मानसिक स्वास्थ्य

मानसिक तनाव और ग्रह :-

Dr.R.B.Dhawan

सभी जानते हैं- वर्तमान युग भागदौड़ और कशमकश भरा है। आज के युग में हर इंसान मशीन के जैसे जीवनयापन करने के लिये मजबूर है। कारण हर इंसान की आकांक्षाएं और महत्वकांशायें इतनी हो गई हैं कि, वह किसी भी तरह से अपने आप से संतुष्ट नहीं हो पा रहा है, और इस कारण आम आदमी भारी तनाव में जीवन जीने के लिये मजबूर हो रहा है। कुण्ठा, हताशा, फ्रस्टेशन, टेंशन और डिप्रेशन एक भावनात्मक प्रतिक्रिया है, जो किसी व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ति न होने पर प्रतिरोध स्वरूप प्रकट होती है।

डाक्टरों एवं वर्तमान मेडिकल साइंस के रिसर्च को मानें तो, प्रति दस व्यक्ति में से दो व्यक्ति मानसिक अवसाद dipreshan से घिरे हैं, और सीधी बात डिप्रेशन के शिकार हैं, एेसा क्यूं हो रहा है। कारण स्पष्ट है कि मानसिक संतुष्टि का न होना। अब यह मानसिक संतुष्टि कैसे हो सकती है? परंतु मानसिक असंतुष्टि किसी भी प्रकार से हो सकती है। किसी को अपने काम से संतोष नहीं है, तो किसी को पारिवारिक क्लेश है, किसी को पैसे की कमी खलती है, तो कोई अपने शरीर से दुःखी है, और कोई सिर्फ इसलिये दुःखी है कि उसके रिश्तेदार या पड़ोसी क्यों सुखी हैं। कुल मिलाकर सभी के दुःखों का अपना-अपना कोई न कोई कारण है। अगर हम किसी के दुःख या dipreshan का कारण जानें तो, हमें यह ज्ञात होगा कि, जिसे वह अपना दुःख समझ रहा है, वह दरअसल उसका दुःख है ही नहीं, मात्र उसके मन का भ्रम अथवा जीवन की वह कमजोरी है जिसे वह सही तरीके से अभिव्यक्त नहीं कर पाता और धीरे-धीरे मानसिक अवसाद dipreshan का शिकार हो जाता है।
देखने मे आता है कि उच्च प्रतिष्ठित परिवारों के सदस्य भी, जिनके जीवन में कहीं किसी प्रकार की भौतित सुखों की कमी नहीं होती है, और वह भी उच्च पदासीन होते हैं, बावजूद इसके वह आत्महत्या जैसा जघन्य कार्य कर लेते हैं, अथवा किसी की हत्या जैसा घृणित कार्य भी कर देते हैं, कारण सिर्फ मानसिक अवसाद, मानसिक उत्तेजना।

अाज डिप्रेशन इतना आम हो चुका है कि अधिकांश लोग इसे बीमारी की तरह नहीं लेते और नजर-अंदाज कर देते हैं। यह हो क्यों रहा है?- यदि विचार किया जाये तो, किसी वस्तु या किसी कार्य की सफलता, अथवा मन की इच्छा के पूर्ण होने की जब प्रबल आशा हो, और वह आशा टूट जाये, तब एक बार निराशा का दौर आ प्रकट होता है, बस यही वह समय है जब हिम्मत दिलाने वालों की आवश्यकता होती है। हिम्मत या हौसला दिलाने वाला कोई अपना हो तो, बहुत जल्दी व्यक्ति निराशा के दौर से निकल जाता है।

किसी-किसी मामले में एेसे समय में निराशा होती ही नहीं तब ? तब एक विचित्र भाव पैदा होता है, और यह भाव होता है ‘ईर्ष्या’ भाव! ईर्ष्या भी जब नियंत्रित न की जाये, तब चिढचिढापन, फ्रस्टेशन, टेंशन और फिर डिप्रेशन। मेरा कार्य क्यों नहीं हुआ? दूसरे का वही कार्य हो गया। “मेरी तो किस्मत ही खराब है” एेसे समय में सकारात्मक वातावरण बनाने की आवश्यकता होती है, अन्यथा वह व्यक्ति मानसिक कुण्ठा का शिकार होने लगता है,

कुण्ठा, फ्रस्टेशन, टेंशन और फिर डिप्रेशन (अवसाद)। यह सब मानसिक अवसाद में आ जाता है। आजकल ऐसा होना आम बात है, लेकिन कई बार डिप्रेशन इतना अधिक बड़ जाता है कि मनुष्य कुछ समय के लिए अपनी सुध-बुध खो बैठता है। कुछ लोग डिप्रेशन के कारण पागलपन का शिकार भी हो जाते हैं।

आज अवसाद (डिप्रेशन) शब्द से लगभग सभी लोग परिचित हैं, और साथ ही एक बड़ी संख्या में लोग इसका शिकार भी हो रहे हैं। अवसाद, हताशा, उदासी गहरी निराशा और इनसे सम्बंधित रोग चिकित्सा जगत में मेजर डिप्रेशन (Major depression), डिस्थाइमिया (Dysthymia), बायपोलर डिसऑर्डर या मेनिक डिप्रेशन (Bipolar disorder or manic depression), पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum depression), सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर (Seasonal affective disorder), आदि नामों से जाने जाते हैं।

वैसे हर किसी के जीवन में कभी-न-कभी ऐसे पल आते ही हैं, जब उसका मन बहुत उदास होता है। इसलिए शायद हर एक को लगता है कि हम गहरी निराशा के विषय में सब कुछ जानते हैं। परन्तु ऐसा नहीं है। कुछ के लिए तो यह निराशावादी स्थिति एक लंबे समय तक बनी रहती है। जिंदगी में अचानक, बिना किसी विशेष कारण के निराशा के काले बादल छा जाते हैं और लाख प्रयासों के बाद भी वे बादल छंटने का नाम नहीं लेते। अंततः हिम्मत जवाब दे जाती है और बिलकुल समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों हो रहा है।

इन परिस्थितियों में जीवन बोझ सा लगने लगता है, और निराशा की भावना से पूरा शरीर दर्द से कराह उठता है। कुछ का तो बाद में बिस्तर से उठ पाना भी लगभग असंभव सा हो जाता है। इसलिए प्रारंभिक अवस्था में ही ध्यान रखा जाना चाहिए कि, व्यक्ति हद से अधिक उदासी में न डूब जाये। समय रहते लक्षणों को पहचान कर किसी विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए व तदनुसार उपचार करवाना चाहिए।

दिनचर्या में बदलाव लाने, खानपान में फेरबदल करने तथा व्यायाम, ध्यान (Meditation) आदि से अच्छे परिणाम मिलते हैं। ध्यान रहे, डॉक्टर की सलाह के बिना दवाई लेने के भी बुरे परिणाम हो सकते हैं, तथा बीमारी जटिल हो सकती है। जरूरी नहीं की दवाई की आवश्यकता ही हो, अधिकांश मामलों में काऊँसलिंग की ही आवश्यकता होती है। सकारात्मक भाव पैदा करना ही सही उपचार है।

डिप्रेशन मानसिक लक्षणों के अतिरिक्त शारीरिक लक्षण भी प्रकट करता है, जिनमे दिल की धडकन में तेजी, कमजोरी, आलस्य तथा सिर दर्द प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त इस रोग से ग्रसित व्यक्ति का मन किसी काम में नहीं लगता, स्वभाव में चिडचिडापन आने लगता है, उदासी रहने लगती है, और वह शारीरिक स्तर पर भी थका-थका सा अनुभव करता है।

वैसे तो यह बीमारी किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति को हो सकती है, किन्तु देखने में आता है कि इस परिस्थितियों से पीडित किशोरावस्था के जातक तथा स्त्रियां अधिक होती हैं। कारण, कि इस रोग का केद्रबिन्दु मानव मन है, ओर मनमुखी व्यक्ति इसकी चपेट में जल्दी आ जाता है।

देखने में आता है कि किशोरावस्था एवं युवावस्था के जातक इस की चपेट में अधिक आते हैं, क्यों कि उनका मन अपने आगामी भविष्य के अकल्पनीय स्वप्न संजोने में तेजी से लगा रहता है। स्वप्नों की असीमित उड़ान, प्रेम में असफलता, प्यार में, व्यापार में अथवा नौकरी में धोखा होने के पश्चात जब किसी दूसरी वास्तविकता से उनका सामना होता है तो, मन अवसादग्रस्त होने लगता है।

क्या है इसका ईलाज और बचाव?- यद्यपि अध्यात्म शास्त्र कोई शारीरिक चिकित्सा शास्त्र नहीं है, तदापि मन और मस्तिष्क की बेहतर खुराक अवश्य है।

अध्यात्म शास्त्रीयों का मानना है कि, जिस प्रकार पेट की खुराक अन्न है, इसी प्रकार मन-बुद्धि की बेहतर खुराक आध्यात्मिक दर्शन शास्त्र है। स्वंय का ज्ञान (आत्मज्ञान) और ईश्वर को जानना ही बेहतर मानसिक उपचार है। इससे मनोदैहिक एवं मानसिक रोग या विकार शांत हो जाते हैं। मेरा तात्पर्य यहाँ ऐसे ज्ञानरूपी उपचार से है जो वेदान्त व भगवत्गीता आदि में उल्लेखित तथा स्वामी विवेकानंद, श्रीराम शर्मा आचार्य सरीखे वर्तमानकाल के विद्वानों द्वारा बताई गयी आत्मा, परमात्मा, कर्म, कर्मफल, पुनर्जन्म, संचित, प्रारब्ध, मोक्ष जैसे शब्दों की व्याख्या पर पूर्ण विश्वास करने से है। एवं पूर्ण आस्था के साथ जीवन के प्रत्येक प्रसंग को इन सिद्धांतों के साथ जोड़कर देखने से है।

अब अगर हम मानसिक अवसाद dipreshan का ज्योतिषीय कारण देखें तो, स्पष्ट है कि चन्द्रमा को ज्योतिष में मन का कारक माना गया है, और चन्द्रमा सभी ग्रहों में शीघ्र चलायमान ग्रह है, क्योंकि यह हमारी पृथ्वी के सबसे नजदीकी ग्रह है, इसलिए चन्दमा का हमारे मन-मस्तिष्क पर सबसे पहले और सब से अधिक प्रभाव पड़ता है। ज्योर्तिविज्ञान के अनुसार चन्द्रमा मन का कारक होने के साथ-साथ बड़ा सौम्य (नाजुक) ग्रह है, जिस किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में चन्द्रमा पाप ग्रह से पीड़ित होगा, वह किसी-न-किसी प्रकार से मानसिक अवसाद dipreshan का शिकार होगा। पाप ग्रह ससे पीड़ित होने का तात्पर्य है- किसी कुण्डली में चन्द्रमा राहु, केतु या शनि के साथ बैठा है, या इनमें से किसी की चन्द्रमा पर पूर्ण दृष्टि है तो, एेसा व्यक्तित्व अपने जीवनकाल में निश्चित रूप से मानसिक अवसाद का शिकार होता है। एेसे में यदि दो पाप ग्रहों- राहु व शनि अथवा केतु-शनि के साथ चन्द्रमा स्थित हो या दो पाप ग्रहों की चन्द्रमा पर पूर्ण दृष्टि हो, अथवा एक पापग्रह के साथ बैठा हो और दूसरे की पूर्ण दृष्टि हो, एेसी स्थिति में भी समस्या विकट हो जाती है। ज्योर्तिविज्ञान के अनुसार चन्द्रमा बुध के लिये शत्रु ग्रह है, मेरे अनुभव मे आया है कि जिस किसी जातक की जन्मकुंडली में चन्द्रमा बुध के साथ अथवा बुध से ग्रसित होगा और एेसी कुण्डली में चन्द्रमा पूर्णतः क्षीण होगा, या चन्द्रमा के आगे-पीछे कोई सौम्य ग्रह नहीं होता, या आगे-पीछे एक अथवा दो पापग्रह हों, कहने का तात्पर्य यह है कि दो पाप ग्रहों के मध्य चन्द्रमा अकेला हो तो, एेसा व्यक्ति मानसिक अवसाद dipreshan का शिकार हो जाता है।

पुस्तक- “रोग एवं ज्योतिष”

