता है कि, दूसरी पत्नी पति पर उसी तरह से शासन करने लगती है जिस प्रकार से एक नौकर से मालिक व्यवहार करता है, जब भी कोई बात होती है तो पत्नी अपने बच्चों के द्वारा पति को प्रताडित करवाती है, पति को मजबूरी से मंगल की उम्र निकल जाने के कारण सब कुछ सुनना पडता है। यह एक साधारण फलित है। जातक सुख के पीछे भाग दौड़ करता रहता है, ओर सुख आगे आगे भागता रहता है, दोनों का संग ही नही हो पाता, ओर जिन्दगी के सारे मुकाम बीत जाते हैं फिर जातक बुढ़ापे जैसे रोगो की लपेट में आपने आप को जकड़े हुये बेबस ओर लाचार महसूस करते पाया जाता है।

अब कुछ विवाह विलंब के योग :-

1. सप्तमेश वक्री होकर बैठा हो एंव मंगल आठवें भाव में हो तो विवाह विलंब के योग बनते हैं, इस योग में जन्मे जातक का विवाह प्राय: अति विलंब से ही संभव है, अर्थात् विवाह योग्य आयु निकल जाने के बाद ही वैवाहिक कार्य सम्पत्र होता है।

2. लग्न, सांतवां भाव, सप्तमेश व शक्र स्थिर राशि- वृष, सिंह वृश्चिक और कुंभ में स्थित हो तथा चंद्रमा चार राशि- मेष, कर्क, तुला और मकर में हो तो यह योग बनता है। ऐसे जातक का विवाह भी अति विलंब से ही सम्पत्र होता है। यदि उपरोक्त योग का कहीं भी शनि से संबंध बन जाए तो जीवन के पचासवें वसंत व्ययतीत होने के बाद ही जातक का वैवाहिक संयोग बनते हैं।

3. सप्तमेश सप्तम भाव से यदि छठें, आठवें एंव बारहवे स्थान पर हो तो भी विवाह विलंब के योग निर्मित होते है। इस योग में जन्मे जातक का विवाह भी अति विलंब से ही संभव हो पाता है। अर्थात् विवाह योग्य आयु निकल जाने के बाद ही वैवाहिक संयोग निर्मित होते है।

4. सप्तमेश यदि शनि से युक्त होकर बैठा हो या शनि शुक्र के साथ हो या शुक्र द्वारा दृष्ट हो तो यह योग निर्मित होता है। इस योग में जन्मे जातक का विवाह भी पर्याप्त विलंब से संभव होता है। अर्थात विवाह योग्य आयु व्ययतीत होने के बाद ही वैवाहिक संयोग निर्मित होते है।

5. यदि शुक लग्न से चौथे स्थान में तथा चंद्रमा छठे, आठवें और बारहवें स्थान में हो तो यह योग निर्मित होता है। इस योग में जन्मे जातक का विवाह भी पर्याप्त विलंब से ही संभव होता है। अर्थात् विवाह योग्य आयु निकल के बाद ही वैवाहिक कार्य संभव होता है।

6. राहु और शुक्र लग्न में तथ मंगल सातवें स्थान में हो तो यह येाग बनता है। इस योग में जन्मे जातक का विवाह भी विलंब से सम्पत्र होता है। अर्थात् विवाह योग्य आयु निकल के बाद ही जातक वैवाहिक डोर में बंधते हैं।

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रूद्राक्ष धारण के लाभ

Dr.R.B.Dhawan

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जब जब हम रूद्राक्ष के विषय में जानकारी चाहते हैं, तब तब कुछ शंकायें सामने आ खड़ी होती हैं, यह रुद्राक्ष असली है या नकली? रूद्राक्ष की जांच कैसे की जाये?

रूद्राक्ष के विषय में एक मिथक अधिक प्रचलित है :- “असली रूद्राक्ष को जल में डालने से वह डूब जाता है” रूद्राक्ष पानी में डालने पर वह डूब जाये तो असली अन्यथा नकली। वास्तव में यह परीक्षा है ही नहीं, यह परीक्षा मिथ्या है।

1. जो रूद्राक्ष का फल पूरा समय पेड़ पर नहीं रह पाता, पहले ही टूटकर गिर जाता है, एेसे फल की गुठली हल्की रह जाती है, और जो रूद्राक्ष अच्छी प्रकार पक कर गिरता वह रूद्राक्ष का दाना ठोस और भारी और कठोर रूद्राक्ष हो जाता है। इस प्रकार ठोस और भारी दाना पानी में नीचे बैठ जाता है। और जो दाना पूरा नहीं पक पाता वह हल्का रूद्राक्ष पानी में डालने पर तैर जाता है। इसलिए इस प्रक्रिया से रूद्राक्ष के पके या कच्चे होने का पता तो लग सकता है, परंतु असली या नकली होने का नहीं। हां कच्चा दाना हल्का रूद्राक्ष गुणवत्ता में इसलिये भी कमजोर होता है, क्योंकि यह पके दाने की तुलना में कम समय में टूट जाता है, अर्थात् इसकी कठोरता कम होने से इसकी आयु भी लम्बी नहीं होती। जबकि पूरा पका और भारी और कठोर दाना कच्चे दाने की तुलना में कहीं अधिक समय तक चलता है (शीघ्र टूटता नहीं)। इसी लिये इस का मूल्य भी कम पके रूद्राक्षों से दो-तीन गुना तक अधिक होता है। वैसे कम पके या अधिक पके रूद्राक्ष में से किसी को भी धारण किया जाये आध्यात्मिक लाभ दोनो से बराबर ही प्राप्त होता है।

2. तांबे का एक टुकड़ा नीचे रखकर उसके ऊपर रूद्राक्ष रखकर फिर दूसरा तांबे का टुकड़ा रूद्राक्ष के ऊपर रख दिया जाये और एक अंगुली से हल्के से दबाया जाये तो असली रूद्राक्ष नाचने लगता है। यह पहचान हमेशा प्रमाणिक है।

