नक्षत्र और वनस्पति

 नक्षत्रों के लिए निर्धारित पेड़ पौधे :-


Dr.R.B.Dhawan

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक नक्षत्र के वृक्षों का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। उपाय की दृष्टि से जो जातक अपने जन्म नक्षत्र के वृक्षों  या पौधों को रोपित करता है, अथवा सींचता है, या उनका भरण पोषण करता है, उसकी आयु के साथ ऐश्वर्य व धन धान्य में भी वृद्धि होती है। ज्योतिष शास्त्र में 27 नक्षत्रों के जो वृक्ष बताए गये है, उसके अनुसार अश्वनी नक्षत्र के लिए कुचला का वृक्ष, भरणी नक्षत्र के लिए आंवला, कृतिका के लिए गूलर व स्वर्णशीरी, मृगशिरा के लिए खैर, आर्द्रा नक्षत्र का वृक्ष बहेडा, रोहणी के लिए जामुन व तुलसी बताया गया है । इसी प्रकार पुनर्वसु नक्षत्र के लिए बांस, पुष्य नक्षत्र के लिए पीपल, अश्लेशा के लिए नागकेसर, मघा के लिए बड़, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के लिए ढाक (पलास) का वृक्ष, तथा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के लिए रूद्राक्ष या पाकर लगाना उपयोगी माना जाता है। 13 वें स्थान के नक्षत्र हस्त में जन्में व्यक्ति रीठा व पाढ का वृक्ष, चित्रा नक्षत्र वाले बेल नारियल, स्वाती के लिए अर्जुन का वृक्ष, विशाखा नक्षत्र के लिए भटकटैया, अनुराधा नक्षत्र के लिए बकुल या मौलश्री, ज्येष्ठा नक्षत्र के लिए चीड़ या देवदारू व लोध का वृक्ष लगा सकते है। इसी प्रकार मूल नक्षत्र के लिए साल का वृक्ष, पूर्वाषाढ़ा के लिए अशोक या जलवेंत, उत्तराषाढा नक्षत्र के लिए कटहल या फालसा लगायें। श्रवण के लिए आक लगाये, धनिष्ठा नक्षत्र के लिए शमी लगाएं, शतभिषा नक्षत्र के लिए कदम्ब, पूर्वा भाद्रापदा नक्षत्र के लिए आम लगायें, उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र के लिए नीम तथा रेवती नक्षत्र के लिए महुआ का वृक्ष लगाना लाभकारी होता है। 

इस प्रकार सरल उपाय करके एक तरफ जहां हम पर्यावरण संरक्षण में सहायता करेंगे वहीं हम भौतिक, अध्यात्मिक तथा परलौकिक लाभ प्राप्त करने के लिए वृक्षारोपण कर अपने तथा समाज व देश के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे होंगे।

नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़-पौधे :-

1. अश्विनी –            कुचला

2. भरणी–               आंवला 

3. कृतिका –             गूलर

4. रोहिणी –             जामुन 

5. मृगशिरा –            खैर 

6. आर्द्रा–                शीशम 

7. पुनर्वसु –              बांस 

8. पुष्य –                  पीपल 

9. अश्लेषा –             नागकेसर

10. मघा –                  वट

11. पूर्वाफाल्गुनी –      पलास

12. उत्तराफाल्गुनी –    पाकड़

13. हस्त –                  रीठा

14. चित्रा –                 बेल

15. स्वाती-                 अर्जुन

16 विशाखा –            भटकटैया 

17. अनुराधा –            मौलसरी

18. ज्येष्ठा –                चीड़  

19. मूल –                   साल

20. पूर्वाषाढ़ा –            अशोक 

21. उत्तराषाढ़ –           फालसा

22. श्रवण –                मदार 

23. धनिष्ठा –               शमी

24. शतभिषा –            कदम्ब 

25. पूर्वभाद्रपद–          आम

26. उत्तराभाद्रपद –       नीम 

27. रेवती –                 महुआ


बारह राशि के पेड़-पौधे :-

मेष –        आंवला 

वृष –         जामुन

मिथुन –    शीशम

कर्क –       नागकेश्वर

सिंह –       पलास

कन्या –     रीठा

तुला –      अर्जुन

वृश्चिक –  मौलसरी

धनु –      जलवेतस

मकर –     अकोल

कुंभ –       कदम्ब 

मीन –       नीम

ग्रहों के पेड़ -पौधे :-

सूर्य –      अकोल

चन्द्रमा –  पलास

मंगल –    खैर

बुद्ध –     चिरचिरी

गुरु –      पीपल

शुक्र –     गुलड़

शनि –    शमी

राहु –      दुर्वा

केतु –     कुश

ग्रह, राशि, नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़ पौधे का प्रयोग करने से अंतश्चेतना में सकारात्मक सोच का संचार होता है, तत्पश्चात हमारी मनोकामनायें शनै शनै पूरी होती है ।

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तंत्र के रहस्य

तंत्र के रहस्य, सिद्धांत और पंचमकार :-

Dr.R.B.Dhawan

(संकलन)

तंत्र का उल्लेख वैदिक साहित्य में तो नहीं मिलता, परंतु लौकिक साहित्य में अवश्य मिलता है। संभवतः तंत्र की उत्पत्ति वैदिक काल के बाद पौराणिक काल में ही हुई है। तंत्र के प्रधान देव भगवान शिव और भगवति देवी हैं। अनेक योगी आचार्य तंत्राचार्य अथवा अधिकारी नाथ संप्रदाय अथवा “शैव‌ या शाक्त” भी तंत्रालोक के रहस्यों के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता व कुछ सर्जनकार भी हुए हैं। इनमें गुरू मछन्दरनाथ, गुरू गोरक्षनाथ तथा अनेकानेक संस्थापक मठाधीश व तंत्र सम्राट हैं, जिनका नाम आदर से लिया जाता है। आगे की पंक्तियों में पंच-मकार का जो वर्णन दिया जा रहा है, वह कुछ तंत्राचार्यों का मत है, अनेक तंत्राचार्य पंच-मकार का अर्थ अन्य प्रकार से मानते हैं। (मेरा स्वयं का मत भी इस प्रकार के पंच-मकार से भिन्न है।) यहां केवल अघोर पक्ष का मत दिया जा रहा है।

तंत्र में पंचमकार (पांच बार म, म, म, म, म) 1. मद्य, 2. मांस, 3. मत्स्य, 4. मुद्रा और 5. मैथुन। कब, कैसे प्रचलित हुये, और इनका क्या रहस्य है?  साधारणत: यह विश्वास किया जाता है की मंत्र-तंत्र पंचमकार, जादू-टोना, पंचमकार के ही मुख्य अंग हैं। पंचमकार का अर्थ है, जिसमे पांच मकार अर्थात पांच म शब्द से शुरू होने वाले अवयव आयें यथा मांस-मदिरा-मत्स्य-मुद्रा और मैथुन। कौलावली निर्णय में यह मत दिया है की मैथुन से बढ़कर कोई तत्व् नहीं है।, इससे साधक सिद्ध हो जाता है, जबकि केवल मद्य से भैरव ही रह जाता है, मांस से ब्रह्म, मत्स्य से महाभैरव और मुद्रा से साधकों में श्रेष्ठ हो जाता है। केवल मैथुन से ही सिद्ध हो सकता है। इस सम्बन्ध में कुछ बातें ध्यान देने योग्य हैं, प्रथम: पंचमकार का सेवन बौद्धों की बज्रयान शाखा में विकसित हुआ था। इस परंपरा के अनेक सिद्ध, बौद्ध एवं ब्राह्मण परंपरा में सामान रूप से गिने जाते हैं। बज्रयानी चिंतन, व्यवहार और साधना का रूपांतर ब्राह्मण परंपरा में हुआ है, जिसे वामाचार या वाम मार्ग कहते हैं, अतः पंचमकार केवल वज्रयानी साधना और वाम मार्ग में मान्य है। वैष्णव, शौर्य, शैव, शाक्त व गाणपत्य तंत्रों में पंचमकार को कोई स्थान नहीं मिला। काश्मीरी तंत्र शास्त्र में भी वामाचार को कोई स्थान नहीं है। वैष्णवों को छोड़कर शैव व् शाक्त में कहीं कहीं मद्य, मांस व् बलि को स्वीकार कर लिया है, लेकिन मैथुन को स्थान नहीं देते। वाममार्ग की साधना में भी 15-17वीं सदी में वामाचार के प्रति भयंकर प्रतिक्रिया हुई थी। विशेषकर महानिर्वाण तंत्र, कुलार्णव तंत्र, योगिनी तंत्र, शक्ति-संगम तंत्र आदि तंत्रों में पंचमकार के विकल्प या रहस्यवादी अर्थ कर दिए हैं। जैसे मांस के लिए लवण, मत्स्य के लिए अदरक, मुद्रा के लिए चर्वनिय द्रव्य, मद्य के स्थान पर दूध, शहद, नारियल का पानी, मैथुन के स्थान पर साधक का समर्पण या कुंडलिनी शक्ति का सहस्त्रार में विराजित शिव से मिलन। यद्यपि इन विकल्पों में वस्तु भेद है, लेकिन महत्वपूर्ण यह है की वामाचार के स्थूल पंचतत्व शिव-शक्ति की आराधना के उपकरण हैं।

तांत्रिक साधना क्या है? :-

1–वेदाचार

2– वैष्णवाचार 

3–शैवाचार

4–दक्षिणाचार 

5–वामाचार

6–सिद्धान्ताचार

7–कुलाचार

तंत्र शास्त्र के अंतर्गत सात प्रकार के साधना पद्धतियों का प्रचलन या वर्णन प्राप्त होता है, जो दो मुख्य धारणाओं में विभाजित हैं :- प्रथम पश्वाचार या पशु भाव तथा द्वितीय–वीराचार। इसके अतिरिक्त दिव्य-भाव त्रय के अंतर्गत सम्पूर्ण प्रकार के सिद्धि पश्चात जब साधक स्वयं शिव तथा शक्ति के समान हो जाता हैं। पशु भाव के अंतर्गत चार प्रकार के साधन पद्धतियों को समाहित किया गया है जो निम्नलिखित हैं।

1. वेदाचार, 2. वैष्णवाचार, 3. शैवाचार 4. दक्षिणाचार।

1. वेदाचार : तंत्र के अनुसार सर्व निम्न कोटि की उपासना पद्धति वेदाचार हैं, जिसके तहत वैदिक याग-यज्ञादि कर्म विहित हैं।