लेखक :- Dr.R.B.Dhawan

प्राप्ति स्थान :- http://www.shukracharya.com

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वशीकरण

गायत्री तंत्र से वशीकरण :-

Dr.R.B.Dhawan

वशीकरण एक ऐसा शब्द है, जो रहस्यमय लगता है, शायद इसी लिए हर कोई इसका प्रयोग कर अपना कार्य सिद्ध करना चाहता है। आज के युग में अधिकांश लोग इसे बकवास मानते हैं। किसी भी कार्य को करने की कम से कम दो कार्य प्रणाली होती हैं, एक सीधे रास्ते से और दूसरे शार्टकट रास्ते से, कोई भी कार्य सम्पन्न किया जा सकता है। सीधे रास्ते चलने में समय बेशक अधिक लगता है, थकावट भी अधिक होगी, परंतु खतरा कम होगा। और शार्टकट रास्ते में खतरे अधिक होंगे, क्योंकि वे अनजान व ऊबड-खाबड रास्ता होगा, परंतु ठीकठाक रहा तो समय भी बचेगा और थकावट भी कम होगी। इसको आप एेसे भी समझ सकते हैं- हवा के रूख को देख कर हवा के साथ चलना, और हवा के विपरीत चलना, परंतु एक निश्चित मार्ग पर ही चलना। इन दोनो में हवा के साथ चलना सरल प्रतीत होता है, तथा हवा के विपरीत चलना संघर्ष व कठिनाइयों से भरा होता है। शार्टकट तथा हवा के रूख को देख कर उसके साथ बहना तांत्रिक विधि से किसी कार्य को संयोजित करने जैसा हुआ, पर हवा का बहाव (तांत्रिक विधि से किया कार्य) आपका बैलेंस बिगाढ सकता है। तांत्रिक किसी कार्य को शीघ्र व चमत्कारी ढंग से कर तो लेता है, परंतु उस कार्य का जीवनकाल भी कम ही होता है। इसके विपरीत सात्विक विधि से सम्पन्न किया गया कार्य खर्चीला तथा समय अधिक लगने के कारण थकाऊ तो होता है, परंतु इसका जीवन काल कहीं अधिक और टिकाऊ होता है।

पौराणिक काल में इस विद्या का मानव जीवन पर कितना प्रभाव रहा है? या इसका भी कोई विज्ञान है ? यही जानने का प्रयास करते है : – वशीकरण क्रिया का ये रहस्य समझने के लिए सबसे पहले अपने शारीरिक, अपने मन तथा अपने मस्तिष्क की कार्यपद्धति के रहस्य को समझना होगा, जिसके द्वारा हम सोचने और समझने की शक्ति रखते हैं, और हम कल्पना करने की क्षमता रखते हैं, अपने मन में शुभ या अशुभ विचार लाते हैं। तो ऐसी कौन सी शक्ति या क्रिया है, जिसके द्वारा हम लोगों के मन पर अपना प्रभाव डाल सकते हैं, अथवा ऐसी क्षमता प्राप्त करके दूसरों को वशीभूत कर सकते हैं। आइए इस विज्ञान को समझें :-

पहले तो ये जान लीजिए “वशीकरण” शब्द अधूरा है, पूर्ण शब्द “वशीभूत” है, वशीकरण शब्द तो वशीभूत क्रिया के लिए के लिए प्रयोग होता है। किसी दूसरे मनुष्य या प्राणी को वशीभूत करने के लिए पंचभूत सिद्धांत को समझना होगा, क्योंकि मनुष्य शरीर पांच भूतों से बना है, 1. पृथ्वी 2. अग्नि 3. वायु 4. जल और 5. आकाश, ये सभी पंचमहाभूत हैं। ये सभी परस्पर बलवान हैं, इनमें सबसे बलवान आकाश भूत है, आकाश अर्थात आत्मा (आत्मा का निवास मस्तिष्क भाग में है)। वशीभूत होने के पश्चात वशीभूत होने वाले मनुष्य या प्राणी के मस्तिष्क पर वशीभूत करने वाले मनुष्य का आकाश भूत अपना अधिकार कर लेता है, और वे वशीभूत करने वाले की किसी निश्चित समय के लिए संबंधित (केवल प्रयोजन से संबंधित) आज्ञा का पालन करने लगता है, अर्थात यह अधिकार वशीकृत करने वाले को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होता, अपितु जिस स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए वशीकृत किया जाता है, केवल उसी विशेष प्रयोजन के लिए जितना भाग (आकाश तत्व का भाग) ही वशीकृत होता है। किसी विशेष प्रयोजन, कर्म या क्रिया के लिए, और किसी निश्चित अवधि के लिए ही किसी को वशीकृत किया जा सकता है। पूरी तरह इस विज्ञान को (इस पद्धति को) बिना समझे हम वशीकरण vashikaran की क्रिया को नहीं समझ सकते है, ना ही इस क्रिया को सफल बना सकते है। किसी विकट स्थिति में जब कोई अपना दूर होता दिखाई दे या फिर कोई रिश्ता टूट रहा हो और उस रिश्ते को बचाना जरूरी लगता हो, इसी स्थिती में वशीभूत क्रिया का यह प्रयोग संपन्न किया जा सकता है, यहां आगे की पंक्तियों में गायत्री तंत्र का एक प्रयोग प्रस्तुत कर रहे हैं, आवश्यकता होने पर इस तंत्र प्रयोग को आप सम्पन्न कर सकते हैं, और कभी-कभी एेसा प्रयोग करना जरूरी भी हो जाता है :-

यह गायत्री तंत्र प्रयोग बहुत प्रभावशाली है, इस प्रयोग का अन्य उग्र तांत्रिक प्रयोगों की तरह कोई दुष्प्रभाव नहीं है, परंतु यह सफल तभी होता है जब इस ‘तंत्र प्रयोग’ का नाजायज इस्तेमाल नहीं किया जाये।
सरल वशीकरण जब कोई अधिकारी, मालिक, रिश्ते में सम्बंधी अथवा पति या पत्नी नाराज हो जायें, तब उन्हें मनाना जरूरी हो जाता है। एेसे में कठिनाइयां अधिक हो रही हों, तब यह ‘तंत्र प्रयोग’ प्रयोग जायज है।

प्रयोग व सामग्री-
एक पीपल का पत्ता, अनार की कलम, लाल चंदन की लकड़ी, एक थाली, एक आचमनी या चम्मच, और एक तांबे का लोटा। रात्रि में पवित्र भाव से एक शुद्ध आसन पर उत्तराभिमुख होकर बैठें, सामने एक थाली में पीपल के पत्ते पर लाल चंदन की स्याही से अनार की कलम द्वारा जिसका वशीकरण करना हो, उसका नाम लिखकर पत्ता उल्टा करके रख दें। लोटा जो जल से भरा हो, उसमें से एक-एक आचमनी या चम्मच पानी लेकर पीपल के पत्ते पर एक-एक मंत्र का उच्चारण करते हुये डालते रहें, 108 बार जल मंत्र पढ़ते हुये डालना है। मंत्र पाठ के समय दुर्गा वेशधारी माता गायत्री का ध्यान करें। साधारण अवस्था में यह प्रयोग एक सप्ताह (सात दिन) में ही अपना प्रभाव दिखा देता है, परंतु यदि समस्या गहरी हो तो, अधिक दिन भी करना पड़ता है।

मंत्र- ॐ क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

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पूर्णिमा और अमावस्या

हिन्दू संस्कृति में क्यों महत्वपूर्ण हैं,पूर्णिमा और अमावस्या ? :- 

Dr.R.B.Dhawan

पूर्णिमा :- पूर्णिमा का महत्व जहां हिन्दू और सनातन संस्कृति में पर्व के रूप में विशेष है, वहीं आधुनिक विचारधारा सांस्कृतिक विचारधारा से बिल्कुल अलग है। भारतीय सनातन या वैदिक गणना के अनुसार हर माह की पूर्णिमा का कोई न कोई धार्मिक महत्व है, वर्ष की सभी 12 पूर्णिमा के नाम और अपने अपने प्रभाव हैं :- 1. चैत्र की पूर्णिमा के दिन हनुमान जयंती मनाई जाती है। 2. वैशाख की पूर्णिमा के दिन बुद्ध जयंती मनाई जाती है। 3. ज्येष्ठ की पूर्णिमा के दिन वट-सावित्री मनाया जाता है। 4. आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू-पूर्णिमा कहते हैं, इस दिन गुरु पूजा का विधान है। इसी दिन कबीर जयंती भी मनाई जाती है। 5. श्रावण की पूर्णिमा के दिन रक्षाबन्धन का पर्व मनाया जाता है। 6. भाद्रपद की पूर्णिमा के दिन उमा माहेश्वर व्रत मनाया जाता है। 7. अश्विन की पूर्णिमा के दिन शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। 8. कार्तिक की पूर्णिमा के दिन पुष्कर मेला और गुरुनानक जयंती पर्व मनाए जाते हैं। 9. मार्गशीर्ष की पूर्णिमा के दिन श्री दत्तात्रेय जयंती मनाई जाती है। 10. पौष की पूर्णिमा के दिन शाकंभरी जयंती मनाई जाती है, जैन धर्म के मानने वाले पुष्यभिषेक यात्रा प्रारंभ करते हैं। बनारस में दशाश्वमेध तथा प्रयाग में त्रिवेणी संगम पर स्नान का बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। 11. माघ की पूर्णिमा के दिन संत रविदास जयंती, श्री ललित और श्री भैरव जयंती मनाई जाती है, माघी पूर्णिमा के दिन संगम पर माघ-मेले में जाने और स्नान करने का विशेष महत्व है। 12. फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन होली का पर्व मनाया जाता है।

खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार इस दिन चन्द्रमा का प्रभाव काफी तीव्र होता है, इस कारण शरीर के अंदर न्यूरॉन सेल्स क्रियाशील हो जाते हैं, और ऐसी स्थिति में मनुष्य ज्यादा उत्तेजित या या भावुक रहता है। एक बार नहीं, प्रत्येक पूर्णिमा को ऐसा होता रहता है, तो व्यक्ति का भाग्य भी उस क्रिया से प्रभावित होता है। अक्सर देखा जाता है कि पूर्णिमा की रात कुछ लोगों का मन बेचैन रहता है, और नींद कम आती है। संवेदनशील दिमाग वाले लोगों के मन में आत्महत्या करने के विचार बनने लगते हैं। चांद का धरती के जल से सम्बंध है, जब जब पूर्णिमा आती है, समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है, क्योंकि चंद्रमा समुद्र के जल को ऊपर की ओर उठाता है। मानव के शरीर में भी लगभग 66% जल रहता है।

पूर्णिमा के दिन इस जल की गति और गुण बदल जाते हैं। जिन्हें मंदाग्नि रोग होता है, या जिनके पेट में चय-उपचय की क्रिया शिथिल होती है, तब अक्सर सुनने में आता है कि, ऐसे व्यक्ति भोजन करने के बाद नशा जैसा महसूस करते हैं, और नशे में न्यूरॉन सेल्स शिथिल हो जाते हैं, जिससे दिमाग का नियंत्रण शरीर पर कमजोर हो जाता है, और भावनाओं पर केंद्रित हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों पर चन्द्रमा का प्रभाव कुछ इस प्रकार होता है कि उनका मन गलत दिशा लेने लगता है। इस कारण हर माह पूर्णिमा व्रत रखने की सलाह दी जाती है। व्रत के साथ साथ इस दिन तामसिक वस्तुओं का सेवन भी नहीं करना चाहिए। मदिरा इत्यादि से दूर रहना चाहिए। क्योंकि इस दिन तामसिक भोजन करने से मनुष्य के शरीर पर ही नहीं अपितु मन और फिर कर्म व कर्मफल भी प्रभावित होते हैं। चौदस, पूर्णिमा और प्रतिपदा यह 3 दिन पवित्रता बने रहने में ही भलाई है।

अमावस्या :- चन्द्रमा की सोलह कला हैं, इनमें सोलहवीं कला का नाम  “अमा” है, स्कन्द-पुराण में एक श्लोक है :- 