3. शुद्ध सरसों के तेल में रूद्राक्ष को डालकर 10 मिनट तक गर्म किया जाये तो असली रूद्राक्ष अधिक चमकदार हो जायेगा और यदि नकली (लकड़ी से बना रूद्राक्ष) है तो वह धूमिल हो जायेगा, या टूट जायेगा।

4. प्रायः गहरे रंग के रूद्राक्ष को अच्छा माना जाता है, और हल्के रंग वाले को नहीं। वास्तव में रूद्राक्ष का छिलका उतारने के बाद सभी रूद्राक्षों पर रंग चढ़ाया जाता है। बाजार में मिलने वाले रूद्राक्ष की मालाओं को पिरोने के बाद पीले रंग से रंगा जाता है। रंग कम होने से कभी-कभी हल्का रह जाता है। काले और गहरे भूरे रंग के दिखने वाले या फिर घिसे हुये रूद्राक्ष इस्तेमाल किए हुए हो सकते हैं।

5. नेपाली रूद्राक्षों में प्राकृतिक रूप से छेद होता है, नेपाली रूद्राक्ष बहुत शुभ माने जाते हैं। जबकि जावा या इन्डोनेशिया के ज्यादातर रूद्राक्षों में छेद करना पड़ता है। इंडोनेशिया के रूद्राक्षों का प्रभाव नेपाली की तुलना में कम शुभ माना जाता है।

6. नकली रूद्राक्ष के उपर उभरे पठार एकरूप हों तो वह नकली रूद्राक्ष है। असली रूद्राक्ष की उपरी सतह कभी भी एकरूप नहीं होगी। जिस तरह दो मनुष्यों के फिंगरप्रिंट एक जैसे नहीं होते, उसी प्रकार दो रूद्राक्षों के उपरी पठार समान नहीं होते। हां नकली रूद्राक्षों में कितनों के ही उपरी पठार समान होते हैं।

7. कुछ रूद्राक्षों पर शिवलिंग, त्रिशूल या सांप आदी बने होते हैं। यह प्राकृतिक रूप से नहीं बने होते बल्कि कुशल कारीगरी का नमूना होते हैं। अल्प मूल्य वाले रूद्राक्षों पर कलाकारी द्वारा यह आकृतियां बनाई जाती हैं।

8. कभी-कभी दो या तीन रूद्राक्ष प्राकृतिक रूप से जुड़े होते हैं। इन्हें गौरी शंकर रुद्राक्ष या गौरी पाठ रूद्राक्ष कहते हैं। इनका मूल्य काफी अधिक होता है इस कारण इनके नकली होने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है। कुशल कारीगर दो या अधिक रूद्राक्षों को मसाले से चिपकाकर इन्हें गौरी शंकर या गौरी पाठ रूद्राक्ष बना देते हैं।

9. कभी कभी पांच मुखी रूद्राक्ष के चार मुंहों को मसाला से बंद कर एक मुखी कह कर भी बेचा जाता है जिससे इनकी कीमत बहुत बढ़ जाती है। ध्यान से देखने पर मसाला भरा हुआ दिखायी दे जाता है। कभी-कभी पांच मुखी रूद्राक्ष को कुशल कारीगर और धारियां बना अधिक मुख का (7 या 8 मुख का) बना देते हैं। जिससे इनका मूल्य बढ़ जाता है।

10. प्रायः बेर की गुठली पर रंग चढ़ाकर उन्हें असली रूद्राक्ष की माला कहकर बेच दिया जाता है। रूद्राक्ष की मालाओं में बेर की गुठली का उपयोग बहुत किया जाता है।

11. रूद्राक्ष की पहचान का तरीका- एक कटोरे में पानी उबालें। इस उबलते पानी में 45 मिनट के लिए रूद्राक्ष डाल दें। कटोरे को चूल्हे से उतारकर ढक दें। दो चार मिनट बाद ढक्कन हटा कर रूद्राक्ष निकालकर ध्यान से देखें। यदि रूद्राक्ष में जोड़ लगाया होगा तो वह फट जाएगा। दो रूद्राक्षों को चिपकाकर गौरीशंकर रूद्राक्ष बनाया होगा या शिवलिंग, सांप आदी चिपकाए होंगे तो वह अलग हो जाएंगे। जिन रूद्राक्षों में सोल्यूशन भरकर उनके मुख बंद करे होंगे तो उनके मुंह खुल जाएंगे। यदि रूद्राक्ष प्राकृतिक तौर पर फटा होगा तो थोड़ा और फट जाएगा। बेर की गुठली होगी तो नर्म पड़ जाएगी, जबकि असली रूद्राक्ष में अधिक अंतर नहीं पड़ेगा। यदि रूद्राक्ष पर से रंग उतारना हो तो उसे नमक मिले पानी में डालकर गर्म करें उसका रंग हल्का पड़ जाएगा। वैसे रंग करने से रूद्राक्ष की गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पडता है।

रूद्राक्ष कितने मुखी तक मिलते हैं :-

रूद्राक्ष एकमुखी से लेकर सत्ताईस मुखी तक पाए जाते हैं। रूद्राक्ष पर पड़ी धारियों के आधार पर ही इनके मुखों की गणना की जाती है। रूद्राक्ष एकमुखी से लेकर सत्ताईस मुखी तक पाए जाते हैं, जिनके अलग-अलग महत्व व उपयोगिता हैं।

1. एक मुखी रुद्राक्ष:- को साक्षात शिव का रूप माना जाता है। इस एक मुखी रुद्राक्ष द्वारा सुख-शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। तथा भगवान आदित्य का आशिर्वाद भी प्राप्त होता है।

2. दो मुखी रुद्राक्ष:- या द्विमुखी रुद्राक्ष शिव और शक्ति का स्वरुप माना जाता है,वइस अर्धनारीश्व का स्वरूप समाहित है तथा चंद्रमा सी शीतलता प्रदान होती है।

3. तीन मुखी रुद्राक्ष:- को अग्नि देव तथा त्रिदेवों का स्वरुप माना गया है। तीन मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, तथा पापों का शमन होता है।

4. चार मुखी रुद्राक्ष:- ब्रह्म स्वरुप होता है। इसे धारण करने से नर हत्या जैसा जघन्य पाप समाप्त होता है। चतुर्थ मुखी रुद्राक्ष धर्म, अर्थ काम एवं मोक्ष को प्रदान करता है।

