कैसे करें श्राद्ध

Dr.R.B.Dhawan

इस सृष्टि में हर वस्तु अथवा प्राणी का जोड़ा है, जैसे – रात और दिन, अँधेरा और उजाला, सफ़ेद और काला, अमीर और गरीब अथवा नर और नारी इत्यादि बहुत गिनवाये जा सकते हैं । सभी वस्तुएं अपने जोड़े से सार्थक हैं अथवा एक-दूसरे के पूरक है। दोनों एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं । इसी तरह दृश्य और अदृश्य जगत का भी जोड़ा है। दृश्य जगत वो है जो हमें दिखता है, और अदृश्य जगत वो है, जो हमें नहीं दिखता। ये भी एक-दूसरे पर निर्भर है और एक-दूसरे के पूरक हैं। पितृ-लोक भी अदृश्य जगत का हिस्सा है, और अपनी सक्रियता के लिये दृश्य जगत के श्राद्ध पर निर्भर है । 

पौराणिक मान्यताओं और धर्मग्रंथों के अनुसार मृतक श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं, तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा ही चुकाया जा सकता है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।

पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है। इसी दिन से महालय (श्राद्ध पक्ष) का प्रारंभ भी माना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जा सके। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर प्रसन्न रहते हैं। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।

श्राद्ध के दिनों में पितरों को आशा रहती है कि, हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्डदान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य करने के लिए कहा गया है। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि, पितरों को श्रद्धा पूर्वक पिण्डदान pind-daan करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्यादि की प्राप्ति करता है। यही नहीं, पितरों की कृपा से ही उसे सब प्रकार की समृद्धि, सौभाग्य, राज्य तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। आश्विन मास के पितृ पक्ष में पितरों को आशा रहती है कि, हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्डदान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। यही आशा लेकर वे पितृलोक से पृथ्वी लोक पर आते हैं। अतएवं प्रत्येक सनातन सद्गृहस्थ का धर्म है कि वह पितृपक्ष pitra-paksh में अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध एवं तर्पण अवश्य करें, तथा अपनी शक्ति के अनुसार फल-मूल जो भी सम्भव हो, पित्तरों के निमित्त प्रदान करें। यदि इस पक्ष में उन्हें पिण्डदान pind daan या तिलांजलि आदि नहीं मिलती है तो वे शाप देकर जाते हैं। पितृपक्ष पितरों के लिये पर्व का समय है, अतएवं इस पक्ष में श्राद्ध अवश्य किया जाना चाहिये।

श्राद्ध में पंचबली आवश्यक है :- 

इस पक्ष में पितृ की मृत्यु तिथि को जलमिश्रित तिल से तर्पण, ब्राह्मण-भोजन तथा पंचबली आवश्यक हैं। बहुत से सज्जन जल-तिल से तर्पण तथा ब्राह्मण-भोजन तो करवा देते हैं, परंतु पंचबली नहीं करवाते। अतः श्राद्ध shraadh के दिन जल-तिल तथा ब्राह्मण-भोजन के साथ-साथ ‘पंचबली’ अवश्य करना चाहिये, उसका नियम इस प्रकार है :- श्राद्ध shraadh  के निमित्त भोजन तैयार होने पर एक थाली में पाँच जगह थोड़े-थोड़े सभी प्रकार के भोजन परोसकर हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, चन्दन लेकर निम्नलिखित संकल्प करें- अद्यामुक गोत्र अमुक शर्मा (वर्मा/गुप्तो वा) अहममुकगोत्रस्य मम पितुः (मातुः भ्रातुः पितामहस्य वा) वार्षिक श्राद्धे (महालय श्राद्धे) कृतस्य पाकस्य शुद्ध्यर्थं पंचसूनाजनित दोष परिहारार्थं च पंचबलिदानं करिश्ये।

पंचबलि-विधि :- 

(1) गोबलि (पत्ते पर):- मण्डल के बाहर पश्चिम की ओर निम्नलिखित मंत्र पढ़ते हुए सव्य होकर गोबलि पत्ते पर दें (पंचबली का एक भाग गाय को खिलायें) – ॐ सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पुण्यराशयः। प्रतिगृह्वन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः।। इदं गोभ्यो न मम।

(2) श्वानबलि (पत्ते पर):- जनेऊ को कण्ठी कर निम्नलिखित मंत्र से कुत्तों को बलि दें (पंचबली का यह भाग कुत्ते को खिलायें) – द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोöवौ। ताभ्यामन्नं प्रयच्छामि स्यातामेताव हिंसकौ।। इदं श्वभ्यां न मम। 

(3) काकबलि (पृथ्वी पर):- अपसव्य होकर निम्नलिखित मंत्र पढ़कर कौओं को भूमि पर अन्न दें (पंचबली का यह भाग कौओं के लिये छत पर रख दें)- ॐ ऐन्द्रवारूणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा। वायसाः प्रतिगृह्वन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम्।। इदमन्नं वायसेभ्यो न मम।

(4) देवादिबलि (पत्ते पर):- सव्य होकर निम्नलिखित मंत्र पढ़कर देवता आदि के लिय अन्न दें (पंचबली का यह भाग अग्नि के सपुर्द कर दें) – ॐ देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसंघाः। प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम्।। इदमन्नं देवादिभ्यो न मम।

(5) पिपीलिकादिबलि (पत्ते पर):- इसी प्रकार निम्नांकित मंत्र से चींटी आदि को बलि दें (पंचबली का यह भाग चींटीयों के लिये चींटियों के बिल के पास रख दें)- पिलीलिकाः कीटपतंगकाद्या बुभुक्षिताः कर्मनिबन्धबद्धाः। तेषां हि तृप्त्यर्थमिदं मयान्नं तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु।। इदमन्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम।

पंचबलि देने के बाद एक थाली में सभी रसोई परोसकर अपसव्य और दक्षिणाभिमुख होकर निम्न संकल्प करें- उपर्युक्त संकल्प करने के बाद ‘ॐ इदमन्नम्,’ ‘इमा आपः’, ‘इदमाज्यम्’, ‘इदं हविः’ इस प्रकार बोलते हुये अन्न, जल, घी तथा पुनः अन्न को दाहिने हाथ के अँगूठे से स्पर्श करें। पश्चात् दाहिने हाथ में जल, अक्षत आदि लेकर निम्न संकल्प करें- ब्राह्मण-भोजन का संकल्प – अद्यामुक गोत्र अमुकोऽहं मम पितुः (मातुः वा) वार्षिक श्राद्धे यथासंख्याकान् ब्राह्मणान् भोजयिष्ये। पंचबलि निकालकर कौआ के निमित्त निकाला गया अन्न कौआ को, कुत्ता का अन्न कुत्ता को और सब गाय को देने के बाद निम्नलिखित मंत्र से ब्राह्मणों के पैर धोकर भोजन करायें।

यत् फलं कपिलादाने कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे। तत्फलं पाण्डवश्रेष्ठ विप्राणां पादसेचने।।

इसे बाद उन्हें अन्न, वस्त्र और द्रव्य-दक्षिणा देकर तिलक करके नमस्कार करें। तत्पश्चात् नीचे लिखे वाक्य यजमान और ब्राह्मण दोनों बोलें यजमान – शेषान्नेन किं कर्तव्यम्। (श्राद्ध में बचे अन्न का क्या करूँ?) ब्राह्मण – इष्टैः सह भोक्तव्यम्। (अपने इष्ट-मित्रों के साथ भोजन करें।) इसके बाद अपने परिवार वालों के साथ स्वयं भी भोजन करें तथा निम्न मंत्र द्वारा भगवान् को नमस्कार करें – प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः।

श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है, क्योंकि कई बार विधि पूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं :-

1- श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।

2- श्राद्ध में चांदी के बर्तन का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।

3- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए गए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।

4- ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए, क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं, जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।

5- जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए। पिंडदान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।

6- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं। ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।

7- श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटर सरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।

8- दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है। अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।

9- चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।

10- जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहनी वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।

11- श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।

12- शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग)में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए। धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है। अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।

13- श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं। श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।

14- रात्रि को राक्षसी समय माना गया है। अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए। दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।

15- श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं- गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल। केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है। सोना, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं। इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।

16- तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं। तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।

17- रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं। आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।

18- चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।

19- भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-

1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ।

20- श्राद्ध के प्रमुख अंग :-

तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।

भोजन व पिण्ड दान:- पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।

वस्त्रदान– वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।

दक्षिणा दान-– यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।

21 – श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें। श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।

22- पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।

23- तैयार भोजन में से गाय, कुत्ता कौआ, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें। इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।

24- कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं। पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।

25- ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं। ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।

26- पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए । एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करें या सबसे छोटा। 

भारतीय शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि, पितृगण पितृपक्ष में पृथ्वी पर आते हैं, और 15 दिनों तक पृथ्वी पर रहने के बाद अपने लोक लौट जाते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि, पितृपक्ष के दौरान पितृ अपने परिजनों के आस-पास रहते हैं, इसलिए इन दिनों कोई भी ऐसा काम नहीं करें, जिससे पितृगण नाराज हों। पितरों को खुश रखने के लिए पितृ पक्ष में कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। 

पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मण, जामाता, भांजा, गुरु या नाती को भोजन कराना चाहिए। इससे पितृगण अत्यंत प्रसन्न होते हैं। ब्राह्मणों को भोजन करवाते समय भोजन का पात्र दोनों हाथों से पकड़कर लाना चाहिए, अन्यथा भोजन का अंश राक्षस ग्रहण कर लेते हैं, जिससे ब्राह्मणों द्वारा अन्न ग्रहण करने के बावजूद पितृगण भोजन का अंश ग्रहण नहीं करते हैं। पितृ पक्ष में द्वार पर आने वाले किसी भी जीव-जंतु को मारना नहीं चाहिए बल्कि उनके योग्य भोजन का प्रबंध करना चाहिए। हर दिन भोजन बनने के बाद एक हिस्सा निकालकर गाय, कुत्ता, कौआ अथवा बिल्ली को देना चाहिए। मान्यता है कि इन्हें दिया गया भोजन सीधे पितरों को प्राप्त हो जाता है। शाम के समय घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर पितृगणों का ध्यान करना चाहिए। 

सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार जिस तिथि को जिसके पूर्वज गमन करते हैं, उसी तिथि को उनका श्राद्ध करना चाहिए। इस पक्ष में जो लोग अपने पितरों को जल देते हैं, तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं, उनके समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं। जिन लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए पितृ पक्ष में कुछ विशेष तिथियां भी निर्धारित की गई हैं, जिस दिन वे पितरों के निमित्त श्राद्ध कर सकते हैं। 

आश्विन कृष्ण प्रतिपदा: इस तिथि को नाना-नानी के श्राद्ध के लिए सही बताया गया है। इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि याद न हो, तो आप इस दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं। 

पंचमी: जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाना चाहिए। 

नवमी: सौभाग्यवती यानि पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गई हो, उन स्त्रियों का श्राद्ध नवमी को किया जाता है। यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है। इसलिए इसे मातृनवमी भी कहते हैं। मान्यता है कि, इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है। 

एकादशी और द्वादशी: एकादशी में वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध करते हैं। अर्थात् इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है, जिन्होंने संन्यास लिया हो। 

चतुर्दशी: इस तिथि में शस्त्र, आत्म-हत्या, विष और दुर्घटना यानि जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध किया जाता है, जबकि बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को करने के लिए कहा गया है। 

सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या: किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं, या पितरों की तिथि याद नहीं है, तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्र अनुसार, इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है। यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो, उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिए। बाकी तो जिनकी जो तिथि हो, श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए, यही उचित भी है।

