ब्राह्मण से ही पूजा-पाठ क्यों कराएं ?

ब्राह्मण के लक्षण क्या हैं ?

Dr.R.B.Dhawan

भीष्म पितामह पुलस्त्य से कुछ प्रश्न करते हैं –

१. ब्राह्मण के लक्षण क्या हैं ? :-

उत्तर :-

जो‌ विद्वान ब्रह्मतत्व को जानते-समझते हैं, वह ब्राह्मण हैं। जो यम-नियम में आबद्ध है, जिसमें निरंतर उपासना व त्यागवृत्ति, सात्त्विकता एवं उदारता के गुण हैं, जो ईश्वरतत्त्व के सर्वाधिक निकट है, वह ब्राह्मण हैं। जो धर्मशास्त्र व कर्मकांड के ज्ञाता एवं अधिकारी विद्वान हैं, वह ब्राह्मण है। परंपरागत मान्यता अनुसार पूजा-पाठ करने का अधिकार उन्हें ही प्राप्त है, जो एेसे विद्वान ब्राह्मण है।

प्रश्न २:-

ब्राह्मण को देवता क्यों कहा गया है ? –

उत्तर:-

दैवाधीनं जगत्सर्वं, मंत्राधीनं देवता। 

ते मंत्रा विप्रं जानंति, तस्मात् ब्राह्मणदेवताः।। 

यह सारा संसार विविध देवों के अधीन है। देवता मंत्रों के आधीन हैं। उन मंत्रों के प्रयोग-उच्चारण व रहस्य को विप्र भली-भांति जानते हैं, इसलिये ब्राह्मण स्वयं देवता तुल्य होते हैं।

प्रश्न ३:-

ब्राह्मणों को लोक-व्यवहार में अधिक सम्मान क्यों प्राप्त है ? –

उत्तर:-

निरंतर प्रार्थना, धर्मानुष्ठान व धर्मोपदेश कर के जो सम्मानित होता है, ऐसे ब्राह्मण का सम्मान परंपरागत लोक-व्यवहार में सदा सर्वत्र होता आया है।

प्रश्न ४:-

यज्ञाग्नि में तिल-जव इत्यादि खाद्य पदार्थ क्यों हव्य किये जाते हैं ?

उत्तर:-

आज के प्रत्यक्षवादी युग के व्यक्ति हवन में घी-तिल-जव आदि की आहुतियों को, अग्नि में व्यर्थ फूंक देने की जंगली प्रथा ही समझते हैं । प्रत्यक्षवादियों की धारणा वैसी ही भ्रमपूर्ण है जैसी कि किसान को कीमती अन्न खेत की मिट्टी में डालते हुये देखकर कृषि सिद्धांत से अपरिचित व्यक्ति की हो सकती है। प्रत्यक्षवादी को किसान की चेष्टा भले ही मूर्खतापूर्ण लगती हो, पर बुद्धिमान कृषक को विश्वास होता है, कि खेत की मिट्टी में विधिपूर्वक मिलाया हुआ उसका प्रत्येक अन्नकण शतसहस्र-गुणित होकर उसे पुनः प्राप्त होगा। यही बात यज्ञ के संबंध में समझनी चाहिये। जिस प्रकार मिट्टी में मिला अन्न-कण शत से सहस्र गुणित हो जाता है, उसी प्रकार अग्नि से मिला पदार्थ लक्ष-गुणित हो जाता है। किसान का यज्ञ पार्थिव और ज्ञानियों का यज्ञ तैजस् कहलाता है। कृषि दोनों है, एक आधिभौतिक तो दूसरी आधिदैविक। एक का फल है- स्वल्पकालीन अनाजों के ढेर से तृप्ति, तो दूसरे का फल देवताओं के प्रसाद से अनन्तकालीन तृप्ति। यज्ञ में ‘द्रव्य’ को विधिवत अग्नि में होम कर उसे सूक्ष्म रूप में परिणित किया जाता है। अग्नि में डाली हुई वस्तु का स्थूलांश भस्म रूप में पृथ्वी पर ही फैल जाता है।स्थूल सूक्ष्म उभय-मिश्रित भाग धूम्र बनकर अंतरिक्ष में व्याप्त हो जाता है, जो अंततोगत्वा मेघरूप’ में परिणित होकर द्यूलोकस्थ देवगण को परितृप्त करता है। ‘स्थूल-सूक्ष्मवाद’ सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक अंश अबाध गति से अपने अंशी तक पहुंचकर ही रहता है। जल कहीं भी हो, उसका प्रवाह आखिरकार अपने उद्गमस्थल समुद्र में पहुंचें बिना दम नहीं लेता। यह वैज्ञानिक सूत्र स्वतः ही प्रमाणित करता है कि, अग्नि में फूंके गये पदार्थ की सत्ता समाप्त नहीं होती।

मनुस्मृति, अध्याय 3/76 में भी एक महत्वपूर्ण सूत्र है :-

‘अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यग् आदित्यं उपष्ठिते’

अग्नि में विधिवत डाली हुई आहुति, सूर्य में उपस्थित होती है।

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 14-15 में भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि चक्र व यज्ञ के बारे में कहते हैं- संसार के संपूर्ण प्राणी अन्न (खाद्य पदार्थ) से उत्पन्न होते हैं।

अग्नि की उत्पत्ति वृष्टि से होती है और वृष्टि यज्ञ से होती है, और यज्ञ (वेद) विहित कार्यों से उत्पन्न होने वाला है।

उत्तम ब्राम्हण की महिमा-

ॐ जन्मना ब्राम्हणो, ज्ञेय:संस्कारैर्द्विज उच्चते।

विद्यया याति विप्रत्वं, त्रिभि:श्रोत्रिय लक्षणम्।।

ब्राम्हण के बालक को जन्म से ही ब्राम्हण समझना चाहिए। संस्कारों से “द्विज” संज्ञा होती है, तथा विद्याध्ययन से “विप्र” नाम धारण करता है। जो वेद, मन्त्र तथा पुराण से शुद्ध होकर तीर्थस्नान के कारण और भी पवित्र हो गया है, वह ब्राम्हण परम पूजनीय माना गया है।

ॐ पुराणकथको नित्यं, धर्माख्यानस्य सन्तति:।

अस्यैव दर्शनान्नित्यं, अश्वमेधादिजं फलम्।।

जिसके हृदय में गुरु, देवता, माता-पिता और अतिथि के प्रति भक्ति है। जो दूसरों को भी भक्तिमार्ग पर अग्रसर करता है, जो सदा पुराणों की कथा करता और धर्म का प्रचार करता है, ऐसे ब्राम्हण के दर्शन से ही अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

पितामह भीष्म जी ने पुलस्त्य जी से फिर पूछा–

गुरुवर! मनुष्य को देवत्व, सुख, राज्य, धन, यश, विजय, भोग, आरोग्य, आयु, विद्या, लक्ष्मी, पुत्र, बन्धुवर्ग एवं सब प्रकार के मंगल की प्राप्ति कैसे हो सकती है? यह बताने की कृपा करें।

पुलस्त्यजी ने कहा–

राजन! इस पृथ्वी पर ब्राह्मण सदा ही विद्या आदि गुणों से युक्त और श्रीसम्पन्न होता है। इसी कारण तीनों लोकों और प्रत्येक युग में विप्रदेव (ब्राम्हण) नित्य पवित्र माने गये हैं।

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नक्षत्र और वनस्पति

 नक्षत्रों के लिए निर्धारित पेड़ पौधे :-


Dr.R.B.Dhawan

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक नक्षत्र के वृक्षों का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। उपाय की दृष्टि से जो जातक अपने जन्म नक्षत्र के वृक्षों  या पौधों को रोपित करता है, अथवा सींचता है, या उनका भरण पोषण करता है, उसकी आयु के साथ ऐश्वर्य व धन धान्य में भी वृद्धि होती है। ज्योतिष शास्त्र में 27 नक्षत्रों के जो वृक्ष बताए गये है, उसके अनुसार अश्वनी नक्षत्र के लिए कुचला का वृक्ष, भरणी नक्षत्र के लिए आंवला, कृतिका के लिए गूलर व स्वर्णशीरी, मृगशिरा के लिए खैर, आर्द्रा नक्षत्र का वृक्ष बहेडा, रोहणी के लिए जामुन व तुलसी बताया गया है । इसी प्रकार पुनर्वसु नक्षत्र के लिए बांस, पुष्य नक्षत्र के लिए पीपल, अश्लेशा के लिए नागकेसर, मघा के लिए बड़, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के लिए ढाक (पलास) का वृक्ष, तथा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के लिए रूद्राक्ष या पाकर लगाना उपयोगी माना जाता है। 13 वें स्थान के नक्षत्र हस्त में जन्में व्यक्ति रीठा व पाढ का वृक्ष, चित्रा नक्षत्र वाले बेल नारियल, स्वाती के लिए अर्जुन का वृक्ष, विशाखा नक्षत्र के लिए भटकटैया, अनुराधा नक्षत्र के लिए बकुल या मौलश्री, ज्येष्ठा नक्षत्र के लिए चीड़ या देवदारू व लोध का वृक्ष लगा सकते है। इसी प्रकार मूल नक्षत्र के लिए साल का वृक्ष, पूर्वाषाढ़ा के लिए अशोक या जलवेंत, उत्तराषाढा नक्षत्र के लिए कटहल या फालसा लगायें। श्रवण के लिए आक लगाये, धनिष्ठा नक्षत्र के लिए शमी लगाएं, शतभिषा नक्षत्र के लिए कदम्ब, पूर्वा भाद्रापदा नक्षत्र के लिए आम लगायें, उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र के लिए नीम तथा रेवती नक्षत्र के लिए महुआ का वृक्ष लगाना लाभकारी होता है। 

इस प्रकार सरल उपाय करके एक तरफ जहां हम पर्यावरण संरक्षण में सहायता करेंगे वहीं हम भौतिक, अध्यात्मिक तथा परलौकिक लाभ प्राप्त करने के लिए वृक्षारोपण कर अपने तथा समाज व देश के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे होंगे।

नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़-पौधे :-

1. अश्विनी –            कुचला

2. भरणी–               आंवला 

3. कृतिका –             गूलर

4. रोहिणी –             जामुन 

5. मृगशिरा –            खैर 

6. आर्द्रा–                शीशम 

7. पुनर्वसु –              बांस 

8. पुष्य –                  पीपल 

9. अश्लेषा –             नागकेसर

10. मघा –                  वट

11. पूर्वाफाल्गुनी –      पलास

12. उत्तराफाल्गुनी –    पाकड़

13. हस्त –                  रीठा

14. चित्रा –                 बेल

15. स्वाती-                 अर्जुन

16 विशाखा –            भटकटैया 

17. अनुराधा –            मौलसरी

18. ज्येष्ठा –                चीड़  

19. मूल –                   साल

20. पूर्वाषाढ़ा –            अशोक 

21. उत्तराषाढ़ –           फालसा

22. श्रवण –                मदार 

23. धनिष्ठा –               शमी

24. शतभिषा –            कदम्ब 

25. पूर्वभाद्रपद–          आम

26. उत्तराभाद्रपद –       नीम 

27. रेवती –                 महुआ


बारह राशि के पेड़-पौधे :-

मेष –        आंवला 

वृष –         जामुन

मिथुन –    शीशम

कर्क –       नागकेश्वर

सिंह –       पलास

कन्या –     रीठा

तुला –      अर्जुन

वृश्चिक –  मौलसरी

धनु –      जलवेतस

मकर –     अकोल

कुंभ –       कदम्ब 

मीन –       नीम

ग्रहों के पेड़ -पौधे :-

सूर्य –      अकोल

चन्द्रमा –  पलास

मंगल –    खैर

बुद्ध –     चिरचिरी

गुरु –      पीपल

शुक्र –     गुलड़

शनि –    शमी

राहु –      दुर्वा

केतु –     कुश

ग्रह, राशि, नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़ पौधे का प्रयोग करने से अंतश्चेतना में सकारात्मक सोच का संचार होता है, तत्पश्चात हमारी मनोकामनायें शनै शनै पूरी होती है ।

शिवलिंग पूजा

महाशिवरात्रि और शिव पूजन :-

Dr.R.B.Dhawan

महाशिवरात्रि पर्व रात्रि प्रधान पर्व है, इस दिन अर्धरात्रि की पूजा का विशेष महत्व है। अर्ध रात्रि की पूजा के लिये स्कन्दपुराण में लिखा है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को –

निशिभ्रमन्ति भूतानि शक्तयः शूलभृद यतः ।

अतस्तस्यां चतुर्दश्यां सत्यां तत्पूजनं भवेत् ॥

अर्थात् रात्रि के समय भूत, प्रेत, पिशाच, शक्तियाँ और स्वयं शिवजी भ्रमण करते हैं; अतः उस समय इनका पूजन करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट होते हैं । 

शिवपुराण में आया है- 

“कालो निशीथो वै प्रोक्तोमध्ययामद्वयं निशि ।

शिवपूजा विशेषेण तत्काले ऽभीष्टसिद्धिदा ॥

एवं “ज्ञात्वा नरः कुर्वन्यथोक्तफलभाग्भवेत्” अर्थात रात के चार प्रहरों में से जो बीच के दो प्रहर हैं, उन्हें निशीथकाल कहा गया है। विशेषत: उसी काल में की हुई भगवान शिव की पूजा-प्रार्थना अभीष्ट फल को देनेवाली होती है। ऐसा जानकर कर्म करनेवाला मनुष्य यथोक्त फल का भागी होता है। चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं, अत: ज्योतिष शास्त्र में इसे परम कल्याणकारी कहा गया है। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है, परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि कहा गया है। शिव रहस्य में कहा गया है- 

चतुर्दश्यां तु कृष्णायां फाल्गुने शिवपूजनम्।

तामुपोष्य प्रयत्नेन विषयान् परिवर्जयेत।।

शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम्।

शिवपुराण में ईशान संहिता के अनुसार :- 

फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि।

 शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:।। 

अर्थात :- फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोडों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए इसलिए इसे महाशिवरात्रि मानते हैं। शिवपुराण में विद्येश्वर संहिता के अनुसार शिवरात्रि के दिन ब्रह्मा जी तथा विष्णु जी ने अन्यान्य दिव्य उपहारों द्वारा सबसे पहले शिव पूजन किया था जिससे प्रसन्न होकर महेश्वर ने कहा था की “आज का दिन एक महान दिन है। इसमें तुम्हारे द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है, इससे मैं तुम देवों पर बहुत प्रसन्न हूँ। इसी कारण यह दिन परम पवित्र और महान होगा। आज की यह तिथि ‘महाशिवरात्रि’ के नाम से विख्यात होकर मेरे लिये परम प्रिय होगी। इसके समय में जो मेरे लिंग (निष्कल अंग– आकृति से रहित निराकार स्वरूप के प्रतीक ) वेर (सकल साकार रूप के प्रतीक विग्रह) की पूजा करेगा, वह पुरुष जगत की सृष्टि और पालन आदि कार्य में भी सक्षम हो सकता है। जो महाशिवरात्रि को दिन-रात निराहार एवं जितेन्द्रिय रहकर अपनी शक्ति के अनुसार निश्चल भाव से मेरी यथोचित पूजा करेगा, उसको मिलने वाले फल का वर्णन सुनो -एक वर्ष तक निरंतर मेरी पूजा करने पर जो फल मिलता हैं, वह सारा शुभ फल केवल महाशिवरात्रि को मेरा पूजन करने से ही मनुष्य तत्काल प्राप्त कर लेता हैं। जैसे पूर्ण चंद्रमा का उदय समुद्र की वृद्धि का अवसर हैं, उसी प्रकार यह महाशिवरात्रि तिथि मेरे धर्म की वृद्धि का समय हैं। इस तिथि में मेरी स्थापना आदि का मंगलमय उत्सव मनाना चाहिये | ॐ नमः शिवाय।

शिवलिंग पूजा से मनेकामना पूर्ति सिद्धि :-

शिव के उस अपादान कारण को, जो अनादि और अनंत है, उसे लिंग कहते हैं। उसी गुणनात्मक मौलिक प्रकृति का नाम माया है, उसी से यह सम्पूर्ण जगत उत्पन्न हुआ है, होता रहेगा। जिसको जाना नहीं जा सकता, जो स्वंय ही कार्य के रूप में व्यक्त हुआ है, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है, और उसी में लीन हो जाना है, उसे ही लिंग कहते हैं। विश्व की उत्पत्ती और लय के हेतु (कारण) होने से ही उस परमपुरूष की लिंगता है। लिंग शिव का शरीर है, क्योंकि वह उसी रूप में अधिष्ठित हैं। लिंग के आधार रूप में जो तीन मेखला युक्त वेदिका है, वह भग रूप में कही जाने वाली जगतदात्री महाशक्ति हैं। इस प्रकार आधार सहित लिंग जगत का कारण है। यह उमा-महेश्वर स्वरूप है। भगवान शिव स्वयं ही ज्योतिर्लिंग स्वरूप तमस से परे हैं, लिंग और वेदी के समायोजन से ये अर्धनारीश्वर हैं।पूज्यो हरस्तु सर्वत्र लिंगे पूर्णोर्चनं भवेत।। (अग्निपुराण अध्याय ५४)

