शनि ग्रह

प्राणियों के प्रति सृजनात्मक शक्ति हैं, शनिदेव।

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

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शनिग्रह के मूल लक्षण योग की अवस्था में ज्ञान चक्षु हैं। शनिग्रह में इस दैवीय ज्ञान के फलस्वरूप सृष्टि-क्रम को समूह में नष्ट करने अथवा जीव जगत के प्राणियों को दण्ड देने की क्षमता है। देव, असुर से लेकर मानव और अन्य समस्त जीव-जगत के प्राणी शनि की इस शक्ति के सामने अपने को निर्बल पाते हैं। ये सभी चेतन शक्तियां सृष्टि के विभिन्न स्तरों पर निरन्तर सृजनात्मक कार्य में व्यस्त रहती हैं, परन्तु उन सभी का अस्तित्व शनि की कृपा पर ही निर्भर रहता है।

शास्त्रों में शनि का एक गुण ‘सर्वभक्षक’ बताया गया है। शनि का शरीर इतना विकराल है कि, जिसमें सब कुछ समहित हो सकता है। शनि को प्रलयाग्नि के समान अनिष्टकारी भी कहा गया है। इन सब विशलेषणों से भी शनि के इसी रौद्र रूप को व्यक्त करने का प्रयास किया गया है। परन्तु सबसे मुख्य बात यही है कि इसी प्रक्रिया में ‘आत्मा’ के नवीनीकरण का रहस्य भी छिपा हुआ है। इसी लिए शनि को शास्त्रों में कृतांत अर्थात पूर्वजन्म के कर्म फलों को वर्तमान जन्म में देने वाला देव भी कहा गया है। शनि का यह तत्व सृष्टि के प्रत्येक कण-कण में सन्निहित दिखाई पड़ता है। इसी तत्व के कारण सृष्टि की आन्तरिक शक्तियां स्वयं के कर्म और उसके प्रतिफल को अनुकूल ढंग से अभिव्यक्त करके विकसित होती है। कृतांत होना शनि का, कर्म अधिदेव होने का सूचक है, परन्तु इसके फलस्वरूप होने वाला विकास क्रम बृहस्पति की कार्य प्रणाली का द्योतक है। प्रत्यक्षतः बृहस्पति विस्तार एवं सृजनात्मक कार्य में निरत रहते हैं, परन्तु शनि ही सृष्टि रूप में इसे संभव करते हैं। इस सृष्टि में पार्थिव सृजन एवं विभिन्न स्तरों पर प्रकट आकारों का नाश करना भी सन्निहित है। यम का यही स्वरूप शनि को विकराल, भयंकर और अनिष्टकारी बनाता है।

शनि के संबंध में आधुनिक ज्योतिषियों का मत – शनि का दायित्व इतना दुष्कर और कठिन है, और उनकी कार्यप्रणाली इतनी जटिल है कि, इनकी प्रकृति के संबध में अनेक तरह की धारणाएं एवं मान्यताएं समाज में प्रचलित हो गयी हैं। फलित ज्येातिष शास्त्र में शनि को अत्यंत क्रूर, प्रतिकारक, पीड़ा एवं संताप देनेवाला, दण्डकारक तथा मंद ग्रह कहा गया है। परन्तु इन गुणों से शनि की वास्तविक प्रकृति की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं होती।

प्राचीन ऋषियों ने शनि को सूर्य पुत्र माना है, और देवगुरु बृहस्पति को शनि का गुरु बताया है। इस तरह शनि सृष्टि के मुख्य आधार और जीवन के प्रमुख सूत्रधार सूर्य के पुत्र हुए और इस तरह शनि को प्रतिकार, संताप एवं कष्ट देने वाला, युक्ति संगत प्रतीत नहीं होता। ज्योतिषियों ने शनि को दुःख, पीड़ा, निराशा, मानसिक संताप एवं कष्ट देनेवाला, दुर्भाग्यशाली तथा असफलता आदि प्रदान करने वाला ग्रह भी माना है, परन्तु सृष्टि की आत्मा के पुत्र से अपने सहजीवी प्राणियों के ऊपर दुःखों का कहर बरसाने की बात पुनः युक्ति संगत प्रतीत नहीं होती। इतना ही नहीं शनि की शिक्षा-दीक्षा भी देवगुरु बृहस्पति के हाथों हुई मानी गयी है, ओर देवगुरु बृहस्पति से ऐसी आशा रखना कि वह अपने शिष्य को एैसे कामों से संस्कारित करेंगे कतई युक्ति संगत नहीं लगता। क्योंकि बृहस्पति ग्रह मण्डल के सर्वश्रेष्ठ शुभ ग्रह माने गये हैं। अतः सोचने की बात यही है कि क्या सूर्यदेव के कर्म इतने निकृष्ट रहे थे कि उनका पुत्र क्रूर और ग्रह मण्डल में सबसे अहम एवं अनिष्ट फल करने वाला माना जाएगा? क्या देवगुरु बृहस्पति इतने अयोग्य और निष्फल शिक्षक थे कि वे अपने विषय में किसी अच्छाई की जगह बुराइयों की नींव ही रखेंगे।
इस नियम विरोध का रहस्य इस ग्रह के गूढ़ लक्षणों के सूक्ष्म विश्लेषण और इसके प्रतिपादित वाह्य संबंधों को जान लेने से पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है।

दरअसल शनि के निगूढ़ रहस्यों को समझे बिना फलित ज्योतिष के गुह्य सिद्धांतों के मूल रूप को समझना प्रायः असंभव ही है। विभिन्न धर्मग्रंथों में शनिदेव और उनकी शक्तियों के संबंध में सैकड़ों कहानियां पढ़ने को मिलती हैं। इन कहानियों में शनि की मूलभूत प्रकृति के अनेक संकेत प्राप्त होते हैं। किन्तु यह विषय फिर पूर्णतः दार्शनिक विषय बन जाता है। यद्यपि इन प्राचीन आख्यानों में उल्लिखित संकेतों को अगर ठीक तरह से समझ लिया जाए, तो शनि के अनेक गुह्य रहस्यों से सहज ही पर्दा उठ जाता है और फिर उन गुह्य रहस्यों के आधार पर शनि को सृजनात्मक या विध्वंसात्मक देव के रूप में प्रतिपादित करना ज्योतिषियों के लिए काफी मुश्किल हो जाएगा। शनि के इन गुह्य रहस्यों पर फिर कभी चर्चा करने का प्रयास करूंगा।

ज्योतिष शास्त्र में शनि का लक्षण- ज्योतिष शास्त्र में शनि को लम्बा व भूरा-काला वर्ण, रक्त आंखें, शरीर से विकलांग, बड़े-बड़े दांत, कड़े बाल, भयानक आकृति, नपुंसक ग्रह, वृद्धावस्था वाला, पश्चिम दिशा का अधिपति, श्रमिक वर्ग व दस्यु प्रवृत्ति आदि गुणों वाला माना गया है। शनि शूद्र जाति का नायक है। शनि का निवास क्रीड़ा स्थल, श्मशान घाट, शराब खाना है। इनको काल पुरुष का दुःख व कष्ट माना जाता है। धातुओं में लोहा, जगहों में पहाड़ी, कूड़ों का ढेर तथा उपेक्षित स्थान, वस्त्रों में फटे चिथड़े आदि का संबंध शनि के साथ जोड़ा जाता है।

शनि मकर और कुम्भ राशि का स्वामी है। मकर पृथ्वी तत्त्व तथा कुम्भ वायु तत्त्व राशि है। मकर स्त्री वर्ण और कुम्भ पुरुष वर्ण राशि है। शनि तुला में उच्च तथा मेष राशि में नीच होता है। शुक्र जो क्रियात्मक ग्रह है, उसके शनि मित्रवत् हैं और ऐसा ही संबंध इसका बुध के साथ भी है जो तीव्र गति वाला स्वर्ग लोक का दूत तथा मस्तिष्क को तीव्र बुद्धि देने वाला ग्रह माना जाता है। देवगुरु के प्रति शनि उदासीन रहता है। सूर्य, मंगल तथा चन्द्रमा शनि के शत्रु हैं।

शनि अपने पिता सूर्य से अत्यंत दूरी पर स्थित है। इसी कारण यह विद्याहीन, काला, प्रकाशहीन व क्रूर ग्रह माना गया है। शायद इस कारण से ही जिनके जन्मांग में यह कमजोर अथवा पापी होता है, वह अक्सर विद्याहीन व मजदूर वर्ग से संबंधित देखे जाते हैं। प्रकाश के अभाव से कई रोगों की उत्पत्ति होती है। इसीलिए शनि को रोगों का भी कारक माना गया है। शनि की मंद गति के कारण इसको ‘मंद’ व ‘पंगु’ ग्रह भी कहा गया है। मनुष्य चलता पैरों से है। इसीलिए शनि का पैरों से भी बहुत घनिष्ट संबंध रहता है। इसी आधार पर लोगों के पैरों का अध्ययन करके उनके शनि की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। शनि के निर्बल और क्षीण होने की स्थिति में जातक के पैरों में कष्ट रहता है। जन्मांग में शनि के अध्ययन से जातक के दुःख, दर्द, सुख, रोग, निरोगी आदि बातें का भी सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त जातक की आयु, मृत्यु, चोरी, मुकद्दमा, राजदण्ड, नफा-नुकसान, दिवाला, निकलना, शत्रुता आदि बातों का पता लगाया जा सकता है।

शनि के विभिन्न भावों में बैठने से शनि अलग-अलग फल प्रदान करते हुए देखे जाते हैं। लग्नस्थ शनि के फल कथन में तो विशेष सर्तकता बरतने की जरूरत रहती है। लग्न के द्वारा सार्वभौतिक चेतना जातक की व्यक्तिगत आत्मा से संयुक्त होती है और उसके वर्तमान जन्म के आवास की स्थिति निर्धारित करती है। सामान्य रूप से लग्नस्थ शनि का प्रभाव विशेषकर जातक की आयु तथा उसकी भौतिक संपत्ति पर पड़ता है। जीवन की कोई भी अवस्था हो या जीवन क्रम कैसा भी हो यदि शनि लग्नस्थ है तो आत्मा की दृृष्टि से जन्म बहुत महत्वपूर्ण होता है।

सामान्यतः लग्नस्थ शनि जातक को नीच, दुष्ट, जड़वादी, व्यभिचारी, पर-स्त्रीगामी, शराबी तथा मादक द्रव्य सेवन का अभ्यस्त बनाता है। ऐसी स्थिति में जातक प्रवृत्ति मार्ग पर जड़ता के निम्नतम स्तर पर अज्ञान में जकड़ा हुआ रहता है। एैसे जातक को जब निराशा, दुःख, मानसिक संताप व्यथित कर देता है तो वह धीरे-धीरे भोग विलास से दूर भागना शुरू कर देता है और अन्ततः वैराग्य धारण कर लेता है।

द्वितीय स्थान पर शनि भू-संपत्ति तथा ऐश्वर्य की हानि तथा वाणी दोष देता है। शनि तृतीय स्थान में भाई बहनों को अनिष्ट करता है। चतुर्थस्थ शनि माता, निवास स्थान, शिक्षा एवं भावनात्मक जीवन में अनिष्ट लाता है। माता की असामयिक मृत्यु भी हो सकती है। पंचम स्थान में निर्बल और अशुभ शनि जातक की शारीरिक एवं मानसिक क्रियात्मक क्षमता के लिए अनिष्टकारी सिद्ध होता है। इससे वैवाहिक जीवन में भी कठिनाइयां आती है।

षष्ठस्थ शनि जातक के शत्रुओं का नाश करता है। परन्तु उसे असाध्य रोगी बना देता है। सप्तम भाव में शनि पुनः वैवाहिक सुख में कठिनाइयां खड़ी करने वाला सिद्ध होता है। अष्टम भाव में शनि जातक को मानसिक रोगी बनाता है। नवम भाव में शनि जातक को निगूढ़ विद्या में निपुण बनाता है।

दशमस्थ भाव में शनि उच्च पदाधिकारी तथा मान-प्रतिष्ठा बढ़ाने का कार्य करता है। यह जातक को उन्नति की पराकाष्ठा पर पहुंचा देता है। एकादश भाव में शनि जातक को अत्यंत संपन्न एवं समृद्धिशाली बनाता है। राजनैतिक सम्मान की प्राप्ति भी करा देता है। द्वादशस्थ शनि जातक को अनेक कलाओं में निपुण करता है।

शनि के अशुभ फल से बचाव के उपाय- यह तो प्रायः अनुभव आधारित बात है ही कि शनि का अशुभ फल अति प्रभावशील होता है। जब शनि क्रोधित होते हैं तो उनके प्रकोप से बचना सहज संभव नहीं हो पाता। शनि के कोप से देव भी अपने को नहीं बचा पाए, फिर हम मनुष्यों की बात बहुत दूर है। परन्तु शनि ही एक मात्र ऐसे ग्रह भी हैं जो विभिन्न उपायों से प्रसन्न भी शीघ्र हो जाते हैं। न केवल वह अपनी उपासनाओं से विघ्न-बाधाओं को ही शीघ्र दूर कर देते हैं, वरन् समुचित वरदान भी दे डालते हैं। इस संबंध में पद्मपुराण में एक बहुत ही रोचक कथा का वर्णन किया गया है।

कहते हैं कि एक बार महाराज दशरथ के राज्य में शनि प्रकोप के कारण भयंकर अकाल पड़ गया। भोजन, पानी की कमी और बीमारियों के फलस्वरूप प्रजा अत्यंत व्याकुल हो गई। महाराज अपनी प्रजा का कष्ट देख बहुत व्यथित रहने लगे। महाराज जब प्रजा की पीड़ा से चिंतित रहने लगे तो गुरु वशिष्ठ से उनकी पीड़ा देखी नहीं गई। महाराज दशरथ ने गुरु आज्ञा को शिरोधार्य करके शनि को प्रसन्न करने के लिए उनकी आराधना शुरू कर दी। उनकी आराधना से शनि शीघ्र प्रसन्न हो गये और उनके राज्य का दुर्भिक्ष समाप्त हो गया।

महाराज दशरथ ने शनिदेव की आराधना स्वरूप ‘शनिश्चर स्त्रोत’ का सृजन किया था, इस शनिश्चर स्त्रोत में उन्होंने शनि के अनेक गुणों का विस्तार पूर्वक वर्णन किया है। शनि का यह स्त्रोत अब भी वैसा ही प्रभावशील एवं तत्क्षण फलप्रद होते देखा जाता है, जैसी कि इसके विषय में प्राचीन समय में विश्वास किया गया। इस शनि स्त्रोत का स्वयं मैंने भी अनेक बार चमत्कार होते हुए देखा है।

दशरथकृत इस ‘श्नैश्चर स्त्रोत’ का एक विशेष अनुष्ठान क्रम है। इस अनुष्ठान क्रम को किसी भी शनिवार से प्रारंभ किया जा सकता है। इस स्त्रोत का प्रतिदिन ग्यारह से इक्कीस बार तक पाठ करना होता है। पाठ के दौरान त्रिकोणाकृति वालेे हवन कुण्ड में भूतकेषी, गंधवाला, पीली सरसों, नीलोफर, काले तिल, काली हल्दी, पारिजात पुष्प, सर्पगंधा, रूद्रवन्ती, धूप लकड़ी, श्वेत चंदन, शतपुष्पी, लोध्र, नागरमोथा आदि से युक्त समिधा अग्नि को समर्पित करते हुए स्त्रोत पाठ करना होता है।

साधना काल में एक तांबे का पात्र लेकर उसमें काले वस्त्र में पांच लौंग, पांच सुपारी, पांच इलायची, थोड़ी सी काली उड़द और पांच सुलेमानी हकीक पत्थर बांधकर रखने होते हैं। इस सामग्री को 21 दिन का अनुष्ठान पूरा करने के बाद बहते हुए पानी में प्रवाहित करना होता है।

शनि द्वारा अलग-अलग राशियों को प्रभावित करने के अनुसार इस अनुष्ठान के समय और समिधा की सामग्रियों में थोड़ा बहुत बदलाव करना होता है, जैसे कि शनि के अष्टम भावस्थ पीड़ित होकर बैठने से इस अनुष्ठान को रात्रि के दौरान सम्पन्न करना पड़ता है, जबकि लग्न भाव के शनि द्वारा पीड़ित होने पर इस अनुष्ठान को प्रातःकाल संपन्न करना होता है।

