गोमेद

कब धारण करें- राहु रत्न गोमेद :-

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ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार गोमेद राहु का रत्न है, गोमेद को अंग्रेजी में Hessonite कहते हैं।

गोमेद को ज्योतिष विज्ञान में राहु ग्रह के अनिष्ट व निर्बल प्रभावों को नियंत्रित करने हेतु प्रयुक्त किया जाता है। सुन्दर आकर्षक, चमकदार, चिकना, उल्लू की आंखों के समान, अंगारे तथा मृदु प्रकाश के समान प्रतीत होने वाला यह रत्न पारदर्शक, अर्द्धपारदर्शक व अपारदर्शक रूपों में पाया जाता है। इस रत्न के उत्पादकों के रूप में आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, नोर्वे, चीन, बर्मा, ईरान आदि देशों के नाम काफी प्रमुख हैं, परन्तु श्रीलंका से प्राप्त होने वाले गोमेद रत्न सुन्दरता के दृष्टिकोण से उत्तम श्रेणी के माने जाते हैं। ऐसे भारत में केदारनाथ, त्रावणकोर व बिहार प्रांत के गया जिले के क्षेत्रों से भी गोमेद रत्न प्राप्त होते हैं। परन्तु गुणों के आधार पर इन्हें मध्य श्रेणी का माना जाता है।

वैज्ञानिक स्वरूप:- वैज्ञानिक तौर पर गोमेद रत्न जिरसोनियम आक्साइड, सिलिकन आक्साइड व कैल्शियम का एक ठोस संगठन है, जिसका आपेक्षिक धनत्व 4.65 से 4.71 वर्तनांक 1.93 से 1.98, दुहरावर्तन 0.06 तथा कठोरता 7.5 तक के लगभग आंका जाता है।

प्राकृतिक स्वरूप:- गोमेद रत्न सुडौल मृदुघाट के निर्मल अर्थात माणिक्य, पुखराज, नीलम, लहसुनियाँ आदि रत्नों से कम कठोर, औसत से अधिक वजनदार तथा भूरे, केसर, पीले, गौमूत्र के समान आदि प्रकृतिक रंगों में पाये जाते हैं, जिसमें मधु के समान झाईयाँ पाई जाती हैं।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण :- धन, यश, राजनीति, अनुसंधान, दुर्भाग्य, प्रेतबाधा, चिंता, विलासिता, साहस, क्रोध, शत्रु की पराजय, दुर्घटना, त्वचा व गुप्त रोगों के सूचक राहु ग्रह हैं, और उपरोक्त संबंधित नकारात्मक प्रभाव को नियंत्रित करने हेतु राहु रत्न गोमेद धारण करने की सलाह दी जाती है। राहु के विषय में ज्योतिषीय धारणा है कि राहु के किसी भी राशि का प्रतिनिधित्व न करने के कारण उसके मित्र ग्रह बुध, शुक्र व शनि की राशियां वृष, मिथुन, कन्या, तुला, मकर व मीन के हेतु कारक, समभाव के ग्रह गुरू की राशियाँ धनु व मीन के हेतु सामान्य तथा चंद्र, सूर्य व मंगल के साथ शत्रुभाव रखने के कारण उनकी राशियां कर्क, सिंह, मेष व वृश्चिक राशि के हेतु प्रतिकूल रत्न के रूप में जाना जाता है।

गोमेद रत्न की पहचान:-
– उत्तम श्रेणी के गोमेद रत्न को यदि लकड़ी के बुरादे से घिसें तो इसकी चमक में वृद्धि हो जाती है।
– गोमेद रत्न को गौ-मूत्र में यदि चैबीस, पच्चीस घंटे रख दें तो गौ-मूत्र का रंग बलद जाता है।
– ऐसा माना जाता है कि गोमेद रत्न को यदि गौ के दूध में रख दें तो उस दूध का रंग गौ-मूत्र के समान हो जाता है।

दोष युक्त गोमेद:- गोमेद रत्न खरीदते समय इस बात का ध्यान अवश्य देना चाहिये कि उस पर लाल रंग अर्थात रक्त के समान छीटें ना दिखाई पड़े, ऐसा रत्न संतान सुख के लिये अहितकारी माना गया है। बिना चमक या सुन्न जैसे रत्न को रोगवर्धक व स्त्री सुख के हेतु हानिकारक कहा गया है। कई रंगों की छीटें या धब्बे व जिस रत्न पर गड्ढा पाया जाए उसे धन संपत्ति व पशुधन के हेतु हाानिकारक माना गया है। श्यामल, दुरंगा, दरार व जाल युक्त गोमेद वंश, बंधु, स्थाई निवास, आदि सुखों के हेतु घातक माने जाते हैं तथा इसे धारण करने से भाग्य में व्यवधान उत्पन्न होेने लगता है।

गोमेद रत्न से लाभ व उपयोगिताएं:-
– प्रेत सम्बंधित बाधा अर्थात किसी नकारात्मक शक्ति से किसी भी प्रकार का भय उत्पन्न हो रहा हो तो इस स्थिति में सुरक्षा के दृष्टिकोण से गोमेद रत्न अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है।
– राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय जातक के कार्य व प्रभावों के सिद्धि प्राप्ति हेतु यह रत्न अत्यंत प्रभावकारी माना गया है। जिसे धारण से शत्रु सामने नहीं टिकता।
– आर्थिक लाभ व पद प्रतिष्ठा में वृद्धि हेतु यह रत्न अत्यंत उपयोगी माना गया है।
– अचानक बनते काम में व्यवधान या रूकावटें उत्पन्न होने से हर बार निराशा हाथ लगे तो इस स्थिति में गोमेद रत्न धारण करना लाभकारी माना जाता है।
– गृह कलह, पति-पत्नी के मन मुटाव, घर में दिल न लगे या मन उखड़ा-उखड़ा सा लगे तो इन कष्टों के निराकरण हेतु यह रत्न अत्यंत लाभदायक सिद्ध होता है।

गोमेद रत्न के धारण करने हेतु आधारभूत सिद्धांत:-
– राहु ग्रह से बुध, शुक्र व शनि के नैसर्गिक मित्रों के फलस्वरूप, वृष, मिथुन, कन्या, तुला, मकर व कुंभ राशि व लग्न के जातक इस रत्न को धारण कर सकते हैं।
– लग्नेश का मित्र होकर राहु जन्म कुंडली में प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम व नवम भाव में स्थित हो तो ऐसी स्थिति में इस रत्न को धारण किया जा सकता है।
– द्वितीय व एकादश भाव में स्थित राहु यदि लग्नेश का मित्र हो तो धन व जायदाद सम्बधित लाभ के हेतु इस रत्न को धारण किया जा सकता है।
– यदि जातक की राशि व लग्न मेष, कर्क, सिंह व वृश्चिक हो तो गोमेद धारण करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिये।
– मीन व धनु लग्न के जातक कुछ विशेष परिस्थिति में ज्योतिष परामर्श से गोमेद रत्न धारण कर सकते हैं।
– जन्म कुंडली में राहु षष्ठ, अष्टम व द्वादश भाव में स्थित हो तो गोमेद रत्न धारण करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिये।
– कुंडली में राहु कारक अवस्था में स्थित होकर सूर्य से युक्त या दृष्ट अथवा सिंह राशि में स्थित हो तो राहु की महादशा व अन्तर दशा में इस रत्न को धारण किया जा सकता है।
– यदि कुंडली में राहु कारक होकर मेष, कर्क, वृश्चिक, धनु व मीन राशि में स्थित हो तो राहु की महादशा व अंतर्दशा में गोमेद रत्न को धारण करना श्रेष्ठकर माना जाता है।
– यदि जातक का जन्म आद्र्रा, स्वाती व शतभिषा नक्षत्रों में हुआ हो तो उनके लिये इस रत्न को धारण करना श्रेष्ठकर होगा।

गोमेद रत्न को धारण करने हेतु विधि:-
सबसे पहले तो किसी अनुभवी विद्वान से अपनी कुंडली की जांच करवाकर यह पता लगा लें कि आपके लिए गोमेद धारण करना कैसा रहेगा। यदि आपको गोमेद धारण करने की सलाह दी जाती है तो अंगूठी में पाँच रत्ती से अधिक वजन के गोमेद रत्न को चाँदी अथवा अष्टधातु की अंगूठी में जड़वा लें, फिर इस चाँदी अथवा अष्टधातु से निर्मित अंगूठी को किसी स्वाती नक्षत्र के शनिवार की शाम अपने दाहिने हाथ की मध्यमा अंगुली में प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में धारण करें।

रत्न विज्ञान के अनुसार रत्न धारण करने से अवश्य भाग्य लाभ मिलता है। यदि आप कुंडली दिखाकर रत्न परामर्श लेना चाहते हैं तो सम्पर्क कर सकते हैं :- 09810143516, 09155669922

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विवाह बाधा योग का निवारण?

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कैसे हो, विवाह बाधा योग का निवारण ? यदि इस प्रश्न पर हम ज्योतिषीय संदर्भ में विचार करें तो उत्तर होगा कि मनोनुकूल पत्नी/पति पाना लड़का/लड़की के हाथ में नहीं है। इसके पीछे भारतीय धर्म, सिद्धांत में पुनर्जन्म का सिद्धांत कार्य करता है।

वस्तुत: मनुष्य अपने पूर्वजन्मार्जित कर्मों के अनुसार कर्म फल भोगने के लिये संसार में जन्म लेता है। विधाता तद्नुसार उसका भाग्य निर्धारण कर देते हैं। कौन किसका पति बनेगा और कौन किसकी पत्नी यह भी विधाता के द्वारा तय कर दिया जाता है। वैसे ही योग जन्मांग में दिखाई देते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार लड़कियों की कुंडली में गुरू पति सुख का कारक ग्रह होता है, और लड़कों की कुंडली में शुक्र। कुंडली का सप्तम भाव दाम्पत्य सुख का स्थान होता है। अतः सप्तम स्थान, सप्तमेश तथा गुरू/शुक्र की स्थिति से ही तय होता है कि लड़के/लड़की को कैसा पत्नी पति मिलेगा? भले ही वह अपने मन में कैसे भी पत्नी पति की स्वप्न सजाये हुए हो।

विवाह बाधा योग लड़के, लड़कियों की कुंडलियों में समान रूप से लागू होते हैं, अंतर केवल इतना है कि लड़कियों की कुंडली में गुरू की स्थिति पर विचार तथा लड़कों की कुंडलियों में शुक्र की विशेष स्थिति पर विचार करना होता है।

(1) यदि कुंडली में सप्तम भाव ग्रह रहित हो और सप्तमेश बलहीन हो, सप्तम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तो, अच्छा पति/पत्नी मिल पाना संभव नहीं हो पाता है।

(2) सप्तम भाव में बुध-शनि की युति होने पर भी दाम्पत्य सुख की हानि होती है। सप्तम भाव में यदि सूर्य, शनि, राहू-केतू आदि में से एकाधिक ग्रह हों अथवा इनमें से एकाधिक ग्रहों की दृष्टि हो तो भी दाम्पत्य सुख बिगड़ जाता है।

(3) यदि कुण्डली में सप्तम भाव पर शुभाशुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो पुनर्विवाह की संभावना रहती है। नवांश कुंडली में यदि मंगल या शुक्र का राशि परिवर्तन हो, या जन्म कुंडली में चंद्र, मंगल, शुक्र संयुक्त रूप से सप्तम भाव में हों, तो ये योग चरित्रहीनता का कारण बनते हैं, और इस कारण दाम्पत्य सुख बिगड़ सकता है।

(4) यदि जन्मलग्न या चंद्र लग्न से सातवें या आठवें भाव में पाप ग्रह हों, या आठवें स्थान का स्वामी सातवें भाव में हो, तथा सातवें भाव के स्वामी पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो, तो दाम्पत्य सुख की कल्पना करना भी मुश्किल है।

(5) यदि नवम भाव या दशम भाव के स्वामी, अष्टमेश या षष्ठेश के साथ स्थित हों, या लग्नेश तथा शनि बलहीन हों, चार या चार से अधिक ग्रह कुंडली में कहीं भी एक साथ स्थित हों अथवा द्रेष्काण कुंडली में चन्द्रमा शनि के द्रेष्काण में गया हो, और नवांश कुंडली में मंगल के नवांश में शनि हो, और उस पर मंगल की दृष्टि हो या सूर्य, गुरू, चन्द्रमा में से एक भी ग्रह बलहीन होकर लग्न में दशम में, या बारहवें भाव में हो और बलवान शनि की पूर्ण दृष्टि में हो, तो ये योग जातक या जातिका को सन्यासी प्रवृत्ति देते हैं, या फिर वैराग्य भाव के कारण अलगाव की स्थिति आ जाती है, विवाह की ओर उनका लगाव बहुत कम होता है।

(6) यदि लग्नेश भाग्य भाव में हो तथा नवमेश पति स्थान में स्थित हो, तो ऐसी लड़की भाग्यशाली पति के साथ स्वयं भाग्यशाली होती है। उसको अपने कुटुम्बी सदस्यों द्वारा एवं समाज द्वारा पूर्ण मान-सम्मान दिया जाता है। इसी प्रकार यदि लग्नेश, चतुर्थेश तथा पंचमेश त्रिकोण या केंद्र में स्थित हों तो भी उपरोक्त फल प्राप्त होता है।

(7) यदि सप्तम भाव में शनि और बुध एक साथ हों और चंद्रमा विषम राशि में हो, तो दाम्पत्य जीवन कलहयुक्त बनता है और अलगाव की संभावना होती है।

(8) यदि जातिका की कुुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश एवं गुरू तथा जातक की कुण्डली में सप्तम भाव सप्तमेश एवं शुक्र पाप प्रभाव में हों, तथा द्वितीय भाव का स्वामी छठवें, आठवें या बारहवें भाव में हो, तो इस योग वाले जातक-जातिकाओं को अविवाहित रह जाना पड़ता है।

(9) शुक्र, गुरू बलहीन हों या अस्त हों, सप्तमेश भी बलहीन हो या अस्त हो, तथा सातवें भाव में राहू एवं शनि स्थित हों, तो विवाह नहीं होता है।

(10) लग्न, दूसरा भाव और सप्तम भाव पाप ग्रहोें से युक्त हों, और उन पर शुभ ग्रह की पूर्ण दृष्टि न हो, तो विवाह नहीं होता है।

(11) यदि शुक्र, सूर्य तथा चंद्रमा पुरूषों की कुंडली में तथा सूर्य, गुरू, चंद्रमा, महिलाओं की कुंडली में एक ही नवांश में हों, तथा छठवें, आठवें तथा बारहवें भाव में हों, तो भी विवाह नहीं होता है।
इस प्रकार ज्योतिषीय ग्रंथों में अनेकानेक कुयोग मिलते हैं जो या तो विवाह होने ही नहीं देते हैं, अथवा विवाह हो भी जाये तो दाम्पत्य सुख को तहस-नहस कर देते हैं।

