शनि साढ़ेसाती

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शनि साढ़ेसाती का मनुष्य पर प्रभाव :-
शनिदेव की चित्र-विचित्र विषिष्टताओं की व्याख्या करने के लिये अनेकानेक प्रसंग प्राचीन भारतीय साहित्य में उपलब्ध हैं, इनके द्वारा क्रूर तथा अनुकूल फल देने वाले शनि ग्रह की सामर्थ्य का पता चलता है। शनिदेव के स्वरूप को समझने के लिये इन पुराण के आख्यानों का उल्लेख आवश्यक है। इनसे ज्ञात होता है कि समय-समय पर शनिदेव ने ईश्वरीय अवतारों से लेकर चक्रवर्ती सम्राटों तक को अपनी विशेष ऊर्जा से विचलित किया है।
परब्रह्म के रूवरूप- ब्रह्मा-विष्णु-महेष में भूतभावन भगवान शंकर ने सृष्टि के संहार अथवा विसर्जन का दायित्व ग्रहण किया है। सृष्टि के समस्त जीवधारियों को आचरण के अनुरूप अनुशासित करना बहुत कठिन कार्य था। इस वृहत्तर कार्य में अपनी सहायता हेतु भगवान शिव ने सहयोगी गणों को जब अपने साथ लिया था प्रायः इसी समय छाया के गर्भ से भगवान भास्कर के 9 पुत्रों ने जन्म लिया था। इन 9 पुत्रों में शनिदेव एवं यम की भयोत्पादक गतिविधियाँ विस्मयकारी थी। इनके प्रचण्ड बाहुबल से दैवी शक्तियाँ अत्यंत प्रभावित थीं। परिणामतः कल्याण तथा विध्वंस के देव भगवान शंकर ने इन्हें अपनी सेवा में ग्रहण कर लिया। शनिदेव को शिव द्वारा कर्मानुसार दण्ड प्रदान करने का अधिकार प्राप्त हुआ। यम मृत्यु के निमित्त नियुक्त हुए। इस पुराणगाथा में शनि के कारकत्व से संबधित अनेक सूक्ष्म संकेत उपलब्ध होते हैं। साथ ही शनि-उपचार में शिवोपासना का माहात्म्य भी रेखांकित किया गया है।
भगवान सूर्य के नौ पुत्रों में अपनी भीषणता के लिए शनि सर्वोपरि हैं। कृष्ण वर्णीय यमुना शनि की सहोदरा और कालनियन्त्रक यम शनि के अनुज हैं। शनि की रूक्षता का कारण उनका विचित्र परिवार भी है। पुराण कथाओं के अनुसार सन्तानों के योग्य होने पर सूर्य ने प्रत्येक सन्तान हेतु एक-एक लोक की व्यवस्था की। किन्तु प्रवृति से पाप-प्रधान ग्रह शनि अपने एक लोक के अधिपत्य से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने समस्त लोकों पर आक्रमण करने की योजना तैयार की। सूर्य को शनि की भावना से अत्याधिक पीड़ा हुई। किन्तु उनके परामर्श का शनि पर कोई प्रभाव नहीं पडा। अन्ततः सूर्य भगवान ने शिव भगवान से आतुर निवेदन किया। भक्तभयहारी शिव ने तब उद्दण्ड शनि को चेतावनी दी। शनि ने जब उपेक्षा की तो शिव-शनि युद्ध प्रारम्भ हुआ। शनि ने अद्भुत पराक्रम से नन्दी तथा वीरभद्र सहित समस्त शिवगणों को परास्त कर दिया। अपने सैन्यबल का संहार देखकर भगवान शिव कुपित हो गये। उन्होंने प्रलयंकारी तृतीय नेत्र खोल दिया। शनि ने भी अपनी मारक दृष्टि का संधान किया। भगवान शिव और शनि की दृष्टियों से उत्पन्न एक अप्रतिम ज्योति ने शनि लोक को आच्छादित कर लिया।
तत्पश्चात भगवान शिव ने क्रोधित होकर शनि पर त्रिशूल से प्रहार किया। शनि यह आघात सहन नहीं कर सके। वह संज्ञाशून्य हो गये। पुत्र की यह स्थिति देखकर सूर्य का पुत्रमोह जाग उठा। भगवान् आशुतोष से उन्होंने शनि के जीवन रक्षण हेतु भाव भरा निवेदन किया आशुतोष ने प्रसन्न होकर शनि के संकट को हर लिया इस घटना से शनि ने भगवान शिव की सर्वसमर्थता स्वीकार कर ली। उन्होंने भगवान शिव से पुनः पुनः क्षमायाचना की। शनि ने यह भी इच्छा व्यक्त की कि वह अपनी समस्त सेवायें शिव को समर्पित करना चाहते हैं। प्रचण्ड पराक्रमी शनिदेव के रणकौशल से अभिभूत भूतभावन भगवान भोले नाथ ने शनि को अपना सेवक बना लिया। भगवान शिव ने शनि को दण्डाधिकारी नियुक्त किया। इसी कारण लोग शनि साढ़ेसाती अथवा शनि महादशा में शारीरिक, मानसिक व आर्थिक पीडा होने पर भगवान शिव की आराधना करते हैं। भगवान शिव की शरण में आये व्यक्ति को शनिदेव कष्ट नही देते तथा उससे प्रसन्न रहते हैं।
शनि ग्रह के संबंध में अनेक भ्रांतियां हैं, और इसलिए उसे मारक, अशुभ और दुःखकारक माना जाता है। पाश्चात्य ज्योतिषी भी इसे दु:ख देने वाला ग्रह मानते हैं। शनि ग्रह उतना अशुभ नही है, जितना इसे समझा जाता है। वस्तुतः वह शत्रु नहीं मित्र है। व्यक्ति को अध्यात्म व मोक्ष दिलाने वाला केवल शनि ग्रह ही है। नवग्रहों के कक्षा क्रम में शनि, सूर्य से सबसे दूर है।
शनिदेव को शनैश्चर भी कहा जाता है। एक मान्यता के अनुसार पिप्लादि ऋषि के पिता की मृत्यु शनि की साढेसाती के दौरान हुई तो पिप्लादि बहुत क्रुद्ध होकर शनैश्चर को दण्ड देने के लिए शनैश्चर को खोजने के पश्चात अपने दिव्य मुद्दगर से प्रहार करने लगे शनैश्चर बचाओं-बचाओं की गुहार करते हुए दौड़ रहे थे। सभी देवतागण शनि की सहायता के लिए पधारे किन्तु तब तक पिप्लादि ने शनि की टांग पर प्रहार कर उन्हें लंगडा बना दिया। देवताओं के समझाने के पश्चात् ही ऋषि का गुस्सा शांत हुआ। उन्हें बताया गया कि शनिदेव प्रकृति के नियमों से बंधे हैं, वो वही करते हैं जो व्यक्ति का कर्म फल बताता है। तब से ही शनिवार के दिन पीपल के नीचे तिल तेल का दीपक जलाने से शनिदेव जातक पर प्रसन्न होकर कष्ट में कमी कर देते हैं।
याद रखें हर प्राणी को प्रत्येक तीस वर्ष में एक बार शनि साढे़साती अवश्य ही आती है। प्रत्येक प्राणी को साढे़साती लगने से पहले जप, तप, यज्ञ अवश्य कर लेना चाहिए, ताकि शनि साढे़साती अथवा शनि महादशा के प्रतीकूल प्रभाव को कम किया जा सके।
शनि भगवान् सूर्य के पुत्र हैं। छाया (स्वर्णा) इनकी माता है शास्त्रों के अनुसार ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के श्राप के कारण है। यह कथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में इस प्रकार वर्णित है-
बचपन से ही शनि देवता भगवान श्रीकृष्ण के अनुराग में निमग्न रहते थे। व्यस्क होने पर इनके पिता ने चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह कर दिया। पत्नी सती-साध्वी और तेजस्विनी थी। एक रात ऋतु-स्नानकर पुत्र-प्राप्ति की अभिलाषा से वह पति के पास पहुँची। पति ध्यान में बैठे थे। बाह्य ज्ञान न था। पत्नी प्रतीक्षा कर थक गयी। ऋतुकाल निष्फल हो चुका था। इस उपेक्षा से क्रुद्ध होकर सती ने शाप दे दिया कि जिसे तुम देख लोगे वह नष्ट हो जायेगा। ध्यान टूटने पर शनि देवता ने पत्नी को मनाया। पत्नी को स्वयं पश्चाताप हो रहा था, किंतु श्राप के प्रतीकार की शक्ति उसमें न थी। तब से शनि देवता सिर नीचा करके रहने लगे, क्योंकि वे किसी का अहित नहीं चाहते थे। उनकी दृष्टि पड़ते ही कोई भी नष्ट हो सकता था।
भगवान शिव शनिदेव के गुरू हैं। पहले शनिदेव ने ब्रह्मा जी की तपस्या की थी फिर उन्होंने भगवान शिव की तपस्या करके उन्हें अपना आजीवन गुरू बनाया। शनि महाराज भगवान श्रीकृष्ण के भी भक्त थे, भगवान कृष्ण की भक्ति के कारण ही इनका एक नाम कृष्णों भी पड़ा।
शनिदेव से संबधित पीड़ा (शनि साढ़ेसाती अथवा शनि महादशा) शांति के लिए जब श्रीकृष्ण भगवान की भक्ति की जाती है तो, स्वयं शनिदेव अपने ईष्ट की शरण में जाने पर मनुष्य को उतना कष्ट नहीं देते हैं । श्रीकृष्ण भगवान का आगे का जन्म श्री नाथजी के रूप में माना गया है, श्रीनाथ जी का विवाह स्वयं शनिदेव की बहन यमुना के साथ हुआ था। शनिदेव की बहन यमुना के पति श्रीनाथ जी शनिदेव के बहनोई हुए।
यहाँ बात बताना आवश्यक है किसी भी जन्म कुण्डली में चाहे शनि की स्थिति मित्र की हो अथवा शत्रु की। शनि साढ़ेसाती के समय न मित्र होते हैं न शत्रु वह हमारे कर्मों का फल ही हमें प्रदान करते हैं। शनि की साढ़ेसाती हर व्यक्ति के जीवन में तीस वर्ष के अंतराल पर आती है, उन तीस वर्षों में किये गये कर्मों का शुभाशुभ प्रभाव साढ़ेसाती के समय प्राप्त होता है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु शनि साढ़ेसाती आने से पूर्व ही हो जाती है तो, वो सारे प्रभाव व्यक्ति को अपने अगले जन्म में अवश्य प्राप्त होते हैं। इसलिए शनिदेव के प्रकोप से बचना है तो कोई कार्य ऐसा न करें जिसका प्रतिफल हमारे लिए कष्ट देने वाला हो।
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कर्म और भाग्य