अमावस्या षोडशभागेन देवी प्रोक्ता महाकला।

संस्थिता परमा माया देबिना देहधारिणी।।

चन्द्रमण्डल की सोलह कलाओं में ‘अमा’ नाम की भी एक महाकला है, जिसमे चन्द्रमा की सोलह कलाएं समाहित हैं, जिसका कभी क्षय या उदय नहीं होता, आसान शब्दों में कहा जाये तो, सूर्य और चंद्रमा के मिलन काल को अमावस्या कहते हैं, ज्योतिष में चन्द्रमा को मन का देवता माना गया है। अमावस्या के दिन चन्द्रमा दिखाई नहीं देता। ऐसे में जो लोग अति भावुक होते हैं, जैसे लड़कियां और महिलाएं, इन पर इस खगोलीय घटना का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, क्यों की ये मन से बहुत ही भावुक होती हैं, इस दिन संवेदनशील लोगों विशेषकर लड़कियों और महिलाओं के मन में हलचल अधिक बढ़ जाती है। इस के अतिरिक्त जो व्यक्ति नकारात्मक सोच वाला होता है, उसे नकारात्मक शक्ति अपने प्रभाव में ले लेती है। अमावस्या माह में एक दिन आती है। शास्त्रों में अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है। अमावस्या सूर्य और चन्द्र के मिलन का काल है, इस दिन दोनों एक ही राशि में रहते हैं।  क्योंकि अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव है, इसी लिए यह धारणा प्रचलित हुई की इस दिन भूत-प्रेत पितृ, पिशाच, निशाचर जीव-जंतु और दैत्य अधिक सक्रिय और उन्मुक्त रहते हैं। अतः इस दिन कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस दिन तामसिक भोजन और मादक वस्तुओ का सेवन करने से बचना चाहिए। मांसाहार का सेवन नहीं करना चाहिए। शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए इन वस्तुओं का शरीर पर ही नहीं, मन पर भी दुष्प्रभाव होता है। अच्छी बात तो यह होगी कि चौदस, अमावस्या और प्रतिपदा इन तीनों दिन पवित्र रहकर सात्विक आहार और ब्रह्मचर्य का पालन करने में ही भलाई है ।कुछ मुख्य अमावस्या : भौमवती अमावस्या, मौनी अमावस्या, शनि अमावस्या, हरियाली अमावस्या, दिवाली अमावस्या, सोमवती अमावस्या, सर्वपितृ अमावस्या।

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रुद्राष्टकम्

श्री गोस्वामी तुलसीदास कृतं शिव रूद्राष्टक स्तोत्रं : –

Dr.R.B.Dhawan

यूं तो भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सनातन ग्रंथों में, पुराणों में अनेक मंत्र उल्लेखित हैं, अनेक स्तुति व स्त्रोत भी हैं, जिनकी रचना अनेक ऋषियों और आचार्यों ने की है। जिनके जप व गान करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं, परंतु श्री शिव रुद्राष्टक स्त्रोत्र का महत्व  और प्रभाव विलक्षण है। प्रतिदिन शिव रुद्राष्टक का पाठ किया जाए तो हर प्रकार की समस्याओं का समाधान स्वत: ही हो जाता है। साथ ही भगवान शिव की कृपा भी प्राप्त होती है। महाशिवरात्रि, श्रावण मास अथवा चतुर्दशी तिथि (मासिक शिवरात्रि) को इसका जप व गान किया जाए तो विशेष फल मिलता है।

श्री रामचरित मानस के उत्तर काण्ड में वर्णित इस रूद्राष्टक की कथा इस प्रकार है :- कागभुशुण्डि जो कि परम शिवभक्त थे। वह भगवान शिव को परमेश्वर एवं अन्य देवों से अतुल्य मानते थे। उनके गुरू श्री लोमेश थे जो भगवान शिव के साथ-साथ राम में भी असिम श्रद्धा रखते थे। इस कारण कागभुशुण्डि का अपने गुरू के साथ मत-भेद रहता था।
एक बार गुरूजी ने समझाया कि; स्वयं शिव भी राम नाम से आनन्दित रहते हैं, तो तू राम की महिमा को क्यों स्वीकार करने से इन्कार करता है। ऐसे प्रसंग को शिव विरोधी मान कर कागभुशुण्डि अपने गुरू से ही रूष्ट हो गए। इसके उपरांत कागभुशुण्डि ने एक बार एक महायज्ञ का आयोजन किया, परंतु अपने इस यज्ञ की सूचना अपने गुरू को नहीं दी। फिर भी सरल हृदय गुरू अपने भक्त के यज्ञ में समलित होने के लिए पहुँच गए। शिव पुजन में बैठे कागभुशुण्डि ने अपने गुरू लोमश को आया देखा। किन्तु अपने आसन से न उठे, न ही उनका कोई आदर सत्कार ही किया। सरल हृदय गुरू लोमश ने एक बार फिर इसका बुरा नहीं माना। पर महादेव तो महादेव ही हैं। वो अनाचार क्यों सहन करने लगे ? भविष्यवाणी हुई – अरे मुर्ख, अभिमानी ! तेरे सत्यज्ञानी गुरू ने सरलता वश तुझ पर क्रोध नहीं किया। लेकिन, मैं तुझे श्राप दुंगा। क्योंकि नीति का विरोध मुझे पसंद नहीं। यदि तुझे दण्ड ना मिला तो वेद मार्गी भ्रष्ट हो जाएंगे। जो गुरू से ईर्ष्या करते हैं, वो नर्क के भागी होते हैं। तू गुरू के समुख भी अजगर की भांति ही बैठा हुआ है। अत: अधोगति को पाकर अजगर बन जा तथा किसी वृक्ष की कोटर में ही रहना।
इस श्राप से दुःखी हो कर तथा अपने शिष्य के लिए क्षमा दान पाने की अपेक्षा से, शिव को प्रसन्न करने हेतु; ही गुरू लोमश ने प्रार्थना की तथा रूद्राष्टक की रचना और वाचना की तथा आशुतोष भगवान को प्रसन्न किया। इस कथा का सार है – शिव अनाचारी को क्षमा नहीं करते; बेशक वो उनका परम भक्त ही क्यूँ ना हो। परम शिव भक्त कागभुशुण्डि ने जब अपने गुरू की अवहेलना की तो; वे भगवान शिव के क्रोध-भाजन हुए। अपने शिष्य के लिए क्षमादान की अपेक्षा रखने वाले सहृदय गुरू लोमश ने रूद्राष्टक की रचना की तथा महादेव को प्रसन्न किया। गुरु के तप व शिव भक्ति के प्रभाव से यह शिव स्तुति मंगलकारी शक्तियों से सम्पन्न मानी जाती है। तथा मनुष्य के अहंकार को दूर कर उसे विनम्र बनाती है। शिव की इस स्तुति का वाचन करने से मन में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा, तनाव, द्वेष, ईर्ष्या और अहं दूर होता है। यह स्तुति सरल, सरस और भक्तिमय होने से शिव व शिव भक्तों को बहुत प्रिय है। इस स्तुति के पाठ से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं। यह कथा रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में वर्णित है।

       नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

      विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम।

      निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं

      चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम।

हे भगवन ईशान को मेरा प्रणाम ऐसे भगवान जो कि निर्वाण रूप हैं, जो कि महान ॐ के दाता हैं, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण में व्यापत हैं, जो अपने आपको धारण किये हुए हैं, जिनके सामने गुण अवगुण का कोई महत्व नहीं, जिनका कोई विकल्प नहीं, जो निष्पक्ष हैं, जिनका आकार आकाश के सामान है, जिसे नापा नहीं जा सकता, उनकी मैं उपासना करता हूँ।
      निराकारमोङ्करमूल, तुरीयं,

      गिराज्ञानगोतीतमीशं, गिरीशम् ।

      करालं महाकालकालं कृपालं

     गुणागारसंसारपारं, नतोहम।

जिनका कोई आकार नहीं, जो ॐ के मूल हैं, जिनका कोई राज्य नहीं, जो गिरी के वासी हैं, जो कि सभी ज्ञान, शब्द से परे हैं, जो कि कैलाश के स्वामी हैं, जिनका रूप भयावह है, जो कि काल के स्वामी हैं, जो उदार एवम् दयालु हैं, जो गुणों का खजाना हैं, जो पुरे संसार के परे हैं उनके सामने मैं नत मस्तक हूँ।

      तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं

      मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ।

      स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा

      लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा।

जो कि बर्फ के समान शील हैं, जिनका मुख सुंदर है, जो गौर वर्ण के हैं, जो गहन चिंतन में हैं, जो सभी प्राणियों के मन में हैं, जिनका वैभव अपार है, जिनकी देह सुंदर है, जिनके मस्तक पर तेज है, जिनकी जटाओ में लहलहाती गंगा हैं, जिनके चमकते हुए मस्तक पर चाँद हैं, और जिनके कंठ पर सर्प का वास हैं।

      चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं

      प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।

      मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं

     प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि।

जिनके कानों में बालियाँ हैं, जिनकी सुन्दर भोहे और बड़ी-बड़ी आँखे हैं, जिनके चेहरे पर सुख का भाव है, जिनके कंठ में विष का वास है, जो दयालु हैं, जिनके वस्त्र शेर की खाल हैं, जिनके गले में मुंड माला है, ऐसे प्रिय शंकर पूरे संसार के नाथ हैं, उनको मैं पूजता हूँ।

           प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं

      अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।

            त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं

           भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम।

जो भयंकर हैं, जो परिपक्व साहसी हैं, जो श्रेष्ठ हैं अखंड हैं, जो अजन्मे हैं, जो सहस्त्र सूर्य के सामान प्रकाशवान हैं, जिनके पास त्रिशूल है, जिनका कोई मूल नहीं है, जिनमे किसी भी मूल का नाश करने की शक्ति है, ऐसे त्रिशूल धारी माँ भगवती के पति जो प्रेम से जीते जा सकते हैं, उन्हें मैं वन्दन करता हूँ।

       कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी

      सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।

      चिदानन्दसंदोह मोहापहारी

      प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।

जो काल से बंधे नहीं हैं, जो कल्याणकारी हैं, जो विनाशक भी हैं,जो हमेशा आशीर्वाद देते हैं, और धर्म का साथ देते हैं, जो अधर्मी का नाश करते हैं, जो चित्त का आनंद हैं, जो जूनून हैं, जो मुझसे खुश रहें, ऐसे भगवान जो कामदेव के नाशी हैं, उन्हें मेरा प्रणाम।

       न यावद्, उमानाथपादारविन्दं

      भजन्तीह लोके परे वा नराणाम।

     न तावत्सुखं शान्ति, सन्तापनाशं

      प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।

जो यथावत नहीं हैं, ऐसे उमा पति के चरणों में वन्दन करता हूं, ऐसे भगवान को पूरे लोक के नर नारी पूजते हैं, जो सुख के सागर हैं, शांति हैं, जो सारे दु:खों का नाश करते हैं, जो सभी जगह वास करते हैं।

       न जानामि योगं जपं नैव पूजां

      नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्।

      जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं

      प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।

मैं कुछ नहीं जानता, ना योग, ना ध्यान, आप देव के सामने मेरा मस्तक झुकता है, सभी संसारिक कष्टों, दुःख दर्द से मेरी रक्षा करें, मेरी बुढ़ापे के कष्टों से से रक्षा करें। मैं सदा ऐसे शिव शम्भु को प्रणाम करता हूँ।

मेरे और लेख देखें :- astroguruji.in तथा Aapkabhavishya.in पर।

ब्राह्मण से ही पूजा-पाठ क्यों कराएं ?

ब्राह्मण के लक्षण क्या हैं ?