पिंडदान करने के लिए:  सफेद या पीले वस्त्र ही धारण करें। जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं, वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं।

विशेष: श्राद्ध कर्म करने वालों को निम्न मंत्र तीन बार अवश्य पढ़ना चाहिए। यह मंत्र ब्रह्मा जी द्वारा रचित आयु, आरोग्य, धन, लक्ष्मी प्रदान करने वाला अमृतमंत्र है- 

देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिश्च एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत ।।            (वायु पुराण)

श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें। प्रातः एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। हमारे धर्म-ग्रंथों में पितरों को देवताओं के समान संज्ञा दी गई है। सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ के अनुसार चंद्रमा की ऊधर्व कक्षा में पितृलोक है, जहां पितृ रहते हैं। पितृ लोक को मनुष्य लोक से आंखों द्वारा नहीं देखा जा सकता। जीवात्मा जब इस स्थूल देह से पृथक होती है, उस स्थिति को मृत्यु कहते हैं। यह भौतिक शरीर 27 तत्वों के संधान से बना है। स्थूल पंच महाभूतों एवं स्थूल कर्मेन्द्रियों को छोड़ने पर अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी 17 तत्वों से बना हुआ सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है। 

सनातन मान्यताओं के अनुसार एक वर्ष तक प्रायः सूक्ष्म जीव को नया शरीर नहीं मिलता। मोहवश वह सूक्ष्म जीव स्वजनों व घर के आसपास भ्रमण करता रहता है। श्राद्ध कार्य के अनुष्ठान से सूक्ष्म जीव को तृप्ति मिलती है, इसीलिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। अगर किसी के कुंडली में पितृदोष है, और वह इस श्राद्ध पक्ष में अपनी कुंडली के अनुसार उचित निवारण करते हैं तो, जीवन की बहुत सी समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं। योग्य ब्राह्मण द्वारा ही श्राद्ध कर्म पूर्ण करवाये जाने चाहिएं।

ऐसा कुछ भी नहीं है कि, इस अनुष्ठान में ब्राह्मणों को जो भोजन खिलाया जाता है, वही पदार्थ ज्यों का त्यों उसी आकार, वजन और परिमाण में मृतक पितरों को मिलता है। वास्तव में श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध में दिए गए भोजन का सूक्ष्म अंश परिणत होकर, उसी अनुपात व मात्रा में प्राणी को मिलता है, जिस योनि में वह प्राणी इस समय है।

पितृ लोक में गया हुआ प्राणी श्राद्ध में दिए हुए अन्न का स्वधा रूप में परिणत भाग को प्राप्त करता है। यदि शुभ कर्म के कारण मर कर पिता देवता बन गया हो तो, श्राद्ध में दिया हुआ अन्न उसे अमृत में परिणत होकर देवयोनि में प्राप्त होगा। गंधर्व बन गया हो तो, वह अन्न अनेक भोगों के रूप में प्राप्त होता है। पशु बन जाने पर घास के रूप में परिवर्तित होकर उसे तृप्त करता है। यदि नाग योनि में है तो, श्राद्ध का अन्न वायु के रूप में तृप्ति देता है। दानव, प्रेत व यक्ष योनि मिलने पर श्राद्ध का अन्न नाना प्रकार के अन्न पान और भोग्य रसादि के रूप में परिणत होकर प्राणी को तृप्त करता है। अगर किसी की जन्मकुंडली में पितृदोष है तो, जन्म कुंडली के अनुसार उचित उपाय करें। 

सरल तर्पण विधि :–

श्रीगुरुभ्यो नमः श्री गुरुचरणेभ्यो ॥ श्री गणेशाय नमः ॥ 

शौच एवं स्नान के बाद शुद्ध वस्त्र पहन कर, एक जोड़ा शुद्ध यज्ञोपवीत धारण किये हुए हो। बायें कंधे पर एक गमछा लिए हो, उत्तर या पूर्वोत्तर दिशा की ओर मुख कर के आसन पर बैठ कर मार्जन करें, मार्जन के विनियोग का मन्त्र पढ़कर जल छोड़े (विनियोग का जल छोटी-चम्मच से छोड़े जिसे आचमनी कहते हैं। 

ॐ अपवित्रः पवित्रो वेत्यस्य वामदेव ऋषिः, विष्णुर्देवता,गायत्रीच्छन्दः, हृदि पवित्रकरणे विनियोगः।

मार्जन का मन्त्र पढ़कर अपने शरीर एवं सामग्री पर जल छिड़के (तीन कुश या तीन अँगुलियों से) –

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।

यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

आसन पवित्र करने के मंत्र का विनियोग पढ़कर जल गिराए –

ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतलं छन्दः, कूर्मो देवता, आसन पवित्रकरणे विनियोगः।

अब आसन पर जल छिड़क कर दायें हाथ से उसका स्पर्श करते हुए आसन पवित्र करने का मंत्र पढ़े –

ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका देवि! त्वं विष्णुना धृता।

त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु चासनम्॥

अब अपनी सम्प्रदाय की मर्यादा के अनुसार तिलक करें, अन्यथा  त्रायुषं जमदग्नेः कह कर ललाट में तिलक करें (कश्यपस्य त्र्यायुषम्इ) इस मंत्र से गले में, यद्देवेषु त्र्यायुषम् इस मंत्र से दोनों भुजाओं के मूल में और तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम् इस मंत्र से हृदय में भस्म लगाए)।

आचमन :–

ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः – इन तीनों मंत्रो को पढ़कर प्रत्येक मंत्र से एक बार, कुल तीन बार जल से आचमन करें। ॐ गोविन्दाय नमः बोलते हुए हाथ धो लें।

ॐ हृषीकेशाय नमः बोल कर दायें हाथ के अँगूठे से मूल भाग से दो बार ओठ पोंछ ले। तत्पश्चात् भीगी हुई अंगुलियों से मुख आदि का स्पर्श करें। मध्यमा-अनामिका से मुख, तर्जनी-अंगुष्ठ से नासिका, मध्यमा-अंगुष्ठ से नेत्र, अनामिका-अंगुष्ठ से कान, कनिष्ठका-अंगुष्ठ से नाभि, दाहिने हाथ से हृदय, पाँचों अंगुलियों से सिर, पाँचों अंगुलियों से दाहिनी बाँह और बायीं बाँह का स्पर्श करें।

तर्पण विधि :- 

(देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणविधि) प्रातःकाल संध्योपासना करने के पश्चात् बायें और दायें हाथ की अनामिका अङ्गुलि में पवित्र धारण करें।

ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्।। इस मन्त्र को पढते हुए पवित्री (पैंती) धारण करें । 

फिर हाथ में त्रिकुश, यव, अक्षत और जल लेकर निम्नाङ्कित रूप से संकल्प पढें :-  विष्णवे नम: ३। हरि: ॐ तत्सदद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्न: अमुकशर्मा (वर्मा, गुप्त:) अहं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं देवर्पिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये । 

तीन कुश ग्रहण कर निम्न मंत्र को तीन बार कहें- 

ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।

नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमोनमः।

तदनन्तर एक ताँवे अथवा चाँदी के पात्र में श्वेत चन्दन, जौ, तिल, चावल, सुगन्धित पुष्प और तुलसीदल रखें, फिर उस पात्र के ऊपर एक हाथ या प्रादेशमात्र लम्बे तीन कुश रखें, जिनका अग्रभाग पूर्व की ओर रहे । इसके बाद उस पात्र में तर्पण के लिये जल भर दें । फिर उसमें रखे हुए तीनों कुशों को तुलसी सहित सम्पुटाकार दायें हाथ में लेकर बायें हाथ से उसे ढँक लें और निम्नाङ्कित मन्त्र पढते हुए देवताओं का आवाहन करें:- ॐ विश्वेदेवास ऽआगत श्रृणुता म ऽइम, हवम् । एदं वर्हिनिषीदत ॥   (शु० यजु० ७।३४) 

‘हे विश्वेदेवगण ! आप लोग यहाँ पदार्पण करें, हमारे प्रेमपूर्वक किये हुए इस आवाहन को सुनें और इस कुश के आसन पर विराजमान हों ।

विश्वेदेवा: श्रृणुतेम, हवं मे ये ऽअन्तरिक्षे य ऽउप द्यवि ष्ठ ।येऽअग्निजिह्वाऽउत वा यजत्राऽआसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयद्ध्वम् ॥

(शु० यजु० ३३।५३)

‘हे विश्वेदेवगण ! आपलोगोंमें से जो अन्तरिक्ष में हों, जो द्य्लोक (स्वर्ग) के समीप हों तथा अग्नि के समान जिह्वावाले एवं यजन करने योग्य हों, वे सब हमारे इस आवाहन को सुनें और इस कुशासन पर बैठकर तृप्त हों ।

आगच्छन्तु महाभागा ब्रह्माण्डोदर वर्तिनः । 

ये यत्र  विहितास्तत्र सावधाना भवन्तु ते ॥ 

इस प्रकार आवाहन कर कुश का आसन दें और उन पूर्वाग्र कुशों द्वारा दायें हाथ की समस्त अङ्गुलियों के अग्रभाग अर्थात् देवतीर्थ से ब्रह्मादि देवताओं के लिये पूर्वोक्त पात्र में से एक-एक अञ्जलि तिल चावल-मिश्रित जल लेकर दूसरे पात्र में गिरावें और निम्नाङ्कित रूप से उन-उन देवताओं के नाम मन्त्र पढते रहें :-

देवतर्पण :-

ॐ ब्रह्मा तृप्यताम् । ॐ विष्णुस्तृप्यताम् । ॐ रुद्रस्तृप्यताम् । ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम् । ॐ देवास्तृप्यन्ताम् । ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम् । ॐ वेदास्तृप्यन्ताम् । ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम् । ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम् । ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम् । ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम् । ॐ संवत्सररू सावयवस्तृप्यताम् । ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम् । ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम् । ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम् । ॐ नागास्तृप्यन्ताम् । ॐ सागरास्तृप्यन्ताम् । ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम् । ॐ सरितस्तृप्यन्ताम् । ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम् । ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम् । ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम् । ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम् । ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम् । ॐ भूतानि तृप्यन्ताम् । ॐ पशवस्तृप्यन्ताम् । ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम् । ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम् । ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम् ।

ऋषितर्पण :- इसी प्रकार निम्नाङ्कित मन्त्रवाक्यों से मरीचि आदि ऋषियों को भी एव्क-एक अञ्जलि जल दें :-

ॐ मरीचिस्तृप्यताम् । ॐ अत्रिस्तृप्यताम् । ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम् । ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम् । ॐ पुलहस्तृप्यताम् । ॐ क्रतुस्तृप्यताम् । ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम् । ॐ प्रचेतास्तृप्यताम् । ॐ भृगुस्तृप्यताम् । ॐ नारदस्तृप्यताम् ॥ 

दिव्यमनुष्यतर्पण :-

इसके बाद जनेऊ को माला की भाँति गले में धारण कर अर्थात्  पूर्वोक्त कुशों को दायें हाथ की कनिष्ठिका के मूल-भाग में उत्तराग्र रखकर स्वयं उत्तराभिमुख हो निम्नाङ्कित मन्त्रों को दो-दो बार पढते हुए दिव्य मनुष्यों के लिये प्रत्येक को दो-दो अञ्जलि यवसहित जल प्राजापत्यतीर्थ कनिष्ठिका के मूला-भाग) से अर्पण करें :-    