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant)

कर्म और भाग्य का सम्बन्ध अटूट है, कर्म जैसे रहे हों भाग्य भी वैसा ही होगा, कर्म कैसे किये हैं, जिस कारण भाग्य ऐसा बना है? यह जातक की जन्मकुंडली (कर्म कुंडली) से सांकेतिक भाषा से पता चलता है।
मनुष्य को सामान्य सफलतायें यद्यपि पुरूषार्थ से मिल जाती हैं। लेकिन असाधारण सफलतायें पुरूषार्थ के साथ-साथ भाग्य की देन हैं। जातक की जन्म पत्रिका उसके संचित कर्मो का अभिलेखा होती है। क्योंकि व्यक्ति का जन्म उसके पूर्व जन्मार्जित कर्म फल भोग के लिये होता है। व्यक्ति के जन्मांग के 12 भाव 12 राशियों का प्रतिनीधित्व करते हैं। तथा उनके स्वामी ग्रह (7 ग्रह) भावेश कहलाते हैं। वे कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार शुभाशुभ फल देते हैं। ये ग्रह क्रमशः लग्नेश, धनेश, पराक्रमेश, सुखेश, पंचमेश, ऋणेश, सप्तमेश, अष्टमेश, भाग्येश, कर्मेश (राज्येश) लाभेश एवं व्ययेश कहलाते हैं।
चन्द्र, बुध, गुरू, शुक्र को सौम्य ग्रह कहा गया है। सूर्य, मंगल, शनि एवं राहु, केतु को पाप ग्रह कहा गया है। सौम्य ग्रह केन्द्र एवं त्रिकोण में बैठकर जीवन को सुखद बनाते हैं। पाप ग्रह जहाँ बैठते हैं, वहाँ हानि करते हैं। प्रत्येक ग्रह अपने से सातवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है, लेकिन गुरू, राहु, केतु को पाँचवी, नौवीं भी पूर्ण दृष्टि होती है। इसी प्रकार मंगल की चौथी और आठवीं भी पूर्ण दृष्टि होती है। तथा शनि की तीसरी और दसवीं भी पूर्ण दृष्टि होती है। ज्योतिष के दो सिद्धान्त देखें, स्थान वृद्धि करे शनि, दृष्टि वृद्धि करो गुरू।‌ इस के अलावा जो भाव अपने स्वामी से दृष्ट होगा। वह ग्रह उस भाव की वृद्धि होगी। ग्रह स्वराशि, उच्च राशि, मित्र राशि, नीच राशि, एवं शत्रु राशि में स्थिति अनुसार अपना शुभाशुभ फल देते हैं। वक्री ग्रह भी अपनी प्रकृति अनुसार फल देते हैं। जन्म कुंडली में ग्रह जिस राशि में है, यदि नवांश कुंडली में भी वह ग्रह उसी राशि में हो तो श्रेष्ठ फल देता है। जन्म कुंडली के एक, चार, सात एवं दसवां भाव केन्द्र भाव कहलाते हैं। तथा पाँचवां एवं नौवां भाव त्रिकोण और छठा, आठवां एवं बारहवाँ भाव त्रिक भाव होते हैं। तृतीय एकादश भाव को उपचय कहा जाता है।
जन्म लग्न की भाँति चन्द्र लग्न एवं सूर्य लग्न को भी पृथक महत्व दिया गया है। चलित गोचर ग्रह फल के लिये तो चन्द्र लग्न ही प्रमुख है। इस प्रकार तीनो लग्नों, चलित ग्रह, नवांश, विंशोत्तरी महादशा आदि का समन्वय युक्त फल कथन ही सही बैठता है।
जन्म कुंडली का दूसरा भाव धन संचय का, चौथा भाव अचल सम्पति का दशम भाव कमाई का/तनख्वाह का, ग्यारहवां भाव दिन प्रतिदिन के लाभ का तथा पाँचवे एवं नौवे भाव एकाएक सम्पत्ति लाभ के माने जाते हैं। छठे भाव से रोग, ऋण एवं शत्रुता का विचार करते हैं। आठवें भाव से दरिद्रता एवं द्वादश भाव से व्यय तथा हानि देखते हैं। पाप ग्रह अपनी प्रकृति के अनुसार फलनाश करते हैं। वहीं सौम्य ग्रह केन्द्र एवं त्रिकोण में स्थित होकर जीवन को सुखमय बनाते हैं। यदि स्थिति उल्टी हो अर्थात शुभ ग्रह त्रिक स्थानों मे हों और अशुभ ग्रह केन्द्र त्रिकोण मे हों तो निश्चित ही व्यक्ति का जीवन अत्यंत संघर्षमय हो जाता है। ज्योतिष विज्ञान इस तथ्य को प्रमाणित करता है। कि व्यक्ति उच्च ग्रहों की महादशा में जन्म जन्मांतर में किये गये सत्कर्मो का फल भोगता है। और नीच ग्रहों की दशा में पूर्व जन्मार्जित दुष्कर्मो का स्वराशि एवं वर्गोतमी ग्रहों की महादशा में उस जन्म के कर्मो का फल भी मिलता है। जन्मांग गत ग्रह हमारे कर्म फलभोग की सूचना देते हैं।
यदि चन्द्र लग्न एवं सूर्य लग्न पाप ग्रहों के मध्य पाप कर्तरी योग बनायें तो जीवन घोर संघर्ष युक्त रहता है। और वहीं यदि ये लग्ने शुभ मध्यत्व (अर्थात सूर्य लग्नः चन्द्र लग्न के दोनों ओर शुभ ग्रह हों) में हों तो जातक सामान्य परिश्रम प्रयास से ही अच्छी सफलता पा लेता है। यदि धनेश एवं लाभेश दोनों छठे भाव में स्थित हों तो व्यक्ति जीवन भर ऋण भार से दबा रहता है। यदि लग्नेश एवं नवमेश में भाव परिवर्तन हो तो व्यक्ति भौतिक उन्नति के साथ आध्यात्मिक उन्नत्ति भी करता है। चन्द्र एवं गुरू एक दूसरे से सम-सप्तक हों तो व्यक्ति दूसरे के धन का सुखोपभोग करता है। वैसे भी चन्द्र से गुरू का केन्द्र में होना गज केसरी राज योग देता है। और व्यक्ति शासकीय सेवा से जुड़ता है। यदि द्वितीय, पंचम, नवम, दशम एवं लाभ भाव में उच्च राशि के ग्रह विशेषतः शुक्र या केतु हों तो व्यक्ति