Dr.R.B.Dhawan

भीष्म पितामह पुलस्त्य से कुछ प्रश्न करते हैं –

१. ब्राह्मण के लक्षण क्या हैं ? :-

उत्तर :-

जो‌ विद्वान ब्रह्मतत्व को जानते-समझते हैं, वह ब्राह्मण हैं। जो यम-नियम में आबद्ध है, जिसमें निरंतर उपासना व त्यागवृत्ति, सात्त्विकता एवं उदारता के गुण हैं, जो ईश्वरतत्त्व के सर्वाधिक निकट है, वह ब्राह्मण हैं। जो धर्मशास्त्र व कर्मकांड के ज्ञाता एवं अधिकारी विद्वान हैं, वह ब्राह्मण है। परंपरागत मान्यता अनुसार पूजा-पाठ करने का अधिकार उन्हें ही प्राप्त है, जो एेसे विद्वान ब्राह्मण है।

प्रश्न २:-

ब्राह्मण को देवता क्यों कहा गया है ? –

उत्तर:-

दैवाधीनं जगत्सर्वं, मंत्राधीनं देवता। 

ते मंत्रा विप्रं जानंति, तस्मात् ब्राह्मणदेवताः।। 

यह सारा संसार विविध देवों के अधीन है। देवता मंत्रों के आधीन हैं। उन मंत्रों के प्रयोग-उच्चारण व रहस्य को विप्र भली-भांति जानते हैं, इसलिये ब्राह्मण स्वयं देवता तुल्य होते हैं।

प्रश्न ३:-

ब्राह्मणों को लोक-व्यवहार में अधिक सम्मान क्यों प्राप्त है ? –

उत्तर:-

निरंतर प्रार्थना, धर्मानुष्ठान व धर्मोपदेश कर के जो सम्मानित होता है, ऐसे ब्राह्मण का सम्मान परंपरागत लोक-व्यवहार में सदा सर्वत्र होता आया है।

प्रश्न ४:-

यज्ञाग्नि में तिल-जव इत्यादि खाद्य पदार्थ क्यों हव्य किये जाते हैं ?

उत्तर:-

आज के प्रत्यक्षवादी युग के व्यक्ति हवन में घी-तिल-जव आदि की आहुतियों को, अग्नि में व्यर्थ फूंक देने की जंगली प्रथा ही समझते हैं । प्रत्यक्षवादियों की धारणा वैसी ही भ्रमपूर्ण है जैसी कि किसान को कीमती अन्न खेत की मिट्टी में डालते हुये देखकर कृषि सिद्धांत से अपरिचित व्यक्ति की हो सकती है। प्रत्यक्षवादी को किसान की चेष्टा भले ही मूर्खतापूर्ण लगती हो, पर बुद्धिमान कृषक को विश्वास होता है, कि खेत की मिट्टी में विधिपूर्वक मिलाया हुआ उसका प्रत्येक अन्नकण शतसहस्र-गुणित होकर उसे पुनः प्राप्त होगा। यही बात यज्ञ के संबंध में समझनी चाहिये। जिस प्रकार मिट्टी में मिला अन्न-कण शत से सहस्र गुणित हो जाता है, उसी प्रकार अग्नि से मिला पदार्थ लक्ष-गुणित हो जाता है। किसान का यज्ञ पार्थिव और ज्ञानियों का यज्ञ तैजस् कहलाता है। कृषि दोनों है, एक आधिभौतिक तो दूसरी आधिदैविक। एक का फल है- स्वल्पकालीन अनाजों के ढेर से तृप्ति, तो दूसरे का फल देवताओं के प्रसाद से अनन्तकालीन तृप्ति। यज्ञ में ‘द्रव्य’ को विधिवत अग्नि में होम कर उसे सूक्ष्म रूप में परिणित किया जाता है। अग्नि में डाली हुई वस्तु का स्थूलांश भस्म रूप में पृथ्वी पर ही फैल जाता है।स्थूल सूक्ष्म उभय-मिश्रित भाग धूम्र बनकर अंतरिक्ष में व्याप्त हो जाता है, जो अंततोगत्वा मेघरूप’ में परिणित होकर द्यूलोकस्थ देवगण को परितृप्त करता है। ‘स्थूल-सूक्ष्मवाद’ सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक अंश अबाध गति से अपने अंशी तक पहुंचकर ही रहता है। जल कहीं भी हो, उसका प्रवाह आखिरकार अपने उद्गमस्थल समुद्र में पहुंचें बिना दम नहीं लेता। यह वैज्ञानिक सूत्र स्वतः ही प्रमाणित करता है कि, अग्नि में फूंके गये पदार्थ की सत्ता समाप्त नहीं होती।

मनुस्मृति, अध्याय 3/76 में भी एक महत्वपूर्ण सूत्र है :-

‘अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यग् आदित्यं उपष्ठिते’

अग्नि में विधिवत डाली हुई आहुति, सूर्य में उपस्थित होती है।

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 14-15 में भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि चक्र व यज्ञ के बारे में कहते हैं- संसार के संपूर्ण प्राणी अन्न (खाद्य पदार्थ) से उत्पन्न होते हैं।

अग्नि की उत्पत्ति वृष्टि से होती है और वृष्टि यज्ञ से होती है, और यज्ञ (वेद) विहित कार्यों से उत्पन्न होने वाला है।

उत्तम ब्राम्हण की महिमा-

ॐ जन्मना ब्राम्हणो, ज्ञेय:संस्कारैर्द्विज उच्चते।

विद्यया याति विप्रत्वं, त्रिभि:श्रोत्रिय लक्षणम्।।

ब्राम्हण के बालक को जन्म से ही ब्राम्हण समझना चाहिए। संस्कारों से “द्विज” संज्ञा होती है, तथा विद्याध्ययन से “विप्र” नाम धारण करता है। जो वेद, मन्त्र तथा पुराण से शुद्ध होकर तीर्थस्नान के कारण और भी पवित्र हो गया है, वह ब्राम्हण परम पूजनीय माना गया है।

ॐ पुराणकथको नित्यं, धर्माख्यानस्य सन्तति:।

अस्यैव दर्शनान्नित्यं, अश्वमेधादिजं फलम्।।

जिसके हृदय में गुरु, देवता, माता-पिता और अतिथि के प्रति भक्ति है। जो दूसरों को भी भक्तिमार्ग पर अग्रसर करता है, जो सदा पुराणों की कथा करता और धर्म का प्रचार करता है, ऐसे ब्राम्हण के दर्शन से ही अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

पितामह भीष्म जी ने पुलस्त्य जी से फिर पूछा–

गुरुवर! मनुष्य को देवत्व, सुख, राज्य, धन, यश, विजय, भोग, आरोग्य, आयु, विद्या, लक्ष्मी, पुत्र, बन्धुवर्ग एवं सब प्रकार के मंगल की प्राप्ति कैसे हो सकती है? यह बताने की कृपा करें।

पुलस्त्यजी ने कहा–

राजन! इस पृथ्वी पर ब्राह्मण सदा ही विद्या आदि गुणों से युक्त और श्रीसम्पन्न होता है। इसी कारण तीनों लोकों और प्रत्येक युग में विप्रदेव (ब्राम्हण) नित्य पवित्र माने गये हैं।

नक्षत्र और वनस्पति

 नक्षत्रों के लिए निर्धारित पेड़ पौधे :-


Dr.R.B.Dhawan

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक नक्षत्र के वृक्षों का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। उपाय की दृष्टि से जो जातक अपने जन्म नक्षत्र के वृक्षों  या पौधों को रोपित करता है, अथवा सींचता है, या उनका भरण पोषण करता है, उसकी आयु के साथ ऐश्वर्य व धन धान्य में भी वृद्धि होती है। ज्योतिष शास्त्र में 27 नक्षत्रों के जो वृक्ष बताए गये है, उसके अनुसार अश्वनी नक्षत्र के लिए कुचला का वृक्ष, भरणी नक्षत्र के लिए आंवला, कृतिका के लिए गूलर व स्वर्णशीरी, मृगशिरा के लिए खैर, आर्द्रा नक्षत्र का वृक्ष बहेडा, रोहणी के लिए जामुन व तुलसी बताया गया है । इसी प्रकार पुनर्वसु नक्षत्र के लिए बांस, पुष्य नक्षत्र के लिए पीपल, अश्लेशा के लिए नागकेसर, मघा के लिए बड़, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के लिए ढाक (पलास) का वृक्ष, तथा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के लिए रूद्राक्ष या पाकर लगाना उपयोगी माना जाता है। 13 वें स्थान के नक्षत्र हस्त में जन्में व्यक्ति रीठा व पाढ का वृक्ष, चित्रा नक्षत्र वाले बेल नारियल, स्वाती के लिए अर्जुन का वृक्ष, विशाखा नक्षत्र के लिए भटकटैया, अनुराधा नक्षत्र के लिए बकुल या मौलश्री, ज्येष्ठा नक्षत्र के लिए चीड़ या देवदारू व लोध का वृक्ष लगा सकते है। इसी प्रकार मूल नक्षत्र के लिए साल का वृक्ष, पूर्वाषाढ़ा के लिए अशोक या जलवेंत, उत्तराषाढा नक्षत्र के लिए कटहल या फालसा लगायें। श्रवण के लिए आक लगाये, धनिष्ठा नक्षत्र के लिए शमी लगाएं, शतभिषा नक्षत्र के लिए कदम्ब, पूर्वा भाद्रापदा नक्षत्र के लिए आम लगायें, उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र के लिए नीम तथा रेवती नक्षत्र के लिए महुआ का वृक्ष लगाना लाभकारी होता है। 

इस प्रकार सरल उपाय करके एक तरफ जहां हम पर्यावरण संरक्षण में सहायता करेंगे वहीं हम भौतिक, अध्यात्मिक तथा परलौकिक लाभ प्राप्त करने के लिए वृक्षारोपण कर अपने तथा समाज व देश के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे होंगे।

नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़-पौधे :-

1. अश्विनी –            कुचला

2. भरणी–               आंवला 

3. कृतिका –             गूलर

4. रोहिणी –             जामुन 

5. मृगशिरा –            खैर 

6. आर्द्रा–                शीशम 

7. पुनर्वसु –              बांस 

8. पुष्य –                  पीपल 

9. अश्लेषा –             नागकेसर

10. मघा –                  वट

11. पूर्वाफाल्गुनी –      पलास

12. उत्तराफाल्गुनी –    पाकड़

13. हस्त –                  रीठा

14. चित्रा –                 बेल

15. स्वाती-                 अर्जुन

16 विशाखा –            भटकटैया 

17. अनुराधा –            मौलसरी

18. ज्येष्ठा –                चीड़  

19. मूल –                   साल

20. पूर्वाषाढ़ा –            अशोक 

21. उत्तराषाढ़ –           फालसा

22. श्रवण –                मदार 

23. धनिष्ठा –               शमी

24. शतभिषा –            कदम्ब 

25. पूर्वभाद्रपद–          आम

26. उत्तराभाद्रपद –       नीम 

27. रेवती –                 महुआ


बारह राशि के पेड़-पौधे :-

मेष –        आंवला 

वृष –         जामुन

मिथुन –    शीशम

कर्क –       नागकेश्वर

सिंह –       पलास

कन्या –     रीठा

तुला –      अर्जुन

वृश्चिक –  मौलसरी

धनु –      जलवेतस

मकर –     अकोल

कुंभ –       कदम्ब 

मीन –       नीम

ग्रहों के पेड़ -पौधे :-

सूर्य –      अकोल

चन्द्रमा –  पलास

मंगल –    खैर

बुद्ध –     चिरचिरी

गुरु –      पीपल

शुक्र –     गुलड़

शनि –    शमी

राहु –      दुर्वा

केतु –     कुश

ग्रह, राशि, नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़ पौधे का प्रयोग करने से अंतश्चेतना में सकारात्मक सोच का संचार होता है, तत्पश्चात हमारी मनोकामनायें शनै शनै पूरी होती है ।

शिवलिंग पूजा

महाशिवरात्रि और शिव पूजन :-

Dr.R.B.Dhawan

महाशिवरात्रि पर्व रात्रि प्रधान पर्व है, इस दिन अर्धरात्रि की पूजा का विशेष महत्व है। अर्ध रात्रि की पूजा के लिये स्कन्दपुराण में लिखा है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को –

निशिभ्रमन्ति भूतानि शक्तयः शूलभृद यतः ।

अतस्तस्यां चतुर्दश्यां सत्यां तत्पूजनं भवेत् ॥

अर्थात् रात्रि के समय भूत, प्रेत, पिशाच, शक्तियाँ और स्वयं शिवजी भ्रमण करते हैं; अतः उस समय इनका पूजन करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट होते हैं । 

शिवपुराण में आया है- 

“कालो निशीथो वै प्रोक्तोमध्ययामद्वयं निशि ।

शिवपूजा विशेषेण तत्काले ऽभीष्टसिद्धिदा ॥

एवं “ज्ञात्वा नरः कुर्वन्यथोक्तफलभाग्भवेत्” अर्थात रात के चार प्रहरों में से जो बीच के दो प्रहर हैं, उन्हें निशीथकाल कहा गया है। विशेषत: उसी काल में की हुई भगवान शिव की पूजा-प्रार्थना अभीष्ट फल को देनेवाली होती है। ऐसा जानकर कर्म करनेवाला मनुष्य यथोक्त फल का भागी होता है। चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं, अत: ज्योतिष शास्त्र में इसे परम कल्याणकारी कहा गया है। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है, परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि कहा गया है। शिव रहस्य में कहा गया है- 