ॐ सनकस्तृप्यताम् ॥2॥ ॐ सनन्दनस्तृप्यताम् ॥2॥ 

ॐ सनातनस्तृप्यताम् ॥2॥ ॐ कपिलस्तृप्यताम् ॥2॥

ॐ आसुरिस्तृप्यताम् ॥2॥ ॐ वोढुस्तृप्यताम् ॥2॥ 

ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम् ॥2॥ 

दिव्यपितृतर्पण :-

तत्पश्चात उन कुशों को द्विगुण भुग्न करके उनका मूल और अग्रभाग दक्षिण की ओर किये हुए ही उन्हें अंगूठे और तर्जनी के बीच में रखे और स्वयं दक्षिणाभिमुख हो बायें घुटने को पृथ्वी पर रखकर अपसव्यभाव से जनेऊ को दायें कंधेपर रखकर पूर्वोक्त पात्रस्थ जल में काला तिल मिलाकर पितृतीर्थ से अंगुठा और तर्जनी के मध्यभाग से दिव्य पितरों के लिये निम्नाङ्कित मन्त्र-वाक्यों को पढते हुए तीन-तीन अञ्जलि जल दें :-  कव्यवाडनलस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: ॥3॥  

सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: ॥3॥

ॐ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: ॥3॥ 

ॐ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: ॥3॥

ॐ अग्निष्वात्ता: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम: ॥3॥ 

ॐ सोमपा: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम:॥३॥ 

ॐ बर्हिषद: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम: ॥३॥ 

यमतर्पण  :-

इसी प्रकार निम्नलिखित मन्त्र-वाक्यों को पढते हुए चैदह यमों के लिये भी पितृतीर्थ से ही तीन-तीन अञ्जलि तिल सहित जल दें :-

ॐ यमाय नम: ॥3॥ ॐ धर्मराजाय नम: ॥3॥

ॐ मृत्यवे नम: ॥3॥ ॐ अन्तकाय नम: ॥3॥ 

ॐ वैवस्वताय नमः ॥3॥ ॐ कालाय नम: ॥3॥ 

ॐ सर्वभूतक्षयाय नम: ॥3॥ ॐ औदुम्बराय नम: ॥3॥ 

ॐ दध्नाय नम: ॥3॥ ॐ नीलाय नम:॥3॥ 

ॐ परमेष्ठिने नम:॥3॥ ॐ वृकोदराय नम:॥3॥ ॐ चित्राय नम:॥3॥ ॐ चित्रगुप्ताय नम: ॥3॥ 

ततः निम्नाङ्कित मन्त्र से पितरों का आवाहन करें:-

ॐ उशन्तस्त्वा निधीमह्युशन्त: समिधीमहि ।

उशन्नुशत ऽआवह पितृन्हाविषे ऽअत्तवे ॥(शु० यजु० १६।७०) 

‘हे अग्ने ! तुम्हारे यजन की कामना करते हुए हम तुम्हें स्थापित करते हैं । यजन की ही इच्छा रखते हुए तुम्हें प्रज्वलित करते हैं । हविष्य की इच्छा रखते हुए तुम भी तृप्ति की कामनावाले हमारे पितरों को हविष्य भोजन करने के लिये बुलाओ ।

ॐ आयन्तु न: पितर: सोम्यासोऽग्निष्वात्ता: पथिभिर्देवयानै: । अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिव्रुवन्तु तेऽवन्तस्मान् ॥ (शु० यजु० १६।५८) 

हमारे सोमपान करने योग्य अग्निष्वात्त पितृगण देवताओं के साथ गमन करने योग्य मार्गों से यहाँ आवें और इस यज्ञ में स्वाधा से तृप्त होकर हमें मानसिक उपदेश दें तथा वे हमारी रक्षा करें ।

तदनन्तर अपने पितृगणों का नाम-गोत्र आदि उच्चारण करते हुए प्रत्येक के लिये पूर्वोक्त विधि से ही तीन-तीन अञ्जलि तिल-सहित जल इस प्रकार दें :-

अस्मत्पिता (बाप) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यतांम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्पितामह: (दादा) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्प्रपितामह: (परदादा) अमुकशर्मा अमुकसगोत्र आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥३॥

अस्मन्माता अमुकी देवा दा अमुकसगोत्रा वसुरूषा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्पितामही (दादी) अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्प्रपितामही परदादी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जल तस्यै स्वधा नम: ॥३॥

अस्मत्सापत्नमाता सौतेली मा अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥२॥

 इसके बाद निम्नाङ्कित नौ मन्त्रों को पढते हुए पितृतीर्थ से जल गिराता रहे –

ॐ उदीरतामवर ऽउत्परास ऽउन्मध्यमा: पितर: सोम्यास: । असुं य ऽईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥ ( शु० य० १६।४६)

इस लोक में स्थित, परलोक में स्थित और मध्यलोक में स्थित सोमभागी पितृगण क्रम से ऊर्ध्वलोकों को प्राप्त हों । जो वायुरूपको प्राप्त हो चुके हैं, वे शत्रुहीन सत्यवेत्ता पितर आवाहन करनेपर यहाँ उपस्थित हो हमलोगों की रक्षा करें ।

ॐ अङ्गिरसो न: पितरो नवग्वा ऽअथर्वाणो भृगव: सोम्यास: । तेषां वय, सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम । (शु० य० १६।७०) 

अङ्गिरा के कुल में, अथर्व मुनि के वंश में तथा भृगुकुल में उत्पन्न हुए नवीन गतिवाले एवं सोमपान करने योग्य जो हमारे पितर इस समय पितृलोक को प्राप्त हैं, उन यज्ञ में पूजनीय पितरों की सुन्दर बुद्धि में तथा उनके कल्याणकारी मन में हम स्थित रहें । अर्थात् उनकी मन-बुद्धि में हमारे कल्याण की भावना बनी रहे ।

ॐ आयन्तु न: पितर: सोम्यासोऽग्निष्वात्ता:पथिभिर्देवयानै: । अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥ (शु० य० १६।५८) इस मन्त्र का अर्थ पहले (पृष्ठ ३२में) आ चुका है ।

ॐ ऊर्ज्जं वहन्तीरमृतं घृतं पय: कीलालं परिस्त्रुतम् । स्वधास्थ तर्पयत मे पितृन् ॥ (शु० य०।३४)

 हे जल ! तुम स्वादिष्ट अन्न के सारभूत रस, रोग-मृत्यु को दूर करनेवाले घी और सब प्रकार का कष्ट मिटानेवाले दुग्ध का वहन करते हो तथा सब ओर प्रवाहित होते हो, अतएव तुम पितरों के लिये हविःस्वरूप होय इसलिये मेरे पितरों को तृप्त करो ।’ 

ॐ पितृभ्य:स्वधायिभ्य: स्वधा नम: पितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधा नम: प्रपितामहेभ्य: स्वधायिभ्यं: स्वधा नम: । अक्षन्पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृप्यन्त पितर: पितर:शुन्धध्वम् ॥ (शु० य० १६।३६)

स्वधा (अन्न) के प्रति गमन करनेवाले पितरों को स्वधासंज्ञक अन्न प्राप्त हो, उन पितरों को हमारा नमस्कार है । स्वधा के प्रति जानेवाले पितामहों को स्वधा प्राप्त हो, उन्हें हमारा नमस्कार है । स्वधा के प्रति गमन करनेवाले प्रपितामहों को स्वधा प्राप्त हो, उन्हें हमारा नमस्कार है । पितर पूर्ण आहार कर चुके, पितर आनन्दित हुए, पितर तृप्त हुए हे पितरो ! अब आपलोग आचमन आदि करके शुद्ध हों ।

ॐ ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्य याँ  २॥ ऽउ च न प्रविद्द्म । त्वं वेत्थ यति ते जातवेदरू स्वधाभिर्यज्ञ, सुकृतं जुपस्व ॥ (शु० य० १६।६७) 

जो पितर इस लोक में वर्तमान हैं और जो इस लोक में नही किन्तु पितृलोक में विद्यमान हैं तथा जिन पितरों को हम जानते हैं और जिनको स्मरण न होने के कारण नही जानते हैं, वे सभी पितर जितने हैं, उन सबको हे जातवेदा-अग्निदेव ! तुम जानते हो । पितरों के निमित्त दी जानेवाली स्वधा के द्वारा तुम इस श्रेष्ठ यज्ञ का सेवन करो-इसे सफल बनाओ ।

ॐ मधु व्वाता ऽऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धव: । माध्वीन: सन्त्वोषधी: ॥ (शु० य० १३।२७) 

यज्ञ की इच्छा करनेवाले यजमान के लिये वायु मधु पुष्परस-मकरन्द की वर्षा करती है । बहनेवाली नदियाँ मधु के समान मधुर जल का स्नोत बहाती हैं । समस्त ओषधियाँ हमारे लिये मधु-रस से युक्त हों ।’ 

ॐ मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव , रज: ।मधु द्यौरस्तु न पिता ॥ (शु० य० १३।२८) 

हमारे रात-दिन सभी मधुमय हों । पिता के समान पालन करनेवाला द्युलोक हमारे लिये मधुमय-अमृतमय हो । माता के समान पोषण करनेवाली पृथिवी की धूलि हमारे लिये मधुमयी हो

ॐ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँऽ२ ॥ अस्तु सूर्यः ।माध्वीर्गावो भवन्तु न: ॥ (शु० य० १३।२६) 

ॐ मधु । मधु । मधु । तृप्यध्वम् । तृप्यध्वम् । तृप्यध्वम् ।

वनस्पति और सूर्य भी हमारे लिये मधुमान् मधुर रस से युक्त हों । हमारी समस्त गौएँ माध्वी-मधु के समान दूध देनेवाली हों ।’ 

फिर नीचे लिखे मन्त्र का पाठमात्र करे– 

ॐ नमो व: पितरो रसाय नमो व: पितर: शोषाय नमो व: पितरो जीवाय नमो वर: पितर: स्वधायै नमो व: पितरो घोराय नमो व: पितरो मन्यवे नमो वर: पितर: पितरो नमो वो गृहान्न:पितरो दत्त सतो व: पितरो देष्मैतद्व: पितरो व्वास ऽआधत्त ॥ (शु० य० २।३२) 

‘हे पितृगण । तुमसे सम्बन्ध रखनेवाली रसस्वरूप वसन्त-ऋतु को नमस्कार है, शोषण करनेवली ग्रीष्म-ऋतु को नमस्कार है, जीवन-स्वरूप वर्षा-ऋतु को नमस्कार है, स्वधारूप शरद-ऋतु को नमस्कार है, प्राणियों के लिये घोर प्रतीत होनेवाली हेमन्त-ऋतु को नमस्कार है, क्रोधस्वरूप शिशिर-ऋतु को नमस्कार है । अर्थात् तुमसे सम्बन्ध रखनेवाली सभी ऋतुएँ तुम्हारी कृपा से सर्वथा अनुकूल होकर सबको लाभ पहुँचानेवाली हों । हे षडऋतुरूप पितरो ! तुम हमें साध्वी पत्नी और सत्पुत्र आदि से युक्त उत्तम गृह प्रदान करो । हे पितृगण ! इन प्रस्तुत दातव्य वस्तुओं को हम तुम्हें अर्पण करते हैं, तुम्हारे लिये यह सूत्ररूप वस्त्र है, इसे धारण करो ।’ द्वितीयगोत्रतर्पण इसके बाद द्वितीय गोत्र मातामह आदि का तर्पण करे, यहाँ भी पहले की ही भाँति निम्नलिखित वाक्यों को तीन-तीन बार पढकर तिलसहित जल की तीन-तीन अञ्जलियाँ पितृतीर्थ से दे ।

अस्मन्मातामह: नाना अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं गङ्गाजलं वा तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्प्रमातामह: परनाना अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मद्वृद्धप्रमातामह: बूढे परनाना अमुकशर्मा अमुकसगोत्र आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥३॥ 

अस्मन्मातामही नानी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्प्रमातामही परनानी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥३॥ 