को अचानक धन लाभ देते हैं। ये ग्रह अपनी दशा एवं महादशा तथा गोचर में श्रेष्ठ स्थिति बनने पर अवश्य लाभ देते हैं। ग्रहों का भाव परिवर्तन फलो में वृद्धि करता है, यथा लाभेश दूसरे भाव में हो और द्वितीयेश लाभ भाव में हो तो व्यक्ति की सुख-समृद्धि बढ़ती रहती है। छठे, आठवें, बारहवें भाव के स्वामियों की दशा में खर्चे अधिक एवं आय कम हो जाती है। केन्द्र एवं त्रिकोण स्थित ग्रहों की महादशा में आय-व्यय का श्रेष्ठ संतुलन बना रहता है। गुरू एवं शुक्र की महादशा उचित एवं न्यायिक मार्गों से धन देती है। वहीं शनि एवं राहु दो नम्बर के मार्ग से धन लाभ कराते हैं। यदि दशम भाव में राहु अपनी उच्च राशि में हो तो अपनी महादशा में व्यक्ति को करोड़ों रूपयों का लाभ देता है। महादशा के साथ अन्तर्दशा पर भी गौर करें यदि अन्तर्दशा का स्वामी ग्रह महादशा के स्वामी से छठा, आठवां, बारहवां हो तो धन प्राप्ति में बाधाये आती हैं। यदि अन्तर्दशा का स्वामी महादशा नाथ से दूसरा हो तो धन संग्रह होता है। चतुर्थ होने पर अचल संपत्ति का लाभ एवं वृद्धि देता है। त्रिकोण होने पर आकस्मिक लाभ तथा दसवें होने पर राज्य से लाभ देता है। लाभेश की महादशा प्रचुर धन लाभ देती है।
यज्जातकेषु द्रतिणं प्रदिष्टं या कर्म वार्ता कथिता ग्रहस्य। आलोक योगोद् भावंज, तत्सर्व कृतिन्योजय तद् दशायाम।।
अर्थात् ग्रहों के जो द्रव्य, आजीविका, वर्ण, स्वभाव, दृष्टि तथा योगज फल कहे गये हैं। वे सब फल उन ग्रहों की दशा अन्तर्दशा में धटित होते हैं। यदि लग्नेश छठे, आठवें, बारहवें, भाव को छोड़कर कहीं विद्यमान हो तो मनुष्य राजाओं द्वारा सम्मानित होता है। लग्नेश की स्थिति शुक्र के साथ होना अनिवार्य है। दशमेश से लग्नेश का सम्बन्ध राजयोगकारी कहा गया है। यदि दोनों ही बलशाली हों, क्रूर ग्रहों के प्रभाव से मुक्त हों तो अवश्य ही राज पद की प्राप्ति होती है। दशम भाव में लग्नेश तथा लग्न में दशमेश होने से व्यक्ति बहुत सी भूमि का स्वामी धन एवं सौन्दर्य के कारण विख्यात् तथा बहुत धन सम्पत्ति का स्वामी होता है। एकादश स्थान में लग्नेश तथा लग्न में एकादशेश व्यक्ति को राजा एवं दीर्घायु बनाता है।
लग्नाधीशेऽर्थगेचेद् धन भवन पतौ लग्नयातेऽर्थवान् स्यात्। बुध्या चार प्रवीणः परम सूकृत्कृत्सारभृद् भोग शलीः जातकंलकार।।
लग्नेश धन भाव में धनेश लग्न में होने पर जातक धनी, बुद्धि से आचरण करने वाला धार्मिक अच्छे कार्य करने वाला यथार्थवान एवं भोगी होता है। राहु-केतु के नाम से लोग भयभीत रहते हैं। लेकिन:-
केन्द्रऽथवा कोण गृहे वसेतां, तमोग्रहावन्य तरेज चाँदि। नाथेन सम्बन्धवशाद् भवेतां, तौ कारकावुक्तमि हेति विज्ञै।।
यदि राहु-केतु केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो तथा उनका दूसरे केन्द्र से या त्रिकोण से सम्बन्ध हो अथवा केन्द्र में होते हुये त्रिकोणेश से या त्रिकोण में रहते हुये केन्द्रेश से सम्बन्ध हो तो ये उत्तम योग कारक होते हैं। या तीसरे, छठे, ग्यारहवें भाव में हो तो इनकी दशा शुभ फल देती है। वक्री ग्रह की दशा में धन, स्थान और सुख हानि होती है। व्यर्थ भ्रमण एवं सम्मान हानि भी होती है। मार्गी ग्रह की महादशा धन, सम्मान, सुख, यशवृद्धि एवं श्रेष्ठ आजीविका दायक होती है। यदि पंचमेश एवं नवमेश केन्द्र में हो तथा बुध, चन्द्र व गुरू द्वारा दृष्ट हो तो जातक धनी, सुखी, संतुष्ट एवं धर्मात्मा होता है। लग्न के नवांश का स्वामी और नवमेश दोनों परम उच्चांश में हो, और लाभेश बलवान हो तो, व्यक्ति के पास अटूट सम्पत्ति होती है। नवम भाव में सूर्य, गुरू तथा दशम भाव में मंगल बुध हो तो जातक राज्य में सर्वोच्च पद पाता है। सर्व दृष्टि से सुखी एवं सम्पन्न रहता है। यदि लग्न को छोड़कर सभी ग्रह परस्पर त्रिकोण भाव में स्थित हो या लग्नेश बली होकर केन्द्र में हो तथा चतुर्थेश लग्न में हो और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक भूमिपति बनता है। भूमि से ही अथाह लाभ पाता है।
इस प्रकार व्यक्ति के जन्मांग में अनेकानेक सूयोग्य- कूयोग उसके जीवन का संचालन करते हैं। हमारे शुभ कर्म हमें सुयोग्य तथा अशुभ कर्म कुयोग प्रदान करते हैं। कर्म ही हमारे भाग्य का निर्माण करते हैं। कर्म फल भोग का सिद्धान्त होने से व्यक्ति के पूर्व जन्मार्जित कर्म ही वर्तमान भाग्य का निर्धारण करते हैं। रीति-नीति धर्माचरणा तथा देवी-देव पूजा, जप, अनुष्ठान दानादि के द्वारा कुयोगों के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है। तथा सूयोगों को बलवान बनाकर पूर्ण लाभ लिया जा सकता है।