2. वैष्णवाचार : सत्व गुण से सम्बद्ध, सात्विक आहार तथा विहार, निरामिष भोजन, पवित्रता, व्रत, ब्रह्मचर्य, भजन-कीर्तन इत्यादि कर्म विहित हैं।

3. शैवाचार : शिव तथा शक्ति की उपासना, यम-नियम, ध्यान, समाधि कर्म विहित हैं।

4. दक्षिणाचार : उपर्युक्त तीनों पद्धतियों का एक साथ पालन करते हुए, मादक द्रव्य का प्रयोग विहित हैं।

दक्षिणा-चार (पशु भाव), वीरा-चार तथा कुला-चार (वीर भाव), सिद्धान्ताचार (दिव्य भाव) हैं, भिन्न-भिन्न तंत्रों में दक्षिणा-चार, वीरा-चार तथा कुला-चार, इन तीन प्रकार के पद्धति या आचारों से शक्ति साधना करने का वर्णन प्राप्त होता है। शैव तथा शक्ति संप्रदाय के क्रमानुसार साधन मार्ग निम्नलिखित हैं :-

1. दक्षिणा-चार, पश्वाचार (पशु भाव) ; जिसके अंतर्गत, वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार के कर्म निहित हैं जैसे, दिन में पूजन, प्रातः स्नान, शुद्ध तथा सात्विक आचार-विचार तथा आहार, त्रि-संध्या जप तथा पूजन, रात्रि पूजन का पूर्ण रूप से त्याग, रुद्राक्ष माला का प्रयोग, ब्रह्मचर्य इत्यादि नियम सम्मिलित हैं, मांस-मत्स्यादी से पूजन निषिद्ध हैं। ब्रह्मचर्य का पालन अत्यंत आवश्यक है, अथवा अपनी स्त्री में ही रत रहना ब्रह्मचर्य पालन ही समझा जाता है। पंच-मकार से पूजन सर्वथा निषिद्ध है, यदि कही आवश्यकता पड़ जाये तो उनके प्रतिनिधि प्रयुक्त हो सकते हैं। साधना का आरंभ पशु भाव से शुरू होता है, तत्पश्चात शनै-शनै साधक सिद्धि की ओर बढ़ता है।

2. वामा-चार या वीरा-चार (वीर भाव) ; शारीरिक पवित्रता स्नान-शौच इत्यादि का कोई बंधन नहीं हैं, साधक सर्वदा, सर्व स्थान पर जप-पूजन इत्यादि करने का अधिकारी है। मध्य या अर्ध रात्रि में पूजन तय प्रशस्त हैं, मद्य-मांस-मतस्य से देव पूजन, भेद-भाव रहित, सर्व वर्णों के प्रति सम दृष्टि तथा सम्मान इत्यादि निहित है। साधक स्वयं को शक्ति या वामा कल्पना कर साधना करता है।

3. सिद्धान्ताचार : शुद्ध बुद्धि! इसी पद्धति या आचार के साधन काल में उदय होता है, अपने अन्दर साधक शिव तथा शक्ति का साक्षात् अनुभव कर पाने में समर्थ होता है। संसार की प्रत्येक वस्तु या तत्व, साधक को शुद्ध तथा परमेश्वर या परमशिव से युक्त या सम्बंधित लगी है, अहंकार, घृणा, लज्जा इत्यादि पाशों का पूर्ण रूप से त्याग कर देता है। अंतिम स्थान कौलाचार या राज-योग ही है, साधक साधना के सर्वोच्च स्थान को प्राप्त कर लेता है। इस स्तर तक पहुँचने पर साधक सोना और मिट्टी में, श्मशान तथा गृह में, प्रिय तथा शत्रु में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं रखता है, उनके निमित्त सब एक हैं, उसे अद्वैत ज्ञान की प्राप्ति हो जाती हैं। इन्हीं आचार-पद्धतियों को भाव त्रय भी कहा गया है।

1. पशु भाव 2. वीर भाव 3. दिव्य भाव कहा जाता है।

तंत्र साधना हेतु उत्तम स्थान :- मणिकर्णिका घाट, वाराणसी या काशी। यह स्थान तंत्र साधना हेतु सर्वोत्तम माना जाता है, भगवान शिव यहाँ सर्वदा, साक्षात विराजमान रहते हैं। आदि काल से ही, काशी या वाराणसी का प्रयोग तांत्रिक साधनाओं हेतु किया जाता है। पश्वाचार, कौलाचार या कुलाचार, दिव्याचार, शैव-शाक्त के साधन क्रम हैं।

अष्ट पाश : घृणा, शंका, भय, लज्जा, जुगुप्सा, कुल, शील तथा जाति, पशु भाव आदि भाव हैं, मनुष्य पशुओं में सर्वश्रेष्ठ तथा सोचने-समझने या बुद्धि युक्त है। जब तक मनुष्य के बुद्धि का पूर्ण रूप से विकास ना हो, वह पशु के ही श्रेणी में आता है। जिसकी जितनी बुद्धि होगी उसका ज्ञान भी उतना ही श्रेष्ठ होगा। यहां पशु भाव से ही साधन प्रारंभ करने का विधान है, यह प्रारंभिक साधन का क्रम है, आत्म तथा सर्व समर्पण भाव उदय का प्रथम कारक पशु भाव क्रम से साधना करना है। यह भाव निम्न कोटि का माना गया है, स्वयं त्रिपुर-सुंदरी, श्री देवी ने अपने मुखारविंद से भाव चूड़ामणि तंत्र में पशु भाव को सर्व-निन्दित तथा सर्व-निम्न श्रेणी का बताया है। अपनी साधना द्वारा प्राप्त ज्ञान द्वारा जब अज्ञान का अन्धकार समाप्त हो जाता है, पशु भाव स्वतः ही लुप्त हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार पशुत्व लक्षण आठ प्रकार से युक्त मानव स्वभाव लक्षणों या पाशों से है; 1. घृणा, 2. शंका, 3. भय, 4. लज्जा, 5. जुगुप्सा, 6. कुल, 7. शील तथा 8. जाति। यही अष्टपाश युक्त मानव लक्षण सर्वदा ही मनुष्य के आध्यात्मिक उन्नति हेतु बाधक माने गए हैं, तथा साधना पथ में त्याज्य हैं। पशु भाव साधना क्रम के अनुसार साधक इन्हीं लक्षणों या पाशों पर विजय पाने का प्रयास करता है।

1. घृणा : व्यक्ति-विशेष के शरीर, इन्द्रियां तथा मन को न भाने वाली तथा तिरस्कृत करने वाला लक्षण घृणा कहलाती है। संसार के समस्त तत्व या पञ्च तत्व से निर्मित प्रत्येक वस्तुओं में किसी भी प्रकार का विकार अनुभव करना ही घृणा है, जो अभिमान, अहंकार इत्यादि विकारों को जन्म देता है। मनुष्य के हृदय पर किसी वस्तु या तत्व के प्रति प्रेम तथा किसी के प्रति तिरस्कार यदि विद्यमान है तो, वह मनुष्य परमात्मा तथा प्रत्येक तत्व में विद्यमान परमात्मा के अस्तित्व से अनभिज्ञ है।

2. शंका : किसी व्यक्ति के प्रति संदेह की भावना शंका है। विषय-आसक्त, माया-मोह में पड़ा हुआ मनुष्य, अपने विकास के लिये नाना प्रकार के छल-प्रपंच में लिप्त रहता है, कपट व्यवहार करता है, झूठ बोलता है, देहाभिमानी है, परिणाम स्वरूप वह दूसरे को भी ऐसा ही समझ कर उस पर संदेह करता है।

3. भय : मनुष्य को अपने शरीर, प्रिय-जन, संपत्ति, अभिलषित वस्तुओं से प्रेम रहता है, तथा इसके नष्ट होने का सर्वदा भय रहता है। भौतिक वस्तुओं के नाश का उसे सर्वदा भय रहता है, परन्तु आत्म के नाश का नहीं तथा आत्म तत्व को जानने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। अन्य कई कारण हैं, जो भय को उत्पन्न करते हैं; जैसे अपने सन्मुख होने वाली कोई अप्रिय घटना इत्यादि।

4. लज्जा : सामान्यतः मनुष्य के हृदय में मान-अपमान भावना का उदय होना लज्जा कहलाता है। मनुष्य का शरीर नश्वर है, फिर शरीर के मान-अपमान का कितना महत्व हो सकता है? तथा शरीर को जीवन देने वाली आत्म साक्षात् परमात्मा ही है, तथा मान-अपमान से परे है।

5. जुगुप्सा : दूसरों की निंदा-चर्चा करना जुगुप्सा कहलाती है, मनुष्य दूसरों के गुण तथा दोषों को देखता है, तथा अपने दोषों का मनन नहीं कर पाता।

6. कुल : उच्च कुल या वंश में जन्म कुल-भाव से है, जैसे उच्च कुल में पैदा हुआ अपने आप को उच्च मानता है, तथा दूसरे के कुल को छोटा। यह भाव मनुष्य के अन्दर छोटा या बड़ा होने की प्रवृति को उदित करता है, तथा उसके विचार भेद-भाव युक्त हो जाते हैं।

7. शील : शिष्टाचार का अभिप्राय शील है, अन्य लोगों के प्रति मानव का व्यवहार, सेवा, उठने-बैठने का तरीका शिष्टाचार या शील कहलाता है। शीलता के बंधन को काट देने पर साधक विचार तथा कर्म में स्वतंत्र हो जाता है, तथा उसे ये चिंता नहीं रहती की कोई अन्य उसके बारे में क्या सोच रहा है।

8. जाती : मनुष्य का अपना जात्यभिमान, उसके हृदय में बड़े या छोटे भावना का प्रतिपादन करता है। जाती भेद को समदर्शी न मानने वाला पशु भाव से ग्रस्त है, चारों जातियां क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र सभी परम-पिता ब्रह्मा जी के संतान हैं।