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अकाल मृत्यु योग

क्या जन्म कुंडली द्वारा अकाल-मृत्यु (एक्सीडेंट) योग का पता लगाया जा सकता है ? :-

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वस्तुत: मृत्यु एक ऐसा अटल सत्य है, जिसे कोई बदल नहीं सकता। कब, किस कारण से, मौत को गले लगाना होगा, यह कोई भी नहीं जानता। कुछ लोगों की असमय और अस्वाभाविक मृत्यु हो जाती है। ऐसी मौत को ही अकाल मृत्यु कहते हैं। प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या जातक की कुंडली के आधार पर अकाल मृत्यु के संबंध में जाना जा सकता है? इसका उत्तर है हां जाना तो जा सकता है, परंतु यह सरल बिल्कुल भी नहीं है, इसके लिए बहुत जटिल ज्योतिषीय गणनाओं का गुणा-भाग करना होता है, और इस के साथ-साथ ज्योतिषीय योगों का सामंजस्य बैठाना होता है। आगे की पंक्तियों में कुछ मान्य ग्रंथों से अकाल मृत्यु के योग लिख रहे हैं, परंतु ध्यान रहे केवल इन योगों को आधार मानकर अकाल मृत्यु की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, बल्कि इस के साथ साथ ज्योतिष के अन्य नियमों का मिलान होना भी आवश्यक है, तभी इन में से कोई योग घटित हो सकता है।

ज्योतिष शास्त्र के कुछ मान्य ग्रंथों में – वृहद्पराशर होराशास्त्र, जातक पारिजात, फल दीपिका इत्यादि के आयुर्दाय अध्याय में कुछ अपमृत्यु (अकाल मृत्यु) के योगों का वर्णन मिलता है :-

1- लग्नेश तथा मंगल की युति यदि लग्न कुंडली के छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो, जातक को शस्त्र से घाव होता है। इसी प्रकार का फल इन भावों में शनि और मंगल के होने से भी मिलता है।

2- यदि मंगल किसी जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव, सप्तम भाव अथवा अष्टम भाव में स्थित हो, और उस मंगल पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो, जातक की मृत्यु अग्नि से हो सकती है।

3- लग्न, द्वितीय भाव तथा बारहवें भाव में क्रूर ग्रहों की स्थिति हत्या का कारण बनती है।

4- दशम भाव की नवांश राशि का स्वामी राहु अथवा केतु के साथ स्थित हो तो, जातक की मृत्यु अस्वाभाविक होती है।

5- यदि जातक की कुंडली के लग्न में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि हो तो, दुर्घटना में मृत्यु होने की आशंका रहती है।

6- राहु-मंगल की युति अथवा दोनों का सम-सप्तक होकर एक-दूसरे से दृष्ट होना भी दुर्घटना का कारण हो सकता है।

7- षष्ठ भाव का स्वामी पापग्रह से युक्त होकर षष्ठ अथवा अष्टम भाव में हो तो, दुर्घटना होने का भय रहता है।

8- अष्टम भाव और लग्न भाव के स्वामी बलहीन हों और मंगल 6 घर के स्वामी के साथ बैठा हो तो, ये योग बनता है –

9- क्षीण चन्द्रमा 8वें भाव में हो तो भी यह योग बनता है, या लग्न में शनि हो, और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो, तथा उसके साथ सूर्य, चन्द्रमा, या सूर्य राहू हो तो भी यह योग बनता है..

ऐसे योंगों में मृत्यु के निम्न कारण होते हैं जैसे

शस्त्र से , 2- विष से, 3- फांसी लगाने से, 4- आग में जलने से, 5- पानी में डूबने से या 6- मोटर-वाहन की दुर्घटना से –

1- यदि जातक की कुंडली के लग्न में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि हो तो दुर्घटना में मृत्यु होने की आशंका रहती है।

2- राहु-मंगल की युति अथवा दोनों का सम-सप्तक होकर एक-दूसरे से दृष्ट होना भी दुर्घटना का कारण हो सकता है।

3- षष्ठ भाव का स्वामी पापग्रह से युक्त होकर षष्ठ अथवा अष्टम भाव में हो तो, दुर्घटना होने का भय रहता है।

4- लग्न, द्वितीय भाव तथा बारहवें भाव में क्रूर ग्रह की स्थिति हत्या का कारण बनती है।

5- दशम भाव की नवांश राशि का स्वामी राहु अथवा केतु के साथ स्थित हो तो, जातक की मृत्यु अस्वाभाविक होती है।

6- लग्नेश तथा मंगल की युति छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो, जातक को शस्त्र से घाव होता है। इसी प्रकार का फल इन भावों में शनि और मंगल के होने से मिलता है।

7- यदि मंगल जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव, सप्तम भाव अथवा अष्टम भाव में स्थित हो, और उस पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो, जातक की मृत्यु आग से हो सकती है।

विशेष :- कुंडली में अनेक अपमृत्यु योगों को भंग करने वाले योग भी साथ-साथ बन रहे होते हैं, इस लिये कुंडली का सभी दृष्टियों से विचार करना आवश्यक है।
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अपमृत्यु अथवा अल्पायु योगों का निवारण —

लग्नेश को मजबूत करें, उपाय के द्वारा और रत्नादि धारण अथवा रत्न दान के द्वारा, और इसके बाद भी यदि दुर्घटना होती है तो, महामृत्युंजय मंत्र का जाप या मृत्संजनी मंत्र का अनुष्ठान ही ऐसे जातक के जीवन रक्षा करता है।

क्या आप अल्पायु या अपमृत्यु योग का निवारण चाहते हैं तो, निम्न मंत्र का नित्य 11 बार जाप किया करें …

”अश्वत्थामा बलीर व्यासो हनुमानाश च विभिशाना कृपाचार्य च परशुरामम सप्तैता चिरंजीवानाम ”

1- अश्वत्थामा, 2 – राजा बलि, 3 – व्यास ऋषि, 4 – अंजनी नंदन श्री राम भक्त हनुमान, 5 – लंका के राजा विभीषण, 6 – महातपस्वी परशुराम, 7 – कृपाचार्य। ये सात नाम हैं जो अजर अमर हैं, और आज भी पृथ्वी पर विराजमान हैं।

अभेद्य महामृत्युंजय कवच : — जब जन्म कुंडली में मृत्यु का योग न हो लेकिन फिर भी व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो इसे अकाल मृत्यु कहा जाता है। हर समय किसी अनहोनी का डर लगा रहता है। इन्हीं कारणों से बचाव के लिए मां भगवती ने भगवान शिव से पूछा कि प्रभू अकाल मृत्यु से रक्षा करने और सभी प्रकार के अशुभों से रक्षा का कोई उपाय बताइए। तब भगवान शिव ने महामृत्युंजय कवच के बारे में बताया। महामृत्युंजय कवच को धारण करके मनुष्य सभी प्रकार के अशुभों से बच सकता है, और अकाल मृत्यु को भी टाल सकता है।

अकाल मृत्यु का भय नाश करता है, महामृत्युंजयग्रहों के द्वारा पिड़ीत आम जन मानस को मुक्ति सरलता से मिल सकती है। सोमवार के व्रत में भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की जाती है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार सोमवार के व्रत तीन तरह के होते हैं। सोमवार, सोलह सोमवार और सौम्य प्रदोष। इस व्रत को सावन माह में आरंभ करना शुभ माना जाता है।

सावन में शिव-शंकर की पूजा :-
सावन के महीने में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरूआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, शमीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भाँग और श्रीफल महादेव को चढ़ाया जाता है।

क्यों किया जाता है महादेव का अभिषेक ? –
महादेव का अभिषेक करने के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है कि, समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने के बाद जब महादेव इस विष का पान करते हैं तो वह मूर्छित हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं, और उन्हें होश में लाने के लिए निकट में जो चीजें उपलब्ध होती हैं, उनसे महादेव को स्नान कराने लगते हैं। इसके बाद से ही जल से लेकर तमाम उन चीजों से महादेव का अभिषेक किया जाता है।

‘मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये’

इसके पश्चात निम्न मंत्र से ध्यान करें-
‘ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥
ध्यान के पश्चात ‘ऊँ नम: शिवाय’ से शिवजी का तथा ‘ऊँ नम: शिवायै’ के अलावा जन साधारण को महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है । अत: शिव-पार्वती जी का षोडशोपचार पूजन कर राशियों के अनुसार दिये मंत्र से अलग-अलग प्रकार से पुष्प अर्पित करें।

राशियों के अनुसार क्या चढ़ावें भगवान शिव को..?-
भगवान शिव को भक्त प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और समीपत्र चढ़ाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 88 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक शमीपत्र का महत्व होता है।

मेष:- ॐ ह्रौं जूं स:, इस त्र्यक्षरी महामृत्युञ्जय मंत्र बोलते हुए 11 बेलपत्र चढ़ावें।

वृषभ:- ॐ शशीशेषराय नम:, इस मंत्र से 84 शमीपत्र चढ़ावें।

मिथुन:- ॐ महा कालेश्वराय नम:, (बेलपत्र 51)।

कर्क:- ॐ त्र्यम्बकाय नम:, (नील कमल 61)।

सिंह:- ॐ व्योमाय पाय्घर्याय नम:, (मंदार पुष्प 108)

कन्या:- ॐ नम: कैलाश वासिने नंदिकेश्वराय नम:, (शमी पत्र 41)

तुला:- ॐ शशिमौलिने नम:, (बेलपत्र 81)

वृश्चिक:- ॐ महाकालेश्वराय नम:, ( नील कमल 11 फूल)

धनु:- ॐ कपालिक भैरवाय नम:, (जंवाफूल कनेर 108)

मकर:- ॐ भव्याय मयोभवाय नम:, (गन्ना रस और बेल पत्र 108)

कुम्भ:- ॐ कृत्सनाय नम:, (शमी पत्र 108)

मीन:- ॐ पिंङगलाय नम: (बेलपत्र में पीला चंदन से राम नाम लिख कर 108)

सावन सोमवार व्रत नियमित रूप से करने पर भगवान शिव तथा देवी पार्वती की अनुकम्पा बनी रहती है।जीवन धन-धान्य से भर जाता है।

सभी अनिष्टों का भगवान शिव हरण कर भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं।

कुंडली में मृत्यु के प्रकार :-
हमारे प्राचीन ऋषि-महर्षियों ने ज्योतिष की गणना के आधार पर जीवन और मृत्यु के बारे में कुछ योग बताएं हैं, जसके आधार पर मृत्यु कैसे होगी किस प्रकार से होगी आइये देखते हैं-

लग्नेश के नवांश से मृत्यु का ज्ञान:- जन्म कुंडली में लग्न चक्र और नवांश को देखकर यह बताया जा सकता है की मृत्यु कैसे होगी ..

लग्नेश का नवांश मेष हो तो, पितदोष, पीलिया, ज्वर, जठराग्नि आदि से संबंधित बीमारी से मृत्यु होती है।

लग्नेश का नवांश वृष हो तो एपेंडिसाइटिस, शूल या दमा आदि से मृत्यु होती है।

लग्नेश का मिथुन नवांश हो तो, मेनिन्जाइटिस, सिर शूल, दमा आदि से मृत्यु होती है।

लग्नेश कर्क नवांश में हो तो, वात रोग से मृत्यु हो सकती है।

लग्नेश सिंह नवांश में हो तो, व्रण, हथियार या अम्ल से अथवा अफीम, नशा आदि के सेवन से मृत्यु होती है।

कन्या नवांश में लग्नेश के होने से बवासीर, मस्से आदि रोग से मृत्यु होती है।

तुला नवांश में लग्नेश के होने से घुटने तथा जोड़ों के दर्द अथवा किसी जानवर के आक्रमण चतुष्पद (पशु) के कारण मृत्यु होती है।

लग्नेश वृश्चिक नवांश में हो तो, संग्रहणी, यक्ष्मा आदि से मृत्यु होती है।

लग्नेश धनु नवांश में हो तो, विष ज्वर, गठिया आदि के कारण मृत्यु हो सकती है।

लग्नेश मकर नवांश में हो तो, अजीर्ण, अथवा, पेट की किसी अन्य व्याधि से मृत्यु हो सकती है।

लग्नेश कुंभ नवांश में हो तो, श्वास संबंधी रोग, क्षय, भीषण ताप, लू आदि से मृत्यु हो सकती है।

लग्नेश मीन नवांश में हो तो, धातु रोग, बवासीर, भगंदर, प्रमेह, गर्भाशय के कैंसर आदि से मृत्यु होती है।

हत्या एवं आत्महत्या के योग :-
शरीर के संवेदनशील तंत्र पर चंद्रमा का अधिकार होता है। कुंडली में चंद्रमा अगर शनि, मंगल, राहु-केतु, नेप्च्यून आदि ग्रहों के प्रभाव में हो तो, मन व्यग्रता का अनुभव करता है। दूषित ग्रहों के प्रभाव से मन में कृतघ्नता के भाव अंकुरित होते हैं, पाप की प्रवृत्ति पैदा होती है, और मनुष्य अपराध, आत्महत्या, हिंसक कर्म आदि की ओर उन्मुख हो जाता है। चंद्रमा की कलाओं में अस्थिरता के कारण आत्महत्या की घटनाएं अक्सर एकादशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा के आस-पास होती हैं। मनुष्य के शरीर में शारीरिक और मानसिक बल कार्य करते हैं। मनोबल की कमी के कारण मनुष्य का विवेक काम करना बंद कर देता है, और अवसाद में हार कर वह आत्महत्या जैसा पाप कर बैठता है।
आत्महत्या करने वालों में 60 प्रतिशत से अधिक लोग अवसाद या किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रस्त होते हैं।
आत्महत्या के कारण मृत्यु योग- जन्म कुंडली में निम्न स्थितियां हों तो जातक आत्महत्या की तरफ उन्मुख होता है।
लग्न व सप्तम स्थान में नीच ग्रह हो।

अष्टमेश पाप ग्रह शनि राहु से पीड़ित हो।

अष्टम स्थान के दोनों तरफ अर्थात् सप्तम व हो, उच्च या नीच राशिस्थ हो, अथवा मंगल व केतु की युति में हो।

सप्तमेश और सूर्य नीच भाव का हो, तथा राहु शनि से दृष्टि संबंध रखता हो।

लग्नेश व अष्टमेश का संबंध व्ययेश से हो।

मंगल व षष्ठेश की युति हो, तृतीयेश, शनि और मंगल अष्टम में हों।

अष्टमेश यदि जल तत्वीय हो तो जातक पानी में डूबकर और यदि अग्नि तत्वीय हो तो जल कर आत्महत्या करता है।

कर्क राशि का मंगल अष्टम भाव में हो तो जातक पानी में डूबकर आत्महत्या करता है।

हत्या या आत्महत्या के कारण होने वाली मृत्यु के अन्य योग:-

यदि मकर या कुंभ राशिस्थ चंद्र दो पापग्रहों के मध्य हो तो जातक की मृत्यु फांसी, आत्महत्या या अग्नि से होती है।

चतुर्थ भाव में सूर्य एवं मंगल तथा दशम भाव में शनि हो तो जातक की मृत्यु फांसी से होती है।

यदि अष्टम भाव में एक या अधिक अशुभ ग्रह हों तो जातक की मृत्यु हत्या, आत्महत्या, बीमारी या दुर्घटना के कारण होती है।

यदि अष्टम भाव में बुध और शनि स्थित हों तो जातक की मृत्यु फांसी से होती है।

यदि मंगल और सूर्य राशि परिवर्तन योग में हों और अष्टमेश से केंद्र में स्थित हों तो जातक को सरकार द्वारा मृत्यु दण्ड अर्थात् फांसी मिलती है।

शनि लग्न में हो और उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तथा सूर्य, राहु और क्षीण चंद्र युत हों तो जातक की गोली या छुरे से हत्या होती है।

यदि नवांश लग्न से सप्तमेश, राहु या केतु से युत हो तथा भाव 6, 8 या 12 में स्थित हो तो जातक की मृत्यु फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेने से होती है।

यदि चंद्र से पंचम या नवम राशि पर किसी अशुभ ग्रह की दृष्टि या उससे युति हो और अष्टम भाव अर्थात 22वें द्रेष्काण में सर्प, निगड़, पाश या आयुध द्रेष्काण का उदय हो रहा हो तो जातक फांसी लगाकर आत्महत्या करने से मृत्यु को प्राप्त होता है।

चौथे और दसवें या त्रिकोण भाव में अशुभ ग्रह स्थित हो या अष्टमेश लग्न में मंगल से युत हो तो जातक फांसी लगाकर आत्महत्या करता है।

दुर्घटना के कारण मृत्यु योग:-
जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ और दशम भाव में से किसी एक में सूर्य और दूसरे में मंगल हो, उसकी मृत्यु पत्थर से चोट लगने के कारण होती है।

यदि शनि, चंद्र और मंगल क्रमशः चतुर्थ, सप्तम और दशम भाव में हो तो, जातक की मृत्यु कुएं में गिरने से होती है।

सूर्य और चंद्रमा दोनों कन्या राशि में हों, और पाप ग्रह से दृष्ट हों तो, जातक की उसके घर में बंधुओं के सामने मृत्यु होती है।

यदि कोई द्विस्वभाव राशि लग्न में हो, और उस में सूर्य तथा चंद्र हों तो, जातक की मृत्यु जल में डूबने से होती है।