5. पांच मुखी रुद्राक्ष:- कालाग्नि रुद्र का स्वरूप माना जाता है। यह पंच ब्रह्म एवं पंच तत्वों का प्रतीक भी है। पांच मुखी को धारण करने से अभक्ष्याभक्ष्य एवं परस्त्रीगमन जैसे पापों से मुक्ति मिलती है। तथा सुखों की प्राप्ति होती है।

6. छह मुखी रुद्राक्ष:- को साक्षात कार्तिकेय का स्वरूप माना गया है। इसे शत्रुंजय रुद्राक्ष भी कहा जाता है, यह ब्रह्म हत्या जैसे पापों से मुक्ति तथा एवं संतान देने वाला होता है।

7. सात मुखी रुद्राक्ष:- या सप्तमुखी रुद्राक्ष दरिद्रता को दूर करने वाला होता है। इस सात मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।

8. आठ मुखी रुद्राक्ष:- को भगवान गणेश जी का स्वरूप माना जाता है। अष्टमुखी रुद्राक्ष राहु के अशुभ प्रभावों से मुक्ति दिलाता है, तथा पापों का क्षय करके मोक्ष देता है।

9. नौ मुखी रुद्राक्ष:- को भैरव का स्वरूप माना जाता है। इसे बाईं भुजा में धारण करने से गर्भहत्या जेसे पाप से मुक्ति मिलती है। नवम मुखी रुद्राक्ष को यम का रूप भी कहते हैं। यह केतु के अशुभ प्रभावों को दूर करता है।

10. दस मुखी रुद्राक्ष:- को भगवान विष्णु का स्वरूप कहा जाता है। दस मुखी रुद्राक्ष शांति एवं सौंदर्य प्रदान करने वाला होता है। इसे धारण करने से समस्त भय समाप्त हो जाते हैं।

11. एकादश मुखी रुद्राक्ष:- साक्षात भगवान शिव का रूप माना जाता है। एकादश मुखी रुद्राक्ष को भगवान हनुमान जी का प्रतीक माना गया है, इसे धारण करने से ज्ञान एवं भक्ति की प्राप्ति होती है।

12. द्वादश मुखी रुद्राक्ष:- बारह आदित्यों का आशीर्वाद प्रदान करता है। इस बारह मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान यह फल प्रदान करता है।

13. तेरह मुखी रुद्राक्ष:- को इंद्र देव का प्रतीक माना गया है इसे धारण करने पर व्यक्ति को समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।

14. चौदह मुखी रुद्राक्ष:- भगवान हनुमान का स्वरूप है। इसे धारण करने से व्यक्ति परमपद को पाता है।

15. पंद्रह मुखी रुद्राक्ष:- पशुपतिनाथ का स्वरूप माना गया है। यह संपूर्ण पापों को नष्ट करने वाला होता है।

16. सोलह मुखी रुद्राक्ष:- विष्णु तथा शिव का स्वरूप माना गया है। यह रोगों से मुक्ति एवं भय को समाप्त करता है।

17. सत्रह मुखी रुद्राक्ष:- राम-सीता का स्वरूप माना गया है, यह रुद्राक्ष विश्वकर्माजी का प्रतीक भी है, इसे धारण करने से व्यक्ति को भूमि का सुख एवं कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने का मार्ग प्राप्त होता है।

18. अठारह मुखी रुद्राक्ष:- को भैरव एवं माता पृथ्वी का स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।

19. उन्नीस मुखी रुद्राक्ष:- नारायण भगवान का स्वरूप माना गया है यह सुख एवं समृद्धि दायक होता है।

20. बीस मुखी रुद्राक्ष:- को जनार्दन स्वरूप माना गया है। इस बीस मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से व्यक्ति को भूत-प्रेत आदि का भय नहीं सताता।

21. इक्कीस मुखी रुद्राक्ष:- रुद्र स्वरूप है, तथा इसमें सभी देवताओं का वास है। इसे धारण करने से व्यक्ति ब्रह्महत्या जैसे पापों से मुक्त हो जाता है।

22. गौरी शंकर रुद्राक्ष:- यह रुद्राक्ष प्राकृतिक रुप से जुडा़ होता है शिव व शक्ति का स्वरूप माना गया है। इस रुद्राक्ष को सर्वसिद्धिदायक एवं मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। गौरी शंकर रुद्राक्ष दांपत्य जीवन में सुख एवं शांति लाता है।

23. गणेश रुद्राक्ष:- इस रुद्राक्ष को भगवान गणेश जी का स्वरुप माना जाता है। इसे धारण करने से ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है। यह रुद्राक्ष विद्या प्रदान करने में लाभकारी है विद्यार्थियों के लिए यह रुद्राक्ष बहुत लाभदायक है।

24. गौरीपाठ रुद्राक्ष:- यह रुद्राक्ष त्रिदेवों का स्वरूप है। इस रुद्राक्ष द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और महेश की कृपा प्राप्त होती है।

राशि के अनुसार रुद्राक्ष धारण :-

1. मेष राशि के स्वामी ग्रह मंगल है, इसलिए ऎसे जातक तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करें ।

2. वृषभ राशि के स्वामी ग्रह शुक्र है । अतः इस राशि के जातकों के लिए छह मुखी रुद्राक्ष फायदेमंद होता है ।

3. मिथुन राशि के स्वामी ग्रह बुध है । इस राशि वालों के लिए चार मुखी रुद्राक्ष है ।

4. कर्क राशि के स्वामी ग्रह चंद्रमा है । इस राशि के लिए दो मुखी रुद्राक्ष लाभकारी है ।

5. सिंह राशि के स्वामी ग्रह सूर्य है । इस राशि के लिए एक या बारह मुखी रुद्राक्ष उपयोगी होगा ।

6. कन्या राशि के स्वामी ग्रह बुध है । इनके लिए चार मुखी रुद्राक्ष लाभदायक है ।

7. तुला राशि के स्वामी ग्रह शुक्र है । इनके लिए छह मुखी रुद्राक्ष व तेरह मुखी रुद्राक्ष उपयोगी होगा ।

