दो मुखी रुद्राक्ष, 2 Mukhi Rudraksh

दो मुखी रूद्राक्ष, 2 Mukhi Rudraksh Nepal, 2 Mukhi Rudraksh Original Nepal,

Dr.R.B.Dhawan,Astrological Consultant, specialist: marriage problems, top best astrologer in delhi

असुराचार्य shukracharya का कथन है कि- दो मुखी रूद्राक्ष अर्धनारिश्वर स्वरूप है, यह शिव तथा शक्ति दोनो का संयुक्त रूप है। इसे धारण करने से भगवान शिव तथा पार्वती दोनों ही प्रसन्न होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष गोहत्या के पाप से मुक्ति दिलाता है, तथा यह मन और मस्तिष्क को सन्तुलित रखता है, Dr.R.B.Dhawan अपने अनुभवों के आधार पर कहते हैं- इसको धारण करने से मनुष्य की बुद्धि सक्रिय होती है, तथा घर में हर प्रकार की सुख-सुविधा उपलब्ध होती है। इसको धारण करने से पति-पत्नी में एकात्मय भाव उत्पन्न होता है, यह रूद्राक्ष श्रद्धा एवं विश्वास का स्वरूप है। यह व्यापार में सफलता दिलाता है। आचार्य shukracharya लिखते हैं- दो मुखी रूद्राक्ष सांसारिक ऐश्वर्य व उपलब्धियां कराता है, तथा घर से क्लेश की जड़ को दूर करता है। दो मुखी रूद्राक्ष शिव और पार्वती का सम्मिलित स्वरूप है। इस रूद्राक्ष को धारण करने वाले व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। इस रूद्राक्ष की अद्भुत शक्ति से धारक का मन मस्तिष्क संतुलित रहता है। Dr.R.B.Dhawan के अनुसार शिवपुराण में दो मुखी रूद्राक्ष के लिए कहा गया है कि यह बेहद दुर्लभ और कल्याणकारी रूद्राक्ष है। नेपाल के द्विमुखी रूद्राक्ष चपटे, आँख की आकृति के होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष नेपाल में काफी कम होता है, तथा बहुत मँहगा भी होता है, इसलिये दो मुखी रूद्राक्ष रामेश्वरम का ही अधिक देखने को मिलता है। दो मुखी रूद्राक्ष को धारण करने से भगवान् शिव तथा माता पार्वती दोनों ही प्रसन्न होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष गोहत्या के पाप से मुक्ति दिलाता है, तथा यह मन मस्तिष्क दोनों को सन्तुलित रखता है। दो मुखी रूद्राक्ष अर्ध-नारीश्वर स्वरूप है, इसे शिव-शिवा रूप भी कह सकते हैं, दोमुखी रूद्राक्ष साक्षात् अग्नि स्वरूप हैं, जिसके शरीर पर ये प्रतिष्ठित करके धारण किया होता है, आचार्य shukracharya का मानना है कि उसके जन्म जन्मांतर के पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे अग्नि ईंधन को जला डालती है।

इस रूद्राक्ष के धारण करने से कुंडली में चन्द्रमा से उत्पन्न सभी दोषों का निवारण हो जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से चन्द्रमा हृदय, फेफडा, मन, वामनेत्र, गुर्दा, भोजन नली इत्यादि का कारक है। चन्द्रमा की प्रतिकूल स्थिति तथा दुष्प्रभाव के कारण हृदय तथा फेफड़ों के रोग हो सकते हैं। बांयी आँख की खराबी, खून की कमी, जल सम्बन्धी रोग, गुर्दा कष्ट, मासिक धर्म के रोग, स्मृति-भ्रंश इत्यादि रोग भी हो सकते हैं। इसके दुष्प्रभाव से दरिद्रता तथा मन मस्तिष्क विकार भी होते हैं। गुणों के हिसाब से यह मोती से कई गुना अधिक प्रभावी है। दो मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाले धारक के परिजन परस्पर आदर व श्रद्धा की सतत् वृद्धि अनुभव करते हैं। द्विमुखी रूद्राक्ष शिक्षक व छात्र के बीच, पिता व पुत्र के बीच, पति व पत्नी के बीच या मित्रों में मतभेद मिटाता है, और एकात्मता उत्पन्न करता है। धारक शांतिमय पारिवारिक जीवन जीने के लिये सक्षम बन जाता है। इस रूद्राक्ष में अंर्तगर्भित ऐसी विद्युत तरंगें होती हैं कि जिन के प्रभाव से यह रूद्राक्ष सभी शारीरिक व्याधियों से रक्षा करता है, गुरू जी (Dr.R.B.Dhawan) अपने अनुभव लिखते हुए आगे कहते हैं- इस रूद्राक्ष को धारण करने से इनकम/सेल्स टैक्स अधिकारी व्यापारी को व सरकारी नौकरी वालों को उनके अधिकारी बेकार परेशान नहीं करते इस लिये इन्हें यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिये। यह शरीर की गर्मी को निकालता है, इससे रक्तचाप नियंत्रण में रहता है। मन मस्तिष्क की बीमारी भी सही हो जाती हैं। दो मुखी रूद्राक्ष को देवेश्वर भी कहा जाता है। दो मुखी रूद्राक्ष दांपत्य जीवन सुखमय बनाने के लिये अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। शिव और शक्ति की उपासना करने वाले को यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिये। इस रूद्राक्ष के स्वामी ग्रह चंद्रदेव हैं।

दो मुखी रूद्राक्ष धारण मंत्र- ॐ नमः ॐ शिव शक्तिभ्यां नमः।
चैतन्य करने का मंत्र- ॐ क्षी हृो क्षौं वो ॐ।।
उपयोग- आदर्श पारिवारिक जीवन, शांतिपूर्ण व स्थाई संबधों के लिये।