यदि चंद्रमा मेष या वृश्चिक राशि में दो पाप ग्रहों के मध्य स्थित हो तो जातक की मृत्यु शस्त्र या अग्नि दुर्घटना से होती है।

जिस जातक के जन्म लग्न से पंचम और नवम भावों में पाप ग्रह हों, और उन दोनों पर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो, उसकी मृत्यु बंधन से होती है।

जिस जातक के जन्मकाल में किसी पाप ग्रह से युत चंद्रमा कन्या राशि में स्थित हो, उसकी मृत्यु उसके घर की किसी स्त्री के कारण होती है।

जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ भाव में सूर्य या मंगल और दशम में शनि हो, उसकी मृत्यु चाकू से होती है।

यदि दशम भाव में क्षीण चंद्र, नवम में मंगल, लग्न में शनि और पंचम में सूर्य हो तो, जातक की मृत्यु अग्नि, धुआं, बंधन या काष्ठादि के प्रहार के कारण होती है।

जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ भाव में मंगल, सप्तम में सूर्य और दशम में शनि स्थित हो तो, उसकी मृत्यु शस्त्र या अग्नि दुर्घटना से होती है।

जिस जातक के जन्म लग्न से दशम भाव में सूर्य और चतुर्थ में मंगल स्थित हो, उसकी मृत्यु सवारी से गिरने से या वाहन दुर्घटना में होती है।

यदि लग्न से सप्तम भाव में मंगल और लग्न में शनि, सूर्य एवं चंद्र हों उसकी मृत्यु मशीन आदि से होती है।

यदि मंगल, शनि और चंद्रमा क्रम से तुला, मेष और मकर या कुंभ में स्थित हों तो, जातक की मृत्यु विष्ठा में गिरने से होती है।

मंगल और सूर्य सप्तम भाव में, शनि अष्टम में और क्षीण चंद्र में स्थित हो तो, उसकी मृत्यु पक्षी के कारण होती है।

यदि लग्न में सूर्य, पंचम में मंगल, अष्टम में शनि और नवम में क्षीण चंद्र हो तो जातक की मृत्यु पर्वत के शिखर या दीवार से गिरने अथवा वज्रपात से होती है।

सूर्य, शनि, चंद्र और मंगल लग्न से अष्टमस्थ या त्रिकोणस्थ हों तो, वज्र या शूल के कारण अथवा दीवार से टकराकर या मोटर दुर्घटना से जातक की मृत्यु होती है।

चंद्रमा लग्न में, गुरु द्वादश भाव में हो, कोई पाप ग्रह चतुर्थ में और सूर्य अष्टम में निर्बल हो तो जातक की मृत्यु किसी दुर्घटना से होती है।

यदि दशम भाव का स्वामी नवांशपति शनि से युत होकर भाव 6, 8 या 12 में स्थित हो तो, जातक की मृत्यु विष भक्षण से होती है।

यदि चंद्र या गुरु जल राशि (कर्क, वृश्चिक या मीन) में अष्टम भाव में स्थित हो, और साथ में राहु हो तथा उसे पाप ग्रह देखता हो तो सर्पदंश से मृत्यु होती है।

यदि लग्न में शनि, सप्तम में राहु और क्षीण चंद्रमा तथा कन्या में शुक्र हो तो, जातक की शस्त्राघात से मृत्यु होती है।

यदि अष्टम भाव तथा अष्टमेश से सूर्य, मंगल और केतु की युति हो अथवा दोनों पर उक्त तीनों ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक की मृत्यु अग्नि दुर्घटना से होती है।

यदि शनि और चंद्र भाव 4, 6, 8 या 12 में हो तथा अष्टमेश अष्टम भाव में दो पाप ग्रहों से घिरा हो तो, जातक की मृत्यु नदी या समुद्र में डूबने से होती है।

लग्नेश, अष्टमेश और सप्तमेश यदि एक साथ बैठे हों तो जातक की मृत्यु स्त्री के साथ होती है।

यदि कर्क या सिंह राशिस्थ चंद्रमा सप्तम या अष्टम भाव में हो और राहु से युत हो तो, मृत्यु पशु के आक्रमण के कारण होती है।

दशम भाव में सूर्य और चतुर्थ में मंगल स्थित हो तो, वाहन के टकराने से मृत्यु होती है।

अष्टमेश एवं द्वादशेश में भाव परिवर्तन हो, तथा इन पर मंगल की दृष्टि हो तो, जातक की अकाल मृत्यु होती है।

षष्ठ, अष्टम अथवा द्वादश भाव में चंद्रमा, शनि एवं राहु हों तो, जातक की मृत्यु अस्वाभाविक तरीके से होती है।

लग्नेश एवं अष्टमेश बलहीन हों, तथा मंगल षष्ठेश के साथ हो तो, जातक की मृत्यु कष्टदायक होती है।

चंद्रमा, मंगल एवं शनि अष्टमस्थ हों तो, मृत्यु शस्त्र से होती है।

षष्ठ भाव में लग्नेश एवं अष्टमेश हों, तथा षष्ठेश मंगल से दृष्ट हो तो, जातक की मृत्यु शत्रु द्वारा या शस्त्राघात से होती है।

लग्नेश और अष्टमेश अष्टम भाव में हों, तथा पाप ग्रहों से युत दृष्ट हों तो, जातक की मृत्यु प्रायः दुर्घटना के कारण होती है।

चतुर्थेश, षष्ठेश एवं अष्टमेश में संबंध हो तो, जातक की मृत्यु वाहन दुर्घटना में होती है।

अष्टमस्थ केतु 25 वें वर्ष में भयंकर कष्ट अर्थात् मृत्युतुल्य कष्ट देता है।

यदि अष्टम भाव में चंद्रमा, मंगल, और शनि हों तो, जातक की मृत्यु हथियार से होती है।

यदि द्वादश भाव में मंगल, और अष्टम भाव में शनि हो तो, भी जातक की मृत्यु हथियार द्वारा होती है।

यदि षष्ठ भाव में मंगल हो तो, भी जातक की मृत्यु हथियार से होती है।

यदि राहु चतुर्थेश के साथ षष्ठ भाव में हो तो, मृत्यु डकैती या चोरी के समय उग्र आवेग के कारण होती है।

यदि चंद्रमा मेष या वृश्चिक राशि में पापकर्तरी योग में हो तो, जातक जलने से या हथियार के प्रहार से मृत्यु को प्राप्त होता है।

यदि अष्टम भाव में चंद्रमा, दशम में मंगल, चतुर्थ में शनि और लग्न में सूर्य हो तो, मृत्यु कुंद वस्तु से होती है।

यदि सप्तम भाव में मंगल और लग्न में चंद्र तथा शनि हों तो, मृत्यु संताप के कारण या विचार गोष्ठी कारण होती है।

यदि लग्नेश और अष्टमेश कमजोर हों और मंगल षष्ठेश से युत हो तो, मृत्यु युद्ध में होती है।

यदि नवांश लग्न से सप्तमेश, शनि से युत हो, या भाव 6, 8 या 12 में हो तो मृत्यु जहर खाने से होती है।

यदि चंद्रमा और शनि अष्टम भाव में हो और मंगल चतुर्थ में हो, या सूर्य सप्तम में अथवा चंद और बुध षष्ठ भाव में हो तो, जातक की मृत्यु जहर खाने से होती है।

यदि शुक्र मेष राशि में, सूर्य लग्न में, और चंद्रमा सप्तम भाव में अशुभ ग्रह से युत हो तो, स्त्री के कारण मृत्यु होती है।

यदि लग्न स्थित मीन राशि में सूर्य, चंद्रमा और अशुभ ग्रह हों तथा, अष्टम भाव में भी अशुभ ग्रह हों तो, दुष्ट स्त्री के कारण मृत्यु होती है।

विभिन्न दुर्घटना योग:-
लग्नेश और अष्टमेश दोनों अष्टम में हो, अष्टमेश पर लाभेश की दृष्टि हो, (क्योंकि लाभेश षष्ठ से षष्ठम भाव का स्वामी होता है)।

द्वितीयेश, चतुर्थेश और षष्ठेश का परस्पर संबंध हो।

मंगल, शनि और राहु भाव 2, 4 अथवा 6 में हों।

तृतीयेश क्रूर हो तो, परिवार के किसी सदस्य से तथा चतुर्थेश क्रूर हो तो, जनता से आघात होता है।

अष्टमेश पर मंगल का प्रभाव हो, तो जातक गोली का शिकार होता है।

अगर शनि की दृष्टि अष्टमेश पर हो, और लग्नेश भी वहीं हो तो, गाड़ी, जीप, मोटर या ट्राॅली से दुर्घटना हो सकती है।

बीमारी के कारण मृत्यु योग:-
जिस जातक के जन्मकाल में शनि कर्क में एवं चंद्रमा मकर में बैठा हो, अर्थात् देानों ही ग्रहों में राशि परिवर्तन हो, उसकी मृत्यु जलोदर रोग से या जल में डूबने से होती है।

यदि कन्या राशि में चंद्रमा दो पाप ग्रहों के मध्य स्थित हो तो, जातक की मृत्यु रक्त विकार या क्षय रोग से होती है।

यदि शनि द्वितीय भाव में और मंगल दशम में हों तो, मृत्यु शरीर में कीड़े पड़ने से होती है।

जिस जातक के जन्मकाल में क्षीण चंद्रमा बलवान मंगल से दृष्ट हो, और शनि लग्न से अष्टम भाव में स्थित हो तो, उसकी मृत्यु गुप्त रोग या शरीर में कीड़े पड़ने से या शस्त्र से या अग्नि से होती है।

अष्टम भाव में पाप ग्रह स्थित हो तो, मृत्यु अत्यंत कष्टकारी होती है। इसी भाव में शुभ ग्रह स्थित हो, और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो, गुप्त रोग या नेत्ररोग की पीड़ा से मृत्यु होती है।

क्षीण चंद्र अष्टमस्थ हो, और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो, इस स्थिति में भी उक्त रोगों से मृत्यु होती है।

यदि अष्टम भाव में शनि एवं राहु हो तो, मृत्यु पुराने रोग के कारण होती है।

यदि अष्टम भाव में चंद्रमा हो, और साथ में मंगल, शनि या राहु हो तो, जातक की मृत्यु मिरगी से होती है।

यदि अष्टम भाव में मंगल हो, और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो, मृत्यु सर्जरी या गुप्त रोग अथवा आंख की बीमारी के कारण होती है।

यदि बुध और शुक्र अष्टम भाव में हो तो, जातक की मृत्यु नींद में होती है।

यदि मंगल लग्नेश हो (यदि मंगल नवांशेश हो) और लग्न में सूर्य और राहु तथा सिंह राशि में बुध और क्षीण चंद्रमा स्थित हों तो, जातक की मृत्यु पेट के आपरेशन के कारण होती है।

जब लग्नेश या सप्तमेश, द्वितीयेश और चतुर्थेश से युत हो तो, अपच के कारण मृत्यु होती है।

यदि बुध सिंह राशि में अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो, जातक की मृत्यु बुखार से होती है।

यदि अष्टमस्थ शुक्र अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो, मृत्यु गठिया या मधुमेह के कारण होती है।

यदि बृहस्पति अष्टम भाव में जलीय राशि में हो तो, मृत्यु फेफड़े की बीमारी के कारण होती है।

यदि राहु अष्टम भाव में अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो, मृत्यु चेचक, घाव, सांप के काटने, गिरने या पितृदोष से मृत्यु होती है।

यदि मंगल षष्ठ भाव में सूर्य से दृष्ट हो तो, मृत्यु हैजे से होती है।

यदि मंगल और शनि अष्टम भाव में स्थित हों तो धमनी में खराबी के कारण मृत्यु होती है।

नवम भाव में बुध और शुक्र हों तो, हृदय रोग से मृत्यु होती है।

यदि चंद्र कन्या राशि में अशुभ ग्रहों के घेरे में हो तो, मृत्यु रक्त की कमी के कारण होती है।

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कुंडली का फलकथन (कुछ सूत्र):-

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कुंडली का फलकथन करने से पूर्व इन ज्योतिषीय सूत्रों को ध्यान में रखकर फलादेश करना चाहिए :-

1. किसी भी ग्रह की महादशा में उसी ग्रह की अन्तर्दशा अनुकूल फल नहीं देती।

2. योगकारक ग्रह (केन्द्र और त्रकोण का स्वामी ग्रह) की महादशा में पापी या मारक (त्रिषडाय) ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में शुभ फल तथा उत्तरार्द्ध में अशुभ फल मिलता है।

3. अकारक ग्रह की महादशा में कारक ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में अशुभ तथा उत्तरार्द्ध में शुभ फल की प्राप्ति होती है।

4. भाग्य स्थान का स्वामी यदि भाग्य भाव में बैठा हो, और उस पर गुरु की दृष्टि हो तो, ऐसा व्यक्ति प्रबल भाग्यशाली माना जाता है।

5. लग्न का स्वामी सूर्य के साथ बैठकर विशेष अनुकूल रहता है।

6. सूर्य के समीप निम्न अंशों तक जाने पर ग्रह अस्त हो जाते हैं, (चन्द्र-12 अंश, मंगल-17 अंश, बुध-13 अंश, गुरु-11 अंश, शुक्र-9 अंश, शनि-15 अंश) फलस्वरूप ऐसे ग्रहों का फल शून्य होता है। अस्त ग्रह जिन भावों के अधिपति होते हैं, उन भावों का फल शून्य ही समझना चाहिए।

7. सूर्य उच्च का होकर यदि ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली तथा पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त व्यक्तित्व वाले होते हैं।

8. सूर्य और चन्द्र को छोड़कर यदि कोई ग्रह अपनी राशि में बैठा हो तो, वह अपनी दूसरी राशि के प्रभाव को बहुत अधिक बढ़ा देता है।

9. किसी भी भाव में जो ग्रह बैठा है, इसकी अपेक्षा जो ग्रह उस भाव को देख रहा होता है, उसका प्रभाव ज़्यादा रहता है।

10. जिन भावों में शुभ ग्रह बैठे हों, या जिन भावों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो, वे भाव शुभ फल देने में सहायक होते हैं।

11. यदि एक ग्रह दो भावों का अधिपति होता है तो, ऐसी स्थिति में वह ग्रह अपनी दशा में लग्न से गिनने पर उस ग्रह की जो राशि पहले आएगी उसका फल वह पहले प्रदान करेगा।

12. दो केन्द्रों का स्वामी ग्रह यदि त्रिकोण के स्वामी के साथ बैठा है तो, उसे केंद्रत्व दोष नहीं लगता, और वह शुभ फल देने में सहायक हो जाता है। सामान्य नियमों के अनुसार यदि कोई ग्रह दो केंद्र भावों का स्वामी होता है तो, वह अशुभ फल देने लग जाता है, चाहे वह जन्म-कुंडली में करक ग्रह ही क्यों न हो।

13. अपने भाव से केन्द्र व त्रिकोण में पड़ा हुआ ग्रह शुभ होता है।

14. केंद्र के स्वामी तथा त्रिकोण के स्वामी के बीच यदि संबंध हो तो, वे एक दूसरे की दशा में शुभ फल देते हैं। यदि संबंध न हो तो, एक की महादशा में जब दूसरे की अंतर्दशा आती है तो, अशुभ फल ही प्राप्त होता है।

15. वक्री होने पर ग्रह अधिक बलवान हो जाता है, तथा वह ग्रह जन्म-कुंडली में जिस भाव का स्वामी है, उस भाव को विशेष फल प्रदान करता है।

16. यदि भावाधिपति उच्च, मूल त्रिकोणी, स्वक्षेत्री अथवा मित्रक्षेत्री हो तो शुभ फल करता है।

17. यदि केन्द्र का स्वामी त्रिकोण में बैठा हो, या त्रिकोण केंद्र में हो तो, वह ग्रह अत्यन्त ही श्रेष्ठ फल देने में समर्थ होता है। जन्म-कुंडली में पहला, पाँचवा तथा नवाँ स्थान त्रिकोण स्थान कहलाते हैं। परन्तु कोई ग्रह त्रिकोण में बैठकर केंद्र के स्वामी के साथ संबंध स्थापित करता है तो, वह न्यून योगकारक ही माना जाता है।

18. त्रिक स्थान (कुंडली के 6, 8, 12वें भाव को त्रिक स्थान कहते हैं) में यदि शुभ ग्रह बैठे हों तो, त्रिक स्थान को शुभ फल देते हैं परन्तु स्वयं दूषित हो जाते हैं, और अपनी शुभता खो देते हैं।

19. यदि त्रिक स्थान में पाप ग्रह बैठे हों तो, त्रिक भावों को पापयुक्त बना देते हैं, पर वे ग्रह स्वयं शुभ रहते हैं, और अपनी दशा में शुभ फल देते हैं।

19. त्रिक स्थान के स्वामी यदि किसी भी या अन्य त्रिक स्थान में बैठे हों तो, वे त्रिक स्वामी अपनी दशा या अंतरदशा में शुभ रहते हैं।