अस्मद्वृद्धप्रमातामही बूढी परनानी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥३॥ 

पत्न्यादितर्पण अस्मत्पत्नी भार्या अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥१॥ 

अस्मत्सुतरू बेटा अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्कन्या बेटी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥१॥ 

अस्मत्पितृव्य: पिता के भाई अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥

अस्मन्मातुल: मामा अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मद्भ्राता अपना भाई अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्सापत्नभ्राता सौतेला भाई अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥३॥ 

अस्मत्पितृभगिनी बूआ अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥१॥ 

अस्मन्मातृभगिनी मौसी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥१॥ 

अस्मदात्मभगिनी अपनी बहिन अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥१॥ 

अस्मत्सापत्नभगिनी सौतेली बहिन अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥१॥

अस्मच्छवशुर: श्वशुर अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥

अस्मद्गुरु: अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मदाचार्यपत्नी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: ॥२॥ 

अस्मच्छिष्य: अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

अस्मत्सखा अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥

अस्मदाप्तपुरुष: अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम: ॥३॥ 

इसके बाद सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो नीचे लिखे श्लोकों को पढते हुए जल गिरावे—  

देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसा: । 

पिशाचा गुह्यका: सिद्धा: कूष्माण्डास्तरव: खगा: ॥ 

जलेचरा भूमिचराः वाय्वाधाराश्च जन्तव: । 

प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला: ॥

 नरकेषु समस्तेपु यातनासु च ये स्थिता: ।

 तेषामाप्ययनायैतद्दीयते सलिलं मया ॥

 येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा: ।

 ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङ्क्षिण: ॥ 

देवता, असुर , यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्मक, सिद्ध, कूष्माण्ड, वृक्षवर्ग, पक्षी, जलचर जीव और वायु के आधार पर रहनेवाले जन्तु-ये सभी मेरे दिये हुए जल से भीघ्र तृप्त हों । जो समस्त नरकों तथा वहाँ की यातनाओं में पङेपडे दुरूख भोग रहे हैं, उनको पुष्ट तथा शान्त करने की इच्छा से मैं यह जल देता हूँ । जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में बान्धव रहे हों, अथवा किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सब तथा इनके अतिरिक्त भी जो मुम्कसे जल पाने की इच्छा रखते हों, वे भी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हों ।’

ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवषिंपितृमानवा: । 

तृप्यन्तु पितर: सर्वे मातृमातामहादय: ॥

अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम् ।

आ ब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम् ॥ 

येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा: ।

ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा ॥ 

ब्रह्माजो  से लोकर कीटों तक जितने जीव हैं, वे तथा देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और माता, नाना आदि पितृगण-ये सभी तृप्त हों मेरे कुल की बीती हुई करोडों पीढियों में उत्पन्न हुए जो-जो पितर ब्रह्मलोकपर्यम्त सात द्रीपो के भीतर कहीं भी निवास करते हों, उनकी तृप्ति के लिये मेरा दिया हुआ यह तिलमिश्रित जल उन्हें प्राप्त हो जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में या किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सभी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हो जायँ वस्त्र-निष्पीडन तत्पश्चात् वस्त्र को चार आवृत्ति लपेटकर जल में डुबावे और बाहर ले आकर निम्नाङ्कित मन्त्र को पढते हुए अपसव्य-होकर अपने बाएँ भाग में भूमिपर उस वस्त्र को निचोड़े । 

पवित्रक को तर्पण किये हुए जल मे छोड दे । यदि घर में किसी मृत पुरुष का वार्षिक श्राद्ध आदि कर्म हो तो वस्त्र-निष्पीडन नहीं करना चाहिये । 

वस्त्र-निष्पीडन का मन्त्र यह है :-

ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः ।

ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम् ॥ 

भीष्मतर्पण :-

 इसके बाद दक्षिणाभिमुख हो पितृतर्पण के समान ही अनेऊ अपसव्य करके हाथ में कुश धारण किये हुए ही बालब्रह्मचारी भक्तप्रवर भीष्म के लिये पितृतीर्थ से तिलमिश्रित जल अके द्वारा तर्पण करे । .   

उनके लिये तर्पण का मन्त्र निम्नाङ्कित श्लोक है:-

 वैयाघ्रपदगोत्राय साङ्कृतिप्रवराय च । 

गङ्गापुत्राय भीष्माय प्रदास्येऽहं तिलोदकम् । 

अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्मवर्मणे ॥

अर्घ्य दान फिर शुद्ध जल से आचमन करके प्राणायाम करे ।

 तदनन्तर यज्ञोपवीत सव्य कर बाएँ कंधेपर करके एक पात्र में शुद्ध जल भरकर उसके मध्यभाग में अनामिका से षडदल कमल बनावे और उसमें श्वेत चन्दन, अक्षत, पुष्प तथा तुलसीदल छोड दे । फिर दूसरे पात्र में चन्दल से षडदल-कमल बनाकर उसमें पूर्वादि दिशा के क्रम से ब्रह्मादि देवताओं का आवाहन-पूजन करे तथा पहले पात्र के जल से उन पूजित देवताओं के लिये अर्ध्य अर्पण करे । 

 अर्ध्यदान के मन्त्र निम्नाङ्कित हैं :-

ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमत: सुरुचो व्वेन ऽआव: । स बुध्न्या ऽउपमा ऽअस्य व्विष्ठा: सतश्च योनिमसतश्व व्विव: ॥ (शु० य० १३।३) ॐ ब्रह्मणे नम:। ब्रह्माणं पूजयामि ॥ 

‘सर्वप्रथम पूर्व दिशा से प्रकट होनेवाले आदित्यरूप ब्रह्मने भूगोल के मध्यभाग से आरम्भ करके इन समस्त सुन्दर कान्तिबाले लोकों को अपने प्रकाश से व्यक्त किय है तथा वह अत्यन्त कमनीय आदित्य इस जगत् कि निवासस्थानभूत अवकाशयुक्त दिशाओं को, विद्यमान-मूर्त्तपदार्थ के स्थानों को और अमूर्त्त वायु आदि के उत्पत्ति स्थानों को भी प्रकाशित करता है ।

ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्यपा, सुरे स्वाहा ॥ 

ॐ विष्णवे नम: । विष्णुं पूजयामि ॥ 

सर्वव्यापी त्रिविक्रम वामन अवतारधारी भगवान् विष्णुने इस चराचर जगत् को विभक्त करके अपने चरणों से आक्राम्त किया है । उन्होंने पृथ्वी, आकाश और द्युलोक-इन तीनो स्थानों में अपना चरण स्थापित किया है अथवा उक्त तीनों स्थानों में वे क्रमशरू अग्नि, वायु तथा सूर्यरूप से स्थित हैं ।, इन विष्णु भगवान् के चरण में समस्त विश्व अन्तर्भूत है । इम इनके निमित्त स्वाहा हविष्यदान करते हैं ।

ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽउतो त ऽइषवे नम: । वाहुब्यामुत ते नम: ॥ ॐ रुद्राय नम: । रुद्रं पूजयामि ॥ 

हे रुद्र ! आप के क्रोध और वाण को नमस्कार है तथा आपकी दोनों भुजाओं को नमस्कार हैं ।

ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो न: प्रचोदयात् ॥ ॐ सवित्रे नम: । सवितारं पूजयामि ॥

हस स्थावर-जङ्गमरूप सम्पूर्ण विश्व को उत्पन्न करनेवाले उन निरतिशय प्रकाशमय सूर्यस्वरूप परमेश्वर के भजने योग्य तेज का ध्यान करते हैं, जो कि हमारी बुद्धियों को सत्कर्मों की ओर प्रेरित करते रहते हैं ।

ॐ मित्रस्य चर्षणीधृतोऽवो देवस्य सानसि । द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम् ॥ ॐ मित्राय नम:। मित्रं पूजयामि ॥ 

मनुष्यों का पोषण करनेवाले दीप्तिमान् मित्रदेवता का यह रक्षणकार्य सनातन, यशरूप से प्रसिद्ध, विचित्र तथा श्रवण करने के योग्य है ।

ॐ इमं मे व्वरूण श्रुधी हवमद्या च मृडय ।  त्वामवस्युराचके ॥ ॐ वरुणाय नम: । वरूणं पूजयामि ॥

हे संसार-सागर के अधिपति वरुणदेव ! अपनी रक्षा के लिये मैं आपको बुलाना चाहता हूँ, आप मेरे इल आवाहन को सुनिये और यहाँ शीघ्र पधारकर आज हमें सब प्रकार से सुखी कीजिये ।

फिर भगवान सूर्य को अर्घय दें :-

एहि सूर्य सहस्त्राशों तेजो राशिं जगत्पते।

अनुकम्पय मां भक्त्या गृहणार्घय दिवाकरः। 

हाथों को उपर कर उपस्थापन मंत्र पढ़ें –

चित्रं देवाना मुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरूणस्याग्नेः। 

आप्राद्यावा पृथ्वी अन्तरिक्ष सूर्यआत्माजगतस्तस्थुशश्च। 

फिर परिक्रमा करते हुए दशों दिशाओं को नमस्कार करें :-

ॐ प्राच्यै इन्द्राय नमः। ॐ आग्नयै अग्नयै नमः। ॐ दक्षिणायै यमाय नमः। ॐ नैऋत्यै नैऋतये नमः। ॐ पश्चिमायै वरूणाय नमः। ॐ वाव्ययै वायवे नमः। ॐ उदीच्यै कुवेराय नमः। ॐ ईशान्यै ईशानाय नमः। ॐ ऊधर्वायै ब्रह्मणै नमः। ॐ अवाच्यै अनन्ताय नमः। 

सव्य होकर पुनः देवतीर्थ से तर्पण करें :-

ॐ ब्रह्मणै नमः। ॐ अग्नयै नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ औषधिभ्यो नमः। ॐ वाचे नमः। ॐ वाचस्पतये नमः। ॐ महद्भ्यो नमः। ॐ विष्णवे नमः। ॐ अद्भ्यो  नमः। ॐ अपां  पतये नमः। ॐ वरूणाय नमः। फिर तर्पण के जल को मुख पर लगायें और तीन बार ॐ अच्युताय नमः मंत्र का जप करें।

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आचार्य चाणक्य

Dr.R.B.Dhawan

अधमा धनमिइच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः ।

उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम् ।।१।। 

1. नीच वर्ग के लोग दौलत चाहते है, मध्यम वर्ग के दौलत और इज्जत, लेकिन उच्च वर्ग के लोग सम्मान चाहते है क्यों की सम्मान ही उच्च लोगो की असली दौलत है।
इक्षुरापः पयो मूलं ताम्बूलं फलमौषधम् ।

भक्षयित्वाऽपिकर्तव्याःस्नानदानादिकाःक्रियाः ।।२।।

2. ऊख, जल, दूध, पान, फल और औषधि इन वस्तुओं के भोजन करने पर भी स्नान दान आदि क्रिया कर सकते हैं।

दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते ।

यदन्नं भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा ।।३।।

3. दीपक अँधेरे का भक्षण करता है इसीलिए काला धुआ बनाता है. इसी प्रकार हम जिस प्रकार का अन्न खाते है. माने सात्विक, राजसिक, तामसिक उसी प्रकार के विचार उत्पन्न करते है.