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पंद्रह मुखी रूद्राक्ष, 15 Mukhi Rudraksh

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रक्ष जाति के आचार्य shukracharya का वचन है कि- पंद्रहमुखी रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ रूद्राक्षों की श्रेणी में आता है। यह रूद्राक्ष परम प्रभावशाली तथा अल्प कालावधि में ही शिवजी को प्रसन्न करने वाला रूद्राक्ष है, यह रूद्राक्ष साक्षात् देवमणि है। गुरू जी (Dr.R.B.Dhawan) और पुराणों के अनुसार पंद्रह विद्या, का साक्षात रूप है। इसमें महादेव की विशेष शक्ति निहित होती है, इसलिये नवग्रहों से उत्पन्न दोष इसे धारण करने मात्र से शांत होते हैं। यह रूद्राक्ष कठिन से कठिन परिस्थितियों में धारण करने वाले का मार्गदर्शन करता है। जो व्यक्ति इस रूद्राक्ष को कंठ के मध्य में धारण करते हैं, वह सर्वत्र पूजित होते हैं, और अंत समय वे स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। चमड़ी के जटिल से जटिल रोगों को दूर करने की इसमें शक्ति है। धारक को आत्मरक्षा करने में समर्थ बनाता है। यह रूद्राक्ष धारक को हानि, दुर्घटना, जटिल रोग, आर्थिक चिन्ता से मुक्त रखकर धारक को सुरक्षा-समृद्धि देता है। वैसे तो यह रूद्राक्ष सभी जटिल रोगों को दूर करने वाला माना गया है, फिर भी Dr.R.B.Dhawan के अनुभव अनुसार इस रूद्राक्ष में पौरुष रोग को दूर करने की महान शक्ति है। इसी लिए दुर्बल पुरुष के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, और इसीलिये इस की मांग अधिक होने से यह अधिक मूल्यावान भी होता है। वैसे भी यह रूद्राक्ष बहुत ही कम मात्रा में उत्पन्न होता है, और इसकी मांग इसकी उपलब्धता से कहीं अधिक है। पंद्रहमुखी रूद्राक्ष स्वास्थ्य लाभ, रोगमुक्ति और शारीरिक तथा मानसिक-व्यापारिक उन्नति में सहायक होता है। धारण करने पर आध्यात्मिक तथा भौतिक सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इस रूद्राक्ष को धारण करने से शत्रुओं का नाश होता है, इस लिए यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक है, यह समस्त रोगों का हरण करने वाला, सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला है। इसके धारण करने से कुल की मर्यादा और कुल वृद्धि अवश्य होती है। इससे बल और उत्साह का वर्धन होता है, और निर्भयता प्राप्त होती है, तथा संकट काल में सरंक्षण भी प्राप्त होता है। पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति सदा सही निर्णय लेता है, और संकटों, कुपरिस्थितियों एवं चिंताओं से छुटकारा पाता है, धारणकर्ता में विशेष ओजस गुणों का विकास होने लगते हैं। यह शास्त्रोक्त सत्य है कि जिसने पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण कर लिया, उसेे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है, और गृहस्थ जीवन भी अच्छा होता है। गर्भपात रूक जाता है, व गुणवान संतान उत्पन्न होती है।

पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण का मंत्र है- ॐ पशुपतय नम:’ मंत्र का 108 बार जाप करते हुए धारण करें।
लाभ- अलौकिक मार्गदर्शन, जटिल और पौरुष रोगों की शांति।

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चौदह मुखी रूद्राक्ष, 14 Mukhi Rudraksh

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असुराचार्य shukracharya के अनुसार- चौदह मुखी रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ रूद्राक्षों की श्रेणी में आता है। परम प्रभावशाली तथा अल्प समय में ही शिवजी को प्रसन्न करने वाला यह चौदह मुखी रूद्राक्ष साक्षात् देवमणि है। Dr.R.B.Dhawana जी का कथन है कि- पुराणों में वर्णित है कि यह रूद्राक्ष चौदह विद्या, 14 लोक, 14 मनु का साक्षात् रूप है। इसमें हनुमानजी की शक्ति भी निहित होती है, इसलिये शनि से संबंधित सभी दोष इसे धारण करने मात्र से शांत होते हैं। यह रूद्राक्ष आज्ञाचक्र का नियन्ता है। जो व्यक्ति इस रूद्राक्ष को कपाल के मध्य में धारण करते हैं, उनकी पूजा देवता और ब्राह्यण करते हैं, और वे निर्वाण (स्वर्ग) को प्राप्त हो जाते हैं। यह शिवजी तीसरे नेत्र के समान है, और धारक को आत्म रक्षा एवं कार्य के सही नियोजन में सहायक बनाता है। यह रूद्राक्ष धारक को हानि, दुर्घटना, रोग, चिन्ता से मुक्त रखकर साधक को सुरक्षा-समृद्धि देता है, यह रूद्राक्ष सभी रूद्राक्षों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, और इसीलिये यह अधिक मूल्यावान होता है। ये बहुत ही कम संख्याओं में उत्पन्न होता है, और इसकी मांग इसकी उपलब्धता से कहीं अधिक होती है। चौदह मुखी रूद्राक्ष shukracharya संस्थान में उपलब्ध है, क्योंकि इस रूद्राक्ष को स्वयं भगवान शिव ने धारण किया था, इसे धारण करने से परिवार का कल्याण होता है, चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष स्वास्थ्य लाभ, रोगमुक्ति और शारीरिक तथा मानसिक-व्यापारिक उन्नति में सहायक होता है। 14 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से आध्यात्मिक लाभ तथा भौतिक सुख तथा सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इस रूद्राक्ष को मस्तक पर धारण करना चाहिये। जो मनष्य इसे मंत्र सिद्ध करके धारण करते हैं, वह रूद्रलोक में जाकर बसते हैं। इससे परमपद की प्राप्ति होती है, शत्रुओं का नाश होता है, बैकुंठ की प्राप्ति होती है। यह जेल भय से मुक्ति भी दिलाता है। यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक है, यह समस्त रोगों का हरण करने वाला सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला है। इसके धारण करने से वंशवृद्धि अवश्य होती है। इससे बल और उत्साह का वर्धन होता है। इससे निर्भयता प्राप्त होती है, और संकट काल में सरंक्षण प्राप्त होता है। विपत्ति और दुर्घटना से बचाव के लिये हनुमान जी (रूद्र) के प्रतीक माने जाने वाले इस 14 मुखी रूद्राक्ष को अवश्य प्रयोग करना चाहिये। चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष धारक को भविष्य देखने की दृष्टि प्रदान करता है, यह ‘देवमणि’ रूद्राक्ष है। चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति सदा सही निर्णय लेता है, और संकटों, कुपरिस्थितियों एवं चिंताओं से छुटकारा पाता है, तथा भूत-पिशाच, डाकिनी, शाकिनी का प्रकोप उसके निकट भी नहीं आता। धारणकर्ता में विशेष गुण विकसित होने लगते हैं। यह आचार्य shukracharya द्वारा शास्त्रोक्त सिद्ध है कि जिसने 14 मुखी रूद्राक्ष धारण कर लिया, शनि जैसा प्रतिकूल ग्रह भी अनुकूल हो जाता है। चौदह मुखी रूद्राक्ष की माला पुरूष या स्त्री द्वारा धारण करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है, और गृहस्थ जीवन भी अच्छा होता है। ग्यारह मुखी तथा चौदह मुखी दोनों रूद्राक्ष की माला को पेट पर बांधने से बार-बार हो जाने वाला गर्भपात नहीं होता। और उच्च कोटि की संतान उत्पन्न होती है।