20. चाहे अशुभ या पाप ग्रह ही हों, पर यदि वह त्रिकोण भाव में या त्रिकोण भाव का स्वामी होता है तो, उसमे शुभता आ जाती है।

21. एक ही त्रिकोण का स्वामी यदि दूसरे त्रिकोण भाव में बैठा हो तो, उसकी शुभता समाप्त हो जाती है और वह विपरीत फल देते हैं। जैसे पंचम भाव का स्वामी नवम भाव में हो तो, संतान से संबंधित परेशानी रहती है, या संतान योग्य नहीं होती।

22. यदि एक ही ग्रह जन्म-कुंडली में दो केंद्र स्थानों का स्वामी हो तो, शुभफलदायक नहीं रहता। जन्म-कुंडली में पहला, चौथा, सातवाँ तथा दसवां भाव केन्द्र स्थान कहलाते हैं।

23. शनि और राहु विछेदात्मक ग्रह हैं, अतः ये दोनों ग्रह जिस भाव में भी होंगे संबंधित फल में विच्छेद करेंगे, जैसे अगर ये ग्रह सप्तम भाव में हों तो, पत्नी से विछेद रहता है। यदि पुत्र भाव में हों तो, पुत्र-सुख में न्यूनता रहती है।

24. राहू या केतू जिस भाव में बैठते हैं, उस भाव की राशि के स्वामी समान बन जाते हैं, तथा जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उस ग्रह के गुण ग्रहण कर लेते हैं।

25. केतु जिस ग्रह के साथ बैठ जाता है, उस ग्रह के प्रभाव को बहुत अधिक बड़ा देता है।

26. लग्न का स्वामी जिस भाव में भी बैठा होता है उस भाव को वह विशेष फल देता है, तथा उस भाव की वृद्धि करता है।

27. लग्न से तीसरे स्थान पर पापी ग्रह शुभ प्रभाव करता है, लेकिन शुभ ग्रह हो तो मध्यम फल मिलता है।

28. तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में पापी ग्रहों का रहना शुभ माना जाता जाता है।

29. तीसरे भाव का स्वामी तीसरे में, छठे भाव का स्वामी छठे में या ग्यारहवें भाव का स्वामी ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो, ऐसे ग्रह पापी नहीं रहते अपितु शुभ फल देने लग जाते हैं।

30. चौथे भाव में यदि अकेला शनि हो तो उस व्यक्ति की वृद्धावस्था अत्यंत दुःखमय व्यतीत होती है।

31. यदि मंगल चौथे, सातवें , दसवें भाव में से किसी भी एक भाव में हो तो, ऐसे व्यक्ति का गृहस्थ जीवन दुःखमय होता है। पिता से कुछ भी सहायता नहीं मिल पाती और जीवन में भाग्यहीन बना रहता है।

32. यदि चौथे भाव का स्वामी पाँचवे भाव में हो, और पाँचवें भाव का स्वामी चौथे भाव में हो तो, विशेष फलदायक होता है। इसी प्रकार नवम भाव का स्वामी दशम भाव में बैठा हो, तथा दशम भाव का स्वामी नवम भाव में बैठा हो तो, विशेष अनुकूलता देने में समर्थ होता है।

33. अकेला गुरु यदि पंचम भाव में हो तो संतान से न्यून सुख प्राप्त होता है, या प्रथम पुत्र से मतभेद रहते हैं।

34. जिस भाव की जो राशि होती है, उस राशि के स्वामी ग्रह को उस भाव का अधिपति या भावेश कहा जाता है। छठे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी जिन भावों में रहते हैं, उनको बिगाड़ते हैं, किन्तु अपवाद रूप में यदि यह स्वगृही ग्रह हों तो अनिष्ट फल नहीं करते, क्योंकि स्वगृही ग्रह का फल शुभ होता है।

35. छठे भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठेगा, उस भाव में परेशानियाँ रहेगी। उदहारण के लिए छठे भाव का स्वामी यदि आय भाव में हो तो वह व्यक्ति जितना परिश्रम करेगा उतनी आय उसको प्राप्त नहीं हो सकेगी।

36. यदि सप्तम भाव में अकेला शुक्र हो तो उस व्यक्ति का गृहस्थ जीवन सुखमय नहीं रहता और पति-पत्नी में परस्पर अनबन बनी रहती है।

37. अष्टम भाव का स्वामी जहाँ भी बैठेगा उस भाव को कमजोर ही करेगा।

38. शनि यदि अष्टम भाव में हो तो, उस व्यक्ति की आयु लम्बी होती है।

39. अष्टम भाव में प्रत्येक ग्रह कमजोर होता है, परन्तु सूर्य या चन्द्रमा अष्टम भाव में हो तो कमजोर नहीं रहते।

40. आठवें और बारहवें भाव में सभी ग्रह अनिष्टप्रद होते हैं, लेकिन बारहवें घर में शुक्र इसका अपवाद है, क्योंकि शुक्र भोग का ग्रह है, बारहवां भाव भोग का स्थान है। यदि शुक्र बारहवें भाव में हो तो, ऐसा व्यक्ति अतुलनीय धनवान एवं प्रसिद्ध व्यक्ति होता है।

41. द्वादश भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठता है, उस भाव को हानि पहुँचाता है।

42. दशम भाव में सूर्य और मंगल स्वतः ही बलवान माने गए हैं, इसी प्रकार चतुर्थ भाव में चन्द्र और शुक्र, लग्न में बुध तथा गुरु और सप्तम भाव में शनि स्वतः ही बलवान हो जाते हैं, तथा विशेष फल देने में सहायक होते हैं।

43. ग्यारहवें भाव में सभी ग्रह अच्छा फल करते हैं।

44. अपने स्वामी ग्रह से दृष्ट, युत या शुभ ग्रह से दृष्ट भाव बलवान होता है।

45. किस भाव का स्वामी कहाँ स्थित है, तथा उस भाव के स्वामी का क्या फल है, यह भी देख लेना चाहिए।

46. यदि कोई ग्रह जिस राशि में है, उसी नवमांश में भी हो तो, वह वर्गोत्तम ग्रह कहलाता है, और ऐसा ग्रह पूर्णतया बलवान माना जाता है, तथा श्रेष्ठ फल देने में सहायक होता है।

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श्री दुर्गा सप्तशती

संकलन एवं प्रस्तुति –

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“दुर्गा सप्तशती” इस कल्याणकारी ग्रंथ में 700 श्लोक समाहित हैं, और इस के पाठ में अद्भुत शक्तियां हैं। हर श्लोक एक कल्याणकारी मंत्र है। आगे की पंक्तियों में दुर्गा सप्तशती के कुछ कल्याणकारी श्लोकों की व्याख्या करते हैं :-

सनातन मत में विश्वास रखने वाले सभी देवी दुर्गा के भक्त जानते हैं- नव रात्र के दौरान देवी को प्रसन्न करने के लिए साधक विभिन्न प्रकार के पूजन करते हैं, जिनसे देवी प्रसन्न होकर उन्हें अद्भुत शक्तियां प्रदान करती हैं। ऐसा माना जाता है कि, यदि नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का नियमित पाठ विधि-विधान से किया जाए तो देवी बहुत प्रसन्न होती हैं। दुर्गा सप्तशती में (700) सात सौ प्रयोग हैं जिनके प्रयोग इस प्रकार है:-

मारण के 90, मोहन के 90, उच्चाटन के 200, स्तंभन के 200, विद्वेषण के 60 और वशीकरण के 60।

इसी कारण इसे सप्तशती कहा जाता है। दुर्गा सप्तशती पाठ की विधि :-

– सर्वप्रथम साधक को स्नान कर शुद्ध हो जाना चाहिए।

– तत्पश्चात वह आसन शुद्धि की क्रिया कर आसन पर बैठ जाए।

– माथे पर अपनी रूचि के अनुसार भस्म, चंदन अथवा रोली लगा लें।

– शिखा बाँध लें, फिर पूर्वाभिमुख होकर चार बार आचमन करें।

– इसके बाद प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें, फिर पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ इत्यादि मन्त्र से कुश की पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर देवी को अर्पित करें तथा मंत्रों से संकल्प लें।

– देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार विधि से पुस्तक की पूजा करें।

– फिर मूल नवार्ण मन्त्र से पीठ आदि में आधारशक्ति की स्थापना करके, उसके ऊपर पुस्तक को विराजमान करें। इसके बाद शापोद्धार करना चाहिए।

– इसके बाद उत्कीलन मन्त्र का जाप किया जाता है। इसका जप आदि और अन्त में इक्कीस-इक्कीस बार होता है।

– इसके जप के पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या का जाप करना चाहिए।

– तत्पश्चात पूरे ध्यान के साथ माता दुर्गा का स्मरण करते हुए दुर्गा सप्तशती पाठ करने से सभी प्रकार की मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं।

एक वर्ष में चार नवरात्रें होते हैं, ये शायद बहुत कम लोगों को पत्ता होता है। सर्वोत्तम माह महिना की नवरात्री की मान्यता है। किन्तु क्रम इस प्रकार है – चैत्र, आषाढ़, आश्विन, और माघ। प्रायः उत्तर भारत में चैत्र एवं आश्विन की नवरात्री लोग विशेष धूम धाम से मानते हैं, किन्तु दक्षिण भारत में आषाढ़ और माघ की नवरात्रीयां भी विशेष प्रकार से लोग मनाते हैं । सच तो यह भी है, कि जिनको पत्ता है, वो चारो नवरात्रियों में विशेष पूजन इत्यादि करते हैं।

दुर्गा अर्थात दुर्ग शब्द से दुर्गा बना है, दुर्ग = किला, स्तंभ, शप्तशती अर्थात सात सौ। जिस ग्रन्थ को सात सौ श्लोकों में समाहित किया गया हो, उसका नाम शप्तशती है।

महत्व – जो कोई भी इस ग्रन्थ का अवलोकन एवं पाठ करता है देवी माँ जगदम्बा की उसपर असीम कृपा होती है।

कथा – “सुरथ और “समाधी ” नाम के राजा एवं वैश्य का मिलन किसी वन में होता है, और वे दोनों अपने मन में विचार करते हैं, कि हमलोग राजा एवं सभी संपदाओं से युक्त होते हुए भी अपनों से विरक्त हैं, किन्तु यहाँ वन में, ऋषि के आश्रम में, सभी जीव प्रसन्नता पूर्वक एकसाथ रहते हैं। यह आश्चर्य लगता है, कि क्या कारण है, जो गाय के साथ सिंह भी निवास करता है, और कोई भय नहीं है, जब हमें अपनों ने परित्याग कर दिए, तो फिर अपनों की याद क्यों आती है। वहाँ ऋषि के द्वारा यह ज्ञात होता है, कि यह उसी महामाया की कृपा है, सो पुनः ये दोनों दुर्गा की आराधना करने लगते हैं, और शप्तशती के बारहवे अध्याय में आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, और अपने परिवार से युक्त भी हो जाते हैं।

भाव – जो कोई भी देवी माँ जगदम्बा की शरण लेता है, उसके ऊपर देवी की असीम कृपा होती है। संसार की समस्त बाधा का निवारण होता है। अतः सभी को दुर्गा शप्तशती का पाठ तो करने ही चाहिए, और इस ग्रन्थ को अपने पुरोहित से जानना समझना भी चाहिए।

दुर्गा सप्तशती के अलग-अलग प्रयोग से कामनापूर्ति-

– लक्ष्मी, ऐश्वर्य, धन संबंधी प्रयोगों के लिए पीले रंग के आसन का प्रयोग करें।

– वशीकरण, उच्चाटन आदि प्रयोगों के लिए काले रंग के आसन का प्रयोग करें।

– बल, शक्ति आदि प्रयोगों के लिए लाल रंग का आसन प्रयोग करें।

– सात्विक साधनाओं के प्रयोगों हेतु कुश के बने आसन का प्रयोग करें।

वस्त्र – लक्ष्मी संबंधी प्रयोगों में आप पीले वस्त्रों का ही प्रयोग करें। यदि पीले वस्त्र न हो तो मात्र धोती पहन लें एवं ऊपर शाल लपेट लें। आप चाहे तो धोती को केशर के पानी में भिगोंकर पीला रंग कर सकते हैं।

हवन करने के लिए सामग्री :-

– जायफल से कीर्ति और किशमिश से कार्य की सिद्धि होती है।

– आंवले से सुख और केले से आभूषण की प्राप्ति होती है। इस प्रकार फलों से अर्ध्य देकर यथाविधि हवन करें।

– खांड, घी, गेंहू, शहद, जौ, तिल, बिल्वपत्र, नारियल, किशमिश और कदंब से हवन करें।

– गेंहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

– खीर से परिवार वृद्धि, चम्पा के पुष्पों से धन, और सुख की प्राप्ति होती है।

– आवंले से कीर्ति, और केले से पुत्र प्राप्ति होती है।

– कमल से राज सम्मान, और किशमिश से सुख और संपत्ति की प्राप्ति होती है।

– खांड, घी, नारियल, शहद, जौं और तिल इनसे तथा फलों से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है।

– इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के अनुसार करने से सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। नवरात्र व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

दुर्गा सप्तशती के अध्याय से कामनापूर्ति-

1- पहला अध्याय- हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए।

2- दूसरा अध्याय- मुकदमा झगडा आदि में विजय पाने के लिए।

3- तीसरा अध्याय- शत्रु से छुटकारा पाने के लिये।

4- चौथा अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिये।

5- पाँचवाँ अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिए।

6- छठा अध्याय- डर, शक, बाधा ह टाने के लिये।

7- सातवाँ अध्याय- हर कामना पूर्ण करने के लिये।

8- आठवाँ अध्याय- मिलाप व वशीकरण के लिये।

9- नवाँ अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र प्राप्ति के लिये।

10- दसवाँ अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।

11- ग्यारहवाँ अध्याय- व्यापार व सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिये।

12- बारहवाँ अध्याय- मान-सम्मान तथा लाभ प्राप्ति के लिये।

13- तेरहवाँ अध्याय- भक्ति प्राप्ति के लिये।

वैदिक आहुति की सामग्री –

पहला अध्याय- एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना।

दूसरा अध्याय- पहला अध्याय की सामग्री अनुसार, गुग्गुल विशेष।

तीसरा अध्याय- पहला अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक 38 – एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना।

चौथा अध्याय- पहला अध्याय की सामग्री अनुसार – एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना। श्लोक सं.1 से 11 मिश्री व खीर विशेष।

विशेष:- चौथा अध्याय के मंत्र संख्या 24 से 27 तक इन 4 मंत्रों की आहुति नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से देह नाश होता है। इस कारण इन चार मंत्रों के स्थान पर ॐ नमः चण्डिकायै स्वाहा बोलकर आहुति देना तथा मंत्रों का केवल पाठ करना चाहिए इनका पाठ करने से सब प्रकार का भय नष्ट होते हैं।

पाँचवाँ अध्याय- पहला अध्याय की सामग्री अनुसार – – एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना।श्लोक सं. 9 मंत्र कपूर, पुष्प, व ऋतुफल ही है।

छठा अध्याय- पहला अध्याय की सामग्री अनुसार – एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना। श्लोक सं. 23 भोजपत्र।

सातवाँ अध्याय- पहला अध्याय की सामग्री अनुसार – एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना। श्लोक सं. 10 दो जायफल श्लोक संख्या 19 में सफेद चन्दन श्लोक संख्या 27 में इन्द्र जौं।

आठवाँ अध्याय- पहला अध्याय की सामग्री अनुसार – एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना।श्लोक संख्या 54 एवं 62 लाल चंदन।

नवाँ अध्याय- पहला अध्याय की सामग्री अनुसार – एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना। श्लोक संख्या श्लोक संख्या 37 में 1 बेलफल 40 में गन्ना।

दसवाँ अध्याय- पहला अध्याय की सामग्री अनुसार – एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना। श्लोक संख्या 5 में समुन्द्र झाग 31 में कत्था।

ग्यारहवाँ अध्याय- पहला अध्याय की सामग्री अनुसार – एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना। श्लोक संख्या 2 से 23 तक पुष्प व खीर श्लोक संख्या 29 में गिलोय 31 में भोज पत्र 39 में पीली सरसों 42 में माखन मिश्री 44 में अनार व अनार का फूल श्लोक संख्या 49 में पालक श्लोक संख्या 54 एवं 55 मे फूल चावल और सामग्री।

बारहवाँ अध्याय- पहला अध्याय की सामग्री अनुसार – एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना। श्लोक संख्या 10 मे नीबू काटकर रोली लगाकर और पेठा श्लोक संख्या 13 में काली मिर्च श्लोक संख्या 16 में बाल-खाल श्लोक संख्या 18 में कुशा श्लोक संख्या 19 में जायफल और कमल गट्टा श्लोक संख्या 20 में ऋीतु फल, फूल, चावल और चन्दन श्लोक संख्या 21 पर हलवा और पुरी श्लोक संख्या 40 पर कमल गट्टा, मखाने और बादाम श्लोक संख्या 41 पर इत्र, फूल और चावल।