वित्तंदेहि गुणान्वितेष मतिमन्नाऽन्यत्रदेहि क्वचित् ।

प्राप्तं वारिनिधेर्जलं घनमुचां माधुर्ययुक्तं सदा 

जीवाः स्थावरजड्गमाश्च सकला संजीव्य भूमण्डलं ।

भूयः पश्यतदेवकोटिगुणितंगच्छस्वमम्भोनिधिम् ।।४।।

4. हे विद्वान् पुरुष ! अपनी संपत्ति केवल पात्र को ही दे और दूसरो को कभी ना दे, जो जल बादल को समुद्र देता है वह बड़ा मीठा होता है।बादल वर्षा करके वह जल पृथ्वी के सभी चल अचल जीवो को देता है और फिर उसे समुद्र को लौटा देता है।

चाण्डालानां सहस्त्रैश्च सूरिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।

एको हि यवनः प्रोक्तो न नीचो यवनात्परः ।।५।।

5 .विद्वान् लोग जो तत्त्व को जानने वाले है उन्होंने कहा है की मास खाने वाले चांडालो से हजार गुना नीच है, इसलिए ऐसे आदमी से नीच कोई नहीं।

तैलाभ्यड्गे चिताधूमे मैथुने क्षौरकर्मणि ।

तावद् भवति चाण्डालो यावत्स्नानं न चाचरेत् ।।६।।

6.शरीर पर मालिश करने के बाद, स्मशान में चिता का धुआ शरीर पर आने के बाद, सम्भोग करने के बाद, दाढ़ी बनाने के बाद जब तक आदमी नहा ना ले वह चांडाल रहता है।

अजीर्णे भेषजं वारि जार्णे वारि बलप्रदम् ।

भोजने चाऽमृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम् ।।७।।

7. जल अपच की दवा है, जल चैतन्य निर्माण करता है, यदि उसे भोजन पच जाने के बाद पीते है, पानी को भोजन के बाद तुरंत पीना विष पिने के समान है।

हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः ।

हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः ।।८।।

8.यदि ज्ञान को उपयोग में ना लाया जाए तो वह खो जाता है, आदमी यदि अज्ञानी है तो खो जाता है, सेनापति के बिना सेना खो जाती है, पति के बिना पत्नी खो जाती है।

वृध्द्काले मृता भार्या बन्धुहस्ते गतं धनम् ।

भाजनं च पराधीनं स्त्रिः पुँसां विडम्बनाः ।।९।।

9. वह आदमी अभागा है जो अपने बुढ़ापे में पत्नी की मृत्यु देखता है, वह भी अभागा है जो अपनी सम्पदा संबंधियों को सौप देता है, वह भी अभागा है जो खाने के लिए दुसरो पर निर्भर है।

अग्निहोत्रं विना वेदाः न च दानं विना क्रियाः ।

न भावेनविना सिध्दिस्तस्माद्भावो हि कारणम् ।।१०।।

10. यह बाते बेकार है, वेद मंत्रो का उच्चारण करना लेकिन निहित यज्ञ कर्मो को ना करना, यज्ञ करना लेकिन बाद में लोगो को दान दे कर तृप्त ना करना, पूर्णता तो भक्ति से ही आती है, भक्ति ही सभी सफलताओ का मूल है।

न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।

भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम् ।।११।।

11. देवता न काठ में, पत्थर में, और न मिट्टी ही में रहते हैं, वे तो रहते हैं भाव में। इससे यह निष्कर्ष निकला कि भाव ही सबका कारण है।

काष्ठ-पाषाण-धातूनां कृत्वा भावेन सेवनम् ।

श्रध्दया च तया सिध्दिस्तस्य विष्णोः प्रसादतः ।।१२।।

12. काठ, पाषाण तथा धातु की भी श्रध्दापूर्वक सेवा करने से और भगवत्कृपा से सिध्दि प्राप्त हो जाती है।

शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम् ।

न तृष्णया परो व्याधिर्न च धर्मो दया परः ।।१३।।

13. एक संयमित मन के समान कोई तप नहीं, संतोष के समान कोई सुख नहीं, लोभ के समान कोई रोग नहीं, दया के समान कोई गुण नहीं।

क्रोधो वैवस्वतो राहा तृष्णा वैतरणी नदी ।

विद्या कामदुधा धेनुः सन्तोषो नन्दनंवनम् ।।१४।।

14. क्रोध साक्षात् यम है, तृष्णा नरक की और ले जाने वाली वैतरणी है, ज्ञान कामधेनु है, संतोष ही तो नंदनवन है।

गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम् ।

सिध्दिर्भूषयते वद्यां भोगी भूषयते धनम् ।।१५।।

15. नीति की उत्तमता ही व्यक्ति के सौंदर्य का गहना है, उत्तम आचरण से व्यक्ति उत्तरोत्तर ऊँचे लोक में जाता है, सफलता ही विद्या का आभूषण है, उचित विनियोग ही संपत्ति का गहना है,

निर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम् ।

असिध्दस्य हता विद्या अभोगेन हतं धनम् ।।१६।।

16. निति भ्रष्ट होने से सुन्दरता का नाश होता है, हीन आचरण से अच्छे कुल का नाश होता है, पूर्णता न आने से विद्या का नाश होता है, उचित विनियोग के बिना धन का नाश होता है।

शुध्दं भूमिगतं तोयं शुध्दा नारी पतिव्रता ।

शुचिः क्षेमकरोराजा संतोषी ब्राह्मणः शुचिः ।।१७।।

17. जो जल धरती में समां गया वो शुद्ध है, परिवार को समर्पित पत्नी शुद्ध है, लोगो का कल्याण करने वाला राजा शुद्ध है, वह ब्राह्मण शुद्ध है जो संतुष्ट है।

असंतुष्टा द्विजा नष्टाः संतुष्टाश्च महीभृतः ।

सलज्जागणिकानष्टाः निर्लज्जाश्च कुलांगनाः ।।१८।।

18. असंतुष्ट ब्राह्मण, संतुष्ट राजा, लज्जा रखने वाली वेश्या, कठोर आचरण करने वाली गृहिणी ये सभी लोग विनाश को प्राप्त होते है।

किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम् ।

दुष्कुलं चापि विदुषी देवैरपि हि पूज्यते ।।१९।।

19. क्या करना ऊंचे कुल का यदि बुद्धिमत्ता ना हो, एक नीच कुल में उत्पन्न होने वाले विद्वान् व्यक्ति का सम्मान देवता भी करते है।

विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान्सर्वत्र गौरवम् ।

विद्यया लभते सर्व विद्या सर्वत्र पूज्यते ।।२०।।

20. विद्वान् व्यक्ति लोगो से सम्मान पाता है, विद्वान् उसकी विद्वत्ता के लिए हर जगह सम्मान पाता है, यह बिलकुल सच है की विद्या हर जगह सम्मानित है।

रूपयौवनसंपन्ना विशालकुलसम्भवाः ।

विद्याहीना नशोभन्ते निर्गन्धा इवकिंशुकाः ।।२१।।

21. जो लोग दिखने में सुन्दर है, जवान है, ऊँचे कुल में पैदा हुए है, वो बेकार है यदि उनके पास विद्या नहीं है. वो तो पलाश के फूल के समान है जो दिखते तो अच्छे है पर महकते नहीं।

मांसभक्षैः सुरापानैः मूर्खैश्चाऽक्षरवर्जितैः ।

पशुभि पुरुषाकारर्भाराक्रान्ताऽस्ति मेदिनी ।।२२।।

22. यह धरती उन लोगो के भार से दबी जा रही है, जो मास खाते है, दारू पीते है, बेवकूफ है, वे सब तो आदमी होते हुए पशु ही है।

अन्नहीना दहेद्राष्ट्रं मंत्रहीनश्च रिषीत्विजः ।

यजमानं दानहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः ।।२३।।

23. उस यज्ञ के समान कोई शत्रु नहीं जिसके उपरांत लोगो को बड़े पैमाने पर भोजन ना कराया जाए, ऐसा यज्ञ राज्यों को ख़तम कर देता है, यदि पुरोहित यज्ञ में ठीक से उच्चारण ना करे तो यज्ञ उसे ख़तम कर देता है, और यदि यजमान लोगो को दान एवं भेटवस्तू ना दे तो वह भी यज्ञ द्वारा ख़तम हो जाता है।

—–चाणक्य नीति

बेलपत्र और भगवान शिव

बेल का वृक्ष और भगवान शिव :- 

Dr.R.B.Dhawan

बेलपत्र को संस्कृत में ‘बिल्वपत्र’ कहा जाता है, यह औषधी गुणों से भरपूर वृक्ष भगवान शिव को प्रिय है, पौराणिक मान्यता है कि बेलपत्र और जल से भगवान शंकर का अभिषेक करने से और पूजा में इनका प्रयोग करने से शिव जल्द प्रसन्न होते हैं। बेलपत्र का तोड़ने के लिए पुराणों में ऐसे निर्देश दिए गए हैं, जिससे धर्म का पालन भी हो जाये और वृक्षों का संरक्षण भी हो जाए, यही कारण है कि देवी-देवताओं को अर्पित किए जाने वाले फूल और पत्रों को तोड़ने के कुछ नियम हैं, बेलपत्र तोड़ने के भी कुछ नियम हैं :-  

1. चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथ‍ियों को, सं‍क्रांति के समय और सोमवार को बेलपत्र न तोड़ें। 

2. भगवान शंकर को बेलपत्र चढ़ाने के लिए इन तिथ‍ियों या वार से पहले तोड़ा गया पत्र ही चढ़ाना चाहिए।  

3. शास्त्रों में कहा गया है कि अगर नया बेलपत्र न मिल सके, तो किसी दूसरे के चढ़ाए हुए बेलपत्र को भी धोकर कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है। 

अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:।
शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि क्वचित्।।
(स्कंदपुराण) 

4. टहनी से चुन-चुनकर सिर्फ बेलपत्र ही तोड़ना चाहिए, कभी भी पूरी टहनी नहीं तोड़नी चाहिए। पत्र सावधानी से तोड़ना चाहिए कि वृक्ष को कोई हानि न पहुंचे। 

5. बेलपत्र तोड़ने से पहले और बाद में वृक्ष को मन ही मन प्रणाम करना चाहिए।

कैसे चढ़ाएं बेलपत्र :- भगवान शिव को बेल पत्र प्रिय हैं ही। साथ ही भगवान शिव के अंशावतार हनुमान जी को भी बेलपत्र अर्पित किया जा सकता है, भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाने से घर की धन-दौलत में वृद्धि होने लगती है, अधूरी कामनाएं पूर्ण होती हैं।

शिव पुराण के अनुसार सावन के सोमवार को शिवालय में बेलपत्र चढ़ाने से एक करोड़ कन्यादान के बराबर फल मिलता है।
बेलपत्र का वृक्ष हर कामना को पूरी करता है। यही नहीं उसके पत्तों को गंगा जल से धोकर उन्हें बजरंगबली पर अर्पित करने से अनेक तीर्थों का फल मिलता है।

बिल्व वृक्ष (बेल के पेड़) की जड़ सफेद धागे में पिरोकर रविवार को गले में धारण करने से रक्तचाप, क्रोध और असाध्य रोगों से रक्षा होती है। 
बिल्व वृक्ष का पूजन पाप व दरिद्रता का अंत कर वैभवशाली बनाने वाला माना गया है। घर में बेल पत्र लगाने से देवी महालक्ष्मी बहुत प्रसन्न होती हैं।

बेल पत्तों को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। इन्हें अपने पास रखने से कभी धन-दौलत का अभाव नहीं होता।

शिव पुराण के अनुसार :-  1. बिल्व वृक्ष के आसपास सर्प नहीं आते ।  

2. यदि किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर
गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है ।

3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता
सबसे अधिक बिल्व वृक्ष में होती है ।

4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला
परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल
मिलता है ।

5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल
वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है। 

6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता
है। 

7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।

8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट
लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। 

9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि
स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे । 

10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी
शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त
हो जाते है । 

11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव
से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को
चढ़ाने से क्या फल मिलता है :-

1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।

3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।यह सभी अन्न भगवान
को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए। 