शक्ति साधना मार्ग में प्रयुक्त होने वाले, पञ्च-मकार (मद्ध, मांस, मत्स्य, मुद्रा तथा मैथुन) के कारण साधक को शिवत्व प्राप्त करने हेतु इन सभी पाशों या लक्षणों से मुक्त होना अत्यंत आवश्यक है। जो इन अष्ट-पाशों में से किसी एक से भी ग्रस्त है, मनोविकार युक्त है, वह सर्वदा, सर्व-काल तथा सर्व-व्यवस्था में साधना करने में समर्थ नहीं हो सकता। चित निर्मल हुए बिना, समदर्शिता तथा त्याग की भावना का उदय होना अत्यंत कठिन है, चित को निर्मल निर्विकार करने हेतु पशु भाव का त्याग अत्यंत आवश्यक है। पशु भाव से साधना प्रारंभ कर अष्ट पाशों, मनोविकार पर विजय पाकर ही साधक वीर-भाव में गमन का अधिकारी है। वस्तुतः पशु भाव युक्त साधना कर साधक इन अष्ट-पाशों या विकारों से मुक्त होने का प्रयास करता है।

वीर भाव : इस भाव तक आते-आते साधक! अष्ट-पाशों के कारण होने वाले दुष्परिणामों को समझने लगता है, परन्तु उनका पूर्ण रूप से वह त्याग नहीं कर पाता है, परन्तु करना चाहता है। इसी प्रकार पशु भाव से अपने देह तथा मन की शुद्धि करने के प्रयासरत साधक, वीर-भाव से साधना कर पाता है। वीर-भाव का मुख्य आधार केवल यह है कि! साधक अपने आप में तथा अपने इष्ट देवता में कोई अंतर न समझे, तथा साधना में रत रहा कर अपने इष्ट देव के समान ही गुण-स्वभाव वाला बने। वीर-भाव बहुत ही कठिन मार्ग है, बिना गुरु आज्ञा तथा मार्गदर्शन के यह साधन हानिकारक ही होता है, इस मार्ग को कुल, वाम, कौल, वीरा-चार नाम से भी जाना जाता है। साथ ही साधक का दृढ़ निश्चयी भी होना अत्यंत आवश्यक है, किसी भी कारण इस मार्ग का मध्य में त्याग करना उचित नहीं है, अन्यथा दुष्परिणाम अवश्य प्रकट होते हैं। जिस साधक में किसी भी प्रकार से कोई शंका नहीं है, वह भय मुक्त है, निर्भीक है, निर्भय हो किसी भी समय कही पर भी चला जाये, लज्जा व कुतूहल से रहित है, वेद तथा शास्त्रों के अध्ययन में सर्वदा रत रहता है, वह वीर साधन करने का अधिकारी है। साधन के इस क्रम में मूल पञ्च-तत्व के प्रतीक पञ्च-तत्वों से साधना करने का विधान है, जिसे पञ्च-मकार नाम से जाना जाता है।

इसी मार्ग का अनुसरण कर महर्षि वशिष्ठ ने, नील वर्णा महा-विद्या तारा की सिद्धि प्राप्त की थी। सर्वप्रथम, अपने पिता ब्रह्मा जी की आज्ञा से महर्षि वशिष्ठ ने देवी तारा की वैदिक रीति से साधना प्रारंभ की परन्तु सहस्त्र वर्षों तक कठोर साधना करने पर भी मुनि-राज सफल न हो सके। परिणामस्वरूप क्रोध-वश उन्होंने तारा मंत्र को श्राप दे दिया। तदनंतर दैवीय आकाशवाणी के अनुसार, मुनि राज ने कौल या कुलागम मार्ग का ज्ञान प्राप्त किया, तथा देवी के प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त कर, सिद्धि प्राप्त की। साधना के इस क्रम में साधना पञ्च-मकार विधि से की जाती हैं! यह पञ्च या पांच तत्व हैं 1. मद्य, 2. मांस 3. मतस्य 4. मुद्रा तथा 5. मैथुन, इन समस्त द्रव्यों को कुल-द्रव्य भी कहा जाता है। सामान्यतः इनमें से केवल मुद्रा (चवर्ण अन्न तथा हस्त मुद्रायें) को छोड़ कर सभी को निन्दित वस्तु माना जाता है, वैष्णव सम्प्रदाय तो इन समस्त वस्तुओं को महा-पाप का कारण मानता है, मद्य या सुरा पान पञ्च-महा पापों में से एक है। परन्तु आदि काल से ही वीर-साधना में इन सब वस्तुओं के प्रयोग किये जाने का विधान है। कुला-चार केवल साधन का एक मार्ग है, तथा इस मार्ग में प्रयोग किये जाने वाले इन पञ्च-तत्वों को केवल अष्ट-पाशों का भेदन कर, साधक को स्वतंत्र-उन्मुक्त बनाने हेतु प्रयोग किया जाता है। साधक इन समस्त तत्वों का प्रयोग अपनी आत्म-तृप्ति हेतु नहीं कर सकता, इनका कदापि आदि नहीं हो सकता, साधक केवल अपने इष्ट देवता को समर्पित कर ग्रहण करने का अधिकारी है, यह केवल उपासना की सामग्री है, उपभोग की नहीं। अति-प्रिय होने पर भी, इन तत्वों से साधक किसी प्रकार की आसक्ति नहीं रख सकता है, यह ही साधक के साधना की चरम पराकाष्ठा है। देखा जाये तो आदि काल से ही शैव तथा विशेषकर शक्ति संप्रदाय से सम्बंधित पूजा-साधना तथा पितृ यज्ञ कर्मों में मद्य, मांस, मीन इत्यादि का प्रयोग किया जाता रहा है।

कुछ तंत्राचार्यों का मत है  (मेरा स्वयं का मत इस पक्ष में नहीं है):- ऋग्-वेद! देव तथा पितृ कार्यों हेतु हिंसा को पाप नहीं मानता। कुलार्णव तंत्र (कौल या कुल धर्म के विवरण सम्बन्धी तंत्र) के अनुसार, शास्त्रोक्त विधि से देवता तथा पितरों का पूजन कर मांस खानेवाला तथा मद्य पीने वाला किसी भी प्रकार के दोष का भागी नहीं होता। बिना यज्ञ कर्मों के मांस-मदिरा सेवन दोष युक्त माना गया है, तथा पाप की श्रेणी में आता हैं। मंत्रों द्वारा पवित्र किया गया या शास्त्रोक्त विधि से कुल द्रव्य या तत्व, गुरु तथा देवता को अर्पण कर पान करने वाला भव सागर के बंधन से मुक्त हो जाता है, तथा किसी भी प्रकार के दोष का भागी नहीं है। मतस्य-मांस, सुरा इत्यादि मादक द्रव्यों का कौल मार्ग में दीक्षा संस्कार के पश्चात, देव कार्य पूजन के अतिरिक्त सेवन दोष युक्त माना गया है।

कुछ तंत्राचार्यों का मत :- मद्य, मांस, मतस्य, मुद्रा के सेवन का मुख्य कारण यह है कि सामान्यतः मद्य निन्दित वस्तुओं में माना जाता है, परन्तु मादक द्रव्यों में मद्य या सुरा सर्वोत्तम द्रव्य माना जाता है, इसके सेवन से मनुष्य नशे में लिप्त हो, आत्म विस्मृत की अवस्था को प्राप्त कर उन्मत हो जाता है। अन्य मादक द्रव्यों के समान मद्य मनुष्य में आलस्य नहीं लाता है, आलसी मनुष्य को क्रिया-शील करने में मद्य विशेष प्रभाव दिखता है। अष्ट-पाशों का जो सादाहरण या मानसिक बल से परित्याग कर विमुक्त होने में समर्थ नहीं है, वह सुरा पान रूपी औषधि का प्रयोग कर, इन पाशों का त्याग करने या नियंत्रण करने में सफल हो सकता है। मद्यपान ध्यान केन्द्रित करने में पूर्णतः सक्षम है, तथा इसी करण वश शक्ति साधनाओं में प्रयुक्त होता है। साधक जिस किसी ओर चाहे, अपना ध्यान पूर्ण केन्द्रित कर सकता है, वास्तव में मद्यपान कर साधक आत्म-विस्मृत की अवस्था को प्राप्त करता है, तथा सर्व प्रकार से चिंता रहित हो, ध्यान केन्द्रित कर पाता है। मद्य उत्कट उत्तेजक पदार्थ है, तथा इसका प्रयोग मांस, मतस्य, चर्वण अन्न के साथ प्रयोग किया जाता है। मदिरा के साथ, मांस-मत्स्य इत्यादि का प्रयोग, मदिरा में व्याप्त विष को शांत करने हेतु किया जाता है, साथ ही पौष्टिक भोजन के अलावा मदिरा का सेवन मनुष्य को मृत्यु की ओर ले जाता है। मदिरा के साथ या अन्य मादक द्रव्यों के साथ मांस इत्यादि का सेवन मनुष्य को बलवान एवं तेजस्वी बनता है।

स्त्री सेवन का मुख्य कारण :- स्त्री के प्रति मोह या प्रेम! काम वासना या कामुकता, किसी भी साधना पथ का सबसे बड़ा विघ्न है, तथा विघ्न से दूर रह कर या कहें तो स्त्री से दूर रहकर इस विघ्न पर विजय नहीं पाया जा सकता है। प्रेम में लिप्त मनुष्य, सही और गलत भूल कर, मनमाने तरीके से कार्य करता है। अघोर तंत्र में स्त्री सेवन में रहते हुए, काम-वासना, प्रेम इत्यादि आसक्ति का आत्म त्याग सर्वश्रेष्ठ माना गया है। पूजन, केवल विभिन्न द्रव्यों को देवताओं पर अर्पित करना ही नहीं होता, अपितु देवता के पूर्ण रूप से संतुष्टि होने से भी सम्बंधित है। समस्त वस्तु या तत्व परमात्मा द्वारा ही बनायी गई हैं, पंच-मकार मार्ग! समस्त प्रकार के वैभव-भोगो में रत रहते हुए, धीरे-धीरे त्याग का मार्ग है। साधक का सदाचारी होना भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, संस्कार (दीक्षा) विहीन होने पर, गुरु आज्ञा का उलंघन करने पर तथा सदाचार विहीन होने पर साधक पाप का अधिकारी हो पतन की ओर अग्रसर होता है। शक्ति संगम तंत्र के अनुसार मैथुन हेतु सर्वोत्तम स्त्री संग, दीक्षिता तथा देवताओं पर भक्ति भाव रखने वाली, मंत्र-जप इत्यादि देव कर्म करने वाली होना आवश्यक है। किसी भी स्त्री को केवल देखकर मन में विकार जागृत होना, साधक के नाश का कारण बनता है। कुल-धर्म दीक्षा रहित स्त्री का संग, सर्व सिद्धियों की हानि करने वाला होता है। स्त्री संग से पूर्व स्त्री-पूजन अनिवार्य है, तथा स्त्रियों से द्वेष निषेध है, स्त्री सेवन या सम्भोग आत्म सुख के लिये करने वाला पापी तथा नरक गामी होता है। पर-द्रव्य, पर-अन्य, प्रतिग्रह, पर-स्त्री, पर-निंदा, से सर्वदा दूर रहकर! सदाचार पालन अत्यंत आवश्यक है।