तेरहवाँ अध्याय- पहला अध्याय की सामग्री अनुसार – एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना।श्लोक संख्या 27 से 29 तक फल व फूल।

साधक जानकारी के अभाव में मन मर्जी के अनुसार आरती उतारता रहता है, जबकि देवताओं के सम्मुख चौदह बार आरती उतारने का विधान है- चार बार चरणों पर से दो बार नाभि पर से, एक बार मुख पर से, सात बार पूरे शरीर पर से। इस प्रकार चौदह बार आरती की जाती है। जहां तक हो सके विषम संख्या अर्थात 1, 5, 7 बत्तियां बनाकर ही आरती की जानी चाहिये।

दुर्गा सप्तशती का पाठ, विधि:-

साधक स्नान करके पवित्र हो आसन-शुद्धि की क्रिया सम्पन्न करके शुद्ध आसन पर बैठे; साथ में शुद्ध जल, पूजन-सामग्री और श्रीदुर्गासप्तशती की पुस्तक रखे। पुस्तक को अपने सामने काष्ठ आदि के शुद्ध आसन पर विराजमान कर दे। ललाट में अपनी रुचि के अनुसार भस्म, चन्दन अथवा रोली लगा ले, शिखा बाँध ले; फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्त्व-शुद्धि के लिये चार बार आचमन करे। उस समय अग्रांकित चार मन्त्रों को क्रमशः पढ़े-

ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।

ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥

ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥

तत्पश्‍चात् प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें; फिर

ॐ पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसवः

उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः।

तस्यते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्॥

इत्यादि मन्त्र से कुश की पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर निम्नांकित रूप से संकल्प करें-

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। ॐ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्‍वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकायने महामाङ्गल्यप्रदे मासानाम्‌ उत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरान्वितायाम्‌ अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवंगुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ सकलशास्त्रश्रुतिस्मृति-पुराणोक्तफलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुकनाम अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतो ग्रहकृतराजकृतसर्वविधपीडा-निवृत्तिपूर्वकं नैरुज्यदीर्घायुःपुष्टिधनधान्यसमृद्ध्यर्थं श्रीनवदुर्गाप्रसादेन सर्वापन्निवृत्तिसर्वाभीष्ट-फलावाप्तिधर्मार्थकाममोक्षचतुर्विधपुरुषार्थसिद्धिद्वारा श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताप्रीत्यर्थं शापोद्धारपुरस्सरं कवचार्गलाकीलकपाठवेदतन्त्रोक्त-रात्रिसूक्तपादेव्यथर्वशीर्षपाठन्यास-विधिसहितनवार्णजपसप्तशतीन्यासध्यानसहित-चरित्रसम्बन्धिविनियोगन्यासध्यानपूर्वकं च “मार्कण्डेय उवाच॥ सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।” इत्याद्यारभ्य “सावर्णिर्भविता मनुः” इत्यन्तं दुर्गासप्तशतीपाठं तदन्ते न्यासविधिसहितनवार्णमन्त्रजपं वेदतन्त्रोक्तदेवीसूक्तपाठं रहस्यत्रयपठनं शापोद्धारादिकं च करिष्ये।

इस प्रकार प्रतिज्ञा (संकल्प) करके देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार की विधि से पुस्तक की पूजा करें, योनिमुद्रा का प्रदर्शन करके भगवती को प्रणाम करें, फिर मूल नवार्णमन्त्र से पीठ आदि में आधार शक्ति की स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तक को विराजमान करें। इसके बाद शापोद्धार करना चाहिये। इसके अनेक प्रकार हैं।

ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा।

इस मन्त्र का आदि और अन्त में सात बार जप करें। यह शापोद्धार मन्त्र कहलाता है। इसके अनन्तर उत्कीलन मन्त्र का जप किया जाता है। इसका जप आदि और अन्तमें इक्कीस-इक्कीस बार होता है। यह मन्त्र इस प्रकार है-

ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा।

इसके जप के पश्‍चात्‌ आदि और अन्त में सात-सात बार मृतसंजीवनी विद्या का जप करना चाहिये, जो इस प्रकार है-

ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।

मारीचकल्पके अनुसार सप्तशती-शापविमोचन का मन्त्र यह है-

ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूं ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं।

इस मन्त्र का आरम्भ में ही एक सौ आठ बार जाप करना चाहिये, पाठ के अन्त में नहीं। अथवा रुद्रयामल महातन्त्र के अन्तर्गत दुर्गाकल्प में कहे हुए चण्डिका-शाप-विमोचन मन्त्रों का आरम्भ में ही पाठ करना चाहिये। वे मन्त्र इस प्रकार हैं-

ॐ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापविमोचनमन्त्रस्य वसिष्ठ-नारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषयः सर्वैश्‍वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्री शक्तिः त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तौ मम संकल्पितकार्यसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।

ॐ (ह्रीं) रीं रेतःस्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिन्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१॥

ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिण्यै महिषासुरसैन्यनाशिन्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥२॥

ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥३॥

ॐ क्षुं क्षुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥४॥

ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥५॥

ॐ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥६॥

ॐ तृं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥७॥

ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥८॥

ॐ जां जातिस्वरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥९॥

ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१०॥

ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥११॥

ॐ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफलदात्र्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१२॥

ॐ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१३॥

ॐ मां मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमसहितायै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१४॥

ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्‍वर्यकारिण्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१५॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१६॥

ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फट् स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै

ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१७॥

ॐ ऐं ह्री क्लीं महाकालीमहालक्ष्मी-

महासरस्वतीस्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नमः॥१८॥

इत्येवं हि महामन्त्रान्‌ पठित्वा परमेश्‍वर।

चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशयः॥१९॥

एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति यः।

आत्मानं चैव दातारं क्षीणं कुर्यान्न संशयः॥२०॥

इस प्रकार शापोद्धार करने के अनन्तर अन्तर्मातृका-बहिर्मातृका आदि न्यास करें, फिर श्रीदेवी का ध्यान करके रहस्य में बताये अनुसार नौ कोष्ठोंवाले यन्त्र में महालक्ष्मी आदि का पूजन करे, इसके बाद छः अंगों सहित दुर्गासप्तशती का पाठ आरम्भ किया जाता है। कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य- ये ही सप्तशती के छः अंग माने गये हैं। इनके क्रम में भी मतभेद हैं। चिदम्बर संहिता में पहले अर्गला फिर कीलक तथा अन्त में कवच पढ़ने का विधान है। किंतु योगरत्नावली में पाठ का क्रम इससे भिन्न है। उसमें कवच को बीज, अर्गला को शक्ति तथा कीलक को कीलक संज्ञा दी गई है। जिस प्रकार सब मन्त्रों में पहले बीज का, फिर शक्ति का तथा अन्त में कीलक का उच्चारण होता है, उसी प्रकार यहाँ भी पहले कवचरूप बीज का, फिर अर्गलारूपा शक्ति का तथा अन्त में कीलकरूप कीलक का क्रमशः पाठ होना चाहिये। यहाँ इसी क्रम का अनुसरण किया गया है।

।। देवी माहात्म्यम् ।।

श्रीचण्डिकाध्यानम्

ॐ बन्धूककुसुमाभासां पञ्चमुण्डाधिवासिनीम् ।

स्फुरच्चन्द्रकलारत्नमुकुटां मुण्डमालिनीम् ।।

त्रिनेत्रां रक्तवसनां पीनोन्नतघटस्तनीम् ।

पुस्तकं चाक्षमालां च वरं चाभयकं क्रमात् ।।

दधतीं संस्मरेन्नित्यमुत्तराम्नायमानिताम् ।

अथवा

या चण्डी मधुकैटभादिदैत्यदलनी या माहिषोन्मूलिनी या धूम्रेक्षणचण्डमुण्डमथनी या रक्तबीजाशनी ।

शक्तिः शुम्भनिशुम्भदैत्यदलनी या सिद्धिदात्री परा सा देवी नवकोटिमूर्तिसहिता मां पातु विश्वेश्वरी ।।

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गोमेद

कब धारण करें- राहु रत्न गोमेद :-

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ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार गोमेद राहु का रत्न है, गोमेद को अंग्रेजी में Hessonite कहते हैं।

गोमेद को ज्योतिष विज्ञान में राहु ग्रह के अनिष्ट व निर्बल प्रभावों को नियंत्रित करने हेतु प्रयुक्त किया जाता है। सुन्दर आकर्षक, चमकदार, चिकना, उल्लू की आंखों के समान, अंगारे तथा मृदु प्रकाश के समान प्रतीत होने वाला यह रत्न पारदर्शक, अर्द्धपारदर्शक व अपारदर्शक रूपों में पाया जाता है। इस रत्न के उत्पादकों के रूप में आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, नोर्वे, चीन, बर्मा, ईरान आदि देशों के नाम काफी प्रमुख हैं, परन्तु श्रीलंका से प्राप्त होने वाले गोमेद रत्न सुन्दरता के दृष्टिकोण से उत्तम श्रेणी के माने जाते हैं। ऐसे भारत में केदारनाथ, त्रावणकोर व बिहार प्रांत के गया जिले के क्षेत्रों से भी गोमेद रत्न प्राप्त होते हैं। परन्तु गुणों के आधार पर इन्हें मध्य श्रेणी का माना जाता है।

वैज्ञानिक स्वरूप:- वैज्ञानिक तौर पर गोमेद रत्न जिरसोनियम आक्साइड, सिलिकन आक्साइड व कैल्शियम का एक ठोस संगठन है, जिसका आपेक्षिक धनत्व 4.65 से 4.71 वर्तनांक 1.93 से 1.98, दुहरावर्तन 0.06 तथा कठोरता 7.5 तक के लगभग आंका जाता है।

प्राकृतिक स्वरूप:- गोमेद रत्न सुडौल मृदुघाट के निर्मल अर्थात माणिक्य, पुखराज, नीलम, लहसुनियाँ आदि रत्नों से कम कठोर, औसत से अधिक वजनदार तथा भूरे, केसर, पीले, गौमूत्र के समान आदि प्रकृतिक रंगों में पाये जाते हैं, जिसमें मधु के समान झाईयाँ पाई जाती हैं।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण :- धन, यश, राजनीति, अनुसंधान, दुर्भाग्य, प्रेतबाधा, चिंता, विलासिता, साहस, क्रोध, शत्रु की पराजय, दुर्घटना, त्वचा व गुप्त रोगों के सूचक राहु ग्रह हैं, और उपरोक्त संबंधित नकारात्मक प्रभाव को नियंत्रित करने हेतु राहु रत्न गोमेद धारण करने की सलाह दी जाती है। राहु के विषय में ज्योतिषीय धारणा है कि राहु के किसी भी राशि का प्रतिनिधित्व न करने के कारण उसके मित्र ग्रह बुध, शुक्र व शनि की राशियां वृष, मिथुन, कन्या, तुला, मकर व मीन के हेतु कारक, समभाव के ग्रह गुरू की राशियाँ धनु व मीन के हेतु सामान्य तथा चंद्र, सूर्य व मंगल के साथ शत्रुभाव रखने के कारण उनकी राशियां कर्क, सिंह, मेष व वृश्चिक राशि के हेतु प्रतिकूल रत्न के रूप में जाना जाता है।

गोमेद रत्न की पहचान:-
– उत्तम श्रेणी के गोमेद रत्न को यदि लकड़ी के बुरादे से घिसें तो इसकी चमक में वृद्धि हो जाती है।
– गोमेद रत्न को गौ-मूत्र में यदि चैबीस, पच्चीस घंटे रख दें तो गौ-मूत्र का रंग बलद जाता है।
– ऐसा माना जाता है कि गोमेद रत्न को यदि गौ के दूध में रख दें तो उस दूध का रंग गौ-मूत्र के समान हो जाता है।

दोष युक्त गोमेद:- गोमेद रत्न खरीदते समय इस बात का ध्यान अवश्य देना चाहिये कि उस पर लाल रंग अर्थात रक्त के समान छीटें ना दिखाई पड़े, ऐसा रत्न संतान सुख के लिये अहितकारी माना गया है। बिना चमक या सुन्न जैसे रत्न को रोगवर्धक व स्त्री सुख के हेतु हानिकारक कहा गया है। कई रंगों की छीटें या धब्बे व जिस रत्न पर गड्ढा पाया जाए उसे धन संपत्ति व पशुधन के हेतु हाानिकारक माना गया है। श्यामल, दुरंगा, दरार व जाल युक्त गोमेद वंश, बंधु, स्थाई निवास, आदि सुखों के हेतु घातक माने जाते हैं तथा इसे धारण करने से भाग्य में व्यवधान उत्पन्न होेने लगता है।

गोमेद रत्न से लाभ व उपयोगिताएं:-
– प्रेत सम्बंधित बाधा अर्थात किसी नकारात्मक शक्ति से किसी भी प्रकार का भय उत्पन्न हो रहा हो तो इस स्थिति में सुरक्षा के दृष्टिकोण से गोमेद रत्न अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है।
– राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय जातक के कार्य व प्रभावों के सिद्धि प्राप्ति हेतु यह रत्न अत्यंत प्रभावकारी माना गया है। जिसे धारण से शत्रु सामने नहीं टिकता।
– आर्थिक लाभ व पद प्रतिष्ठा में वृद्धि हेतु यह रत्न अत्यंत उपयोगी माना गया है।
– अचानक बनते काम में व्यवधान या रूकावटें उत्पन्न होने से हर बार निराशा हाथ लगे तो इस स्थिति में गोमेद रत्न धारण करना लाभकारी माना जाता है।
– गृह कलह, पति-पत्नी के मन मुटाव, घर में दिल न लगे या मन उखड़ा-उखड़ा सा लगे तो इन कष्टों के निराकरण हेतु यह रत्न अत्यंत लाभदायक सिद्ध होता है।

गोमेद रत्न के धारण करने हेतु आधारभूत सिद्धांत:-
– राहु ग्रह से बुध, शुक्र व शनि के नैसर्गिक मित्रों के फलस्वरूप, वृष, मिथुन, कन्या, तुला, मकर व कुंभ राशि व लग्न के जातक इस रत्न को धारण कर सकते हैं।
– लग्नेश का मित्र होकर राहु जन्म कुंडली में प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम व नवम भाव में स्थित हो तो ऐसी स्थिति में इस रत्न को धारण किया जा सकता है।
– द्वितीय व एकादश भाव में स्थित राहु यदि लग्नेश का मित्र हो तो धन व जायदाद सम्बधित लाभ के हेतु इस रत्न को धारण किया जा सकता है।
– यदि जातक की राशि व लग्न मेष, कर्क, सिंह व वृश्चिक हो तो गोमेद धारण करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिये।
– मीन व धनु लग्न के जातक कुछ विशेष परिस्थिति में ज्योतिष परामर्श से गोमेद रत्न धारण कर सकते हैं।
– जन्म कुंडली में राहु षष्ठ, अष्टम व द्वादश भाव में स्थित हो तो गोमेद रत्न धारण करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिये।
– कुंडली में राहु कारक अवस्था में स्थित होकर सूर्य से युक्त या दृष्ट अथवा सिंह राशि में स्थित हो तो राहु की महादशा व अन्तर दशा में इस रत्न को धारण किया जा सकता है।
– यदि कुंडली में राहु कारक होकर मेष, कर्क, वृश्चिक, धनु व मीन राशि में स्थित हो तो राहु की महादशा व अंतर्दशा में गोमेद रत्न को धारण करना श्रेष्ठकर माना जाता है।
– यदि जातक का जन्म आद्र्रा, स्वाती व शतभिषा नक्षत्रों में हुआ हो तो उनके लिये इस रत्न को धारण करना श्रेष्ठकर होगा।

गोमेद रत्न को धारण करने हेतु विधि:-
सबसे पहले तो किसी अनुभवी विद्वान से अपनी कुंडली की जांच करवाकर यह पता लगा लें कि आपके लिए गोमेद धारण करना कैसा रहेगा। यदि आपको गोमेद धारण करने की सलाह दी जाती है तो अंगूठी में पाँच रत्ती से अधिक वजन के गोमेद रत्न को चाँदी अथवा अष्टधातु की अंगूठी में जड़वा लें, फिर इस चाँदी अथवा अष्टधातु से निर्मित अंगूठी को किसी स्वाती नक्षत्र के शनिवार की शाम अपने दाहिने हाथ की मध्यमा अंगुली में प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में धारण करें।

रत्न विज्ञान के अनुसार रत्न धारण करने से अवश्य भाग्य लाभ मिलता है। यदि आप कुंडली दिखाकर रत्न परामर्श लेना चाहते हैं तो सम्पर्क कर सकते हैं :- 09810143516, 09155669922

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विवाह बाधा योग का निवारण?