8. वृश्चिक राशि के स्वामी ग्रह मंगल है । इनके लिए तीन मुखी रुद्राक्ष लाभदायक होगा ।

9. धनु राशि के स्वामी ग्रह (गुरु )वृहस्पति है। ऎसे जातकों के लिए पांच मुखी रुद्राक्ष उपयोगी है ।

10. मकर राशि के स्वामी ग्रह शनि है । इनके लिए सात या चौदह मुखी रुद्राक्ष उपयोगी होगा ।

11. कुंभ राशि के स्वामी ग्रह शनि है । इनके लिए सात चौदह मुखी रुद्राक्ष लाभदायक होगा ।

12. मीन राशि के स्वामी ग्रह गुरु है । इस राशि के जातकों के लिए पांच मुखी रुद्राक्ष उपयोगी होगा ।

रूद्राक्षों की अधिक जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट देखें :- http://www.shukracharya.com

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धनवान बनाने वाला मंत्र

दरिद्रता को समूल नष्ट करने के लिये श्री स्वर्णाकर्षण भैरव मंत्र :-

Dr.R.B.Dhawan

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श्री भैरव के अनेक रूप व साधनाओं का वर्णन तन्त्रों में वर्णित है। उनमें से एक श्रीस्वर्णाकर्षण भैरव साधना हैं, जो साधक को दरिद्रता से मुक्ति दिलाते हैं। जैसा इनका नाम है, वैसा ही इनके मंत्र का प्रभाव है। अपने भक्तों की दरिद्रता को नष्ट कर उन्हें धन-धान्य सम्पन्न बनाने के कारण ही इनका नाम ‘स्वर्णाकर्षण भैरव’ प्रसिद्ध है।

इनकी साधना विशेष रूप से रात्रि काल में कि जाती हैं। शान्ति-पुष्टि आदि सभी कर्मों में इनकी साधना अत्यन्त सफल सिद्ध होती है। इनके मन्त्र, स्तोत्र, कवच, सहस्रनाम व यन्त्र आदि का व्यापक वर्णन तन्त्रों में मिलता है। यहाँ पर सिर्फ मन्त्र-विधान दिया जा रहा है। ताकि जन -सामान्य लाभान्वित हो सकें।

प्रारंभिक पूजा विधान पूर्ण करने के बाद :-

विनियोग :- ॐअस्य श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव मन्त्रस्य श्रीब्रह्मा ॠषिः, पंक्तिश्छन्दः, हरि-हर ब्रह्मात्मक श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरवो देवता, ह्रीं बीजं, ह्रीं शक्तिः, ऊँ कीलकं, श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव प्रसन्नता प्राप्तये, स्वर्ण-राशि प्राप्तये श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव मन्त्र जपे विनियोगः।

ॠष्यादिन्यास :- ऊँ ब्रह्मा-ॠषये नमः – शिरसि।

ॐ पंक्तिश्छन्दसे नमः -मुखे।

ॐ हरि-हर ब्रह्मात्मक स्वर्णाकर्षण भैरव देवतायै नमः – ह्रदये।

ॐ ह्रीं बीजाय नमः – गुह्ये।

ॐ ह्रीं शक्तये नमः – पादयोः।

ॐ ॐ बीजाय नमः – नाभौ।

ॐ विनियोगाय नमः – सर्वाङ्गे।

करन्यास :– ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं श्रीं आपदुद्धारणाय – अंगुष्टाभ्यां नमः।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं अजामल बद्धाय – तर्जनीभ्यां नमः।

ॐ लोकेश्वराय – मध्यमाभ्यां नमः।

ॐ स्वर्णाकर्षण-भैरवाय नमः – अनामिकाभ्यां नमः।

ॐ मम दारिद्र्य-विद्वेषणाय – कनिष्ठिकाभ्यां नमः।

ॐ महा-भैरवाय नमः श्रीं ह्रीं ऐं – करतल-कर पृष्ठाभ्यां नमः।

ह्रदयादिन्यासः- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं श्रीं आपदुद्धारणाय – ह्रदयाय नमः।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं अजामल-बद्धाय – शिरसे स्वाहा।

ॐ लोकेश्वराय – शिखायै वषट्।

ॐ स्वर्णाकर्षण-भैरवाय – कवचाय हुम्।

ॐ मम दारिद्र्य-विद्वेषणाय – नेत्र-त्रयाय वौषट्।

ॐ महा-भैरवाय नमः श्रीं ह्रीं ऐं – अस्त्राय फट्।

ध्यान-

पारिजात-द्रु-कान्तारे ,स्थिते माणिक्य-मण्डपे।

सिंहासन-गतं ध्यायेद्, भैरवं स्वर्ण – दायिनं।।

गाङ्गेय-पात्रं डमरुं त्रिशूलं ,वरं करैः सन्दधतं त्रिनेत्रम्।

देव्या युतं तप्त-सुवर्ण-वर्णं, स्वर्णाकृतिं भैरवमाश्रयामि।।

ध्यान करने के बाद पञ्चोपचार पूजन कर लें ।

मन्त्र :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं श्रीं आपदुद्धारणाय ह्रां ह्रीं ह्रूं अजामल-बद्धाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण-भैरवाय मम दारिद्र्य-विद्वेषणाय महा-भैरवाय नमः श्रीं ह्रीं ऐं।

जप संख्या व हवन – एक लाख जप करने से उपरोक्त मन्त्र का पुरश्चरण होता है और खीर से दशांश हवन करने तथा दशांश तर्पण और तर्पण का दशांश मार्जन व मार्जन का दशांश ब्राह्मण भोजन करने से यह अनुष्ठान पूर्ण होता है। पुरश्चरण के बाद तीन या पाँच माला प्रतिदिन करने से एक वर्ष में दरिद्रता का निवारण हो जाता है। साथ ही उचित कर्म भी आवश्यक है। (साधना आरभ करने से पूर्व किसी योग्य विद्वान से परामर्श जरूर प्राप्त कर लें।