पंच-मकार विधि से साधना करने का मुख्य उद्देश्य :- पञ्च-मकार साधना केवल मात्र इष्ट देवता की पूजा हेतु विहित है, न की स्व-तृप्ति या विषय-भोग के लिए, समस्त भौतिक सुखों से पंच-मकार विधि मुक्ति पाने हेतु केवल साधन मात्र है। साधारण मनुष्य विषय-भोगों में सर्वदा आसक्त रहता है, और अधिक प्राप्त करने का प्रयास करता है, तथा सर्वदा उनमें लिप्त रहता है, आदी हो जाता है। परन्तु वीराचारी आसक्ति से सर्वदा दूर रहता है। किसी भी प्रकार से विषय-भोगो में आसक्ति, लिप्त रहने का उसे अधिकार उसे नहीं है, सर्वदा ही उसे उन्मुक्त रहना पड़ता है, वह आदी नहीं हो सकता है। स्त्री संग करने पर साधक पर स्त्री का कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये, न मोह न प्रेम। इसी तरह मद्य, मांस तथा मतस्य के सेवन के पश्चात भी, शरीर पर इनका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये। मद्यपान करने पर साधक के शरीर में पूर्ण चेतना रहनी चाहिये।

वास्तव में देखा जाये तो, यह पंच-मकार मनुष्य के अष्ट पाशों के बंधन से मुक्त होने में सहायक है, सर्वश्रेष्ठ विषय भोगो को भोग करते हुए भी, विषय भोगो के प्रति अनासक्ति का भाव, इस मार्ग का परम उद्देश्य है। जब तक मानव पाश-बद्ध, विषय-भोगो के प्रति आसक्त, देहाभिमानी है, वह केवल जीव कहलाता है, पाश-मुक्त होने पर वह स्वयं शिव के समान हो जाता है। वीर-साधना या शक्ति साधना का मुख्य उद्देश्य शिव तथा समस्त जीवों में ऐक्य प्राप्त करना है। यहाँ मानव देह देवालय है तथा आत्म स्वरूप में शिव इसी देवालय में विराजमान है, अष्ट पाशों से मुक्त हुए बिना देह में व्याप्त सदा-शिव का अनुभव संभव नहीं है। शक्ति साधना के अंतर्गत पशु भाव, वीर-भाव जैसे साधन कर्मों का पालन कर मनुष्य सफल योगी बन पाता है।

बेलपत्र और भगवान शिव

बेल का वृक्ष और भगवान शिव :- 

Dr.R.B.Dhawan

बेलपत्र को संस्कृत में ‘बिल्वपत्र’ कहा जाता है, यह औषधी गुणों से भरपूर वृक्ष भगवान शिव को प्रिय है, पौराणिक मान्यता है कि बेलपत्र और जल से भगवान शंकर का अभिषेक करने से और पूजा में इनका प्रयोग करने से शिव जल्द प्रसन्न होते हैं। बेलपत्र का तोड़ने के लिए पुराणों में ऐसे निर्देश दिए गए हैं, जिससे धर्म का पालन भी हो जाये और वृक्षों का संरक्षण भी हो जाए, यही कारण है कि देवी-देवताओं को अर्पित किए जाने वाले फूल और पत्रों को तोड़ने के कुछ नियम हैं, बेलपत्र तोड़ने के भी कुछ नियम हैं :-  

1. चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथ‍ियों को, सं‍क्रांति के समय और सोमवार को बेलपत्र न तोड़ें। 

2. भगवान शंकर को बेलपत्र चढ़ाने के लिए इन तिथ‍ियों या वार से पहले तोड़ा गया पत्र ही चढ़ाना चाहिए।  

3. शास्त्रों में कहा गया है कि अगर नया बेलपत्र न मिल सके, तो किसी दूसरे के चढ़ाए हुए बेलपत्र को भी धोकर कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है। 

अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:।
शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि क्वचित्।।
(स्कंदपुराण) 

4. टहनी से चुन-चुनकर सिर्फ बेलपत्र ही तोड़ना चाहिए, कभी भी पूरी टहनी नहीं तोड़नी चाहिए। पत्र सावधानी से तोड़ना चाहिए कि वृक्ष को कोई हानि न पहुंचे। 

5. बेलपत्र तोड़ने से पहले और बाद में वृक्ष को मन ही मन प्रणाम करना चाहिए।

कैसे चढ़ाएं बेलपत्र :- भगवान शिव को बेल पत्र प्रिय हैं ही। साथ ही भगवान शिव के अंशावतार हनुमान जी को भी बेलपत्र अर्पित किया जा सकता है, भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाने से घर की धन-दौलत में वृद्धि होने लगती है, अधूरी कामनाएं पूर्ण होती हैं।

शिव पुराण के अनुसार सावन के सोमवार को शिवालय में बेलपत्र चढ़ाने से एक करोड़ कन्यादान के बराबर फल मिलता है।
बेलपत्र का वृक्ष हर कामना को पूरी करता है। यही नहीं उसके पत्तों को गंगा जल से धोकर उन्हें बजरंगबली पर अर्पित करने से अनेक तीर्थों का फल मिलता है।

बिल्व वृक्ष (बेल के पेड़) की जड़ सफेद धागे में पिरोकर रविवार को गले में धारण करने से रक्तचाप, क्रोध और असाध्य रोगों से रक्षा होती है। 
बिल्व वृक्ष का पूजन पाप व दरिद्रता का अंत कर वैभवशाली बनाने वाला माना गया है। घर में बेल पत्र लगाने से देवी महालक्ष्मी बहुत प्रसन्न होती हैं।

बेल पत्तों को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। इन्हें अपने पास रखने से कभी धन-दौलत का अभाव नहीं होता।

शिव पुराण के अनुसार :-  1. बिल्व वृक्ष के आसपास सर्प नहीं आते ।  

2. यदि किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर
गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है ।

3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता
सबसे अधिक बिल्व वृक्ष में होती है ।

4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला
परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल
मिलता है ।

5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल
वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है। 

6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता
है। 

7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।

8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट
लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। 

9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि
स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे । 

10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी
शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त
हो जाते है । 

11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव
से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को
चढ़ाने से क्या फल मिलता है :-

1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।

3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।यह सभी अन्न भगवान
को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए। 

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन सा रस
(द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है :-

1. ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से
शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी
जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2. नपुंसक व्यक्ति अगर शुद्ध घी से भगवान शिव का अभिषेक
करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो
उसकी समस्या का निदान संभव है।

3. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को
चढ़ाएं।

4. सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में
वृद्धि होती है।

5. शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों
की प्राप्ति होती है।

6. शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति
होती है।

7. मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा
(टीबी) रोग में आराम मिलता है।

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन का फूल
चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है :-

1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने
पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।

3. अलसी के फूल से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान
विष्णु को प्रिय होता है।

4. शमी पत्र (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती
है।

6. जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की
कमी नहीं होती।

7. कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।

8. हारसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि
होती है।

9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र
प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशनकरता है।

10. लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है। 

11. दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

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गायत्री मंत्र

गायत्री मंत्र:-

Dr.R.B.Dhawan

कुछ मंत्र ऐसे भी होते हैं, जिनके जपने से तत्काल हमारे संकट दूर हो जाते हैं, परंतु इन तत्कालिक लाभ देने वाले मंत्रों का प्रभाव स्थाई नहीं होता। दूसरी ओर वैदिक मंत्र हैं, जो दीर्घकाल में सिद्ध होते हैं, और इनका प्रभाव स्थाई बना रहता है। इसी लिसे विद्वानों ने बार-बार कहा है कि वैदिक मंत्रों में अपार शक्ति है। आइए जानें अलग-अलग देवताओं के अलग-अलग मंत्रों की शक्ति के बारे में। धर्मग्रंथों के अनुसार आत्मबल सफलता का मुख्य आधार है, मन की इच्छाएं पूरी करने के लिए इष्टसिद्धि बहुत आवश्यक है, इष्टसिद्धि का अर्थ है कि मनुष्य जिस देव शक्ति के लिए श्रद्धा और आस्था मन में बना लेता है, उस देवता से जुड़ी सभी शक्तियां, प्रभाव और तेज उसे मिलने लगते हैं।

इष्टसिद्धि मे मां गायत्री का ध्यान सफलता प्रदायक होता है। गायत्री उपासना के लिए गायत्री मंत्र बहुत ही चमत्कारी और शक्तिशाली माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस मंत्र में 24 अक्षर हैं, गायत्री मंत्र के ये 24 अक्षर 24 महाशक्तियों के प्रतीक हैं। एक गायत्री के महामंत्र द्वारा इन 24 देवशक्तियों का सानिध्य प्राप्त हो जाता है।

24 देव शक्तियों के ऐसे 24 चमत्कारी गायत्री मंत्र मे से, जो देवी-देवता आपके इष्ट है, उनका विशेष गायत्री मंत्र जपने से चमत्कारी फल प्राप्त होगा। शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक व भौतिक शक्तियों की प्राप्ति के लिए गायत्री उपासना सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। गायत्री ही वह शक्ति है जो पूरी सृष्टि की रचना, स्थिति या पालन और संहार का कारण है। वेदों में गायत्री शक्ति ही प्राण, आयु, शक्ति, तेज, कीर्ति और धन देने वाली मानी गई है। गायत्री मंत्र को महामन्त्र कहा गया है, जो शरीर की कई शक्तियों को चैतन्य करता है।

इष्टसिद्धी से मनचाहा कार्य बनाने के लिए गायत्री मंत्र के 24 अक्षरो के हर देवता के विशेष मंत्रों का जाप करना चाहिए।