बाधा निवारण हेतु कुछ उपाय:-
इन कुयोगों को काटने के लिए शिव-पार्वती का अनुष्ठान, माँ दुर्गा जी की पूजा अर्चना, कारक ग्रहों के रत्न धारण करना, कुयोग दायक ग्रहों से संबधित मंत्र जप, पूजा अनुष्ठान, दानादि करने से बाधाओं का निराकरण हो जाता है।

(1) वे कन्यायें जिनकी शादी में किसी कारण विलम्ब बाधायें आ रही हों, तो वे इस मंत्र का जप नियमित करें तो उन्हें मनोवांछित वर प्राप्त होता है।

एंव देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः।
सूर्याज्जनम समासाद्य सावर्णिभतिता मनुः।।

(2) वे युवक जिनका किसी कारण से विवाह नहीं हो रहा हो, इस मंत्र का नियमित जप करें तो उन्हें मनोवांछित पत्नी प्राप्त होती है।

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिहणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भ्वाम्।।

(3) गुरूवार का व्रत, सोमवार का व्रत एवं लड़कों के लिए शुक्रवार का व्रत करने से शादी की शीघ्र संभावना बनती है।

(4) माँ कात्यायिनी देवी का मंत्र जाप भी शादी में आने वाली बाधाओं को दूर कर देता है।

‘‘कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरी।
नंद गोप सुतं देवि पतिं में कुरूते नमः’’।

(5) माँ पार्वती के निम्नलिखित मंत्र का नियमित जप करने से भी शीघ्र विवाह की संभावना बनती है।

‘‘हे गौरि शंकरार्धागि यथा त्वं शंकरप्रिया।
तथा माँ कुरू कलयाणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्।।

(6) श्री रामचरितमानस में सीता जी द्वारा गिरिजा पूजन प्रसंग ‘जय-जय गिरिवर राज किशोरी’ से लेकर सोरठा– जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरष न जात कहि। मंगल मंजुल मूल, बाम अंग फरकन लगे।। तक का पाठ करना अथवा राम-जानकी विवाह प्रसंग चैपाई ‘‘समय बिलोकि बशिष्ठ बोलाए। सादर सतानंद सुनि आए।।’’ से लेकर दोहा-

मुदित अवध पति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि।
जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि।।

का पाठ करना चाहिए। इस पाठ को करने से पहले राम-जानकी का फोटो अपने सामने रखें। संकल्प लेकर पाठ करें और अंत में समर्पण कर दें।

(7) यदि विवाह में बाधा का कारण मंगल हो, तो मंगल चंडिका स्तोत्र का पाठ एवं मंगल चंडिका मंत्र का जप करने से भी विवाह हो जाता है। गणेश जी की जप पूजा भी विवाह बाधा का निवारण करती है।

(8) अघोर गौरी का मंत्र भी विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करता है। यह मंत्र इस्लामी साधना का मंत्र कहलाता है। इस मंत्र को प्रतिदिन 1000 बार जपना चाहिए। इसमें रूद्राक्ष की माला का प्रयोग नहीं करते हैं। ऊनी आसन पर पश्चिम की ओर मुख करके बैठा जाता है। सुगंधित अगरबत्ती जलाई जाती है। इसका जप उसी लड़की को करना होता है जिसकी शादी में बाधायें आ रही हों:-

मखनो हाथी जर्द अम्बारी उस पर बैठी कमाल खाँ की सवारी कमाल खाँ कमाल खाँ मुगल पठान बैठे चबूतरे पढ़े कुरान हजार काम दुनिया का करे एक काम मेरा कर ना करे तो तीन लाख तैंतीस हजार पैगम्बरों की दुहाई।

(9) यह एक अनुभूत उपाय है। इसे मैंने कई बार आजमाया है। पीला पुखराज कम से कम सवा पाँच रत्ती वजन का सोने की अँगूठी में गुरूवार के दिन बायें हाथ की तर्जनी में पहना दिया जाये और कम से कम सात रत्ती वजन का फिरोजा चाँदी की अंगूठी में शुक्रवार के दिन बायें हाथ की कनिष्ठिका में धारण किया जाये तो शादी की शीघ्र संभावना बनती है।
इस प्रकार विभिन्न प्रकार के उपाय विवाह बाधा निवारण हेतु मिलते हैं इनमें धारण करने के यंत्र भी सम्मिलित हैं जिन्हें अपनाकर बाधा निवारण किया जा सकता है और दाम्पत्य सुख पाया जा सकता है। यदि कुंडली में वैधव्य योग हों तो शादी के पहले घट विवाह, अश्वत्थ विवाह, विष्णु प्रतिमा या शलिग्राम विवाह में से कोई न कोई विवाह सम्पन्न कराकर विवाह करना चाहिए।

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पितृदोष

क्या पित्तृश्राप ही पितृदोष का कारण है-

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जिस प्रकार चिकित्सा के क्षेत्र में कुछ रोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशानुसार होते हैं, उसी प्रकार पितृरी दोष भी वंशानुगत होता है। पूर्वजों के प्रति अवांछित कर्मों के फलस्वरूप पितृश्राप उनके वशंजों के जन्मांग में विद्यमान होता है। कई बार पित्तरों के श्राप के कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह श्राप पाँच-पाँच पीढ़ी तक चलता रहता है। श्राद्ध न होने के कारण भी पितृगणों का आक्रोश पितृश्राप के रूप में जन्मांग में विद्यामान होकर जातक को जीवन भर पीड़ित करता रहता है।
जिस प्रकार न्याय प्रणाली अनुसार पूर्वजों का ऋण उनके पुत्रों या वारिसों को अदा करना पड़ता है। उसी प्रकार पिछले जन्मों के अपने या पूर्वजों के दुष्ट और पाप कर्मों या अपने पिछले जन्मों के कर्मो का फल वंशजो को भोगना पड़ता है, जन्मकुंडली में यह दोष ही पितृदोष कहलाता है।

माना कि किसी व्यक्ति विशेष या परिवार में कई पीढ़ियों तक दुखःदायी अवस्थाओं से सघंर्ष करना या अकाल मृत्यु, एकाएक व्यापार में हानि आदि जैसी अन्य घटनाओं को ज्योतिष के परिप्रेक्ष्य में कई कारणों द्वारा समझाया जा सकता है। इन्हीं कारणों में से एक कारण है ‘श्राप’ अथवा पितृश्राप का विश्लेषण या इसके कुप्रभावों का निवारण का वर्णन कम ग्रन्थों में
मिलता है। वृहद पाराशर होरा शास्त्र में 14 प्रकार के श्रापों का वर्णन मिलता है। जिस में मुख्य है पितृश्राप,
प्रेतश्राप, ब्राह्मणश्राप, मातृश्राप, पत्नीश्राप, समुंद्रश्राप, गऊ हत्या श्राप, आदि-2, शास्त्रों में तो मालूम नहीं मगर 36 (छत्तीस) प्रकार के श्रापों को माना गया है। भृगु सूत्र में महर्षि मृगु के अनुसार यदि राहु किसी जातक के जन्मांक में पंचम भावस्थ हो, तो सर्प श्राप के कारण उसे पुत्र का आभाव रहता है। परन्तु राहु के अतिरिक्त अन्य ग्रहों का पंचम भाव से सम्बंध अपेक्षित है। इसी को सर्पश्राप कहते हैं। महर्षि मंत्रेश्वर के अनुसार पंचम भावस्थ राहु के संस्थित होने से प्रेत बाधा की प्रबल सम्भावना रहती है।

किसी श्राप का अशुभ प्रभाव वंश विशेष के लिए पितृदोष के रूप मैं प्रकट होकर अन्यान्य सुखों को आक्रांत और आंतकित करता है। इसलिये अकसर देखने में आता है कि, एक ही वंश के अनेक सदस्यों को परिवार में समान योग विद्यामान होता है। ‘कालसर्प योग’ भी एक प्रकार का पितृदोष ही है, जो कई पीढ़ियों तक व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करता रहता है! इस प्रकार के श्राप की मुक्ति हेतु अनेक परिहार शास्त्रोक्त हैं। जिनका गंभीरता से अनुसरण करना हितकर है। कम से कम तीन पीढ़ीयों तक श्राप का प्रभाव वंश विशेष को आंतकित और भयभीत करता है।

राहु के कारण उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के श्राप हैं, जो व्यक्ति के जीवन की अनुकूलता, प्रतिकूलता में परिवर्तित करते है। राहु जैसे क्रूर ग्रह के कारण उपजने वाले श्राप के वास्तविक प्रभाव को पूर्ण रूप से समझना या समझ पाना तो सम्भव नहीं है। परन्तु कुछ निजी अनुभवों का उल्लेख हम यहाँ कर रहे हैं। फिर भी आवश्यकता होने पर आप मेरे 32 वर्षीय अनुभव का लाभ Telephonic Astrological Appointment द्वारा प्राप्त कर सकते हैं।

कुंडली में यदि राहु-शुक्र से संयुक्त होकर चतुर्थ भाव में हो तो परिवार की स्त्रियों को प्रेतबाधा या भूतबाधा व्याधि द्वारा कष्ट प्राप्त होता है। यहाँ प्रेतात्मा किसी नारी को अपना कर तरह-तरह के कष्ट पहुँचाती है।

चतुर्थ भावगत राहु और दशम भाव में मंगल का योग हो तो उस व्यक्ति के निवास स्थान को दोषयुक्त कर देता है, जहाँ पर निरन्तर हानि, बाधा, व्याधि, असफलता और चिन्ता जातक को व्याप्त रहते हैं। प्रेतबाधा की संभावना से घर के सारे वातावरण को, प्रसन्नता के, और उन्नति, समृद्धि को ग्रहण लग जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप संतति हानि अथवा धन हानि नारियों को बार-बार गर्भपात की स्थिति उत्पन्न होती है। उल्लेखनीय है कि घर में प्रेतबाधा का कारण पूर्व जन्म में मंगल दोष या यूँ कहें कि मंगल श्राप के कारण उत्पन्न होता है। जिसे जन्मांग में पितृदोष के रूप में देखा जा सकता है।

किसी भी श्राप को भलि-भाँति जानना आवश्यक है, यदि राहु का सम्बंध द्वितीय या चतुर्थ भाव से हो रहा हो या उन भावों के स्वामियों से राहु की युति हो तो कुटुम्ब में एक प्रकार का कष्ट दृष्टिगत होता है। चतुर्थ भाव के अंतर्गत पति-पत्नी और संतति को दर्शाता है। जबकि द्वितीय भाव माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, पत्नी संतान मौसा-मौसी, बुआ-फूफा, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मामा-मामी आदि आते हैं। द्वितीय भाव पर राहु के प्रभाव के कारण परिवार में किसी की मृत्युश्राप के कारण या प्रेतबाधा का होना संभव है। मृतक की सम्पत्ति और धन उस व्यक्ति को प्राप्त होता है। जिसके जन्मांग में द्वितीय भाव शापित होगा, उस व्यक्ति का विनाश भी इसी प्रकार की धन सम्पत्ति प्राप्त करने से होता है। सम्पत्ति का कोई सुख प्राप्त नहीं होता।

चतुर्थ भाव में राहु की स्थिति जातक को हमेशा ही आशान्त और चिंताग्रस्त रखती है। यदि यहाँ राहु के साथ शनि, सूर्य अथवा चन्द्रमा भी चतुर्थ भावगत हो तो श्राप के प्रभाव में वृद्धि होती है तथा ऐसे व्यक्ति को कष्ट, दुख, अवरोध तथा असीमित वेदना प्रदान करता है।

जब राहु किसी भाव में उसके भावाधिपति से सयुंक्त हो, तो उस भाव से सम्बन्धित श्राप अधिक मात्रा में दृष्टिगत होता है। श्राप में वृद्धि का कारण यह है कि उस भाव को राहु आक्रांत करता है, साथ में उस भाव के स्वामी या कारक को भी अपनी युति द्वारा श्रापग्रस्त करता है। अतः श्राप के अशुभ प्रभाव का स्पष्ट विस्तार का आभास होता है।

चतुर्थ भाव में राहु और चंद्रमा की युति से परिवार से श्राप का प्रभाव अवश्य होता है। द्वितीय भाव में राहु और शुक्र की युति भी श्राप प्रदर्शित करती है क्योंकि चतुर्थ भाव चंद्रमा का है और द्वितीय भाव शुक्र का है, इसलिये श्राप का प्रभाव ज्यादातर नारियों पर ही पड़ता है। कष्ट जैसे बांझपन, सन्तति हीनता, वैधव्य या व्याधिग्रस्त रहने का कारण भी सम्भव है।

शांति के उपाय:-
ग्रहयोगवशेनैव नृणां ज्ञात्वाऽनपत्यताम्।
तछोषपरिहारार्थ नागपूजा समाचरेत्।।
स्वगृह्योक्तविधानेन प्रतिष्ठा कारयेत् सुधीः।
नागमूर्ति सुवर्णेन कृत्वा पूजां समाचरेत्।।
गो-भू-तिल-हिरण्यादि दद्याद् वित्तानुसारतः।
एवं कृते त, नागेन्द्रप्रसादात् वर्धते कुलम्।।

अनपत्यता का कारण यदि सर्प श्राप हो, तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार नागदेव की स्वर्ण की मूर्ति बनाकर प्रतिष्ठा करके उनकी पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् गाय, भूमि, तिल, स्वर्ण आदि का दान करें, तो शीघ्र ही नागराज की कृपा से पुत्र उत्पन्न होकर कुल की वृद्धि करता है।

पितृश्राप का शांति उपायः-
गया में श्राद्ध करना तथा यथाचित अधिक से अधिक ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये अथवा कन्यादान और गोदान करना चाहिये। यदि अपनी कन्या नहीं है तो किसी अन्य कन्या का विवाह में कन्यादान करें, क्योंकि संतान हीनता का पूर्ण प्रभाव होने पर कन्या या पुत्र का अभाव होगा।

मातृश्राप का उपाय:-
सेतुस्नानं प्रकर्तव्यं गायत्री लक्षसंख्यक।

रौष्यमात्रं पयः पीत्वा ग्रहदान प्रयत्नतः।।
ब्राह्मणान् भोजयेतद्धदश्वत्थस्य व्रदक्षिणाम्।

कर्तव्यं भक्तिमुक्तेन चाष्टोत्तरसहस्त्रकम।।
एवं कृते महादेवि।

श्रापानमोक्षो भविष्यति, सुपुत्रं लभते पश्चात् कुल वृद्धिश्चजायेतं।।

अर्थात:- रामेश्वरम् में स्नान, एक लाख वार गायत्री जप, ग्रहों का दान, ब्राह्मण भोजन, 1008 बार पीपल की प्रदक्षिणा करने से श्राप की शांति होकर पुत्र प्राप्ति तथा कुल की वृद्धि होती है।

भ्रातृश्राप की शांति हेतु उपाय:-
भ्रातृश्रापविमोक्षार्थ वंशस्य श्रवणं हरेः।

चान्द्रायणं चरेत् पश्चात् कावेर्या विष्णु सन्निधौ।।
अश्वत्थस्थापनं कुर्यात् दश धने्श्च दापयेत्।