14 मुखी रूद्राक्ष धारण का मंत्र है- ॐ नमः ॐ हनुमते नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ औं हस्फ्रें हसख्फ्रें। इस मंत्र से रूद्राक्ष को चैतन्य कर धारण करना चाहिये।
उपयोग- यह रूद्राक्ष भविष्य दर्शन, कल्पना शक्ति एवं ध्यान में सहायक है।

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गौरी-शंकर रुद्राक्ष Gori Shankar Rudraksh

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Aacharya, shukracharya के अनुसार गौरी शंकर रुद्राक्ष प्राकृतिक रूप से परस्पर जुड़े दो रूद्राक्षों को ही गौरी-शंकर रूद्राक्ष कहा जाता है। गौरी-शंकर रूद्राक्ष gauri Shankar Rudraksha को भगवान् शिव तथा माता गौरी का स्वरूप माना जाता है, इसलिये इसका नाम गौरी शंकर रूद्राक्ष है। यह रूद्राक्ष हर प्रकार की सिद्धियों का दाता है। यह रूद्राक्ष एक मुखी तथा चैदह मुखी की तरह बहुत दुर्लभ तथा विशिष्ट रूद्राक्ष है। कुछ लोग इसे अर्धनारीश्वर रूद्राक्ष भी कहते हैं। यह सुख-शांति, विवाह, संतान, सात्विक शक्ति, धन-धान्य, वैभव, प्रतिष्ठा, दैवीय कृपा और स्थाई लक्ष्मी प्रदाता रूद्राक्ष है। इस gauri Shankar Rudraksha रूद्राक्ष को उपयोग में लाने से भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसमें द्विमुखी रूद्राक्ष के जैसे गुण होते हैं, ऐसी मान्यता है। गौरी-शंकर रूद्राक्ष में एक मुखी रूद्राक्ष और चैदह मुखी रूद्राक्ष दोनों की शक्तियाँ समाहित होती हैं। गौरी-शंकर को पति-पत्नी के बीच, पिता-पुत्र के बीच, या दो मित्रों के बीच सम्बन्ध सुधारने के लिये धारण करते हैं। विवाह के इच्छुक युवक-युवती इसे धारण करते हैं। सामंजस्य, आकर्षण, मंगल कामनाओं की सिद्धि में यह रूद्राक्ष बहुत सहायक है। गौरी-शंकर रूद्राक्ष gauri Shankar Rudraksha सर्वसिद्धि प्रदाता रूद्राक्ष कहा गया है। यह सात्विक शक्ति में वृद्धि करने वाला, मोक्ष प्रदाता है। महिलाओं के लिये गौरी-शंकर रूद्राक्ष सफल वैवाहिक जीवन के लिये लाभकारी माना गया है। यह रूद्राक्ष भगवान शिव और उमादेवी का संयुक्त प्रतिरूप होने के कारण वंशवृद्धि द्वारा सृष्टि का विकास करता है। अतः पारिवारिक शांति एवं एकजुटता के लिये श्रेष्ठ है। गुरू जी Dr.R.B.Dhawan का कहना है की जन्म पत्री में यदि दुःखदायी कालसर्प योग पूर्णरूप से अथवा आंशिक रूप से प्रकट होकर जीवन को कष्टमय बना रहा हो तो, व्यक्ति को अविलम्ब 8 मुखी 9 मुखी और गौरी-शंकर रूद्राक्ष gauri Shankar Rudraksha अर्थात तीनों ही रूद्राक्षों का संयुक्त बन्ध बनवाकर धारण करना चाहिये क्योंकि कालसर्प दोष केवल शिव कृपा से ही दूर होता है, और गौरी-शंकर रूद्राक्ष के साथ राहू एवं केतु के 8 एवं 9 मुखी रूद्राक्ष बन्ध निश्चित रूप से कालसर्प योग से पूर्णतः मुक्ति दिलाने में सर्वश्रेष्ट हैं। गौरी-शंकर रूद्राक्ष धारण करने से पुरूषों को स्त्री सुख प्राप्त होता है, तथा परस्पर सहयोग एवं सम्मान तथा प्रेम की वृद्धि होती है। यह रूद्राक्ष शिव-शक्ति के लिये उपयोगी माना गया है। यह बहुत दुर्लभ रूद्राक्ष है। परंतु shukracharya संस्थान में उपलब्ध है। इस से जीवन सर्वतोन्मुखी विकास की ओर अग्रसर होता है। संक्षेप में यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को देने वाला चतुर्वर्ग प्रदाता रूद्राक्ष है, यह ध्यान में भी प्रबल सहायक है। सर्वाधिक गौरी-शंकर में कुल 1, 10 या 11 मुख होते हैं, ऐसे भी गौरी-शंकर है, जिनमें 11 मुख या फिर दोनों दानों में एक-एक मुख होता है। गौरी-शंकर कंठा जिसमें 33 बीज होते हैं, सन्यासी पहनते हैं, जिन्हें अपने ब्रह्यचर्य की रखा करनी होती है। अधिकांशतः लोग इसे पहनने की बजाय इसकी पूजा करते हैं। इसके 33 दानों के कंठे से निसृत ऊर्जा सामान्य व्यक्ति में वैराग्य की भावना पैदा करती है। गौरी शंकर रूद्राक्ष को पूजा स्थान के साथ-साथ तिजोरी, गल्ले, में स्थापित करते हैं। धारण करने के लिये इसे सोने या चांदी में मढ़वा लेना श्रेष्ठ है।