1. श्रीगणेश – कठिन या जटिल कार्यों में सफलता, रुकावटों को दूर करने, बुद्धि लाभ के लिए इस गणेश गायत्री मंत्र का स्मरण करना चाहिए –

ॐ एकदृंष्ट्राय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो बुद्धिः प्रचोदयात्।

2. नृसिंह – शत्रु की शत्रुता को हराने, बहादुरी, भय व दहशत दूर करने, पुरुषार्थी बनने व किसी भी आक्रमण से बचने के लिए नृसिंह गायत्री प्रभावशाली साबित होती है –

ॐ उग्रनृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि तन्नो नृसिंह प्रचोदयात्।

3. विष्णु – पालन-पोषण की क्षमता को बढ़ाने या किसी भी तरह से सबल बनने के लिए विष्णु गायत्री का महत्व है –

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।

4. शिव – दायित्वों व कर्तव्यों को लेकर दृढ़ बनने, अमंगल का नाश व शुभता को बढ़ाने के लिए शिव गायत्री मंत्र प्रभावी माना गया है –

ॐ पञ्चवक्त्राय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।

5. कृष्ण – सक्रियता, समर्पण, निस्वार्थ व मोह से दूर रहकर कार्य करने की शक्ति, खूबसूरती व सरल स्वभाव की चाहत को कृष्ण गायत्री मंत्र पूरी करता है –

ॐ देवकीनन्दाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्।

6. राधा – प्रेम भाव को बढ़ाने व द्वेष या घृणा को दूर रखने के लिए राधा गायत्री मंत्र का स्मरण लाभ देता है

ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात्।

7. लक्ष्मी – मान-सम्मान, आर्थिक समृद्धि, पद, यश व भौतिक सुख-सुविधाओं की चाहत लक्ष्मी गायत्री मंत्र शीघ्र पूरी कर देता है –

ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।

8. अग्रि – शारीरिक बल बढ़ाने, प्रभावशाली व होनहार बनने के लिए अग्निदेव का स्मरण अग्नि गायत्री मंत्र से करना शुभ होता है-

ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि तन्नो अग्निः प्रचोदयात्।

9. इन्द्र – संयम के द्वारा बीमारियों, हिंसा के भाव को रोकने व भूत-प्रेत या अनिष्ट से रक्षा में इन्द्र गायत्री मंत्र प्रभावशाली माना गया है –

ॐ सहस्त्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्नो इन्द्रः प्रचोदयात्।

10. सरस्वती – बुद्धि व विवेक, दूरदर्शिता, चतुराई से सफलता मां सरस्वती गायत्री मंत्र से मिलती है –

ॐ सरस्वत्यै विद्महे ब्रह्मपुत्र्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्।

11. दुर्गा – विघ्नों के नाश, दुर्जनों व शत्रुओं को परास्त करने व अहंकार के नाश के लिए दु्र्गा गायत्री मंत्र का महत्व है-

ॐ गिरिजायै विद्महे शिव पत्नीय धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्।

12. हनुमानजी – निष्ठावान, भरोसेमंद, संयमी, शक्तिशाली, निडर व दृढ़ संकल्पित बनने के लिए हनुमान गायत्री मंत्र को अचूक माना गया है –

ॐ अञ्जनीसुताय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो मारुतिः प्रचोदयात्।

13. पृथ्वी – पृथ्वी गायत्री मंत्र सहनशील बनाने वाला, इरादों को मजबूत करने वाला व क्षमाभाव बढ़ाने वाला होता है –

ॐ पृथ्वी देव्यै विद्महे सहस्त्र मूर्त्यै धीमहि तन्नो पृथ्वी प्रचोदयात्।

14. सूर्य – निरोगी बनने, लंबी आयु, उन्नति व भीतर के दोषों का शमन करने के लिए सूर्य गायत्री मंत्र प्रभावी माना गया है –

ॐ भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नो सूर्य्यः प्रचोदयात्।

15. राम – धर्म पालन, मर्यादा, स्वभाव में विनम्रता, मैत्री भाव की चाहत राम गायत्री मंत्र से पूरी होती है –

ॐ दाशरथये विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात्।

16. सीता – सीता गायत्री मंत्र मन, वचन व कर्म से विकारों को दूर कर पवित्र करता है। साथ ही स्वभाव मे भी मिठास घोलता है –

ॐ जनकनन्दिन्यै विद्महे भूमिजायै धीमहि तन्नो सीता प्रचोदयात्।

17. चन्द्रमा – काम, क्रोध, लोभ, मोह, निराशा व शोक को दूर कर शांति व सुख की चाहत चन्द्र गायत्री मंत्र से पूरी होती है –

ॐ क्षीरपुत्रायै विद्महे अमृततत्वाय धीमहि तन्नो चन्द्रः प्रचोदयात्।

18. यम – मृत्यु सहित हर भय से छुटकारा, समय को अनुकूल बनाने व आलस्य दूर करने के लिए यम गायत्री मंत्र प्रभावशाली होता है –

ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नो यमः प्रचोदयात्।

19. ब्रह्मा – किसी भी रूप में सृजन शक्ति व रचनात्कमता बढ़ाने के लिए ब्रह्मा गायत्री मंत्र मंगलकारी होता है –

ॐ चतु्र्मुखाय विद्महे हंसारुढ़ाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्।

20. वरुण – दया, करुणा, कला, प्रसन्नता, सौंदर्य व भावुकता की कामना वरुण गायत्री मंत्र पूरी करता है –

ॐ जलबिम्बाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्।

21. नारायण – चरित्रवान बनने, महत्वकांक्षा पूरी करने, अनूठी खूबियां पैदा करने व प्रेरणास्त्रोत बनने के लिए नारायण गायत्री मंत्र शुभ है –

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो नारायणः प्रचोदयात्।

22. हयग्रीव – मुसीबतों को पछाड़ने, बुरे वक्त को टालने, साहसी बनने, उत्साह बढ़ाने व मेहनती बनने की कामना ह्यग्रीव गायत्री मंत्र पूरी करता है –

ॐ वाणीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हयग्रीवः प्रचोदयात्।

23. हंस – यश, कीर्ति पाने के साथ संतोष व विवेक शक्ति जगाने के लिए हंस गायत्री मंत्र प्रभावशाली होता है –

ॐ परमहंसाय विद्महे महाहंसाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात्।

24. तुलसी – सेवा भावना, सच्चाई को अपनाने, सुखद दाम्पत्य जीवन, शांति व परोपकारी बनने की चाहत तुलसी गायत्री मंत्र पूरी करता है –

ॐ श्री तुलस्यै विद्महे विष्णु प्रियायै धीमहि तन्नो वृन्दा प्रचोदयात्।

ये 24 देवशक्तियां जाग्रत, आत्मिक और भौतिक शक्तियों से संपन्न मानी गई है।

                        —– गायत्री महाविज्ञान से ——

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विषयोग

विष योग :-

Dr. R.B.Dhawan :-

ज्योतिषीय मतानुसार जन्म कुंडली में शनि और चंद्रमा का योग जातक के लिए कष्टकारी माना गया है। सिद्धांत यह है कि, शनिदेव अपनी धीमी गति के लिये जाने जाते हैं, और चन्द्रमा अपनी तीव्र गति के लिये, अर्थात शनि अधिक क्षमताशील होने के कारण अक्सर चंद्रमा को प्रताड़ित करते हैं। यदि चंद्र और शनि की युति कुंडली के किसी भी भाव में हो, तो ऐसी कुंडली में उनकी आपस में दशा-अंतर्दशा के दौरान विकट फल मिलने की संभावना होती है। (कुंडली में चंद्राराशि के अनुसार आप का प्रतिदिन ग्रह फल बदलता रहता है, इस ग्रह फल को जानने के लिये आप मेरी daily horoscope prediction app डाउनलोड कर सकते हैं। इससे आप प्रतिदिन अपना चंन्द्र राशि फल जान सकेंगे। Daily horoscope prediction app आपको गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध होगी।)
शनि:-  धीमी गति, लंगड़ापन, शूद्रत्व, सेवक, चाकरी, पुराने घर, खपरैल, बंधन, कारावास, आयु, जीर्ण-शीर्ण अवस्था आदि का कारक ग्रह है।

जबकि चंद्रमा:- मन की चंचलता, माता, स्त्री का सहयोग, तरल पदार्थ, सुख, कोमलता, मोती, दिल से स्नेह सम्मान, आदि का कारक है।

इन दोनो की अपनी-अपनी गति और अपनी-अपनी प्रकृति है, जो कि एक-दूसरे से विपरीत है, उदाहरणार्थ एक साथ रहने वाले दो प्राणी हैं, उन्होंने मिलकर एक कार्य करना है, तो एक सामान्य से जल्दी करेगा ओर दूसरा सामान्य से भी धीरे करेगा। अब दोनों में इसी बात का झगडा हमेशा रहेगा। शनि और चंद्र की युति से बनने वाले योग को विषयोग के नाम से जाना जाता है। यह कुंडली का एक अशुभ योग है। ये विषयोग जातक के जीवन में यथा नाम विषाक्तता घोलने में पूर्ण सक्षम है। जिस भी जातक की कुण्डली में विषयोग का निर्माण होता है, उसे जीवन भर अशक्तता, मानसिक व्याधियां, भ्रम, रोग, बिगड़े दाम्पत्य सुख, आदि का सामना करना पड़ता है। हां, जिस भी भाव में ऐसा विषयोग निर्मित हो रहा हो, उस भाव के अनुसार ही अशुभ फल की प्राप्ति होती है।   
जैसे यदि किसी जातक के लग्न चक्र में शनि-चंद्र की युति हो तो ऐसा जातक शारीरिक तौर पर बेहद अक्षम महसूस करता है। उसे जीवन के कुछ भाग में कंगाली और दरिद्रता का सामना करना पड़ सकता है। 