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त्राटक

त्राटक एक यौगिक क्रिया या साधना है, त्राटक कहते हैं- बिना पलक झपके एकटक किसी वस्तु या व्यक्ति की ओर देखते रहने को, यह साधना मन को एकाग्र और केन्द्रित करने के लिये बहुत उपयोगी है। वस्तुत: मन को एकाग्र करना ही मनुष्य के लिये सब से कठिन कार्य है। मन की शक्ति आपार है, इस शक्ति को यदि ठीक प्रकार से समझकर (संंगठित करके) सही दिशा में प्रयोग किया जाये तो मनुष्य ऐसे-ऐसे आश्चर्यजनक कार्य करने लगता है, जिनके परिणाम भौतिक अविष्कारों से भी अधिक महत्व के होते हैं, तथा लौकिक व अलौकिक सिद्धियाँ भी प्राप्त हो सकती हैं, जिनका प्रयोग कर साधक एक महान विभूति की तरह सम्मानित हो सकता है।

कैसे करें त्राटक साधना- मनुष्य के मन में एक पल में सैकडों विचार आते हैं (यह मानव मस्तिष्क की कार्य प्रणाली है।) और वे सैकडों विचारों पर एक समय में कार्य नहीं कर सकता। अतः उनमें से अधिकांश विचार निरर्थक हो जाते हैं, यदि उनमें से मस्तिष्क दो चार विचार चुन लेता है, तो फिर यह निर्णय करता है कि इनमें से कौन सा विचार उत्तम है? कौन सा गलत है? परंतु आमतौर पर इसमें भी वह सही या गलत का चुनाव नहीं कर पाता, तब वह असमजस की स्थिति में रहता है, और परिणाम स्वरूप कोई भी कार्य नहीं कर पाता। क्योकि उसका आज्ञाचक्र सक्रीय नहीं होता, और यदि उसका आज्ञाचक्र सक्रीय हो, तब क्या हो? तब वह हर उस विचार और उसके परणाम की बखूबी पहचान कर लेगा जो उसके लिये विशेष उपयोगी हो सकता है। यदि ऐसा करने में साधक सफल होता है तो एक दिन वह साधारण साधक से एक ऐसी विभूति के रूप में परिवर्तित होगा कि लाखों लोगों को मार्गदर्शन करेगा। और यह तभी संभव है जब वे अभ्यास के द्वारा अपना आज्ञाचक्र सक्रीय कर ले, इसके लिये सर्वोंत्तम यौगिक क्रिया है- त्राटक त्राटक साधना। त्राटक एकमात्र वह यौगिक क्रिया है, जिससे द्वारा साधक आज्ञाचक्र पर तो विजय पा ही सकता है, साथ ही साथ वह प्रकृति के अनेक रहस्यों का ज्ञान भी अर्जित कर सकता है। यह आज्ञाचक्र मानव शरीर में दोनो भ्रकुटियों के मध्य में एक महत्वपूर्ण ग्रन्थि है, जो कि अन्य चक्रों की तरह
लगभग सुप्तावस्था में ही रहती है, जिसके सक्रीय हो
जाने पर साधक न केवल अपने ही नहीं अपितु दूसरों के भविष्य में भी झाँक सकता है। वे जान सकता है कि उसके सामने वाले व्यक्ति के मन में क्या चल रहा है? वे जान सकता है कि कौन उसके लिये भविष्य में कैसे काम आ सकता है। कौन उसके प्रति कैसे विचार रखता है। आने वाले समय में किस प्रकार की योजना उसे सफलता के शिखर तक ले जा सकती है। यहां तक की उसके आस-पास किस प्रकार की विचार धारायें अथवा अशरीरी आत्मायें भ्रमण कर रही हैं, वह उसके लिये किस प्रकार से सहायक हो सकती हैं? अथवा उनसे किस प्रकार कोई जनहित का कार्य करवाया जा सकता है? यह सभी कुछ तभी संभव है
जब सुप्त आज्ञाचक्र को सक्रिय किया जाये। जब इस
चक्र को सिद्ध (स्क्रीय) कर लिया जाये तब त्राटक का अभ्यास सहज है, और इस चक्र को सिद्ध करने के लिये यह बहुत ही उपयोगी और सरल मार्ग है, सरल यौगिक क्रिया है।
कैसे करें त्राटक का अभ्यास?- एक सफेद रंग के कागज में एक रूपये के सिक्के जितना बडा और गोल छेद कर लें, इस छेद को कागज के पीछे से एक पीले कागज को चिपकाकर बंद कर दें, आगे से देखने पर पीले रंग की एक गोल बिन्दी दिखाई देगी, अब इस गोल पीली बिन्दी में बीचोबीच एक काली मिर्च के आकार का काले रंग से निशान बना लें बस इसी काले निशान पर ही आप की दृष्टि रहेगी। एक दूसरे प्रकार के अभ्यास में यही काले निशान वाली पीली बिन्दी एक दर्पण पर भी चिपका सकते हैं, इस सफेद कागज अथवा दर्पण को अपने से दो फुट के फासले पर ऐसे टांग दें कि काला बिन्दु बिल्कुल आपकी आंखों के सामने पड़े और इस काले बिन्दु को पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर स्थिर दृष्टि से देखने का अभ्यास करें।
दाहिने नेत्र में काल का, बायें नेत्र ने शक्ति का और शिव नेत्र (त्रिकुटी में) ब्रह्म का निवास है। शिव नेत्र से विचार उत्पन्न होता है। दाहिने नेत्र से इच्छा पैदा होती है और बांये नेत्र से क्रिया उत्पन्न होती है। पद्मासन से बैठो, नेत्रों को बंद करो, जीभ को तालु की ओर चढ़ा लो, अपने ध्यान को दोनों भृकुटियों के मेल के स्थान से (अर्थात् नाक की जड़ से) दो अंगुल ऊपर भू्रमध्य पर जमाओ, यह ध्यान सिर के बाहरी भाग पर न होना चाहिए। (आज्ञाचक्र पर) ध्यान के समय शिवमंत्र (ऊँ नमः शिवाय) का मन से जाप करना चाहिए। ऐसा करने से धीरे-धीरे मन स्वयं एकाग्र हो जाता है, और साधक का दिव्यचक्षु खुल जाता है, उसको सब स्थानों की घटनाएं दिखलाई पड़ने लगती हैं, और देव-दर्शन प्राप्त होता है। अभ्यास के समय जो विचार या दृश्य ध्यान में आये उसे प्रभु का छद्मवेश समझो, उसे भी प्रभु ही मानों, ब्रह्ममय मानो जो कुछ भी लीलायें आप ध्यान में देखें या समझें ऐसा समझें कि वह क्रियाएं आप प्रभु के साथ ही कर रहे हैं। ऐसा करने से प्राण स्थिर होकर ब्रह्मनाद भी सुनाई देगा, ब्रह्मनाद दाहिने कर्ण में सुनाई देता है, सद्गुरु भी दाहिने ही कान में मंत्र फूंकते हैं, ब्रह्मनाद का दूसरा नाम परा है।
त्राटक करने से आरम्भ में उष्णता के कारण आंखों से गरम पानी जायेगा, उसे जाने दे, बंद न करें लगभग एक सप्ताह के अंदर ही पानी का जाना बंद हो जावेगा, पानी से यदि आंखें बीच में ही बंद हो जायें तो कोई हर्ज नहीं, आंखें पोंछकर फिर से अभ्यास आरंभ करे, चित्त-वृत्ति को स्थिर करके बिना पलक गिराये, जितनी अधिक देर तक अभ्यास किया जा सके उतना ही अधिक लाभप्रद होगा। पहले प्रतिदिन दस पन्द्रह मिनट ही अभ्यास करें, पीछे धीरे-धीरे घंटा सवा घंटे तक का अभ्यास बढ़ा लें, जब आधे घंटे तक चित्त को स्थिर रखकर बिना पलक गिराये एकाग्र दृष्टि से देखने का अभ्यास हो जाता है तब इष्टदेवता के दर्शन होते हैं और अनेक चमत्कार दीखाई पड़ने लगते हैं, लेकिन साधक को चाहिए कि इन चमत्कारों में न पड़कर भगवत्स्वरूप की भावना को ही दृढ़ रखकर उसका प्रत्यक्ष होते ही उसमें तन्मय हो जायें, उसी में लीन हो जायें। यदि पलकों पर अधिक तनाव प्रतीत हो तो पलकों पर जोर देकर भौंहाें को कस दें, इससे आंखें अधिक देर तक खुली रहेंगी।
बहुत अभ्यास हो जाने के पश्चात् बिन्दु-ज्योतिर्बन्दु, त्रिकुटि (भ्रुमध्य) या नासाग्र पर स्थिर दृष्टि से अभ्यास करना बहिर्मुख (बाह्य) त्राटक कहलाता है। हृदय अथवा भू्रमध्य में नेत्र बंद रखकर एकाग्रता पूर्वक चक्षुवृत्ति की भावना करने को अन्तरत्राटक कहते हैं। इन अन्तत्राटक और ध्यान में बहुत समानता है। भ्रुमध्य में त्राटक करने से आरंभ में कुछ दिनों तक सिर में दर्द हो जाता है, तथा नेत्र को बरौनी में चंचलता प्रतीत होने लगती है, परन्तु कुछ दिनों के पश्चात् नेत्रवृत्ति में स्थिरता आ जाती है, हृदय प्रदेश में वृत्ति की स्थिरता के लिए प्रयत्न करने वालों को ऐसी प्रतिकूलता नहीं होती।
त्राटक के बाद आंखों को इधर-उधर ऊपर नीचे घुमाकर कुच्छ समय तक देखने का अभ्यास करना चाहिए ताकि आपकी दृष्टि बाईं और स्थिर रहे, बाईं ओर देखने से दिमाग कमजोर नहीं होता, त्राटक के बाद अंखों को गुलाब जल से धो लिया करें, इससे नेत्रों को तरावट मिलती है। प्रारंभ में त्राटक करने से शीघ्र थकावट हो जाती है, थक जाने पर आंखें बंद कर लें और त्राटक करें, अंतर त्राटक से संयम सिद्ध होती है, यह षटचक्रों पर, इष्ट पर, बीजमंत्र या यंत्र पर भी किया जाता है। इस त्राटक में संयम सिद्धि का लक्षण है। वास्तव में त्राटक का अनुकूल समय रात्रि के दो से पांच बजे तक है शांति के समय चित्त की एकाग्रता बहुत शीघ्र होने लगती है। त्राटक के अभ्यास के समय मुुंह बंद रखिये, परन्तु दांत छू न जाये, जीभ न ऊपर लगे न नीचे, मुख के अंदर उसकी नोंक खड़ी कर दीजिए, आपका मन स्थिर हो जायेगा।
सुखासन में (जिसे जिस आसन का अभ्यास हो) बैठकर मस्तक, गर्दन, पीठ और उदर बराबर सीधे रख, अपने शरीर को सीधा करके बैठें, इसके बाद नाभि-मण्डल में (तोंद की जगह) दृष्टि जमाकर कुछ देर तक पलक न झपकें। नाभि स्थान में दृष्टि और मन रखने से मन स्थिर होता जायेगा। इसी भाव में नाभि के ऊपर दृष्टि और मन लगाकर बैठने से कुछ दिन के बाद मन स्थिर होगा, मन स्थिर करने का त्राटक जैसा सरल उपाय दूसरा और नहीं है।

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नीलम Neelam धारण

नीलम कब धारण करें-

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नीलम रत्न शनि ग्रह का रत्न है, यह रत्न नवरत्नों में से एक और मूल्यवान तथा अति प्रभावशाली रत्न है, शनि ग्रह का प्रतिनिधि यह रत्न चमत्कारी और तुरंत अपना प्रभाव प्रकट करने वाला, किस्मत पलटने की ताकत रखने वाला माना गया है।
इस रत्न के विषय में लोक मान्यता यह है कि, यह रत्न विरले ही किसी जातक को अनुकूल बैठता है। जिस किसी को अनुकूल बैठता है, उसकी किस्मत ही पलट देता है। यह रत्न रंक से राजा भी बना देता है, और अनूकूल नहीं बैठने पर राजा से रंक भी बना देता है।
मैने अनेक ऐसे जातकों को नीलम धारण करने की सलाह दी है, जिनकी जन्म कुंडली में शनि ग्रह योगकारक है, अथवा योगकारक होकर शुभ ग्रहों के साथ युति बना रहा है, या फिर योगकारक होकर शुभ स्थान में स्थित है।