संस्कृत में लिंग का अर्थ “चिन्ह” है। और इसी अर्थ में यह शिवलिंग shivling के लिये प्रयुक्त होता है। देवताओं की पूजा शरीर के रूप में हेती है, लेकिन परमपुरूष अशरीर हैं, इस लिये परम पुरूष की पूजा shivling Pooja दोनों प्रकार से होती है। जब पूजा शरीर के रूप मे होती है, तब वह शरीर अराधक की भावना के अनुरूप होता है। जब पूजा प्रतीक के रूप में होती है, तब यह प्रतीक अनंत होता है। क्यों की ब्रह्माण्ड की कल्पना ही अण्डाकर रूप में होती है, इस लिये कोई जब अनंत या ज्योति का स्वरूप बनाना चाहेगा, तब प्रकृति को अभिव्यक्त करने के लिये लिंग के साथ तीन मेखला वाली वेदी बनानी पड़ती है, क्योंकि प्रकृति त्रिगुणात्मक (सत्व-रज-तम) है, इस वेदी को भग कहते हैं। लेकिन यहां भग का अर्थ स्त्री जननेद्रीय नहीं है। भगवान शब्द में जो भग है उसका अर्थ है:- एेश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य है। सम्पूर्ण जगत में एकीभूत है। इस अर्थ में वेदिका निखिलेश्वर्यमयी महा शक्ति है।परमपुरूष शिव की सनातन (पौराणिक) मत में पांच रूपों में उपासना करने की परम्परा है, इसे ही पंचदेवोपासना कहते हैं:- शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश ओर सूर्य। इन पांचो का ही गोल प्रतीक आपने देखा है। शिवलिंग shivling पर चर्चा हम कर ही रहे हैं। विष्णु के प्रतीक शालिग्राम shaligram आपने सभी वैष्णव मंदिरों में देखा है। विष्णु के जितने अवतार हैं, लक्षणभेद से शालिग्राम shaligram शिला के साथ भी गोमती चक्र रखना पड़ता है। यह महाप्रकृति का एेश्वर्यमय भग स्वरूप है। जो शिवलिंगार्चन में वेदिका के रूप में है। इसी प्रकार शक्ति की गोल पिण्डियां देश के अनेक शक्ति स्थानों में विद्यमान हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो कालीपीठ पर   शक्ति केवल पिण्डियों के रूप में ही स्थापित होती हैं। गणेशजी की स्थापना प्राय: प्रत्येक पूजन के आरम्भ में सुपारी अथवा गोबर की गोल पिण्डियाें पर ब्राह्मणों को करवाते आपने देखा ही होगा। भगवान सूर्य का प्रत्यक्ष प्रतीक आकाश का सूर्य-मण्डल जैसा है। आप जानते हैं, जहां भी ग्रहों के चक्र बनाये जाते हैं, सूर्यमण्डल को अण्डाकर ही बनाना पड़ता है। इस प्रकार इन पंचदेवों की लिंग मानकर अर्थात् चिन्ह बनाकर ही इनकी उपासना होती है।पार्थिव लिंग की पूजा और महत्व:-जो लिंग बांबी, गंगा, तलाब, वैश्या के घर, घुड़साल की मिट्टी मक्खन या मिश्री से बनाये जाते हैं, उनका अलग-अलग मनेकामना के लिये उपासना, पूजा व अभिषेक करने के उपरांत उन्हें जल में विसर्जित करने का विधान है। पार्थिव लिंग के तांत्रिक प्रयोगों से प्रयोजन सिद्धियां :-

1. भू सम्पत्ती प्राप्त करने के लिये- फूलों से बनाये गये शिवलिंग shivling का अभिषेक करें।

2. स्वास्थ्य और संतान के लिये- जौ, गेहूं और चावल तीनों के आटे को बराबर मात्रा में लेकर, शिवलिंग shivling बनाकर उसकी पूजा करें।

3. असाध्य रोग से छुटकारा पाने के लिये- मिश्री से बनाये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

4. सुख-शांति के लिये- चीनी की चाशनी से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

5. वंश वृद्धि के लिये- बांस के अंकुर से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

6. आर्थिक समृद्धि के लिये- दही का पानी कपडे से निचोड़ लें और उस बिना पानी वाली दही से जो शिवलिंग shivling बनेगा, उसका पूजन करने से समृद्धि प्राप्त होती है।

7. शिव सायुज्य के लिये- कस्तूरी और चंदन से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

8. वशीकरण के लिये- त्रिकुटा (सोंठ, मिर्च व पीपल के चूर्ण में नमक मिलाकर शिवलिंग shivling बनता है, उसकी पूजा की जाती है।

10. अभिलाषा पूर्ति के लिये- भीगे तिलों को पीसकर बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

11. अभिष्ट फल की प्राप्ति के लिये- यज्ञ कुण्ड से ली गई भस्म का शिवलिंग shivling बनाकर उसकी पूजा करें। 

12. प्रीति बढ़ाने के लिये- गुड़ की डली से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

13. कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये- गुड़ में अन्न चिपकाकर उस से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

14. फल वाटिका में फल की अधिक पैदावार के लिये- उसी फल को शिवलिंग shivling के समान रखकर उस फल की पूजा करें।

15. मुक्ति प्राप्त करने के लिये- आंवले को पीसकर उस से बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

16. स्त्रीयों के लिये सौभाग्य प्रदाता- मक्खन को अथवा वृक्षों के पत्तों को पीसकर बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

17. आकाल मृत्यु भय दूर करने के लिये- दूर्वा को शिवलिंगाकार गूंथकर उस की पूजा करें।

18. भक्ति और मुक्ति के लिये- कपूर से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

19. तंत्र में सिद्धि के लिये- लौह से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

20. स्त्रीयों के भाग्य में वृद्धि- मोती से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

21. सुख-समृद्धि के लिये- स्वर्ण से बने शिवलिंग shivling का पूजन करें।

22. धन-धान्य वृद्धि के लिये- चांदी से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

23. दरिद्रता निवारण के लिये- पारद (पारा) के शिवलिंग shivling की पूजा करें।

24. शत्रुता निवारण के लिये- पीतल से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

25. कर्ज निवारण के लिये- कांस्य से निर्मित शिवलिंग shivling की पूजा करें।

मेरे और लेख देखें :- astroguruji.in तथा aapkabhavishya.in पर।

सरस्वती मंत्र

सरस्वती मंत्र से विद्या प्राप्ति :-

Dr.R.B.Dhawan

आप भी महान व्यक्तित्व के स्वामी बन सकते हैं, यदि पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी के इन सिद्धांतों को अपनी जीवनशैली में उतार लें-

1. ईश्वर को सर्वव्यापी व न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को स्वीकार करें।
2. अपने शरीर को परमात्मा का मंदिर मानकर (क्योंकि परमात्मा के अंश “आत्मा” का आपके शरीर में भी निवास है।) आत्मसंयम, और नियमितता द्वारा अपने शरीर की रोगों और बुराईयों से रक्षा करें।
3. मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाये रखने के लिये संस्कारी लोगों की संगति करें।
4. इन्द्रियों पर नियंत्रण, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सदा अभ्यास करें।
5. मर्यादाओं का पालन करें, वर्जनाओं से बचें तथा समाजनिष्ठ बनें।
6. अनिति से प्राप्त उपलब्धियों और सफलताओं की उपेक्षा करें।
7. रूढ़िवादी परम्परा की तुलना में विवेक से फैसले लें।
8. मनुष्य का मूल्यांकन उसकी सफलताओं और योग्यताओं से न करके, उसके सद्द्विचारों और सत्कर्मों को महत्व दें।
9. “मनुष्य अपने अच्छे-बुरे कर्मो के द्वारा अपने भाग्य का निर्माण स्वयं ही करता है” इस विश्वास पर चलते हुये आजीवन सद्कर्म करते चलें।

जहां बहुत से विद्यार्थिंयों कि स्मरण शक्ति अच्छी होती है, वहीं कुछ विद्यार्थी कमजोर स्मरण शक्ति वाले भी होते हैं। बच्चे को एवं उसके माता-पिता को कभी कभी ऐसा लगता है, कि बच्चे का मन पढाई में नहीं लगता, या बच्चे जितनी मेहनत करते हैं, उन्हें उसके अनुरुप फल नहीं मिलता, परीक्षा के प्रश्न पत्र में लिखते समय उसे भय रहता है, बच्चे ने जो पढाई कि है, वह परिक्षा पत्र में लिखते समय भूल जाता हैं, इत्यादी.., कारणो से बच्चे और माता-पिता हमेशा परेशान रहते हैं।

कुछ बच्चे होते हैं, जो एक या दो बार पढने पर याद कर लेते हैं, तो कुछ बच्चे वही पाठ्य सामग्री अधिक समय पढने के उपरांत भी ठीक से याद नहीं कर पाते। ऐसा क्यूं होता है? इस का मुख्य कारण है, अनुचित ढंग से कि गई पढाई या पढाई में एकाग्रता की कमी। विद्या अध्ययन में आने वाली रुकावटों एवं विघ्न बाधाओं को दूर करने हेतु ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशिष्ठ मंत्रो का उल्लेख मिलता है। जिसके जप से पढाई में आने वाली रुकावटे दूर हो सकती हैं, एवं कमजोर यादाश्त की समस्या का निराकरण होता है। इस समस्या के लिए सबसे अच्छा उपाय है : माता सरस्वती की उपासना। आगे की पंक्तियों में माता सरस्वती मंत्र और उनके कुछ प्रयोग जिसे जा रहे हैं, इनका प्रयोग करने से माता सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है :-

सरस्वती मंत्र: –

या कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्र वृस्तावता ।

या वीणा वर दण्ड मंडित करा या श्वेत पद्मसना ।।

या ब्रह्माच्युत्त शंकर: प्रभृतिर्भि देवै सदा वन्दिता ।

सा माम पातु सरस्वती भगवती नि:शेष जाड्या पहा ॥१॥

भावार्थ: जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह श्वेत वर्ण की हैं, और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर अपना आसन ग्रहण किया है, तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हैं, आप हमारी रक्षा करें।

सरस्वती मंत्र तन्त्रोक्तं देवी सूक्त से : –

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेणसंस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

विद्या प्राप्ति के लिये सरस्वती मंत्र:-

घंटाशूलहलानि शंखमुसले चक्रं धनुः सायकं हस्ताब्जैर्दघतीं धनान्तविलसच्छीतांशु तुल्यप्रभाम्‌।

गौरीदेहसमुद्भवा त्रिनयनामांधारभूतां महापूर्वामत्र सरस्वती मनुमजे शुम्भादि दैत्यार्दिनीम्‌॥

भावार्थ: जो अपने हस्त कमल में घंटा, त्रिशूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण को धारण करने वाली, गोरी देह से उत्पन्ना, त्रिनेत्रा, मेघास्थित चंद्रमा के समान कांति वाली, संसार की आधारभूता, शुंभादि दैत्य का नाश करने वाली महासरस्वती को हम नमस्कार करते हैं। माँ सरस्वती जो प्रधानतः जगत की उत्पत्ति और ज्ञान का संचार करती हैं।

अत्यंत सरल सरस्वती मंत्र प्रयोग:-

प्रतिदिन सुबह स्नान इत्यादि से निवृत होने के बाद मंत्र जप आरंभ करें। अपने सामने मां सरस्वती का यंत्र या चित्र स्थापित करें । अब चित्र या यंत्र के ऊपर श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प व अक्षत (चावल) भेंट करें, और धूप-दीप जलाकर देवी की पूजा करें, और अपनी मनोकामना का मन में स्मरण करके स्फटिक की माला से किसी भी सरस्वती मंत्र की शांत मन से एक माला फेरें।

1. सरस्वती मूल मंत्र:-

ॐ ऎं सरस्वत्यै ऎं नमः।

2. सरस्वती मंत्र:-

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वती देव्यै नमः।

3. सरस्वती गायत्री मंत्र:-

१ – ॐ सरस्वत्यै विधमहे, ब्रह्मपुत्रयै धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयात।

२ – ॐ वाग देव्यै विद्दमहे काम राज्या धीमहि । तन्नो सरस्वती: प्रचोदयात।

4. ज्ञान वृद्धि हेतु गायत्री मंत्र :-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

5. परीक्षा भय निवारण हेतु:-

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वीणा पुस्तक धारिणीम् मम् भय निवारय निवारय अभयम् देहि देहि स्वाहा।

6. स्मरण शक्ति नियंत्रण हेतु:-

ॐ ऐं स्मृत्यै नमः।

7. विघ्न बाधा निवारण हेतु:-

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अंतरिक्ष सरस्वती परम रक्षिणी मम सर्व विघ्न बाधा निवारय निवारय स्वाहा।

8. स्मरण शक्ति बढा के लिए :-

ऐं नमः भगवति वद वद वाग्देवि स्वाहा।

9. परीक्षा में सफलता के लिए :-

१ – ॐ नमः श्रीं श्रीं अहं वद वद वाग्वादिनी भगवती सरस्वत्यै नमः स्वाहा विद्यां देहि मम ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा।

२ -जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी, कवि उर अजिर नचावहिं बानी।

मोरि सुधारिहिं सो सब भांती, जासु कृपा नहिं कृपा अघाती॥

10. हंसारुढा मां सरस्वती का ध्यान कर मानस-पूजा-पूर्वक निम्न मन्त्र का 21 बार जप करें :-

ॐ ऐं क्लीं सौः ह्रीं श्रीं ध्रीं वद वद वाग्-वादिनि सौः क्लीं ऐं श्रीसरस्वत्यै नमः।

11. विद्या प्राप्ति एवं मातृभाव हेतु:-

विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा: स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।

त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्तिः॥

अर्थातः- देवि! विश्वकि सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं। जगदम्बे! एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थो से परे हो।

उपरोक्त मंत्र का जप हरें, सफेद हकीक या स्फटिक माला से प्रतिदिन सुबह १०८ बार करें, तदुपरांत एक माला जप निम्न मंत्र का भी करें।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं महा सरस्वत्यै नमः।

12. देवी सरस्वती के अन्य प्रभावशाली मंत्र :-

एकाक्षर मंत्र :-

“ऐ”

द्वियक्षर मंत्र :-

१ “आं लृं”,।

२ “ऐं लृं”।

त्र्यक्षर मंत्र :-

“ऐं रुं स्वों”।

चतुर्क्षर मंत्र :-

“ॐ ऎं नमः”।

नवाक्षर मंत्र :-

“ॐ ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः”।

दशाक्षर मंत्र :-

१ – “वद वद वाग्वादिन्यै स्वाहा”।

२ – “ह्रीं ॐ ह्सौः ॐ सरस्वत्यै नमः”।

एकादशाक्षर मंत्र :-

१ – “ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

२ – “ऐं वाचस्पते अमृते प्लुवः प्लुः”।

३ – “ऐं वाचस्पतेऽमृते प्लवः प्लवः”।

एकादशाक्षर-चिन्तामणि-सरस्वती मंत्र :-

“ॐ ह्रीं ह्स्त्रैं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

एकादशाक्षर-पारिजात-सरस्वतीः-

१ – “ॐ ह्रीं ह्सौं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

२ – “ॐ ऐं ह्स्त्रैं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

द्वादशाक्षर मंत्र :-

“ह्रीं वद वद वाग्-वादिनि स्वाहा ह्रीं”।

अन्तरिक्ष-सरस्वती मंत्र :-

“ऐं ह्रीं अन्तरिक्ष-सरस्वती स्वाहा”।

षोडशाक्षर मंत्र :-

“ऐं नमः भगवति वद वद वाग्देवि स्वाहा”।

अन्य मंत्र :-

• ॐ नमः पद्मासने शब्द रुपे ऎं ह्रीं क्लीं वद वद वाग्दादिनि स्वाहा।

• “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा”।

• “ऐंह्रींश्रींक्लींसौं क्लींह्रींऐंब्लूंस्त्रीं नील-तारे सरस्वति द्रांह्रींक्लींब्लूंसःऐं ह्रींश्रींक्लीं सौं: सौं: ह्रीं स्वाहा”।

• “ॐ ह्रीं श्रीं ऐं वाग्वादिनि भगवती अर्हन्मुख-निवासिनि सरस्वति ममास्ये प्रकाशं कुरु कुरु स्वाहा ऐं नमः”।

• ॐ पंचनद्यः सरस्वतीमयपिबंति सस्त्रोतः सरस्वती तु पंचद्या सो देशे भवत्सरित्।

उपरोक्त आवश्यक मंत्र का प्रतिदिन जाप करने से विद्या की प्राप्ति होती है। स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ कपडे पहन कर मंत्र का जप प्रतिदिन एक माला करें। ब्राह्म मुहूर्त मे किये गए मंत्र का जप अधिक फलदायी होता हैं। इस्से अतिरीक्त अपनी सुविधा के अनुसार खाली बैठे हैं तो मंत्र का जप कर सकते हैं। मंत्र जप उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके करें। जप करते समय शरीर का सीधा संपर्क जमीन से न हो इस लिए ऊन के आसन पर बैठकर जप करें। जमीन के संपर्क में रहकर जप करने से जप प्रभाव हीन होते हैं।

मेरे और लेख देखें :- astroguruji.in ओर aapkabhavishya.in पर भी।

शनि ग्रह

कैसा फल देता है शनि, अन्य ग्रहों के साथ? :-

Dr.R.B.Dhawan

खगोलीय दृष्टि से शनि हमारे सौरमंडल में सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण में बारह राशियों में शनि को मकर और कुम्भ राशि का स्वामी मना गया है, शनि की उच्च राशि तुला तथा नीच राशि मेष है, शनि को एक क्रोधित ग्रह के रूप में उल्लेखित किया गया है। शनि का रंग काला है। शनि की गति नवग्रहों में सबसे धीमी है, इसी लिए शनि एक राशि में ढाई वर्ष तक गतिमान रहता है, और बारह राशियों के चक्र को तीस साल में पूरा करता है। ज्योतिष में शनि को कर्म, आजीविका, जनता, सेवक, नौकरी, अनुशाशन, दूरदृष्टि, प्राचीन वस्तु, लोहा, स्टील, कोयला, पेट्रोल, पेट्रोलयम प्रोडक्ट, चमड़ा, मशीन, औजार, तपस्या और अध्यात्म का कारक माना गया है। स्वास्थ की दृष्टि से शनि हमारे पाचन–तंत्र, हड्डियों के जोड़, बाल, नाखून,और दांत को नियंत्रित करता है। जन्मकुण्डली में यदि शनि का यदि अन्य ग्रहों से योग हो तो भिन्न भिन्न प्रकार के फल व्यक्ति को प्राप्त होते हैं, आईये उन्हें जानते हैं :-

शनि सूर्य – कुण्डली में शनि और सूर्य का योग बहुत शुभ नहीं माना गया है, यह जीवन में संघर्ष बढ़ाने वाला योग माना गया है, फलित ज्योतिष में सूर्य, शनि को परस्पर शत्रु ग्रह माना गया है, कुंडली में शनि सूर्य का योग होने पर व्यक्ति को आजीविका के लिए संघर्ष का सामना करना पड़ता है, विशेष रूप से करियर का आरंभिक पक्ष संघर्षपूर्ण होता है, और यदि शनि अंशों में सूर्य के बहुत अधिक निकट हो तो, आजीविका में बार बार उतार-चढ़ाव रहते हैं, शनि सूर्य का योग होने पर जातक को या तो पिता के सुख में कमी होती है, या पिता के साथ वैचारिक मतभेद रहते हैं, यदि शनि और सूर्य का योग शुभ भाव में बन रहा हो तो, ऐसे में संघर्ष के बाद सरकारी नौकरी का योग बनता है।

शनि चन्द्रमा – कुंडली में शनि और चन्द्रमा का योग होने पर व्यक्ति मानसिक रूप से हमेशा परेशान रहता है, मानसिक अस्थिरता की स्थिति रहती है, इस योग के होने पर नकारात्मक विचार, डिप्रेशन, एंग्जायटी और अन्य साइकैट्रिकल समस्याएं उत्पन्न होती हैं, व्यक्ति एकाग्रता की कमी के कारण अपने कार्यों को करने में समस्या आती है, यह योग माता के सुख में कमी या वैचारिक मतभेद भी उत्पन्न करता है, पर यदि शनि चन्द्रमा  का योग शुभ भाव में बन रहा हो तो, ऐसे में विदेश यात्रा या विदेश से जुड़कर आजीविका का साधन बनता है।