लग्न में:- शनि-चंद्र की युति हो जाने से उसका प्रभाव सप्तम भाव पर बेहद नकारात्मक होता है, जिससे जातक का दाम्पत्य जीवन बेहद बुरा बीतता है। लग्न शरीर का प्रतिनिधि है, इसलिए इस पर चंद्र और शनि की युति बेहद नकारात्मक असर छोड़ती है। जातक जीवन भर रोग-व्याधि से पीड़ित रहता है।
द्वितीय भाव में:- शनि-चंद्र की युुति बने तो जातक जीवन भर धनाभाव से ग्रसित होता है। 
तृतीय भाव में:- यह युति जातक के पराक्रम को कम कर देती है। 
चतुर्थ भाव में:- सुख और मातृ सुख की न्यूनता तथा ।
पंचम भाव में:- संतान व विवेक का नाश होता है। 
छठे भाव में:- ऐसी युति शत्रु-रोग-ऋण में बढ़ोत्तरी।
सप्तम भाव में:- शनि-चंद्र की युति संयोग पति-पत्नी के बीच सामंजस्य को खत्म करता है। 
अष्टम भाव में:- आयु नाश।
नवम भाव में:- भाग्य हीन बनाता है।
दशम भाव में:- शनि-चंद्र की युति पिता से वैमनस्य व पद-प्रतिष्ठा में कमी करती है।
ग्यारहवें भाव में:- एक्सिडेंट की संभावना बढ़ाने के साथ लाभ में न्यूनता आती है।
बारहवें भाव में:- शनि-चंद्र की युति व्यय को आय से बहुत अधिक बढ़ाकर जातक का जीवन कष्टमय बना देने में सक्षम है।  

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी ज्योतिषी से सलाह लेकर उचित उपाय किए जाये तो ‘विषयोग’ के दु:ष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। आगे की पंक्तियों में कुछ सरल उपाय दिए जा रहे हैं, इनका प्रयोग अवश्य ही लाभदायक रहेगा।

1. शनैश्नीचरी अमावस की रात्रि में नीली स्याही से 10 पीपल के पत्तों पर शनि का जाप  करते हुए एक-एक अक्षर लिखें :- 1. ॐ, 2. शं, 3. श, 4. नै, 5. श (यह  अक्षर आधा), 6. च, 7. रा, 8. यै, 9. न, 10. मः इस प्रकार 10 पत्तो में 10 अक्षर लिख कर फिर इन पत्तो को काले धागे में माला का रूप देकर, शनि देव की प्रतिमा या शिला में चढ़ाये। तब  इस क्रिया को करते समय मन ही मन शनि मंत्र का जाप भी करते रहना चाहिए। 

2. पीपल के पेड़ के ठीक नीचे एक पानी वाला नारियल सिर से सात बार उतार कर फोड़ दें और नारियल को प्रसाद के रूप में बॉट दें।

3. शनिवार के दिन या शनि अमावस्या के दिन संध्या काल सूर्यास्त के पश्चात् श्री शनिदेव की प्रतिमा पर या शिला पर तेल चढ़ाए, एक दीपक तिल के तेल का जलाए दीपक में थोड़ा काला तिल एवं थोड़ा काला उड़द डाल दें। इसके पश्चात् 10 आक के पत्ते लें, और काजल में थोड़ा तिल का तेल मिला कर स्याही बना लें, और लोहे की कील के माध्यम से प्रत्येक पत्ते में नीचे लिखे मंत्र को लिखे। यह पत्ते जल में प्रवाहित कर दें।

4. प्रतिदिन रूद्राक्ष की माला से कम से कम पाँच  माला महामृत्युन्जय मंत्र का जाप करें। इस क्रिया को शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से आरम्भ करें।

5. माता एवं पिता या अपने से उम्र में जो अधिक हो अर्थात पिता माता समान हो उनका चरण छूकर आर्षीवाद ले।

6.  सुन्दर कांड का 40 पाठ करें। किसी हनुमान जी के मंदिर में या पूजा स्थान में शुद्ध घी का दीपक जलाकर पाठ करें, पाठ प्रारम्भ करने के पूर्व अपने गुरू एवं श्री हनुमान जी का आवाहन अवश्य करें।

7. श्री हनुमान जी को शुद्ध घी एवं सिन्दूर का चोला चढ़ाये श्री हनुमान जी के दाहिने पैर का सिन्दूर अपने माथे में लगाए।

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गुरूजी के टोटके (5)

इस दिवाली धन प्राप्ति के टोटके : –

(1) सोमवार को शिव-मंदिर में जाकर दूध मिश्रित जल शिवलिंग पर चढ़ाएं तथा रूद्राक्ष की माला से ‘ऊँ सोमेश्वराय नम:’ का 108 बार जप करें। साथ ही पूर्णिमा को जल में दूध मिला कर चन्द्रमा को अर्ध्य देकर व्यवसाय में उन्नति की प्रार्थना करें, तुरन्त ही असर दिखाई देगा।

(2) यदि बहुत प्रयासों के बाद भी घर में पैसा नहीं रूकता है, तो एक छोटा सा उपाय करें। सोमवार या शनिवार को थोड़े से गेहूं में 11 पत्ते तुलसी तथा 2 दाने केसर के डाल कर पिसवा लें। बाद में इस आटे को पूरे आटे में मिला लें। घर में बरकत रहेगी और लक्ष्मी दिन दूना रात चौगुना बढऩे लगेगी।

(3) घर में लक्ष्मी के स्थाई वास के लिए एक लोहे के बर्तन में जल, चीनी, दूध व घी मिला लें। इसे पीपल के पेड़ की छाया के नीचे खड़े होकर पीपल की जड़ में डाले। इससे घर में लक्ष्मी का स्थाई वास होता है।

(4) घर में सुख-समृद्धि लाने के लिए एक मिट्टी के सुंदर से बर्तन में कुछ सोने-चांदी के सिक्के लाल कपड़े में बांधकर रखें। इसके बाद बर्तन को गेहूं या चावल के भर कर घर के वायव्य (उत्तर-पश्चिम) कोने में रख दें। ऐसा करने से घर में धन का कभी कोई अभाव नहीं रहेगा।

“गुरुजी के टोटके” पुस्तक से (गुरु जी द्वारा लिखित इस पुस्तक में लगभग 1500 totke हैं)। यह पुस्तक shukracharya karyalaya से अथवा shukracharya.com पर आर्डर करके मंगवा सकते हैं।

पंचमहापुरुष योग

Dr.R.B.Dhawan

जन्मकुंडली में बनने वाले हजारों योगों में से पंच महापुरुष योग ऐसे योग हैं, जो अपना शुभ फल अवश्य देते हैं, बेशक इन योगों को बनाने वाले ग्रह अस्ट ही क्यों ना हों, या नीच राशि में ही क्यों ना हों। और यह पांच योग अपना न्यूनाधिक फल जीवन भर देते रहते हैं।

1. रूचक योग-

मंगल यदि कुंडली के केंद्र में होकर अपनी ही राशि, अथवा अपनी उच्च राशि का हो तो “रूचक योग” होता है । रूचक योग होने पर जातक बलवान, साहसी, तेजस्वी, उच्च स्तरीय वाहन रखने वाला होता है । इस योग में जन्मा जातक विशेष पद प्राप्त करता है |

2. भद्र योग-

बुद्ध ग्रह कुंडली के केंद्र में स्वगृही अथवा उच्च राशि का हो तो “भद्र योग” होता है । इस योग  में जन्मा जातक उच्च व्यवसाई होता है ।अपने प्रबंधन, कौशल, बुद्धि-विवेक का उपयोग कर व्यवसाय द्वारा धनोपार्जन करता है । ऐसे जातक के जीवन में बुध कि दशा आ जाय तो ऐसा जातक मिट्टी में भी हाथ डालेगा तो वे सोना बन जाएगी । अनेक मार्गों से अर्थोपार्जन करेगा, तथा व्यवसायिक जगत में शिखर पुरुष होता है। यह योग सप्तम भाव में हो तो जाना माना उद्योगपति बन जाता है ।

3. हंस योग-

कुंडली में यदि बृहस्पति किसी केंद्र मैं होकर स्वगृही अथवा उच्च राशि  का हो तब “हंस योग” होता है, यह जातक मानवीय गुणों से ओत-प्रोत, गौर वर्ण, सुन्दर, हसमुख, मिलनसार, विनम्र होने के साथ, अपार धन-सम्पत्तिवान होता है । पुण्य कर्मों में रुचि रखने वाला, दयालु, कृपालु, शास्त्र का ज्ञान रखने वाला होता है ।

4. मालव्य योग-

कुंडली के केंद्र में शुक्र ग्रह यदि स्वगृही उच्च राशि का होकर विराजमान हो तो “मालव्य योग” बनता है | इस योग के जातक सुन्दर, गुणी, तेजस्वी, धैर्यवान, धनी तथा जीवन भर सुख-सुविधा युक्त रहते हैं |

5. शश योग-

शनि ग्रह यदि किसी की कुंडली में स्वराशिस्थ अथवा उच्च राशिस्थ केंद्र भाव में स्थिति हो “शश योग” होता है। यह योग सप्तम भाव या दशम भाव में होता है तो, व्यक्ति विपुल धन-संपत्ति का स्वामी होता है ।व्यवसाय और नौकरी कि कला के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करता है । यह समुदाय का मुखिया जैसे उच्च पद को प्राप्त करता है ।

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दीपावली तंत्र-मंत्र विशेषांक

संपादक  :- Dr. R.B.Dhawan

“आप का भविष्य” मासिक ज्योतिषीय ई-पत्रिका अक्तूबर 2017 अंक :-  “दीपावली तंत्र-मंत्र विशेषांक” Deepawali tantra mantra viseshank जिसमें आप पाएंगे दीपावली पर सिद्ध किए जाने वाले आर्थिक समृद्धि तथा जीवनोपयोगी अनेक सरल प्रयोग।

इस अंक की विशेष बात यह है कि, ज्योतिष विज्ञान व तंत्र विज्ञान में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह कहना ठीक होगा कि, वे पूरा वर्ष दीपावली पर प्रकाशित होने वाले इस अंक की बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं। इस अक्तूबर आप ई-पत्रिका “आप का भविष्य” Diawali tantra mantra की Subscription ले ही लीजिए, बेशक आप अक्तूबर 2017 अंक से सितम्बर 2018 अंक तक की Subscription ले सकते हैं। Deepawali Tantra Mantra viseshank अक्तूबर अंक केवल तंत्र मंत्र विशेषांक ही नहीं अपितु आप के लिये बहुत उपयोगी भी है। इस अंक में गुरूजी ने आप के लिये अनेक सरल प्रयोग एवं उपाय प्रकाशित किए हैं, जिनमें से एक प्रयोग (सरल उपाय) आपने सिद्ध कर लिया तो आप इस विद्या की प्रशंसा करते नहीं थकेंगे।

तंत्र-मंत्र से संबंधित अनेक कार्य एेसे होते हैं, जो पर्वकाल में ही सिद्ध हो सकते हैं, कुछ समस्याएं होती ही एेसी हैं, जिनकी चर्चा किसी से भी नहीं कर सकते। परंतु उनका जल्दी ही समाधान न किया जाए तो वे और भी जटिल होती चली जाती हैं। आज का युग तड़क-भड़क और दिखावे का युग बनकर रह गया है, इसके प्रभाव वश अनेक युवक किसी सुन्दर युवती को देखकर मचलने लगते हैं, आजकल के हालात को देखकर तो लगता है, कुछ युवतियों का लक्ष्य दूसरी महिला मित्र के पति पर डोरे डालने का ही हो गया है। इस समस्या से पीड़ित अनेक महिलाएं तो किसी को बताना भी ठीक नहीं समझती, और यह ठीक भी है, बताकर भला अपने पति की इज्जत क्यों खराब की जाये?