वस्तुत: मैंने नीलम धारण करवाने के बाद उन जातकों के जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन देखा है। उनमें से कुछ तो आर्थिक संकट के चलते न केवल अपना व्यापार ही बंद कर चुके थे, बल्कि भयंकर कर्ज से दबे हुये भी थे, और कुछ का व्यापार बंद होने के कागार पर था। कुछ लोग ऐसे भी थे जो नौकरी-पेशा थे, और अपने अधिकारियों से तंग आकर नौकरी छोड चुके थे, उनके सामने भी भयंकर आर्थिक संकट मंडरा रहा था। ऐसी स्थिति में कुंडली का पूर्ण विश्लेषण करने की आवश्यकता होती है, मैंने अपने 32 वर्ष के अनुभव से और ज्योतिष के मूल सिद्धांतों को कुंडलियों पर लागू करने के बाद ही कहा कि, जातक की कुंडली में शनि ग्रह विशेष स्थिति में स्थित है। इस लिये नीलम धारण करने से न केवल समस्या का समाधान होगा अपितु अत्यंत आर्थिक सहायता भी प्राप्त होगी।
नीलम धारण करने के मामले में पहले किसी दीर्घ-अनुभवी विद्वान ज्योतिषाचार्य से सलाह अवश्य लेनी चाहिये। क्योकि कभी-कभी शनि ग्रह का चमत्कारी रत्न ‘‘नीलम’’ शनिग्रह जैसे क्रूर स्वाभाव को भी धारक पर प्रकट कर देता है, इसी लिये विशेष परिस्थितीयों में ही तथा शनि ग्रह की अनुकूलता प्राप्त करने के लिये ‘‘नीलम रत्न’’ धारण करने की सलाह अवश्य दी जाती है।

कब धारण करें नीलम :-
नीलम के विषय में मेरा अपना पिछले 32 वर्ष का अनुभव रहा है कि, नीलम रत्न केवल वृष एवं तुला लग्न वालों को ही धारण करना चाहिये, वह भी कुंडली का पूर्ण विश्लेषण के उपरांत क्योकि तुला लग्न के लिये शनि चतुर्थेश-पंचमेश होता है, और वृष लग्न के लिये शनि नवम और दशम स्थान का स्वामी होकर योगकारक ग्रह कहलता है। परंतु वृष-तुला लग्न में जब शनि की स्थिति कुंडली के किसी केन्द्र या त्रिकोण स्थान में हो। जैसे-

1. वृष लग्न की कुंडली में नवमेश-दशमेश शनि की स्थिति यदि नवम स्थान में हो, तो (शनि इस लग्न में केन्द्र-त्रिकोण नवम-दशम दोनो स्थान) का स्वामी होगा, और नवम स्थान में स्वगृही (अपनी मकर राशि) में योगकारक स्थित में होने के कारण अत्यंत शुभ फल प्रकट करेगा। परंतु इस शुभ योग के लिये शर्त यह है कि इस स्थान में शनि के साथ कोई पाप स्थान का स्वामी ग्रह स्थित नहीं होना चाहिये, अथवा कुंडली के इस स्थान में शनि वक्री नहीं होना चाहिये। यदि शनि नवम में वक्री या किसी पाप स्थान के स्वामी के साथ स्थित होगा, तब शनि रत्न नीलम का अशुभ फल होगा अथवा नीलम धारण के शुभ प्रभाव में कमी हो जायेगी। वृष लग्न की कुंडली में नवम भाव स्थित शनि के शुभ प्रभाव में कमी तब भी होती है, जब शनि ग्रह अपनी इस राशि में वाल्यावस्था, कुमारावस्था, वृद्धावस्था अथवा मृतावस्था में हो। वृष लग्न और नवम भाव में पाप युक्त या वक्री स्थिति में शनि नहीं है, तब भी अवस्था देखना आवश्यक है।

शनि की अवस्था (शनि की स्थिति वृष या तुला लग्न तथा कुम्भ राशि में) –

बाल्यावस्था- में शनि (24 से 30 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
कुमारावस्था- में शनि (18 से 24 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
युवावस्था- में शनि (12 से 18 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 100 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
वृद्धावस्था- में शनि (06 से 12 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
मृतावस्था- में शनि (00 से 06 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।

शनि की अवस्था- (शनि की स्थिति वृष या तुला लग्न तथा मकर राशि में) –

मृतावस्था- में शनि (00 से 06 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
वृद्धावस्था- में शनि (06 से 12 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
युवावस्था- में शनि (12 से 18 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 100 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
कुमारावस्था- में शनि (18 से 24 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
बाल्यावस्था- में शनि (24 से 30 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।

2. वृष लग्न की कुंडली में दशम स्थान कुम्भ राशि (मूल त्रिकोण राशि) का शनि न केवल योगकारक होता है, मकर से अधिक शुभ फल प्रदान करता है। इस कुम्भ राशि में दशम (केन्द्र) में स्थित शनि भी यदि किसी पाप स्थान के स्वामी के साथ स्थित नहीं, वक्री नहीं है, और युवावस्था में भी है, शनि ग्रह शुभ व बलवान माना जाता है, और नीलम धारण करने वाले धारक को अत्यंत शुभफल की प्राप्ति होती है। परंतु यदि अवस्था में भी कमजोर हो, तो तब यह शनि का रत्न नीलम पूर्ण शुभ फल नहीं देता, अपितु नीलम धारण करने वाले को न्यून शुभफल ही प्राप्त होता है।

3. तुला लग्न की कुंडली में शनि चतुर्थ व पंचम स्थान का स्वामी होकर योगकारक होता है, इस लिये तुला लग्न वाले जातक की कुंडली में शनि की स्थिति यदि चतुर्थ या पंचम में हो, और शनि ग्रह के मार्गी तथा युवावस्था में होने पर जातक नीलम धारण करके 100 प्रतीशत शुभ फल प्राप्त करते हैं। तथा बाल्य, कुमार, वृद्ध और मृत अवस्था में अथवा शनि ग्रह का पाप स्थान के स्वामी से सम्बंध अथवा शनि के वक्री होने पर शुभ फल में कमी हो जाती है।
विशेष– वृष तथा तुला लग्न वाले जातक के लिये शनि की स्थिति इन दो स्थानों (नवम-दशम अथवा चतुर्थ-पंचम स्थान) के अतिरिक्त भी (कुंडली के अन्य भावों में) शुभ हो सकती है, परंतु वह स्थिति कितनी शुभ या अशुभ होगी, कुंडली के अन्य ग्रहों की स्थिति के अनुसार ही निर्णय किया जा सकता है। अतः नीलम धारण से शुभाशुभ फल प्राप्त हो सकता है, अथवा नहीं? यदि शुभफल प्राप्त हो सकता है, तो कितने प्रतीशत? इस शुभाशुभ का निर्णय कुंडली का पूर्ण विश्लेषण करने के पश्चात ही हो सकता है।

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तीन मुखी रूद्राक्ष, 3 Mukhi Rudraksha

तीन मुखी रूद्राक्ष, 3 Mukhi Rudraksha Nepal, 3 Mukhi Original Nepal rudraksha –

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तीन मुखी रूद्राक्ष त्रिदेव बह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक है। तीन मुखी रूद्राक्ष में त्रिमूर्ति की शक्तियां समाहित होती हैं, और यह साधना में रूची रखने वाले या साधनाओं में संलग्न रहने वाले व्यक्तियों को शुभ फल देने वाला रूद्राक्ष है। यह रूद्राक्ष अग्नि स्वरूप रूद्राक्ष माना गया है। सत्व, रज और तम-इन तीनों गुणों का स्वामी हाने से यह त्रिगुणात्मक शक्तियों का स्वरूप है। यह रूद्राक्ष जातक को भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान देने वाला है। इसे धारण करने वाले मनुष्य की विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों का स्वयं ही दमन हो जाता है, और उसमें रचनात्मक प्रवृत्तियों को उदय होता है। जीवन धाराप्रवाह चलता है, और अल्पायु तथा मृत्यु का भय भी नहीं रहता। यह उच्च शिक्षा देता है, निम्न रक्तचाप से मुक्ति दिलाता है, मंदबुद्धि बालकों के लिये अधिक उपयोगी रूद्राक्ष है, शास्त्रों के अनुसार यह इच्छा शक्ति, ज्ञान और क्रिया शक्ति मिश्रित रूप है, अतः यह ब्रह्म शक्ति का द्योतक भी है। इसकी माला से शिव मंत्र का जप करने से साधक को यश और मान-सम्मान की प्राप्ति होती है, तथा उसकी सभी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।

चिकित्सक भी यह दावा करते हैं, कि तीन मुखी रूद्राक्ष कई बीमारियों और रोगों का निवारण कर सकता है। नेपाली तीन मुखी रूद्राक्ष को धारण करने वाला व्यक्ति कभी भी बीमारियों या कमजोरी से कष्ट नहीं उठाता है। तीन मुखी रूद्राक्ष पीलिया रोग का रामबाण इलाज है। तीन मुखी रूद्राक्ष नौकरी ढूंढने वाले व्यक्तियों को निश्चित ही शीघ्र सफलता देता है, और बेरोजगारी को टालता है। तीन मुखी रूद्राक्ष धारक को स्त्री के श्राप से भी मुक्ति मिलती है। शिवपुराण के अनुसार तीन मुखी रूद्राक्ष कठिन साधना से मिलने वाले फल के बराबर फल देने वाला बताया गया है। तीन मुखी रूद्राक्ष शौर्य और ऐश्वर्य को बढ़ाने वाला होता है। मंगल ग्रह से इस का सम्बंध होने के कारण सोचने की शक्ति और विषय पर एकाग्रता लाना इस रूद्राक्ष के प्रधान गुण हैं। त्रिमुखी अग्निदेव की तरह सब दोषों को शुद्ध करता है। धारक पूर्व जन्म के पापों से मुक्त होता है, और पवित्र होकर नया जीवन प्रारम्भ करता है। यह रचनात्मक बुद्धि की शक्ति को बढ़ा देता है। इसे धारण करने वाला रचनात्मक संसाधनों में स्वतः सफलता प्राप्त करने लगता है। इस रूद्राक्ष के देवता मंगल देव हैं। जिन लोगों को विद्या प्राप्ति में कठिनाई आ रही हो, उन्हें दो मुखी के साथ तीन मुखी रूद्राक्ष भी धारण करना चाहिये।