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन सा रस
(द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है :-

1. ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से
शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी
जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2. नपुंसक व्यक्ति अगर शुद्ध घी से भगवान शिव का अभिषेक
करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो
उसकी समस्या का निदान संभव है।

3. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को
चढ़ाएं।

4. सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में
वृद्धि होती है।

5. शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों
की प्राप्ति होती है।

6. शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति
होती है।

7. मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा
(टीबी) रोग में आराम मिलता है।

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन का फूल
चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है :-

1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने
पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।

3. अलसी के फूल से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान
विष्णु को प्रिय होता है।

4. शमी पत्र (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती
है।

6. जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की
कमी नहीं होती।

7. कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।

8. हारसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि
होती है।

9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र
प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशनकरता है।

10. लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है। 

11. दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

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शुभ और अशुभ ग्रह

गुरू या शुक्र अस्त होने पर मांगलिक कार्य वर्जित क्यों हो जाते हैं।

Dr.R.B.Dhawan

शुक्रे चास्तं गते जीवे चन्द्र वास्तमुपागते।
तेषां वृद्धि च बाल्ये च शुभकर्म भयप्रदम्।।

शुक्र नष्टे गुरौ सिंह गुर्वादित्ये मलिम्लुचे। 

गृहकर्म व्रतों यात्रा मनसापि न चिन्तयेत।।

अर्थात्:- शुक्र चन्द्र गुरू के अस्त होने में व वृद्धत्वव बलात् में शुभ कार्य करने से भय ही मिलता है। इसी प्रकार सिंह राशि में गुरू का प्रभाव है।

सूर्य सिद्धान्त के अनुसार – सूर्येणास्तम्भन सह अर्थात सूर्य के साथ (निकट के अंशों में आने से) ग्रह अस्त होते हैं। अपनी-अपनी गति से भ्रमण करते हुये ग्रह जब सूर्य के सानिध्य में आते हैं, तब उनका सूर्यकिरणों में छिप जाने के कारण ग्रह दिखाई नहीं देते हैं। इसी को ग्रह का अस्त होना कहते हैं। और जब सूर्य से दूर हट कर दिखलाई देने लगते हैं, तब इसे उदय ग्रह कहा जाता है । ग्रहों का उदय अस्त होना , मनुष्य की दृष्टी से ओझल होना व्यक्त करता है। और गुरू, शुक्र का उदय अस्त होना मंगल कार्य के मुहूर्त की दृष्टी से विशेष महत्व रखता है।

सूर्य के दक्षिणायन होने पर (कर्क संक्रान्ति से धनु संक्रान्ति के अन्त तक) देव प्राण-प्रतिष्ठा, जलाशय-प्रतिष्ठा, विवाह-संस्कार, अग्निहोत्र, ग्रहप्रवेश, मुण्डन, राज्याभिषेक एवं व्रतबंध आदि मांगलिक कार्य वर्जित हैं, अर्थात् शुभकारी नहीं होते।

बाल्यावस्था, अस्तांगत एवं वृद्धावस्था में गुरू और शुक्र के जाने पर तथा केतु के उदय होने पर भी यह मांगलिक कार्य शुभ फल नहीं देते। इस का कारण है- सूर्य मण्डल में शुक्र अस्त हो जाता है, तो तेजहीन हो जाता है। इसी प्रकार गुरू भी तेजहीन हो जाता है। शुक्र या गुरु की ऐसी स्थिति में मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिये। क्योंकि शुक्र भोग कारक ग्रह होने से भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति में बाधक होता है, यह भोग प्रदाता ग्रह है, सांसारिक सुख का ग्रह है, एवं दैहिक भोगविलास और लग्ज़री वस्तुओं का विवाह उपरांत आभाव अच्छा नहीं। ऐसे में शुक्र ग्रह के अस्त होने से विवाहोपरांत मिलने वाले शुभ फल कैसे मिल सकते हैं ? भारतीय ज्योतिष में कन्या के विवाह के लिये गुरू की स्थिति देखी जाती है । गुरू के बलवान  व शुभ होने पर कन्या को श्रेष्ठ पति सुख मिलता है। देव जागरण (देव प्रबोधिनी एकादशी) तुलसी विवाह से मांगलिक कार्य आरंभ हो जाते हैं।

अशुभ ग्रह :-

यदि कोई ग्रह
आपकी जन्म कुंडली में अशुभ स्थान
पर बैठकर प्रमोशन में बाधा बन रहा है तो आगे बताए
गए उपाय करने से आपकी समस्या का समाधान हो
सकता है।

ये उपाय इस प्रकार हैं-
1- यदि शनि आपके प्रमोशन में बाधा उत्पन्न कर रहा
है, तो एक बर्तन में तिल्ली का तेल लेकर उसमें
अपनी
परछाई देखकर दान कर दें। 

2- यदि सूर्य के कारण बाधा हो तो प्रतिदिन पहली
रोटी गाय को दें यदि गाय काली या
पीली हो तो
और भी शुभ रहता है। 

3- चन्द्र के कारण बाधा हो शिवलिंग पर कच्चे दूध में
गंगाजल मिलाकर अभिषेक करें। 

4- मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण बाधा हो तो घर की
बुजुर्ग महिलाओं का सम्मान करें और चांदी
की अंगूठी
या कड़ा पहनें। 

5- बुध ग्रह के कारण आपके प्रमोशन में बाधा उत्पन्न
हो रही हो तो किसी को चांदी
का आभूषण दान करें। 

6- गुरु के प्रभाव के कारण तरक्की में बाधा उत्पन्न
हो रही हो तो रोज गाय को गुड़-चने खिलाएं। 

7- यदि शुक्र ग्रह के कारण प्रमोशन रुका हो तो
माता-पिता व घर के अन्य बुजुर्ग लोगों की सेवा करें।
माता के पैर छूकर ही घर से बाहर निकलें। 

8- राहु के प्रभाव के कारण बाधा आ रही हो तो
चींटियों को आटा डालें व आटे की गोलियां
बनाकर
मछलियों को खिलाएं। 

9- केतु का अशुभ प्रभाव हो तो रोज काले कुत्ते को
रोटी पर तेल लगाकर खिलाएं।

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गायत्री मंत्र

गायत्री मंत्र:-

Dr.R.B.Dhawan

कुछ मंत्र ऐसे भी होते हैं, जिनके जपने से तत्काल हमारे संकट दूर हो जाते हैं, परंतु इन तत्कालिक लाभ देने वाले मंत्रों का प्रभाव स्थाई नहीं होता। दूसरी ओर वैदिक मंत्र हैं, जो दीर्घकाल में सिद्ध होते हैं, और इनका प्रभाव स्थाई बना रहता है। इसी लिसे विद्वानों ने बार-बार कहा है कि वैदिक मंत्रों में अपार शक्ति है। आइए जानें अलग-अलग देवताओं के अलग-अलग मंत्रों की शक्ति के बारे में। धर्मग्रंथों के अनुसार आत्मबल सफलता का मुख्य आधार है, मन की इच्छाएं पूरी करने के लिए इष्टसिद्धि बहुत आवश्यक है, इष्टसिद्धि का अर्थ है कि मनुष्य जिस देव शक्ति के लिए श्रद्धा और आस्था मन में बना लेता है, उस देवता से जुड़ी सभी शक्तियां, प्रभाव और तेज उसे मिलने लगते हैं।

इष्टसिद्धि मे मां गायत्री का ध्यान सफलता प्रदायक होता है। गायत्री उपासना के लिए गायत्री मंत्र बहुत ही चमत्कारी और शक्तिशाली माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस मंत्र में 24 अक्षर हैं, गायत्री मंत्र के ये 24 अक्षर 24 महाशक्तियों के प्रतीक हैं। एक गायत्री के महामंत्र द्वारा इन 24 देवशक्तियों का सानिध्य प्राप्त हो जाता है।

24 देव शक्तियों के ऐसे 24 चमत्कारी गायत्री मंत्र मे से, जो देवी-देवता आपके इष्ट है, उनका विशेष गायत्री मंत्र जपने से चमत्कारी फल प्राप्त होगा। शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक व भौतिक शक्तियों की प्राप्ति के लिए गायत्री उपासना सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। गायत्री ही वह शक्ति है जो पूरी सृष्टि की रचना, स्थिति या पालन और संहार का कारण है। वेदों में गायत्री शक्ति ही प्राण, आयु, शक्ति, तेज, कीर्ति और धन देने वाली मानी गई है। गायत्री मंत्र को महामन्त्र कहा गया है, जो शरीर की कई शक्तियों को चैतन्य करता है।

इष्टसिद्धी से मनचाहा कार्य बनाने के लिए गायत्री मंत्र के 24 अक्षरो के हर देवता के विशेष मंत्रों का जाप करना चाहिए।

1. श्रीगणेश – कठिन या जटिल कार्यों में सफलता, रुकावटों को दूर करने, बुद्धि लाभ के लिए इस गणेश गायत्री मंत्र का स्मरण करना चाहिए –

ॐ एकदृंष्ट्राय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो बुद्धिः प्रचोदयात्।

2. नृसिंह – शत्रु की शत्रुता को हराने, बहादुरी, भय व दहशत दूर करने, पुरुषार्थी बनने व किसी भी आक्रमण से बचने के लिए नृसिंह गायत्री प्रभावशाली साबित होती है –

ॐ उग्रनृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि तन्नो नृसिंह प्रचोदयात्।

3. विष्णु – पालन-पोषण की क्षमता को बढ़ाने या किसी भी तरह से सबल बनने के लिए विष्णु गायत्री का महत्व है –

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।

4. शिव – दायित्वों व कर्तव्यों को लेकर दृढ़ बनने, अमंगल का नाश व शुभता को बढ़ाने के लिए शिव गायत्री मंत्र प्रभावी माना गया है –

ॐ पञ्चवक्त्राय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।

5. कृष्ण – सक्रियता, समर्पण, निस्वार्थ व मोह से दूर रहकर कार्य करने की शक्ति, खूबसूरती व सरल स्वभाव की चाहत को कृष्ण गायत्री मंत्र पूरी करता है –

ॐ देवकीनन्दाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्।

6. राधा – प्रेम भाव को बढ़ाने व द्वेष या घृणा को दूर रखने के लिए राधा गायत्री मंत्र का स्मरण लाभ देता है

ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात्।

7. लक्ष्मी – मान-सम्मान, आर्थिक समृद्धि, पद, यश व भौतिक सुख-सुविधाओं की चाहत लक्ष्मी गायत्री मंत्र शीघ्र पूरी कर देता है –

ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।

8. अग्रि – शारीरिक बल बढ़ाने, प्रभावशाली व होनहार बनने के लिए अग्निदेव का स्मरण अग्नि गायत्री मंत्र से करना शुभ होता है-

ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि तन्नो अग्निः प्रचोदयात्।

9. इन्द्र – संयम के द्वारा बीमारियों, हिंसा के भाव को रोकने व भूत-प्रेत या अनिष्ट से रक्षा में इन्द्र गायत्री मंत्र प्रभावशाली माना गया है –

ॐ सहस्त्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्नो इन्द्रः प्रचोदयात्।

10. सरस्वती – बुद्धि व विवेक, दूरदर्शिता, चतुराई से सफलता मां सरस्वती गायत्री मंत्र से मिलती है –

ॐ सरस्वत्यै विद्महे ब्रह्मपुत्र्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्।

11. दुर्गा – विघ्नों के नाश, दुर्जनों व शत्रुओं को परास्त करने व अहंकार के नाश के लिए दु्र्गा गायत्री मंत्र का महत्व है-

ॐ गिरिजायै विद्महे शिव पत्नीय धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्।