पत्नी हस्तेन पुत्रेच्छुर्भूमि दद्यात् फलान्विताम्।।
एवं यः कुरूते भक्त्या धर्मपल्या समन्वितः।
ध्रुवं तस्य भवेत् पुत्रः कुलवृद्धिश्च जायते।।

अर्थात:- हरिवंश पुराण को श्रवण करने से भ्रातृश्राप की शांति हो जाती है। नदी तट पर या शालिग्राम के सम्मुख चान्द्रायण व्रत करने से, पीपल वृक्ष का रोपण कर पूजन करने से भी भ्रातृ श्राप की परिशांति होती है। इसके अतिरिक्त दस गायों के दान करने से तथा पत्नी के हाथों भूमिदान कराने से इस श्राप से मुक्ति होती है।

मातुलश्राप हेतु:-
बायी कूपतऽगादि निर्माणं सेतु – बन्धनम्।

पुत्र वृद्धिर्भवेतस्य सम्पदवृद्धिश्च जायते।।

अर्थात:- उपरोक्त मातुलदोष शमनार्थ विष्णु की स्थापना करें। कुआँ तालाब बनवाएँ। पुल का निर्माण करवायें तो पुत्र की प्राप्ति और सम्पत्ति की भी वृद्धि होती है।

पत्नीश्राप हेतु:-
श्रापमुक्त्यै च कन्यायां सत्यां तद्दानमाचरेत्।

कन्याभावे च श्री विष्णोमूर्मि लक्ष्मी समन्विलाम्। दद्यात् स्वर्णमयी विप्र दशधेनुसमन्विताम्।।
शय्यां च भूषण वस्त्रं दम्पतिम्यां द्विजन्मनाम्।

धु्रवं तस्य भवेत पुत्रो भाग्य वृद्धिश्च जायते।।

अर्थात:- यदि कन्या हो जो कन्यादान करने से तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोने की लक्ष्मीनारायण की मूर्ति तथा बछडे सहित 10 गायों, शय्या, भूषण और वस्त्र आदि ब्राह्मण को दान करने से पुत्र की प्राप्ति होती है।

प्रेतश्राप हेतु:- गया में पिण्डदान करने तथा रूद्राभिषेक करने से प्रेतश्राप की शांति होती है ब्रह्मा की सोने की मूर्ति बनवाकर गाय, चाँदी का पात्र और नीलम दान करना चाहिये एवं यथा शक्ति ब्राह्मण भोजन करवाकर उन्हें दक्षिणा दें।

ज्योतिष शास्त्र हमारे जीवन की भावी योजनाओं तथा पूर्वजन्मकृत श्राप के निवारणार्थ प्रमाणिक विज्ञान (विद्या) है, अत: श्राप सम्बंधित मार्गदर्शन भी बेहतर मिल सकता है।

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दिल लगाने से पहले

दिल लगाने से पहले गुण भी मिला लीजिए :-

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कबीरदास जी ने कहा है-
पोथी पढ पढ जग मुआ पंडित भयो न कोई।
ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होई।।

प्रेम एक दिव्य अलौकिक एवं वंदनीय तथा प्रफुल्लता देने वाली स्थिति है। प्रेम मनुष्य के करुणा-दुलार-स्नेह की अनुभूति देता है। फिर चाहे यह भक्त का भगवान से हो, माता का पुत्र से या प्रेमी का प्रेमिका के लिए प्रेम हो सभी का अपना महत्त्व है।

प्रेम और विवाह, विवाह और प्रेम दोनों के समान अर्थ हैं लेकिन दोनों के क्रम में परिवर्तन है। विवाह पश्चात् पति या पत्नी के बीच समर्पण व भावनात्मकता प्रेम का एक पहलू है प्रेम संबंध का विवाह में परिणीत होना इस बात को दर्शाता हैं कि प्रेमी प्रमिका, एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से इतना जुड़े हैं कि जीवन भर साथ रहना चाहते हैं।

सर्वविदित है कि हिन्दू संस्कृति में जिन 16 संस्कारों का वर्णन किया है उनमें से विवाह एक महत्त्वपूर्ण संस्कार है। जीवन के विकास, उसमें, सरलता और सदृष्टि को नये आयाम देने के लिए विवाह परम आवश्यक प्रक्रिया है। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है। प्रेम और विवाह आदर्श स्थितियों में वंदनीय, आनंददायक और प्रफुल्लता देने वाला है।

वर्तमान आधुनिक परिवेश, खुला वातावरण एवं इंटरनेट संस्कृति के कारण हमारी युवा पीढ़ी अपने लक्ष्यों से भटक रही है। बिना सोच विचार किए गए प्रेम-विवाह शीघ्र ही मन मुटाव के चलते तलाक तक पहुँच जाते हैं, इंटरनेट के अलावा टी.वी. धारावाहिकों एवं फिल्मों की देखादेखी युवक-युवती एक दूसरे को आकर्षित करने का प्रयास करते हैं।

रोज डे, वेलेन्टाईन डे, जैसे अवसर पर इस कार्य को बढ़ावा देते हैं। प्यार-मोहब्बत करें, लेकिन सोच समझकर अवसाद का शिकार होने, आत्महत्या से बचने या बदनामी से बचने हेतु दिल लगाने से पूर्व अपने साथी से अपने गुण-विचार ठीक प्रकार मिला लें ताकि भविष्य में पछताना ना पड़ें। सोच समझ कर निर्णय लें।

ग्रहों के कारण व्यक्ति प्रेम करता है, और इन्हीं ग्रहों के प्रभाव से दिल भी टूटते हैं। ज्योतिष ग्रंथों में प्रेम-विवाह के योगों के बारे में स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता है, परन्तु जीवन-साथी के बारे में अपने समान कुल, जाति, वर्ण या अपने से अन्य या निम्न स्तरीय का विस्तृत विवरण है, कोई भी स्त्री-पुरूष अपने उच्च/नीच स्तर में तभी विवाह करेगा जब वे दोनों प्रेम करते होंगे।

आज की पढ़ी-लिखी और घोर भौतिकवादी युवापीढ़ी प्रेम-विवाह की ओर आकर्षित हो रही है। कई बार प्रेम एक-दूसरे की देखा देखी या फैशन के तौर पर पर भी होता है किन्तु जीवनपर्यन्त निभ नहीं पाता।ग्रह-अनुकूल नहीं होने के कारण ऐसी स्थिति बनती हैं। शास्त्रों में प्रेम-विवाह को गंधर्व विवाह के नाम से जाना जाता है।

किसी युवक-युवती के मध्य प्रेम की जो भावना पैदा होती है, वह सब उनके ग्रहों का प्रभाव ही होता है, जो कमाल दिखाता है। ग्रह हमारी मनोदशा, पसंद, नापसंद और रूचियों को तय करते हैं, और बदलते भी हैं। वर्तमान प्रेम विवाह, बहुत हद तक गंधर्व विवाह का ही परिवर्तित रूप है।

प्रेम विवाह के कुछ मुख्य योगः-
1. लग्नेश का पंचम से संबंध हो और जन्मपत्रिका में पंचमेश सप्तमेश का किसी भी रूप में संबंध हो। शुक्र, मंगल की युति, शुक्र की मंगल की राशि में स्थिति, मंगल की शुक्र की राशि में स्थिति और लग्न त्रिकोण का संबंध प्रेम संबंधों का सूचक है। पंचम या सप्तम भाव में शुक्र सप्तमेश या पंचमेश के साथ हो।

2. किसी की जन्मपत्रिका में लग्न, पंचम, सप्तम भाव व इनके स्वामियों और शुक्र तथा चन्द्रमा जातक के वैवाहिक जीवन व प्रेम संबंधों को समान रूप से प्रभावित करते हैं लग्न या लग्नेश का सप्तम और सप्तमेश का पंचम भाव व पंचमेश से किसी भी रूप में संबंध प्रेम संबंध की सूचना देता है। यह संबंध सफल होगा अथवा नहीं इसकी सूचना ग्रह योगों की शुभ-अशुभ स्थिति देती है।

3. यदि सप्तमेश लग्नेश से कमजोर हो या यदि सप्तमेश अस्त हो तो अथवा जिस राशि में हो या नवांश में नीच राशि हो तो जातक का विवाह अपने से निम्न कुल में होता है। इसके विपरीत लग्न से सप्तमेश बली हो, शुभ नवांश में हो तो जीवन-साथी उच्चकुल का होता है।

4. पंचमेश सप्तम भाव में हो अथवा लग्नेश और पंचमेश भाव के स्वामी के साथ लग्न में स्थित हो। सप्तमेश पंचम भाव में हो और लग्न से संबंध बना रहा हो। पंचमेश सप्तम भाव में हो उसका संबंध लग्नेश से हो। पंचमेश सप्तम में हो और सप्तमेश पंचम में हो। सप्तमेश लग्न में और लग्नेश सप्तम में हो, साथ ही पंचम भाव के स्वामी से दृष्टि संबंध हो तो भी प्रेम संबंध का योग बनता है।

5. पंचम में मंगल भी प्रेम-विवाह करवाता है। यदि राहु पंचम या सप्तम में हो तो विवाह की संभावना होती है। सप्तम भाव में यदि मेष राशि में मंगल हो तो प्रेम विवाह होता है। सप्तमेश और पंचमेश एक-दूसरे के नक्षत्र पर हों तो भी प्रेम विवाह का योग बनता है। शुक्र व गुरु दोनों विवाह के कारक है। यदि यह एक-दूसरे को देखें तब भी प्रेम विवाह होता है।

6. पंचमेश तथा सप्तमेश कहीं भी, किसी भी तरह से द्वादशेष से संबंध बनाएं। लग्नेश या सप्तमेश का आपस में स्थान परिवर्तन अथवा आपस में युति होना अथवा दृष्टि संबंध।

7. दाराकारक और पुत्रकारक की युति भी प्रेम-विवाह कराती है। पंचमेश और दाराकारक का संबंध भी प्रेम-विवाह करवाता है। (जैमिनी सुत्रानुसार)

8. सप्तमेश स्वग्रही से, लग्न में राहु हो, शनि और केतु 7वें स्थान में हों, एकादश स्थान पापग्रहों के प्रभाव में बिल्कुल ना हो, शुक्र लग्न में लग्नेश के साथ, मंगल सप्तम भाव में हो, सप्तमेश के साथ, चन्द्रमा लग्न में लग्नेश के साथ हो।

9. अन्तर्जातीय विवाह योग- कर्क लग्न हो, सप्तम में चन्द्रमा पर शनि की दृष्टि हो, नवम भाव, सप्तम भाव तथा नवमेश होकर बृहस्पति का पाप ग्रहों से संबंध हो, कर्क लग्न में शनि होने पर अन्तर्जातीय विवाह होता है।

प्रेम विवाह असफल रहने/दिल टूटने के कारणः-

1. शुक्र व मंगल की स्थिति व प्रभाव प्रेम संबंधों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यदि किसी जातक की कुण्डली में सभी अनुकूल स्थितियां होते हुए भी शुक्र की स्थिति अनुकूल नहीं हो तो प्रेम संबंध टूटकर दिल टूटने की घटना होती है।

2. सप्तम भाव या सप्तमेश का पाप पीड़ित होना, पाप योग में होना, वह प्रेम विवाह की सफलता पर प्रश्न लगाता है। पंचमेश व सप्तमेश दोनों की स्थिति इस प्रकार हो कि उनका सप्तम-पंचम से कोई दृष्टि संबंध न हो तो प्रेम की असफलता दृष्टिगत होती है।

3. शुक्र का सूर्य के नक्षत्र में होना और उस पर चन्द्रमा का प्रभाव होने की स्थिति में प्रेम संबंध होने के उपरान्त या परिस्थितिवश विवाह हो जाने पर भी सफलता नहीं मिलती। शुक्र का सूर्य-चन्द्रमा के मध्य परिस्थितिवश विवाह हो जाने पर भी सफलता नहीं मिलती। शुक्र का सूर्य-चन्द्रमा के मध्य में होना असफल प्रेम का कारण हैं।

4. पंचम व सप्तम भाव के स्वामी ग्रह यदि धीमी गति के ग्रह हों तो प्रेम संबंधों का योग होने पर चिर स्थायी प्रेम की अनुभूति दर्शाता हैं। इस प्रकार के जातक जीवन भर प्रेम प्रसंगों को नहीं भूलते चाहे वे सफल हो या असफल।

प्रेम विवाह को मजबूत करने के उपायः-
1. शुक्र देव की पूजा करें।
2. पंचमेश व सप्तमेश की पूजा करें।
3. पंचमेश का रत्न धारण करें।
4. ब्लयू टोपाज- सुखद दामपत्य एवं वशीकरण हेतु।
5. चन्द्रमणी- प्रेम प्रसंग मे सफलता हेतु।
प्रेम विवाह के लिए जन्मकुण्डली के पहले, पांचवे, सप्तम भाव के साथ-साथ 12वें भाव को भी देखें क्योंकि विवाह के लिए 12वां भाव भी देखा जाता है। यह भाव शय्या सुख का भी है। इन भावों के साथ-साथ इन भावों के स्वामियों की स्थिति का पता करना होता है। यदि इन भावों के स्वामियों का संबंध किसी भी रूप से अपने भावों से बना रहा हो तो निश्चित रूप से जातक प्रेम विवाह करता है।

अन्तरजातीय विवाह के मामले में शनि की मुख्य भूमिका होती है। यदि कुण्डली में शनि का संबंध किसी भी रूप में प्रेम-विवाह कराने वाले भावेशों के भाव से हो जातक अन्तरजातीय विवाह करेगा। जीवन-साथी का संबंध 7वें भाव से होता है। जबकि पंचम भाव को संतान, उदर एवं बुद्धि का भाव माना गया है लेकिन यह भाव प्रेम को भी दर्शाता है। प्रेम विवाह के मामलों में यह भाव विशेष भूमिका दर्शाता है।

प्रेम संबंध का परिणाम विवाह होगा या नहीं, इस प्रकार की स्थिति में ज्योतिष का आश्रय लेकर काफी हद तक बचा जा सकता है। दिल लगाने से पूर्व या टूटने की स्थिति ना आए इस हेतु प्रेमी-प्रेमिका को अपनी जन्मपत्रिका के ग्रहों की स्थिति किसी योग्य ज्योतिषी से अवश्य पूछ लेनी चाहिए कि उनके जीवन में प्रेम की घटना होगी या नहीं। प्रेम ईश्वर का वरदान हैं। प्रेम करें अवश्य लेकिन सोच समझ कर।

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अष्टमेश

क्या कुंडली का अष्टमेश सदा दु:खदाई होता है?:-

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किसी भी जन्म-पत्रिका की लग्न कुंडली में छठा तथा आठवाँ स्थान कुंडली के सबसे खराब घर माने जाते हैं कारण कि छठा घर रोग, कर्ज तथा शत्रुओं का है, तथा आठवाँ स्थान आयु स्थान! दूसरे शब्दों में मृत्यु स्थान है। जैसा कि सर्व विदित है कि कुंडली के जिस घर में जो राशि होती है उस राशि का मालिक ग्रह उस घर का मालिक माना जाता है, अतः कुंडली के आठवें घर में जो राशि होगी उस राशि का मालिक ग्रह आठवें घर का मालिक अर्थात अष्टमेश कहलायेगा।