तीन मुखी रूद्राक्ष धारण करने का मंत्र- ॐ क्लीं नमः ॐ अग्नये नमः।
चैतन्य करने का मंत्र- ॐ रं इं हृीं हूं ॐ ।
उपयोग- जीवन की गूढ़ समस्याएँ और तीव्र रोष, उदासी, चिन्ता, दोष भावना एवं शैथिल्य से मुक्ति।

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पांच मुखी रूद्राक्ष, 5 Mukhi Rudraksha

पांच मुखी रूद्राक्ष- 5 Mukhi Rudraksha Nepal, 5 Mukhi Rudraksha Original Nepal –

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पाँच मुखी रूद्राक्ष पर पाँच धारियाँ होती हैं, पाँच मुखी रूद्राक्ष साक्षात् रूद्र स्वरूप है, इसे कालाग्नि के नाम से भी जाना जाता है। सधोजात्, ईशान, तत्पुरूष, अघोर तथा कामदेव, शिव के ये पाँचों रूप पंचमुखी रूद्राक्ष में निवास करते हैं। यह रूद्राक्ष अपनी रोगनिवारक क्षमता और आरोग्यता प्रदान करने के लिये विख्यात है। इस रूद्राक्ष को धारण करने से दीर्घायु और बेहतर स्वास्थ्य लाभ मिलता है। यह धारक को अपेक्षित अप्रिय घटनाओं से बचाता है, और आध्यात्मिक शक्तियों से आर्शिवाद प्राप्त होता है, धारक का मन सदा प्रसन्नता से परिपूर्ण रहता है। पंचमुखी रूद्राक्ष पंच देवों (विष्णु, शिव, गणेष, सूर्य और देवी) का स्वरूप है। पंचमुखी रूद्राक्ष का प्रयोग शिव-शक्ति के हर रूप की साधना व ध्यान के लिये किया जाता है। यह पंच तत्वों को नियंत्रित करता है। यह रूद्राक्ष भगवान शिव का पंचानन रूप है। भगवान के पाँच रूप अद्योजात, ईशान, तत्पुरूष, अघोर एवं वामदेव पंचमुखी रूद्राक्ष में निवास करते हैं। पंचवक्त्रः स्वयं रूद्राः कालाग्र्निाम नामतः। कुछ लोग इस रूद्राक्ष को रूद्र-कालाग्नि भी कहते हैं। जब रूद्राक्षों का संयोग करते हैं, तब पंचमुखी रूद्राक्ष का संयोजन आवश्यक होता है। अधिकतर मालायें पंचमुखी रूद्राक्ष की होती हैं। रूद्राक्ष कहीं के भी क्यों न हों, भारत, नेपाल या इंडोनेशिया, 60 से 70 प्रतिशत दाने पंचमुखी ही होते हैं। विशेष ऊर्जा प्राप्त करने के लिये पंच मुखी रूद्राक्ष के तीन दानों को (हर दाने की पूंछ के साथ दूसरे दाने मुख मिलाकर पिरोई गई माला) एक साथ पहनना चाहिये, इस प्रकार की 3 दानों की पंचमुखी रूद्राक्ष माला शत्रु को नष्ट करने या शत्रु पर नियंत्रण करने में अद्भुत परिणाम देती है। पंच मुखी रूद्राक्ष धारक को विषैले जानवर जैसे सर्प या बिच्छू से रक्षा करता है, और धारक को मन की शांति और समृद्धि प्रदान करता है। माना जाता है कि बृहस्पति के कुप्रभाव से मन की शांति नष्ट होती है, दारिद्रता आती है, सौहार्द्रता की कमी होती है, चर्बी संबधी, किडनी, कान की बीमारियां, रक्तचाप, मधुमेह आदि पैदा होते हैं। इसलिये पंचमुखी रूद्राक्ष बृहस्पति ग्रह के बुरे प्रभाव को कम करके शरीर की अग्नि धातु को परिशुद्ध करता है, और इसी सिद्धांत से पंचमुखी रूद्राक्ष का धारण मनुष्य के अवगुणों और उसकी सभी बुराईयों को दूर करता है, और उसे तन-मन से पवित्र बनाता है। धारक पशुभावों से मुक्त होकर एक उद्यत देव के समान जीवन व्यतीत करता है। इस प्रकार यह रूद्राक्ष सर्वकल्याणकारी, मंगलप्रदाता एवं आयुष्यवर्द्धक है। महामृत्युंजय इत्यादि अनुष्ठानों में इसका ही प्रयोग होता है। यह अभीष्ट सिद्धि प्रदाता रूद्राक्ष है। पंचमुखी रूद्राक्ष सबसे सुरक्षित तथा अल्मोली विकल्प है, यह रूद्राक्ष सभी प्रकार के पापों के प्रभाव को भी नष्ट करता है। यह ध्यान हेतु उत्तम धारणीय फल है, रक्तचाप को सामान्य बनाये रखता है, यह शैक्षिक उन्नति देता है, और मस्तिष्क पर शांत प्रभाव में लाता है। यह रूद्राक्ष स्मरण शक्ति को दुरूस्त करने में बहुत मददगार है, अर्थात जब व्यक्ति की स्मरण शक्ति क्षीण हो जाती है, तो यह रूद्राक्ष बहुत उपयोगी है। इस रूद्राक्ष के देवता सत्तारूढ़ गुरू ग्रह हैं।

रूद्राक्ष धारण का मंत्र- ॐ ह्यी नमः। ॐ नमः श्विाय। इस मंत्र के साथ पंचमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिये।
चैतन्य करने का मंत्र- ऊँ ह्यँ आ क्ष्म्यौं स्वाहा।
उपयोग- उच्च रक्तचाप, स्मृतिनाश, उदासी, चिंता मधुमेह।

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चार मुखी रुद्राक्ष, 4 Mukhi Rudraksha

चार मुखी रुद्राक्ष, 4 Mukhi Rudraksha Nepal, 4 Mukhi Rudraksha Original Nepal –

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चार मुखी रूद्राक्ष में ऊपर से नीचे तक चार धारीयाँ होती हैं, और ये इस रूद्राक्ष के जन्म ही बनना शुरू हो जाती हैं, और धीरे-धीरे अपना आकार लेती हैं। पुराणों में, चार मुखी रूद्राक्ष देवी सरस्वती और भगवान् ब्रह्मा की शक्ति से परिपूर्ण होता है, यह रूद्राक्ष ब्रह्माजी की सृजनात्मक बुद्धि से प्रभावित होता है। यह रूद्राक्ष धारक को सृजनात्मक शक्ति, ज्ञान एवं विद्वता प्रदान करता है, यह रूद्राक्ष धारक को चार लाभ प्रदान करता है- 1. धर्म का ज्ञान और विश्वास। 2. आर्थिक मजबूती। 3. स्वास्थ्य, शारीरिक हित और 4. अज्ञान का नाश तथा मोक्ष की प्राप्ति। चार मुखी रूद्राक्ष विद्यार्थीयों के लिये बहुत लाभदायक होता है। चार मुखी रूद्राक्ष ’कल्पतरू वृक्ष’ की तरह है- वह वृक्ष उन प्राणियों की सभी मनोकामनाओं को पूरा करता है, जो शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, या सार्वजनिक रूप से बात करने में सक्षम नहीं होते। जिनकी स्मरण शक्ति कमजोर है, या नकारात्मक विचारों से ग्रस्त है, उन्हें यह रूद्राक्ष धारण करने से अत्मविश्वास की वृद्धि के साथ सकारात्मक विचार भी प्राप्त हाने लगते हैं। महाभारत के अनुसार, वह व्यक्ति जो चार मुख वाला रूद्राक्ष धारण करता है, वह द्विज स्तर प्राप्त करता है, और वह स्वयं को बिल्कुल ऊर्जावान व्यक्तित्व में परिवर्तित कर लेता है, और जीवन में नई और बेहतर भूमिका अपना लेता है। चार मुखी रूद्राक्ष देवों के गुरू बृहस्पति का प्रतीक रूद्राक्ष है। बृहस्पति के गुणों जैसी ऊर्जा धारक को ज्ञान व विवेक के माध्यम से प्राप्त होती है। इस रूद्राक्ष में निहित गुरू ग्रह की ऊर्जा व चेतना के चारों स्तरों का लाभ प्राप्त होता है- जागृत अवस्था, स्वप्न अवस्था, सुशुप्ति या गहरी निद्रा की अवस्था और तुरिया या चेतना अथवा पराचेतना अवस्था। चार मुखी रूद्राक्ष इन सभी अवस्थाओं के ज्ञान को संचित करने में सहायक होता है, और अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करता है। चतुर्मुखी रूद्राक्ष से विद्या प्राप्ति में, बुद्धि को कुशाग्र करने में तथा सद्गुरू को प्राप्त करने में सहायता मिलती है। चार मुखी रूद्राक्ष को दूध में उबाल कर पीने से स्नायु विकार (नर्वस सिस्टम के विकार) दूर होते हैं। इसे धारण करने से विक्षिप्त मनुष्य के मानसिक रोग दूर होते हैं, मन में सात्विक विचार उत्पन्न होते हैं, एवं धर्म का ज्ञान व धर्म में रूचि बढ़ती है। शीघ्र सफलता पाने के लिये इस रूद्राक्ष को धारण करना चाहिये। इससे उदर, गर्भाशय, रक्तचाप व हृदय से सम्बन्धित अनेक रोग समाप्त होते देखे गये हैं। यह रूद्राक्ष मंद बुद्धि जातक को चतुर बनाता है, अर्थात चातुर्य बढ़ा कर कुशाग्र बुद्धि वाला बनाता है। इस रूद्राक्ष में सर्वोच्च रचनात्मक गतिविधि, परमात्मा के ध्यान के साथ तार्किक और ठोस संरचनात्मक सोच को नियंत्रित करने की शक्ति प्राप्त होती है। यह डाॅक्टर, अध्यापक, प्रोफेसर, इंजीनियर के लिये परम गुणकारी रूद्राक्ष है। इसका उपयोग सकारात्मक सोच, रचनात्मकता, कुशाग्र बुद्धि और खुफिया तंत्र, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, लेखकों और पत्रकारों, आत्मविश्वास के साथ बोलने वालों के लिये अधिक उपयुक्त है। यह नाड़ी, चर्म व हायपौथैमलस की बीमारियों से भी बचाता है। इस रूद्राक्ष के देवता सत्तारूढ़ बुध ग्रह हैं।