चतुर्दश्यां तु कृष्णायां फाल्गुने शिवपूजनम्।

तामुपोष्य प्रयत्नेन विषयान् परिवर्जयेत।।

शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम्।

शिवपुराण में ईशान संहिता के अनुसार :- 

फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि।

 शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:।। 

अर्थात :- फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोडों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए इसलिए इसे महाशिवरात्रि मानते हैं। शिवपुराण में विद्येश्वर संहिता के अनुसार शिवरात्रि के दिन ब्रह्मा जी तथा विष्णु जी ने अन्यान्य दिव्य उपहारों द्वारा सबसे पहले शिव पूजन किया था जिससे प्रसन्न होकर महेश्वर ने कहा था की “आज का दिन एक महान दिन है। इसमें तुम्हारे द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है, इससे मैं तुम देवों पर बहुत प्रसन्न हूँ। इसी कारण यह दिन परम पवित्र और महान होगा। आज की यह तिथि ‘महाशिवरात्रि’ के नाम से विख्यात होकर मेरे लिये परम प्रिय होगी। इसके समय में जो मेरे लिंग (निष्कल अंग– आकृति से रहित निराकार स्वरूप के प्रतीक ) वेर (सकल साकार रूप के प्रतीक विग्रह) की पूजा करेगा, वह पुरुष जगत की सृष्टि और पालन आदि कार्य में भी सक्षम हो सकता है। जो महाशिवरात्रि को दिन-रात निराहार एवं जितेन्द्रिय रहकर अपनी शक्ति के अनुसार निश्चल भाव से मेरी यथोचित पूजा करेगा, उसको मिलने वाले फल का वर्णन सुनो -एक वर्ष तक निरंतर मेरी पूजा करने पर जो फल मिलता हैं, वह सारा शुभ फल केवल महाशिवरात्रि को मेरा पूजन करने से ही मनुष्य तत्काल प्राप्त कर लेता हैं। जैसे पूर्ण चंद्रमा का उदय समुद्र की वृद्धि का अवसर हैं, उसी प्रकार यह महाशिवरात्रि तिथि मेरे धर्म की वृद्धि का समय हैं। इस तिथि में मेरी स्थापना आदि का मंगलमय उत्सव मनाना चाहिये | ॐ नमः शिवाय।

शिवलिंग पूजा से मनेकामना पूर्ति सिद्धि :-

शिव के उस अपादान कारण को, जो अनादि और अनंत है, उसे लिंग कहते हैं। उसी गुणनात्मक मौलिक प्रकृति का नाम माया है, उसी से यह सम्पूर्ण जगत उत्पन्न हुआ है, होता रहेगा। जिसको जाना नहीं जा सकता, जो स्वंय ही कार्य के रूप में व्यक्त हुआ है, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है, और उसी में लीन हो जाना है, उसे ही लिंग कहते हैं। विश्व की उत्पत्ती और लय के हेतु (कारण) होने से ही उस परमपुरूष की लिंगता है। लिंग शिव का शरीर है, क्योंकि वह उसी रूप में अधिष्ठित हैं। लिंग के आधार रूप में जो तीन मेखला युक्त वेदिका है, वह भग रूप में कही जाने वाली जगतदात्री महाशक्ति हैं। इस प्रकार आधार सहित लिंग जगत का कारण है। यह उमा-महेश्वर स्वरूप है। भगवान शिव स्वयं ही ज्योतिर्लिंग स्वरूप तमस से परे हैं, लिंग और वेदी के समायोजन से ये अर्धनारीश्वर हैं।पूज्यो हरस्तु सर्वत्र लिंगे पूर्णोर्चनं भवेत।। (अग्निपुराण अध्याय ५४)

संस्कृत में लिंग का अर्थ “चिन्ह” है। और इसी अर्थ में यह शिवलिंग shivling के लिये प्रयुक्त होता है। देवताओं की पूजा शरीर के रूप में हेती है, लेकिन परमपुरूष अशरीर हैं, इस लिये परम पुरूष की पूजा shivling Pooja दोनों प्रकार से होती है। जब पूजा शरीर के रूप मे होती है, तब वह शरीर अराधक की भावना के अनुरूप होता है। जब पूजा प्रतीक के रूप में होती है, तब यह प्रतीक अनंत होता है। क्यों की ब्रह्माण्ड की कल्पना ही अण्डाकर रूप में होती है, इस लिये कोई जब अनंत या ज्योति का स्वरूप बनाना चाहेगा, तब प्रकृति को अभिव्यक्त करने के लिये लिंग के साथ तीन मेखला वाली वेदी बनानी पड़ती है, क्योंकि प्रकृति त्रिगुणात्मक (सत्व-रज-तम) है, इस वेदी को भग कहते हैं। लेकिन यहां भग का अर्थ स्त्री जननेद्रीय नहीं है। भगवान शब्द में जो भग है उसका अर्थ है:- एेश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य है। सम्पूर्ण जगत में एकीभूत है। इस अर्थ में वेदिका निखिलेश्वर्यमयी महा शक्ति है।परमपुरूष शिव की सनातन (पौराणिक) मत में पांच रूपों में उपासना करने की परम्परा है, इसे ही पंचदेवोपासना कहते हैं:- शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश ओर सूर्य। इन पांचो का ही गोल प्रतीक आपने देखा है। शिवलिंग shivling पर चर्चा हम कर ही रहे हैं। विष्णु के प्रतीक शालिग्राम shaligram आपने सभी वैष्णव मंदिरों में देखा है। विष्णु के जितने अवतार हैं, लक्षणभेद से शालिग्राम shaligram शिला के साथ भी गोमती चक्र रखना पड़ता है। यह महाप्रकृति का एेश्वर्यमय भग स्वरूप है। जो शिवलिंगार्चन में वेदिका के रूप में है। इसी प्रकार शक्ति की गोल पिण्डियां देश के अनेक शक्ति स्थानों में विद्यमान हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो कालीपीठ पर   शक्ति केवल पिण्डियों के रूप में ही स्थापित होती हैं। गणेशजी की स्थापना प्राय: प्रत्येक पूजन के आरम्भ में सुपारी अथवा गोबर की गोल पिण्डियाें पर ब्राह्मणों को करवाते आपने देखा ही होगा। भगवान सूर्य का प्रत्यक्ष प्रतीक आकाश का सूर्य-मण्डल जैसा है। आप जानते हैं, जहां भी ग्रहों के चक्र बनाये जाते हैं, सूर्यमण्डल को अण्डाकर ही बनाना पड़ता है। इस प्रकार इन पंचदेवों की लिंग मानकर अर्थात् चिन्ह बनाकर ही इनकी उपासना होती है।पार्थिव लिंग की पूजा और महत्व:-जो लिंग बांबी, गंगा, तलाब, वैश्या के घर, घुड़साल की मिट्टी मक्खन या मिश्री से बनाये जाते हैं, उनका अलग-अलग मनेकामना के लिये उपासना, पूजा व अभिषेक करने के उपरांत उन्हें जल में विसर्जित करने का विधान है। पार्थिव लिंग के तांत्रिक प्रयोगों से प्रयोजन सिद्धियां :-

1. भू सम्पत्ती प्राप्त करने के लिये- फूलों से बनाये गये शिवलिंग shivling का अभिषेक करें।

2. स्वास्थ्य और संतान के लिये- जौ, गेहूं और चावल तीनों के आटे को बराबर मात्रा में लेकर, शिवलिंग shivling बनाकर उसकी पूजा करें।

3. असाध्य रोग से छुटकारा पाने के लिये- मिश्री से बनाये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

4. सुख-शांति के लिये- चीनी की चाशनी से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

5. वंश वृद्धि के लिये- बांस के अंकुर से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

6. आर्थिक समृद्धि के लिये- दही का पानी कपडे से निचोड़ लें और उस बिना पानी वाली दही से जो शिवलिंग shivling बनेगा, उसका पूजन करने से समृद्धि प्राप्त होती है।

7. शिव सायुज्य के लिये- कस्तूरी और चंदन से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

8. वशीकरण के लिये- त्रिकुटा (सोंठ, मिर्च व पीपल के चूर्ण में नमक मिलाकर शिवलिंग shivling बनता है, उसकी पूजा की जाती है।

10. अभिलाषा पूर्ति के लिये- भीगे तिलों को पीसकर बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

11. अभिष्ट फल की प्राप्ति के लिये- यज्ञ कुण्ड से ली गई भस्म का शिवलिंग shivling बनाकर उसकी पूजा करें। 

12. प्रीति बढ़ाने के लिये- गुड़ की डली से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

13. कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये- गुड़ में अन्न चिपकाकर उस से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

14. फल वाटिका में फल की अधिक पैदावार के लिये- उसी फल को शिवलिंग shivling के समान रखकर उस फल की पूजा करें।

15. मुक्ति प्राप्त करने के लिये- आंवले को पीसकर उस से बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

16. स्त्रीयों के लिये सौभाग्य प्रदाता- मक्खन को अथवा वृक्षों के पत्तों को पीसकर बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

17. आकाल मृत्यु भय दूर करने के लिये- दूर्वा को शिवलिंगाकार गूंथकर उस की पूजा करें।

18. भक्ति और मुक्ति के लिये- कपूर से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

19. तंत्र में सिद्धि के लिये- लौह से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

20. स्त्रीयों के भाग्य में वृद्धि- मोती से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

21. सुख-समृद्धि के लिये- स्वर्ण से बने शिवलिंग shivling का पूजन करें।

22. धन-धान्य वृद्धि के लिये- चांदी से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

23. दरिद्रता निवारण के लिये- पारद (पारा) के शिवलिंग shivling की पूजा करें।

24. शत्रुता निवारण के लिये- पीतल से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

25. कर्ज निवारण के लिये- कांस्य से निर्मित शिवलिंग shivling की पूजा करें।

मेरे और लेख देखें :- astroguruji.in तथा aapkabhavishya.in पर।

कुण्डली के राजयोग-

राजयोग उत्तरकालामृत में :-

Dr.R.B.Dhawan

यदा मुश्तरी कर्कटे वा कमाने, अगर चश्मखोरा पड़े आयुखाने।
भला ज्योतिषी क्या लिखेगा पढ़ेगा, हुआ बालका बादशाही करेगा।।

उत्तरकालामृत ग्रन्थ में उल्लेखित यह ज्योतिषीय खोज अब्दुल रहीम खानखाना की कृति है, जो की मुगल काल के विद्वान थे। सैकड़ो वर्ष के उपरांत आज भी यह खोज सत्य ही प्रतीत होती है। इस ज्योतिषीय योग से स्पष्ट है कि यदि 2, 3, 5, 6, 8, 9 तथा 11, 12 में से किसी भी स्थान में बृहस्पति की स्थिति हो, और शुक्र 8वें स्थान में हो तो ऐसी ग्रह स्थिति में जन्म लेने वाला जातक चाहे साधारण परिवार में ही क्यों न जन्मा हो, वह राज्याधिकारी ही बनता है। यही कारण है कि कभी-कभी अत्यंत साधारण परिवार के बालकों में भी राजसिक लक्षण पायें जाते हैं, और वे किसी न किसी दिन राज्य के अधिकारी घोषित किये जाते हैं। विभिन्न योगों के अनुसार ही मनुष्य की चेष्टायें और क्रियायें विकसित होती हैं, इस विषय पर विभिन्न शास्त्रों का भी उल्लेख दर्शनीय है। सर्वप्रथम ज्योतिष शास्त्र को लीजिये उसमें राजयोग के लक्षण इस प्रकार बतलाये गये हैं।
जिस व्यक्ति के पैर की तर्जनी उंगली में तिल का चिन्ह हो वह पुरूष राज्य-वाहन का अधिकारी होता है। जिसके हाथ की उंगलियों के प्रथम पर्व ऊपर की ओर अधिक झुके हों, वह जनप्रिय तथा नेतृत्व करने वाला होता है। जिसके हाथ में चक्र, दण्ड एवं छत्र युक्त रेखायें हों, वह व्यक्ति निसंदेह राजा अथवा राजतुल्य होता है। जिसके मस्तिष्क में सीधी रेखायें और तिलादि का चिन्ह हो, वह राजा के समान ही सुख को प्राप्त करता है, और उसमें बैद्धिक कुशलता भी पर्याप्त मात्रा में होती है।
किन्तु वृहज्जातक के अनुसार राजयोग के बारह प्रकार होते हैं :-