चूँकि अष्टम स्थान आयु का स्थान है, और आयु समाप्त होने से बुरी घटना किसी इंसान के जीवन में कभी हो नहीं सकती, अर्थात् यह पाप स्थान, खराब स्थान है, महऋषि पराशर ने वृहत्पराशर होरा शास्त्र में अष्टम स्थान को छिद्र, खर स्थान कहा है। अष्टम वह स्थान है, जहां किसी भी अन्य स्थान का स्वामी आकर अपनी शुभता इस प्रकार खो देता है जैसे कोई जीव कुंआ में डूब जाता है, और जीवित नहीं रहता। यह तो स्वाभाविक बात है कि इसका मालिक ग्रह भी पापी होगा चाहे वो नैसर्गिक रूप से शुभ ग्रह यथा चन्द्रमा, बुध, गुरू या शुक्र ही हो, किन्तु यदि वह अष्टम स्थान का मालिक है तो अपना पाप प्रभाव ही देगा। ऐसे में यदि अष्टम स्थान में अन्य स्थान का स्वामी कैसे शुभ फलदाई रहेगा। अष्टम स्थान का मालिक ग्रह अर्थात अष्टमेश यदि कुण्डली में लग्न में बैठ जाये लग्न यानि कुण्डली का पहला घर तो निश्चय ही वह उस जातक का आत्मबल शीण कर देगा। उस व्यक्ति को सारी उम्र मानसिक परेशानियाँ, चिन्ता इत्यादि से त्रस्त रखेगा। कारण की किसी व्यक्ति की कुण्डली में लग्न उसका अपना घर होता है, उसका मन-मस्तिष्क होता है, लग्न से हम किसी व्यक्ति के शरीर उसकी आत्मा तथा आत्मविश्वास की गणना करते हैं, यदि उसमें पापी ग्रह पाप स्थान अष्टम का स्वामी बैठ जाये तो निश्चय ही वो अपना पाप प्रभाव ही देगा, किसी भी सूरत में शुभ प्रभाव नहीं दे सकता, भले ही उसके साथ कोई शुभ ग्रह ही क्यों न बैठा हो या केन्द्र-त्रिकोण का मालिक कोई ग्रह ही ना हो, अपितु अष्टमेश उस शुभ ग्रह का शुभ प्रभाव भी कम कर देता है।

जैसा कि सब ज्योतिष के विद्वान जानते हैं सभी ग्रहों की सातवीं पूर्ण दृष्टि होती है, और जब कोई ग्रह लग्न में होगा तो स्वाभाविक है कि उस ग्रह की सातवीं दृष्टि सप्तम भाव यानि पुरूष की कुंडली में पत्नी के स्थान पर और स्त्री की कुंडली में पति के स्थान पर पड़ेगी, ऐसी स्थिति में वह सातवें स्थान को प्रताड़ित करे बिना नहीं रह सकता, जिस किसी भी व्यक्ति की कुण्डली में अष्टमेश लग्न में बैठा होगा उसके अपनी पत्नी अथवा पति से मधुर सम्बंधों में निश्चित रूप से कमी लायेगा।

यहाँ विचारणीय बात यह भी है कि कई ग्रहों की सातवीं के अतिरिक्त भी कई दूसरी पूर्ण दृष्टियाँ होती हैं जैसे मंगल की चौथी और आठवीं, गुरू, राहु, केतु की पाँचवी तथा नौवीं एवं शनि की तीसरी तथा दसवीं, ऐसी परिस्थिति में वह ग्रह सातवीं के अतिरिक्त जिन-जिन घरों पर अपनी दृष्टियाँ डालेंगे उन-उन घरों को भी निश्चित रूप से प्रभावित करेंगे।

मेष लग्न की कुंडली में अष्टमेश मंगल होता है, इसमें हालांकि मंगल लग्नेश भी है और लग्न में मंगल किसी सुहागिन स्त्री के माथे पर चमकती हुई बिन्दी की जैसे प्रतीत तो होता है, किन्तु उसकी स्थिति सुहागन होते हुये भी पति से ठुकराई हुई स्त्री की जैसी होगी, और वह पूर्ण लग्नेश का फल नहीं प्रदान कर लग्नेश एवं अष्टमेश का मिला-जुला असर प्रदान करता है, और लग्न, चतुर्थ, सप्तम एवं अष्टम स्थान को प्रभावित करता है। वृषभ लग्न में अष्टमेश गुरू होता है, और यदि गुरू लग्न में हो तो लग्न, पंचम, सप्तम तथा नवम भाव को प्रभावित करता है। मिथुन लग्न में अष्टमेश शनि होता है। इसमें शनि भाग्येश भी होता है किन्तु फिर भी लग्न में शनि हो तो अपना अष्टम स्थान का पाप प्रभाव नहीं छोड़ता, और लग्न, तृतीय, सप्तम एवं दशम स्थान को प्रभावित करता है। कर्क लग्न में भी अष्टमेश शनि होता है, इसमें शनि अष्टम के साथ-साथ सप्तम भाव का भी मालिक होता है अतः अत्यधिक पाप प्रभावित हो जाता है, और लग्न में होने से ज्यादा पीड़ादायक रहता है, और लग्न, तृतीय, सप्तम एवं दशम भाव को प्रभावित करता है।

सिंह लग्न में गुरू अष्टम स्थान का अधिपति होकर यदि लग्न में हो तो त्रिकोण का मालिक होने के बावजूद वह अपना पूर्ण फल प्रदान नहीं करता है, कन्या लग्न में मंगल अष्टमेश होता है, जो तृतीयेश भी है, और चूँकि तृतीय स्थान भी आयु का स्थान माना जाता है, अतः मंगल यहाँ पूर्ण पाप प्रभाव में होकर शुभ फल प्रदान नहीं कर सकता, तुला लग्न में शुक्र जो कि लग्नेश भी होता है, साथ ही अष्टमेश भी होता है, इसकी स्थिति भी वही रहती है, जो मेष लग्न में मंगल की होती है, वृश्चिक लग्न में बुध अष्टमेश होता है, और यदि बुध लग्न में हो तो, लग्न एवं सप्तम स्थान को प्रभावित करता है।

इसी प्रकार धनु लग्न में चन्द्रमा अष्टम का मालिक होकर यदि लग्न में हो तो, लग्न एवं सप्तम स्थान को प्रभावित करें बिना नहीं रहता है, मकर लग्न में सूर्य अष्टमेश होकर यदि लग्न में हो तो, लग्न एवं सप्तम स्थान को खराब करे बिना नहीं छोड़ता है। यहाँ विशेष रूप से ध्यान देने योग्य यह बात है कि सूर्य जो कि नौ ग्रहों में सबसे ज्यादा क्रूर गह है, जिस घर में बैठता है, और जिस पर अपनी दृष्टि डालता है, दोनों के शुभ प्रभावों में कमी कर देता है, मेरे व्यक्तिगत अनुभव में कई कुंडलियों में यह देखने में आया है कि यदि मकर लग्न में सूर्य लग्न में है तो, उस व्यक्ति का जीवन हमेशा तनावग्रस्त रहता है, तथा अपने जीवन-साथी के साथ उसके मधुर सम्बंध नहीं रहते हैं। कुंभ लग्न में बुध अष्टम का मालिक होता है, और यदि यह लग्न में हो तो, त्रिकोण का मालिक होते हुये भी अपना शुभ प्रभाव नहीं दे सकता, इसी प्रकार मीन लग्न की कुंडली में शुक्र अष्टमेश होकर यदि लग्न में हो भले ही वह उच्च का होकर लग्न में बैठे किन्तु फिर भी तृतीयेश भी होने से कतई अपना शुभ फल प्रदान नहीं कर सकता और लग्न तथा सप्तम स्थान को अपने पाप प्रभाव से प्रभावित करता है।

पाठको से मेरा निवेदन है कि, ध्यान दें कभी-कभी इस प्रकार के नेष्ट योग का अपवाद भी देखने में आया है, जैसे इस लेख के आरम्भ में जो मिथुन लग्न की कुंडली दी गई है, इस कुंडली में अष्टम भाव में शनि अपनी ही मकर राशि में है, और अपनी ही राशि में होने के कारण कोई भी ग्रह उस घर से सम्बंधित अपना अशुभ प्रभाव नहीं डालता। परंतु अपनी दूसरी राशि वाले घर का फल अवश्य क्षीण कर देगा। जिस प्रकार इस मिथुन लग्न की कुंडली में शनि नवम स्थान का शुभ फल अष्टम में होने के कारण क्षीण कर देगा तथा अष्टम भाव का स्वामी होकर अष्टम भाव में ही होने के कारण अष्टम भाव सम्बंधित शुभ फल देने वाला हो जायेगा। इस प्रकार इस कुंडली के लिए शनि धर्म व भाग्य सम्बंधित पाप फल तथा अष्टम में अष्टम का मालिक होकर स्थित होने से ससुराल से अक्समात् कोई बड़ा लाभ अथवा लाटरी से धन, गढ़ा हुआ धन, बड़ा उपहार इत्यादि देने वाला हो सकता है। परंतु इस प्रकार का योग सैकड़ों में किसी एकाध कुंडली में ही होता है।

एक बात और हमेशा आप ध्यान रखें, जिस किसी की कुण्डली में अष्टमेश यदि लग्न में हो तो, उन्हें हमेशा अष्टमेश से सम्बंधी दान एवं जाप अवश्य करने चाहिये तथा इसका कोई रत्न नहीं धारणा करना चाहिये। यदि ज्योतिषीय परामर्श की आवश्यकता हो तो आप सम्पर्क करें – 09810143516, 09155669922

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अलगाववादी ग्रह

वैवाहिक जीवन में अलगाववादी ग्रह :-

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ज्योतिष शास्त्र में मुख्यतः तीन ग्रहों को अलगाववादी ग्रह माना जाता है। 1. शनि, 2. राहु, 3. सूर्य।

ज्योतिषीय स्थिति तथा इनके दुष्प्रभावों के कारण यदि एक साथ इन ग्रहों का प्रभाव किसी भाव पर पड़ता है, तो उस योग से जातक का अलगाव हो जाता है। मुख्यतः हम सप्तम भाव से पत्नी-पति सुख देखते हैं, यदि इस भाव पर किसी भी तरह स्थिति दशा, विचार, गोचर पर पड़े तो अलगाव हो जाता है। यह नियम हम किसी भी भाव व उसके कारकत्त्व पर लागू कर सकते हैं।

प्रवृत्ति अनुसार ग्रहों का अलगाववादी होने के मुख्य कारण निम्न होते है। शनिः शनि को श्नैश्चर भी कहते हैं, जिसका अर्थ है, धीरे चलने वाला अर्थात शनि की दृष्टि के कारण, नौकरी में देरी, विवाह में देरी, संतान में देरी आदि समस्याएं आती हैं, इस प्रकार की दृष्टि के कारण जो भी कार्य होता है, वह धीरे-धीरे होता है।

शनि: को काल भी कहते हैं, किसी घटना के घटित होने में शनि का गोचर या स्थिति देखना जरूरी है।

राहु: राहु आधारभूत रूप से एक छाया ग्रह है, तथा पौराणिक कथा अनुसार राहु का दैत्य कुल होने के बावजूद उसने देवताओं के बीच बैठकर अमृत ग्रहण किया था। जिसका भेद सूर्य/चन्द्रमा ने खोल दिया था। इसलिए राहु सूर्य/चन्द्रमा के लिए समस्याएं उत्पन्न करता है, तथा एक अलगाववादी ग्रह की श्रेणी में आता है, राहु का सिर विष्णु भगवान नेे सुदर्शन चक्र द्वारा काट दिया था, अमृतपान के कारण राहु अमर था, परन्तु उसका सिर तथा धड़ अलग- अलग हो गये। सर का हिस्सा राहु तथा धड़ का हिस्सा केतु कहलाता है। इसके कारण भी राहु अलगाव का प्रतीक है।

सूर्य: सभी नवग्रहों में सूर्य सबसे ज्यादा शक्तिशाली ग्रह माना जाता है, इसे एक क्रूर ग्रह भी कहा जाता है, क्योंकि जो ग्रह इसके करीब आता है, वह अपना अस्तित्व खो बैठता है या अस्त हो जाता है, इसलिए भी अलगाव का कारक है, इसके अलावा पौराणिक कथा के अनुसार सूर्य की पत्नी भी इनकी गर्मी के कारण इन्हें छोड़कर चली गई थी, इसलिए सूर्य की गर्मी जिस भाव पर पड़ती है, वहां अनावश्यक गर्मी पैदा होती है, इसलिए भी यह विच्छेद का कारक है।
शनि, राहु, सूर्य अलगाववादी ग्रह हैं, तथा किसी भी भाव पर उनके संयुक्त प्रभाव से उस भाव कारक से जातक का अलगाव हो जाएगा। जैसे गोचर से इस तीन ग्रहों का संयुक्त प्रभाव यदि दशम भाव पर पड़े तो व्यक्ति को व्यवसाय से संबंधी समस्याएं आएंगी ही। ईसी प्रकार शनि, राहु अथवा सूर्य का सप्तम भाव पर दृष्टि प्रभाव हो, अथवा सप्तम स्थान का इनमें से किसी ग्रह से युति सम्बन्ध बन रहा हो तो वैवाहिक जीवन में अलगाव की स्थिति आ सकती है।

वैवाहिक अलगाव की स्थिति को जन्मकुंडली से देखकर इस स्थिति से बचाव के ज्योतिषीय उपाय का सहारा अवश्य ही लिया जा सकता है।

1. इन ग्रहों से संबंधित दान करवाना चाहिए।
2. मंत्र जप, उपवास या श्रद्धा भाव से पूजा-पाठ करना चाहिए।
3. शांति पूजा, रत्न तथा यंत्रों के प्रयोग द्वारा भी इस स्थिति को टाला जा सकता है।

किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले किसी अनुभवी और योग्य ज्योतिषी द्वारा कुण्डली का अध्ययन करवाकर उपायों का प्रयोग करना चाहिए।_____________________________________

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कालसर्प योग

कुंडली में कालसर्प योग का क्या प्रभाव होता है? कालसर्प योग जातक पर किस प्रकार अपना शुभ या अशुभ प्रभाव डालता है ? :-

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विविध धर्मग्रन्थों एवं शास्त्रों में सर्पदोषों का वर्णन मिलता है। वर्तमान में प्राचीन एवं नवीन ज्योतिषाचार्यों के मध्य कालसर्प योग के विषय में मन्त्रणा प्रारम्भ हो चुकी है। यदि हम प्राचीन ग्रन्थ मानसागरी, बृहज्जातक तथा बृहत्पाराशर होराशास्त्र का अवलोकन करें तो यह सिद्ध हो जाता है कि इन ग्रन्थों में कालसर्पयोग अथवा सर्पयोग का उल्लेख किया गया है।