12. हनुमानजी – निष्ठावान, भरोसेमंद, संयमी, शक्तिशाली, निडर व दृढ़ संकल्पित बनने के लिए हनुमान गायत्री मंत्र को अचूक माना गया है –

ॐ अञ्जनीसुताय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो मारुतिः प्रचोदयात्।

13. पृथ्वी – पृथ्वी गायत्री मंत्र सहनशील बनाने वाला, इरादों को मजबूत करने वाला व क्षमाभाव बढ़ाने वाला होता है –

ॐ पृथ्वी देव्यै विद्महे सहस्त्र मूर्त्यै धीमहि तन्नो पृथ्वी प्रचोदयात्।

14. सूर्य – निरोगी बनने, लंबी आयु, उन्नति व भीतर के दोषों का शमन करने के लिए सूर्य गायत्री मंत्र प्रभावी माना गया है –

ॐ भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नो सूर्य्यः प्रचोदयात्।

15. राम – धर्म पालन, मर्यादा, स्वभाव में विनम्रता, मैत्री भाव की चाहत राम गायत्री मंत्र से पूरी होती है –

ॐ दाशरथये विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात्।

16. सीता – सीता गायत्री मंत्र मन, वचन व कर्म से विकारों को दूर कर पवित्र करता है। साथ ही स्वभाव मे भी मिठास घोलता है –

ॐ जनकनन्दिन्यै विद्महे भूमिजायै धीमहि तन्नो सीता प्रचोदयात्।

17. चन्द्रमा – काम, क्रोध, लोभ, मोह, निराशा व शोक को दूर कर शांति व सुख की चाहत चन्द्र गायत्री मंत्र से पूरी होती है –

ॐ क्षीरपुत्रायै विद्महे अमृततत्वाय धीमहि तन्नो चन्द्रः प्रचोदयात्।

18. यम – मृत्यु सहित हर भय से छुटकारा, समय को अनुकूल बनाने व आलस्य दूर करने के लिए यम गायत्री मंत्र प्रभावशाली होता है –

ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नो यमः प्रचोदयात्।

19. ब्रह्मा – किसी भी रूप में सृजन शक्ति व रचनात्कमता बढ़ाने के लिए ब्रह्मा गायत्री मंत्र मंगलकारी होता है –

ॐ चतु्र्मुखाय विद्महे हंसारुढ़ाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्।

20. वरुण – दया, करुणा, कला, प्रसन्नता, सौंदर्य व भावुकता की कामना वरुण गायत्री मंत्र पूरी करता है –

ॐ जलबिम्बाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्।

21. नारायण – चरित्रवान बनने, महत्वकांक्षा पूरी करने, अनूठी खूबियां पैदा करने व प्रेरणास्त्रोत बनने के लिए नारायण गायत्री मंत्र शुभ है –

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो नारायणः प्रचोदयात्।

22. हयग्रीव – मुसीबतों को पछाड़ने, बुरे वक्त को टालने, साहसी बनने, उत्साह बढ़ाने व मेहनती बनने की कामना ह्यग्रीव गायत्री मंत्र पूरी करता है –

ॐ वाणीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हयग्रीवः प्रचोदयात्।

23. हंस – यश, कीर्ति पाने के साथ संतोष व विवेक शक्ति जगाने के लिए हंस गायत्री मंत्र प्रभावशाली होता है –

ॐ परमहंसाय विद्महे महाहंसाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात्।

24. तुलसी – सेवा भावना, सच्चाई को अपनाने, सुखद दाम्पत्य जीवन, शांति व परोपकारी बनने की चाहत तुलसी गायत्री मंत्र पूरी करता है –

ॐ श्री तुलस्यै विद्महे विष्णु प्रियायै धीमहि तन्नो वृन्दा प्रचोदयात्।

ये 24 देवशक्तियां जाग्रत, आत्मिक और भौतिक शक्तियों से संपन्न मानी गई है।

                        —– गायत्री महाविज्ञान से ——

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विषयोग

विष योग :-

Dr. R.B.Dhawan :-

ज्योतिषीय मतानुसार जन्म कुंडली में शनि और चंद्रमा का योग जातक के लिए कष्टकारी माना गया है। सिद्धांत यह है कि, शनिदेव अपनी धीमी गति के लिये जाने जाते हैं, और चन्द्रमा अपनी तीव्र गति के लिये, अर्थात शनि अधिक क्षमताशील होने के कारण अक्सर चंद्रमा को प्रताड़ित करते हैं। यदि चंद्र और शनि की युति कुंडली के किसी भी भाव में हो, तो ऐसी कुंडली में उनकी आपस में दशा-अंतर्दशा के दौरान विकट फल मिलने की संभावना होती है। (कुंडली में चंद्राराशि के अनुसार आप का प्रतिदिन ग्रह फल बदलता रहता है, इस ग्रह फल को जानने के लिये आप मेरी daily horoscope prediction app डाउनलोड कर सकते हैं। इससे आप प्रतिदिन अपना चंन्द्र राशि फल जान सकेंगे। Daily horoscope prediction app आपको गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध होगी।)
शनि:-  धीमी गति, लंगड़ापन, शूद्रत्व, सेवक, चाकरी, पुराने घर, खपरैल, बंधन, कारावास, आयु, जीर्ण-शीर्ण अवस्था आदि का कारक ग्रह है।

जबकि चंद्रमा:- मन की चंचलता, माता, स्त्री का सहयोग, तरल पदार्थ, सुख, कोमलता, मोती, दिल से स्नेह सम्मान, आदि का कारक है।

इन दोनो की अपनी-अपनी गति और अपनी-अपनी प्रकृति है, जो कि एक-दूसरे से विपरीत है, उदाहरणार्थ एक साथ रहने वाले दो प्राणी हैं, उन्होंने मिलकर एक कार्य करना है, तो एक सामान्य से जल्दी करेगा ओर दूसरा सामान्य से भी धीरे करेगा। अब दोनों में इसी बात का झगडा हमेशा रहेगा। शनि और चंद्र की युति से बनने वाले योग को विषयोग के नाम से जाना जाता है। यह कुंडली का एक अशुभ योग है। ये विषयोग जातक के जीवन में यथा नाम विषाक्तता घोलने में पूर्ण सक्षम है। जिस भी जातक की कुण्डली में विषयोग का निर्माण होता है, उसे जीवन भर अशक्तता, मानसिक व्याधियां, भ्रम, रोग, बिगड़े दाम्पत्य सुख, आदि का सामना करना पड़ता है। हां, जिस भी भाव में ऐसा विषयोग निर्मित हो रहा हो, उस भाव के अनुसार ही अशुभ फल की प्राप्ति होती है।   
जैसे यदि किसी जातक के लग्न चक्र में शनि-चंद्र की युति हो तो ऐसा जातक शारीरिक तौर पर बेहद अक्षम महसूस करता है। उसे जीवन के कुछ भाग में कंगाली और दरिद्रता का सामना करना पड़ सकता है। 

लग्न में:- शनि-चंद्र की युति हो जाने से उसका प्रभाव सप्तम भाव पर बेहद नकारात्मक होता है, जिससे जातक का दाम्पत्य जीवन बेहद बुरा बीतता है। लग्न शरीर का प्रतिनिधि है, इसलिए इस पर चंद्र और शनि की युति बेहद नकारात्मक असर छोड़ती है। जातक जीवन भर रोग-व्याधि से पीड़ित रहता है।
द्वितीय भाव में:- शनि-चंद्र की युुति बने तो जातक जीवन भर धनाभाव से ग्रसित होता है। 
तृतीय भाव में:- यह युति जातक के पराक्रम को कम कर देती है। 
चतुर्थ भाव में:- सुख और मातृ सुख की न्यूनता तथा ।
पंचम भाव में:- संतान व विवेक का नाश होता है। 
छठे भाव में:- ऐसी युति शत्रु-रोग-ऋण में बढ़ोत्तरी।
सप्तम भाव में:- शनि-चंद्र की युति संयोग पति-पत्नी के बीच सामंजस्य को खत्म करता है। 
अष्टम भाव में:- आयु नाश।
नवम भाव में:- भाग्य हीन बनाता है।
दशम भाव में:- शनि-चंद्र की युति पिता से वैमनस्य व पद-प्रतिष्ठा में कमी करती है।
ग्यारहवें भाव में:- एक्सिडेंट की संभावना बढ़ाने के साथ लाभ में न्यूनता आती है।
बारहवें भाव में:- शनि-चंद्र की युति व्यय को आय से बहुत अधिक बढ़ाकर जातक का जीवन कष्टमय बना देने में सक्षम है।  

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी ज्योतिषी से सलाह लेकर उचित उपाय किए जाये तो ‘विषयोग’ के दु:ष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। आगे की पंक्तियों में कुछ सरल उपाय दिए जा रहे हैं, इनका प्रयोग अवश्य ही लाभदायक रहेगा।

1. शनैश्नीचरी अमावस की रात्रि में नीली स्याही से 10 पीपल के पत्तों पर शनि का जाप  करते हुए एक-एक अक्षर लिखें :- 1. ॐ, 2. शं, 3. श, 4. नै, 5. श (यह  अक्षर आधा), 6. च, 7. रा, 8. यै, 9. न, 10. मः इस प्रकार 10 पत्तो में 10 अक्षर लिख कर फिर इन पत्तो को काले धागे में माला का रूप देकर, शनि देव की प्रतिमा या शिला में चढ़ाये। तब  इस क्रिया को करते समय मन ही मन शनि मंत्र का जाप भी करते रहना चाहिए। 

2. पीपल के पेड़ के ठीक नीचे एक पानी वाला नारियल सिर से सात बार उतार कर फोड़ दें और नारियल को प्रसाद के रूप में बॉट दें।

3. शनिवार के दिन या शनि अमावस्या के दिन संध्या काल सूर्यास्त के पश्चात् श्री शनिदेव की प्रतिमा पर या शिला पर तेल चढ़ाए, एक दीपक तिल के तेल का जलाए दीपक में थोड़ा काला तिल एवं थोड़ा काला उड़द डाल दें। इसके पश्चात् 10 आक के पत्ते लें, और काजल में थोड़ा तिल का तेल मिला कर स्याही बना लें, और लोहे की कील के माध्यम से प्रत्येक पत्ते में नीचे लिखे मंत्र को लिखे। यह पत्ते जल में प्रवाहित कर दें।

4. प्रतिदिन रूद्राक्ष की माला से कम से कम पाँच  माला महामृत्युन्जय मंत्र का जाप करें। इस क्रिया को शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से आरम्भ करें।

5. माता एवं पिता या अपने से उम्र में जो अधिक हो अर्थात पिता माता समान हो उनका चरण छूकर आर्षीवाद ले।

6.  सुन्दर कांड का 40 पाठ करें। किसी हनुमान जी के मंदिर में या पूजा स्थान में शुद्ध घी का दीपक जलाकर पाठ करें, पाठ प्रारम्भ करने के पूर्व अपने गुरू एवं श्री हनुमान जी का आवाहन अवश्य करें।

7. श्री हनुमान जी को शुद्ध घी एवं सिन्दूर का चोला चढ़ाये श्री हनुमान जी के दाहिने पैर का सिन्दूर अपने माथे में लगाए।

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गुरूजी के टोटके (5)

इस दिवाली धन प्राप्ति के टोटके : –

(1) सोमवार को शिव-मंदिर में जाकर दूध मिश्रित जल शिवलिंग पर चढ़ाएं तथा रूद्राक्ष की माला से ‘ऊँ सोमेश्वराय नम:’ का 108 बार जप करें। साथ ही पूर्णिमा को जल में दूध मिला कर चन्द्रमा को अर्ध्य देकर व्यवसाय में उन्नति की प्रार्थना करें, तुरन्त ही असर दिखाई देगा।