तीन ग्रह उच्च के होने पर जातक स्वकुलानुसार राजा (राजतुल्य) होता है। यदि उच्चवर्ती तीन पापग्रह हों तो, जातक क्रूर बुद्धि का राजा होता है, और शुभ ग्रह होने पर सद्बुद्धि युक्त। उच्चवर्ती पाप-ग्रहों से राजा की समानता करने वाला होता है, किन्तु राजा नहीं होता। मंगल, शनि, सूर्य और गुरू चारों अपनी-अपनी उच्च राशियों में हों, और कोई एक ग्रह लग्न में उच्चराशि का हो तो, चार प्रकार का राजयोग होता है। चन्द्रमा कर्क लग्न में हो, और मंगल, सूर्य तथा शनि और गुरू में से कोई भी दो ग्रह उच्च हों तो, भी राजयोग होता है। जैसे- मेष लग्न में सूर्य, कर्क में गुरू, तुला का शनि और मकर राशि में मंगल भी प्रबल राजयोग कारक होता है, कर्क लग्न से दूसरा, तुला से तीसरा, मकर से चौथा जो तीन ग्रह उच्च के हों, जैसे मेष में सूर्य, कर्क में गुरू, तुला में शनि तो भी राजयोग माना जाता है। शनि कुंभ में, सूर्य मेष में, बुध मिथुन में, सिंह का गुरू और वृश्चिक का मंगल तथा शनि सूर्य और चन्द्रमा में से एक ग्रह लग्न में हो तो भी पांच प्रकार का राजयोग माना जाता है। 

सूर्य बुध कन्या में हो, तुला का शनि, वृष का चंद्रमा और तुला में शुक्र, मेष में मंगल तथा कर्क में बृहस्पति भी राजयोगप्रद ही माने जाते हैं। मंगल उच्च का सूर्य और चन्द्र धनु में और लग्न में मंगल के साथ यदि मकर का शनि भी हो तो, मनुष्य निश्चित ही राजा (राजतुल्य) होता है। शनि चन्द्रमा के साथ सप्तम में हो, और बृहस्पति धनु का हो, तथा सूर्य मेष राशि का हो, और लग्न में हो तो, भी मनुष्य राजा होता है। वृष का चन्द्रमा लग्न में हो, और सिंह का सूर्य तथा वृश्चिक का बृहस्पति और कुंभ का शनि हो तो, मनुष्य निश्चय ही राजा होता है। मकर का शनि, तीसरा चन्द्रमा, छठा मंगल, नवम् बुध, बारहवां बृहस्पति हो तो, मनुष्य अनेक सुंदर गुणों से युक्त राजा होता है। धनु का बृहस्पति चंद्रमा युक्त क्रमश: अपने-अपने उच्च राशिगत हों तो, जातक गुणावान राजा होता है। और मंगल मकर का और बुध शुक्र अपने-अपने उच्च में लग्न गत हों तो, जातक गुणावान राजा होता है। मंगल शनि पंचम गुरू और शुक्र चतुर्थ तथा कन्या लग्न में बुध हों तो, जातक गुणावान राजा होता है। मीन का चंद्रमा लग्न में हो, कुंभ का शनि, मकर का मंगल, सिंह का सूर्य जिसके जन्म कुण्डली में हों, वह जातक भूमि का पालन करने वाला गुणी राजा होता है। मेष का मंगल लग्न में, कर्क का बृहस्पति हो तो, जातक शक्तिशाली राजा होता है। कर्क लग्न में बृहस्पति और ग्याहरवें स्थान में वृष का चंद्रमा शुक्र, बुध और मेष का सूर्य दशम स्थान में होने से जातक पराक्रमी राजा होता है।

मकर लग्न में शनि, मेष लग्न में मंगल, कर्क का चन्द्र, सिंह का सूर्य, मिथुन का बुध और तुला का शुक्र होने से जातक यशस्वी व भूमिपति होता है। कन्या का बुध लग्न में और दशम शुक्र सप्तम् बृहस्पति तथा चन्द्रमा भी जातक राजा होता है। जितने भी राजयोग हैं, इनके अन्तर्गत जन्म पाने पर मनुष्य चाहे जिस जाति स्वभाव और वर्ण का क्यों न हो, वे राजा ही होता है। फिर राजवंश में जन्म प्राप्त करने वाले जातक तो चक्रवर्ती राजा तक हो सकते हैं। किन्तु अब कुछ इस प्रकार के योगों का वर्णन किया जा रहा है जिनमें केवल राजा का पुत्र ही राजा होता है, तथा अन्य जातियों के लोग राजा तुल्य होते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि राजा का पुत्र राजा ही हो, उसके लिये निम्नलिखित में से किसी एक का होना नितांत आवश्यक है, कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि राजवंश में जन्म पाने वाला जातक भी सामान्य व्यक्ति होता है, और सामान्य वंश और स्थिति में जन्म पाने वाला महान हो जाता है, उसका यही कारण है। यदि त्रिकोण में 3-4 ग्रह बलवान हों तो राजवंशीय राजा होते हैं। जब 5-6-7 भाव में ग्रह उच्च अथवा मूल त्रिकोण में हों तो, अन्य वंशीय जातक भी राजा होते हैं। मेष के सूर्य चंद्र लग्नस्थ हों और मंगल मकर का तथा शनि कुंभ का बृहस्पति धनु का हो तो, राजवंशीय राजा होता है।

यदि शुक्र 2, 7 राशि का चतुर्थ भाव में और नवम स्थान में चंद्रमा हो और सभी ग्रह 3,1,11 भाव में ही हों तो, ऐसा जातक राजवंशीय राजा होता है। बलवान बुध लग्न में और बलवान शुक्र तथा बृहस्पति नवम स्थान में हो और शेष ग्रह 4, 2, 3, 6, 10, 11 भाव में ही हों तो, ऐसा राजपुत्र धर्मात्मा और धनी-मानी राजा होता है। यदि वृष का चंद्रमा लग्न में हो और मिथुन का बृहस्पति, तुला का शनि और मीन राशि में अन्य रवि, मंगल, बुध तथा शुक्र ग्रह हों तो, राजपुत्र अत्यंत धनी होता है। दशम चन्द्रमा, ग्याहरवां शनि, लग्न का गुरू, दूसरा बुध और मंगल, से राजपुत्र राजा ही होेता है। किंतु यदि मंगल शनि लग्न में चतुर्थ चंद्रमा और सप्तम बृहस्पति, नवम, शुक्र, दशम सूर्य, ग्यारहवें बुध हो तो, भी यही फल होता है। चतुर्थ में सूर्य और शुक्र होने से राजपुत्र राजा ही होेता है। किंतु यदि मंगल शनि लग्न में चतुर्थ चंद्रमा और सप्तम बृहस्पति, नवम, शुक्र, दशम सूर्य, ग्यारहवें बुध हो तो, भी यही फल होता है। एक बात सबसे अधिक ध्यान देने की यह है कि राजयोग का निर्माण करने वाले समस्त ग्रहों में से जो ग्रह दशम तथा लग्न में स्थित हों तो, उनकी अन्तर्दशा में राज्य लाभ होगा जब दोनों स्थानों में ग्रह हों तो, उनसे भी अधिक शक्तिशाली राज्य लाभ होगा, उसके अन्तर्दशा में जो लग्न, दशम में अनेक ग्रह हों तो, उनमें जो सर्वाेत्तम बली हो, उसके प्रभाव के द्वारा ही राज्य का लाभ हो सकेगा। बलवान ग्रह द्वारा प्राप्त हुआ राज्य भी छिद्र दशा द्वारा समाप्त हो जाता है। यह जन्म कालिक शत्रु या नीच राशिगत ग्रह की अन्तर्दशा छिद्र दशा कहलाती है। जो राज्य को समाप्त करती है, अथवा बाधायें उपस्थित करती है। यदि बृहस्पति, शुक्र और बुध की राशियां 4, 12, 6, 2, 3, 6 लग्न में हों, और सातवां शनि तथा दशम सूर्य हो तो, भी मनुष्य धन रहित होकर भी भाग्यवान होता है, और अच्छे साधन उसके लिये सदा उपलब्ध होते हैं। यदि केन्द्रगत ग्रह पाप राशि में हों, और सौम्य राशियों में पापग्रह होें तो, ऐसा मनुष्य चोरों का राजा होता है। इस प्रकार से विभिन्न राजयोगों के होने पर मनुष्य सुख और ऐश्वर्य का भोग करता। 

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सरस्वती मंत्र

सरस्वती मंत्र से विद्या प्राप्ति :-

Dr.R.B.Dhawan

आप भी महान व्यक्तित्व के स्वामी बन सकते हैं, यदि पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी के इन सिद्धांतों को अपनी जीवनशैली में उतार लें-

1. ईश्वर को सर्वव्यापी व न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को स्वीकार करें।
2. अपने शरीर को परमात्मा का मंदिर मानकर (क्योंकि परमात्मा के अंश “आत्मा” का आपके शरीर में भी निवास है।) आत्मसंयम, और नियमितता द्वारा अपने शरीर की रोगों और बुराईयों से रक्षा करें।
3. मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाये रखने के लिये संस्कारी लोगों की संगति करें।
4. इन्द्रियों पर नियंत्रण, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सदा अभ्यास करें।
5. मर्यादाओं का पालन करें, वर्जनाओं से बचें तथा समाजनिष्ठ बनें।
6. अनिति से प्राप्त उपलब्धियों और सफलताओं की उपेक्षा करें।
7. रूढ़िवादी परम्परा की तुलना में विवेक से फैसले लें।
8. मनुष्य का मूल्यांकन उसकी सफलताओं और योग्यताओं से न करके, उसके सद्द्विचारों और सत्कर्मों को महत्व दें।
9. “मनुष्य अपने अच्छे-बुरे कर्मो के द्वारा अपने भाग्य का निर्माण स्वयं ही करता है” इस विश्वास पर चलते हुये आजीवन सद्कर्म करते चलें।

जहां बहुत से विद्यार्थिंयों कि स्मरण शक्ति अच्छी होती है, वहीं कुछ विद्यार्थी कमजोर स्मरण शक्ति वाले भी होते हैं। बच्चे को एवं उसके माता-पिता को कभी कभी ऐसा लगता है, कि बच्चे का मन पढाई में नहीं लगता, या बच्चे जितनी मेहनत करते हैं, उन्हें उसके अनुरुप फल नहीं मिलता, परीक्षा के प्रश्न पत्र में लिखते समय उसे भय रहता है, बच्चे ने जो पढाई कि है, वह परिक्षा पत्र में लिखते समय भूल जाता हैं, इत्यादी.., कारणो से बच्चे और माता-पिता हमेशा परेशान रहते हैं।

कुछ बच्चे होते हैं, जो एक या दो बार पढने पर याद कर लेते हैं, तो कुछ बच्चे वही पाठ्य सामग्री अधिक समय पढने के उपरांत भी ठीक से याद नहीं कर पाते। ऐसा क्यूं होता है? इस का मुख्य कारण है, अनुचित ढंग से कि गई पढाई या पढाई में एकाग्रता की कमी। विद्या अध्ययन में आने वाली रुकावटों एवं विघ्न बाधाओं को दूर करने हेतु ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशिष्ठ मंत्रो का उल्लेख मिलता है। जिसके जप से पढाई में आने वाली रुकावटे दूर हो सकती हैं, एवं कमजोर यादाश्त की समस्या का निराकरण होता है। इस समस्या के लिए सबसे अच्छा उपाय है : माता सरस्वती की उपासना। आगे की पंक्तियों में माता सरस्वती मंत्र और उनके कुछ प्रयोग जिसे जा रहे हैं, इनका प्रयोग करने से माता सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है :-