धारण करने के लिये मंत्र- ॐ ऐं हृीं युगलरूपिण्यै नमः। ॐ गौरी-शंकराभ्यां नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ ऐं हृीं क्लीं क्ष्म्यौं स्वाहा।। इस मंत्र से रूद्राक्ष को चैतन्य कर धारण करना चाहिये।
उपयोग- बड़े से बड़ा विघ्न इस रूद्राक्ष को धारण करने से समूल नष्ट होता है, मानसिक शारीरिक रोगों से पीड़ित पुरूषों/स्त्रियों के लिये ये रूद्राक्ष दिव्यौषधि की तरह काम करता है।

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त्रिजुटी रूद्राक्ष, Trijuti Rudraksh

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आचार्य shukracharya के अनुसार – त्रिजुटी एक बहुत ही अलग प्रकार का रूद्राक्ष होता है। इस रूद्राक्ष में तीन रूद्राक्ष एक साथ जुड़े होते हैं, इसे trijuti Rudraksh गौरी पाठ रूद्राक्ष भी कहते हैं। यह शिव-पार्वती-गणेश यानि सम्पूर्ण शिव परिवार के रूप में पाया जाता है। यह रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ होता है, कभी-कभी कई साल में भी एक रूद्राक्ष पैदा नहीं होता है। यह रूद्राक्ष प्रजाति का सबसे दुर्लभ रत्न समझा जाता है। जितना फल एक मुखी रूद्राक्ष से, चैदह मुखी रूद्राक्ष, तथा गौरी-शंकर रूद्राक्ष सहित सभी रूद्राक्ष पहनने से मिलता है, उससे करोड़ों गुना फल श्री trijuti Rudraksh गौरी पाठ रूद्राक्ष दर्शन से ही प्राप्त हो जाता है। यह रूद्राक्ष एक तरह से अप्राप्य होता है, इसकी कीमत दो या तीन लाख रूपये तक होती है। गुरू जी Dr.R.B.Dhawan के अनुसार इस के दर्शन भी किसी भाग्य वाले को ही प्राप्त होते हैं, ऐसी ही मान्यता है। त्रिजुटी trijuti Rudraksh रूद्राक्ष प्रकृति का अजूबा है। तीन रूद्राक्ष पेड़ पर ही जुड़ जाते हैं। यानी कि गौरी-शंकर में एक रूद्राक्ष और मिल जाता है। त्रिजुटी के अनेक प्रकार हैं, पर तीनों दानें एक आकार व आकृति के हों, और समान रूप से जुड़े हों, यह दुर्लभ है। ऐसा दाना shukracharya संस्थान में उपलब्ध है। यह रूद्राक्ष कई वर्षों में एक बार उपजता है। यह ब्रह्याण्ड के मूल गुणों का प्रतीक है। इसे धारण करने मात्र से गुरू ब्रह्या, गुरू विष्णु, गुरू महेश की कृपा स्वतः प्राप्त हो जाती है। यह सम्पूर्ण व्यक्तित्व का सूचक है, और धारक को हर कठिनाई के समय पूरा साथ देता है। नेतृत्व एवं यश प्राप्ति में यह बहुत सहायक है। त्रिजुटी में मुख कितने भी हो सकते हैं। यह दिव्य रूद्राक्ष है, और धारक को इसकी विचित्र ऊर्जाओं के साथ तादात्म्य पाने में समय लगता है। विशेष परिस्थितियों में इसे धारण करने के बजाय केवल पूजा स्थान पर ही रख दिया जाता है।

त्रिजुटी रूद्राक्ष के साथ जपने योग्य मंत्र :- ॐ त्र्यंबकम् यजामहे सुगंधि पुष्टिवर्धनम उर्वारुकमिव बंधनान् मृत्योर्मोक्षीय मामृतात्।। (महामृत्युजय मंत्र) तथा ॐ नमः शिवाय।

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गर्भगौरी रूद्राक्ष Garbh Gori Rudraksh