शनि मंगल – कुंडली में शनि मंगल का योग भी करियर के लिए संघर्ष देने वाला होता है, करियर की स्थिरता में बहुत समय लगता है, और व्यक्ति को बहुत अधिक पुरुषार्थ करने पर ही सफलता मिलती है, शनि मंगल का योग व्यक्ति को तकनीकी कार्यों जैसे इंजीनियरिंग आदि में आगे ले जाता है, और यह योग कुंडली के शुभ भावों में होने पर व्यक्ति पुरुषार्थ से अपनी तकनीकी प्रतिभाओं के द्वारा सफलता पाता है, शनि मंगल का योग यदि कुंडली के छटे या आठवे भाव में हो तो, स्वास्थ में कष्ट उत्पन्न करता है, शनि मंगल का योग विशेष रूप से पाचन तंत्र की समस्या, जॉइंट्स पेन और एक्सीडेंट जैसी समस्याएं देता है।

शनि बुध – शनि और बुध का योग शुभ फल देने वाला होता है। कुंडली में शनि बुध के एक साथ होने पर ऐसा व्यक्ति गहन अध्ययन की प्रवृति रखने वाला होता है, और प्राचीन वस्तुएं, इतिहास और गणनात्मक विषयों में रुचि रखने वाला होता है, और व्यक्ति प्रत्येक बात को तार्किक दृष्टिकोण से देखने वाला होता है, कुंडली में शनि बुध का योग व्यक्ति को बौद्धिक कार्य, गणनात्मक और वाणी से जुड़े कार्यों में सफलता दिलाता है।

शनि बृहस्पति – शनि और बृहस्पति के योग को बहुत अच्छा और शुभ फल देने वाला माना गया है, कुंडली में शनि बृहस्पति एक साथ होने पर व्यक्ति अपने कार्य को बहुत समर्पण भाव और लगन के साथ करने वाला होता है, यह योग आजीविका की दृष्टि से बहुत शुभ फल देने वाला होता है, व्यक्ति अपने आजीविका के क्षेत्र में सम्मान और यश तो प्राप्त करता ही है, पर शनि बृहस्पति का योग होने पर व्यक्ति अपने कार्य क्षेत्र में कुछ ऐसा विशेष करता है, जिससे उसकी कीर्ति बहुत बढ़ जाती है। कुंडली में शनि और बृहस्पति का योग होने पर ऐसे व्यक्ति के करियर या आजीविका की सफलता में उसके गुरु का बहुत बड़ा विशेष योगदान होता है, यह योग धार्मिक, समाजसेवा और आध्यात्मिक कार्य से व्यक्ति को जोड़कर परमार्थ के पग पर भी ले जाता है।

शनि शुक्र – शनि और शुक्र का योग भी बहुत शुभ माना गया है, कुंडली में शनि और शुक्र का योग होने पर व्यक्ति रचनात्मक या कलात्मक कार्यों से सफलता पाता है, जीवन में आजीविका के द्वारा अच्छी धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, व्यक्ति विलासिता पूर्ण कार्य से आजीविका चलाता है, यदि पुरुष जातक की कुंडलीं में शनि शुक्र का योग हो तो, ऐसे व्यक्तियों के जीवन में उनके विवाह के बाद विशेष उन्नति और भाग्योदय होता है, तथा उनकी पत्नी जीवन निर्वाह में विशेष सहायक होती है।  

शनि राहु – शनि और राहु का योग कुंडली में होने पर व्यक्ति वाक्-चातुर्य और तर्क से अपने कार्य सिद्ध करने वाला होता है, ऐसे में व्यक्ति को आकस्मिक धन प्राप्ति वाले कार्यों से लाभ होता है, व्यक्ति अपनी मुख्य आजीविका से अलग भी गुप्त रूप से धन लाभ प्राप्त करता है, और शुभ प्रभाव के आभाव में यह योग व्यक्ति को छल के कार्यों से भी जोड़ देता है।

शनि केतु – शनि और केतु का योग बहुत संघर्षपूर्ण योग माना गया है कुंडली में यदि शनि और केतु एक साथ हों तो, ऐसे में व्यक्ति की आजीविका या करियर बहुत संघर्ष पूर्ण होता है, व्यक्ति को पूरी मेहनत करने पर भी आपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, कई बार व्यक्ति अपनी आजीविका का क्षेत्र बदलने पर मजबूर हो जाता है, यह योग व्यक्ति में आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी उत्पन्न करता है, यदि कुंडली में अन्य अच्छे योग भी हों तो भी व्यक्ति के करियर की स्थिति तो अस्थिर ही बनी रहती है, शनि केतु का योग व्यक्ति को पाचनतंत्र, जोड़ो के दर्द और आंतो से जुडी समस्याएं भी देता है। यह तो हैं शनि के सामान्य लक्षण, अब बात कर लेते हैं, शनि देव की साढ़ेसाती की, क्योंकि शनि साढ़ेसाती अक्सर लोगों को भयभीत किसे रहती है।

शनि की साढ़ेसाती :-

साढ़ेसाती का नाम सुनते ही, अच्छे-अच्छे भयभीत हो उठते हैं। जैसे शनि ग्रह कोई भयानक राक्षस है! ‘बस जैसे ही आयेगा हमें कच्चा ही चबा जायेगा। 

वस्तुतः ज्योतिष शास्त्र में शनि ग्रह को दुःख और पीडा का ‘सूचक’ ग्रह कहा गया है। परंतु सूचक का अर्थ यह नहीं की शनि ग्रह का समय केवल दुःख और पीडा ही लेकर आता है। शनि का समय केवल दुःख और पीडा के समय की सूचना मात्र देता है। दुःख और पीडा तो मनुष्य अपने पाप कर्मों के कारण प्राप्त करता है। यह ग्रह मनुष्य के द्वारा किये गये उसके अपने ही पाप कर्मों की सजा देता है।

शास्त्रों में पाप कर्म इस प्रकार वर्णित हैं- कर्मेन्द्रियों (नेत्रों, कर्णों, जिव्हा, नासिका व जन्नेद्रियों द्वारा, मन-वचन-कर्म के तथा मन) के द्वारा जो कर्म किये जाते हैं, अच्छे, बुरे या मध्यम होते हैं।

अच्छे या पुण्य कर्म वे हैं- जो दूसरों को सुख देने वाले होते हैं।

बुरे या पाप कर्म वे हैं- जो दूसरों को दुःख देने वाले होते हैं।

मध्यम कर्म- जो किसी को न तो दुःख ना ही सुख देते हैं।

इन तीनों श्रेणियों के कर्म भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं, जो मानसिक, शारीरिक तथा आर्थिक रूप से दूसरों को प्रभावित करते हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया के प्राकृतिक सिद्धांत के अनुसार मनुष्य अपने कृत कर्मों से दूसरों को जो भी देता है, वही लौटकर एक दिन उसे मिलता है। “अपना ही बीजा हुआ फल मिलता है” यह ‘कर्म सिद्धांत’ है।

कर्म सिद्धांत के अनुसार अच्छे कर्मों की सूचना शुभ ग्रह राजयोगों के रूप में देते हैं, तथा बुरे कर्मों की सूचना मानसिक, शारीरिक या फिर आर्थिक हानि ‘दुःख और पीडा’ के रूप में पाप ग्रह देते हैं। पाप ग्रहों में सर्वाधिक बलवान ग्रह शनि ग्रह है, इसी लिये यह दुःख और पीडा का सूचक ग्रह कहा गया है। शनि ग्रह यदि कुंडली में अत्यधिक कष्ट की सूचना दे रहा हो तो इसकी शांति के लिए छाया दान बहुत ही कारगर उपाय है।

आज इस लेख के माध्यम से में आपको छाया दान के विषय में बताता हूँ, जिसके द्वारा जातक शनि ग्रह महादशा, अंतर्दशा अथवा साढ़ेसाती में होने वाली भिन्न-भिन्न तरह की परेशानियों से निजात पा सकता है, इस लेख के माध्यम से आप समझ सकते हैं की छाया दान क्या है, और क्यों किया जाना चाहिए :- अक्सर ऐसा होता है कि व्यक्ति का बीता हुआ काल अर्थात भूतकाल अगर दर्दनाक रहा हो या अच्छा न रहा हो तो, वह व्यक्ति के आने वाले भविष्य को भी ख़राब करता है, और भविष्य बिगाड़ देता है।  ऐसे समय में बिता हुआ कल आप का आज भी बिगड़ रहा हो, और बीता हुआ कल अच्छा न हो तो, निश्चित तोर पर कल भी बिगाड़ देगा। इससे बचने के लिये छाया दान करना चाहिए। 
जीवन में जब तरह तरह कि समस्या आप का भूत काल बन गया हो तो, छाया दान से मुक्ति मिलती है, और कष्ट से आराम मिलता है।

 1 . बीते हुए समय में पति पत्नी में भयंकर अनबन रही हो  तो : –

अगर बीते समय में पति पत्नी के सम्बन्ध मधुर न रहा हों और उसके चलते आज वर्त्तमान समय में भी वो परछाई कि तरह आप का पीछा कर रहा हो तो, ऐसे समय में आप छाया दान करें और छाया दान आप बृहस्पत्ति वार के दिन कांसे कि कटोरी में घी भर कर पति पत्नी अपना मुख देख कर कटोरी समेत मंदिर में दान दें, इससे आप कि खटास भरे भूत काल से मुक्ति मिलेगा। और भविष्य काल मधुरतापूर्ण और सुखमय रहेगा।

 2 . बीते हुए समय में हुई हो भयावह दुर्घटना या एक्सीडेंट :

अगर बीते समय में कोई भयंकर दुर्घटना हुई हो, और उस खौफ से आप समय बीतने के बाद भी नहीं उबार पाये हैं। मन में हमेशा एक डर बना रहता है,ओर आप कही भी जाते हैं तो, आप के मन में उस दुर्घटना का भय बना रहता है तो, आप छाया दान करें। आप एक मिटी के बर्तन में सरसों का तेल भर कर शनि वार के दिन अपनी छाया देख कर शनि मंदिर में दान करें। इससे आप को लाभ होगा, बीती हुई दर्दनाक स्मृति से छुटकारा मिलेगा। और भविष्य  सुरक्षित रहेगा।

3 . बीते समय में व्यापर में हुआ घाटा आज भी डरा रहा है आप को :

कई बार ऐसा होता है कि बीते समय में व्यापारिक घाटे या  बहुत बड़े नुकसान  से आप बहुत मुश्किल से उबरे हों, और आज स्थिति ठीक होने के बावजूद भी आप को यह डर सता रहा है कि दुबारा वैसा ही न हो जाये तो, इससे बचने के लिए आप बुधवार के दिन एक पीतल कि कटोरी में घी भर कर उसमे अपनी छाया देख कर छाया पात्र समेत आप किसी ब्राह्मण को दान दें। इससे दुबारा कभी भी आप को व्यापार में घाटा नहीं होगा। और भविष्य में व्यापार भी फलता फूलता रहेगा।

4 . भूत काल कि कोई बड़ी बीमारी आज भी परछाई बन कर डरा रही हो :

बीते समय में कई बार कोई लम्बी बीमारी के कारण व्यक्ति मानसिक तौर पर उससे उबर नहीं पाता है। और ठीक होने के बावजूद भी मानसिक तौर पर अपने भूत काल में ही घिरा रहता है। तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति को शनिवार के दिन एक लोहे के पात्र में तिल का तेल भर कर अपनी मुख छाया देखकर उसका दान शनि मंदिर में करें। इससे आप को इस स्मृति से मुक्ति मिलेगी और भविष्य में बीमार नहीं होंगे, स्वस्थ्य रहेंगे।

5 लम्बे समय के बाद नौकरी मिली है, लेकिन भुतकाल का डर कि फिर बेरोजगार न हो जाये :

बहुत लम्बे समय की बेरोजगारी के बाद नौकरी मिलती है, लेकिन मन में सदेव एक भय सताता है कि दुबार नौकरी न चली जाये, और यह सोच एक प्रेत कि तरह आप का पीछा करती है तो, ऐसे स्थिति में आप सोमवार के दिन तांम्बे की एक कटोरी में शहद भर कर अपनी छाया देख कर ब्राह्मण को दान करना चाहिए, इससे आप को लाभ मिलेगा। इस छाया दान से उन्नति बनी रहती है, रोजगार बना रहता है। 

6 .कुछ ऐसा काम कर चुके हैं जो गोपनीय है, लेकिन उसके पश्चाताप से उबर नहीं पाये हैं : 

कई बार जीवन में ऐसी गलती आदमी कर देता है कि जो किसी को बता नहीं पता लेकिन मन ही मन हर पल घुटता रहता है, और भूत काल में कि गई गलती से उबर नहीं पता है तो, ऐसी स्थिति में व्यक्ति को पीतल कि कटोरी में बादाम के तेल में मुख देख कर शुक्रवार के दिन छाया दान करना चाहिए। इससे पश्चाताप कि अग्नि से मुक्ति मिलती है, और कि हुई गलती के दोष से मुक्ति मिलती है।

7 . पहली शादी टूट गयी, दूसरी शादी करने जा रहे हैं, लेकिन मन में वह भी टूटने का डर  है :

संयोग वश या किसी दुर्घटना वश व्यक्ति कि पहली शादी टूट गयी है, और दूसरी शादी करने जा रहे हैं, और मन में भय है कि जैसे पहले हुआ था वैसे दुबारा न हो जाये तो, इसके लिए व्यक्ति को (स्त्री हो या पुरुष) रविवार के दिन ताँबे के पात्र में घी भरकर उसमे अपना मुख देख कर छाया दान करें। इससे भूत काल में हुई घटना या दुर्घटना का भय नहीं रहेगा। और भविष्य सुखमय रहेगा।

तंत्र के रहस्य

तंत्र के रहस्य, सिद्धांत और पंचमकार :-

Dr.R.B.Dhawan

(संकलन)

तंत्र का उल्लेख वैदिक साहित्य में तो नहीं मिलता, परंतु लौकिक साहित्य में अवश्य मिलता है। संभवतः तंत्र की उत्पत्ति वैदिक काल के बाद पौराणिक काल में ही हुई है। तंत्र के प्रधान देव भगवान शिव और भगवति देवी हैं। अनेक योगी आचार्य तंत्राचार्य अथवा अधिकारी नाथ संप्रदाय अथवा “शैव‌ या शाक्त” भी तंत्रालोक के रहस्यों के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता व कुछ सर्जनकार भी हुए हैं। इनमें गुरू मछन्दरनाथ, गुरू गोरक्षनाथ तथा अनेकानेक संस्थापक मठाधीश व तंत्र सम्राट हैं, जिनका नाम आदर से लिया जाता है। आगे की पंक्तियों में पंच-मकार का जो वर्णन दिया जा रहा है, वह कुछ तंत्राचार्यों का मत है, अनेक तंत्राचार्य पंच-मकार का अर्थ अन्य प्रकार से मानते हैं। (मेरा स्वयं का मत भी इस प्रकार के पंच-मकार से भिन्न है।) यहां केवल अघोर पक्ष का मत दिया जा रहा है।

तंत्र में पंचमकार (पांच बार म, म, म, म, म) 1. मद्य, 2. मांस, 3. मत्स्य, 4. मुद्रा और 5. मैथुन। कब, कैसे प्रचलित हुये, और इनका क्या रहस्य है?  साधारणत: यह विश्वास किया जाता है की मंत्र-तंत्र पंचमकार, जादू-टोना, पंचमकार के ही मुख्य अंग हैं। पंचमकार का अर्थ है, जिसमे पांच मकार अर्थात पांच म शब्द से शुरू होने वाले अवयव आयें यथा मांस-मदिरा-मत्स्य-मुद्रा और मैथुन। कौलावली निर्णय में यह मत दिया है की मैथुन से बढ़कर कोई तत्व् नहीं है।, इससे साधक सिद्ध हो जाता है, जबकि केवल मद्य से भैरव ही रह जाता है, मांस से ब्रह्म, मत्स्य से महाभैरव और मुद्रा से साधकों में श्रेष्ठ हो जाता है। केवल मैथुन से ही सिद्ध हो सकता है। इस सम्बन्ध में कुछ बातें ध्यान देने योग्य हैं, प्रथम: पंचमकार का सेवन बौद्धों की बज्रयान शाखा में विकसित हुआ था। इस परंपरा के अनेक सिद्ध, बौद्ध एवं ब्राह्मण परंपरा में सामान रूप से गिने जाते हैं। बज्रयानी चिंतन, व्यवहार और साधना का रूपांतर ब्राह्मण परंपरा में हुआ है, जिसे वामाचार या वाम मार्ग कहते हैं, अतः पंचमकार केवल वज्रयानी साधना और वाम मार्ग में मान्य है। वैष्णव, शौर्य, शैव, शाक्त व गाणपत्य तंत्रों में पंचमकार को कोई स्थान नहीं मिला। काश्मीरी तंत्र शास्त्र में भी वामाचार को कोई स्थान नहीं है। वैष्णवों को छोड़कर शैव व् शाक्त में कहीं कहीं मद्य, मांस व् बलि को स्वीकार कर लिया है, लेकिन मैथुन को स्थान नहीं देते। वाममार्ग की साधना में भी 15-17वीं सदी में वामाचार के प्रति भयंकर प्रतिक्रिया हुई थी। विशेषकर महानिर्वाण तंत्र, कुलार्णव तंत्र, योगिनी तंत्र, शक्ति-संगम तंत्र आदि तंत्रों में पंचमकार के विकल्प या रहस्यवादी अर्थ कर दिए हैं। जैसे मांस के लिए लवण, मत्स्य के लिए अदरक, मुद्रा के लिए चर्वनिय द्रव्य, मद्य के स्थान पर दूध, शहद, नारियल का पानी, मैथुन के स्थान पर साधक का समर्पण या कुंडलिनी शक्ति का सहस्त्रार में विराजित शिव से मिलन। यद्यपि इन विकल्पों में वस्तु भेद है, लेकिन महत्वपूर्ण यह है की वामाचार के स्थूल पंचतत्व शिव-शक्ति की आराधना के उपकरण हैं।

तांत्रिक साधना क्या है? :-

1–वेदाचार

2– वैष्णवाचार 

3–शैवाचार

4–दक्षिणाचार 

5–वामाचार

6–सिद्धान्ताचार

7–कुलाचार

तंत्र शास्त्र के अंतर्गत सात प्रकार के साधना पद्धतियों का प्रचलन या वर्णन प्राप्त होता है, जो दो मुख्य धारणाओं में विभाजित हैं :- प्रथम पश्वाचार या पशु भाव तथा द्वितीय–वीराचार। इसके अतिरिक्त दिव्य-भाव त्रय के अंतर्गत सम्पूर्ण प्रकार के सिद्धि पश्चात जब साधक स्वयं शिव तथा शक्ति के समान हो जाता हैं। पशु भाव के अंतर्गत चार प्रकार के साधन पद्धतियों को समाहित किया गया है जो निम्नलिखित हैं।