भारतीय संस्कृति में नागों का विशेष महत्व है। प्राचीन काल से ही नागपूजा की जाती रही है। नागपंचमी का पर्व पूरे देश में पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन प्रत्येक गृहस्थ घर के प्रवेशद्वार पर नाग की आकृति बनाकर पूजन करता है। इस दिन नागदर्शन को अत्यन्त शुभ माना जाता है। इन्हें शक्ति एवं सूर्य का अवतार माना गया है। मानव-सभ्यता के प्रारम्भ से ही नागों के प्रति विशेष भय की भावना रही है। भारत के प्रत्येक क्षेत्र में भगवान् आशुतोष के पूजन का विधान होता है। नाग भगवान् शिव के गले का हार हैं।

सप्ताह के सात दिनों के नाम किसी-न-किसी ग्रह के ऊपर रखे गये हैं, किंतु राहु केतु के नाम पर कोई नाम नहीं रखा गया; क्योंकि इन्हें छायाग्रह माना जाता है। इसलिये इनका प्रभाव भी परोक्ष रूप से पड़ता है। राहु का स्वभाव शनिवत् एवं केतु का मंगलवत् माना जाता है। एक शरीर के भागों में राहु को सिर एवं केतु को धड़ मानने पर सिर में विचार-शक्ति होती है, किंतु शरीर न होने पर यह स्वयं क्रिया करने में असमर्थ होता है। राहु जिस भाव में होता है, उसके भावेश, उस भाव में स्थित ग्रह या जहाँ दृष्टि डालता है उस राशि, राशीश एवं उस भाव में स्थित ग्रह को अपनी विचारशक्ति से प्रभावित कर क्रिया करने को प्रेरित करता है। केतु जिस भाव में बैठता है उस राशि, उसके भावेश, केतु पर दृष्टिपात करने वाले ग्रह के प्रभाव में क्रिया करता है। केतु को मंगल के समान मान लेने पर उसका प्रभाव मंगल के समान विध्वंसकारी हो जाता है। अपनी महादशा एवं अन्तर्दशा में व्यक्ति के कर्म को भ्रमित कर सुख-समृद्धि का हृास करता है।

राहु की महादशा बाधाकारक होती है। यहाँ विचारणीय यह है कि राहु सम्बन्धित ग्रह के माध्यम से बुद्धि को प्रभावित करता है, एवं केतु सम्बन्धित ग्रह के प्रभाव में आकर उस ग्रह के अनुिसार कार्य करवाता है।

राहु के सम्बन्ध में एक बात अवश्य विचारणीय है कि राहु जिस ग्रह के सम्पर्क में हो, उसके अंश राहु से कम होने पर राहु प्रभावी रहेगा, जबकि राहु के अंश कम होने पर उस ग्रह का प्रभाव अधिक होगा एवं राहु निस्तेज हो जायगा, उस स्थिति में कालसर्प योग का प्रभाव भी न्यूनतम रहेगा। कालसर्प योग राहु से केतु एवं केतु से राहु की ओर बनता है। यहाँ विचारणीय यह है कि राहु से केतु की ओर बननेवला योग निष्प्रभावी होता है। यह कहना उपयुक्त होता है कि केतु से राहु की ओर बननेवाले योग को कालसर्प की संज्ञा देना उपयुक्त नहीं होगा।

वैज्ञानिक रूप से यदि कालसर्प योग की व्याख्या करें तो जन्मांग-चक्र में राहु-केतु की स्थिति हमेशा आमने-सामने की होती है। जब अन्य सभी ग्रह इनके मध्य अर्थात् प्रभावक्षेत्र में आ जाते हैं, तब वे अपना प्रभाव त्यागकर राहु केतु के चुम्बकीय क्षेत्र से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते एवं राहु-केतु के गुण-दोषों का प्रभाव पड़ना इन ग्रहों पर अवश्यम्भावी हो जाता है।

राहु-केतु हमेशा वक्रगति से चलते हैं। इनमें वाम गोलार्ध एवं दक्षिण गोलार्ध दो स्थितियाँ बनती हैं। राहु का बायाँ भाग काल कहलाता है। इसीलिये राहु से केतु की ओर बननेवाला योग ही कालसर्प योग की श्रेणी में आता है। केतु से राहु की ओर बनने वाले योग को अनेक आचार्यों ने कालसर्प योग नहीं माना है। इतना अवश्य है कि कालसर्प योग का निर्माण किसी-न-किसी पूर्वजन्मकृत दोष अथवा पितृदोष के कारण बनाता है।

निम्न चक्रद्वारा कालसर्प योग को स्पष्टतः समझा जा सकता है-

उदित गोलार्ध कालसर्प योग कुंडली

अनुदित गोलार्ध कालसर्प योग कुंडली

उदित गोलार्ध कालसर्प योग जन्म से ही प्रभावी हो जाता है, जबकि अनुदित का प्रभाव गोचर में ग्रह के राहु के प्रभाव में आने पर होता है। अतः उदित का प्रभाव अधिक भयावह होता देखा गया है।

किसी जन्मांग में कालसर्प योग का निर्धारण अत्यन्त सावधानी से करना चाहिये। केवल राहु-केतु के मध्य ग्रहों का होना ही प्रर्याप्त नहीं है। यहाँ अनेक ऐसे बिन्दु हैं, जिनका ध्यान न रखें तो हमारी दिशा एवं जातक की दशा खराब होने में अधिक समय नहीं लगेगा। सर्वप्रथम यह देखें कि कालसर्प योग किस भाव से किस भावतक है एवं ग्रह का भाव कया है उस भाव में ग्रहों की क्या स्थति बन रही है? ग्रहों की युति का क्या प्रभाव पड़ रहा है। यदि राहु के साथ किसी अन्य ग्रह की युति है तो यहाँ यह भी देखना है कि युति वाले ग्रह का बल राहु से कम है या अधिक। ऐसी स्थिति है तो राहु का न केवल प्रभाव कम होगा, अपितु कालसर्प योग भंग भी हो सकता है। यही स्थिति किसी ग्रह के राहु-केतु की पकड़ से बाहर निकले पर भी हो सकती है। अतः कालसर्प का निर्धारण सतही स्तर के विश्लेषण द्वारा करना चाहिए। यह योग जातक के लिये अत्यन्त ही दुःखदायी हो सकता है।
यहाँ पर एक बात और कहने योग्य है कि कालसर्प हमेशा कष्टकारक ही नहीं होते। कभी-कभी तो ये इतने अधिक अनुकूल होते हैं कि व्यक्ति को विश्वास्तर पर न केवल प्रसिद्ध बनाते हैं। अपितु सम्पत्ति, वैभव, नाम प्रसिद्धि के देनेवाले भी बन जाते हैं। आप विश्व के महापुरूषों के जन्मांगों का अध्ययन करें तो पायेंगे कि उनकी कुण्डली में कालसर्प योग होने के बाद भी वे प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचे। इतना अवश्यक है कि उनके जीवन का कोई-न-कोई पक्ष ऐसा अवश्य रहा है जो अपूर्णता का प्रतीक बन गया हो। कालसर्प योग से डरने या भयाक्रान्त होने की आवश्यकता बिलकुल भी नहीं है। जन्मकुण्डली में अनेक शुभ योग जैसे पंचमहापुरूष योग, बुधादित्य योग आदि बनते हैं, जिनके कारण कालसर्प योग का प्रभाव अत्यधिक नहीं होकर अल्पकालिक होता है। यदि आप विश्व के सफलतम व्यक्तियों के जीवन का अध्ययन करें तो निश्चित ही यह पायेंगे कि उनकी कुण्डली के कालसर्प योग ने ही उन्हें इस उच्चतम शिखर पर पहुँचाया।

किसी जातक की कुण्डली में कालसर्प योग है तो यह मानकर चलिये कि परिवार के अन्य सदस्यों के जन्मांग में भी यह योग देखने को मिलेगा; क्योंकि यह अनुबन्धित ऋण है, जो हमें पूर्वजों से मिलता है, एवं इससे परिवार के सभी सदस्य किसी-न-किसी रूप में प्रभावित होते हैं। इसे ही पितृदोष का नाम दिया जाता है। कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि ज्योतिषाचार्य द्वारा व्यक्ति इतना डरा दिया गया है कि वह ठीक ढंग से सोने भी नहीं पाता, जबकि कुंडली में कालसर्प योग था ही नहीं, या आंशिक प्रभाव पड़ रहा था, जिसका सहज निदान किया जा सकता था। अतः कालसर्प योग का निर्णय किसी योग्य एवं अनुभवी ज्योतिषी से कराकर उसका निदान करा लेना चाहिये।

आज समाज में ऐसे भी विद्वान ज्योतिषाचार्य हैं, जो अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर सही सलाह दे रहे हैं। इस लिये अनुभवहीन ज्योतिषियों को कुंडली दिखाने से बचने का प्रयास करना चाहिये।

कालसर्प योग के प्रकार :-
ज्योतिष में 12 राशियाँ हैं। इनके आधार पर 12 लग्न होते हैं, और इनके विविध योगों के आधार पर कुल 288 प्रकार के कालसर्प योग निर्मित हो सकते हैं। प्रमुख रूप से भाव के आधार पर कालसर्प योग 12 प्रकार के होते हैं, जिसके मान एवं प्रभाव निम्नानुसार हैं-

1- अनन्त कालसर्प योग- लग्न से सप्तम भाव तक बननेवाले इस योग को अनन्त कालसर्प योग कहा जाता है। इस योग के कारण जातक को मानसिक अशान्ति, जीवन की अस्थिरता, कपटबुद्धि, प्रतिष्ठाहानि, वैवाहिक जीवन का दुःखमय होना इत्यादि प्रभाव देखने को मिलते हैं। जातक को आगे बढ़ने के लिये काफी संघर्ष करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति निरन्तर मानसिक रूप से अशान्त रहता है।

2- कुलिक कालसर्प योग- द्वितीय स्थान से अष्टम स्थान तक पड़नेवाले इस योग के कारण जातक का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। जीवन में आर्थिक पक्ष को लेकर अत्यन्त संघर्ष करना पड़ता है। जातक कर्कश वाणी से युक्त होता है, साथ ही वह पारिवारिक विरोध एवं अपयशका भागी भी बनता है। योग की तीव्रता के कारण विवाह में विलम्ब के साथ विच्छेदतक भी होता रहता है।

3- वासुकि कालसर्प योग- यह योग तृतीय से नवमतक बनता है। पारिवारिक विरोध, भाई-बहनों से मनमुटाव, मित्रों से धोखा, भाग्य की प्रतिकूलता, व्यावसाय या नौकरी में रूकावटें, धर्म के प्रति नास्तिकता, कानूनी रूकावटें आदि बातें देखने को मिलती हैं। जातक धन अवश्य कमाता है, किंतु कोई-न-कोई बदनामी उसके साथ जुड़ी ही रहती है। उसे यश पद, प्रतिष्ठा पाने के लिये संघर्ष करना ही पड़ता है।

4- शंखपाल कालसर्प योग- यह योग चतुर्थ से दशम भाव में निर्मित होता है। इसके प्रभाव से व्यवसाय, नौकरी, विद्याध्ययन इत्यादि पक्षों में रूकावटें आती हैं। घाटे का सामना करना पड़ता है। वाहन एवं भृत्यों (नौकर) तथा कर्मचारियों को लेकर कोई-न-कोई समस्या हमेशा बनी रहती है। आर्थिक स्थिति इतनी अधिक खराब हो जाती है कि दिवालिया होने तक की परिस्थितियाँ आ सकती है।

5-पग कालसर्प योग- पंचम से एकादश भाव में राहु-केतु होने से यह योग होता है। इसके कारण सन्तान सुख में कमी या सन्तान का दूर रहना अथवा विच्छेद तथा गुप्तरोगों से जूझना पड़ता है। असाध्यरोग हो सकते हैं, जिनकी चिकित्सा में अत्यधिक धन का अपव्यय होता है। दुर्घटना एवं हाथों में तकलीफ हो सकती है। मित्रों एवं पत्नी से विश्वासघात मिलता है। यदि सट्टा, लाटरी, जुआ की लत हो तो इसमें सर्वस्व स्वाहा होने में देर नहीं लगती। शिक्षा प्राप्ति में अनेक अवरोध आते हैं। जातक की शिक्षा भी अपूर्ण रह सकती है। जिस व्यक्ति पर सर्वाधिक विश्वास करेंगे, उसी से धोखा मिलता है। सुख में प्रयत्न करने पर भी इच्छित फल की प्राप्ति नहीं हो पाती। संघर्षपूर्ण जीवन बीतता है।

6-महापग कालसर्प योग- छह से बारह भाव के इस योग में पत्नी-विछोह, चरित्र की गिरावट, शत्रुओं से निरन्तर पराभव आदि बातें होती हैं। यात्राओं की अधिकता रहती है। आत्मबल की गिरावट देखने को मिल जाती है। प्रयत्न करने पर भी बीमारी से छुटकारा नहीं मिलता। गुप्त शत्रु निरन्तर षड्यन्त्र करते ही रहते हैं।

7- तक्षक कालसर्प योग- सप्तम से लग्न तक यह योग होता है। इसमें सर्वाधिक प्रभाव वैवाहिक जीवन एवं सम्पत्ति के स्थायित्व पर पड़ता है। जातक को शत्रुओं से हमेशा हानि मिलती है, और असाध्य रोगों से जूझना पड़ता है। पदोन्नति में निरन्तर अवरोध आते हैं। मानसिक परेशानी का कोई-न-कोई कारण उपस्थित होता रहता है।

8-कर्कोटक कालसर्प योग- अष्टम भाव से द्वितीय भाव तक कर्कोटक योग होता है। जातक रोग और दुर्घटना से कष्ट उठाता है, ऊपरी बाधाएँ भी आती हैं। अर्थहानि, व्यापार में नुकसान, नौकरी में परेशानी, अधिकारियों से मनमुटाव, पदावनति, मित्रों से हानि एवं साझेदारी में धोखा मिलता है। रोगों की अधिकता, शल्यक्रिया, जहर का प्रकोप एवं अकाल मृत्यु आदि योग बनते हैं।

9-शंखनाद/शंखचूड़/कालसर्प योग- यह योग नवम से तृतीय भाव तक निर्मित होता है। यह योग भाग्य को दूषित करता है। व्यापार में हानि एवं पारिवारिक तथा अधिकारियों से मनमुटाव कराता है, फलतःशासन से कार्यो में अवरोध होते हैं। जातक के सुख में कमी देखने को मिलती है।

10-पातक कालसर्प योग- दशम से चतुर्थ भाव तक यह योग होता है दश भाव से व्यवसाय की जानकारी मिलती है। सन्तान पक्ष को बीमारी भी होती है। दशम एवं चतुर्थ से माता-पिता का अध्ययन किया जाता है, अतः माता-पिता, दादा-दादी का वियोग राहु की महादशा/अन्तर्दशा में सम्भाव्य है।

11-विषाक्त/विषधर कालसर्प योग- राहु-केतु के एकादश-पंचम में स्थित होने पर इस योग से नेत्रपीडा, हृदयरोग, बन्धुविरोध, अनिद्रारोग आदि स्थितियाँ बनती हैं। जातक को जन्मस्थान से दूर रहने को बाध्य होना पड़ता है। किसी लम्बी बीमारी की सम्भावना रहती है।