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यह रूद्राक्ष गौरी-शंकर रूद्राक्ष का वह रूप है, जिसमें दो रूद्राक्ष एक दूसरे से जुड़े होते हैं, और इनमें से एक दाना दूसरे से छोटा होता है। असुर गुरु shukracharya का कथन है कि इस रुद्राक्ष को धारण करने से गर्भरक्षा होती है, यह भगवान गणेश और माता गौरी की शक्ति तथा सायुज्यता का घोेतक तथा प्रेमपूर्ण संबध का प्रतीक है, इसी लिए इस रूद्राक्ष को गर्भगौरी रूद्राक्ष कहते हैं। उपाय के रूप में यदि किसी गर्भवती को गर्भपात abortion का भय हो तो यह रूद्राक्ष धारण करने से गर्भरक्षा होती है। यह गौरी-शंकर रूद्राक्ष जैसा होता है, परंतु एक रूद्राक्ष छोटा और दूसरा सामान्य आकार का होता है। और जिसमें दो रूद्राक्ष प्राकृतिक ढंग से जुड़े हुये होते हैं। इस रूद्राक्ष को धारण करने से गर्भरक्षा होती है, और गर्भपात abortion होने के भय से मुक्ति मिलती है। किसी स्त्री के गर्भ धारण में शारीरिक कठिनाई हो या बार-बार गर्भपात abortion हो जाता हो तो यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करें।

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गणेश रूद्राक्ष, Ganesh Rudraksh

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गणेश रूद्राक्ष की पहचान यह है कि उस पर प्राकृतिक रूप से एक उभरी हुई सूंड की आकृति बनी रहती है, जैसा कि भगवान गणेश के मुख पर होती है।

सृष्टि का नियम है कि हमेशा से पढ़ने लिखने का युग रहा है, जिसके पास विद्या है, वह सम्माननीय होता है, एवं जिसके पास ज्ञान है वही पूजनीय होता है। समाज में लोग उसे आदर की दृष्टि से देखते हैं, Ganesh Rudraksha की यह विशेषता है की पढ़ने-लिखने वालों के लिये यह वरदान साबित होता है, तथा बच्चों के लिये भी अद्भुत रूप से लाभदायक होता है। आसुर गुरु shukracharya का कथन है कि गणेश रुद्राक्ष को धारण करने से स्मरण शक्ति तीव्र होती है, इस विषय में Dr.R.B.Dhawan का मानना है कि ganesh Rudraksha को धारण करने से विद्यार्थी को पढ़ा-लिखा याद रहता है, तथा बच्चों का पढ़ाई में मन लगता है, जिससे कि वह अच्छे अंकों से पास हो सकते हैं, तथा प्रतियोगिता परीक्षा में भी अद्भुत रूप से सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

जो बच्चे प्रतियोगिता परीक्षा में या फिर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें गणेश रूद्राक्ष ganesh Rudraksha अवश्य ही धारण करना चाहिये, ताकि वे अपने लक्ष्य तक पहुँच सकें, जिससे कि वह अपने जीवन में उच्च पद की प्राप्ति कर सकने में समर्थ हों। Ganesh Rudraksha धारण करने वाले पर श्री गणेश की विशेष अनुकम्पा होती है। धारण करने वाले व्यापारियों को यह बुद्धि, रिद्धि-सिद्धि प्रदान कर व्यापार में आश्चर्यजनक प्रगति देते हैं। यह रूद्राक्ष विघ्न-बाधाओं से रक्षा करता है। गणेश रूद्राक्ष ganesh Rudraksha को धारण करने से धारक का भाग्योदय होता है। सन्तान प्राप्ति में बाधा एवं वैवाहिक विलम्ब दूर हो जाते हैं। गणेश रूद्राक्ष के धारक को इसके चमत्कारी प्रभाव शीघ्र ही दिखाई देते हैं। विघ्न विनाशक गणेश माँ पार्वती एवं देवाधि देव भगवान शंकर की पूर्ण कृपा प्रदायक ये रूद्राक्ष दिव्य है, परम दुर्लभ भी है, विशेष रूप से संतान बाधा child problems एवं पुत्र-पुत्री के विवाह में आ रही बाधा को निश्चित रूप से दूर करके अविलम्ब कार्य सिद्धि प्रदान करता है। यह ‘गणेश रूद्राक्ष’ दुर्लभ होता है। इस रूद्राक्ष में 4, 5, 6, 7 या 8 धारियों के बीच में गणेश जी की शूंड की तरह का आकार बना होता है, अष्टमुखी और एकादश मुखी गणेश रूद्राक्ष का महत्व अधिक है, और इसे विशेष परिस्थितियों में ही धारण किया जाता है। व्यापार के लिए इसे बहुत शुभ मानते हैं। इसलिये यह अष्टमुखी गणेश रूद्राक्ष कहलाता है। इस रूद्राक्ष में अष्टसिद्धियों का एवं अष्टमातृकाओं का वास होता है, एवं नौ ग्रह में राहु देव का प्रतीक होता है, अतः जिस किसी जातक का जब राहु अशुभ हो, अथवा राहु की महादशा चल रही हो, उसे इस अष्टमुखी गणेश रूद्राक्ष को गले में धारण करना चाहिये इससे राहु अनुकूल प्रभाव देने लगता है।

देवगुरु बृहस्पति ओर आसुर गुरु shukracharya के अनुसार – अष्ठ मुखी गणेश रूद्राक्ष अत्यंत ही दुर्लभ एवं अद्भुत रूप से भाग्योदय कारक रूद्राक्ष होता है। अष्टमुखी रूद्राक्ष में गणेश रूद्राक्ष मिलना काफी कठिन होता है, अगर जिस किसी को यह प्राप्त हो जाये तो समझो उसके सौभाग्य का द्वार खोलने से उसे कोई नहीं रोक करता है तथा अद्भुत रूप से भाग्य उसका साथ देने लगता है। गणेश जी की कृपा से धारक को ऋद्धि-सिद्धि, बुद्धि, बल, चतुर्य की प्राप्ति एवं समस्त शत्रुओं का नाश होता है। पर सभी रूद्राक्ष उपलब्ध हैं।