1. वेदाचार, 2. वैष्णवाचार, 3. शैवाचार 4. दक्षिणाचार।

1. वेदाचार : तंत्र के अनुसार सर्व निम्न कोटि की उपासना पद्धति वेदाचार हैं, जिसके तहत वैदिक याग-यज्ञादि कर्म विहित हैं।

2. वैष्णवाचार : सत्व गुण से सम्बद्ध, सात्विक आहार तथा विहार, निरामिष भोजन, पवित्रता, व्रत, ब्रह्मचर्य, भजन-कीर्तन इत्यादि कर्म विहित हैं।

3. शैवाचार : शिव तथा शक्ति की उपासना, यम-नियम, ध्यान, समाधि कर्म विहित हैं।

4. दक्षिणाचार : उपर्युक्त तीनों पद्धतियों का एक साथ पालन करते हुए, मादक द्रव्य का प्रयोग विहित हैं।

दक्षिणा-चार (पशु भाव), वीरा-चार तथा कुला-चार (वीर भाव), सिद्धान्ताचार (दिव्य भाव) हैं, भिन्न-भिन्न तंत्रों में दक्षिणा-चार, वीरा-चार तथा कुला-चार, इन तीन प्रकार के पद्धति या आचारों से शक्ति साधना करने का वर्णन प्राप्त होता है। शैव तथा शक्ति संप्रदाय के क्रमानुसार साधन मार्ग निम्नलिखित हैं :-

1. दक्षिणा-चार, पश्वाचार (पशु भाव) ; जिसके अंतर्गत, वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार के कर्म निहित हैं जैसे, दिन में पूजन, प्रातः स्नान, शुद्ध तथा सात्विक आचार-विचार तथा आहार, त्रि-संध्या जप तथा पूजन, रात्रि पूजन का पूर्ण रूप से त्याग, रुद्राक्ष माला का प्रयोग, ब्रह्मचर्य इत्यादि नियम सम्मिलित हैं, मांस-मत्स्यादी से पूजन निषिद्ध हैं। ब्रह्मचर्य का पालन अत्यंत आवश्यक है, अथवा अपनी स्त्री में ही रत रहना ब्रह्मचर्य पालन ही समझा जाता है। पंच-मकार से पूजन सर्वथा निषिद्ध है, यदि कही आवश्यकता पड़ जाये तो उनके प्रतिनिधि प्रयुक्त हो सकते हैं। साधना का आरंभ पशु भाव से शुरू होता है, तत्पश्चात शनै-शनै साधक सिद्धि की ओर बढ़ता है।

2. वामा-चार या वीरा-चार (वीर भाव) ; शारीरिक पवित्रता स्नान-शौच इत्यादि का कोई बंधन नहीं हैं, साधक सर्वदा, सर्व स्थान पर जप-पूजन इत्यादि करने का अधिकारी है। मध्य या अर्ध रात्रि में पूजन तय प्रशस्त हैं, मद्य-मांस-मतस्य से देव पूजन, भेद-भाव रहित, सर्व वर्णों के प्रति सम दृष्टि तथा सम्मान इत्यादि निहित है। साधक स्वयं को शक्ति या वामा कल्पना कर साधना करता है।

3. सिद्धान्ताचार : शुद्ध बुद्धि! इसी पद्धति या आचार के साधन काल में उदय होता है, अपने अन्दर साधक शिव तथा शक्ति का साक्षात् अनुभव कर पाने में समर्थ होता है। संसार की प्रत्येक वस्तु या तत्व, साधक को शुद्ध तथा परमेश्वर या परमशिव से युक्त या सम्बंधित लगी है, अहंकार, घृणा, लज्जा इत्यादि पाशों का पूर्ण रूप से त्याग कर देता है। अंतिम स्थान कौलाचार या राज-योग ही है, साधक साधना के सर्वोच्च स्थान को प्राप्त कर लेता है। इस स्तर तक पहुँचने पर साधक सोना और मिट्टी में, श्मशान तथा गृह में, प्रिय तथा शत्रु में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं रखता है, उनके निमित्त सब एक हैं, उसे अद्वैत ज्ञान की प्राप्ति हो जाती हैं। इन्हीं आचार-पद्धतियों को भाव त्रय भी कहा गया है।

1. पशु भाव 2. वीर भाव 3. दिव्य भाव कहा जाता है।

तंत्र साधना हेतु उत्तम स्थान :- मणिकर्णिका घाट, वाराणसी या काशी। यह स्थान तंत्र साधना हेतु सर्वोत्तम माना जाता है, भगवान शिव यहाँ सर्वदा, साक्षात विराजमान रहते हैं। आदि काल से ही, काशी या वाराणसी का प्रयोग तांत्रिक साधनाओं हेतु किया जाता है। पश्वाचार, कौलाचार या कुलाचार, दिव्याचार, शैव-शाक्त के साधन क्रम हैं।

अष्ट पाश : घृणा, शंका, भय, लज्जा, जुगुप्सा, कुल, शील तथा जाति, पशु भाव आदि भाव हैं, मनुष्य पशुओं में सर्वश्रेष्ठ तथा सोचने-समझने या बुद्धि युक्त है। जब तक मनुष्य के बुद्धि का पूर्ण रूप से विकास ना हो, वह पशु के ही श्रेणी में आता है। जिसकी जितनी बुद्धि होगी उसका ज्ञान भी उतना ही श्रेष्ठ होगा। यहां पशु भाव से ही साधन प्रारंभ करने का विधान है, यह प्रारंभिक साधन का क्रम है, आत्म तथा सर्व समर्पण भाव उदय का प्रथम कारक पशु भाव क्रम से साधना करना है। यह भाव निम्न कोटि का माना गया है, स्वयं त्रिपुर-सुंदरी, श्री देवी ने अपने मुखारविंद से भाव चूड़ामणि तंत्र में पशु भाव को सर्व-निन्दित तथा सर्व-निम्न श्रेणी का बताया है। अपनी साधना द्वारा प्राप्त ज्ञान द्वारा जब अज्ञान का अन्धकार समाप्त हो जाता है, पशु भाव स्वतः ही लुप्त हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार पशुत्व लक्षण आठ प्रकार से युक्त मानव स्वभाव लक्षणों या पाशों से है; 1. घृणा, 2. शंका, 3. भय, 4. लज्जा, 5. जुगुप्सा, 6. कुल, 7. शील तथा 8. जाति। यही अष्टपाश युक्त मानव लक्षण सर्वदा ही मनुष्य के आध्यात्मिक उन्नति हेतु बाधक माने गए हैं, तथा साधना पथ में त्याज्य हैं। पशु भाव साधना क्रम के अनुसार साधक इन्हीं लक्षणों या पाशों पर विजय पाने का प्रयास करता है।

1. घृणा : व्यक्ति-विशेष के शरीर, इन्द्रियां तथा मन को न भाने वाली तथा तिरस्कृत करने वाला लक्षण घृणा कहलाती है। संसार के समस्त तत्व या पञ्च तत्व से निर्मित प्रत्येक वस्तुओं में किसी भी प्रकार का विकार अनुभव करना ही घृणा है, जो अभिमान, अहंकार इत्यादि विकारों को जन्म देता है। मनुष्य के हृदय पर किसी वस्तु या तत्व के प्रति प्रेम तथा किसी के प्रति तिरस्कार यदि विद्यमान है तो, वह मनुष्य परमात्मा तथा प्रत्येक तत्व में विद्यमान परमात्मा के अस्तित्व से अनभिज्ञ है।

2. शंका : किसी व्यक्ति के प्रति संदेह की भावना शंका है। विषय-आसक्त, माया-मोह में पड़ा हुआ मनुष्य, अपने विकास के लिये नाना प्रकार के छल-प्रपंच में लिप्त रहता है, कपट व्यवहार करता है, झूठ बोलता है, देहाभिमानी है, परिणाम स्वरूप वह दूसरे को भी ऐसा ही समझ कर उस पर संदेह करता है।

3. भय : मनुष्य को अपने शरीर, प्रिय-जन, संपत्ति, अभिलषित वस्तुओं से प्रेम रहता है, तथा इसके नष्ट होने का सर्वदा भय रहता है। भौतिक वस्तुओं के नाश का उसे सर्वदा भय रहता है, परन्तु आत्म के नाश का नहीं तथा आत्म तत्व को जानने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। अन्य कई कारण हैं, जो भय को उत्पन्न करते हैं; जैसे अपने सन्मुख होने वाली कोई अप्रिय घटना इत्यादि।

4. लज्जा : सामान्यतः मनुष्य के हृदय में मान-अपमान भावना का उदय होना लज्जा कहलाता है। मनुष्य का शरीर नश्वर है, फिर शरीर के मान-अपमान का कितना महत्व हो सकता है? तथा शरीर को जीवन देने वाली आत्म साक्षात् परमात्मा ही है, तथा मान-अपमान से परे है।

5. जुगुप्सा : दूसरों की निंदा-चर्चा करना जुगुप्सा कहलाती है, मनुष्य दूसरों के गुण तथा दोषों को देखता है, तथा अपने दोषों का मनन नहीं कर पाता।

6. कुल : उच्च कुल या वंश में जन्म कुल-भाव से है, जैसे उच्च कुल में पैदा हुआ अपने आप को उच्च मानता है, तथा दूसरे के कुल को छोटा। यह भाव मनुष्य के अन्दर छोटा या बड़ा होने की प्रवृति को उदित करता है, तथा उसके विचार भेद-भाव युक्त हो जाते हैं।

7. शील : शिष्टाचार का अभिप्राय शील है, अन्य लोगों के प्रति मानव का व्यवहार, सेवा, उठने-बैठने का तरीका शिष्टाचार या शील कहलाता है। शीलता के बंधन को काट देने पर साधक विचार तथा कर्म में स्वतंत्र हो जाता है, तथा उसे ये चिंता नहीं रहती की कोई अन्य उसके बारे में क्या सोच रहा है।

8. जाती : मनुष्य का अपना जात्यभिमान, उसके हृदय में बड़े या छोटे भावना का प्रतिपादन करता है। जाती भेद को समदर्शी न मानने वाला पशु भाव से ग्रस्त है, चारों जातियां क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र सभी परम-पिता ब्रह्मा जी के संतान हैं।

शक्ति साधना मार्ग में प्रयुक्त होने वाले, पञ्च-मकार (मद्ध, मांस, मत्स्य, मुद्रा तथा मैथुन) के कारण साधक को शिवत्व प्राप्त करने हेतु इन सभी पाशों या लक्षणों से मुक्त होना अत्यंत आवश्यक है। जो इन अष्ट-पाशों में से किसी एक से भी ग्रस्त है, मनोविकार युक्त है, वह सर्वदा, सर्व-काल तथा सर्व-व्यवस्था में साधना करने में समर्थ नहीं हो सकता। चित निर्मल हुए बिना, समदर्शिता तथा त्याग की भावना का उदय होना अत्यंत कठिन है, चित को निर्मल निर्विकार करने हेतु पशु भाव का त्याग अत्यंत आवश्यक है। पशु भाव से साधना प्रारंभ कर अष्ट पाशों, मनोविकार पर विजय पाकर ही साधक वीर-भाव में गमन का अधिकारी है। वस्तुतः पशु भाव युक्त साधना कर साधक इन अष्ट-पाशों या विकारों से मुक्त होने का प्रयास करता है।

वीर भाव : इस भाव तक आते-आते साधक! अष्ट-पाशों के कारण होने वाले दुष्परिणामों को समझने लगता है, परन्तु उनका पूर्ण रूप से वह त्याग नहीं कर पाता है, परन्तु करना चाहता है। इसी प्रकार पशु भाव से अपने देह तथा मन की शुद्धि करने के प्रयासरत साधक, वीर-भाव से साधना कर पाता है। वीर-भाव का मुख्य आधार केवल यह है कि! साधक अपने आप में तथा अपने इष्ट देवता में कोई अंतर न समझे, तथा साधना में रत रहा कर अपने इष्ट देव के समान ही गुण-स्वभाव वाला बने। वीर-भाव बहुत ही कठिन मार्ग है, बिना गुरु आज्ञा तथा मार्गदर्शन के यह साधन हानिकारक ही होता है, इस मार्ग को कुल, वाम, कौल, वीरा-चार नाम से भी जाना जाता है। साथ ही साधक का दृढ़ निश्चयी भी होना अत्यंत आवश्यक है, किसी भी कारण इस मार्ग का मध्य में त्याग करना उचित नहीं है, अन्यथा दुष्परिणाम अवश्य प्रकट होते हैं। जिस साधक में किसी भी प्रकार से कोई शंका नहीं है, वह भय मुक्त है, निर्भीक है, निर्भय हो किसी भी समय कही पर भी चला जाये, लज्जा व कुतूहल से रहित है, वेद तथा शास्त्रों के अध्ययन में सर्वदा रत रहता है, वह वीर साधन करने का अधिकारी है। साधन के इस क्रम में मूल पञ्च-तत्व के प्रतीक पञ्च-तत्वों से साधना करने का विधान है, जिसे पञ्च-मकार नाम से जाना जाता है।

इसी मार्ग का अनुसरण कर महर्षि वशिष्ठ ने, नील वर्णा महा-विद्या तारा की सिद्धि प्राप्त की थी। सर्वप्रथम, अपने पिता ब्रह्मा जी की आज्ञा से महर्षि वशिष्ठ ने देवी तारा की वैदिक रीति से साधना प्रारंभ की परन्तु सहस्त्र वर्षों तक कठोर साधना करने पर भी मुनि-राज सफल न हो सके। परिणामस्वरूप क्रोध-वश उन्होंने तारा मंत्र को श्राप दे दिया। तदनंतर दैवीय आकाशवाणी के अनुसार, मुनि राज ने कौल या कुलागम मार्ग का ज्ञान प्राप्त किया, तथा देवी के प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त कर, सिद्धि प्राप्त की। साधना के इस क्रम में साधना पञ्च-मकार विधि से की जाती हैं! यह पञ्च या पांच तत्व हैं 1. मद्य, 2. मांस 3. मतस्य 4. मुद्रा तथा 5. मैथुन, इन समस्त द्रव्यों को कुल-द्रव्य भी कहा जाता है। सामान्यतः इनमें से केवल मुद्रा (चवर्ण अन्न तथा हस्त मुद्रायें) को छोड़ कर सभी को निन्दित वस्तु माना जाता है, वैष्णव सम्प्रदाय तो इन समस्त वस्तुओं को महा-पाप का कारण मानता है, मद्य या सुरा पान पञ्च-महा पापों में से एक है। परन्तु आदि काल से ही वीर-साधना में इन सब वस्तुओं के प्रयोग किये जाने का विधान है। कुला-चार केवल साधन का एक मार्ग है, तथा इस मार्ग में प्रयोग किये जाने वाले इन पञ्च-तत्वों को केवल अष्ट-पाशों का भेदन कर, साधक को स्वतंत्र-उन्मुक्त बनाने हेतु प्रयोग किया जाता है। साधक इन समस्त तत्वों का प्रयोग अपनी आत्म-तृप्ति हेतु नहीं कर सकता, इनका कदापि आदि नहीं हो सकता, साधक केवल अपने इष्ट देवता को समर्पित कर ग्रहण करने का अधिकारी है, यह केवल उपासना की सामग्री है, उपभोग की नहीं। अति-प्रिय होने पर भी, इन तत्वों से साधक किसी प्रकार की आसक्ति नहीं रख सकता है, यह ही साधक के साधना की चरम पराकाष्ठा है। देखा जाये तो आदि काल से ही शैव तथा विशेषकर शक्ति संप्रदाय से सम्बंधित पूजा-साधना तथा पितृ यज्ञ कर्मों में मद्य, मांस, मीन इत्यादि का प्रयोग किया जाता रहा है।

कुछ तंत्राचार्यों का मत है  (मेरा स्वयं का मत इस पक्ष में नहीं है):- ऋग्-वेद! देव तथा पितृ कार्यों हेतु हिंसा को पाप नहीं मानता। कुलार्णव तंत्र (कौल या कुल धर्म के विवरण सम्बन्धी तंत्र) के अनुसार, शास्त्रोक्त विधि से देवता तथा पितरों का पूजन कर मांस खानेवाला तथा मद्य पीने वाला किसी भी प्रकार के दोष का भागी नहीं होता। बिना यज्ञ कर्मों के मांस-मदिरा सेवन दोष युक्त माना गया है, तथा पाप की श्रेणी में आता हैं। मंत्रों द्वारा पवित्र किया गया या शास्त्रोक्त विधि से कुल द्रव्य या तत्व, गुरु तथा देवता को अर्पण कर पान करने वाला भव सागर के बंधन से मुक्त हो जाता है, तथा किसी भी प्रकार के दोष का भागी नहीं है। मतस्य-मांस, सुरा इत्यादि मादक द्रव्यों का कौल मार्ग में दीक्षा संस्कार के पश्चात, देव कार्य पूजन के अतिरिक्त सेवन दोष युक्त माना गया है।

कुछ तंत्राचार्यों का मत :- मद्य, मांस, मतस्य, मुद्रा के सेवन का मुख्य कारण यह है कि सामान्यतः मद्य निन्दित वस्तुओं में माना जाता है, परन्तु मादक द्रव्यों में मद्य या सुरा सर्वोत्तम द्रव्य माना जाता है, इसके सेवन से मनुष्य नशे में लिप्त हो, आत्म विस्मृत की अवस्था को प्राप्त कर उन्मत हो जाता है। अन्य मादक द्रव्यों के समान मद्य मनुष्य में आलस्य नहीं लाता है, आलसी मनुष्य को क्रिया-शील करने में मद्य विशेष प्रभाव दिखता है। अष्ट-पाशों का जो सादाहरण या मानसिक बल से परित्याग कर विमुक्त होने में समर्थ नहीं है, वह सुरा पान रूपी औषधि का प्रयोग कर, इन पाशों का त्याग करने या नियंत्रण करने में सफल हो सकता है। मद्यपान ध्यान केन्द्रित करने में पूर्णतः सक्षम है, तथा इसी करण वश शक्ति साधनाओं में प्रयुक्त होता है। साधक जिस किसी ओर चाहे, अपना ध्यान पूर्ण केन्द्रित कर सकता है, वास्तव में मद्यपान कर साधक आत्म-विस्मृत की अवस्था को प्राप्त करता है, तथा सर्व प्रकार से चिंता रहित हो, ध्यान केन्द्रित कर पाता है। मद्य उत्कट उत्तेजक पदार्थ है, तथा इसका प्रयोग मांस, मतस्य, चर्वण अन्न के साथ प्रयोग किया जाता है। मदिरा के साथ, मांस-मत्स्य इत्यादि का प्रयोग, मदिरा में व्याप्त विष को शांत करने हेतु किया जाता है, साथ ही पौष्टिक भोजन के अलावा मदिरा का सेवन मनुष्य को मृत्यु की ओर ले जाता है। मदिरा के साथ या अन्य मादक द्रव्यों के साथ मांस इत्यादि का सेवन मनुष्य को बलवान एवं तेजस्वी बनता है।