सरस्वती मंत्र: –

या कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्र वृस्तावता ।

या वीणा वर दण्ड मंडित करा या श्वेत पद्मसना ।।

या ब्रह्माच्युत्त शंकर: प्रभृतिर्भि देवै सदा वन्दिता ।

सा माम पातु सरस्वती भगवती नि:शेष जाड्या पहा ॥१॥

भावार्थ: जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह श्वेत वर्ण की हैं, और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर अपना आसन ग्रहण किया है, तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हैं, आप हमारी रक्षा करें।

सरस्वती मंत्र तन्त्रोक्तं देवी सूक्त से : –

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेणसंस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

विद्या प्राप्ति के लिये सरस्वती मंत्र:-

घंटाशूलहलानि शंखमुसले चक्रं धनुः सायकं हस्ताब्जैर्दघतीं धनान्तविलसच्छीतांशु तुल्यप्रभाम्‌।

गौरीदेहसमुद्भवा त्रिनयनामांधारभूतां महापूर्वामत्र सरस्वती मनुमजे शुम्भादि दैत्यार्दिनीम्‌॥

भावार्थ: जो अपने हस्त कमल में घंटा, त्रिशूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण को धारण करने वाली, गोरी देह से उत्पन्ना, त्रिनेत्रा, मेघास्थित चंद्रमा के समान कांति वाली, संसार की आधारभूता, शुंभादि दैत्य का नाश करने वाली महासरस्वती को हम नमस्कार करते हैं। माँ सरस्वती जो प्रधानतः जगत की उत्पत्ति और ज्ञान का संचार करती हैं।

अत्यंत सरल सरस्वती मंत्र प्रयोग:-

प्रतिदिन सुबह स्नान इत्यादि से निवृत होने के बाद मंत्र जप आरंभ करें। अपने सामने मां सरस्वती का यंत्र या चित्र स्थापित करें । अब चित्र या यंत्र के ऊपर श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प व अक्षत (चावल) भेंट करें, और धूप-दीप जलाकर देवी की पूजा करें, और अपनी मनोकामना का मन में स्मरण करके स्फटिक की माला से किसी भी सरस्वती मंत्र की शांत मन से एक माला फेरें।

1. सरस्वती मूल मंत्र:-

ॐ ऎं सरस्वत्यै ऎं नमः।

2. सरस्वती मंत्र:-

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वती देव्यै नमः।

3. सरस्वती गायत्री मंत्र:-

१ – ॐ सरस्वत्यै विधमहे, ब्रह्मपुत्रयै धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयात।

२ – ॐ वाग देव्यै विद्दमहे काम राज्या धीमहि । तन्नो सरस्वती: प्रचोदयात।

4. ज्ञान वृद्धि हेतु गायत्री मंत्र :-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

5. परीक्षा भय निवारण हेतु:-

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वीणा पुस्तक धारिणीम् मम् भय निवारय निवारय अभयम् देहि देहि स्वाहा।

6. स्मरण शक्ति नियंत्रण हेतु:-

ॐ ऐं स्मृत्यै नमः।

7. विघ्न बाधा निवारण हेतु:-

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अंतरिक्ष सरस्वती परम रक्षिणी मम सर्व विघ्न बाधा निवारय निवारय स्वाहा।

8. स्मरण शक्ति बढा के लिए :-

ऐं नमः भगवति वद वद वाग्देवि स्वाहा।

9. परीक्षा में सफलता के लिए :-

१ – ॐ नमः श्रीं श्रीं अहं वद वद वाग्वादिनी भगवती सरस्वत्यै नमः स्वाहा विद्यां देहि मम ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा।

२ -जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी, कवि उर अजिर नचावहिं बानी।

मोरि सुधारिहिं सो सब भांती, जासु कृपा नहिं कृपा अघाती॥

10. हंसारुढा मां सरस्वती का ध्यान कर मानस-पूजा-पूर्वक निम्न मन्त्र का 21 बार जप करें :-

ॐ ऐं क्लीं सौः ह्रीं श्रीं ध्रीं वद वद वाग्-वादिनि सौः क्लीं ऐं श्रीसरस्वत्यै नमः।

11. विद्या प्राप्ति एवं मातृभाव हेतु:-

विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा: स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।

त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्तिः॥

अर्थातः- देवि! विश्वकि सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं। जगदम्बे! एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थो से परे हो।

उपरोक्त मंत्र का जप हरें, सफेद हकीक या स्फटिक माला से प्रतिदिन सुबह १०८ बार करें, तदुपरांत एक माला जप निम्न मंत्र का भी करें।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं महा सरस्वत्यै नमः।

12. देवी सरस्वती के अन्य प्रभावशाली मंत्र :-

एकाक्षर मंत्र :-

“ऐ”

द्वियक्षर मंत्र :-

१ “आं लृं”,।

२ “ऐं लृं”।

त्र्यक्षर मंत्र :-

“ऐं रुं स्वों”।

चतुर्क्षर मंत्र :-

“ॐ ऎं नमः”।

नवाक्षर मंत्र :-

“ॐ ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः”।

दशाक्षर मंत्र :-

१ – “वद वद वाग्वादिन्यै स्वाहा”।

२ – “ह्रीं ॐ ह्सौः ॐ सरस्वत्यै नमः”।

एकादशाक्षर मंत्र :-

१ – “ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

२ – “ऐं वाचस्पते अमृते प्लुवः प्लुः”।

३ – “ऐं वाचस्पतेऽमृते प्लवः प्लवः”।

एकादशाक्षर-चिन्तामणि-सरस्वती मंत्र :-

“ॐ ह्रीं ह्स्त्रैं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

एकादशाक्षर-पारिजात-सरस्वतीः-

१ – “ॐ ह्रीं ह्सौं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

२ – “ॐ ऐं ह्स्त्रैं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

द्वादशाक्षर मंत्र :-

“ह्रीं वद वद वाग्-वादिनि स्वाहा ह्रीं”।

अन्तरिक्ष-सरस्वती मंत्र :-

“ऐं ह्रीं अन्तरिक्ष-सरस्वती स्वाहा”।

षोडशाक्षर मंत्र :-

“ऐं नमः भगवति वद वद वाग्देवि स्वाहा”।

अन्य मंत्र :-

• ॐ नमः पद्मासने शब्द रुपे ऎं ह्रीं क्लीं वद वद वाग्दादिनि स्वाहा।

• “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा”।

• “ऐंह्रींश्रींक्लींसौं क्लींह्रींऐंब्लूंस्त्रीं नील-तारे सरस्वति द्रांह्रींक्लींब्लूंसःऐं ह्रींश्रींक्लीं सौं: सौं: ह्रीं स्वाहा”।

• “ॐ ह्रीं श्रीं ऐं वाग्वादिनि भगवती अर्हन्मुख-निवासिनि सरस्वति ममास्ये प्रकाशं कुरु कुरु स्वाहा ऐं नमः”।

• ॐ पंचनद्यः सरस्वतीमयपिबंति सस्त्रोतः सरस्वती तु पंचद्या सो देशे भवत्सरित्।

उपरोक्त आवश्यक मंत्र का प्रतिदिन जाप करने से विद्या की प्राप्ति होती है। स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ कपडे पहन कर मंत्र का जप प्रतिदिन एक माला करें। ब्राह्म मुहूर्त मे किये गए मंत्र का जप अधिक फलदायी होता हैं। इस्से अतिरीक्त अपनी सुविधा के अनुसार खाली बैठे हैं तो मंत्र का जप कर सकते हैं। मंत्र जप उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके करें। जप करते समय शरीर का सीधा संपर्क जमीन से न हो इस लिए ऊन के आसन पर बैठकर जप करें। जमीन के संपर्क में रहकर जप करने से जप प्रभाव हीन होते हैं।

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शनि ग्रह

कैसा फल देता है शनि, अन्य ग्रहों के साथ? :-

Dr.R.B.Dhawan

खगोलीय दृष्टि से शनि हमारे सौरमंडल में सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण में बारह राशियों में शनि को मकर और कुम्भ राशि का स्वामी मना गया है, शनि की उच्च राशि तुला तथा नीच राशि मेष है, शनि को एक क्रोधित ग्रह के रूप में उल्लेखित किया गया है। शनि का रंग काला है। शनि की गति नवग्रहों में सबसे धीमी है, इसी लिए शनि एक राशि में ढाई वर्ष तक गतिमान रहता है, और बारह राशियों के चक्र को तीस साल में पूरा करता है। ज्योतिष में शनि को कर्म, आजीविका, जनता, सेवक, नौकरी, अनुशाशन, दूरदृष्टि, प्राचीन वस्तु, लोहा, स्टील, कोयला, पेट्रोल, पेट्रोलयम प्रोडक्ट, चमड़ा, मशीन, औजार, तपस्या और अध्यात्म का कारक माना गया है। स्वास्थ की दृष्टि से शनि हमारे पाचन–तंत्र, हड्डियों के जोड़, बाल, नाखून,और दांत को नियंत्रित करता है। जन्मकुण्डली में यदि शनि का यदि अन्य ग्रहों से योग हो तो भिन्न भिन्न प्रकार के फल व्यक्ति को प्राप्त होते हैं, आईये उन्हें जानते हैं :-

शनि सूर्य – कुण्डली में शनि और सूर्य का योग बहुत शुभ नहीं माना गया है, यह जीवन में संघर्ष बढ़ाने वाला योग माना गया है, फलित ज्योतिष में सूर्य, शनि को परस्पर शत्रु ग्रह माना गया है, कुंडली में शनि सूर्य का योग होने पर व्यक्ति को आजीविका के लिए संघर्ष का सामना करना पड़ता है, विशेष रूप से करियर का आरंभिक पक्ष संघर्षपूर्ण होता है, और यदि शनि अंशों में सूर्य के बहुत अधिक निकट हो तो, आजीविका में बार बार उतार-चढ़ाव रहते हैं, शनि सूर्य का योग होने पर जातक को या तो पिता के सुख में कमी होती है, या पिता के साथ वैचारिक मतभेद रहते हैं, यदि शनि और सूर्य का योग शुभ भाव में बन रहा हो तो, ऐसे में संघर्ष के बाद सरकारी नौकरी का योग बनता है।

शनि चन्द्रमा – कुंडली में शनि और चन्द्रमा का योग होने पर व्यक्ति मानसिक रूप से हमेशा परेशान रहता है, मानसिक अस्थिरता की स्थिति रहती है, इस योग के होने पर नकारात्मक विचार, डिप्रेशन, एंग्जायटी और अन्य साइकैट्रिकल समस्याएं उत्पन्न होती हैं, व्यक्ति एकाग्रता की कमी के कारण अपने कार्यों को करने में समस्या आती है, यह योग माता के सुख में कमी या वैचारिक मतभेद भी उत्पन्न करता है, पर यदि शनि चन्द्रमा  का योग शुभ भाव में बन रहा हो तो, ऐसे में विदेश यात्रा या विदेश से जुड़कर आजीविका का साधन बनता है।

शनि मंगल – कुंडली में शनि मंगल का योग भी करियर के लिए संघर्ष देने वाला होता है, करियर की स्थिरता में बहुत समय लगता है, और व्यक्ति को बहुत अधिक पुरुषार्थ करने पर ही सफलता मिलती है, शनि मंगल का योग व्यक्ति को तकनीकी कार्यों जैसे इंजीनियरिंग आदि में आगे ले जाता है, और यह योग कुंडली के शुभ भावों में होने पर व्यक्ति पुरुषार्थ से अपनी तकनीकी प्रतिभाओं के द्वारा सफलता पाता है, शनि मंगल का योग यदि कुंडली के छटे या आठवे भाव में हो तो, स्वास्थ में कष्ट उत्पन्न करता है, शनि मंगल का योग विशेष रूप से पाचन तंत्र की समस्या, जॉइंट्स पेन और एक्सीडेंट जैसी समस्याएं देता है।

शनि बुध – शनि और बुध का योग शुभ फल देने वाला होता है। कुंडली में शनि बुध के एक साथ होने पर ऐसा व्यक्ति गहन अध्ययन की प्रवृति रखने वाला होता है, और प्राचीन वस्तुएं, इतिहास और गणनात्मक विषयों में रुचि रखने वाला होता है, और व्यक्ति प्रत्येक बात को तार्किक दृष्टिकोण से देखने वाला होता है, कुंडली में शनि बुध का योग व्यक्ति को बौद्धिक कार्य, गणनात्मक और वाणी से जुड़े कार्यों में सफलता दिलाता है।