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कैसे हो, विवाह बाधा योग का निवारण ? यदि इस प्रश्न पर हम ज्योतिषीय संदर्भ में विचार करें तो उत्तर होगा कि मनोनुकूल पत्नी/पति पाना लड़का/लड़की के हाथ में नहीं है। इसके पीछे भारतीय धर्म, सिद्धांत में पुनर्जन्म का सिद्धांत कार्य करता है।

वस्तुत: मनुष्य अपने पूर्वजन्मार्जित कर्मों के अनुसार कर्म फल भोगने के लिये संसार में जन्म लेता है। विधाता तद्नुसार उसका भाग्य निर्धारण कर देते हैं। कौन किसका पति बनेगा और कौन किसकी पत्नी यह भी विधाता के द्वारा तय कर दिया जाता है। वैसे ही योग जन्मांग में दिखाई देते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार लड़कियों की कुंडली में गुरू पति सुख का कारक ग्रह होता है, और लड़कों की कुंडली में शुक्र। कुंडली का सप्तम भाव दाम्पत्य सुख का स्थान होता है। अतः सप्तम स्थान, सप्तमेश तथा गुरू/शुक्र की स्थिति से ही तय होता है कि लड़के/लड़की को कैसा पत्नी पति मिलेगा? भले ही वह अपने मन में कैसे भी पत्नी पति की स्वप्न सजाये हुए हो।

विवाह बाधा योग लड़के, लड़कियों की कुंडलियों में समान रूप से लागू होते हैं, अंतर केवल इतना है कि लड़कियों की कुंडली में गुरू की स्थिति पर विचार तथा लड़कों की कुंडलियों में शुक्र की विशेष स्थिति पर विचार करना होता है।

(1) यदि कुंडली में सप्तम भाव ग्रह रहित हो और सप्तमेश बलहीन हो, सप्तम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तो, अच्छा पति/पत्नी मिल पाना संभव नहीं हो पाता है।

(2) सप्तम भाव में बुध-शनि की युति होने पर भी दाम्पत्य सुख की हानि होती है। सप्तम भाव में यदि सूर्य, शनि, राहू-केतू आदि में से एकाधिक ग्रह हों अथवा इनमें से एकाधिक ग्रहों की दृष्टि हो तो भी दाम्पत्य सुख बिगड़ जाता है।

(3) यदि कुण्डली में सप्तम भाव पर शुभाशुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो पुनर्विवाह की संभावना रहती है। नवांश कुंडली में यदि मंगल या शुक्र का राशि परिवर्तन हो, या जन्म कुंडली में चंद्र, मंगल, शुक्र संयुक्त रूप से सप्तम भाव में हों, तो ये योग चरित्रहीनता का कारण बनते हैं, और इस कारण दाम्पत्य सुख बिगड़ सकता है।

(4) यदि जन्मलग्न या चंद्र लग्न से सातवें या आठवें भाव में पाप ग्रह हों, या आठवें स्थान का स्वामी सातवें भाव में हो, तथा सातवें भाव के स्वामी पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो, तो दाम्पत्य सुख की कल्पना करना भी मुश्किल है।

(5) यदि नवम भाव या दशम भाव के स्वामी, अष्टमेश या षष्ठेश के साथ स्थित हों, या लग्नेश तथा शनि बलहीन हों, चार या चार से अधिक ग्रह कुंडली में कहीं भी एक साथ स्थित हों अथवा द्रेष्काण कुंडली में चन्द्रमा शनि के द्रेष्काण में गया हो, और नवांश कुंडली में मंगल के नवांश में शनि हो, और उस पर मंगल की दृष्टि हो या सूर्य, गुरू, चन्द्रमा में से एक भी ग्रह बलहीन होकर लग्न में दशम में, या बारहवें भाव में हो और बलवान शनि की पूर्ण दृष्टि में हो, तो ये योग जातक या जातिका को सन्यासी प्रवृत्ति देते हैं, या फिर वैराग्य भाव के कारण अलगाव की स्थिति आ जाती है, विवाह की ओर उनका लगाव बहुत कम होता है।

(6) यदि लग्नेश भाग्य भाव में हो तथा नवमेश पति स्थान में स्थित हो, तो ऐसी लड़की भाग्यशाली पति के साथ स्वयं भाग्यशाली होती है। उसको अपने कुटुम्बी सदस्यों द्वारा एवं समाज द्वारा पूर्ण मान-सम्मान दिया जाता है। इसी प्रकार यदि लग्नेश, चतुर्थेश तथा पंचमेश त्रिकोण या केंद्र में स्थित हों तो भी उपरोक्त फल प्राप्त होता है।

(7) यदि सप्तम भाव में शनि और बुध एक साथ हों और चंद्रमा विषम राशि में हो, तो दाम्पत्य जीवन कलहयुक्त बनता है और अलगाव की संभावना होती है।

(8) यदि जातिका की कुुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश एवं गुरू तथा जातक की कुण्डली में सप्तम भाव सप्तमेश एवं शुक्र पाप प्रभाव में हों, तथा द्वितीय भाव का स्वामी छठवें, आठवें या बारहवें भाव में हो, तो इस योग वाले जातक-जातिकाओं को अविवाहित रह जाना पड़ता है।

(9) शुक्र, गुरू बलहीन हों या अस्त हों, सप्तमेश भी बलहीन हो या अस्त हो, तथा सातवें भाव में राहू एवं शनि स्थित हों, तो विवाह नहीं होता है।

(10) लग्न, दूसरा भाव और सप्तम भाव पाप ग्रहोें से युक्त हों, और उन पर शुभ ग्रह की पूर्ण दृष्टि न हो, तो विवाह नहीं होता है।

(11) यदि शुक्र, सूर्य तथा चंद्रमा पुरूषों की कुंडली में तथा सूर्य, गुरू, चंद्रमा, महिलाओं की कुंडली में एक ही नवांश में हों, तथा छठवें, आठवें तथा बारहवें भाव में हों, तो भी विवाह नहीं होता है।
इस प्रकार ज्योतिषीय ग्रंथों में अनेकानेक कुयोग मिलते हैं जो या तो विवाह होने ही नहीं देते हैं, अथवा विवाह हो भी जाये तो दाम्पत्य सुख को तहस-नहस कर देते हैं।

बाधा निवारण हेतु कुछ उपाय:-
इन कुयोगों को काटने के लिए शिव-पार्वती का अनुष्ठान, माँ दुर्गा जी की पूजा अर्चना, कारक ग्रहों के रत्न धारण करना, कुयोग दायक ग्रहों से संबधित मंत्र जप, पूजा अनुष्ठान, दानादि करने से बाधाओं का निराकरण हो जाता है।

(1) वे कन्यायें जिनकी शादी में किसी कारण विलम्ब बाधायें आ रही हों, तो वे इस मंत्र का जप नियमित करें तो उन्हें मनोवांछित वर प्राप्त होता है।

एंव देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः।
सूर्याज्जनम समासाद्य सावर्णिभतिता मनुः।।

(2) वे युवक जिनका किसी कारण से विवाह नहीं हो रहा हो, इस मंत्र का नियमित जप करें तो उन्हें मनोवांछित पत्नी प्राप्त होती है।

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिहणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भ्वाम्।।

(3) गुरूवार का व्रत, सोमवार का व्रत एवं लड़कों के लिए शुक्रवार का व्रत करने से शादी की शीघ्र संभावना बनती है।

(4) माँ कात्यायिनी देवी का मंत्र जाप भी शादी में आने वाली बाधाओं को दूर कर देता है।

‘‘कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरी।
नंद गोप सुतं देवि पतिं में कुरूते नमः’’।

(5) माँ पार्वती के निम्नलिखित मंत्र का नियमित जप करने से भी शीघ्र विवाह की संभावना बनती है।

‘‘हे गौरि शंकरार्धागि यथा त्वं शंकरप्रिया।
तथा माँ कुरू कलयाणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्।।

(6) श्री रामचरितमानस में सीता जी द्वारा गिरिजा पूजन प्रसंग ‘जय-जय गिरिवर राज किशोरी’ से लेकर सोरठा– जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरष न जात कहि। मंगल मंजुल मूल, बाम अंग फरकन लगे।। तक का पाठ करना अथवा राम-जानकी विवाह प्रसंग चैपाई ‘‘समय बिलोकि बशिष्ठ बोलाए। सादर सतानंद सुनि आए।।’’ से लेकर दोहा-

मुदित अवध पति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि।
जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि।।

का पाठ करना चाहिए। इस पाठ को करने से पहले राम-जानकी का फोटो अपने सामने रखें। संकल्प लेकर पाठ करें और अंत में समर्पण कर दें।

(7) यदि विवाह में बाधा का कारण मंगल हो, तो मंगल चंडिका स्तोत्र का पाठ एवं मंगल चंडिका मंत्र का जप करने से भी विवाह हो जाता है। गणेश जी की जप पूजा भी विवाह बाधा का निवारण करती है।

(8) अघोर गौरी का मंत्र भी विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करता है। यह मंत्र इस्लामी साधना का मंत्र कहलाता है। इस मंत्र को प्रतिदिन 1000 बार जपना चाहिए। इसमें रूद्राक्ष की माला का प्रयोग नहीं करते हैं। ऊनी आसन पर पश्चिम की ओर मुख करके बैठा जाता है। सुगंधित अगरबत्ती जलाई जाती है। इसका जप उसी लड़की को करना होता है जिसकी शादी में बाधायें आ रही हों:-

मखनो हाथी जर्द अम्बारी उस पर बैठी कमाल खाँ की सवारी कमाल खाँ कमाल खाँ मुगल पठान बैठे चबूतरे पढ़े कुरान हजार काम दुनिया का करे एक काम मेरा कर ना करे तो तीन लाख तैंतीस हजार पैगम्बरों की दुहाई।

(9) यह एक अनुभूत उपाय है। इसे मैंने कई बार आजमाया है। पीला पुखराज कम से कम सवा पाँच रत्ती वजन का सोने की अँगूठी में गुरूवार के दिन बायें हाथ की तर्जनी में पहना दिया जाये और कम से कम सात रत्ती वजन का फिरोजा चाँदी की अंगूठी में शुक्रवार के दिन बायें हाथ की कनिष्ठिका में धारण किया जाये तो शादी की शीघ्र संभावना बनती है।
इस प्रकार विभिन्न प्रकार के उपाय विवाह बाधा निवारण हेतु मिलते हैं इनमें धारण करने के यंत्र भी सम्मिलित हैं जिन्हें अपनाकर बाधा निवारण किया जा सकता है और दाम्पत्य सुख पाया जा सकता है। यदि कुंडली में वैधव्य योग हों तो शादी के पहले घट विवाह, अश्वत्थ विवाह, विष्णु प्रतिमा या शलिग्राम विवाह में से कोई न कोई विवाह सम्पन्न कराकर विवाह करना चाहिए।

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विवाह में विलम्ब हो या वैवाहिक जीवन में अलगाव की स्थिति आ गई है तो Dr.R.B.Dhawan जी से Telephonic Consultation, या फिर face to face Consultation हेतु संपर्क सकते हैं : गुरूजी आपको best top remedy का सुझाव देंगे :- 09810143516, 09155669922

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पितृदोष

क्या पित्तृश्राप ही पितृदोष का कारण है-

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जिस प्रकार चिकित्सा के क्षेत्र में कुछ रोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशानुसार होते हैं, उसी प्रकार पितृरी दोष भी वंशानुगत होता है। पूर्वजों के प्रति अवांछित कर्मों के फलस्वरूप पितृश्राप उनके वशंजों के जन्मांग में विद्यमान होता है। कई बार पित्तरों के श्राप के कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह श्राप पाँच-पाँच पीढ़ी तक चलता रहता है। श्राद्ध न होने के कारण भी पितृगणों का आक्रोश पितृश्राप के रूप में जन्मांग में विद्यामान होकर जातक को जीवन भर पीड़ित करता रहता है।
जिस प्रकार न्याय प्रणाली अनुसार पूर्वजों का ऋण उनके पुत्रों या वारिसों को अदा करना पड़ता है। उसी प्रकार पिछले जन्मों के अपने या पूर्वजों के दुष्ट और पाप कर्मों या अपने पिछले जन्मों के कर्मो का फल वंशजो को भोगना पड़ता है, जन्मकुंडली में यह दोष ही पितृदोष कहलाता है।

माना कि किसी व्यक्ति विशेष या परिवार में कई पीढ़ियों तक दुखःदायी अवस्थाओं से सघंर्ष करना या अकाल मृत्यु, एकाएक व्यापार में हानि आदि जैसी अन्य घटनाओं को ज्योतिष के परिप्रेक्ष्य में कई कारणों द्वारा समझाया जा सकता है। इन्हीं कारणों में से एक कारण है ‘श्राप’ अथवा पितृश्राप का विश्लेषण या इसके कुप्रभावों का निवारण का वर्णन कम ग्रन्थों में
मिलता है। वृहद पाराशर होरा शास्त्र में 14 प्रकार के श्रापों का वर्णन मिलता है। जिस में मुख्य है पितृश्राप,
प्रेतश्राप, ब्राह्मणश्राप, मातृश्राप, पत्नीश्राप, समुंद्रश्राप, गऊ हत्या श्राप, आदि-2, शास्त्रों में तो मालूम नहीं मगर 36 (छत्तीस) प्रकार के श्रापों को माना गया है। भृगु सूत्र में महर्षि मृगु के अनुसार यदि राहु किसी जातक के जन्मांक में पंचम भावस्थ हो, तो सर्प श्राप के कारण उसे पुत्र का आभाव रहता है। परन्तु राहु के अतिरिक्त अन्य ग्रहों का पंचम भाव से सम्बंध अपेक्षित है। इसी को सर्पश्राप कहते हैं। महर्षि मंत्रेश्वर के अनुसार पंचम भावस्थ राहु के संस्थित होने से प्रेत बाधा की प्रबल सम्भावना रहती है।

किसी श्राप का अशुभ प्रभाव वंश विशेष के लिए पितृदोष के रूप मैं प्रकट होकर अन्यान्य सुखों को आक्रांत और आंतकित करता है। इसलिये अकसर देखने में आता है कि, एक ही वंश के अनेक सदस्यों को परिवार में समान योग विद्यामान होता है। ‘कालसर्प योग’ भी एक प्रकार का पितृदोष ही है, जो कई पीढ़ियों तक व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करता रहता है! इस प्रकार के श्राप की मुक्ति हेतु अनेक परिहार शास्त्रोक्त हैं। जिनका गंभीरता से अनुसरण करना हितकर है। कम से कम तीन पीढ़ीयों तक श्राप का प्रभाव वंश विशेष को आंतकित और भयभीत करता है।

राहु के कारण उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के श्राप हैं, जो व्यक्ति के जीवन की अनुकूलता, प्रतिकूलता में परिवर्तित करते है। राहु जैसे क्रूर ग्रह के कारण उपजने वाले श्राप के वास्तविक प्रभाव को पूर्ण रूप से समझना या समझ पाना तो सम्भव नहीं है। परन्तु कुछ निजी अनुभवों का उल्लेख हम यहाँ कर रहे हैं। फिर भी आवश्यकता होने पर आप मेरे 32 वर्षीय अनुभव का लाभ Telephonic Astrological Appointment द्वारा प्राप्त कर सकते हैं।

कुंडली में यदि राहु-शुक्र से संयुक्त होकर चतुर्थ भाव में हो तो परिवार की स्त्रियों को प्रेतबाधा या भूतबाधा व्याधि द्वारा कष्ट प्राप्त होता है। यहाँ प्रेतात्मा किसी नारी को अपना कर तरह-तरह के कष्ट पहुँचाती है।

चतुर्थ भावगत राहु और दशम भाव में मंगल का योग हो तो उस व्यक्ति के निवास स्थान को दोषयुक्त कर देता है, जहाँ पर निरन्तर हानि, बाधा, व्याधि, असफलता और चिन्ता जातक को व्याप्त रहते हैं। प्रेतबाधा की संभावना से घर के सारे वातावरण को, प्रसन्नता के, और उन्नति, समृद्धि को ग्रहण लग जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप संतति हानि अथवा धन हानि नारियों को बार-बार गर्भपात की स्थिति उत्पन्न होती है। उल्लेखनीय है कि घर में प्रेतबाधा का कारण पूर्व जन्म में मंगल दोष या यूँ कहें कि मंगल श्राप के कारण उत्पन्न होता है। जिसे जन्मांग में पितृदोष के रूप में देखा जा सकता है।