12- शेषनाग कालसर्प योग- द्वादश से षष्ठ भाव के इस योग में जातक के गुप्त शत्रुओं की अधिकता तो होती ही है वे जातक को निरन्तर नुकसान भी पहुँचाते रहते हैं। जिन्दगी में बदनामी अधिक होती है। नेत्र की शल्यक्रिया करवानी पड़ सकती है। कोर्ट-कचहरी के मामलों में पराजय मिलती है।

कालसर्प योग के सामान्य लक्षण:-
कालसर्प योग से जो जातक प्रभावित होते हैं, उन्हें प्रायः स्पप्न में सर्प दिखायी देते हैं। जातक अपने कार्यो में अथक परिश्रम करने के बावजूद आशातीय सफलता प्राप्त नहीं कर पाता। हमेशा मानसिक तनाव से ग्रस्त रहता है, जिसके कारण सही निर्णय लेने में असमर्थ रहता है। अकारण लोगों से शत्रुता मिलती है। गुप्त शत्रु सक्रिय रहते हैं, जो कार्यो में अवरोध पैदा करते हैं। पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण हो जाता है। विवाह में विलम्ब या वैवाहिक जीवन के साथ विच्छेद तक की स्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं।

सर्वाधिक अनिष्टकारी समय- जातक के जीवन में सर्वाधिक अनिष्टकारी समय निम्न अवस्था में होता है-

1- राहु की महादशा, राहु की प्रत्यन्तर दशा में अथवा शनि, सूर्य तथा मंगल की अन्तर्दशा में।

2- जीवन के मध्यकाल लगभग 40से 45 वर्ष की आयु में।

3- ग्रह-गोचर में कुण्डली में जब-जब कालसर्प योग बनता हो।

उपर्युक्त अवस्थाओं में कालसर्प योग सर्वाधिक प्रभावकारी होता है एवं जातक को इस समय शारीरिक, मानसिक पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक, व्यावसायिक इत्यादि क्षेत्र में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

कालसर्प योग शान्ति के कुछ स्थान:-
1- कालहस्ती शिवमन्दिर, विरूपति।
2- त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग, नासिक।
3- त्रिवेणीसंगम, इलाहाबाद।
4- त्रियुगी नारायण मन्दिर, केदारनाथ।
5- त्रिनागेश्वर मन्दिर, जिला तंजौर।
6- सिद्धशक्तिपीठ, कालीपीठ, कलकत्ता।
7- भूतेश्वर महादेवमन्दिर नीमतल्लाघाट, कलकत्ता।
8- गरूड़-गोविन्द मन्दिर छटीकारा गाँव एवं गरूड़ेश्वर मन्दिर बडोदरा।
9- नागमन्दिर, जैतगाँव, मथुरा।
10- चामुण्डादेवी मन्दिर, हिमालय प्रदेश।
11- मनसादेवी मन्दिर, चण्डीगड़।
12- नागमन्दिर ग्वारीघाट, जबलपुर।
13- महाकालमन्दिर उज्जैन।

कालसर्प योग की शान्ति किसी पवित्र नदी तट, नदी संगम, नदी किनारे के श्मशान, नदी किनारे स्थित शिवमन्दिर अथवा किसी भी नाग मन्दिर में की जाती है। कभी-कभी देखने में आता है कि अनेक आचार्य यजमान के घरों (निवास)- में ही कालसर्प योग की शान्ति करवा देते हैं। ऐसा ठीक नहीं प्रतीत होता। रूद्राभिषेक तो घर में किया जा सकता है, किंतु कालसर्प योग की शान्ति निवास स्थल में नहीं करनी चाहिये।

राहुकृत पीड़ा के उपाय:-
यदि जन्मांग में राहु अशुभ स्थिति में हो तो उससे बचने के लिये कस्तूरी, तारपीन, गजदन्त भस्म, लोबान एवं चंदन का इत्र जल में मिलाकर स्नान करने से राहु की पीड़ा से शान्ति मिलती है। इसके लिये नक्षत्र, योग दिन, दिशा एवं समय का विशेष ध्यान रखना चाहिये। ऐसे जातक को गोमेद का दान करना चाहिये।

राहु शांति के लिए दान:-
राहु की पीड़ा के निवारण हेतु जातकों को निम्न वस्तुओं का दान बुधवार या शनिवार के दिन करना चाहिये-

1-सरसों का तेल, 2- सीसा (रांगा), 3- काला तिल, 4-कम्बल, 5-तलवार, 6-स्वर्ण, 7-नीला वस्त्र, 8- सूप, 9- गोमेद, 10-काले रंग का पुष्प, 11-अभ्रक, 12-दक्षिणा।

उपर्युक्त वस्तुओं का दान किसी शनि का दान लेने वाले को दें, अथवा किसी शिव मन्दिर, शनि मंदिर में रात्रिकाल में बुधवार या शनिवार को छोड़ दें।

कालसर्प योग शान्ति के अन्य उपाय:-
1- कालसर्प योग का सर्वमन्य शान्ति-उपाय रूद्राभिषेक है। श्रावण मास में अवश्य निर्यमित करें।

2- बहते जल में विधान सहित पूजन कर दूध से पूरितकर चाँदी के नाग-नागिन के जोड़े को प्रवाहित करें।

3- तीर्थराज प्रयाग में तर्पण एवं श्राद्धकर्म सम्पन्न करें।

4- कालसर्प योग में राहु की शान्ति का उपाय रात्रि के समय किया जाये। राहु के सभी पूजन शिव मन्दिर में रात्रि के समय या राहुकाल में करें।

5- राहु के हवन हेतु दूर्वा का उपयोग आवश्यक है। राहु के पूजन में धूप एवं अगरबत्ती का उपयोग न करें। इसके स्थान पर कपूर, चन्दन का इत्र उपयोग करें।

6- शिवलिंग पर मिसरी एवं दूध अर्पित करें। शिवताण्डवस्तोत्र का नियमित पाठ करें।

7- घर के पूजा स्थल में भगवान् श्रीकृष्ण की मोरपंखयुक्त मूर्ति का नियमित पूजन करें।

8- पंचाक्षर मंत्र का नियमित जप करें। नियमित मौली (कलावा) का दान करें, एवं बहते जल में कोयले प्रवाहित करते रहने से स्थायी शान्ति प्राप्त होती है।

9- मसूर की दाल एवं कुछ पैसे सफाई कर्मचारी को प्रातःकाल दें।

10- निम्न नवनागस्तोत्र के नौ पाठ प्रतिदिन करें-

अनन्तं वासुकिं शेषं पगनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
सायकांले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः।।

भावों के अनुसार कालसर्पयोग का निवारण :-
1- प्रथम भाव- गले में हमेशा चाँदी का चैकोर टुकड़ा धारण करें।

2- द्वितीय भाव- घर के उत्तर-पश्चिम-कोण में सफाईकर मिट्टी के बर्तन में पानी भर दें, प्रतिदिन पानी बदलें। बदले हुए पानी को चैराहे में डालें।

3- तृतीय भाव- अपने जन्मदिन पर गुड़, गेहूँ एवं ताँबे का दान करें।

4- चतुर्थ भाव- प्रतिदिन बहते हुए जल में दूध बहायें।

5- पंचम भाव- घर के ईशानकोण में सफेद हाथी की मूर्ति रखें।

6- षष्ट भाव- प्रत्येक माह की पंचमी तिथि को एक नारियल बहते हुए जल में प्रभावित करें।

7- सप्तम भाव- मिट्टी के बर्तन में दूध भरकर निर्जन स्थान में रख आयें।

8- अष्टम भाव- प्रतिदिन काली गाय को गुड़, रोटी, काले तिल एवं उड़द खिलायें।

9- नवम भाव- शिवरात्रि के दिन 18 नारियल सूर्योदय से सूर्यास्त तक 18 मन्दिरों में रखें। यदि 18 मन्दिर पास में न हों तो दुबारा उसी क्रम से मन्दिरों में दान कर सकते हैं।

10- दशम भाव- किसी महत्वपूर्ण कार्य को घर से जाते समय काली उड़द के दाने सिर से सात घुमाकर बिखेर दें।

11- एकादश भाव- प्रत्येक बुधवार को घर की सफाई कर कचरा बाहर फेंक दें। उस दिन फटा वस्त्र पहनें।

12- द्वादश भाव- प्रत्येक अमावास्या को काले कपड़े में काला तिल, दूध में भीगे जौ, नारियल एवं कोयला बाँधकर जल में बहायें।

शिवपंचाक्षर मंत्र एवं शिवपंचाक्षरस्तोत्र का नियमित जप करने एवं कालसर्प यंत्र नियमित पूजन, शिवलिंग तथा चित्र पर चंदन का इत्र लगाने से शान्ति प्राप्त होती है। लगातार 45 दिन का अनुष्ठान निश्चित शान्ति देता है। अनुष्ठान के समय अथवा मंत्र जप के दौरान केवल इत्र एवं कपूर का प्रयोग ही करें। अगरबत्ती के धुएँ एवं दीप से नागों को गर्माहट मिलती है, जिससे वे क्रोधित होते हैं, अतः इन वस्तुओं का उपयोग न करें।

शिवपंचाक्षरस्त्रोत्र :-
नागेन्द्रहराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय हेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नराय नमः शिवाय।।
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय।
चन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नमः शिवाय।।
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय।।
वसिष्ठकुम्भोभ्दवगौतमार्य – मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय।।
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
व्यियाय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय।।
पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।

शिवकृपा से कुछ भी अप्राप्य नहीं है। माँ नर्मदा का नाम-जप करते हुए शिवलिंग पर नर्मदाजल की निरन्तर धार छोड़ते हुए निम्न मंत्र का जप करने से कालसर्प दोष, पितृ दोष, शापित कुंडली के दोषों का पूर्णतः शमन सम्भव हो जाता है-

नर्मदायै नमः प्रातर्नर्मदायै नमो निशि।
नमोऽस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहि मां विषसर्पतः।।

मेरे और लेख देखें :- shukracharya.com, aap kabhavishya.in, aapkabhavishya.com, astroguruji.in, gurujiketotke.com पर भी।

हस्तरेखा

हस्तरेखा शास्त्र का इतिहास :-

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संसार में 78 प्रतिशत लोग ज्योतिष विज्ञान में विश्वास रखते हैं। फ्रांस में तो 47 प्रतिशत लोग विश्वास करते हैं। अमेरिका में 5000 बड़े ज्योतिषी दिन-रात काम में लगे रहते हैं। ’ज्योतिष अद्वैत का विज्ञान’ पुस्तक के अनुसार ज्योतिष विज्ञान में केवल सामान्यजन ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक, विचारक और बुद्धिजीवियों तक का एक बड़ा वर्ग विश्वास रखता है। अब तो विभिन्न देशों के विश्वविद्यालयों में भी ज्योतिष विज्ञान पढ़ाया जाने लगा है।

हस्तरेखा विज्ञान भारतीय समाज और परिवेश में तो युगों पहले से ही प्रचलित है। माना जाता है कि समुद्र ऋषि ऐसे पहले भारतीय ऋषि थे, जिन्होंने क्रमबद्ध रूप से ज्योतिष विज्ञान की रचना की। अतः ज्योतिष शास्त्र या हस्तरेखा शास्त्र को सामुद्रिक शास्त्र भी कहा है। वैदिक धर्म ग्रंथों में कश्यप मुनि ने 18 आचार्यों को ज्योतिष शास्त्र का महान विद्वान व निपुण ज्ञाता माना है, ये हैं – 1. सूर्य 2. भीष्म पितामह, 3. व्यास, 4. वशिष्ठ, 5. अत्रि, 6. पराशर, 7. कश्यप, 8. नारद, 9. गर्ग, 10. मरीचि, 11. मनु, 12. अंगिरा, 13. लोमश, 14. पौलिश, 15. च्यवन, 16. भुवन, 17. भृगु, 18. शौनिक।

हस्त संजीवन के एक श्लोकानुसार मनुष्य का हाथ एक ऐसी जन्मपत्रिका है, जो कभी नष्ट नहीं होती और इसके रचियता स्वयं ब्रह्या हैं। सृष्टि के आदि रचनाकार ब्रह्यदेव द्वारा बनाई गई हस्त रूपी जन्मकुण्डली में संकटकाल के समाधान हैं, और गणितीय त्रुटि की संभावना नहीं है। हस्तरेखायें भी ग्रहों-नक्षत्रों के समान अटल फलादेश प्रदान करती हैं, तथा भावी जीवन का मार्गदर्शन करती हैं।

जिस तरह किन्हीं भी दो व्यक्तियों का जीवन, भाग्य, विचारधारा और परिस्थितियां एक जैसी नहीं होती, ठीक उसी तरह दो व्यक्तियों की हस्तरेखाएं भी एक जैसी नहीं होती। पेरिस में महानतम हस्तरेखा विशेषज्ञ डिसबाररोल्लस ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि संपूर्ण संसार में कोई भी मनुष्य मुझे दो हाथों की एक समान हस्तरेखाएं लाकर देगा तो मैं अपना जीवन एवं दौलत उसके नाम कर दूंगा।

हर मनुष्य के हाथ की रेखाएं अलग-अलग होती हैं- यह एक निश्चित और अटल तथ्य है। हर मनुष्य का ठीक उसी तरह से भाग्य और व्यक्तित्व भी अलग-अलग होता है। यहां तक कि जुड़वां भाइयों में भी कुछ-न-कुछ असमानताएं अवश्य होती हैं।

दुःख की बात यह है कि भारतीय संस्कृति की यह प्राचीन धरोहर जितनी पुरानी है, उतनी ही तिरस्कृत भी है। आचार्य रजनीश ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि मनुष्य जाति के इतिहास में, ऐसा कोई भी समय या सम्यता नहीं थी जब ज्योतिष ज्ञान मौजूद नहीं था।

ईसा से 26 हजार वर्ष पूर्व सुमेर सम्यता में मिली हड्डियों के अवशेषों में भी ज्योतिष ज्ञान के चिह्न पाए गए हैं।

ईसा से पूर्व हस्तरेखा शास्त्री एरिस्टाॅटिल (314-322 ई. पूर्व) ने ’काइरोमेन्टीया एरीस्टोलिस कम फिगरिसं तथा ’डी सिओईओ हट मन्डीकाउंट’ नामक दो महान पुस्तकों की रचना की।

यूरोप में अल्बरटस मैगनस ने 1205-1280 में ’हैंड व्हर्जुसगेन’ नामक हस्तरेखा शास्त्र पर अद्भुत पुस्तक की रचना की।

चीन में हस्तरेखा ज्ञान ईसा के जन्म से 3000 वर्ष पूर्व ही प्रचलित हो चुका था। इतिहास में लिखा है कि हिसपानदा ने स्वर्ण अक्षरों से लिखी हस्तरेखा शास्त्र पर आधारित एक पुस्तक सिकंदर को भेंट की थी।