शनि बृहस्पति – शनि और बृहस्पति के योग को बहुत अच्छा और शुभ फल देने वाला माना गया है, कुंडली में शनि बृहस्पति एक साथ होने पर व्यक्ति अपने कार्य को बहुत समर्पण भाव और लगन के साथ करने वाला होता है, यह योग आजीविका की दृष्टि से बहुत शुभ फल देने वाला होता है, व्यक्ति अपने आजीविका के क्षेत्र में सम्मान और यश तो प्राप्त करता ही है, पर शनि बृहस्पति का योग होने पर व्यक्ति अपने कार्य क्षेत्र में कुछ ऐसा विशेष करता है, जिससे उसकी कीर्ति बहुत बढ़ जाती है। कुंडली में शनि और बृहस्पति का योग होने पर ऐसे व्यक्ति के करियर या आजीविका की सफलता में उसके गुरु का बहुत बड़ा विशेष योगदान होता है, यह योग धार्मिक, समाजसेवा और आध्यात्मिक कार्य से व्यक्ति को जोड़कर परमार्थ के पग पर भी ले जाता है।

शनि शुक्र – शनि और शुक्र का योग भी बहुत शुभ माना गया है, कुंडली में शनि और शुक्र का योग होने पर व्यक्ति रचनात्मक या कलात्मक कार्यों से सफलता पाता है, जीवन में आजीविका के द्वारा अच्छी धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, व्यक्ति विलासिता पूर्ण कार्य से आजीविका चलाता है, यदि पुरुष जातक की कुंडलीं में शनि शुक्र का योग हो तो, ऐसे व्यक्तियों के जीवन में उनके विवाह के बाद विशेष उन्नति और भाग्योदय होता है, तथा उनकी पत्नी जीवन निर्वाह में विशेष सहायक होती है।  

शनि राहु – शनि और राहु का योग कुंडली में होने पर व्यक्ति वाक्-चातुर्य और तर्क से अपने कार्य सिद्ध करने वाला होता है, ऐसे में व्यक्ति को आकस्मिक धन प्राप्ति वाले कार्यों से लाभ होता है, व्यक्ति अपनी मुख्य आजीविका से अलग भी गुप्त रूप से धन लाभ प्राप्त करता है, और शुभ प्रभाव के आभाव में यह योग व्यक्ति को छल के कार्यों से भी जोड़ देता है।

शनि केतु – शनि और केतु का योग बहुत संघर्षपूर्ण योग माना गया है कुंडली में यदि शनि और केतु एक साथ हों तो, ऐसे में व्यक्ति की आजीविका या करियर बहुत संघर्ष पूर्ण होता है, व्यक्ति को पूरी मेहनत करने पर भी आपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, कई बार व्यक्ति अपनी आजीविका का क्षेत्र बदलने पर मजबूर हो जाता है, यह योग व्यक्ति में आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी उत्पन्न करता है, यदि कुंडली में अन्य अच्छे योग भी हों तो भी व्यक्ति के करियर की स्थिति तो अस्थिर ही बनी रहती है, शनि केतु का योग व्यक्ति को पाचनतंत्र, जोड़ो के दर्द और आंतो से जुडी समस्याएं भी देता है। यह तो हैं शनि के सामान्य लक्षण, अब बात कर लेते हैं, शनि देव की साढ़ेसाती की, क्योंकि शनि साढ़ेसाती अक्सर लोगों को भयभीत किसे रहती है।

शनि की साढ़ेसाती :-

साढ़ेसाती का नाम सुनते ही, अच्छे-अच्छे भयभीत हो उठते हैं। जैसे शनि ग्रह कोई भयानक राक्षस है! ‘बस जैसे ही आयेगा हमें कच्चा ही चबा जायेगा। 

वस्तुतः ज्योतिष शास्त्र में शनि ग्रह को दुःख और पीडा का ‘सूचक’ ग्रह कहा गया है। परंतु सूचक का अर्थ यह नहीं की शनि ग्रह का समय केवल दुःख और पीडा ही लेकर आता है। शनि का समय केवल दुःख और पीडा के समय की सूचना मात्र देता है। दुःख और पीडा तो मनुष्य अपने पाप कर्मों के कारण प्राप्त करता है। यह ग्रह मनुष्य के द्वारा किये गये उसके अपने ही पाप कर्मों की सजा देता है।

शास्त्रों में पाप कर्म इस प्रकार वर्णित हैं- कर्मेन्द्रियों (नेत्रों, कर्णों, जिव्हा, नासिका व जन्नेद्रियों द्वारा, मन-वचन-कर्म के तथा मन) के द्वारा जो कर्म किये जाते हैं, अच्छे, बुरे या मध्यम होते हैं।

अच्छे या पुण्य कर्म वे हैं- जो दूसरों को सुख देने वाले होते हैं।

बुरे या पाप कर्म वे हैं- जो दूसरों को दुःख देने वाले होते हैं।

मध्यम कर्म- जो किसी को न तो दुःख ना ही सुख देते हैं।

इन तीनों श्रेणियों के कर्म भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं, जो मानसिक, शारीरिक तथा आर्थिक रूप से दूसरों को प्रभावित करते हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया के प्राकृतिक सिद्धांत के अनुसार मनुष्य अपने कृत कर्मों से दूसरों को जो भी देता है, वही लौटकर एक दिन उसे मिलता है। “अपना ही बीजा हुआ फल मिलता है” यह ‘कर्म सिद्धांत’ है।

कर्म सिद्धांत के अनुसार अच्छे कर्मों की सूचना शुभ ग्रह राजयोगों के रूप में देते हैं, तथा बुरे कर्मों की सूचना मानसिक, शारीरिक या फिर आर्थिक हानि ‘दुःख और पीडा’ के रूप में पाप ग्रह देते हैं। पाप ग्रहों में सर्वाधिक बलवान ग्रह शनि ग्रह है, इसी लिये यह दुःख और पीडा का सूचक ग्रह कहा गया है। शनि ग्रह यदि कुंडली में अत्यधिक कष्ट की सूचना दे रहा हो तो इसकी शांति के लिए छाया दान बहुत ही कारगर उपाय है।

आज इस लेख के माध्यम से में आपको छाया दान के विषय में बताता हूँ, जिसके द्वारा जातक शनि ग्रह महादशा, अंतर्दशा अथवा साढ़ेसाती में होने वाली भिन्न-भिन्न तरह की परेशानियों से निजात पा सकता है, इस लेख के माध्यम से आप समझ सकते हैं की छाया दान क्या है, और क्यों किया जाना चाहिए :- अक्सर ऐसा होता है कि व्यक्ति का बीता हुआ काल अर्थात भूतकाल अगर दर्दनाक रहा हो या अच्छा न रहा हो तो, वह व्यक्ति के आने वाले भविष्य को भी ख़राब करता है, और भविष्य बिगाड़ देता है।  ऐसे समय में बिता हुआ कल आप का आज भी बिगड़ रहा हो, और बीता हुआ कल अच्छा न हो तो, निश्चित तोर पर कल भी बिगाड़ देगा। इससे बचने के लिये छाया दान करना चाहिए। 
जीवन में जब तरह तरह कि समस्या आप का भूत काल बन गया हो तो, छाया दान से मुक्ति मिलती है, और कष्ट से आराम मिलता है।

 1 . बीते हुए समय में पति पत्नी में भयंकर अनबन रही हो  तो : –

अगर बीते समय में पति पत्नी के सम्बन्ध मधुर न रहा हों और उसके चलते आज वर्त्तमान समय में भी वो परछाई कि तरह आप का पीछा कर रहा हो तो, ऐसे समय में आप छाया दान करें और छाया दान आप बृहस्पत्ति वार के दिन कांसे कि कटोरी में घी भर कर पति पत्नी अपना मुख देख कर कटोरी समेत मंदिर में दान दें, इससे आप कि खटास भरे भूत काल से मुक्ति मिलेगा। और भविष्य काल मधुरतापूर्ण और सुखमय रहेगा।

 2 . बीते हुए समय में हुई हो भयावह दुर्घटना या एक्सीडेंट :

अगर बीते समय में कोई भयंकर दुर्घटना हुई हो, और उस खौफ से आप समय बीतने के बाद भी नहीं उबार पाये हैं। मन में हमेशा एक डर बना रहता है,ओर आप कही भी जाते हैं तो, आप के मन में उस दुर्घटना का भय बना रहता है तो, आप छाया दान करें। आप एक मिटी के बर्तन में सरसों का तेल भर कर शनि वार के दिन अपनी छाया देख कर शनि मंदिर में दान करें। इससे आप को लाभ होगा, बीती हुई दर्दनाक स्मृति से छुटकारा मिलेगा। और भविष्य  सुरक्षित रहेगा।

3 . बीते समय में व्यापर में हुआ घाटा आज भी डरा रहा है आप को :

कई बार ऐसा होता है कि बीते समय में व्यापारिक घाटे या  बहुत बड़े नुकसान  से आप बहुत मुश्किल से उबरे हों, और आज स्थिति ठीक होने के बावजूद भी आप को यह डर सता रहा है कि दुबारा वैसा ही न हो जाये तो, इससे बचने के लिए आप बुधवार के दिन एक पीतल कि कटोरी में घी भर कर उसमे अपनी छाया देख कर छाया पात्र समेत आप किसी ब्राह्मण को दान दें। इससे दुबारा कभी भी आप को व्यापार में घाटा नहीं होगा। और भविष्य में व्यापार भी फलता फूलता रहेगा।

4 . भूत काल कि कोई बड़ी बीमारी आज भी परछाई बन कर डरा रही हो :

बीते समय में कई बार कोई लम्बी बीमारी के कारण व्यक्ति मानसिक तौर पर उससे उबर नहीं पाता है। और ठीक होने के बावजूद भी मानसिक तौर पर अपने भूत काल में ही घिरा रहता है। तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति को शनिवार के दिन एक लोहे के पात्र में तिल का तेल भर कर अपनी मुख छाया देखकर उसका दान शनि मंदिर में करें। इससे आप को इस स्मृति से मुक्ति मिलेगी और भविष्य में बीमार नहीं होंगे, स्वस्थ्य रहेंगे।

5 लम्बे समय के बाद नौकरी मिली है, लेकिन भुतकाल का डर कि फिर बेरोजगार न हो जाये :

बहुत लम्बे समय की बेरोजगारी के बाद नौकरी मिलती है, लेकिन मन में सदेव एक भय सताता है कि दुबार नौकरी न चली जाये, और यह सोच एक प्रेत कि तरह आप का पीछा करती है तो, ऐसे स्थिति में आप सोमवार के दिन तांम्बे की एक कटोरी में शहद भर कर अपनी छाया देख कर ब्राह्मण को दान करना चाहिए, इससे आप को लाभ मिलेगा। इस छाया दान से उन्नति बनी रहती है, रोजगार बना रहता है। 

6 .कुछ ऐसा काम कर चुके हैं जो गोपनीय है, लेकिन उसके पश्चाताप से उबर नहीं पाये हैं : 

कई बार जीवन में ऐसी गलती आदमी कर देता है कि जो किसी को बता नहीं पता लेकिन मन ही मन हर पल घुटता रहता है, और भूत काल में कि गई गलती से उबर नहीं पता है तो, ऐसी स्थिति में व्यक्ति को पीतल कि कटोरी में बादाम के तेल में मुख देख कर शुक्रवार के दिन छाया दान करना चाहिए। इससे पश्चाताप कि अग्नि से मुक्ति मिलती है, और कि हुई गलती के दोष से मुक्ति मिलती है।

7 . पहली शादी टूट गयी, दूसरी शादी करने जा रहे हैं, लेकिन मन में वह भी टूटने का डर  है :

संयोग वश या किसी दुर्घटना वश व्यक्ति कि पहली शादी टूट गयी है, और दूसरी शादी करने जा रहे हैं, और मन में भय है कि जैसे पहले हुआ था वैसे दुबारा न हो जाये तो, इसके लिए व्यक्ति को (स्त्री हो या पुरुष) रविवार के दिन ताँबे के पात्र में घी भरकर उसमे अपना मुख देख कर छाया दान करें। इससे भूत काल में हुई घटना या दुर्घटना का भय नहीं रहेगा। और भविष्य सुखमय रहेगा।