स्त्री सेवन का मुख्य कारण :- स्त्री के प्रति मोह या प्रेम! काम वासना या कामुकता, किसी भी साधना पथ का सबसे बड़ा विघ्न है, तथा विघ्न से दूर रह कर या कहें तो स्त्री से दूर रहकर इस विघ्न पर विजय नहीं पाया जा सकता है। प्रेम में लिप्त मनुष्य, सही और गलत भूल कर, मनमाने तरीके से कार्य करता है। अघोर तंत्र में स्त्री सेवन में रहते हुए, काम-वासना, प्रेम इत्यादि आसक्ति का आत्म त्याग सर्वश्रेष्ठ माना गया है। पूजन, केवल विभिन्न द्रव्यों को देवताओं पर अर्पित करना ही नहीं होता, अपितु देवता के पूर्ण रूप से संतुष्टि होने से भी सम्बंधित है। समस्त वस्तु या तत्व परमात्मा द्वारा ही बनायी गई हैं, पंच-मकार मार्ग! समस्त प्रकार के वैभव-भोगो में रत रहते हुए, धीरे-धीरे त्याग का मार्ग है। साधक का सदाचारी होना भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, संस्कार (दीक्षा) विहीन होने पर, गुरु आज्ञा का उलंघन करने पर तथा सदाचार विहीन होने पर साधक पाप का अधिकारी हो पतन की ओर अग्रसर होता है। शक्ति संगम तंत्र के अनुसार मैथुन हेतु सर्वोत्तम स्त्री संग, दीक्षिता तथा देवताओं पर भक्ति भाव रखने वाली, मंत्र-जप इत्यादि देव कर्म करने वाली होना आवश्यक है। किसी भी स्त्री को केवल देखकर मन में विकार जागृत होना, साधक के नाश का कारण बनता है। कुल-धर्म दीक्षा रहित स्त्री का संग, सर्व सिद्धियों की हानि करने वाला होता है। स्त्री संग से पूर्व स्त्री-पूजन अनिवार्य है, तथा स्त्रियों से द्वेष निषेध है, स्त्री सेवन या सम्भोग आत्म सुख के लिये करने वाला पापी तथा नरक गामी होता है। पर-द्रव्य, पर-अन्य, प्रतिग्रह, पर-स्त्री, पर-निंदा, से सर्वदा दूर रहकर! सदाचार पालन अत्यंत आवश्यक है।

पंच-मकार विधि से साधना करने का मुख्य उद्देश्य :- पञ्च-मकार साधना केवल मात्र इष्ट देवता की पूजा हेतु विहित है, न की स्व-तृप्ति या विषय-भोग के लिए, समस्त भौतिक सुखों से पंच-मकार विधि मुक्ति पाने हेतु केवल साधन मात्र है। साधारण मनुष्य विषय-भोगों में सर्वदा आसक्त रहता है, और अधिक प्राप्त करने का प्रयास करता है, तथा सर्वदा उनमें लिप्त रहता है, आदी हो जाता है। परन्तु वीराचारी आसक्ति से सर्वदा दूर रहता है। किसी भी प्रकार से विषय-भोगो में आसक्ति, लिप्त रहने का उसे अधिकार उसे नहीं है, सर्वदा ही उसे उन्मुक्त रहना पड़ता है, वह आदी नहीं हो सकता है। स्त्री संग करने पर साधक पर स्त्री का कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये, न मोह न प्रेम। इसी तरह मद्य, मांस तथा मतस्य के सेवन के पश्चात भी, शरीर पर इनका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये। मद्यपान करने पर साधक के शरीर में पूर्ण चेतना रहनी चाहिये।

वास्तव में देखा जाये तो, यह पंच-मकार मनुष्य के अष्ट पाशों के बंधन से मुक्त होने में सहायक है, सर्वश्रेष्ठ विषय भोगो को भोग करते हुए भी, विषय भोगो के प्रति अनासक्ति का भाव, इस मार्ग का परम उद्देश्य है। जब तक मानव पाश-बद्ध, विषय-भोगो के प्रति आसक्त, देहाभिमानी है, वह केवल जीव कहलाता है, पाश-मुक्त होने पर वह स्वयं शिव के समान हो जाता है। वीर-साधना या शक्ति साधना का मुख्य उद्देश्य शिव तथा समस्त जीवों में ऐक्य प्राप्त करना है। यहाँ मानव देह देवालय है तथा आत्म स्वरूप में शिव इसी देवालय में विराजमान है, अष्ट पाशों से मुक्त हुए बिना देह में व्याप्त सदा-शिव का अनुभव संभव नहीं है। शक्ति साधना के अंतर्गत पशु भाव, वीर-भाव जैसे साधन कर्मों का पालन कर मनुष्य सफल योगी बन पाता है।

​मंत्र जप के नियम

Dr.R.B.Dhawan

वैदिक साहित्य में मंत्र जप करने के नियम व निर्देश दिये गये हैं, किस प्रयोग अथवा साधना के लिए सम्बंधित मंत्र का किस नियम से, और कितना जप किया जाना चाहिए मंत्र का जप कहां बैठकर, किस दिशा में, किस आसन में, किस मुहूर्त में, और किस माला से, किया जाना चाहिये? इसके अलावा भी बहुत से नियम हैं, इन सभी नियमों का निर्देश गुरु से प्राप्त होने पर ही मंत्र का जप आरम्भ करना चाहिए। यहां मंत्र जप के साधारण नियमों का उल्लेख किया जा रहा है :-

नग्नावस्था में कभी भी जप नहीं करना चाहिए । 

सिले हुए वस्त्र पहनकर जप नहीं करना चाहिए ।

शरीर व हाथ अपवित्र हों तो जप नहीं करना चाहिए ।

सिर के बाल खुले रखकर जप नहीं करना चाहिए ।

आसन बिछाए बिना जप नहीं करना चाहिए ।

बातें करते हुए जप नहीं करना चाहिए ।

आधिक लोगों की उपस्थिति में प्रयोग के निमित्त जप नहीं करना चाहिए।

मस्तक ढके बिना जप नहीं करना चाहिए।

अस्थिर चित्त से जप नहीं करना चाहिए ।

ऊंघते हुए भी जप नही करना चाहिए।

रास्ते चलते व रास्ते में बैठकर जप नहीं करना चाहिए ।

भोजन करते व रास्ते में बैठकर जप नहीं करना चाहिए ।

निद्रा लेते समय भी जप नहीं करना चाहिए ।

उल्टे-सीधे बैठकर या पांव पसारकर भी कभी जप नहीं करना चाहिए।

जप के समय छींक नहीं लेनी चाहिए, खंखारना नहीं चाहिए, थूकना नहीं चाहिए, गुप्त अंगों का स्पर्श नहीं करना चाहिए, व भयभीत अवस्था में भी जप नहीं करना चाहिए ।

अंधकारयुक्त स्थान में जप नहीं करना चाहिए ।
अशुद्ध व अशुचियुक्त स्थान में जप नहीं करना चाहिए ।

जप की गणना :-

जप की गणना के तीन प्रकार बतलाए गए हैं –

1. वर्णमाला जप।

2. अक्षमाला जप एवं  

3. कर माला जप ।

1. वर्णमाला जप :– वर्णमाला के अक्षरों के आधार पर जप संख्या की गणना की जाए, उसे ‘वर्णमाला जप’ कहते हैं ।

2. अक्षमाला जप :– मनकों की माला पर जो जप किया जाता है, उसे अक्षमाला जप कहते हैं । अक्षमाला में एक सौ आठ मनकों की माला को प्रधानता प्राप्त है, और उसके पीछे भी व्यवस्थित वैज्ञानिक रहस्य है। प्रथम:- सम्पूर्ण तारामंडल (सभी ग्रह जिसकी परिक्रमा करते हैं) में 27 नक्षत्र हैं, और हर नक्षत्र के 4-4 चरण हैं, यह 27×4= 108 चरण होते हैं। हर नक्षत्र के प्रत्येक चरण तक मंत्र की सूक्ष्म कम्पन ऊर्जा पहुंचनी चाहिए, इसलिए एक माला में 108 मंत्र अनिवार्य हैं। दूसरा:-  जीवन जगत् और सृष्टि का प्राणाधार सूर्य है, जो कि एक मास में एक भ्रमण पूरा कर लेता है । खगोलीय वृत्त 360 अंशों का है, और यदि इसकी कलाएं बनाई जाएं तो 360 × 60 = 21600 सिद्ध होती हैं, चूंकि सूर्य छह मास तक उत्तरायन तथा शेष छह मास दक्षिणायन में रहता है, अतः एक वर्ष में दो अयन होने से यदि इन कलाओं के दो भाग 21600÷2= 10800 सिद्ध होता है । सामंजस्य हेतु अंतिम बिंदुओं से संख्या को मुक्त कर दें तो, शुद्ध संख्या 108 बची रहती हैं, इसलिए भारतीय धर्मग्रंथों में कहीं कहीं उत्तरायन सूर्य के समय सीधे तरीके से तथा दक्षिणायन सूर्य के समय दाएं-बाएं तरीके से एक सौ आठ मनको की माला फेरने का विधान है, जिस से कार्यसिद्धि में शीघ्र सफलता मिलती है।

भारतीय कालगति में एक दिन रात का परिणाम 60 घड़ी माना गया है , जिसके 60 × 60 = 3600 पल तथा 3600 × 60 = 21600 विपल सिद्ध होते हैं । इस प्रकार इसके दो भाग करने से 10800 विपल दिन के और इतने ही रात्रि के सिद्ध होते हैं, और शुभकार्य में अहोरात्र का पूर्व भाग (दिन को) ही उत्तम माना गया है, जिसके विपल 10800 हैं, अतः उस शुभ कर्म में 108 मनकों की माला को प्रधानता देना भी तर्क संगत और वैज्ञानिक दृष्टि से उचित है । किसी भी मंत्र भी हजार अथवा लाख संख्या की गणना माला द्वारा ही संभव है । इसके लिए 108 मनकों की माला सर्वश्रेष्ठ मानी गई है ।

3. करमाला जप :- हाथ की उंगलियों के पोरवों (पर्वो) पर जो जप किया जाता है, उसे “करमाला जप” कहते हैं । नित्य सामान्यतः बिना माला के भी जप किया जा सकता है, किन्तु विशिष्ट कार्य या अनुष्ठान-प्रयोग हेतु माला प्रयोग में लाई जाती है ।

माला संबंधी सावधानी :- माला फेरते समय निम्न सावधानियां बरतनी आवश्यक हैं कि माला सदा दाहिने हाथ में रखनी चाहिए । गोमुखी में रखकर या वस्त्र से ढककर ही जप करें। माला भूमि पर नहीं गिरनी चाहिए, उस पर धूल नहीं जमनी चाहिए । माला अंगूठे, मध्यमा व अनामिका से फेरना ठीक है । दूसरी उंगली तर्जनी से भूलकर भी माला नहीं फेरनी चाहिए । (कर्मविशेष छोड़कर)। मनकों पर नाखून नहीं लगने चाहिए । माला में जो सुमेरु होता है, उसे लांघना नहीं चाहिए ।  यदि दुबारा माला फेरनी हो तो वापस माला बदलकर फेरें । मनके फिराते समय सुमेरु भूमि का कभी स्पर्श न करें । इस बात के प्रति सदा सावधान रहना चाहिए ।

मेरे और लेख देखें :- astroguruji.in एवं aapkabhavishya.in पर।

​ज्योतिष रोग और उपाय

Dr.R.B.Dhawan

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर बीमारी का समबन्ध किसी न किसी ग्रह से है, जो आपकी कुंडली में या तो कमजोर है, या फिर दुसरे ग्रहों से बुरी तरह पीड़ित है। यहाँ इस लेख में मैं सभी रोगों की चर्चा नहीं कर पाऊंगा, इसके लिए मेरी पुस्तक “रोग एवं ज्योतिष” का अध्ययन करने की सलाह दूंगा। यहां केवल सामान्य रोग जो आजकल बहुत से लोगों को हैं, उन्ही की चर्चा संक्षेप में करने की कोशिश करता हूँ। यदि स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है तो, आज धनवान कोई नहीं है, हर किसी को कोई न कोई रोग होता ही है। हर व्यक्ति के शरीर की संरचना अलग होती है। किसे कब क्या कष्ट होगा? यह तो डाक्टर भी नहीं बता सकता, परन्तु ज्योतिष इसकी पूर्वसूचना अवश्य दे देता है कि जातक कब और किस रोग से पीड़ित हो सकता है, या क्या व्याधि आपको शीघ्र प्रभावित करने वाली है। आईये ग्रहों की कमजोर स्थिति से कौन कौन से रोग हो सकते हैं जाने :-

सूर्य से संबंधित रोग  :-

सूर्य ग्रहों का राजा है, इसलिए यदि सूर्य आपका बलवान है तो बीमारियाँ कुछ भी हों आप कभी परवाह नहीं करेंगे, क्योंकि आपकी आत्मा बलवान होगी, और आप में आत्मबल भरपूर होगा। आप शरीर की मामूली व्याधियों की परवाह नहीं करेंगे। परन्तु सूर्य अच्छा नहीं है, कमजोर है तो, सबसे पहले आपके बाल झड़ेंगे, सर में दर्द अक्सर होगा और आपको अक्सर दर्द-निवारक का सहारा लेना ही पड़ेगा।

चन्द्रमा से सम्बन्धित रोग :-

चन्द्रमा संवेदनशील लोगों का अधिष्ठाता ग्रह है। यदि चन्द्रमा दुर्बल हुआ तो मन कमजोर होगा, और जातक भावुक अधिक होगा, कठोरता से तुरंत प्रभावित हो जाता है, और उसमें सहनशक्ति भी कम होगी। इसके बाद सर्दी जुकाम और खांसी कफ जैसी व्याधियों से शीग्र प्रभावित हो जायेगा, एसे लोगों को सलाह है कि संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में न आयें क्योंकि उनको भी संक्रमित होते देर नहीं लगेगी। चन्द्रमा अधिक कमजोर होने से नजला से पीड़ित होंगे, चन्द्रमा की वजह से नर्वस सिस्टम भी प्रभावित होता है।

मंगल से सम्बन्धित रोग :-

मंगल रक्त में ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है, परन्तु जिनका मंगल कमजोर होता है, रक्त की बीमारियों के अतिरिक्त जोश की कमी होगी। ऐसे व्यक्ति हर काम को धीरे-धीरे करेंगे, आपने देखा होगा कुछ लोग हमेशा सुस्त दिखाई देते हैं, और हर काम को भी उस ऊर्जा से नहीं कर पाते, अधिक खराब मंगल से चोट चपेट और एक्सीडेंट आदि का खतरा भी बना रहता है।

बुध से सम्बन्धित रोग :-

अच्छा बुध वाक्-चातुर्य और व्यक्ति को चालाक बनाता है, और कमजोर बुध बुद्धू या धूर्त बनाता है, आज के समय में यदि आप में वाक्-चातुर्य नहीं है तो दुसरे लोग आपका हर दिन फायदा उठाएंगे। भोले भाले लोगों का बुध अवश्य कमजोर होता है। अधिक खराब बुध से व्यक्ति को एलर्जी व चमड़ी के रोग अधिक होते हैं, नर्वसनेस, साँस की बीमारियाँ बुध के दूषित होने से होती हैं। बेहद खराब बुध से व्यक्ति के फेफड़े खराब होने का भय रहता है। व्यक्ति हकलाता है तो भी बुध के कारण और गूंगा बहरापन भी बुध के कारण ही होता है।

बृहस्पति से सम्बन्धित रोग :-

बृहस्पति जातक को ज्ञान देता है, विद्वान बनाता है, बुद्धिमान बनता है, परन्तु पढ़े लिखे लोग यदि मूर्खों जैसा व्यवहार करें तो, समझ लीजिये कि इस व्यक्ति का बृहस्पति कुंडली में खराब है। बृहस्पति सोचने समझने की शक्ति को प्रभावित करता है, और व्यक्ति जडमति हो जाता है। इसके अतिरिक्त बृहस्पति कमजोर होने से पीलिया या पेट के अन्य रोग होते हैं। बृहस्पति यदि दुष्ट ग्रहों से प्रभावित होकर लग्न को प्रभावित करता है तो, मोटापा देता है। अधिकतर लोग जो शरीर से काफी मोटे होते हैं, उनकी कुंडली में गुरु की स्थिति कुछ ऐसी ही होती है।

शुक्र से सम्बन्धित रोग :-

शुक्र मनोरंजन तथा एशो-आराम का कारक ग्रह है। शुक्र स्त्री, यौन सुख, वीर्य और हर प्रकार के सुख और सुन्दरता का कारक ग्रह है। यदि शुक्र की स्थिति कमजोर हो तो, जातक के जीवन से सुख के साधन तथा मनोरंजन को समाप्त कर देता है। नपुंसकता या सेक्स के प्रति अरुचि का कारण अधिकतर शुक्र ही होता है। मंगल की दृष्टि या प्रभाव निर्बल शुक्र पर हो तो, जातक को ब्लड शुगर हो जाती है। इसके अतिरिक्त शुक्र के अशुभ होने से व्यक्ति के शरीर को बेडोल बना देता है। बहुत अधिक पतला शरीर या ठिगना कद शुक्र की अशुभ स्थिति के कारण होते हैं।

शनि से सम्बन्धित रोग :-

शनि दर्द या दुःख का करता  ग्रह है, जितने प्रकार की शारीरिक व्याधियां हैं, उनके परिणामस्वरूप व्यक्ति को जो दुःख और कष्ट प्राप्त होता है, उसका कारक शनि होता है। शनि का प्रभाव दुसरे ग्रहों पर हो तो शनि उसी ग्रह से सम्बन्धित रोग देता है। शनि की दृष्टि सूर्य पर हो तो जातक कुछ भी कर ले सर दर्द कभी पीछा नहीं छोड़ता। चन्द्र पर हो तो जातक को नजला-जुकाम रहता है। मंगल पर हो तो, रक्त में न्यूनता या ब्लडप्रेशर, बुध पर हो तो नपुंसकता, गुरु पर हो तो मोटापा, शुक्र पर हो तो वीर्य के रोग या प्रजनन क्षमता को कमजोर करता है, और राहू पर शनि के प्रभाव से जातक को उच्च और निम्न रक्तचाप दोनों से पीड़ित    होना पड़ता है। केतु पर शनि के प्रभाव से जातक को गम्भीर रोग होते हैं, परन्तु कभी रोग का पता नहीं चलता, और एक उम्र निकल जाती है, पर बीमारियों से जातक जूझता रहता है। दवाई असर नहीं करती, और अधिक विकट स्थिति में लाइलाज रोग शनि ही आकर देता है |