सन् 1500 में इटैलियन विद्वान कोश्वस एंड्रीज ने लाॅ आर्ट डी साइरोमैनस’ नामक ज्योतिष ग्रंथ की रचना की थी।

16वीं शताब्दी में टेस्नियर ने ’पोपस मैथमैटिक्स’ पुस्तक की रचना की, जिसमें हस्तरेखा शास्त्र व ग्रहों के विषय पर विशेष गणितीय सारणियां चित्रित थीं।

17वीं शताब्दी में अंग्रेज पामिस्ट रिचर्ड सेंडर ने हाथों की रेखाओं को देखकर मृत्यु की तिथियां बताना शुरू कर दिया।

18वीं शताब्दी में फेब्रिरीसिज, जोनन अल्र्बट ने 1668-1736 में कई उल्लेखनीय व ज्ञानवर्द्धक हस्तरेखा शास्त्र लिखे।

19 वीं शताब्दी में जो हस्तरेखा शास्त्र से संबंधित अनगिनत पुस्तकें लिखी गईं। हस्तरेखा शास्त्र के लिए यह काल सर्वश्रेष्ठ तथा स्वर्ण काल रहा है।

सन् 1801-1883 में डेसबारोल्स ने मिस्र के पादरियों और हिंदू ब्राह्यणों की पुस्तकों का गहन अध्ययन किया। इसके अलावा उन्होंने अरबी, इटली, रोमन, फ्रांसिसी तथा जर्मनी भाषाओं के हस्तरेखा शास्त्र का भी अध्ययन किया। इनकी लिखी पुस्तक ’लेस मिस्ट्रीज डी लाॅ मेन’ अपने में एक चमत्कारिक व अद्भुत पुस्तक है।

19 वीं शताब्दी के सर्वाधिक चर्चित अंकविद्या ज्ञाता हस्तरेखा के विद्वान कीरो ने लिखा है- ’’विश्वास कीजिए कि सृष्टि का परमपिता कभी नहीं चाहता कि उसकी सृष्टि या उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना मानव किसी भी प्रकार का कष्ट उठाए और अंधकार में भटके।’’

इसी कारण परमपिता परमेश्वर ने मानव की सहायता हेतु विभिन्न प्रकार के ज्ञान की रचना की है। मानव को सुखद परिस्थितियां देने के लिए परमात्मा ने मनुष्य के हाथों में इस प्रकार की रेखाएं अंकित की हैं जिसकी सहायता से वह जान सके कि कौन-सी स्थितियां, प्रवृत्तियां या कारण उसे दुखों और कष्टों की ओर धकेल रहे हैं, और कौन से कारक सुख प्रदानकर्ता हो सकते हैं।

द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने भी मनुष्यों के शुभ-अशुभ लक्षण जानने की जिज्ञासा भगवान शंकर के समक्ष प्रकट की थी।

आदि कवि महर्षि बाल्मीकि ने भी रामायण के प्रमुख चरित्रों के अंग लक्षणानुसार उनके गुण-अवगुण तथा शुभ-अशुभ का वर्णन किया है। बिन्दु मिथक इतिहास के अनुसार यह रचना त्रेता युग की है।

ओशो रजनीश ने ज्योतिष विद्या के ऊपर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा है- ’’भविष्य एकदम अनिश्चित नहीं है। हमारा ज्ञान अनिश्चित है। वैज्ञानिक अभी दस वर्षों में एक नई बात कह रहे हैं कि प्रत्येक प्राणी के पास कोई ऐसी अलौकिक इंद्रिय है, जो भावी घटनाओं या जगतिक प्रभावों को अनुभव करती है।’’ (जैसे जानवरों को भूकम्प का अहसास हो जाना या मछलियों को ज्वार भाटा का पता चल जाना, या किसी की मृत्यु से पूर्व कुत्ते का रोना अथवा सर्दी का मौसम आने से एक माह पूर्व ही पक्षियों का पलायन करने लगना।)

ऐसी ही अलौकिक क्षमता शायद मनुष्य के पास भी है। वास्तव में पशु-पक्षी सदियों से निपट गंवार, ठोस प्राकृतिक व अवैज्ञानिक बने रहे इसलिए उनकी यह पारलौकिक क्षमता गुम नहीं हुई, किंतु मनुष्य ने बुद्धिमानी, अप्राकृतिक अवस्था तथा वैज्ञानिक सुविधाओं में इस योग्यता को खो दिया हस्तरेखा शास्त्र एक प्राचीन विद्या है, जिसे संसार के 78 प्रतिशत लोग मानते हैं। संसार की इतनी बड़ी आबादी को कुछ-न-कुछ तथ्य और सत्य नजर आता ही होगा। हस्तरेखाओं के समाधान में, तभी वे इसे मानते हैं।

जैसे मनुष्य संकट-दुःख में या अपनी परीक्षा अथवा इंटरव्यू के दौरान ईश्वर से प्रार्थना करता है, जबकि नास्तिक लोग ईश्वर से इंकार करते हैं।

पितृ-श्राद्ध के दिनों में लोग अपने-अपने पूर्वजों की आत्माओं की शांति के लिए भोज-आयोजन करते हैं। ऐसा भी देखने में आता है कि कुछ लोगों को बुरी आत्माएं जकड़ लेती हैं तो उन्हें उतरवाने के लिए लोग पीर, पंडित के पास या किसी धार्मिक स्थल पर जाते हैं।

वैज्ञानिक आत्मा के अस्तित्व का बहिष्कार करते हैं, किंतु इस प्रकार के आधुनिक बहिष्कार या इंकार से लोगों की श्रद्धा कम नहीं हुई, और ईश्वर से प्रार्थना, पितृ श्राद्ध, आत्माओं का सम्मान, पीर-मजार को सज्दा तथा धर्म-स्थल की पूजा आज भी जारी है, और आगे भी जारी रहेगी। ठीक उसी तरह हस्तरेखाओं का महत्व, उनकी उपयोगिता, उनके प्रति जनमानस की श्रद्धा और हस्तरेखाओं की अटल भविष्यवाणियां सदियों से आज तक जारी हैं, और आगे भी हस्तरेखाओं के लिए जनमानस का सम्मान और विश्वास जारी रहेगा।

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दीपावली पूजा मुहूर्त 2019

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दीपावली पांच पर्वों का सम्मीलित महापर्व है, जिस का आरम्भ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) से कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई-दूज) तक रहता है। दीपावली के पर्व पर धन-धान्य की प्राप्ति के लिये धन की अधिष्ठात्रि धनदा भगवती लक्ष्मी का समारोह पूर्वक आवाहन, षोडशोपचार पूजन किया जाता है। इस वर्ष के पंचांग के अनुसार 27 अक्टूबर 2019 कार्तिक कृष्ण अमावस्या रविवार के दिन चित्रा नक्षत्र, के सुखद संयोग में दीपावली का पावन पर्व मनाया जायेगा। चित्रा नक्षत्र सांय 22 बजकर 30 मिनट तक रहेगा। पिछले दिनों से में दीपावली पूजन मुहूर्त के विषय में अध्ययन तथा खोज कर रहा था। अनेक ग्रंथों का अध्ययन करने पर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य सामने आये हैं, जिन का वर्णन इस प्रकार है-

1. ‘शक्ति संगम तंत्र’ के काली खण्ड में अनेक विशिष्ट मुहूर्तों का वर्णन मिलता है, जिन मुहूर्तों में लक्ष्मी जी की विशेष कृपा पाने के लिये विशेष उपाय बताये गये हैं। तथा उन में भी दीपावली की रात्रि को विशेष रूप से लक्ष्मी साधना के लिये गोपनीय मुहूर्त बताये गये हैं।

2. रूद्रयामल तंत्र’ में लिखा है कि जब सूर्य और चंद्रमा तुला राशि में गोचरवश भ्रमण करते हैं, तब लक्ष्मी साधना करने से अधिक धन-धान्य की प्राप्ति होती है।

3. ‘श्री विद्यार्णव तंत्र’ में कालरात्रि को महाशक्ति रात्रि माना गया है। कालरात्रि मातृकाओं का भी इस ग्रंथ में उल्लेख मिलता है। कालरात्रि को (श्रीविद्या लक्ष्मी साधना के लिये जो विशेष साधना आदि शंकराचार्य द्वारा बताई गई है।) का अंग कहा गया है। श्रीविद्या की साधना से सुख-सौभाग्य और समृद्धि की स्वतः ही प्राप्ति होने लगती है। मंत्र शास्त्र में इसको गणेश्वरी विद्या कहा गया है, जो ऋद्धि-सिद्धि को देने वाली है।

4. मंत्र महोदघि में उनके विषय में वर्णन इस प्रकार से मिलता है, ‘उदीयमान सूर्य जैसी आभावाली, बिखरे हुये बालों वाली, काले वस्त्र वाली, त्रिनेत्री, चारों हाथों में दण्ड, लिंग, वर तथा भुवन को धारण करने वाली, आभूषणों से सुशोभित, प्रसन्न वदंना, देवगणों से सेवित तथा कामबाण से विकसित शरीर वाली माया तथा काल रात्रि का ध्यान करता हूँ।

5. मुहूर्त चिन्तामणि तथा ज्योतिष ग्रंथो में इस रात्रि का महत्व इस प्रकार से मिलता है- दीपावली की रात्रि को आधी रात्रि के बाद जो दो मुहूर्त का समय है, उसको महानिशीथ काल कहते हैं। उस काल में आराधना, साधना करने से अक्ष्य-लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इस काल में सूर्य तथा चंद्रमा तुला राशि में होते हैं। इस राशि के स्वामी शुक्र को धन-धान्य तथा ऐश्वर्य का प्रतीक माना गया है।

पूजन का समय (मुहूर्त) निर्णय-
इस लेख में आगे दिये गये निर्दिष्ट शुभ मुहूतों में अपने निवास स्थान में किसी स्वच्छ एवं पवित्र स्थान पर आटा, हल्दी, अक्षत् एवं पुष्पादि से अष्टदल कमल बनाकर श्रीमहालक्ष्मी का आवाहन एवं स्थापना करके देवों की विधिवत पूजार्चना करनी चाहिये। पूजन सामग्री में विभिन्न प्रकार की मिठाई, फल-पुष्पाक्षत, धूप, दीपदि सुगंधित वस्तुयें सम्मीलित करनी चाहियें।

आवाहन मंत्र:-

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामाद्र्रां ज्वलंती तृप्तां तर्पयंतीम्। पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप हव्ये श्रियम्।। (श्री सूक्तम्)

पूजा मंत्र:-

ॐ गं गणपतये नमः।। लक्ष्म्यै नमः।। नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रनत्रानां सा मे भूयात्त्वदर्चनात्।।
से लक्ष्मी की, एरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः। शतयज्ञाधिपो देवस्तस्मा इन्द्राय ते नमः

अग्रलिखित मंत्र से इंद्र की और कुबेर की पूजा करें:- कुबेराय नमः, धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च। भवंतु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादि सम्पदः।।

नमस्कार प्रार्थना मंत्र-
ॐ नमः कमलवासिन्य नारायण्यै नमो नमः।
कृष्णप्रियायै सारायै पद्मायै च नमो नमः।।
पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नमः।
पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नमः।।
सर्वसम्पतत्स्वरूपायै सर्वदात्र्यै नमो नमः।
सुखदायै मोक्षदायै सिद्धिदायै नमो नमः।।

जप मंत्र –

ॐ हृीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः।।

ॐ श्री हृीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं हृीं श्रीं ॐ महालक्ष्मयै नमः।।

ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ।।

दीपावली मुहूर्त गणना :-

1. सूर्य और चंद्रमा का संचार – दीपावली का पर्व तभी शुभ होगा जब सूर्य व चंद्रमा (दोनों ग्रह) तुला रात्रि में ही हों। सूर्य का संचार 17 अक्तूबर 2019 से 16 नवम्बर 2019 तक तुला में ही है, तथा चन्द्रमा का तुला में संचार 27 अक्तूबर 2019 साॅय 16 बजकर 31 मिनट से तुला राशि में प्रवेश होगा। अतः 27 अक्तूबर 2019 की रात्रि में दीपावली मुहूर्त के समय सूर्य तथा चंद्रमा (दोनो) तुला राशि में ही संचार कर रहे होंगे।

2. शुभ लग्न (स्थिर) – दीपावली की रात्रि, दीपावली पूजन स्थिर लग्न दीपावली मुहूर्त (वृष लग्न अथवा सिंह लग्न) के समय करना चाहिये- इस वर्ष वृष लग्न 27 अक्तूबरShukracharya.com के दिन 18ः40 से 20ः35 बजे के मध्य विद्यमान रहेगा, तथा सिंह लग्न मध्य रात्रि 01ः09 से 03ः28 तक रहेगा।

3. शुभ की चैघड़िया – दीपावली पूजन, कुबेर-पूजा, दीपावली मुहूर्त रात्रि चर, लाभ, अमृत एवं शुभ की चैघड़िया में करना चाहिये। इस वर्ष 27 अक्तूबर की रात्रि शुभ की चैघड़िया 17 बजकर 40 मिनट से 20 बजकर 52 मिनट तक है, और अमृत का चैघड़िया 19 बजकर 16 मिनट से 20 बजकर 52 मिनट तक रहेगा। इस के उपरांत चर का चैघड़िया 20 बजकर 52 मिनट से 22 बजकर 58 मिनट तक भी शुभ मुहूर्त रहेगा। इस के पश्चात लाभ का चैघड़िया मध्य रात्रि 01 बजकर 42 मिनट से 03 बजकर 18 मिनट तक रहेगा।

4. अमावस्या व प्रदोषकाल का योग- भविष्यपुराण में भी महालक्ष्मी पूजन, दीपावली मुहूर्त के लिये प्रदोषकाल विशेष शुभ माना गया है। इस वर्ष कार्तिक कृष्ण अमावस्य का संयोग 2 दिन हो रहा है। 27 अक्तूबर 2019 ई. रविवार को दोपहर 12 बजकर 23 मिनट के तत्पश्चात् अमावस आरम्भ होगी और 28 अक्तूबर सोमवार को प्रातः 9 बजकर 9 मिनट तक रहेगी।
प्रदोष काल 27 अक्तूबर 2019 ई को दिल्ली एवं निकटवर्ती नगरों में सूर्यास्त (17ः41) से लेकर 2 घ. 36 मि. तक 20 घ. 17 मि. तक प्रदोषकाल रहेगा। दीपावली पूजन के लिये आमवस्या रहते सायं सूर्यास्त (प्रदोषकाल आरम्भ) के बाद की समयावधि श्रीगणेश, श्रीमहालक्ष्मी पूजन आदि के आरम्भ के लिये विशेष शुभ रहेगी।
प्रदोषकाल से महालक्ष्मी पूजन, कुबेर-पूजा, प्रारम्भ करके अर्धरात्रि तक जप-अनुष्ठानादि करने का विशेष महत्व होता है। प्रदोषकाल से कुछ समय पहले स्नानादि उपरांत धर्मस्थल पर मंत्रपूर्वक दीपदान करके अपने निवास स्थान पर श्रीगणेश सहित महालक्ष्मी, कुबेर पूजनादि करके अल्पाहार करना चाहिये। तदुपरांत यथोपलब्ध निशीथ काल मुहूर्त में मंत्र-जप, यंत्र-सिद्धि आदि अनुष्ठान सम्पादित करने चाहियें। कारखाने, दुकान, मकान, व्यवसाय, फैक्ट्री, कार्यालय, विद्यालय, बही खाता पूजन, कलम दान, रोकड़ा पूजन, के लिये शुभ हैं।