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सावधान, यह राहु है

राहु ग्रह के कितने रूप :-

Dr.R.B.Dhawan

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राहू और केतु का नाम तो आपने सुना ही होगा। नवग्रह में राहू को क्रूर ग्रह कहा जाता है। शनि की तरह ही राहू भी बेहद परेशान करता है। यदि राहू के उपाय किए जाए तो यह शांति भी प्रदान करता है। लेकिन आज हम आपको राहू के उन रूपों के बारे में जानकारी देंगे, जिन्हें सुनकर आप दंग रह जाएंगे या फिर ये कहें कि इन रूप में आपको राहू परेशान कर सकता है। राहू के अनेकों रूप है। किसी भी जातक पर जब राहू की कुदृष्टि पड़ती है तो पता नहीं चलता कि राहू किस रूप में आपको परेशान करने के लिए आ जाए। इसलिए यदि आपकी कुंडली अथवा राशि में राहू दोष है तो जरा सावधान रहें। राहू आपको किस रूप में मिल सकता है, वह आप इस लेख के द्वारा जान पाएंगे –

सब से पहले तो यह जान लीजिए की आप के हाथ का मोबाइल फोन ही राहु है, यह वह राक्षस ग्रह है जो धीरे धीरे आप और आपके परिवार में परस्पर दूरियां बनाकर आपसी सम्बन्ध बिगाड़ रहा है, न केवल दूरियां बल्कि परिवार में लगाव, मधुर सम्बन्ध और बड़ों से मिलने वाले संस्कार भी धूमिल हो रहे हैं। चाहे वह सम्बंध मां बेटे, मां बेटी, पिता पुत्र या पुत्री, भाई बहन और पति पत्नी के संबंध हों। यदि आपका संयुक्त परिवार है तो आप देखें, आप जब घर पर होते हैं तब, और जब आप फ्री हैं तब भी, दोनों समय आप बहुत बीजी हैं। क्योंकि आपको अपने मोबाइल से ही फुर्सत नहीं है। ऐसे में न तो कोई आपसे अपने मन की बात करने की साहस करेगा और न ही आपको परिवार के दु:ख सुख सुनने की टेंशन होगी। इसके अलावा राहू ससुराल है। राहू वह धमकी है जिससे आपको डर लगता है । जेल में बंद कैदी भी राहू है। राहू सफाई कर्मचारी है। स्टील के बर्तन राहू के अधिकार में आते हैं। बेटी को स्टील के बर्तन अपने मायके से नहीं ले जाने चाहिए । हाथी दान्त की बनी सभी वस्तुए राहू के रूप हैं । राहू वह मित्र है जो पीठ पीछे निंदा करता है ! दत्तक पुत्र भी राहू की देन होता है। नशे की वस्तुएं राहू हैं। दर्द का टीका राहू है। राहू मन का वह क्रोध है जो कई साल के बाद भी शांत नहीं हुआ है, न लिया हुआ बदला भी राहू है। शेयर मार्केट की गिरावट राहू है, उछाल केतु है। बहुत समय से ताला लगा हुआ मकान राहू है। बदनाम वकील भी राहू है। मिलावटी शराब राहू है। राहू वह धन है जिस पर आपका कोई हक़ नहीं है या जिसे अभी तक लौटाया नहीं गया है। ना लौटाया गया उधार भी राहू है। उधार ली गयी सभी वस्तुएं राहू खराब करती हैं। यदि आपकी कुंडली में राहू अच्छा नहीं है तो किसी से कोई चीज़ मुफ्त में न लें क्योंकि हर मुफ्त की चीज़ पर राहू का अधिकार होता है। लेने वाले का राहू और खराब हो जाता है और देने वाले के सर से राहू उतर जाता है।

राहू ग्रह का कुछ पता नहीं कि कब बदल जाए जैसे कि आप कल कुछ काम करने वाले हैं लेकिन समय आने पर आपका मन बदल जाए और आप कुछ और करने लगें तो इस दुविधा में राहू का हाथ होता है। किसी भी प्रकार की अप्रत्याशित घटना का दावेदार राहू ही होता है। आप खुद नहीं जानते की आप आने वाले कुछ घंटों में क्या करने वाले हैं या कहाँ जाने वाले हैं तो इसमें निस्संदेह राहू का आपसे कुछ नाता है। या तो राहू लग्नेश के साथ है या लग्न में ही राहू है।यदि आप जानते हैं की आप झूठ की राह पर हैं परन्तु आपको लगता है की आप सही कर रहे हैं तो यह धारणा आपको देने वाला राहू ही है ! किसी को धोखा देने की प्रवृत्ति राहू पैदा करता है यदि आप पकडे जाएँ तो इसमें भी आपके राहू का दोष है और यह स्थिति बार बार होगी इसलिए राहू का अनुसरण करना बंद करें क्योंकि यह जब बोलता है तो कुछ और सुनाई नहीं देता। जिस तरह कर्ण पिशाचिनी आपको गुप्त बातों की जानकारी देती है उसी तरह यदि राहू आपकी कुंडली में बलवान होगा तो आपको सभी तरह की गुप्त बातें बैठे बिठाए ही पता चल जायेंगी। यदि आपको लगता है की सब कुछ गुप्त है और आपसे कुछ छुपाया जा रहा है या आपके पीठ पीछे बोलने वाले लोग बहुत अधिक हैं तो यह भी राहू की ही करामात है।

राहू रहस्य कारक ग्रह है और तमाम रहस्य की परतें राहू की ही देन होती हैं। राहू वह झूठ है जो बहुत लुभावना लगता है। राहू झूठ का वह रूप है जो झूठ होते हुए भी सच जैसे प्रतीत होता है। राहू कम से कम सत्य तो कभी नहीं है। जो सम्बन्ध असत्य की डोर से बंधे होते हैं या जो सम्बन्ध दिखावे के लिए होते हैं वे राहू के ही बनावटी सत्य हैं। राहू व्यक्ति को झूठ बोलना सिखाता है। बातें छिपाना, बात बदलना, किसी के विशवास को सफलता पूर्वक जीतने की कला राहू के अलावा कोई और ग्रह नहीं दे सकता। राहू वह लालच है जिसमे व्यक्ति को कुछ अच्छा बुरा दिखाई नहीं देता केवल अपना स्वार्थ ही दिखाई देता है। क्यों न हों ताकतवर राहू के लोग सफल? क्यों बुरे लोग तरक्की जल्दी कर लेते है। क्यों झूठ का बोलबाला अधिक होता है और क्यों दिखावे में इतनी जान होती है ? क्योंकि इन सबके पीछे राहू की ताकत रहती है। मांस मदिरा का सेवन, बुरी लत, चालाकी और क्रूरता, अचानक आने वाला गुस्सा, पीठ पीछे की वो बुराई, जो ये काम करे ये सब राहू की विशेषताएं हैं। असलियत को सामने न आने देना ही राहू की खासियत है!