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अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

Astrological products and astrology course के लिए विजिट कीजिए :- http://www.shukracharya.com

Astrology Course in Distance

SHUKRACHARYA

(Professional Astrological Course)

ज्योतिष/ज्योतिषीय पाठ्यक्रम पत्राचार से उपलब्ध –

परिचय- Shukracharya Astrological Research Centre, शुक्राचार्य (एस्ट्रोलाॅजिकल रिसर्च सेंटर) की स्थापना ज्योतिष जैसी वैदिक विद्याओं तथा अन्य भारतीय गूढ़ विद्याओं का विश्व स्तर पर प्रसार-प्रचार करने के उद्देश्य से Dr.R.B.Dhawan धवन द्वारा 1995 में की गई थीं, जिससे कि इस वैदिक विज्ञान वाले विषय की उपयोगिता का विश्वस्तर पर प्रकाश हो, और इसके उपयोग से मानवता की सेवा की जा सके।

संस्थान के मुख्य कार्यक्रम एवं उद्देशय:-
यह संस्थान प्राचीन वैदिक ज्योतिष vaidic astrology के आधार पर ज्योतिष विज्ञान में रूची रखने वाले जिज्ञासुओं को ज्योतिष विषय के पाठ्यक्रमों की सुविधा प्रदान करता है।

संस्थान के संस्थापक एवं मुख्य संचालक Dr.R.B.Dhawan जी हैं। ये अपनी टीम के साथ निरंतर अनुसंधान एवं शिक्षण कार्य में समर्पित भाव से कार्यरत हैं।

ज्योतिर्विद्या, हस्तरेखा-शास्त्र, अंक-शास्त्र, वास्तु शास्त्र, लाल किताब एवं ज्योतिषीय उपाय आदि विषयों की शिक्षा पत्राचार पाठ्यक्रम के माध्यम से उपलब्ध करवाई जा रही है।

पारम्परिक ज्योतिष एवं इससे जुड़ी अन्य सभी विद्याओं के ज्ञान को सुरक्षित रखने की दृष्टि से इन सभी अति विशिष्ट विद्याओं के अध्ययन अध्यापन की व्यवस्था करना संस्थान का मुख्य उद्देश्य है।

सम्पूर्ण भारतवर्ष में ज्योतिष विज्ञान के अध्यन अध्यापन हेतु क्षेत्रिय प्रशिक्षण केन्द्र खोलने का संकल्प। और उनके संचालन व देख-रेख हेतु क्षेत्रीय फ्रेन्चाईजी (सेंटर) आरम्भ करने का संकल्प है।

मुख्य केन्द्र (दिल्ली) तथा देश के सभी स्थानीय केन्द्रों में ज्योतिष तथा इस से सम्बंधित अन्य वैदिक विद्याओं की निरंतर कक्षाओं एवं शिक्षा (अध्यन अध्यापन) की व्यवस्था करवाना एक लक्ष्य है।

मुख्य केन्द्र (दिल्ली) तथा देश के सभी स्थानीय केन्द्रों में ज्योतिष तथा इस से सम्बंधित अन्य वैदिक विद्याओं vaidic astrology की पत्राचार पाठ्यक्रम द्वारा शिक्षा (अध्यन अध्यापन) के लिये व्यवस्था करना उद्देश्य है।

निरंतर तथा पत्राचार द्वारा देश के अधिकांश शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में ज्योतिष पठ्यक्रम उपलब्ध करवाने का लक्ष्य है।

मासिक ज्योतिषीय पत्रिका (वर्तमान में AAP ka Bhavishya) तथा अन्य उपयोगी पुस्तकें एवं सम्बंधित विषयों के मौलिक ग्रंथ, भाष्य और अनुवाद आदि प्रकाशित करना निरंतर जारी है।

ज्योतिष विज्ञान की पाठ्य पुस्तकों तथा अन्य आधुनिक माध्यमों जैसे-इलैक्ट्रानिक मीडिया, साॅफ्टवेयर, मोबाईल एप, कैसेट या सी. डी. इत्यादि के माध्यम से शोध-निष्कर्षों और भारतीय विद्याओं की उपयोगी अनुसंधानात्मक सामग्री को प्रकाशित करना निरंतर जारी है।

उपरोक्त विषय के विद्वानों को प्रोत्साहित कर उनके विचार प्रकाशित करना। संगोष्टियों तथा सभाओं का आयोजन कर विद्वानों को समय-समय पर सम्मानित करना तथा भारतीय वैदिक विद्याओं vaidic astrology के उत्थान में समर्पित अन्य संस्थाओं को सहयोग देना निरंतर जारी है।

उपरोक्त विद्याओं के विकास के लिये उपयोगी सामग्री जैसे- धर्म-ग्रंथ, सभी प्रकार की पूजा एवं साधना सामग्री, Jyotish software साफ्टवेयर एवं उपयोगी टी. वी. कार्यक्रमों की सी. डी. इत्यादि उचित मूल्य पर विद्वानों को उपलब्ध करवाना निरंतर जारी है।

शुक्राचार्य द्वारा उपलब्ध पाठ्यक्रम:-

वह विद्यार्थी जिन्हें ज्योतिष फलादेश या ज्योतिषीय गणना, अंकशास्त्र, वास्तुशास्त्र अथवा हस्तरेखा शास्त्र जैसे वैदिक विषयों की शिक्षा प्राप्त करने में रुचि है, वे शुक्राचार्य संस्थान द्वारा संचालित सर्टिफिकेट कोर्स Certificate Cource में प्रवेश ले सकते हैं। इन पाठ्यक्रमों को इस प्रकार बनाया गया है कि वह प्रत्येक विद्यार्थी के लिए व्यवसायिक उपयोग के लिये उपयोगी हों।