(2) यदि बहुत प्रयासों के बाद भी घर में पैसा नहीं रूकता है, तो एक छोटा सा उपाय करें। सोमवार या शनिवार को थोड़े से गेहूं में 11 पत्ते तुलसी तथा 2 दाने केसर के डाल कर पिसवा लें। बाद में इस आटे को पूरे आटे में मिला लें। घर में बरकत रहेगी और लक्ष्मी दिन दूना रात चौगुना बढऩे लगेगी।

(3) घर में लक्ष्मी के स्थाई वास के लिए एक लोहे के बर्तन में जल, चीनी, दूध व घी मिला लें। इसे पीपल के पेड़ की छाया के नीचे खड़े होकर पीपल की जड़ में डाले। इससे घर में लक्ष्मी का स्थाई वास होता है।

(4) घर में सुख-समृद्धि लाने के लिए एक मिट्टी के सुंदर से बर्तन में कुछ सोने-चांदी के सिक्के लाल कपड़े में बांधकर रखें। इसके बाद बर्तन को गेहूं या चावल के भर कर घर के वायव्य (उत्तर-पश्चिम) कोने में रख दें। ऐसा करने से घर में धन का कभी कोई अभाव नहीं रहेगा।

“गुरुजी के टोटके” पुस्तक से (गुरु जी द्वारा लिखित इस पुस्तक में लगभग 1500 totke हैं)। यह पुस्तक shukracharya karyalaya से अथवा shukracharya.com पर आर्डर करके मंगवा सकते हैं।

Aap Ka Bhavishya

Aap ka bhavishya एक एंड्रॉयड मोबाइल ऐप है, इस ऐप को लांच करने का प्रयोजन ज्योतिषीय मासिक “ई-पत्रिका” का प्रचार-प्रसार करना है। क्योंकि एक मासिक ज्योतिषीय पत्रिका के माध्यम से वैदिक विद्याओं या विषयों का प्रचार-प्रसार करना सरल है। यह प्रचार-प्रसार ज्ञानवर्धक लेखों‌ के रूप में पाठकों तक पहुंचाने का कार्य Aap Ka Bhavishya मासिक ज्योतिषीय “ई-पत्रिका” कर सकती है, इस ऐप के माध्यम से “Aap Ka Bhavishya” e-magazine के 12 अंक एक वर्ष में प्रकाशित लिए जाते हैं, इस लिए कोई भी Subscriber’s  एक वर्ष के लिए इस Astrological Magazine की Subscription ले सकता हैं। 

गुरुजी (Dr.R.B.Dhawan) ने “आप का भविष्य” हिन्दी मासिक ज्योतिषीय पत्रिका का प्रकाशन एवम् संपादन 2000 ईसवी सन् के जनवरी महिने से आरंभ किया था। 2000 से 2016 तक यह मैगजीन प्रिंट करके publish की जाती रही है, जो कि अब वर्ष 2017 से e-magazine के रूप में हर माह प्रकाशित हो रही है। गुरुजी का मानना है की “ज्योतिष विद्या” मनुष्य को भविष्य के लिए उपयोगी मार्गदर्शन देती रही है, साथ ही साथ ज्योतिष विज्ञान की सहायता से मनुष्य अपने भविष्य के लिए ठीक से planning भी कर सकता है। देखा जाए तो ज्योतिष ही एकमात्र ऐसा विज्ञान है, जो हमें हमारे भविष्य का संकेत देते हुए भविष्य के लिए उचित मार्गदर्शन देकर हमारी सहायता कर सकता है। ये विद्या हमारे ऋषियों-मुनियों के सैकड़ों वर्षों की खोज का परिणाम या उपलब्धि है। हमारे इन भविष्य-दृष्टा ऋषियों-मुनियों ने मानव जाति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने मानव जाति के विकास के लिए सैकड़ों विद्याओं को विकसित किया है, जिन्हें हम आज भी किसी ना किसी रूप में प्रयोग कर रहे हैं।

इस ज्योतिषीय पत्रिका Aap Ka Bhavishya में इन सभी वैदिक विद्याओं के आलेख प्रकाशित किए जाते रहे हैं, वे विद्या चाहे ज्योतिष हो, या आयुर्वेद अथवा मंत्र शास्त्र मनुष्य के आर्थिक-मानसिक-शारीरिक विकास में इनका एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है, और इस क्रम का बने रहना आवश्यक है, इसी लिए गुरुजी का मानना है कि, जब तक जीवन है, तब तक मानव जाति को ऋषियों-मुनियों की इस धरोहर का लाभ पहुंचना एक श्रेष्ठ कार्य होगा। और अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए गुरुजी Dr.R.B.Dhawan निरंतर इस प्रकाशन-संपादन के कार्य में अपना अधिकतम समय देते हैं। गुरुजी का मानना है कि अब समय आ गया है कि, इन सभी विद्याओं को नई Tachnology से जोड़ा जाए। “आप का भविष्य” को “ई-पत्रिका” में परिवर्तित करना इसी श्रंखला की एक कड़ी है, गुरुजी के इस पुनीत कार्य में Para Digital Technologies के सहयोग को कभी भुलाया नही जा सकता। जिस कम्पनी ने Aap Ka Bhavishya ज्योतिषीय पत्रिका को “ई-पत्रिका” का रूप देते हुए इस App की रचना और डिजाइन किया है, इस कार्य के लिए Mr. Pradeep Dhawan द्वारा की गई मेहनत सराहनीय है। इन्होंने अथक परिश्रम करते हुए अपना कीमती समय लगाया है। Para Digital Tachnology और Mr.Pradeep Dhawan जी के इस विशेष योगदान के लिए Shukracharya संस्थान सदा आभारी रहेगा।

Aap Ka Bhavishya App :- “आप का भविष्य” एप जो कि “ई-पत्रिका” है, आप गूगल प्ले स्टोर से अपने एन्ड्रोएड फोन में डाउनलोड कर सकते हैं। डाउनलोड करके आप तीन महीने के अंक फ्री देख सकते हैं, शेष सभी अंकों को देखने के लिए आपको Subscription लेनी होगी।  Subscribe करने के लिए 180/- वार्षिक फीस आनलाइन पे करने की सुविधा इस एप में है। एक वर्ष की मेम्बरशिप लेकर हर माह (12 माह तक) नया और पहले सभी अंकों को रीड कर सकते हैं।

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Daily prediction

Daily prediction app यह एक एंड्रॉयड मोबाइल ऐप है, इस ऐप को लांच करने का प्रयोजन “दैनिक राशिफल” जानना है। इस ऐप के लिए राशिफल तैयार करने के लिए गुरुजी को (Dr.R.B.Dhawan को) लगभग 3 वर्ष का समय लगा।  Para Digital Technologies द्वारा बनी इस ऐप के लिए Mr. Pradeep Dhawan द्वारा की गई मेहनत रंग लाई है, इन्होंने अथक परिश्रम करते हुए अपना कीमती समय लगाया है। Para Digital tachnology और Mr.Pradeep Dhawan जी के इस विशेष योगदान के लिए Shukracharya संस्थान सदा आभारी रहेगा।

Daily prediction app :- 

इस Android App को आप free download कर सकते हैं, इस ऐप को डाउनलोड करके आप अपनी जन्म तिथि और जन्म समय का विवरण इनपुट देंगे, आऊटपुट में आपको उसी दिन का राशिफल मिलेगा, ये राशिफल आप प्रतिदिन हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में देख सकते हैं। विशेष बात ये है कि, ये ऐप शुद्ध भारतीय ज्योतिषीय (vaidic astrology) की गणनाओं चंद्रमा राशि moon sign पर आधारित है, ना कि पाश्चात्य पद्धति sun sign पर क्योंकि पाश्चात्य पद्धति “भारतीय वैदिक ज्योतिष” पद्धति से अलग है, जो कि पाश्चात्य लोगों के कचर के अनुसार तो ठीक हो सकती है, परंतु भारतीय कलचर के अनुसार महर्षि भृगु bhragu की चन्द्रमा पर आधारित फलादेश पद्धति ही उपयुक्त होती है।

Daily prediction app की विशेषताएं :-

दैनिक राशिफल भारतीय वैदिक पद्धति (चन्द्र राशि) के अनुसार देख सकते हैं। (यह सुविधा निशुल्क है)।

इस ऐप के माध्यम से आप गुरुजी (Dr.R.B.Dhawan) से व्यक्तिगत रूप से मिलकर कंसल्ट करने के लिए Appointment बुक कर सकते हैं (इस सुविधा के लिए फीस है)।

इस ऐप के माध्यम से आप गुरुजी से फोन द्वारा ज्योतिषीय परामर्श भी ले सकते हैं। (इस सुविधा के लिए फीस है)।

Link :- https://play.google.com/store/apps/details?id=com.pdt.dailyprediction

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पंचमहापुरुष योग

Dr.R.B.Dhawan

जन्मकुंडली में बनने वाले हजारों योगों में से पंच महापुरुष योग ऐसे योग हैं, जो अपना शुभ फल अवश्य देते हैं, बेशक इन योगों को बनाने वाले ग्रह अस्ट ही क्यों ना हों, या नीच राशि में ही क्यों ना हों। और यह पांच योग अपना न्यूनाधिक फल जीवन भर देते रहते हैं।

1. रूचक योग-

मंगल यदि कुंडली के केंद्र में होकर अपनी ही राशि, अथवा अपनी उच्च राशि का हो तो “रूचक योग” होता है । रूचक योग होने पर जातक बलवान, साहसी, तेजस्वी, उच्च स्तरीय वाहन रखने वाला होता है । इस योग में जन्मा जातक विशेष पद प्राप्त करता है |

2. भद्र योग-

बुद्ध ग्रह कुंडली के केंद्र में स्वगृही अथवा उच्च राशि का हो तो “भद्र योग” होता है । इस योग  में जन्मा जातक उच्च व्यवसाई होता है ।अपने प्रबंधन, कौशल, बुद्धि-विवेक का उपयोग कर व्यवसाय द्वारा धनोपार्जन करता है । ऐसे जातक के जीवन में बुध कि दशा आ जाय तो ऐसा जातक मिट्टी में भी हाथ डालेगा तो वे सोना बन जाएगी । अनेक मार्गों से अर्थोपार्जन करेगा, तथा व्यवसायिक जगत में शिखर पुरुष होता है। यह योग सप्तम भाव में हो तो जाना माना उद्योगपति बन जाता है ।

3. हंस योग-

कुंडली में यदि बृहस्पति किसी केंद्र मैं होकर स्वगृही अथवा उच्च राशि  का हो तब “हंस योग” होता है, यह जातक मानवीय गुणों से ओत-प्रोत, गौर वर्ण, सुन्दर, हसमुख, मिलनसार, विनम्र होने के साथ, अपार धन-सम्पत्तिवान होता है । पुण्य कर्मों में रुचि रखने वाला, दयालु, कृपालु, शास्त्र का ज्ञान रखने वाला होता है ।

4. मालव्य योग-

कुंडली के केंद्र में शुक्र ग्रह यदि स्वगृही उच्च राशि का होकर विराजमान हो तो “मालव्य योग” बनता है | इस योग के जातक सुन्दर, गुणी, तेजस्वी, धैर्यवान, धनी तथा जीवन भर सुख-सुविधा युक्त रहते हैं |

5. शश योग-

शनि ग्रह यदि किसी की कुंडली में स्वराशिस्थ अथवा उच्च राशिस्थ केंद्र भाव में स्थिति हो “शश योग” होता है। यह योग सप्तम भाव या दशम भाव में होता है तो, व्यक्ति विपुल धन-संपत्ति का स्वामी होता है ।व्यवसाय और नौकरी कि कला के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करता है । यह समुदाय का मुखिया जैसे उच्च पद को प्राप्त करता है ।

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