उपाय– यदि आपके जीवन में ये सब बातें हैं तो जाहिर है कि आपका राहु अशुभ है। इसे शुभ करने के लिए Rahu silver yantra locket धारण करें। अथवा “सिद्ध गोमेद लॉकेट” (गुरूजी द्वारा सिद्ध किया हुआ) shukracharya.com पर ऑर्डर करके मंगवा लीजिए। सर्प गायत्री मन्त्र का नित्य जाप करें। शनिवार सन्ध्या के वक्त काले कपड़े में लोहे की कीलें तथा कच्चा कोयला बांध कर बहते जल में बहाएं। किसी मन्दिर या पवित्र जगह पर मूली का दान करें। इन उपायों से राहु के अशुभ फल में कमी होती है।

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ज्योतिष या अंधविश्वास ?

ज्योतिष अंधविश्वास नहीं, विज्ञान है :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

अनेक लोग कुण्डली दिखाते समय प्रश्न करते हैं कि क्या मेरी किस्मत ही खराब है, कब और कैसे अच्छे दिन आयेंगे? अर्थात अच्छे के लिये अच्छी किस्मत या भाग्य का योगदान जरूरी है। दूसरी तरफ बहुत से लोग हैं, जो किस्मत जैसी किसी चीज को स्वीकार ही नहीं करते। और उनका कहना है कि जो कुछ मिलता है, कर्म करने से ही मिलता है। वास्तव में देखा जाए तो दोनों ही बातें सही हैं। एक तरफ कर्म का चक्र चल रहा है, और दूसरी ओर जीवन चक्र। कर्म चक्र वो चक्र है जिसमें मनुष्य कर्म करता है और कर्म का कुछ फल मिल जाता है, और शेष कर्मफल भविष्य काल के लिए संचित हो जाता है, क्योंकि उस समय कर्मफल के लिए उचित समय या वातावरण उपलब्ध नहीं होता। इस लिए भविष्य में जब भी उस कर्मफल को उचित वातावरण मिलता है, उसी समय वह कर्मफल अंकुरित होकर पोधा और फिर वृक्ष बनकर अपना फल देेेने लगता है।

भाग्य या किस्मत क्या है? :- भाग्य का अर्थ यह है, बिना परिश्रम किये सुख के साधन मिलना। भाग्य या किस्मत संचित कर्म से बनता है, कर्म के बाद हर कर्म का फल न भोग पाना इसका कारण है, जीवन चक्र सीमित वर्ष का होता है। मित्रो हम जो भी कर्म करते हैं, प्रकृति उस कर्म की प्रतिक्रिया करती है, इसी को कर्मफल कहते हैं। “क्रिया की प्रतिक्रिया” या कर्म और कर्म का फल एक ही बात है।

इस प्रकार मनुष्य अपने जीवनकाल में कुछ कर्मों का फल इस जीवन तथा शेष कर्मों का फल पुनर्जन्म प्राप्त होने पर ही भोग पाता है।

एक तरफ मनुष्य कर्म करता है, दूसरी ओर भाग्य (कर्मफल) भोगता है। अर्थात् कर्म भी करता चला जाता है, दूसरी और भाग्य का भोग भी भोगता रहता है। इस लिये मनुष्य यदि भाग्य को जानकर कर्म करे तभी हर प्रकार से सफल जीवन व्यतीत कर सकता है।

मेरा अपना विचार है कि चांद तारों से हम और चांद तारे हमसे प्रभावित होते हैं, क्योंकि प्रभाव कभी एक तरफा नहीं होता। सूर्य पर दाग दिखाई पड़ते हैं और तूफान उठते हैं, या धरती पर बीमारियाँ फैलती हैं। विश्वास करो एक छोटा सा तिनका भी सूर्य को या किसी भी ग्रह को प्रभावित करता है और सूर्य भी तिनके को प्रभावित करता है। यहाँ छोटा-बडा कोई नहीं, एक आॅरगनिक यूनिटी है। आप देखें परमाणु है, परमाणु से भी सूक्ष्म कुछ है, उसका एक प्रभाव है। सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा है, अजुड़ा कुछ भी नहीं। हम हर समय एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं, सड़क पर पड़ा हुआ पत्थर भी। हर अणु-परमाणु का एक-दूसरे से पक्का रिश्ता है। इस संयुक्त सृष्टि का बोध यदि हो जाये तभी ज्योतिष और इसका महत्व समझ आ सकता है।

ज्योतिष:- (ज्योति+ईश= ज्योतिष) विज्ञान से बढ़कर पराविज्ञान है, कैसै? आईये मैं बताता हूँ – सभी जानते हैं की ज्योतिष ग्रह-नक्षत्रों की विद्या है। ईसके तीन स्तम्भ (भाग) हैं, प्रथम भाग सिद्धांत जिसे ज्योतिषीय गणना कहा जा सकता है। दूसरा भाग संहिता जिस के सिद्धांत समझकर विद्वान पृथ्वी पर घटने वाली किसी भी भौगोलिक तथा राष्ट्रीय (किसी भी देश या विश्व में घटने वाली राजनैतिक) भविष्यवाणीयां कर सकता है। तीसरा और महत्वपूर्ण भाग “होरा” है, जिसका विशेषज्ञ विद्वान जातक के जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति (जन्मकुण्डली) को देखकर भविष्यवाणी (फलादेश) करता है। जन्मकुण्डली का फलादेश करने वाला विद्वान किसी भी व्यक्ति की कुण्डली देखकर उसके भूत-भविष्य और वर्तमान तीनो काल में घटित तथा घटने वाली घटनाओं का विवरण बता सकता है। केवल इतना ही नहीं इस के गहन अध्ययन व अभ्यास से पूर्व जन्म, वर्तमान तथा पुनर्जन्म के विषय में भी संकेत मिलते हैं।