राहू से सम्बन्धित रोग:-

राहू एक रहस्यमय ग्रह है, इसलिए राहू से जातक को जो रोग होंगे वह भी रहस्यमय ही होते हैं। एक के बाद दूसरी तकलीफ राहू से ही होती है। राहू अशुभ हो तो जातक की दवाई चलती रहती है, और डाक्टर के पास आना जाना लगा रहता है। किसी दवाई से रिएक्शन या एलर्जी राहू से ही होती है। यदि डाक्टर पूरी उम्र के लिए दवाई निर्धारित कर दे तो वह राहू के अशुभ प्रभाव से ही होती है। वहम यदि एक बीमारी है तो यह राहू देता है। डर के मारे हार्ट-अटैक राहू से ही होता है। अचानक हृदय गति रुक जाना या स्ट्रोक राहू से ही होता है।

केतु से सम्बन्धित रोग :-

केतु का संसार अलग है। यह जीवन और मृत्यु से परे है। जातक को यदि केतु से कुछ होना है तो, उसका पता देर से चलता है, यानी केतु से होने वाली बीमारी का पता चलना मुश्किल हो जाता है। केतु थोडा सा खराब हो तो, फोड़े फुंसियाँ देता है, और यदि थोडा और खराब हो तो, घाव जो देर तक न भरे वह केतु की वजह से ही होता है। केतु मनोविज्ञान से सम्बन्ध रखता है। ऊपरी असर या भूत-प्रेत बाधा केतु के कारण ही होती है। असफल इलाज के बाद दुबारा इलाज केतु के कारण आरंभ होता है।

नोट :- “रोग एवं ज्योतिष” इस सम्बन्ध में गम्भीरता से विचार करके अधिक से अधिक कुंडलियों का अध्ययन करने के पश्चात् यह किताब लिखी है। ज्योतिष के विद्यार्थियों को इस पुस्तक का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।

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​सोमवती अमावस्या

Dr.R.B.Dhawan
सोमवती अमावस्या अर्थात्- सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को ही सोमवती अमावस्या कहते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार सोमवती अमावस्या बड़े भाग्य से पड़ती है। पांडव सोमवती अमावस्या के लिए तरसते रहे, लेकिन उनके जीवन में कभी सोमवती अमावस्या पड़ी ही नहीं। सोमवार का दिन भगवान चन्द्रमा को समर्पित दिन है। भगवान चन्द्रमा को ज्योतिष शास्त्र में मन का कारक माना गया है। अत: इस दिन अमावस्या पड़ने का अर्थ है कि यह दिन मन सम्बन्धी दोषों के समाधान के लिये अति उत्तम है। चूंकि हमारे शास्त्रों में चन्द्रमा को ही समस्त दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों का कारक माना जाता है, अत: पूरे वर्ष में एक या दो बार पड़ने वाले इस दिन का बहुत महत्व है। विवाहित स्त्रियों द्वारा इस दिन अपने पतियों के दीर्घायु की कामना के लिए व्रत का विधान है।

सोमवती अमावस्या एक पर्व के रूप में जाना और माना जाता है, यह कल्याणकारी पर्वो में से एक है, लेकिन सोमवती अमावस्या को अन्य अमावस्याओं से अधिक पुण्य कारक मानने के पीछे भी शास्त्रीय और पौराणिक कारण हैं। सोमवार को भगवान शिव और चंद्रमा का दिन कहा गया है। सोम यानि चंद्रमा! अमावस्या और पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का सोमांश यानि अमृतांश सीधे पृथ्वी पर पड़ता है। शास्त्रों के अनुसार सोमवती अमावस्या पर चंद्रमा का अमृतांश पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पड़ता है।

अमावस्या अमा+वस्या दो शब्दों से मिलकर बना है। शिव महापुराण में इस संधि विच्छेद को भगवान शिव ने माता पार्वती को समझाया था। क्योंकि सोम को अमृत भी कहा जाता है, अमा का अर्थ है एकत्र करना और वस्या वास को कहा गया है। यानि जिसमें सब एक साथ वास करते हों वह अमावस्या अति पवित्र सोमवती अमावस्या कहलाती है। यह भी माना जाता है की सोमवती अमावस्या में भक्तों को अमृत की प्राप्ति होती है।

निर्णय सिंधु व्यास के वचनानुसार इस दिन मौन रहकर स्नान-ध्यान करने से सहस्र गोदान का पुण्य फल प्राप्त होता है। हिन्दु धर्म शास्त्रों में इसे अश्वत्थ प्रदक्षिणा व्रत की भी संज्ञा दी गयी है। अश्वत्थ यानि पीपल वृक्ष। इस दिन पीपल कि सेवा-पूजा, परिक्रमा का अति विशेष महत्व है।

शास्त्रों के अनुसार में पीपल की छाया से, स्पर्श करने से और प्रदक्षिणा करने से समस्त पापों का नाश, अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति और आयु में वृद्धि होती है।

पीपल के पूजन में दूध, दही, मीठा,फल,फूल, जल,जनेऊ जोड़ा चढ़ाने और दीप दिखाने से भक्तों कि सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कहते हैं कि पीपल के मूल में भगवान विष्णु, तने में भगवान शिव जी तथा अग्रभाग में भगवान ब्रह्मा जी का निवास है। इसलिए सोमवार को यदि अमावस्या हो तो, पीपल के पूजन से अक्षय पुण्य, लाभ तथा सौभाग्य की वृद्धि होती है।

इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चन्दन इत्यादि से पूजा और वृक्ष के चारों ओर 108 बार धागा लपेट कर परिक्रमा करने का विधान होता है, और प्रत्येक परिक्रमा में कोई भी एक मिठाई, फल या मेवा चढ़ाने से विशेष लाभ होता है । प्रदक्षिणा के समय 108 फल अलग रखकर समापन के समय वे सभी वस्तुएं ब्राह्मणों और निर्धनों को दान करें। इस प्रक्रिया को कम से कम तीन सोमवती अमावस्या तक करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है और समस्याओं से मुक्ति मिलती है। इस प्रक्रिया से पितृदोष का भी समाधान होता है।

इस दिन जो स्त्री तुलसी व माता पार्वती पर सिन्दूर चढ़ाकर अपनी माँग में लगाती है, वह अखण्ड सौभाग्यवती बनी रहती है। आज के दिन महिलाएँ कपड़ा, गहना, बरतन, अनाज अथवा कोई भी खाने की वस्तु वस्तुयें दान कर सकती हैं, जिससे उनके जीवन में शुभता आती है, समाज में उनके परिवार का नाम होता है, यश मिलता है ।

जिन जातकों की जन्मपत्रिका में घातक कालसर्प दोष है, वे लोग यदि सोमवती अमवस्या पर चांदी के बने नाग-नागिन की विधिवत पूजा करके उन्हे नदीं में प्रवाहित कर दें, भगवान भोले भण्डारी पर कच्चा दूध चढ़ायें, पीपल पर मीठा जल चढ़ाकर उसकी परिक्रमा करें, धूप दीप जलाएं, ब्राह्मणों को यथाशक्ति दान दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद ग्रहण करें तो, उन्हें निश्चित ही कालसर्प दोष से छुटकारा मिलता है।

सोमवती अमावस्या को अत्यंत पुण्य तिथि माना जाता है। मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन किये गए किसी भी प्रकार के उपाय शीघ्र ही फलीभूत होते हैं। सोमवती अमावस्या के दिन उपाय करने से मनुष्यों को सभी तरह के शुभ फल प्राप्त होते हैं, अगर उनको कोई कष्ट है तो, उसका शीघ्र ही निराकरण होता है, और उस व्यक्ति तथा उसके परिवार पर आने वाले सभी तरह के संकट टल जाते हैं।

इस दिन जो मनुष्य व्यवसाय में परेशानियां से जूझ रहे हों, वे पीपल वृक्ष के नीचे तिल के तेल का दिया जलाकर और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:। मंत्र का जाप करें तो, उनके व्यवसाय में आ रही समस्त रुकावटें दूर हो जायेंगी। सोमवती अमावस्या के पर्व पर अपने पितरों के निमित्त पीपल का वृक्ष लगाने से जातक को सुख-सौभाग्य, संतान, पुत्र, धन की प्राप्ति होती है, और उसके समस्त पारिवारिक क्लेश समाप्त हो जाते हैं।

इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी विशेष महत्व समझा जाता है। कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य निश्चय ही समृद्ध, स्वस्थ और सभी दुखों से मुक्त होगा, ऐसी मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से पितरों कि आत्माओं को शांति मिलती है।

इस दिन पवित्र नदियों, तीर्थों में स्नान, ब्राह्मण भोजन, गौदान, अन्नदान, वस्त्र, स्वर्ण आदि दान का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन गंगा स्नान का भी विशिष्ट महत्त्व है। इस दिन यदि गंगा जी जाना संभव न हो तो प्रात:काल किसी नदी या सरोवर आदि में स्नान करके भगवान शंकर, पार्वती और तुलसी की भक्तिपूर्वक पूजा करें।

सोमवार भगवान शिव जी का दिन माना जाता है और सोमवती अमावस्या तो पूर्णरूपेण शिव जी को समर्पित होती है। इसलिए इस दिन भगवान शिव कि कृपा पाने के लिए शिव जी का अभिषेक करना चाहिए, या प्रभु भोले भंडारी पर बेलपत्र, कच्चा दूध ,मेवे, फल, मीठा, जनेऊ जोड़ा आदि चढ़ाकर ॐ नम: शिवाय का जाप करने से सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है।

मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन सुबह-सुबह नित्यकर्मों से निवृत्त होकर किसी भी शिव मंदिर में जाकर सवा किलो साफ चावल अर्पित करते हुए भगवान शिव का पूजन करें। पूजन के पश्चात यह चावल किसी ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को दान करें। शास्त्रों के अनुसार सोमवती अमवस्या पर शिवलिंग पर चावल चढ़ाकर उसका दान करने से अक्षय पुण्य मिलता है, माँ लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।

शास्त्रों में वर्णित है कि सोमवती अमावस्या के दिन उगते हुए भगवान सूर्य नारायण को गायत्री मंत्र उच्चारण करते हुए अर्घ्य देने से गरीबी और दरिद्रता दूर होगी। यह क्रिया आपको अमोघ फल प्रदान करती है ।

सोमवती अमावस्या के दिन 108 बार तुलसी के पौधे की श्री हरि-श्री हरि अथवा ॐ नमो नारायण का जाप करते हुए परिक्रमा करें, इससे जीवन के सभी आर्थिक संकट निश्चय ही समाप्त हो जाते हैं।

जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, वह यदि गाय को दही और चावल खिलाएं तो उन्हें अवश्य ही मानसिक शांति प्राप्त होगी। इसके अलावा मंत्र जाप, सिद्धि साधना एवं दान कर मौन व्रत को धारण करने से पुण्य प्राप्ति और भगवान का आशीर्वाद मिलता है।

इस दिन स्वास्थ्य, शिक्षा, कानूनी विवाद, आर्थिक परेशानियां और पति-पत्नी सम्बन्धी विवाद के समाधान हेतु किये गये उपाय अवश्य ही सफल होते है ।

इस दिन जो व्यक्ति धोबी, धोबन को भोजन कराता है, सम्मान करता है, दान दक्षिणा देता है, उसके बच्चो को कापी किताबे, फल, मिठाई, खिलौने आदि देता है, उसके सभी मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होते हैं।

इस दिन ब्राह्मण, भांजा और ननद को फल, मिठाई या खाने की सामग्री का दान करना बहुत ही उत्तम फल प्रदान करता है। 

कैसे करें श्राद्ध

Dr.R.B.Dhawan

इस सृष्टि में हर वस्तु अथवा प्राणी का जोड़ा है, जैसे – रात और दिन, अँधेरा और उजाला, सफ़ेद और काला, अमीर और गरीब अथवा नर और नारी इत्यादि बहुत गिनवाये जा सकते हैं । सभी वस्तुएं अपने जोड़े से सार्थक हैं अथवा एक-दूसरे के पूरक है। दोनों एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं । इसी तरह दृश्य और अदृश्य जगत का भी जोड़ा है। दृश्य जगत वो है जो हमें दिखता है, और अदृश्य जगत वो है, जो हमें नहीं दिखता। ये भी एक-दूसरे पर निर्भर है और एक-दूसरे के पूरक हैं। पितृ-लोक भी अदृश्य जगत का हिस्सा है, और अपनी सक्रियता के लिये दृश्य जगत के श्राद्ध पर निर्भर है । 

पौराणिक मान्यताओं और धर्मग्रंथों के अनुसार मृतक श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं, तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा ही चुकाया जा सकता है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।

पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है। इसी दिन से महालय (श्राद्ध पक्ष) का प्रारंभ भी माना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जा सके। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर प्रसन्न रहते हैं। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।

श्राद्ध के दिनों में पितरों को आशा रहती है कि, हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्डदान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य करने के लिए कहा गया है। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि, पितरों को श्रद्धा पूर्वक पिण्डदान pind-daan करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्यादि की प्राप्ति करता है। यही नहीं, पितरों की कृपा से ही उसे सब प्रकार की समृद्धि, सौभाग्य, राज्य तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। आश्विन मास के पितृ पक्ष में पितरों को आशा रहती है कि, हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्डदान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। यही आशा लेकर वे पितृलोक से पृथ्वी लोक पर आते हैं। अतएवं प्रत्येक सनातन सद्गृहस्थ का धर्म है कि वह पितृपक्ष pitra-paksh में अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध एवं तर्पण अवश्य करें, तथा अपनी शक्ति के अनुसार फल-मूल जो भी सम्भव हो, पित्तरों के निमित्त प्रदान करें। यदि इस पक्ष में उन्हें पिण्डदान pind daan या तिलांजलि आदि नहीं मिलती है तो वे शाप देकर जाते हैं। पितृपक्ष पितरों के लिये पर्व का समय है, अतएवं इस पक्ष में श्राद्ध अवश्य किया जाना चाहिये।

श्राद्ध में पंचबली आवश्यक है :- 

इस पक्ष में पितृ की मृत्यु तिथि को जलमिश्रित तिल से तर्पण, ब्राह्मण-भोजन तथा पंचबली आवश्यक हैं। बहुत से सज्जन जल-तिल से तर्पण तथा ब्राह्मण-भोजन तो करवा देते हैं, परंतु पंचबली नहीं करवाते। अतः श्राद्ध shraadh के दिन जल-तिल तथा ब्राह्मण-भोजन के साथ-साथ ‘पंचबली’ अवश्य करना चाहिये, उसका नियम इस प्रकार है :- श्राद्ध shraadh  के निमित्त भोजन तैयार होने पर एक थाली में पाँच जगह थोड़े-थोड़े सभी प्रकार के भोजन परोसकर हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, चन्दन लेकर निम्नलिखित संकल्प करें- अद्यामुक गोत्र अमुक शर्मा (वर्मा/गुप्तो वा) अहममुकगोत्रस्य मम पितुः (मातुः भ्रातुः पितामहस्य वा) वार्षिक श्राद्धे (महालय श्राद्धे) कृतस्य पाकस्य शुद्ध्यर्थं पंचसूनाजनित दोष परिहारार्थं च पंचबलिदानं करिश्ये।

पंचबलि-विधि :- 

(1) गोबलि (पत्ते पर):- मण्डल के बाहर पश्चिम की ओर निम्नलिखित मंत्र पढ़ते हुए सव्य होकर गोबलि पत्ते पर दें (पंचबली का एक भाग गाय को खिलायें) – ॐ सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पुण्यराशयः। प्रतिगृह्वन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः।। इदं गोभ्यो न मम।

(2) श्वानबलि (पत्ते पर):- जनेऊ को कण्ठी कर निम्नलिखित मंत्र से कुत्तों को बलि दें (पंचबली का यह भाग कुत्ते को खिलायें) – द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोöवौ। ताभ्यामन्नं प्रयच्छामि स्यातामेताव हिंसकौ।। इदं श्वभ्यां न मम। 

(3) काकबलि (पृथ्वी पर):- अपसव्य होकर निम्नलिखित मंत्र पढ़कर कौओं को भूमि पर अन्न दें (पंचबली का यह भाग कौओं के लिये छत पर रख दें)- ॐ ऐन्द्रवारूणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा। वायसाः प्रतिगृह्वन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम्।। इदमन्नं वायसेभ्यो न मम।

(4) देवादिबलि (पत्ते पर):- सव्य होकर निम्नलिखित मंत्र पढ़कर देवता आदि के लिय अन्न दें (पंचबली का यह भाग अग्नि के सपुर्द कर दें) – ॐ देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसंघाः। प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम्।। इदमन्नं देवादिभ्यो न मम।

(5) पिपीलिकादिबलि (पत्ते पर):- इसी प्रकार निम्नांकित मंत्र से चींटी आदि को बलि दें (पंचबली का यह भाग चींटीयों के लिये चींटियों के बिल के पास रख दें)- पिलीलिकाः कीटपतंगकाद्या बुभुक्षिताः कर्मनिबन्धबद्धाः। तेषां हि तृप्त्यर्थमिदं मयान्नं तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु।। इदमन्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम।

पंचबलि देने के बाद एक थाली में सभी रसोई परोसकर अपसव्य और दक्षिणाभिमुख होकर निम्न संकल्प करें- उपर्युक्त संकल्प करने के बाद ‘ॐ इदमन्नम्,’ ‘इमा आपः’, ‘इदमाज्यम्’, ‘इदं हविः’ इस प्रकार बोलते हुये अन्न, जल, घी तथा पुनः अन्न को दाहिने हाथ के अँगूठे से स्पर्श करें। पश्चात् दाहिने हाथ में जल, अक्षत आदि लेकर निम्न संकल्प करें- ब्राह्मण-भोजन का संकल्प – अद्यामुक गोत्र अमुकोऽहं मम पितुः (मातुः वा) वार्षिक श्राद्धे यथासंख्याकान् ब्राह्मणान् भोजयिष्ये। पंचबलि निकालकर कौआ के निमित्त निकाला गया अन्न कौआ को, कुत्ता का अन्न कुत्ता को और सब गाय को देने के बाद निम्नलिखित मंत्र से ब्राह्मणों के पैर धोकर भोजन करायें।

यत् फलं कपिलादाने कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे। तत्फलं पाण्डवश्रेष्ठ विप्राणां पादसेचने।।

इसे बाद उन्हें अन्न, वस्त्र और द्रव्य-दक्षिणा देकर तिलक करके नमस्कार करें। तत्पश्चात् नीचे लिखे वाक्य यजमान और ब्राह्मण दोनों बोलें यजमान – शेषान्नेन किं कर्तव्यम्। (श्राद्ध में बचे अन्न का क्या करूँ?) ब्राह्मण – इष्टैः सह भोक्तव्यम्। (अपने इष्ट-मित्रों के साथ भोजन करें।) इसके बाद अपने परिवार वालों के साथ स्वयं भी भोजन करें तथा निम्न मंत्र द्वारा भगवान् को नमस्कार करें – प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः।