1. ज्योतिष दैवज्ञ (Jyotish Daivagya) :- यह पाठ्यक्रम नवीन विद्यार्थियों के लिए है, जो ज्योतिष जगत में पहला कदम रख रहे हैं, जो ज्योतिष शास्त्र horoscope के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। मूल रूप से यह एक स्वाध्याय उपकरण Astrological Hobby Course है। यह उन नये विद्यार्थीयों के लिये उपयोगी है, जो ज्योतिष जगत को समझकर ज्योतिष के पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेना चाहते हैं। इस पाठ्यक्रम में ज्योतिष की उत्पत्ति ज्योतिष शास्त्र की विशेषताएं, नक्षत्र व 9 ग्रहों का परिचय और स्वभाव, 12 राशियां और उनका स्वभाव तथा कुण्डली के 12 भावों का परिचय और उन भावों का फलादेश में प्रयोग, ग्रहों की दृष्टियां, ग्रहों की मैत्री-शत्रुता, ग्रहों की अवस्था इत्यादि समझाते हुये पंचांग देखना भी सिखाया जाता है। यह Certificate Cource है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

2. ज्योतिष दैवज्ञाचार्य (Jyotish Daivagyacharya) :– यह पाठ्यक्रम ज्योतिष शास्त्र की गहराइयों को समझने के लिये Professional Course है, इस पाठ्यक्रम में ज्योतिषीय फलादेश तथा ज्योतिषीय गणना के अतिरिक्त ग्रहों की युतियों, दृष्टियों को समझाते हुये फलादेश करने के गोपनीय सूत्र Secret Astrological formulas तथा जीवन के प्रमुख अंगों, अवसरों, सम्बंधियों, आर्थिक तथा व्यक्तिगत आवश्यकताओं, शारीरिक अंगों का फलादेश करना तथा जीवन की लगभग सभी आवश्यकताओं के लिये फलादेश करना समझाया जाता है। यह ज्योतिष पाठ्यक्रम ज्योतिष शास्त्र horoscope की गहराइयों को समझने की मुख्य सीढ़ी है। (एक प्रकार से जन्मपत्रिका का पूर्ण विवेचन करना सिखाया जाता है।) इस के द्वितीय भाग में खगोलीय परिचय, लग्न की गणना, ग्रहों की गणना, नक्षत्र nakshatra गणना वर्ग कुण्डलियों की रचना तथा प्रमुख खगोलीय (ज्योतिषीय) गणनायें, आधुनिक विधि से जन्मकुण्डली का निर्माण एवं ग्रहों की महादशा vimshotari mahadasha व अंतरदशाओं की गणना, अष्टकवर्ग Astakvarga गणना व अष्टकवर्ग निमार्ण की शिक्षा दी जाती है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।) Professional Astrological Course

3. ज्योतिष शिरोमणी (Jyotish Shiromani) :- यह पाठ्यक्रम ज्योतिष शास्त्र की गहराइयों को समझने के लिये Expert Astrology Cource है। इस पाठ्यक्रम के प्रथम भाग में अष्टकवर्ग की अतिरिक्त गणना, आयु की गणना तथा आयुविचार में जातक की आयु की गणना करना सिखाया जाता है।, कुंडली Kundli Milan मिलान एवं मुहूर्त की गणना, तथा वर्षफल गणना की पूर्ण जानकारी दी जाती है। द्वितीय भाग में कुण्डली मिलान एवं मुहूर्त आदि देखना। Astakvarga अष्टकवर्ग के अतिरिक्त फलादेश, कुंडली मिलान एवं फलादेश, मुहूर्त का फलादेश, तथा वर्षफल के फलादेश की पूर्ण रूप से जानकारी तथा प्रश्न कुण्डली prashna kundli के सिद्धांत एवं प्रश्न कर्ता के प्रश्न पूछने के समय की कुण्डली बनाकर उत्तर देना सिखाया जाता है। यह प्रश्न कुण्डली सिद्धांत इस पाठ्यक्रम में सिखाया जाता है। इस पाठ्यक्रम में विद्यार्थी प्रतिदिन काम आने वाली भविष्यवाणी vimshotari mahadasha फलादेश या मिलान एवं मुहूर्त आदि देख सकता है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 1वर्ष है।) Professional Astrological Course

4. ज्योतिष तत्ववेत्ता (Jyotish Tatvaveta) :- यह पाठ्यक्रम केवल शोध एवं अनुसंधान Astrological Research पर आधारित है। इस पाठ्यक्रम में शोध के लिए डाटा इकट्ठा कर अनुसंधान करवाया जाता है। ग्रंथों में दिए गए नियम कितने सही हैं? यह प्रमाणित करना एवं नए नियम प्रस्तावित करना इसका मुख्य उद्देश्य है। इसमें छात्रों को शोध पत्र Astrology Theses लिखना होगा, एवं पत्र पत्रिकाओं में छपवाना आवश्यक होगा। इसमें ग्रह-नक्षत्रों nakshatra के आधार पर कुण्डली के किसी एक भाव पर भी शोध कर सकते हैं, अथवा अपनी रूची तथा अर्जित ज्ञान के अनुसार- गोचर विचार, मांगलिक विचार, कुण्डली मिलान, प्रश्न-कुण्डली, अष्टकवर्ग फलादेश या पंचांग एवं मुहूर्त में से किसी भी एक विषय पर अनुसंधान कर सकते हैं। यह पाठ्यक्रम केवल शोध एवं अनुसंधान कार्य के लिए Dr.R.B.Dhawan द्वारा प्रस्तुत किया गया है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 1वर्ष है।)