किसी भी श्राप को भलि-भाँति जानना आवश्यक है, यदि राहु का सम्बंध द्वितीय या चतुर्थ भाव से हो रहा हो या उन भावों के स्वामियों से राहु की युति हो तो कुटुम्ब में एक प्रकार का कष्ट दृष्टिगत होता है। चतुर्थ भाव के अंतर्गत पति-पत्नी और संतति को दर्शाता है। जबकि द्वितीय भाव माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, पत्नी संतान मौसा-मौसी, बुआ-फूफा, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मामा-मामी आदि आते हैं। द्वितीय भाव पर राहु के प्रभाव के कारण परिवार में किसी की मृत्युश्राप के कारण या प्रेतबाधा का होना संभव है। मृतक की सम्पत्ति और धन उस व्यक्ति को प्राप्त होता है। जिसके जन्मांग में द्वितीय भाव शापित होगा, उस व्यक्ति का विनाश भी इसी प्रकार की धन सम्पत्ति प्राप्त करने से होता है। सम्पत्ति का कोई सुख प्राप्त नहीं होता।

चतुर्थ भाव में राहु की स्थिति जातक को हमेशा ही आशान्त और चिंताग्रस्त रखती है। यदि यहाँ राहु के साथ शनि, सूर्य अथवा चन्द्रमा भी चतुर्थ भावगत हो तो श्राप के प्रभाव में वृद्धि होती है तथा ऐसे व्यक्ति को कष्ट, दुख, अवरोध तथा असीमित वेदना प्रदान करता है।

जब राहु किसी भाव में उसके भावाधिपति से सयुंक्त हो, तो उस भाव से सम्बन्धित श्राप अधिक मात्रा में दृष्टिगत होता है। श्राप में वृद्धि का कारण यह है कि उस भाव को राहु आक्रांत करता है, साथ में उस भाव के स्वामी या कारक को भी अपनी युति द्वारा श्रापग्रस्त करता है। अतः श्राप के अशुभ प्रभाव का स्पष्ट विस्तार का आभास होता है।

चतुर्थ भाव में राहु और चंद्रमा की युति से परिवार से श्राप का प्रभाव अवश्य होता है। द्वितीय भाव में राहु और शुक्र की युति भी श्राप प्रदर्शित करती है क्योंकि चतुर्थ भाव चंद्रमा का है और द्वितीय भाव शुक्र का है, इसलिये श्राप का प्रभाव ज्यादातर नारियों पर ही पड़ता है। कष्ट जैसे बांझपन, सन्तति हीनता, वैधव्य या व्याधिग्रस्त रहने का कारण भी सम्भव है।

शांति के उपाय:-
ग्रहयोगवशेनैव नृणां ज्ञात्वाऽनपत्यताम्।
तछोषपरिहारार्थ नागपूजा समाचरेत्।।
स्वगृह्योक्तविधानेन प्रतिष्ठा कारयेत् सुधीः।
नागमूर्ति सुवर्णेन कृत्वा पूजां समाचरेत्।।
गो-भू-तिल-हिरण्यादि दद्याद् वित्तानुसारतः।
एवं कृते त, नागेन्द्रप्रसादात् वर्धते कुलम्।।

अनपत्यता का कारण यदि सर्प श्राप हो, तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार नागदेव की स्वर्ण की मूर्ति बनाकर प्रतिष्ठा करके उनकी पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् गाय, भूमि, तिल, स्वर्ण आदि का दान करें, तो शीघ्र ही नागराज की कृपा से पुत्र उत्पन्न होकर कुल की वृद्धि करता है।

पितृश्राप का शांति उपायः-
गया में श्राद्ध करना तथा यथाचित अधिक से अधिक ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये अथवा कन्यादान और गोदान करना चाहिये। यदि अपनी कन्या नहीं है तो किसी अन्य कन्या का विवाह में कन्यादान करें, क्योंकि संतान हीनता का पूर्ण प्रभाव होने पर कन्या या पुत्र का अभाव होगा।

मातृश्राप का उपाय:-
सेतुस्नानं प्रकर्तव्यं गायत्री लक्षसंख्यक।

रौष्यमात्रं पयः पीत्वा ग्रहदान प्रयत्नतः।।
ब्राह्मणान् भोजयेतद्धदश्वत्थस्य व्रदक्षिणाम्।

कर्तव्यं भक्तिमुक्तेन चाष्टोत्तरसहस्त्रकम।।
एवं कृते महादेवि।

श्रापानमोक्षो भविष्यति, सुपुत्रं लभते पश्चात् कुल वृद्धिश्चजायेतं।।

अर्थात:- रामेश्वरम् में स्नान, एक लाख वार गायत्री जप, ग्रहों का दान, ब्राह्मण भोजन, 1008 बार पीपल की प्रदक्षिणा करने से श्राप की शांति होकर पुत्र प्राप्ति तथा कुल की वृद्धि होती है।

भ्रातृश्राप की शांति हेतु उपाय:-
भ्रातृश्रापविमोक्षार्थ वंशस्य श्रवणं हरेः।

चान्द्रायणं चरेत् पश्चात् कावेर्या विष्णु सन्निधौ।।
अश्वत्थस्थापनं कुर्यात् दश धने्श्च दापयेत्।

पत्नी हस्तेन पुत्रेच्छुर्भूमि दद्यात् फलान्विताम्।।
एवं यः कुरूते भक्त्या धर्मपल्या समन्वितः।
ध्रुवं तस्य भवेत् पुत्रः कुलवृद्धिश्च जायते।।

अर्थात:- हरिवंश पुराण को श्रवण करने से भ्रातृश्राप की शांति हो जाती है। नदी तट पर या शालिग्राम के सम्मुख चान्द्रायण व्रत करने से, पीपल वृक्ष का रोपण कर पूजन करने से भी भ्रातृ श्राप की परिशांति होती है। इसके अतिरिक्त दस गायों के दान करने से तथा पत्नी के हाथों भूमिदान कराने से इस श्राप से मुक्ति होती है।

मातुलश्राप हेतु:-
बायी कूपतऽगादि निर्माणं सेतु – बन्धनम्।

पुत्र वृद्धिर्भवेतस्य सम्पदवृद्धिश्च जायते।।

अर्थात:- उपरोक्त मातुलदोष शमनार्थ विष्णु की स्थापना करें। कुआँ तालाब बनवाएँ। पुल का निर्माण करवायें तो पुत्र की प्राप्ति और सम्पत्ति की भी वृद्धि होती है।

पत्नीश्राप हेतु:-
श्रापमुक्त्यै च कन्यायां सत्यां तद्दानमाचरेत्।

कन्याभावे च श्री विष्णोमूर्मि लक्ष्मी समन्विलाम्। दद्यात् स्वर्णमयी विप्र दशधेनुसमन्विताम्।।
शय्यां च भूषण वस्त्रं दम्पतिम्यां द्विजन्मनाम्।

धु्रवं तस्य भवेत पुत्रो भाग्य वृद्धिश्च जायते।।

अर्थात:- यदि कन्या हो जो कन्यादान करने से तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोने की लक्ष्मीनारायण की मूर्ति तथा बछडे सहित 10 गायों, शय्या, भूषण और वस्त्र आदि ब्राह्मण को दान करने से पुत्र की प्राप्ति होती है।

प्रेतश्राप हेतु:- गया में पिण्डदान करने तथा रूद्राभिषेक करने से प्रेतश्राप की शांति होती है ब्रह्मा की सोने की मूर्ति बनवाकर गाय, चाँदी का पात्र और नीलम दान करना चाहिये एवं यथा शक्ति ब्राह्मण भोजन करवाकर उन्हें दक्षिणा दें।

ज्योतिष शास्त्र हमारे जीवन की भावी योजनाओं तथा पूर्वजन्मकृत श्राप के निवारणार्थ प्रमाणिक विज्ञान (विद्या) है, अत: श्राप सम्बंधित मार्गदर्शन भी बेहतर मिल सकता है।

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दिल लगाने से पहले

दिल लगाने से पहले गुण भी मिला लीजिए :-

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कबीरदास जी ने कहा है-
पोथी पढ पढ जग मुआ पंडित भयो न कोई।
ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होई।।

प्रेम एक दिव्य अलौकिक एवं वंदनीय तथा प्रफुल्लता देने वाली स्थिति है। प्रेम मनुष्य के करुणा-दुलार-स्नेह की अनुभूति देता है। फिर चाहे यह भक्त का भगवान से हो, माता का पुत्र से या प्रेमी का प्रेमिका के लिए प्रेम हो सभी का अपना महत्त्व है।

प्रेम और विवाह, विवाह और प्रेम दोनों के समान अर्थ हैं लेकिन दोनों के क्रम में परिवर्तन है। विवाह पश्चात् पति या पत्नी के बीच समर्पण व भावनात्मकता प्रेम का एक पहलू है प्रेम संबंध का विवाह में परिणीत होना इस बात को दर्शाता हैं कि प्रेमी प्रमिका, एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से इतना जुड़े हैं कि जीवन भर साथ रहना चाहते हैं।

सर्वविदित है कि हिन्दू संस्कृति में जिन 16 संस्कारों का वर्णन किया है उनमें से विवाह एक महत्त्वपूर्ण संस्कार है। जीवन के विकास, उसमें, सरलता और सदृष्टि को नये आयाम देने के लिए विवाह परम आवश्यक प्रक्रिया है। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है। प्रेम और विवाह आदर्श स्थितियों में वंदनीय, आनंददायक और प्रफुल्लता देने वाला है।

वर्तमान आधुनिक परिवेश, खुला वातावरण एवं इंटरनेट संस्कृति के कारण हमारी युवा पीढ़ी अपने लक्ष्यों से भटक रही है। बिना सोच विचार किए गए प्रेम-विवाह शीघ्र ही मन मुटाव के चलते तलाक तक पहुँच जाते हैं, इंटरनेट के अलावा टी.वी. धारावाहिकों एवं फिल्मों की देखादेखी युवक-युवती एक दूसरे को आकर्षित करने का प्रयास करते हैं।

रोज डे, वेलेन्टाईन डे, जैसे अवसर पर इस कार्य को बढ़ावा देते हैं। प्यार-मोहब्बत करें, लेकिन सोच समझकर अवसाद का शिकार होने, आत्महत्या से बचने या बदनामी से बचने हेतु दिल लगाने से पूर्व अपने साथी से अपने गुण-विचार ठीक प्रकार मिला लें ताकि भविष्य में पछताना ना पड़ें। सोच समझ कर निर्णय लें।

ग्रहों के कारण व्यक्ति प्रेम करता है, और इन्हीं ग्रहों के प्रभाव से दिल भी टूटते हैं। ज्योतिष ग्रंथों में प्रेम-विवाह के योगों के बारे में स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता है, परन्तु जीवन-साथी के बारे में अपने समान कुल, जाति, वर्ण या अपने से अन्य या निम्न स्तरीय का विस्तृत विवरण है, कोई भी स्त्री-पुरूष अपने उच्च/नीच स्तर में तभी विवाह करेगा जब वे दोनों प्रेम करते होंगे।

आज की पढ़ी-लिखी और घोर भौतिकवादी युवापीढ़ी प्रेम-विवाह की ओर आकर्षित हो रही है। कई बार प्रेम एक-दूसरे की देखा देखी या फैशन के तौर पर पर भी होता है किन्तु जीवनपर्यन्त निभ नहीं पाता।ग्रह-अनुकूल नहीं होने के कारण ऐसी स्थिति बनती हैं। शास्त्रों में प्रेम-विवाह को गंधर्व विवाह के नाम से जाना जाता है।

किसी युवक-युवती के मध्य प्रेम की जो भावना पैदा होती है, वह सब उनके ग्रहों का प्रभाव ही होता है, जो कमाल दिखाता है। ग्रह हमारी मनोदशा, पसंद, नापसंद और रूचियों को तय करते हैं, और बदलते भी हैं। वर्तमान प्रेम विवाह, बहुत हद तक गंधर्व विवाह का ही परिवर्तित रूप है।

प्रेम विवाह के कुछ मुख्य योगः-
1. लग्नेश का पंचम से संबंध हो और जन्मपत्रिका में पंचमेश सप्तमेश का किसी भी रूप में संबंध हो। शुक्र, मंगल की युति, शुक्र की मंगल की राशि में स्थिति, मंगल की शुक्र की राशि में स्थिति और लग्न त्रिकोण का संबंध प्रेम संबंधों का सूचक है। पंचम या सप्तम भाव में शुक्र सप्तमेश या पंचमेश के साथ हो।

2. किसी की जन्मपत्रिका में लग्न, पंचम, सप्तम भाव व इनके स्वामियों और शुक्र तथा चन्द्रमा जातक के वैवाहिक जीवन व प्रेम संबंधों को समान रूप से प्रभावित करते हैं लग्न या लग्नेश का सप्तम और सप्तमेश का पंचम भाव व पंचमेश से किसी भी रूप में संबंध प्रेम संबंध की सूचना देता है। यह संबंध सफल होगा अथवा नहीं इसकी सूचना ग्रह योगों की शुभ-अशुभ स्थिति देती है।

3. यदि सप्तमेश लग्नेश से कमजोर हो या यदि सप्तमेश अस्त हो तो अथवा जिस राशि में हो या नवांश में नीच राशि हो तो जातक का विवाह अपने से निम्न कुल में होता है। इसके विपरीत लग्न से सप्तमेश बली हो, शुभ नवांश में हो तो जीवन-साथी उच्चकुल का होता है।

4. पंचमेश सप्तम भाव में हो अथवा लग्नेश और पंचमेश भाव के स्वामी के साथ लग्न में स्थित हो। सप्तमेश पंचम भाव में हो और लग्न से संबंध बना रहा हो। पंचमेश सप्तम भाव में हो उसका संबंध लग्नेश से हो। पंचमेश सप्तम में हो और सप्तमेश पंचम में हो। सप्तमेश लग्न में और लग्नेश सप्तम में हो, साथ ही पंचम भाव के स्वामी से दृष्टि संबंध हो तो भी प्रेम संबंध का योग बनता है।

5. पंचम में मंगल भी प्रेम-विवाह करवाता है। यदि राहु पंचम या सप्तम में हो तो विवाह की संभावना होती है। सप्तम भाव में यदि मेष राशि में मंगल हो तो प्रेम विवाह होता है। सप्तमेश और पंचमेश एक-दूसरे के नक्षत्र पर हों तो भी प्रेम विवाह का योग बनता है। शुक्र व गुरु दोनों विवाह के कारक है। यदि यह एक-दूसरे को देखें तब भी प्रेम विवाह होता है।

6. पंचमेश तथा सप्तमेश कहीं भी, किसी भी तरह से द्वादशेष से संबंध बनाएं। लग्नेश या सप्तमेश का आपस में स्थान परिवर्तन अथवा आपस में युति होना अथवा दृष्टि संबंध।

7. दाराकारक और पुत्रकारक की युति भी प्रेम-विवाह कराती है। पंचमेश और दाराकारक का संबंध भी प्रेम-विवाह करवाता है। (जैमिनी सुत्रानुसार)

8. सप्तमेश स्वग्रही से, लग्न में राहु हो, शनि और केतु 7वें स्थान में हों, एकादश स्थान पापग्रहों के प्रभाव में बिल्कुल ना हो, शुक्र लग्न में लग्नेश के साथ, मंगल सप्तम भाव में हो, सप्तमेश के साथ, चन्द्रमा लग्न में लग्नेश के साथ हो।

9. अन्तर्जातीय विवाह योग- कर्क लग्न हो, सप्तम में चन्द्रमा पर शनि की दृष्टि हो, नवम भाव, सप्तम भाव तथा नवमेश होकर बृहस्पति का पाप ग्रहों से संबंध हो, कर्क लग्न में शनि होने पर अन्तर्जातीय विवाह होता है।

प्रेम विवाह असफल रहने/दिल टूटने के कारणः-

1. शुक्र व मंगल की स्थिति व प्रभाव प्रेम संबंधों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यदि किसी जातक की कुण्डली में सभी अनुकूल स्थितियां होते हुए भी शुक्र की स्थिति अनुकूल नहीं हो तो प्रेम संबंध टूटकर दिल टूटने की घटना होती है।

2. सप्तम भाव या सप्तमेश का पाप पीड़ित होना, पाप योग में होना, वह प्रेम विवाह की सफलता पर प्रश्न लगाता है। पंचमेश व सप्तमेश दोनों की स्थिति इस प्रकार हो कि उनका सप्तम-पंचम से कोई दृष्टि संबंध न हो तो प्रेम की असफलता दृष्टिगत होती है।

3. शुक्र का सूर्य के नक्षत्र में होना और उस पर चन्द्रमा का प्रभाव होने की स्थिति में प्रेम संबंध होने के उपरान्त या परिस्थितिवश विवाह हो जाने पर भी सफलता नहीं मिलती। शुक्र का सूर्य-चन्द्रमा के मध्य परिस्थितिवश विवाह हो जाने पर भी सफलता नहीं मिलती। शुक्र का सूर्य-चन्द्रमा के मध्य में होना असफल प्रेम का कारण हैं।

4. पंचम व सप्तम भाव के स्वामी ग्रह यदि धीमी गति के ग्रह हों तो प्रेम संबंधों का योग होने पर चिर स्थायी प्रेम की अनुभूति दर्शाता हैं। इस प्रकार के जातक जीवन भर प्रेम प्रसंगों को नहीं भूलते चाहे वे सफल हो या असफल।