रूद्राक्ष धारण का मंत्र- ॐ हृी नमः। ॐ ब्रम्हणे नमः। इस मंत्र के साथ ही चारमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिये।
चैतन्य करने का मंत्र- वां क्रां तां हां ई।
उपयोग- एकाग्रता, अध्ययन में सफलता, अनुसंधान में यश।

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छ: मुखी रूद्राक्ष, 6 Mukhi Original Nepal rudraksha

छ: मुखी रूद्राक्ष- 6 Mukhi Rudraksha Nepal, 6 Mukhi Rudraksha Original Nepal –

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छः मुखी रूद्राक्ष पर छः धारियाँ होती हैं, छः मुखी रूद्राक्ष शिव पुत्र कार्तिकेय की भक्ति का केन्द्र बिन्दु है। कार्तिकेय भगवान् नेतृत्व गुण, ऊर्जा व साहस के देव हैं। इस रूद्राक्ष को धारण करने से धारक को भगवान कार्तिकेय की विशेष कृपा प्राप्त होती है, और सांसारिक दुःखों से लड़ने की क्षमता प्राप्त करके वे जीवन के स्तर को अति उत्तम बना सकता है। यह रूद्राक्ष विद्या प्राप्ति के लिये भी श्रेष्ठ है। विद्या, ज्ञान, बुद्धि का प्रदाता छः मुखी रूद्राक्ष पढ़ने वाले विद्यार्थीयों, बौद्धिक कार्य करने वालों को बौद्धिक बल प्रदान करता है। इससे गुप्त व प्रकट सभी प्रकारी के शत्रुओं की शत्रुता नष्ट हो जाती है, अतः इसे ’शत्रुंजय रूद्राक्ष’ भी कहते हैं। निसंदेह छः मुखी रूद्राक्ष को पहनने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। इसकी माला जपने से विपत्ति नष्ट होती हैं, व पीड़ाएँ कम होती हैं। छः मुखी रूद्राक्ष ऋिद्धि और सिद्धि प्राप्त करने में भी चमत्कारी परिणाम प्रकट करता है। कहा जाता है कि देवी अन्नपूर्णा छह मुखी रूद्राक्ष के धारण से घर में हमेशा विराजमान रहती हैं। यह व्यक्ति को अच्छे कर्म करने में मदद करता है, और वह व्यक्ति सदाचारी, संतुष्ट और गुणवान बनता है। इसे धारण करने से धारक की सोई हुई शक्तियां जागृत होती हैं। यह आत्म शक्ति, ज्ञान शक्ति व संकल्प शक्ति में वृद्धि करता है। छः मुखी रूद्राक्ष व्यक्ति की इच्छा शक्ति, अभिव्यक्ति की ताकत, ग्रहण करने शक्ति को बढ़ाता है, और फिर वह व्यक्ति मानसिक रूप से शक्तिशाली हो जाता है। इसलिये यह छात्रों के लिये बहुत उपयोगी रूद्राक्ष होता है। यह रूद्राक्ष धारक को वशीकरण की शक्ति भी प्रदान करता है, और उसे परिहास युक्त, सुशील व सुंदर बनाता है। इसलिये यह सार्वजनिक रूप से सक्रिय लोगों के लिये लाभदायक है, जैसे कलाकार और राजनीतिज्ञ। यह रूद्राक्ष सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत करने में सहायक सिद्ध होता है। छः मुखी रूद्राक्ष शुक्र ग्रह के अनुसार यौन संबधी व यौन अंगों की बीमारियों को दूर करने में सहायक होता है। आरोग्य के लिये इसे पंचमुखी रूद्राक्ष के साथ धारण करना चाहिये। मानसिक विकृति, मिर्गी और स्त्री रोगों को भी इस रूद्राक्ष के धारण से दूर किया जा सकता है। शिक्षा में उच्च सफलता के लिये इसे चमुर्मुखी रूद्राक्ष के साथ धारण करते हैं। यह आँखों को लाभ पहुँचाता है, और मुख के रोग, मूत्र संबधी रोग, गले के रोग एवं जलोदर में भी हितकारी है। निसंतान युगल संतान प्राप्ति हेतु इसे गौरी-शंकर रूद्राक्ष के साथ अथवा द्विमुखी रूद्राक्ष के साथ प्रयोग कर सकते हैं। हकलाने वाले जातक जैसे वाणी दोष वालों के लिये भी यह कारगर सिद्ध होता है। षट्मुखी रूद्राक्ष का दाना व त्रयोदशमुखी दाने को धारण करने वाला धारक मानसिक तौर पर सतर्क और जोश से भरपूर रहता है। इस रूद्राक्ष को धारण करने से छः प्रकार की बुराईयां- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर नष्ट होते हैं। इसके संचालक ग्रह शुक्र देव हैं।

इसका धारण मंत्र है- ॐ हृीं हुं नमः। ॐ षडाननाय नमः। इस मंत्र के साथ यह रूद्राक्ष धारण करें।
चैतन्य करने का मंत्र- ॐ ह्यूं नमः। ॐ ह्यूं। ॐ हृीं श्रीं क्लीं सौं ऐं।।
उपयोग- प्रशासनिक कौशल्य, शोध कार्य में सफलता। कानूनी समस्यायें, व्यक्तिगत संबध।

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सात मुखी रूद्राक्ष, 7 Mukhi Rudraksha