इसी प्रकार कुछ ईष्यालु लोग व्यापार करने वाले अपने दूसरे प्रतिद्वंद्वी पर कोई एेसा तंत्र कर देते हैं, जिसके प्रभाव से प्रतिद्वंद्वी का व्यापार ठप हो जाता है, नौकरी करने वालों को भी कभी-कभी एेसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

गुरूजी का कहना है, एेसी समस्याओं का समाधान आप स्वयं कर सकते हैं। अक्तूबर 2017 “आप का भविष्य” diwali Tantra Mantra अंक इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए प्रकाशित किया गया है।

आज ही Aap Ka Bhavishya app डाउनलोड कीजिए और केवल 180/- में एक वर्ष (12 अंक) के लिये Subscription लीजिए।

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दीपावली मुहूर्त 2017

Diwali muhurt 2017

Dr.R.B.Dhawan

कार्तिक मास kartik की अमावस्या amavasya की रात्रि प्रदोषकाल, स्थिर लग्न में अथवा  महानिशीथ काल, mahanishith kaal स्थिर लग्न में अनुकूल चौघडिया के समय गणेश सहित देवी महालक्ष्मी-महाकाली-महासरस्वती की पूजा-आराधना diwali Pooja करने से यह देवीयां भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं।

इस वर्ष दीपावली depawli pooja (Laxmi Pooja) का पर्व 19 अक्तूबर 2017 बृहस्पतिवार के दिन होगा। दिल्ली की समय गणना अनुसार इस दिन अमावस्या रात्रि 24:44 तक रहेगी, चित्रा नक्षत्र 07:28 से आरंभ होगा, वृष (स्थिर लग्न) 19:11 से 21:06 तक रहेगी। निशीथ काल nishith kaal 20:20 से 22:54 तक, प्रदोष काल pradosh kaal 17:46 से 20:20 तक रहेगा। दीपावली की शाम प्रदोष काल में स्नान के उपरांत वस्त्राभूषण धारण करके धर्मस्थल पर श्रद्धापूर्वक दीपदान करके शुभ मुहूर्त अनुकूल चौघडिया में अपने निवास स्थान पर श्री गणेश सहित देवी महालक्ष्मी महाकाली महासरस्वती और कुबेर की पूजा diwali pooja करनी चाहिए।

महालक्ष्मी mahalxmi Pooja पूजन विशेष मुहूर्त : (1). सायं 19 : 11 से 20 : 20 तक। (2). रात्रि 20 : 20 से 20 : 59 तक। यह दोनों मुहूर्त वृष लग्न के हैं।

विशेष Diwali muhurt 2017, मध्य रात्रि महानिशीथ काल सिंह लग्न : 25 : 39 से 25 : 48 तक है। 

हर पर्व का महत्व व मुहूर्त तथा अनेक ज्योतिषीय लेख पड़ने के लिए आप हमारी एप डाउनलोड करें, इसका वार्षिक (12 अंक के लिए) subscription केवल 180/- है। “आप का भविष्य” मासिक ज्योतिषीय ई-पत्रिका का लिंक दिया गया है, जिस से आप Aap ka Bhavishya एप डाउनलोड कर सकते हैं।

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शत्रु नाशक मंत्र

         Dr.R.BDhawan

​(श्री दुर्गा सप्तशति बीजमंत्रात्मक साधना) –

इस मंत्र की साधना से शत्रु की शत्रुता नष्ट हो जाती है। (शत्रु नहीं)

ॐ श्री गणेशाय नमः [११ बार]
ॐ ह्रों जुं सः सिद्ध गुरूवे नमः [११ बार]
ॐ दुर्गे दुर्गे रक्ष्णी ठः ठः स्वाहः [१३ बार]

[सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम..]

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल  ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दीनि। नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दीनि।।

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भसुरघातिनि। जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।।

ऐंकारी सृष्टीरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका। क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तुते।।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि।।

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी। क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुंभ कुरू।।

हुं हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रै भवान्यै ते नमो नमः।।

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं। धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।।

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा। सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे।।

ॐ नमश्चण्डिका:। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
प्रथमचरित्र…

ॐ अस्य श्री प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा रूषिः महाकाली देवता गायत्री छन्दः नन्दा शक्तिः रक्तदन्तिका बीजम् अग्निस्तत्त्वम् रूग्वेद स्वरूपम् श्रीमहाकाली प्रीत्यर्थे प्रथमचरित्र जपे विनियोगः।

(१) श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं प्रीं ह्रां ह्रीं सौं प्रें म्रें ल्ह्रीं म्लीं स्त्रीं क्रां स्ल्हीं क्रीं चां भें क्रीं वैं ह्रौं युं जुं हं शं रौं यं विं वैं चें ह्रीं क्रं सं कं श्रीं त्रों स्त्रां ज्यैं रौं द्रां द्रों ह्रां द्रूं शां म्रीं श्रौं जूं ल्ह्रूं श्रूं प्रीं रं वं व्रीं ब्लूं स्त्रौं ब्लां लूं सां रौं हसौं क्रूं शौं श्रौं वं त्रूं क्रौं क्लूं क्लीं श्रीं व्लूं ठां ठ्रीं स्त्रां स्लूं क्रैं च्रां फ्रां जीं लूं स्लूं नों स्त्रीं प्रूं स्त्रूं ज्रां वौं ओं श्रौं रीं रूं क्लीं दुं ह्रीं गूं लां ह्रां गं ऐं श्रौं जूं डें श्रौं छ्रां क्लीं

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
मध्यमचरित्र..

ॐ अस्य श्री मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्रूषिः महालक्ष्मीर्देवता उष्णिक छन्दः शाकम्भरी शक्तिः दुर्गा बीजम् वायुस्तत्त्वम् यजुर्वेदः स्वरूपम् श्रीमहालक्ष्मी प्रीत्यर्थे मध्यमचरित्र जपे विनियोगः।

(२) श्रौं श्रीं ह्सूं हौं ह्रीं अं क्लीं चां मुं डां यैं विं च्चें ईं सौं व्रां त्रौं लूं वं ह्रां क्रीं सौं यं ऐं मूं सः हं सं सों शं हं ह्रौं म्लीं यूं त्रूं स्त्रीं आं प्रें शं ह्रां स्मूं ऊं गूं व्र्यूं ह्रूं भैं ह्रां क्रूं मूं ल्ह्रीं श्रां द्रूं द्व्रूं ह्सौं क्रां स्हौं म्लूं श्रीं गैं क्रूं त्रीं क्ष्फीं क्सीं फ्रों ह्रीं शां क्ष्म्रीं रों डुं

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(३) श्रौं क्लीं सां त्रों प्रूं ग्लौं क्रौं व्रीं स्लीं ह्रीं हौं श्रां ग्रीं क्रूं क्रीं यां द्लूं द्रूं क्षं ह्रीं क्रौं क्ष्म्ल्रीं वां श्रूं ग्लूं ल्रीं प्रें हूं ह्रौं दें नूं आं फ्रां प्रीं दं फ्रीं ह्रीं गूं श्रौं सां श्रीं जुं हं सं

।ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(४) श्रौं सौं दीं प्रें यां रूं भं सूं श्रां औं लूं डूं जूं धूं त्रें ल्हीं श्रीं ईं ह्रां ल्ह्रूं क्लूं क्रां लूं फ्रें क्रीं म्लूं घ्रें श्रौं ह्रौं व्रीं ह्रीं त्रौं हलौं गीं यूं ल्हीं ल्हूं श्रौं ओं अं म्हौं प्री

।ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
उत्तमचरित्र..

ॐ अस्य श्री उत्तरचरित्रस्य रुद्र रूषिः महासरस्वती देवता अनुष्टुप् छन्दः भीमा शक्तिः भ्रामरी बीजम सूर्यस्तत्त्वम सामवेदः स्वरूपम श्री महासरस्वती प्रीत्यर्थे उत्तरचरित्र जपे विनियोगः।