प्रेम विवाह को मजबूत करने के उपायः-
1. शुक्र देव की पूजा करें।
2. पंचमेश व सप्तमेश की पूजा करें।
3. पंचमेश का रत्न धारण करें।
4. ब्लयू टोपाज- सुखद दामपत्य एवं वशीकरण हेतु।
5. चन्द्रमणी- प्रेम प्रसंग मे सफलता हेतु।
प्रेम विवाह के लिए जन्मकुण्डली के पहले, पांचवे, सप्तम भाव के साथ-साथ 12वें भाव को भी देखें क्योंकि विवाह के लिए 12वां भाव भी देखा जाता है। यह भाव शय्या सुख का भी है। इन भावों के साथ-साथ इन भावों के स्वामियों की स्थिति का पता करना होता है। यदि इन भावों के स्वामियों का संबंध किसी भी रूप से अपने भावों से बना रहा हो तो निश्चित रूप से जातक प्रेम विवाह करता है।

अन्तरजातीय विवाह के मामले में शनि की मुख्य भूमिका होती है। यदि कुण्डली में शनि का संबंध किसी भी रूप में प्रेम-विवाह कराने वाले भावेशों के भाव से हो जातक अन्तरजातीय विवाह करेगा। जीवन-साथी का संबंध 7वें भाव से होता है। जबकि पंचम भाव को संतान, उदर एवं बुद्धि का भाव माना गया है लेकिन यह भाव प्रेम को भी दर्शाता है। प्रेम विवाह के मामलों में यह भाव विशेष भूमिका दर्शाता है।

प्रेम संबंध का परिणाम विवाह होगा या नहीं, इस प्रकार की स्थिति में ज्योतिष का आश्रय लेकर काफी हद तक बचा जा सकता है। दिल लगाने से पूर्व या टूटने की स्थिति ना आए इस हेतु प्रेमी-प्रेमिका को अपनी जन्मपत्रिका के ग्रहों की स्थिति किसी योग्य ज्योतिषी से अवश्य पूछ लेनी चाहिए कि उनके जीवन में प्रेम की घटना होगी या नहीं। प्रेम ईश्वर का वरदान हैं। प्रेम करें अवश्य लेकिन सोच समझ कर।

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अष्टमेश

क्या कुंडली का अष्टमेश सदा दु:खदाई होता है?:-

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किसी भी जन्म-पत्रिका की लग्न कुंडली में छठा तथा आठवाँ स्थान कुंडली के सबसे खराब घर माने जाते हैं कारण कि छठा घर रोग, कर्ज तथा शत्रुओं का है, तथा आठवाँ स्थान आयु स्थान! दूसरे शब्दों में मृत्यु स्थान है। जैसा कि सर्व विदित है कि कुंडली के जिस घर में जो राशि होती है उस राशि का मालिक ग्रह उस घर का मालिक माना जाता है, अतः कुंडली के आठवें घर में जो राशि होगी उस राशि का मालिक ग्रह आठवें घर का मालिक अर्थात अष्टमेश कहलायेगा।

चूँकि अष्टम स्थान आयु का स्थान है, और आयु समाप्त होने से बुरी घटना किसी इंसान के जीवन में कभी हो नहीं सकती, अर्थात् यह पाप स्थान, खराब स्थान है, महऋषि पराशर ने वृहत्पराशर होरा शास्त्र में अष्टम स्थान को छिद्र, खर स्थान कहा है। अष्टम वह स्थान है, जहां किसी भी अन्य स्थान का स्वामी आकर अपनी शुभता इस प्रकार खो देता है जैसे कोई जीव कुंआ में डूब जाता है, और जीवित नहीं रहता। यह तो स्वाभाविक बात है कि इसका मालिक ग्रह भी पापी होगा चाहे वो नैसर्गिक रूप से शुभ ग्रह यथा चन्द्रमा, बुध, गुरू या शुक्र ही हो, किन्तु यदि वह अष्टम स्थान का मालिक है तो अपना पाप प्रभाव ही देगा। ऐसे में यदि अष्टम स्थान में अन्य स्थान का स्वामी कैसे शुभ फलदाई रहेगा। अष्टम स्थान का मालिक ग्रह अर्थात अष्टमेश यदि कुण्डली में लग्न में बैठ जाये लग्न यानि कुण्डली का पहला घर तो निश्चय ही वह उस जातक का आत्मबल शीण कर देगा। उस व्यक्ति को सारी उम्र मानसिक परेशानियाँ, चिन्ता इत्यादि से त्रस्त रखेगा। कारण की किसी व्यक्ति की कुण्डली में लग्न उसका अपना घर होता है, उसका मन-मस्तिष्क होता है, लग्न से हम किसी व्यक्ति के शरीर उसकी आत्मा तथा आत्मविश्वास की गणना करते हैं, यदि उसमें पापी ग्रह पाप स्थान अष्टम का स्वामी बैठ जाये तो निश्चय ही वो अपना पाप प्रभाव ही देगा, किसी भी सूरत में शुभ प्रभाव नहीं दे सकता, भले ही उसके साथ कोई शुभ ग्रह ही क्यों न बैठा हो या केन्द्र-त्रिकोण का मालिक कोई ग्रह ही ना हो, अपितु अष्टमेश उस शुभ ग्रह का शुभ प्रभाव भी कम कर देता है।

जैसा कि सब ज्योतिष के विद्वान जानते हैं सभी ग्रहों की सातवीं पूर्ण दृष्टि होती है, और जब कोई ग्रह लग्न में होगा तो स्वाभाविक है कि उस ग्रह की सातवीं दृष्टि सप्तम भाव यानि पुरूष की कुंडली में पत्नी के स्थान पर और स्त्री की कुंडली में पति के स्थान पर पड़ेगी, ऐसी स्थिति में वह सातवें स्थान को प्रताड़ित करे बिना नहीं रह सकता, जिस किसी भी व्यक्ति की कुण्डली में अष्टमेश लग्न में बैठा होगा उसके अपनी पत्नी अथवा पति से मधुर सम्बंधों में निश्चित रूप से कमी लायेगा।

यहाँ विचारणीय बात यह भी है कि कई ग्रहों की सातवीं के अतिरिक्त भी कई दूसरी पूर्ण दृष्टियाँ होती हैं जैसे मंगल की चौथी और आठवीं, गुरू, राहु, केतु की पाँचवी तथा नौवीं एवं शनि की तीसरी तथा दसवीं, ऐसी परिस्थिति में वह ग्रह सातवीं के अतिरिक्त जिन-जिन घरों पर अपनी दृष्टियाँ डालेंगे उन-उन घरों को भी निश्चित रूप से प्रभावित करेंगे।

मेष लग्न की कुंडली में अष्टमेश मंगल होता है, इसमें हालांकि मंगल लग्नेश भी है और लग्न में मंगल किसी सुहागिन स्त्री के माथे पर चमकती हुई बिन्दी की जैसे प्रतीत तो होता है, किन्तु उसकी स्थिति सुहागन होते हुये भी पति से ठुकराई हुई स्त्री की जैसी होगी, और वह पूर्ण लग्नेश का फल नहीं प्रदान कर लग्नेश एवं अष्टमेश का मिला-जुला असर प्रदान करता है, और लग्न, चतुर्थ, सप्तम एवं अष्टम स्थान को प्रभावित करता है। वृषभ लग्न में अष्टमेश गुरू होता है, और यदि गुरू लग्न में हो तो लग्न, पंचम, सप्तम तथा नवम भाव को प्रभावित करता है। मिथुन लग्न में अष्टमेश शनि होता है। इसमें शनि भाग्येश भी होता है किन्तु फिर भी लग्न में शनि हो तो अपना अष्टम स्थान का पाप प्रभाव नहीं छोड़ता, और लग्न, तृतीय, सप्तम एवं दशम स्थान को प्रभावित करता है। कर्क लग्न में भी अष्टमेश शनि होता है, इसमें शनि अष्टम के साथ-साथ सप्तम भाव का भी मालिक होता है अतः अत्यधिक पाप प्रभावित हो जाता है, और लग्न में होने से ज्यादा पीड़ादायक रहता है, और लग्न, तृतीय, सप्तम एवं दशम भाव को प्रभावित करता है।

सिंह लग्न में गुरू अष्टम स्थान का अधिपति होकर यदि लग्न में हो तो त्रिकोण का मालिक होने के बावजूद वह अपना पूर्ण फल प्रदान नहीं करता है, कन्या लग्न में मंगल अष्टमेश होता है, जो तृतीयेश भी है, और चूँकि तृतीय स्थान भी आयु का स्थान माना जाता है, अतः मंगल यहाँ पूर्ण पाप प्रभाव में होकर शुभ फल प्रदान नहीं कर सकता, तुला लग्न में शुक्र जो कि लग्नेश भी होता है, साथ ही अष्टमेश भी होता है, इसकी स्थिति भी वही रहती है, जो मेष लग्न में मंगल की होती है, वृश्चिक लग्न में बुध अष्टमेश होता है, और यदि बुध लग्न में हो तो, लग्न एवं सप्तम स्थान को प्रभावित करता है।

इसी प्रकार धनु लग्न में चन्द्रमा अष्टम का मालिक होकर यदि लग्न में हो तो, लग्न एवं सप्तम स्थान को प्रभावित करें बिना नहीं रहता है, मकर लग्न में सूर्य अष्टमेश होकर यदि लग्न में हो तो, लग्न एवं सप्तम स्थान को खराब करे बिना नहीं छोड़ता है। यहाँ विशेष रूप से ध्यान देने योग्य यह बात है कि सूर्य जो कि नौ ग्रहों में सबसे ज्यादा क्रूर गह है, जिस घर में बैठता है, और जिस पर अपनी दृष्टि डालता है, दोनों के शुभ प्रभावों में कमी कर देता है, मेरे व्यक्तिगत अनुभव में कई कुंडलियों में यह देखने में आया है कि यदि मकर लग्न में सूर्य लग्न में है तो, उस व्यक्ति का जीवन हमेशा तनावग्रस्त रहता है, तथा अपने जीवन-साथी के साथ उसके मधुर सम्बंध नहीं रहते हैं। कुंभ लग्न में बुध अष्टम का मालिक होता है, और यदि यह लग्न में हो तो, त्रिकोण का मालिक होते हुये भी अपना शुभ प्रभाव नहीं दे सकता, इसी प्रकार मीन लग्न की कुंडली में शुक्र अष्टमेश होकर यदि लग्न में हो भले ही वह उच्च का होकर लग्न में बैठे किन्तु फिर भी तृतीयेश भी होने से कतई अपना शुभ फल प्रदान नहीं कर सकता और लग्न तथा सप्तम स्थान को अपने पाप प्रभाव से प्रभावित करता है।

पाठको से मेरा निवेदन है कि, ध्यान दें कभी-कभी इस प्रकार के नेष्ट योग का अपवाद भी देखने में आया है, जैसे इस लेख के आरम्भ में जो मिथुन लग्न की कुंडली दी गई है, इस कुंडली में अष्टम भाव में शनि अपनी ही मकर राशि में है, और अपनी ही राशि में होने के कारण कोई भी ग्रह उस घर से सम्बंधित अपना अशुभ प्रभाव नहीं डालता। परंतु अपनी दूसरी राशि वाले घर का फल अवश्य क्षीण कर देगा। जिस प्रकार इस मिथुन लग्न की कुंडली में शनि नवम स्थान का शुभ फल अष्टम में होने के कारण क्षीण कर देगा तथा अष्टम भाव का स्वामी होकर अष्टम भाव में ही होने के कारण अष्टम भाव सम्बंधित शुभ फल देने वाला हो जायेगा। इस प्रकार इस कुंडली के लिए शनि धर्म व भाग्य सम्बंधित पाप फल तथा अष्टम में अष्टम का मालिक होकर स्थित होने से ससुराल से अक्समात् कोई बड़ा लाभ अथवा लाटरी से धन, गढ़ा हुआ धन, बड़ा उपहार इत्यादि देने वाला हो सकता है। परंतु इस प्रकार का योग सैकड़ों में किसी एकाध कुंडली में ही होता है।

एक बात और हमेशा आप ध्यान रखें, जिस किसी की कुण्डली में अष्टमेश यदि लग्न में हो तो, उन्हें हमेशा अष्टमेश से सम्बंधी दान एवं जाप अवश्य करने चाहिये तथा इसका कोई रत्न नहीं धारणा करना चाहिये। यदि ज्योतिषीय परामर्श की आवश्यकता हो तो आप सम्पर्क करें – 09810143516, 09155669922

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अलगाववादी ग्रह

वैवाहिक जीवन में अलगाववादी ग्रह :-

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ज्योतिष शास्त्र में मुख्यतः तीन ग्रहों को अलगाववादी ग्रह माना जाता है। 1. शनि, 2. राहु, 3. सूर्य।

ज्योतिषीय स्थिति तथा इनके दुष्प्रभावों के कारण यदि एक साथ इन ग्रहों का प्रभाव किसी भाव पर पड़ता है, तो उस योग से जातक का अलगाव हो जाता है। मुख्यतः हम सप्तम भाव से पत्नी-पति सुख देखते हैं, यदि इस भाव पर किसी भी तरह स्थिति दशा, विचार, गोचर पर पड़े तो अलगाव हो जाता है। यह नियम हम किसी भी भाव व उसके कारकत्त्व पर लागू कर सकते हैं।

प्रवृत्ति अनुसार ग्रहों का अलगाववादी होने के मुख्य कारण निम्न होते है। शनिः शनि को श्नैश्चर भी कहते हैं, जिसका अर्थ है, धीरे चलने वाला अर्थात शनि की दृष्टि के कारण, नौकरी में देरी, विवाह में देरी, संतान में देरी आदि समस्याएं आती हैं, इस प्रकार की दृष्टि के कारण जो भी कार्य होता है, वह धीरे-धीरे होता है।

शनि: को काल भी कहते हैं, किसी घटना के घटित होने में शनि का गोचर या स्थिति देखना जरूरी है।

राहु: राहु आधारभूत रूप से एक छाया ग्रह है, तथा पौराणिक कथा अनुसार राहु का दैत्य कुल होने के बावजूद उसने देवताओं के बीच बैठकर अमृत ग्रहण किया था। जिसका भेद सूर्य/चन्द्रमा ने खोल दिया था। इसलिए राहु सूर्य/चन्द्रमा के लिए समस्याएं उत्पन्न करता है, तथा एक अलगाववादी ग्रह की श्रेणी में आता है, राहु का सिर विष्णु भगवान नेे सुदर्शन चक्र द्वारा काट दिया था, अमृतपान के कारण राहु अमर था, परन्तु उसका सिर तथा धड़ अलग- अलग हो गये। सर का हिस्सा राहु तथा धड़ का हिस्सा केतु कहलाता है। इसके कारण भी राहु अलगाव का प्रतीक है।

सूर्य: सभी नवग्रहों में सूर्य सबसे ज्यादा शक्तिशाली ग्रह माना जाता है, इसे एक क्रूर ग्रह भी कहा जाता है, क्योंकि जो ग्रह इसके करीब आता है, वह अपना अस्तित्व खो बैठता है या अस्त हो जाता है, इसलिए भी अलगाव का कारक है, इसके अलावा पौराणिक कथा के अनुसार सूर्य की पत्नी भी इनकी गर्मी के कारण इन्हें छोड़कर चली गई थी, इसलिए सूर्य की गर्मी जिस भाव पर पड़ती है, वहां अनावश्यक गर्मी पैदा होती है, इसलिए भी यह विच्छेद का कारक है।
शनि, राहु, सूर्य अलगाववादी ग्रह हैं, तथा किसी भी भाव पर उनके संयुक्त प्रभाव से उस भाव कारक से जातक का अलगाव हो जाएगा। जैसे गोचर से इस तीन ग्रहों का संयुक्त प्रभाव यदि दशम भाव पर पड़े तो व्यक्ति को व्यवसाय से संबंधी समस्याएं आएंगी ही। ईसी प्रकार शनि, राहु अथवा सूर्य का सप्तम भाव पर दृष्टि प्रभाव हो, अथवा सप्तम स्थान का इनमें से किसी ग्रह से युति सम्बन्ध बन रहा हो तो वैवाहिक जीवन में अलगाव की स्थिति आ सकती है।

वैवाहिक अलगाव की स्थिति को जन्मकुंडली से देखकर इस स्थिति से बचाव के ज्योतिषीय उपाय का सहारा अवश्य ही लिया जा सकता है।

1. इन ग्रहों से संबंधित दान करवाना चाहिए।
2. मंत्र जप, उपवास या श्रद्धा भाव से पूजा-पाठ करना चाहिए।
3. शांति पूजा, रत्न तथा यंत्रों के प्रयोग द्वारा भी इस स्थिति को टाला जा सकता है।

किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले किसी अनुभवी और योग्य ज्योतिषी द्वारा कुण्डली का अध्ययन करवाकर उपायों का प्रयोग करना चाहिए।_____________________________________

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