क्या आज विज्ञान के युग में अभी तक भी ज्योतिष के अतिरिक्त कोई पद्धति है, जो भूत-भविष्य तथा वर्तमान तीन काल की जानकारी देती हो ? आधुनिक विज्ञान केवल भौतिक जगत के बारे में जानकारी दे सकता है। सूक्ष्म जगत में तो इसने अभी प्रवेश ही नहीं किया। जबकी वेदों की इस विद्या (ज्योतिष) के रचनाकार हमारे पूर्वज ऋषियों ने सूक्ष्म जगत में न केवल प्रवेश किया बल्कि सूक्ष्म जगत के करोड़ो रहस्यों को जाना समझा और उनके सिद्धांतों सहित हजारों रहस्यों को ग्रन्थों में लिखकर आगे की पीढियों को लाभान्वित किया है। आत्मा से परमात्मा का सम्बंध, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और विनाश के रहस्य, हर ग्रह-नक्षत्र का मनुष्य या धरती पर पढने वाला प्रभाव, खगोलिक घटनाओं तथा ग्रहणादि के सिद्धांत वेदों के रूप में हमें सौंप गये। वेद की 6 विद्याओं में एक महत्वपूर्ण विद्या ज्योतिष है, यह विद्या भौतिक और सूक्षम (लौकिक-पारलौकिक) दोनों के रहस्य अपने भीतर समेटे हुये है। इसी लिये यह विद्या विज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण (अलौकिक) है।

जैसी इंसान की सोच होती है, उसी तरह उसका नजरिया (दृष्टि) हो जाती है। जैसे- काम भाव दृष्टि, प्रेम दृष्टि, क्रोध की दृष्टि, लोभ दृष्टि, मोह दृष्टि, ईर्ष्या दृष्टि, विद्वेष दृष्टि प्रमाद तथा अहंकार दृष्टि। (उसकी आंखें दूसरे को वैसे ही भाव से देखती हैं, जैसा उस का नजरिया होता है) किसी के नेत्र हमें किस भाव से देख रहे हैं ? यह आसानी से पहचाना जा सकता है। जिन्हें पहचान नहीं होती वे यदि इस के लिये थोड़ा ध्यान (एकाग्रता) या अभ्यास करें तो जरूर पहचान होने लगेगी। यह तो हुई आंखो की भाषा। इस प्रकार मनुष्य किसी के नेत्रों की भाषा को समझ कर (जो उसने समझा) उसके अनुसार वह भी प्रतिक्रिया करता है। यह हुई क्रिया की प्रतिक्रिया। अर्थात् – सोच भी एक कर्म है, और प्रतिक्रिया उस कर्म का फल है। अब प्रश्न यह है, कि इंसान की सोच कैसे बनती है? उसे कौन बनाता है? 1. हालात?, 2. ईश्वर या प्रकृति?, या 3. वह स्वयं? इस पर फिर किसी समय चर्चा करूँगा। सिद्धांत तथा सत्य के अनुसार भूत-प्रेत योनि का अस्तित्व भी है, और वह सक्रिय भी होते हैं। परंतु इतना अवश्य है कि भूत-प्रेतों के नाम से जितनी बातें कही जाती हैं, उनमें सभी बातें सचमुच भूत-प्रेतों की नहीं होती। कुछ काल्पनिक भी होती हैं, और कुछ मनोविकार से ग्रस्त रोगीयों के रोग के कारण होती हैं, कुछ मानसिक दुर्बलताओं के कारण भी होती हैं। कुछ तो ढोंग तथा कुछ भोले-भाले लोगों को ठगने के उद्देेश्य से दिखावा अथवा जादूगरी के खेल के रूप में होती हैं। वस्तुत: चित्त पर पड़ने वाले संस्कार अपने अनुरूप कार्य करने के लिये ललचाते हैं। और ललचा जाने वाला मनुष्य पराधीन बन जाता है।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणेः कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

भावार्थ- वास्तव में हमारे सब प्रकार के कर्म प्राकृतिक गुणों द्वारा किये जाते हैं, परंतु अहंकार से मूढ़ बना मनुष्य मानता है कि मैं ही करता हूँ।