(५) श्रौं प्रीं ओं ह्रीं ल्रीं त्रों क्रीं ह्लौं ह्रीं श्रीं हूं क्लीं रौं स्त्रीं म्लीं प्लूं ह्सौं स्त्रीं ग्लूं व्रीं सौः लूं ल्लूं द्रां क्सां क्ष्म्रीं ग्लौं स्कं त्रूं स्क्लूं क्रौं च्छ्रीं म्लूं क्लूं शां ल्हीं स्त्रूं ल्लीं लीं सं लूं हस्त्रूं श्रूं जूं हस्ल्रीं स्कीं क्लां श्रूं हं ह्लीं क्स्त्रूं द्रौं क्लूं गां सं ल्स्त्रां फ्रीं स्लां ल्लूं फ्रें ओं स्म्लीं ह्रां ऊं ल्हूं हूं नं स्त्रां वं मं म्क्लीं शां लं भैं ल्लूं हौं ईं चें क्ल्रीं ल्ह्रीं क्ष्म्ल्रीं पूं श्रौं ह्रौं भ्रूं क्स्त्रीं आं क्रूं त्रूं डूं जां ल्ह्रूं फ्रौं क्रौं किं ग्लूं छ्रंक्लीं रं क्सैं स्हुं श्रौं श्रीं ओं लूं ल्हूं ल्लूं स्क्रीं स्स्त्रौं स्भ्रूं क्ष्मक्लीं व्रीं सीं भूं लां श्रौं स्हैं ह्रीं श्रीं फ्रें रूं च्छ्रूं ल्हूं कं द्रें श्रीं सां ह्रौं ऐं स्कीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(६) श्रौं ओं त्रूं ह्रौं क्रौं श्रौं त्रीं क्लीं प्रीं ह्रीं ह्रौं श्रौं अरैं अरौं श्रीं क्रां हूं छ्रां क्ष्मक्ल्रीं ल्लुं सौः ह्लौं क्रूं सौं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(७) श्रौं कुं ल्हीं ह्रं मूं त्रौं ह्रौं ओं ह्सूं क्लूं क्रें नें लूं ह्स्लीं प्लूं शां स्लूं प्लीं प्रें अं औं म्ल्रीं श्रां सौं श्रौं प्रीं हस्व्रीं।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(८) श्रौं म्हल्रीं प्रूं एं क्रों ईं एं ल्रीं फ्रौं म्लूं नों हूं फ्रौं ग्लौं स्मौं सौं स्हों श्रीं ख्सें क्ष्म्लीं ल्सीं ह्रौं वीं लूं व्लीं त्स्त्रों ब्रूं श्क्लीं श्रूं ह्रीं शीं क्लीं फ्रूं क्लौं ह्रूं क्लूं तीं म्लूं हं स्लूं औं ल्हौं श्ल्रीं यां थ्लीं ल्हीं ग्लौं ह्रौं प्रां क्रीं क्लीं न्स्लुं हीं ह्लौं ह्रैं भ्रं सौं श्रीं प्सूं द्रौं स्स्त्रां ह्स्लीं स्ल्ल्रीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।

(९) रौं क्लीं म्लौं श्रौं ग्लीं ह्रौं ह्सौं ईं ब्रूं श्रां लूं आं श्रीं क्रौं प्रूं क्लीं भ्रूं ह्रौं क्रीं म्लीं ग्लौं ह्सूं प्लीं ह्रौं ह्स्त्रां स्हौं ल्लूं क्स्लीं श्रीं स्तूं च्रें वीं क्ष्लूं श्लूं क्रूं क्रां स्क्ष्लीं भ्रूं ह्रौं क्रां फ्रूं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।

(१०) श्रौं ह्रीं ब्लूं ह्रीं म्लूं ह्रं ह्रीं ग्लीं श्रौं धूं हुं द्रौं श्रीं त्रों व्रूं फ्रें ह्रां जुं सौः स्लौं प्रें हस्वां प्रीं फ्रां क्रीं श्रीं क्रां सः क्लीं व्रें इं ज्स्हल्रीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(११) श्रौं क्रूं श्रीं ल्लीं प्रें सौः स्हौं श्रूं क्लीं स्क्लीं प्रीं ग्लौं ह्स्ह्रीं स्तौं लीं म्लीं स्तूं ज्स्ह्रीं फ्रूं क्रूं ह्रौं ल्लूं क्ष्म्रीं श्रूं ईं जुं त्रैं द्रूं ह्रौं क्लीं सूं हौं श्व्रं ब्रूं स्फ्रूं ह्रीं लं ह्सौं सें ह्रीं ल्हीं विं प्लीं क्ष्म्क्लीं त्स्त्रां प्रं म्लीं स्त्रूं क्ष्मां स्तूं स्ह्रीं थ्प्रीं क्रौं श्रां म्लीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(१२) ह्रीं ओं श्रीं ईं क्लीं क्रूं श्रूं प्रां स्क्रूं दिं फ्रें हं सः चें सूं प्रीं ब्लूं आं औं ह्रीं क्रीं द्रां श्रीं स्लीं क्लीं स्लूं ह्रीं व्लीं ओं त्त्रों श्रौं ऐं प्रें द्रूं क्लूं औं सूं चें ह्रूं प्लीं क्षीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(१३) श्रौं व्रीं ओं औं ह्रां श्रीं श्रां ओं प्लीं सौं ह्रीं क्रीं ल्लूं ह्रीं क्लीं प्लीं श्रीं ल्लीं श्रूं ह्रूं ह्रीं त्रूं ऊं सूं प्रीं श्रीं ह्लौं आं ओं ह्रीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
दुर्गा दुर्गर्तिशमनी दुर्गापद्विनिवारिणी ।

दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी ।।

दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा ।

दुर्गमग्यानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला ।।

दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी ।

दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता ।।

दुर्गमग्यानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी ।

दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी ।।

दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी ।

दुर्गमाँगी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी ।।

दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी ।।

[३ बार]

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ दुर्गार्पणमस्तु।।
नमः शिवाय् 
॥ चण्डिकाहृदयस्तोत्रम् ॥
अस्य श्री चण्डिका हृदय स्तोत्र महामन्त्रस्य ।

मार्क्कण्डेय ऋषिः, अनुष्टुप्च्छन्दः, श्री चण्डिका देवता ।

ह्रां बीजं, ह्रीं शक्तिः, ह्रूं कीलकं,

अस्य श्री चण्डिका प्रसाद सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।

ह्रां इत्यादि षडंग न्यासः ।
ध्यानं ।

सर्वमंगळ मांगल्ये शिवे सर्वार्त्थ साधिके ।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥
ब्रह्मोवाच ।

अथातस्सं प्रवक्ष्यामि विस्तरेण यथातथं ।

चण्डिका हृदयं गुह्यं शृणुष्वैकाग्रमानसः । ।

ॐ ऐं ह्रीं क्ळीं, ह्रां, ह्रीं, ह्रूं जय जय चामुण्डे,

चण्डिके, त्रिदश, मणिमकुटकोटीर संघट्टित चरणारविन्दे,

गायत्री, सावित्री, सरस्वति, महाहिकृताभरणे, भैरवरूप

धारिणी, प्रकटित दंष्ट्रोग्रवदने,घोरे, घोराननेज्वल

ज्वलज्ज्वाला सहस्रपरिवृते, महाट्टहास बधरीकृत दिगन्तरे,

सर्वायुध परिपूर्ण्णे, कपालहस्ते, गजाजिनोत्तरीये,

भूतवेताळबृन्दपरिवृते, प्रकन्पित धराधरे, 

मधुकैटमहिषासुर, धूम्रलोचन चण्डमुण्डरक्तबीज 

शुंभनिशुंभादि दैत्यनिष्कण्ढके, काळरात्रि, 

महामाये, शिवे, नित्ये, इन्द्राग्नियमनिरृति वरुणवायु 

सोमेशान प्रधान शक्ति भूते, ब्रह्माविष्णु शिवस्तुते, 

त्रिभुवनाधाराधारे, वामे, ज्येष्ठे, रौद्र्यंबिके, 

ब्राह्मी, माहेश्वरि, कौमारि, वैष्णवी शंखिनी वाराहीन्द्राणी

चामुण्डा शिवदूति महाकाळि महालक्ष्मी, महासरस्वतीतिस्थिते, 

नादमध्यस्थिते, महोग्रविषोरगफणामणिघटित 

मकुटकटकादिरत्न महाज्वालामय पादबाहुदण्डोत्तमांगे, 

महामहिषोपरि गन्धर्व विद्याधराराधिते,

नवरत्ननिधिकोशे तत्त्वस्वरूपे वाक्पाणिपादपायूपस्थात्मिके,

शब्दस्पर्शरूपरसगन्धादि स्वरूपे,

त्वक्चक्षुः श्रोत्रजिह्वाघ्राणमहाबुद्धिस्थिते, 

ॐ ऐंकार ह्रीं कार क्ळीं कारहस्ते आं क्रों आग्नेयनयनपात्रे प्रवेशय, 

द्रां शोषय शोषय, द्रीं सुकुमारय सुकुमारय, 

श्रीं सर्वं प्रवेशय प्रवेशय, त्रैलोक्यवर वर्ण्णिनि 

समस्त चित्तं वशीकरु वशीकरु मम शत्रून्,

शीघ्रं मारय मारय, जाग्रत् स्वप्न सुषुप्त्य वस्थासु अस्मान् 

राजचोराग्निजल वात विषभूत-शत्रुमृत्यु-ज्वरादि स्फोटकादि 

नानारोगेभ्योः नानाभिचारेभ्यो नानापवादेभ्यः परकर्म मन्त्र 

तन्त्र यन्त्रौषध शल्यशून्य क्षुद्रेभ्यः सम्यङ्मां 

रक्ष रक्ष, ॐ ऐं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रः, 

स्फ्रां स्फ्रीं स्फ्रैं स्फ्रौं स्फ्रः – मम सर्व कार्याणि 

साधय साधय हुं फट् स्वाहा –

राज द्वारे श्मशाने वा विवादे शत्रु सङ्कटे ।

भूताग्नि चोर मद्ध्यस्थे मयि कार्याणि साधय ॥ स्वाहा ।

चण्डिका हृदयं गुह्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।

सर्व काम प्रदं पुंसां भुक्ति मुक्तिं प्रियच्चति ।

(देवी के नौ रूपों का एक स्वरूप दक्षिण भारतीय परम्परा में निम्न प्रकार से उपलब्ध होता है) –

प्रथमा वन -दुर्गेति द्वितीया शूलिनी माता।

तृतीया जातवेदा च चतुर्थी शान्तिरिष्यते।।

पंचमी शबरी चैव षष्ठी ज्वालेति गीयते।

सप्तमी लवणा चेति अष्टम्यां आसुरी माता।।

नवमी दीपदुर्गेति नव दुर्गा प्रकीर्तिता।।
महा नवार्ण मंत्र:- 

ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं महादुर्गे नवाक्षरी नवदुर्गे नवात्मिके नवचण्डी महामाये महामोहे महायोगनिद्रे जये मधुकैटभ विद्राविणी महिषासुर मर्दिनी धूम्रलोचन संहन्त्रि चण्डमुण्ड विनाशिनी रक्तबीजान्तके निशुम्भध्वंसिनी शुम्भदर्पघ्नि देवि अष्टादश बाहुके कपाल- खट्वांग शूल खड्ग खेटक धारिणी छिन्न मस्तक धारिणी रूधिर मांस भोजिनी समस्त भूत प्रेतादि योग ध्वंसिनी ब्रह्मेन्द्रादि स्तुते देवि मां रक्ष रक्ष मम शत्रून् नाशय नाशय ह्रीं फट् ह्रूं फट् ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।।

यह एक गोपनीय साधना विधान है, इस से अधिक विवरण प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। 

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