सात मुखी रूद्राक्ष, 7 Mukhi Rudraksha Nepal, 7 Mukhi Rudraksha Original Nepal –

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सात मुखी रूद्राक्ष के ऊपर सात धारियाँ होती हैं, सप्तमुखी रूद्राक्ष अनन्त नाम से विख्यात है। यह रूद्राक्ष सप्तऋषियों का प्रतीक है। ऋषिजन हमेशा संसार के कल्याण में कार्यरत् रहते हैं, अतः सात मुखी रूद्राक्ष धारण करने से सप्त ऋषियों का सदा आशीर्वाद बना रहता है। जाबलोपनिषद के अनुसार सप्तमुखी रूद्राक्ष में सप्त ऋषियों का आशीर्वाद समाहित है। सप्तमुखी रूद्राक्ष को सप्तामातृकाओं का प्रतिनिधि माना गया है। यह रूद्राक्ष सूर्यदेव, सप्तर्षि, अनंग, अनंत (सर्पराज वासुकी), एवं नाग राज को भी समर्पित है। पùपुराण के अनुसार निम्नलिखित दिव्य सर्प इस रूद्राक्ष के सात मुखों में रहते हैं अनंत, कर्कट, पुंडरीक, तक्षक, व शोशिंबन, करोआश और शंखचूड़। इसीलिये इसका धारण किसी प्रकार के विष से प्रभावित नहीं होता। इस रूद्राक्ष के धारण से शरीर पर किसी भी प्रकार के विष का प्रभाव नहीं होता है। जन्म कुण्डली में यदि पूर्ण या आंशिक कालसर्प योग विद्यमान हो तो, सातमुखी रूद्राक्ष धारण करने से पूर्ण अनुकूलता प्राप्त होती है। इसे धारण करने से विपुल वैभव और उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती है। इसे धारण करने से मनुष्य स्त्रियों के आकर्षण का केन्द्र बना रहता है। इस रूद्राक्ष का संचालक तथा नियंत्रक ग्रह शनि है, यह रोग तथा मृत्यु का कारक है। यह ग्रह ठंडक, श्रम, नपुसंकता, पैरो के बीच तथा नीचे वाले भाग, गतिरोध, वायु, विष और अभाव का नियामक है। यह लोहा पेट्रोल, चमड़ा आदि का प्रतिनिधित्व करने वाला ग्रह है। शनि के प्रभाव से दुर्बलता, उदर पीड़ा, पक्षाघात, मानसिक चिंता, अस्थि रोग, क्षय आदि रोग हो सकते हैं। इस रूद्राक्ष को धारण करने से चोरी, व्यभिचार और नशीली औषधियों का सेवन से छुटकारा मिलता है। इसके धारण करने वाले को गुप्त धन प्राप्त होता है, विपरीत लिंग के व्यक्ति का ध्यान आकर्षित करने की शक्ति इस में समाहित है। यह रूद्राक्ष सप्तमातृका को समर्पित होने से महालक्ष्मी को भी प्रसन्न करता है। अनेक देवी-देवताओं का आशीर्वाद इसे प्राप्त होने के कारण यह रूद्राक्ष कीर्ति, धन और जीवन में प्रगति लाने वाला माना गया है। सप्तमुखी रूद्राक्ष आकृति में प्रायः गोल होता है, तथा इसका इंडोनेशियाई दाना आकार में थोडा छोटा होता है। अधिक दुर्लभ होने के उपरांत भी यह सरलता से मिल जाता है। यह रूद्राक्ष उत्तम स्वास्थ्य और संपत्ति प्रदान करता है। सैकड़ों पाप, सोने की चोरी व गौ वध जैसे पाप इस रूद्राक्ष को धारण करने से नष्ट होते हैं। सभी साधक इसे अवश्य पहनते थे। शास्त्रों में इसे सात आवरण, पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि व अंधकार का स्वरूप माना गया है। इससे धारक को भूमि व लक्ष्मी प्राप्त होती है। यह धनागम व व्यापार व उन्नति में सहायक है, अविवाहित का विवाह हो जाता है, जातक के सहयोग, सम्मान व प्रेम में वृद्धि होती है, इसे धारण करने से पौरूष शक्ति में वृद्धि होती है। सप्तमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति अपने व्यापार एवं नौकरी में तरक्की करता है, और जीवन में सब प्रकार के सुखो को प्राप्त करता है। इसे तिजोरी, लाॅकर या नगद पेटी में भी रख सकते हैं। शनि ग्रह का प्रतिनिधि होने से शनि को प्रसन्न कर दरिद्रता दूर करने के लिये, प्रसिद्धि सफलता, सम्मान न्याय, प्रेम, ज्ञान, तेज, बल, प्राधिकार व्यापार में प्रगति और लंबी उम्र के लिये इस रूद्राक्ष को धारण करना चाहिये। सप्तमुखी रूद्राक्ष ऐसे व्यक्तियों को अवश्य पहनना चाहिये जिनको शारीरिक व्याधि सर्दी, खांसी, ब्रोंकाइटिस, गठिया व टी. बी. जैसे रोगों के कष्ट हैं। चाहे आर्थिक अथवा मानसिक किसी भी प्रकार का कष्ट हो, सप्तमुखी रूद्राक्ष पीड़ा कम करने में बहुत सहायक है। यह सब प्रकार के स्नायु संबधी दर्द, महिलाओं के जननांग सम्बंधी रोग (बंध्यत्व भी), हृदय रोग, गले के रोग और ल्यूकोरिया में विशेष सहायक है। हड्डियों के रोग एवं जोडों में दर्द से पीड़ित लोग रोग एवं कष्ट निवारण में इसे बहुत उपयोगी पाते हैं। सप्तमुखी रूद्राक्ष के नियामक ग्रह शनि हैं।

इसका धारण मंत्र है- ॐ हुं नमः। ॐ अनन्ताय नमः। ॐ ह्यीं नमः। ॐ ह्यीं श्रीं क्लीं सौं नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ ह कों हृीं सौ।
उपयोग- आर्थिक हानि, सफलता में विलम्ब होना, शारीरिक स्वास्थ्य, हानि और निराशा।

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आठ मुखी रूद्राक्ष, 8 Mukhi Rudraksha

आठ मुखी रूद्राक्ष, 8 Mukhi Rudraksha Nepal, 8 Mukhi Rudraksha Original Nepal –

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आठ मुखी या अष्टमुखी रूद्राक्ष पर आठ धारियाँ होती हैं। आठ मुखी रूद्राक्ष अष्टभुजाधारी देवी माँ का प्रतीक है। श्रीमद्ेवीभागवत पुराण, पùपुराण और मंत्रमहार्णव के अनुसार यह दाना श्रीगणेशजी को समर्पित है। ’अष्टवक्त्रो महासेन साक्षाद्ेवो विनायकः अष्टमुखी रूद्राक्ष गणेश जी का स्वरूप भी माना जाता है, यह अष्ट सिद्धि प्रदाता है। मनुष्य सदा भगवान की बनायी आठ प्रकृति (भूमि, आकाश, जल, अग्नि, वायु, मन, बुद्धि और अहंकार) के आधीन रहता है। अष्टमुखी रूद्राक्ष धारण करने से आठों महादोष (अष्ठपाश) धारक के नियंत्रण में रहते हैं, इसमें स्वयं की गुप्त एवं सुप्त शक्तियां जागृत साधक का सहयोग प्रदान करती हैं, जिससे आठों दिशाओं में विजय प्राप्त होती है। अष्टमुखी रूद्राक्ष थोडा दुर्लभ है। अष्टमुखी की आकृति अन्य रूद्राक्षों की तरह गोलाकार होता है, परंतु कभी-कभी ज्यादा मुख होने पर दाने थोडे अण्डाका आकृति के भी होते हैं। इस रूद्राक्ष को धारण करने से बुद्धि के विकार दूर होते हैं, व स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है। यह धारक को विशाल आकलन शक्ति और लेखन का कौशल्य प्रदान करता है। इससे यश, कला में निपुणता, नेतृत्व गुण एवं समृद्धि प्राप्त होते हैं। इसे धारण करने से आठों दिशाओं में विजय प्राप्त होती है, व कोर्ट कचहरी के मामलों में सफलता मिलती है। इसे धारण करने से परमपद की प्राप्ति होती है, दुर्घटनाओं एवं प्रबल शत्रुओं से रक्षा होती है। वैद्यकीय दृष्टि से, इससे नाड़ी संस्थान, प्रोस्टेªट एवं पित्ताशय के रोग मिटते हैं। दुष्ट स्त्री गमन के पापों से मुक्ति मिलती है, तथा यह मनुष्य को अन्तर्मुखी बनाकर उसके जीवन की समस्त उथल-पुथल को समाप्त कर नीचे से ऊपर उठने का मार्ग प्रशस्त करता है, जिससे धारक को परम ज्ञान सुख प्राप्त होता है। जो लोग इस रूद्राक्ष को धारण करते हैं, वे अकाल मृत्यु से शरीर का त्याग नहीं करते हैं। ऐसे लोग पूर्ण आयु जीते हैं। इस रूद्राक्ष के धारणकर्ता पर गणेशजी की पूर्ण कृपा दृष्टि रहती है, इसलिये इसे धारण करने से बाधाओं का अंत होता है, व्यक्ति की ब्रह्मविद्या में रूचि जाग्रत होती है, उत्थान का मार्ग प्रश्स्त होता है, न्यायिक मामलों में विजय प्राप्त होती है।, शत्रु वश में होते हैं। गणेश स्वरूप होने के कारण यह रूद्राक्ष ऋद्धि-सिद्धि और लक्ष्मी प्रदान करने वाला है। इसको धारण करने से अन्न, धन, और स्वर्ण की वृद्धि होती है। आठमुखी रूद्राक्ष का नियंत्रक और संचालक ग्रह राहू है, जो छाया ग्रह है। इसमें शनि ग्रह की भांति तथा शनि ग्रह से भी बढ़कर प्रकाश हीनता है। यह शनि की तरह लम्बा, पीड़ादायक, अभाव, योजनाओं में विलम्ब करने वाला एवं रोगकारक ग्रह है। राहू ग्रह घटनाओं को अकस्मात ही घटित कर देता है। चर्मरोग, फेफड़े की बीमारी, पैरों का कष्ट मोतियाबिन्द आदि रोगों का कारक राहू ग्रह है। आठमुखी रूद्राक्ष धारण करने से उक्त सभी रोगों एवं राहू की पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है। राहु ग्रह से संबधित होने के कारण इसे धारण करने से राहु जनित कष्ट तथा समस्त दैविय बाधायें दूर हो जाती हैं। साधारणतः अष्टमुखी रूद्राक्ष को सप्तमुखी के साथ पहनते हैं। जिनके जीवन में बाधा या अपयश आते हैं, वह इसे अवश्य धारण करें। शनिग्रह का दोष मिटाने के लिये इसे सप्तमुखी के साथ धारण करना चाहिये। राहु ग्रह की किसी भी विपरीत स्थिति को अष्टमुखी रूद्राक्ष अनुकूलता में बदल देता है।

इसका धारण मंत्र है- ॐ हुं नमः। ॐ श्री महागणाधिपतये नमः। ॐ हुं नमः। ॐ सः हुं नमः। ॐ हृीं ग्रीं लीं।
चैतन्य मंत्र- ॐ हृीं ग्रीं लं आं श्री।
उपयोग- जीवन की प्रगति में अड़चन, हार, निराशा और प्रगति के आभाव एवं समस्याओं की वजह से उत्पन्न खीझ।

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