श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है, क्योंकि कई बार विधि पूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं :-

1- श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।

2- श्राद्ध में चांदी के बर्तन का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।

3- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए गए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।

4- ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए, क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं, जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।

5- जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए। पिंडदान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।

6- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं। ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।

7- श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटर सरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।

8- दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है। अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।

9- चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।

10- जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहनी वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।

11- श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।

12- शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग)में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए। धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है। अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।

13- श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं। श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।

14- रात्रि को राक्षसी समय माना गया है। अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए। दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।

15- श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं- गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल। केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है। सोना, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं। इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।

16- तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं। तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।

17- रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं। आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।

18- चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।

19- भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-

1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ।

20- श्राद्ध के प्रमुख अंग :-

तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।

भोजन व पिण्ड दान:- पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।

वस्त्रदान– वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।

दक्षिणा दान-– यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।

21 – श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें। श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।

22- पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।

23- तैयार भोजन में से गाय, कुत्ता कौआ, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें। इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।

24- कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं। पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।

25- ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं। ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।

26- पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए । एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करें या सबसे छोटा। 

भारतीय शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि, पितृगण पितृपक्ष में पृथ्वी पर आते हैं, और 15 दिनों तक पृथ्वी पर रहने के बाद अपने लोक लौट जाते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि, पितृपक्ष के दौरान पितृ अपने परिजनों के आस-पास रहते हैं, इसलिए इन दिनों कोई भी ऐसा काम नहीं करें, जिससे पितृगण नाराज हों। पितरों को खुश रखने के लिए पितृ पक्ष में कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। 

पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मण, जामाता, भांजा, गुरु या नाती को भोजन कराना चाहिए। इससे पितृगण अत्यंत प्रसन्न होते हैं। ब्राह्मणों को भोजन करवाते समय भोजन का पात्र दोनों हाथों से पकड़कर लाना चाहिए, अन्यथा भोजन का अंश राक्षस ग्रहण कर लेते हैं, जिससे ब्राह्मणों द्वारा अन्न ग्रहण करने के बावजूद पितृगण भोजन का अंश ग्रहण नहीं करते हैं। पितृ पक्ष में द्वार पर आने वाले किसी भी जीव-जंतु को मारना नहीं चाहिए बल्कि उनके योग्य भोजन का प्रबंध करना चाहिए। हर दिन भोजन बनने के बाद एक हिस्सा निकालकर गाय, कुत्ता, कौआ अथवा बिल्ली को देना चाहिए। मान्यता है कि इन्हें दिया गया भोजन सीधे पितरों को प्राप्त हो जाता है। शाम के समय घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर पितृगणों का ध्यान करना चाहिए। 

सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार जिस तिथि को जिसके पूर्वज गमन करते हैं, उसी तिथि को उनका श्राद्ध करना चाहिए। इस पक्ष में जो लोग अपने पितरों को जल देते हैं, तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं, उनके समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं। जिन लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए पितृ पक्ष में कुछ विशेष तिथियां भी निर्धारित की गई हैं, जिस दिन वे पितरों के निमित्त श्राद्ध कर सकते हैं। 

आश्विन कृष्ण प्रतिपदा: इस तिथि को नाना-नानी के श्राद्ध के लिए सही बताया गया है। इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि याद न हो, तो आप इस दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं। 

पंचमी: जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाना चाहिए। 

नवमी: सौभाग्यवती यानि पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गई हो, उन स्त्रियों का श्राद्ध नवमी को किया जाता है। यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है। इसलिए इसे मातृनवमी भी कहते हैं। मान्यता है कि, इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है। 

एकादशी और द्वादशी: एकादशी में वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध करते हैं। अर्थात् इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है, जिन्होंने संन्यास लिया हो। 

चतुर्दशी: इस तिथि में शस्त्र, आत्म-हत्या, विष और दुर्घटना यानि जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध किया जाता है, जबकि बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को करने के लिए कहा गया है। 

सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या: किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं, या पितरों की तिथि याद नहीं है, तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्र अनुसार, इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है। यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो, उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिए। बाकी तो जिनकी जो तिथि हो, श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए, यही उचित भी है।

पिंडदान करने के लिए:  सफेद या पीले वस्त्र ही धारण करें। जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं, वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं।

विशेष: श्राद्ध कर्म करने वालों को निम्न मंत्र तीन बार अवश्य पढ़ना चाहिए। यह मंत्र ब्रह्मा जी द्वारा रचित आयु, आरोग्य, धन, लक्ष्मी प्रदान करने वाला अमृतमंत्र है- 

देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिश्च एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत ।।            (वायु पुराण)

श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें। प्रातः एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। हमारे धर्म-ग्रंथों में पितरों को देवताओं के समान संज्ञा दी गई है। सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ के अनुसार चंद्रमा की ऊधर्व कक्षा में पितृलोक है, जहां पितृ रहते हैं। पितृ लोक को मनुष्य लोक से आंखों द्वारा नहीं देखा जा सकता। जीवात्मा जब इस स्थूल देह से पृथक होती है, उस स्थिति को मृत्यु कहते हैं। यह भौतिक शरीर 27 तत्वों के संधान से बना है। स्थूल पंच महाभूतों एवं स्थूल कर्मेन्द्रियों को छोड़ने पर अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी 17 तत्वों से बना हुआ सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है। 

सनातन मान्यताओं के अनुसार एक वर्ष तक प्रायः सूक्ष्म जीव को नया शरीर नहीं मिलता। मोहवश वह सूक्ष्म जीव स्वजनों व घर के आसपास भ्रमण करता रहता है। श्राद्ध कार्य के अनुष्ठान से सूक्ष्म जीव को तृप्ति मिलती है, इसीलिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। अगर किसी के कुंडली में पितृदोष है, और वह इस श्राद्ध पक्ष में अपनी कुंडली के अनुसार उचित निवारण करते हैं तो, जीवन की बहुत सी समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं। योग्य ब्राह्मण द्वारा ही श्राद्ध कर्म पूर्ण करवाये जाने चाहिएं।

ऐसा कुछ भी नहीं है कि, इस अनुष्ठान में ब्राह्मणों को जो भोजन खिलाया जाता है, वही पदार्थ ज्यों का त्यों उसी आकार, वजन और परिमाण में मृतक पितरों को मिलता है। वास्तव में श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध में दिए गए भोजन का सूक्ष्म अंश परिणत होकर, उसी अनुपात व मात्रा में प्राणी को मिलता है, जिस योनि में वह प्राणी इस समय है।

पितृ लोक में गया हुआ प्राणी श्राद्ध में दिए हुए अन्न का स्वधा रूप में परिणत भाग को प्राप्त करता है। यदि शुभ कर्म के कारण मर कर पिता देवता बन गया हो तो, श्राद्ध में दिया हुआ अन्न उसे अमृत में परिणत होकर देवयोनि में प्राप्त होगा। गंधर्व बन गया हो तो, वह अन्न अनेक भोगों के रूप में प्राप्त होता है। पशु बन जाने पर घास के रूप में परिवर्तित होकर उसे तृप्त करता है। यदि नाग योनि में है तो, श्राद्ध का अन्न वायु के रूप में तृप्ति देता है। दानव, प्रेत व यक्ष योनि मिलने पर श्राद्ध का अन्न नाना प्रकार के अन्न पान और भोग्य रसादि के रूप में परिणत होकर प्राणी को तृप्त करता है। अगर किसी की जन्मकुंडली में पितृदोष है तो, जन्म कुंडली के अनुसार उचित उपाय करें। 

सरल तर्पण विधि :–

श्रीगुरुभ्यो नमः श्री गुरुचरणेभ्यो ॥ श्री गणेशाय नमः ॥ 

शौच एवं स्नान के बाद शुद्ध वस्त्र पहन कर, एक जोड़ा शुद्ध यज्ञोपवीत धारण किये हुए हो। बायें कंधे पर एक गमछा लिए हो, उत्तर या पूर्वोत्तर दिशा की ओर मुख कर के आसन पर बैठ कर मार्जन करें, मार्जन के विनियोग का मन्त्र पढ़कर जल छोड़े (विनियोग का जल छोटी-चम्मच से छोड़े जिसे आचमनी कहते हैं। 

ॐ अपवित्रः पवित्रो वेत्यस्य वामदेव ऋषिः, विष्णुर्देवता,गायत्रीच्छन्दः, हृदि पवित्रकरणे विनियोगः।

मार्जन का मन्त्र पढ़कर अपने शरीर एवं सामग्री पर जल छिड़के (तीन कुश या तीन अँगुलियों से) –

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।

यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

आसन पवित्र करने के मंत्र का विनियोग पढ़कर जल गिराए –

ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतलं छन्दः, कूर्मो देवता, आसन पवित्रकरणे विनियोगः।

अब आसन पर जल छिड़क कर दायें हाथ से उसका स्पर्श करते हुए आसन पवित्र करने का मंत्र पढ़े –

ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका देवि! त्वं विष्णुना धृता।

त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु चासनम्॥

अब अपनी सम्प्रदाय की मर्यादा के अनुसार तिलक करें, अन्यथा  त्रायुषं जमदग्नेः कह कर ललाट में तिलक करें (कश्यपस्य त्र्यायुषम्इ) इस मंत्र से गले में, यद्देवेषु त्र्यायुषम् इस मंत्र से दोनों भुजाओं के मूल में और तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम् इस मंत्र से हृदय में भस्म लगाए)।

आचमन :–

ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः – इन तीनों मंत्रो को पढ़कर प्रत्येक मंत्र से एक बार, कुल तीन बार जल से आचमन करें। ॐ गोविन्दाय नमः बोलते हुए हाथ धो लें।

ॐ हृषीकेशाय नमः बोल कर दायें हाथ के अँगूठे से मूल भाग से दो बार ओठ पोंछ ले। तत्पश्चात् भीगी हुई अंगुलियों से मुख आदि का स्पर्श करें। मध्यमा-अनामिका से मुख, तर्जनी-अंगुष्ठ से नासिका, मध्यमा-अंगुष्ठ से नेत्र, अनामिका-अंगुष्ठ से कान, कनिष्ठका-अंगुष्ठ से नाभि, दाहिने हाथ से हृदय, पाँचों अंगुलियों से सिर, पाँचों अंगुलियों से दाहिनी बाँह और बायीं बाँह का स्पर्श करें।

तर्पण विधि :- 

(देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणविधि) प्रातःकाल संध्योपासना करने के पश्चात् बायें और दायें हाथ की अनामिका अङ्गुलि में पवित्र धारण करें।

ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्।। इस मन्त्र को पढते हुए पवित्री (पैंती) धारण करें । 

फिर हाथ में त्रिकुश, यव, अक्षत और जल लेकर निम्नाङ्कित रूप से संकल्प पढें :-  विष्णवे नम: ३। हरि: ॐ तत्सदद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्न: अमुकशर्मा (वर्मा, गुप्त:) अहं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं देवर्पिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये । 

तीन कुश ग्रहण कर निम्न मंत्र को तीन बार कहें- 

ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।

नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमोनमः।

तदनन्तर एक ताँवे अथवा चाँदी के पात्र में श्वेत चन्दन, जौ, तिल, चावल, सुगन्धित पुष्प और तुलसीदल रखें, फिर उस पात्र के ऊपर एक हाथ या प्रादेशमात्र लम्बे तीन कुश रखें, जिनका अग्रभाग पूर्व की ओर रहे । इसके बाद उस पात्र में तर्पण के लिये जल भर दें । फिर उसमें रखे हुए तीनों कुशों को तुलसी सहित सम्पुटाकार दायें हाथ में लेकर बायें हाथ से उसे ढँक लें और निम्नाङ्कित मन्त्र पढते हुए देवताओं का आवाहन करें:- ॐ विश्वेदेवास ऽआगत श्रृणुता म ऽइम, हवम् । एदं वर्हिनिषीदत ॥   (शु० यजु० ७।३४) 

‘हे विश्वेदेवगण ! आप लोग यहाँ पदार्पण करें, हमारे प्रेमपूर्वक किये हुए इस आवाहन को सुनें और इस कुश के आसन पर विराजमान हों ।

विश्वेदेवा: श्रृणुतेम, हवं मे ये ऽअन्तरिक्षे य ऽउप द्यवि ष्ठ ।येऽअग्निजिह्वाऽउत वा यजत्राऽआसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयद्ध्वम् ॥

(शु० यजु० ३३।५३)

‘हे विश्वेदेवगण ! आपलोगोंमें से जो अन्तरिक्ष में हों, जो द्य्लोक (स्वर्ग) के समीप हों तथा अग्नि के समान जिह्वावाले एवं यजन करने योग्य हों, वे सब हमारे इस आवाहन को सुनें और इस कुशासन पर बैठकर तृप्त हों ।

आगच्छन्तु महाभागा ब्रह्माण्डोदर वर्तिनः । 

ये यत्र  विहितास्तत्र सावधाना भवन्तु ते ॥ 

इस प्रकार आवाहन कर कुश का आसन दें और उन पूर्वाग्र कुशों द्वारा दायें हाथ की समस्त अङ्गुलियों के अग्रभाग अर्थात् देवतीर्थ से ब्रह्मादि देवताओं के लिये पूर्वोक्त पात्र में से एक-एक अञ्जलि तिल चावल-मिश्रित जल लेकर दूसरे पात्र में गिरावें और निम्नाङ्कित रूप से उन-उन देवताओं के नाम मन्त्र पढते रहें :-

देवतर्पण :-

ॐ ब्रह्मा तृप्यताम् । ॐ विष्णुस्तृप्यताम् । ॐ रुद्रस्तृप्यताम् । ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम् । ॐ देवास्तृप्यन्ताम् । ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम् । ॐ वेदास्तृप्यन्ताम् । ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम् । ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम् । ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम् । ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम् । ॐ संवत्सररू सावयवस्तृप्यताम् । ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम् । ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम् । ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम् । ॐ नागास्तृप्यन्ताम् । ॐ सागरास्तृप्यन्ताम् । ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम् । ॐ सरितस्तृप्यन्ताम् । ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम् । ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम् । ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम् । ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम् । ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम् । ॐ भूतानि तृप्यन्ताम् । ॐ पशवस्तृप्यन्ताम् । ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम् । ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम् । ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम् ।

ऋषितर्पण :- इसी प्रकार निम्नाङ्कित मन्त्रवाक्यों से मरीचि आदि ऋषियों को भी एव्क-एक अञ्जलि जल दें :-

ॐ मरीचिस्तृप्यताम् । ॐ अत्रिस्तृप्यताम् । ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम् । ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम् । ॐ पुलहस्तृप्यताम् । ॐ क्रतुस्तृप्यताम् । ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम् । ॐ प्रचेतास्तृप्यताम् । ॐ भृगुस्तृप्यताम् । ॐ नारदस्तृप्यताम् ॥ 

दिव्यमनुष्यतर्पण :-

इसके बाद जनेऊ को माला की भाँति गले में धारण कर अर्थात्  पूर्वोक्त कुशों को दायें हाथ की कनिष्ठिका के मूल-भाग में उत्तराग्र रखकर स्वयं उत्तराभिमुख हो निम्नाङ्कित मन्त्रों को दो-दो बार पढते हुए दिव्य मनुष्यों के लिये प्रत्येक को दो-दो अञ्जलि यवसहित जल प्राजापत्यतीर्थ कनिष्ठिका के मूला-भाग) से अर्पण करें :-    

ॐ सनकस्तृप्यताम् ॥2॥ ॐ सनन्दनस्तृप्यताम् ॥2॥ 

ॐ सनातनस्तृप्यताम् ॥2॥ ॐ कपिलस्तृप्यताम् ॥2॥

ॐ आसुरिस्तृप्यताम् ॥2॥ ॐ वोढुस्तृप्यताम् ॥2॥ 

ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम् ॥2॥ 

दिव्यपितृतर्पण :-

तत्पश्चात उन कुशों को द्विगुण भुग्न करके उनका मूल और अग्रभाग दक्षिण की ओर किये हुए ही उन्हें अंगूठे और तर्जनी के बीच में रखे और स्वयं दक्षिणाभिमुख हो बायें घुटने को पृथ्वी पर रखकर अपसव्यभाव से जनेऊ को दायें कंधेपर रखकर पूर्वोक्त पात्रस्थ जल में काला तिल मिलाकर पितृतीर्थ से अंगुठा और तर्जनी के मध्यभाग से दिव्य पितरों के लिये निम्नाङ्कित मन्त्र-वाक्यों को पढते हुए तीन-तीन अञ्जलि जल दें :-  कव्यवाडनलस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: ॥3॥  

सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: ॥3॥

ॐ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: ॥3॥ 

ॐ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: ॥3॥

ॐ अग्निष्वात्ता: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम: ॥3॥ 

ॐ सोमपा: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम:॥३॥ 

ॐ बर्हिषद: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम: ॥३॥ 

यमतर्पण  :-

इसी प्रकार निम्नलिखित मन्त्र-वाक्यों को पढते हुए चैदह यमों के लिये भी पितृतीर्थ से ही तीन-तीन अञ्जलि तिल सहित जल दें :-

ॐ यमाय नम: ॥3॥ ॐ धर्मराजाय नम: ॥3॥

ॐ मृत्यवे नम: ॥3॥ ॐ अन्तकाय नम: ॥3॥ 

ॐ वैवस्वताय नमः ॥3॥ ॐ कालाय नम: ॥3॥ 

ॐ सर्वभूतक्षयाय नम: ॥3॥ ॐ औदुम्बराय नम: ॥3॥ 

ॐ दध्नाय नम: ॥3॥ ॐ नीलाय नम:॥3॥ 

ॐ परमेष्ठिने नम:॥3॥ ॐ वृकोदराय नम:॥3॥ ॐ चित्राय नम:॥3॥ ॐ चित्रगुप्ताय नम: ॥3॥ 

ततः निम्नाङ्कित मन्त्र से पितरों का आवाहन करें:-

ॐ उशन्तस्त्वा निधीमह्युशन्त: समिधीमहि ।

उशन्नुशत ऽआवह पितृन्हाविषे ऽअत्तवे ॥(शु० यजु० १६।७०) 

‘हे अग्ने ! तुम्हारे यजन की कामना करते हुए हम तुम्हें स्थापित करते हैं । यजन की ही इच्छा रखते हुए तुम्हें प्रज्वलित करते हैं । हविष्य की इच्छा रखते हुए तुम भी तृप्ति की कामनावाले हमारे पितरों को हविष्य भोजन करने के लिये बुलाओ ।