5. निशीथकाल /महानिशीथ काल- इस वर्ष दीपावली के दिन निशीथकाल 20ः20 से 22ः53 रहेगा। महानिशीथ काल रात्रि 22ः53 से 01ः29 तक तक रहेगा। यह समय लक्ष्मी पूजन के लिये विशेष उत्तम कहा जाता है। प्रदोष, निशीथ एवं महानिशीथ काल के अतिरिक्त चैघड़िया मुहूर्त में भी महालक्ष्मी पूजन, बही-खाता पूजन, कुबेर-पूजा, जपादि अनुष्ठान की दृष्टि से विशेष प्रशस्त एवं शुभ माने जाते हैं।

27 अक्तूबर 2019 ई. के चौघड़िया मुहूर्त:-

दिन की चौघड़िया घ. मि.
उद्वेग 06ः29 से 07ः53
चर 07ः53 से 09ः17
लाभ 09ः17 से 10ः41
अमृत 10ः41 से 12ः05
काल 12ः05 से 13ः28
शुभ 13ः28 से 14ः52
रोग 14ः52 से 16ः16
उद्वेग 16ः16 से 17ः40

रात्रि की चौघड़िया घ. मि.
शुभ 17ः40 से 19ः16
अमृत 19ः16 से 20ः52
चर 20ः52 से 22ः28
रोग 22ः28 से 24ः06
काल 24ः06 से 01ः42
लाभ। 01ः42 से 03ः18
उद्वेग 03ः18 से 04ः54
शुभ 04ः54 से 06ः30

नोट- चर, लाभ, अमृत, और शुभ चौघड़िया दीपावली पूजन के लिये उत्तम हैं।

दीपावली मुहूर्त की शुद्ध गणाना-

1. सूर्य व चंद्रमा दोनो शुभ राशि में हैं।

2. लग्न-
(क) वृष 18ः40 से 20ः35 तक।
(ख) सिंह मध्य रात्रि 01ः09 से 03ः28 तक।

3. चौघड़िया-
(क) शुभ 17ः40 से 19ः16 तक।
(ख) अमृत 19ः16 से 20ः52 तक।
(ग) चर 20ः52 से 22ः28 तक।
(घ) लाभ 01ः42 से 03ः18 तक।

4. अमावस- 27 अक्तूबर दोपहर 12ः23 से 28 अक्तूबर प्रातः 09ः09 तक।

5. प्रदोष काल- 17ः41 से 20ः17 तक।

6. निशीथ काल- रात्रि 20ः20 से 22ः54 तक।
महानिशीथ काल-रात्रि 22ः53 से 01ः29 तक।

प्रथम शोधित मुहूर्त (वृष लग्न)- 27 अक्तूबर 2019 रविवार साॅय 18 बजकर 40 मिनट से 20 बजकर 17 मिनट तक।

द्वितीय शोधित मुहूर्त (सिंह लग्न)- 27 अक्तूबर 2019 रविवार मध्य रात्रि 01 बजकर 42 मिनट से 03 बजकर 18 मिनट तक।

विशेष- तंत्र विधान से कुबेर-पूजा, महालक्ष्मी साधना करने वालों को 27 अक्तूबर की मध्य रात्रि 01ः09 से पूजा व्यवस्था आरम्भ करके 01ः42 से विशेष साधना मंत्र जप आरम्भ कर लेना चाहिये, तथा 03ः18 तक यह जप साधना सम्पन्न कर लेनी चाहिये।

दीपावली की रात्रि सिद्ध मुहूर्त में गुरूजी द्वारा सिद्ध किये गये यंत्र प्राप्त करने के लिए गुरूजी से सम्पर्क कर सकते हैं-

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शनि साढ़ेसाती

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शनि साढ़ेसाती का मनुष्य पर प्रभाव :-
शनिदेव की चित्र-विचित्र विषिष्टताओं की व्याख्या करने के लिये अनेकानेक प्रसंग प्राचीन भारतीय साहित्य में उपलब्ध हैं, इनके द्वारा क्रूर तथा अनुकूल फल देने वाले शनि ग्रह की सामर्थ्य का पता चलता है। शनिदेव के स्वरूप को समझने के लिये इन पुराण के आख्यानों का उल्लेख आवश्यक है। इनसे ज्ञात होता है कि समय-समय पर शनिदेव ने ईश्वरीय अवतारों से लेकर चक्रवर्ती सम्राटों तक को अपनी विशेष ऊर्जा से विचलित किया है।
परब्रह्म के रूवरूप- ब्रह्मा-विष्णु-महेष में भूतभावन भगवान शंकर ने सृष्टि के संहार अथवा विसर्जन का दायित्व ग्रहण किया है। सृष्टि के समस्त जीवधारियों को आचरण के अनुरूप अनुशासित करना बहुत कठिन कार्य था। इस वृहत्तर कार्य में अपनी सहायता हेतु भगवान शिव ने सहयोगी गणों को जब अपने साथ लिया था प्रायः इसी समय छाया के गर्भ से भगवान भास्कर के 9 पुत्रों ने जन्म लिया था। इन 9 पुत्रों में शनिदेव एवं यम की भयोत्पादक गतिविधियाँ विस्मयकारी थी। इनके प्रचण्ड बाहुबल से दैवी शक्तियाँ अत्यंत प्रभावित थीं। परिणामतः कल्याण तथा विध्वंस के देव भगवान शंकर ने इन्हें अपनी सेवा में ग्रहण कर लिया। शनिदेव को शिव द्वारा कर्मानुसार दण्ड प्रदान करने का अधिकार प्राप्त हुआ। यम मृत्यु के निमित्त नियुक्त हुए। इस पुराणगाथा में शनि के कारकत्व से संबधित अनेक सूक्ष्म संकेत उपलब्ध होते हैं। साथ ही शनि-उपचार में शिवोपासना का माहात्म्य भी रेखांकित किया गया है।
भगवान सूर्य के नौ पुत्रों में अपनी भीषणता के लिए शनि सर्वोपरि हैं। कृष्ण वर्णीय यमुना शनि की सहोदरा और कालनियन्त्रक यम शनि के अनुज हैं। शनि की रूक्षता का कारण उनका विचित्र परिवार भी है। पुराण कथाओं के अनुसार सन्तानों के योग्य होने पर सूर्य ने प्रत्येक सन्तान हेतु एक-एक लोक की व्यवस्था की। किन्तु प्रवृति से पाप-प्रधान ग्रह शनि अपने एक लोक के अधिपत्य से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने समस्त लोकों पर आक्रमण करने की योजना तैयार की। सूर्य को शनि की भावना से अत्याधिक पीड़ा हुई। किन्तु उनके परामर्श का शनि पर कोई प्रभाव नहीं पडा। अन्ततः सूर्य भगवान ने शिव भगवान से आतुर निवेदन किया। भक्तभयहारी शिव ने तब उद्दण्ड शनि को चेतावनी दी। शनि ने जब उपेक्षा की तो शिव-शनि युद्ध प्रारम्भ हुआ। शनि ने अद्भुत पराक्रम से नन्दी तथा वीरभद्र सहित समस्त शिवगणों को परास्त कर दिया। अपने सैन्यबल का संहार देखकर भगवान शिव कुपित हो गये। उन्होंने प्रलयंकारी तृतीय नेत्र खोल दिया। शनि ने भी अपनी मारक दृष्टि का संधान किया। भगवान शिव और शनि की दृष्टियों से उत्पन्न एक अप्रतिम ज्योति ने शनि लोक को आच्छादित कर लिया।
तत्पश्चात भगवान शिव ने क्रोधित होकर शनि पर त्रिशूल से प्रहार किया। शनि यह आघात सहन नहीं कर सके। वह संज्ञाशून्य हो गये। पुत्र की यह स्थिति देखकर सूर्य का पुत्रमोह जाग उठा। भगवान् आशुतोष से उन्होंने शनि के जीवन रक्षण हेतु भाव भरा निवेदन किया आशुतोष ने प्रसन्न होकर शनि के संकट को हर लिया इस घटना से शनि ने भगवान शिव की सर्वसमर्थता स्वीकार कर ली। उन्होंने भगवान शिव से पुनः पुनः क्षमायाचना की। शनि ने यह भी इच्छा व्यक्त की कि वह अपनी समस्त सेवायें शिव को समर्पित करना चाहते हैं। प्रचण्ड पराक्रमी शनिदेव के रणकौशल से अभिभूत भूतभावन भगवान भोले नाथ ने शनि को अपना सेवक बना लिया। भगवान शिव ने शनि को दण्डाधिकारी नियुक्त किया। इसी कारण लोग शनि साढ़ेसाती अथवा शनि महादशा में शारीरिक, मानसिक व आर्थिक पीडा होने पर भगवान शिव की आराधना करते हैं। भगवान शिव की शरण में आये व्यक्ति को शनिदेव कष्ट नही देते तथा उससे प्रसन्न रहते हैं।
शनि ग्रह के संबंध में अनेक भ्रांतियां हैं, और इसलिए उसे मारक, अशुभ और दुःखकारक माना जाता है। पाश्चात्य ज्योतिषी भी इसे दु:ख देने वाला ग्रह मानते हैं। शनि ग्रह उतना अशुभ नही है, जितना इसे समझा जाता है। वस्तुतः वह शत्रु नहीं मित्र है। व्यक्ति को अध्यात्म व मोक्ष दिलाने वाला केवल शनि ग्रह ही है। नवग्रहों के कक्षा क्रम में शनि, सूर्य से सबसे दूर है।
शनिदेव को शनैश्चर भी कहा जाता है। एक मान्यता के अनुसार पिप्लादि ऋषि के पिता की मृत्यु शनि की साढेसाती के दौरान हुई तो पिप्लादि बहुत क्रुद्ध होकर शनैश्चर को दण्ड देने के लिए शनैश्चर को खोजने के पश्चात अपने दिव्य मुद्दगर से प्रहार करने लगे शनैश्चर बचाओं-बचाओं की गुहार करते हुए दौड़ रहे थे। सभी देवतागण शनि की सहायता के लिए पधारे किन्तु तब तक पिप्लादि ने शनि की टांग पर प्रहार कर उन्हें लंगडा बना दिया। देवताओं के समझाने के पश्चात् ही ऋषि का गुस्सा शांत हुआ। उन्हें बताया गया कि शनिदेव प्रकृति के नियमों से बंधे हैं, वो वही करते हैं जो व्यक्ति का कर्म फल बताता है। तब से ही शनिवार के दिन पीपल के नीचे तिल तेल का दीपक जलाने से शनिदेव जातक पर प्रसन्न होकर कष्ट में कमी कर देते हैं।
याद रखें हर प्राणी को प्रत्येक तीस वर्ष में एक बार शनि साढे़साती अवश्य ही आती है। प्रत्येक प्राणी को साढे़साती लगने से पहले जप, तप, यज्ञ अवश्य कर लेना चाहिए, ताकि शनि साढे़साती अथवा शनि महादशा के प्रतीकूल प्रभाव को कम किया जा सके।
शनि भगवान् सूर्य के पुत्र हैं। छाया (स्वर्णा) इनकी माता है शास्त्रों के अनुसार ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के श्राप के कारण है। यह कथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में इस प्रकार वर्णित है-
बचपन से ही शनि देवता भगवान श्रीकृष्ण के अनुराग में निमग्न रहते थे। व्यस्क होने पर इनके पिता ने चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह कर दिया। पत्नी सती-साध्वी और तेजस्विनी थी। एक रात ऋतु-स्नानकर पुत्र-प्राप्ति की अभिलाषा से वह पति के पास पहुँची। पति ध्यान में बैठे थे। बाह्य ज्ञान न था। पत्नी प्रतीक्षा कर थक गयी। ऋतुकाल निष्फल हो चुका था। इस उपेक्षा से क्रुद्ध होकर सती ने शाप दे दिया कि जिसे तुम देख लोगे वह नष्ट हो जायेगा। ध्यान टूटने पर शनि देवता ने पत्नी को मनाया। पत्नी को स्वयं पश्चाताप हो रहा था, किंतु श्राप के प्रतीकार की शक्ति उसमें न थी। तब से शनि देवता सिर नीचा करके रहने लगे, क्योंकि वे किसी का अहित नहीं चाहते थे। उनकी दृष्टि पड़ते ही कोई भी नष्ट हो सकता था।
भगवान शिव शनिदेव के गुरू हैं। पहले शनिदेव ने ब्रह्मा जी की तपस्या की थी फिर उन्होंने भगवान शिव की तपस्या करके उन्हें अपना आजीवन गुरू बनाया। शनि महाराज भगवान श्रीकृष्ण के भी भक्त थे, भगवान कृष्ण की भक्ति के कारण ही इनका एक नाम कृष्णों भी पड़ा।
शनिदेव से संबधित पीड़ा (शनि साढ़ेसाती अथवा शनि महादशा) शांति के लिए जब श्रीकृष्ण भगवान की भक्ति की जाती है तो, स्वयं शनिदेव अपने ईष्ट की शरण में जाने पर मनुष्य को उतना कष्ट नहीं देते हैं । श्रीकृष्ण भगवान का आगे का जन्म श्री नाथजी के रूप में माना गया है, श्रीनाथ जी का विवाह स्वयं शनिदेव की बहन यमुना के साथ हुआ था। शनिदेव की बहन यमुना के पति श्रीनाथ जी शनिदेव के बहनोई हुए।
यहाँ बात बताना आवश्यक है किसी भी जन्म कुण्डली में चाहे शनि की स्थिति मित्र की हो अथवा शत्रु की। शनि साढ़ेसाती के समय न मित्र होते हैं न शत्रु वह हमारे कर्मों का फल ही हमें प्रदान करते हैं। शनि की साढ़ेसाती हर व्यक्ति के जीवन में तीस वर्ष के अंतराल पर आती है, उन तीस वर्षों में किये गये कर्मों का शुभाशुभ प्रभाव साढ़ेसाती के समय प्राप्त होता है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु शनि साढ़ेसाती आने से पूर्व ही हो जाती है तो, वो सारे प्रभाव व्यक्ति को अपने अगले जन्म में अवश्य प्राप्त होते हैं। इसलिए शनिदेव के प्रकोप से बचना है तो कोई कार्य ऐसा न करें जिसका प्रतिफल हमारे लिए कष्ट देने वाला हो।
शनि की साढ़ेसाती के प्रभाव को कम करने तथा शनिदेव को अपने प्रतिकूल बनाने वाले उपाय एवं अन्य ज्ञानवर्धक एवं लाभदायक जानकारियों के लिए। हमारी अन्य वेबसाइट भी देखें : – aapkabhavishya.com, aapkabhavishya.in, astroguruji.in, shukracharya.com