कर्म का सिद्धांत :- सभी जानते हैं- मनुष्य जन्म के बाद (जब से उसे समझ अाती है) से मृत्यु तक “कर्म” करता रहता है। इन्हीं कर्मों को “क्रियमाण कर्म” कहते हैं। अर्थात् मनुष्य के जीवनकाल में जो-जो कर्म किये जाते हैं, वे सभी क्रियमाण कर्म ही कहलाते हैं। यह हुये प्रथम प्रकार के कर्म। द्वितीय प्रकार के कर्म “संचित कर्म” कहलाते हैं, क्रियमाण कर्म जो रोज हुआ करते हैं, में से ही कुछ कर्मों का फल तो भोग लिया जाता है, और शेष प्रतिदिन मन में इकट्ठा होते रहते हैं, इस प्रकार मन रूपी गोदाम में एकत्र हुये कर्मों को संचित कर्म कहा जाता है। जैसे हम प्रतिदिन एक-एक रूपया गोलक में डालते जायें और सालभर के बाद गोलक खोलें तो उसमें जो रूपया निकलेगा वह सब एक वर्ष का संचित धन कहलायेगा। कर्म का एक तीसरा प्रकार “प्रारब्ध कर्म” है, मनुष्य के मन (मस्तिष्क का एक भाग) में अनेक जन्मों के संचित ढेर-के-ढेर कर्म पड़े रहते हैं। मन में जन्म-जन्मांतरों के कर्मों का इतना बड़ा खजाना जमा है कि सृष्टि के अंत तक भी समाप्त नहीं होता। इन्में मनुष्य के जीवनांत में जो कर्म भावी जन्म के लिये परिपक्व हो जाते हैं, उन्हीं कर्मों का फल भोगने के लिये जीव को उसी अनुरूप एक नया जन्म मिलता है। इस प्रकार कालभेद से मनुष्य द्वारा किये जाने वाले कर्म के तीन भेद हुये। 1. क्रियमाण कर्म, 2. संचित कर्म, और 3. प्रारब्ध कर्म। सभी कर्मफल जब तक भोग नहीं लिये जाते तब तक वे नष्ट नहीं होते। वैदिक दर्शनों के अनुसार आत्मा कभी नष्ट नहीं होती, अर्थात्‌- आत्मा अमर है। मनुष्य के शरीर में रहते हुये कर्मबंधन के प्रभाव वश यह परतंत्र, दुःखी, जन्म-मृत्यु एवं जरा (वृद्धावस्था) से युक्त प्रतीत होती है। निष्क्रिय होकर भी आत्मा सक्रिय, स्वतंत्र होते हुये भी परतंत्र, वशी होते हुये भी दुःखदायक भावों से आक्रांत, विभु या सर्वगत होते हुये भी सीमित, तथा निर्विकार होते हुये भी सुख-दुःख आदि विकारों का अनुभव करने लगती है। नित्य शुद्ध और बुद्ध आत्मा को इस स्थिति में लाकर खड़ा करने वाला कारण एकमात्र “कर्मानुबंध” है।किसी कार्य को करने के बाद अनिवार्य रूप से प्राप्त होने वाला परिणाम ही “कर्मानुबंध” है। वस्तुतः आत्मा की स्वतंत्रता या वशित्व केवल कार्य (कर्म) करने में है, परंतु कर्म करने के बाद उसके अपरिहार्य फल से वह अनुबंधित हो जाती है। इसका अर्थ है- कर्म करने या न करने के लिये आत्मा स्वतंत्र है, परंतु कर्म करने के बाद उसका फल भोगने के लिये स्वतंत्र नहीं है।

एक सच्ची बात कहता हूँ, बात तब की है, जब मेरी उम्र 20 से 30 के बीच रही होगी। उस काल में मैं ज्योतिष या ज्योतिष जैसी विद्याओं को नफरत की निगाह से देखा करता था। एेसा होना स्वाभाविक भी था, क्योंकि हर प्रकार से मेरा अच्छा दौर चल रहा था। हर तरफ इज्जत सम्मान भी था, आमदनी अच्छी थी इस लिये आत्मविश्वास की कमी नहीं थी, ईश्वर में आस्था बिलकुल भी नहीं थी, अपने हाथ-पैरों या स्वास्थ शरीर को महत्व देेता था, अपनेे मस्तिष्क तथा तर्कशक्ति से अधिक किसी को महत्व नहीं देता था। फिर कुछ एेसा होने लगा की बिना किसी विशेष कारण के कारोबार व आमदनी तेजी से कम होने लगी, क्योंकि खर्चे बढ चुके थे, उनपर लगाम लगाम ना लग पा रही थी, टेंशने बढती ही चली गई। अपने दूर होने लग गये, तो अपना मनोबल भी डगमगाने लगा, शरीर थका-थका सा रहता, तब मन में आता कोई अनजाना कारण जरूर है, जो दिखाई भी नहीं देता और सुझाई भी नहीं देता। बस सच पूछिए तो उसी दिन से मैं बनने लगा था “ज्योतिषी” और पहुंच गया एक पंडितजी के पास, उन्होंने मेरी कुण्डली बनाई और बताया तुम्हारी तो शनि की साढ़ेसाती चल रही है। मित्रो मैने जब पूछा कि क्या होती है साढ़ेसाती? और क्या होता है इसमें? पंडितजी बोले बस परेशानियाँ रहेंगी। हर क्यों का उत्तर नहीं मिला तो खरीद लाया ज्योतिष की पुस्तकें और लगा दिन-रात पढ़ने। 6-7 वर्ष अध्ययन करते-करते समझ में आने लगा कि क्यों होता है कष्ट, साढ़ेसाती में क्या बात है खास ? और सन 2000 में जब संस्कृत विश्वविद्यालय से मैने ज्योतिष की डिग्री प्राप्त कर स्वयं ज्योतिषी बन बैठा, और आज हजारों कुण्डलियां मेरी निगाहों से गुजर चुकी हैं, तब कभी-कभी मैं उस 20 से 30 की उम्र में अपने विचारों को याद करता हूँ, और महसूस करता हूँ कि यह सब नियति के खेल हैं। कुच्छ तो जन्मों-जन्मों के कर्म हैं, और कुच्छ पूर्व जन्मों की अधूरी इच्छायें या कहिये की अधूरी विद्यायें हैं, जो पीछा करती हैं।

यह आज के विज्ञान के साथ एक दुराग्रह है कि, इसने न केवल प्रत्यक्षवाद को सब कुछ माना है, साथ ही साथ उसी आधार पर हर विषय का प्रतिपादन भी आरम्भ कर दिया है। इस में कमी यह है कि, इस आधार पर हर अनैतिकता को निर्दोष ठहराया जा रहा है। धर्म और आध्यात्म के सिद्धांतों की अवहेलना चल पड़ी है, चरित्रहीनता तो साधारण बात या प्रगतिशीलता की पहचान बनने लगी है, इसका परिणाम क्या होगा? दूसरी ओर भोजन के लिये पशु हत्या! डर है, बात कभी यहाँ तक न पहुंच जाये कि बूढ़ी गाय या बूढ़े बैल की तरह बूढ़े माँ बाप को भी किसी कसाई खाने में पहुंचाने में लाभ न दिखाई देने लगे। आजकल अजन्मे बच्चों का माँस डिब्बाबंद भोजन के रूप में बिकने की खबर सुनकर रूह काँप उठती है। पशुमाँस का सेवन करते-करते मनुष्य में भी पशु स्वभाव का समावेश हो चला है। कभी मनुष्यों को भी एक पशु की तरह मान लिया गया या उस पर भी पशु जैसे अनुबंधों को लागू किया जाने लगा तब क्या होगा?

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