ॐ आयन्तु न: पितर: सोम्यासोऽग्निष्वात्ता: पथिभिर्देवयानै: । अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिव्रुवन्तु तेऽवन्तस्मान् ॥ (शु० यजु० १६।५८) 

हमारे सोमपान करने योग्य अग्निष्वात्त पितृगण देवताओं के साथ गमन करने योग्य मार्गों से यहाँ आवें और इस यज्ञ में स्वाधा से तृप्त होकर हमें मानसिक उपदेश दें तथा वे हमारी रक्षा करें ।

तदनन्तर अपने पितृगणों का नाम-गोत्र आदि उच्चारण करते हुए प्रत्येक के लिये पूर्वोक्त विधि से ही तीन-तीन अञ्जलि तिल-सहित जल इस प्रकार दें :-

अस्मत्पिता (बाप) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यतांम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्पितामह: (दादा) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्प्रपितामह: (परदादा) अमुकशर्मा अमुकसगोत्र आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥३॥

अस्मन्माता अमुकी देवा दा अमुकसगोत्रा वसुरूषा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्पितामही (दादी) अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्प्रपितामही परदादी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जल तस्यै स्वधा नम: ॥३॥

अस्मत्सापत्नमाता सौतेली मा अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥२॥

 इसके बाद निम्नाङ्कित नौ मन्त्रों को पढते हुए पितृतीर्थ से जल गिराता रहे –

ॐ उदीरतामवर ऽउत्परास ऽउन्मध्यमा: पितर: सोम्यास: । असुं य ऽईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥ ( शु० य० १६।४६)

इस लोक में स्थित, परलोक में स्थित और मध्यलोक में स्थित सोमभागी पितृगण क्रम से ऊर्ध्वलोकों को प्राप्त हों । जो वायुरूपको प्राप्त हो चुके हैं, वे शत्रुहीन सत्यवेत्ता पितर आवाहन करनेपर यहाँ उपस्थित हो हमलोगों की रक्षा करें ।

ॐ अङ्गिरसो न: पितरो नवग्वा ऽअथर्वाणो भृगव: सोम्यास: । तेषां वय, सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम । (शु० य० १६।७०) 

अङ्गिरा के कुल में, अथर्व मुनि के वंश में तथा भृगुकुल में उत्पन्न हुए नवीन गतिवाले एवं सोमपान करने योग्य जो हमारे पितर इस समय पितृलोक को प्राप्त हैं, उन यज्ञ में पूजनीय पितरों की सुन्दर बुद्धि में तथा उनके कल्याणकारी मन में हम स्थित रहें । अर्थात् उनकी मन-बुद्धि में हमारे कल्याण की भावना बनी रहे ।

ॐ आयन्तु न: पितर: सोम्यासोऽग्निष्वात्ता:पथिभिर्देवयानै: । अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥ (शु० य० १६।५८) इस मन्त्र का अर्थ पहले (पृष्ठ ३२में) आ चुका है ।

ॐ ऊर्ज्जं वहन्तीरमृतं घृतं पय: कीलालं परिस्त्रुतम् । स्वधास्थ तर्पयत मे पितृन् ॥ (शु० य०।३४)

 हे जल ! तुम स्वादिष्ट अन्न के सारभूत रस, रोग-मृत्यु को दूर करनेवाले घी और सब प्रकार का कष्ट मिटानेवाले दुग्ध का वहन करते हो तथा सब ओर प्रवाहित होते हो, अतएव तुम पितरों के लिये हविःस्वरूप होय इसलिये मेरे पितरों को तृप्त करो ।’ 

ॐ पितृभ्य:स्वधायिभ्य: स्वधा नम: पितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधा नम: प्रपितामहेभ्य: स्वधायिभ्यं: स्वधा नम: । अक्षन्पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृप्यन्त पितर: पितर:शुन्धध्वम् ॥ (शु० य० १६।३६)

स्वधा (अन्न) के प्रति गमन करनेवाले पितरों को स्वधासंज्ञक अन्न प्राप्त हो, उन पितरों को हमारा नमस्कार है । स्वधा के प्रति जानेवाले पितामहों को स्वधा प्राप्त हो, उन्हें हमारा नमस्कार है । स्वधा के प्रति गमन करनेवाले प्रपितामहों को स्वधा प्राप्त हो, उन्हें हमारा नमस्कार है । पितर पूर्ण आहार कर चुके, पितर आनन्दित हुए, पितर तृप्त हुए हे पितरो ! अब आपलोग आचमन आदि करके शुद्ध हों ।

ॐ ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्य याँ  २॥ ऽउ च न प्रविद्द्म । त्वं वेत्थ यति ते जातवेदरू स्वधाभिर्यज्ञ, सुकृतं जुपस्व ॥ (शु० य० १६।६७) 

जो पितर इस लोक में वर्तमान हैं और जो इस लोक में नही किन्तु पितृलोक में विद्यमान हैं तथा जिन पितरों को हम जानते हैं और जिनको स्मरण न होने के कारण नही जानते हैं, वे सभी पितर जितने हैं, उन सबको हे जातवेदा-अग्निदेव ! तुम जानते हो । पितरों के निमित्त दी जानेवाली स्वधा के द्वारा तुम इस श्रेष्ठ यज्ञ का सेवन करो-इसे सफल बनाओ ।

ॐ मधु व्वाता ऽऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धव: । माध्वीन: सन्त्वोषधी: ॥ (शु० य० १३।२७) 

यज्ञ की इच्छा करनेवाले यजमान के लिये वायु मधु पुष्परस-मकरन्द की वर्षा करती है । बहनेवाली नदियाँ मधु के समान मधुर जल का स्नोत बहाती हैं । समस्त ओषधियाँ हमारे लिये मधु-रस से युक्त हों ।’ 

ॐ मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव , रज: ।मधु द्यौरस्तु न पिता ॥ (शु० य० १३।२८) 

हमारे रात-दिन सभी मधुमय हों । पिता के समान पालन करनेवाला द्युलोक हमारे लिये मधुमय-अमृतमय हो । माता के समान पोषण करनेवाली पृथिवी की धूलि हमारे लिये मधुमयी हो

ॐ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँऽ२ ॥ अस्तु सूर्यः ।माध्वीर्गावो भवन्तु न: ॥ (शु० य० १३।२६) 

ॐ मधु । मधु । मधु । तृप्यध्वम् । तृप्यध्वम् । तृप्यध्वम् ।

वनस्पति और सूर्य भी हमारे लिये मधुमान् मधुर रस से युक्त हों । हमारी समस्त गौएँ माध्वी-मधु के समान दूध देनेवाली हों ।’ 

फिर नीचे लिखे मन्त्र का पाठमात्र करे– 

ॐ नमो व: पितरो रसाय नमो व: पितर: शोषाय नमो व: पितरो जीवाय नमो वर: पितर: स्वधायै नमो व: पितरो घोराय नमो व: पितरो मन्यवे नमो वर: पितर: पितरो नमो वो गृहान्न:पितरो दत्त सतो व: पितरो देष्मैतद्व: पितरो व्वास ऽआधत्त ॥ (शु० य० २।३२) 

‘हे पितृगण । तुमसे सम्बन्ध रखनेवाली रसस्वरूप वसन्त-ऋतु को नमस्कार है, शोषण करनेवली ग्रीष्म-ऋतु को नमस्कार है, जीवन-स्वरूप वर्षा-ऋतु को नमस्कार है, स्वधारूप शरद-ऋतु को नमस्कार है, प्राणियों के लिये घोर प्रतीत होनेवाली हेमन्त-ऋतु को नमस्कार है, क्रोधस्वरूप शिशिर-ऋतु को नमस्कार है । अर्थात् तुमसे सम्बन्ध रखनेवाली सभी ऋतुएँ तुम्हारी कृपा से सर्वथा अनुकूल होकर सबको लाभ पहुँचानेवाली हों । हे षडऋतुरूप पितरो ! तुम हमें साध्वी पत्नी और सत्पुत्र आदि से युक्त उत्तम गृह प्रदान करो । हे पितृगण ! इन प्रस्तुत दातव्य वस्तुओं को हम तुम्हें अर्पण करते हैं, तुम्हारे लिये यह सूत्ररूप वस्त्र है, इसे धारण करो ।’ द्वितीयगोत्रतर्पण इसके बाद द्वितीय गोत्र मातामह आदि का तर्पण करे, यहाँ भी पहले की ही भाँति निम्नलिखित वाक्यों को तीन-तीन बार पढकर तिलसहित जल की तीन-तीन अञ्जलियाँ पितृतीर्थ से दे ।

अस्मन्मातामह: नाना अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं गङ्गाजलं वा तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्प्रमातामह: परनाना अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मद्वृद्धप्रमातामह: बूढे परनाना अमुकशर्मा अमुकसगोत्र आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥३॥ 

अस्मन्मातामही नानी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्प्रमातामही परनानी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥३॥ 

अस्मद्वृद्धप्रमातामही बूढी परनानी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥३॥ 

पत्न्यादितर्पण अस्मत्पत्नी भार्या अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥१॥ 

अस्मत्सुतरू बेटा अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्कन्या बेटी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥१॥ 

अस्मत्पितृव्य: पिता के भाई अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥

अस्मन्मातुल: मामा अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मद्भ्राता अपना भाई अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्सापत्नभ्राता सौतेला भाई अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥३॥ 

अस्मत्पितृभगिनी बूआ अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥१॥ 

अस्मन्मातृभगिनी मौसी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥१॥ 

अस्मदात्मभगिनी अपनी बहिन अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥१॥ 

अस्मत्सापत्नभगिनी सौतेली बहिन अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥१॥

अस्मच्छवशुर: श्वशुर अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥

अस्मद्गुरु: अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मदाचार्यपत्नी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥२॥ 

अस्मच्छिष्य: अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्सखा अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥

अस्मदाप्तपुरुष: अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

इसके बाद सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो नीचे लिखे श्लोकों को पढते हुए जल गिरावे—  

देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसा: । 

पिशाचा गुह्यका: सिद्धा: कूष्माण्डास्तरव: खगा: ॥ 

जलेचरा भूमिचराः वाय्वाधाराश्च जन्तव: । 

प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला: ॥

 नरकेषु समस्तेपु यातनासु च ये स्थिता: ।

 तेषामाप्ययनायैतद्दीयते सलिलं मया ॥

 येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा: ।

 ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङ्क्षिण: ॥ 

देवता, असुर , यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्मक, सिद्ध, कूष्माण्ड, वृक्षवर्ग, पक्षी, जलचर जीव और वायु के आधार पर रहनेवाले जन्तु-ये सभी मेरे दिये हुए जल से भीघ्र तृप्त हों । जो समस्त नरकों तथा वहाँ की यातनाओं में पङेपडे दुरूख भोग रहे हैं, उनको पुष्ट तथा शान्त करने की इच्छा से मैं यह जल देता हूँ । जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में बान्धव रहे हों, अथवा किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सब तथा इनके अतिरिक्त भी जो मुम्कसे जल पाने की इच्छा रखते हों, वे भी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हों ।’

ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवषिंपितृमानवा: । 

तृप्यन्तु पितर: सर्वे मातृमातामहादय: ॥

अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम् ।

आ ब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम् ॥ 

येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा: ।

ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा ॥ 

ब्रह्माजो  से लोकर कीटों तक जितने जीव हैं, वे तथा देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और माता, नाना आदि पितृगण-ये सभी तृप्त हों मेरे कुल की बीती हुई करोडों पीढियों में उत्पन्न हुए जो-जो पितर ब्रह्मलोकपर्यम्त सात द्रीपो के भीतर कहीं भी निवास करते हों, उनकी तृप्ति के लिये मेरा दिया हुआ यह तिलमिश्रित जल उन्हें प्राप्त हो जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में या किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सभी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हो जायँ वस्त्र-निष्पीडन तत्पश्चात् वस्त्र को चार आवृत्ति लपेटकर जल में डुबावे और बाहर ले आकर निम्नाङ्कित मन्त्र को पढते हुए अपसव्य-होकर अपने बाएँ भाग में भूमिपर उस वस्त्र को निचोड़े । 

पवित्रक को तर्पण किये हुए जल मे छोड दे । यदि घर में किसी मृत पुरुष का वार्षिक श्राद्ध आदि कर्म हो तो वस्त्र-निष्पीडन नहीं करना चाहिये । 

वस्त्र-निष्पीडन का मन्त्र यह है :-

ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः ।

ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम् ॥ 

भीष्मतर्पण :-

 इसके बाद दक्षिणाभिमुख हो पितृतर्पण के समान ही अनेऊ अपसव्य करके हाथ में कुश धारण किये हुए ही बालब्रह्मचारी भक्तप्रवर भीष्म के लिये पितृतीर्थ से तिलमिश्रित जल अके द्वारा तर्पण करे । .   

उनके लिये तर्पण का मन्त्र निम्नाङ्कित श्लोक है:-

 वैयाघ्रपदगोत्राय साङ्कृतिप्रवराय च । 

गङ्गापुत्राय भीष्माय प्रदास्येऽहं तिलोदकम् । 

अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्मवर्मणे ॥

अर्घ्य दान फिर शुद्ध जल से आचमन करके प्राणायाम करे ।

 तदनन्तर यज्ञोपवीत सव्य कर बाएँ कंधेपर करके एक पात्र में शुद्ध जल भरकर उसके मध्यभाग में अनामिका से षडदल कमल बनावे और उसमें श्वेत चन्दन, अक्षत, पुष्प तथा तुलसीदल छोड दे । फिर दूसरे पात्र में चन्दल से षडदल-कमल बनाकर उसमें पूर्वादि दिशा के क्रम से ब्रह्मादि देवताओं का आवाहन-पूजन करे तथा पहले पात्र के जल से उन पूजित देवताओं के लिये अर्ध्य अर्पण करे । 

 अर्ध्यदान के मन्त्र निम्नाङ्कित हैं :-

ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमत: सुरुचो व्वेन ऽआव: । स बुध्न्या ऽउपमा ऽअस्य व्विष्ठा: सतश्च योनिमसतश्व व्विव: ॥ (शु० य० १३।३) ॐ ब्रह्मणे नम:। ब्रह्माणं पूजयामि ॥ 

‘सर्वप्रथम पूर्व दिशा से प्रकट होनेवाले आदित्यरूप ब्रह्मने भूगोल के मध्यभाग से आरम्भ करके इन समस्त सुन्दर कान्तिबाले लोकों को अपने प्रकाश से व्यक्त किय है तथा वह अत्यन्त कमनीय आदित्य इस जगत् कि निवासस्थानभूत अवकाशयुक्त दिशाओं को, विद्यमान-मूर्त्तपदार्थ के स्थानों को और अमूर्त्त वायु आदि के उत्पत्ति स्थानों को भी प्रकाशित करता है ।

ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्यपा, सुरे स्वाहा ॥ 

ॐ विष्णवे नम: । विष्णुं पूजयामि ॥ 

सर्वव्यापी त्रिविक्रम वामन अवतारधारी भगवान् विष्णुने इस चराचर जगत् को विभक्त करके अपने चरणों से आक्राम्त किया है । उन्होंने पृथ्वी, आकाश और द्युलोक-इन तीनो स्थानों में अपना चरण स्थापित किया है अथवा उक्त तीनों स्थानों में वे क्रमशरू अग्नि, वायु तथा सूर्यरूप से स्थित हैं ।, इन विष्णु भगवान् के चरण में समस्त विश्व अन्तर्भूत है । इम इनके निमित्त स्वाहा हविष्यदान करते हैं ।

ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽउतो त ऽइषवे नम: । वाहुब्यामुत ते नम: ॥ ॐ रुद्राय नम: । रुद्रं पूजयामि ॥ 

हे रुद्र ! आप के क्रोध और वाण को नमस्कार है तथा आपकी दोनों भुजाओं को नमस्कार हैं ।

ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो न: प्रचोदयात् ॥ ॐ सवित्रे नम: । सवितारं पूजयामि ॥

हस स्थावर-जङ्गमरूप सम्पूर्ण विश्व को उत्पन्न करनेवाले उन निरतिशय प्रकाशमय सूर्यस्वरूप परमेश्वर के भजने योग्य तेज का ध्यान करते हैं, जो कि हमारी बुद्धियों को सत्कर्मों की ओर प्रेरित करते रहते हैं ।

ॐ मित्रस्य चर्षणीधृतोऽवो देवस्य सानसि । द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम् ॥ ॐ मित्राय नम:। मित्रं पूजयामि ॥ 

मनुष्यों का पोषण करनेवाले दीप्तिमान् मित्रदेवता का यह रक्षणकार्य सनातन, यशरूप से प्रसिद्ध, विचित्र तथा श्रवण करने के योग्य है ।

ॐ इमं मे व्वरूण श्रुधी हवमद्या च मृडय ।  त्वामवस्युराचके ॥ ॐ वरुणाय नम: । वरूणं पूजयामि ॥

हे संसार-सागर के अधिपति वरुणदेव ! अपनी रक्षा के लिये मैं आपको बुलाना चाहता हूँ, आप मेरे इल आवाहन को सुनिये और यहाँ शीघ्र पधारकर आज हमें सब प्रकार से सुखी कीजिये ।

फिर भगवान सूर्य को अर्घय दें :-

एहि सूर्य सहस्त्राशों तेजो राशिं जगत्पते।

अनुकम्पय मां भक्त्या गृहणार्घय दिवाकरः। 

हाथों को उपर कर उपस्थापन मंत्र पढ़ें –

चित्रं देवाना मुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरूणस्याग्नेः। 

आप्राद्यावा पृथ्वी अन्तरिक्ष सूर्यआत्माजगतस्तस्थुशश्च। 

फिर परिक्रमा करते हुए दशों दिशाओं को नमस्कार करें :-

ॐ प्राच्यै इन्द्राय नमः। ॐ आग्नयै अग्नयै नमः। ॐ दक्षिणायै यमाय नमः। ॐ नैऋत्यै नैऋतये नमः। ॐ पश्चिमायै वरूणाय नमः। ॐ वाव्ययै वायवे नमः। ॐ उदीच्यै कुवेराय नमः। ॐ ईशान्यै ईशानाय नमः। ॐ ऊधर्वायै ब्रह्मणै नमः। ॐ अवाच्यै अनन्ताय नमः। 

सव्य होकर पुनः देवतीर्थ से तर्पण करें :-

ॐ ब्रह्मणै नमः। ॐ अग्नयै नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ औषधिभ्यो नमः। ॐ वाचे नमः। ॐ वाचस्पतये नमः। ॐ महद्भ्यो नमः। ॐ विष्णवे नमः। ॐ अद्भ्यो  नमः। ॐ अपां  पतये नमः। ॐ वरूणाय नमः। फिर तर्पण के जल को मुख पर लगायें और तीन बार ॐ अच्युताय नमः मंत्र का जप करें।

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