5. अंक शास्त्राचार्य (Numerology) :- यह पाठ्यक्रम नवीन विद्यार्थियों के लिए है, जो अंक शास्त्र सीखना चाहते हैं, इस के द्वारा आप शुभ अंक एवं नामांक आदि के बारे में जान सकते हैं। नाम को भाग्यशाली व अनुकूल बनाना इसका मुख्य विषय है। इसमें अंकशास्त्र के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त करना तथा अंकशास्त्र के सामान्य सिद्धांतों के अनुसार अंकों का प्रयोग कर भविष्यफल ज्ञात करना सम्मीलित है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

6. अंक शिरोमणी (Adwance Numerology) :- इस पाठ्यक्रम में अंकशास्त्र के नियमों के अनुसार अंकों का हमारे जीवन में क्या महत्व है, तथा अंकशास्त्र से अपने नाम, कम्पनी के नाम, अपने एकाऊँट नम्बर या वाहन नम्बर को कैसे भाग्यशाली बना सकते हैं? विस्तार पूर्वक समझाया गया है यह पाठ्यक्रम अंकशास्त्र की द्वितीय सीढ़ी है, इसमें अंकों के अनुसार प्रश्न फल का विचार तथा पद्धति का फार्मूला भी दिया गया है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

7. वास्तु आचार्य (Vastushastra) :- यह पाठ्यक्रम नवीन विद्यार्थियों के लिए है, जो वास्तुशास्त्र के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त कर वास्तु विशेषज्ञ बनना चाहते हैं। इस में वास्तु के मूल ग्रन्थों का स्वाध्याय करना होता है। आर्किटेक्ट, बिल्डर एवं उन सब के लिए जो कोई भवन, कार्यालय आदि निर्माण करने का विचार कर रहे हैं, उनके लिए यह पाठ्यक्रम अत्युत्तम है। गृहिणीयों के लिये भी उपयोगी है, जो अपने घर या कार्यालय को वास्तु सम्मत सजाना चाहती हैं। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

8. वास्तु शिरोमणी (Adwance Vastushastra) :- पाठ्यक्रम के इस भाग में जो विद्यार्थी वास्तु नियम जानते हैं, लेकिन उनका उपयोग करने में सक्षम नहीं हैं, इसमें प्रवेश ले सकते हैं। इसमें वास्तु दोष एवं निवारण पर विशेष बल दिया जाता है। वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार अनेक प्रकार के उदाहरणों के द्वारा भवन, मंदिर, कार्यालय, फैक्ट्री इत्यादि में वास्तुदोष की बारीकियों को समझाते हुये उन दोषों का वास्तु अनुरूप निवारण दिया गया है। इस में वास्तु संबंधित उच्च स्तरीय उपायों का भी अध्ययन होता है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

9. हस्तरेखा आचार्य (palmistry) :- यह पाठ्यक्रम उन सभी नवीन विद्यार्थियों के लिए है जो हस्तरेखा विज्ञान सीखना चाहते हैं। जो हस्तरेखा शास्त्र के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। यह नये विद्यार्थीयों के लिये भी उपयोगी है, इस पाठ्यक्रम में हस्तरेखा परीक्षण के सामान्य सिद्धांतों के अतिरिक्त, हस्त की प्रमुख रेखाओं, चिन्हों, पर्वों व पवर्तों के अतिरिक्त शरीर लक्षणों Body Language को समझकर हस्त परीक्षण, अंगुष्ठ विचार, पर्व एवं चिह्न विचार एवं अनेक प्रकार की छोटी-बड़ी रेखाओं के बारे में बताया जाता है, जिससे कि हाथ देखकर भविष्यवाणी की जा सके। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

10. हस्तरेखा शिरोमणी (Adwance Palmistry) :- यह पाठ्यक्रम हस्तरेखा शास्त्र की गहराईयों को समझने की दूसरी सीढ़ी है, इस पाठ्यक्रम में हाथ की बनानट और भेद, ग्रह रेखाओं के अनुसार मानव स्वाभाव, हस्तरेखाओं के सभी 16 भेद, शुभ-अशुभ चिन्ह, अनेक महत्वपूर्ण हस्तरेखाओं और लक्षणों का तुलनात्मक विचार किया गया है। हस्तरेखा ज्ञान में पूर्णता हेतु यह पाठ्यक्रम आवश्यक है। इस पाठ्यक्रम में अनेक प्रकार के प्रश्न जैसे स्वास्थ्य, धन, व्यवसाय, शिक्षा, आयु आदि का विचार किया जाता है। अनेक प्रकार के उपायों के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाती है। मुखाकृति विज्ञान Face Reading की पूर्ण जानकारी भी इसमें दी जाती है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

11. लाल किताब आचार्य (Lal Kitab Acharya) :- पाठ्यक्रम के प्रथम भाग में लाल-किताब के नियमों के अनुसार ग्रहों का लाल किताब में प्रकार जैसे- अंधे ग्रह, रतांध ग्रह, धर्मी ग्रह, मुकाबले के ग्रह, टकराव के ग्रह इत्यादि के रहस्य विस्तार पूर्वक समझाये गये हैं। इस पाठ्यक्रम में लाल किताब के अनुसार वर्षफल बनाने तथा फलादेश का फार्मूला भी दिया गया है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

12. लाल किताब शिरोमणी (Adwance Lal Kitab Acharya) :- पाठ्यक्रम के इस भाग में लाल किताब के अनुसार प्रथम से लेकर द्वादश भाव तक का लाल किताब के अनुसार फलादेश, सूर्य से लेकर केतु तक सभी 9 ग्रहों का लाल किताब के अनुसार फलादेश, अनेक प्रकार की ग्रहस्थितियों एवं योगों का फलादेश तथा प्रत्येक ग्रह, भाव या योग के विपरीत प्रभाव को दूर करने के लाल किताब अनुसार उपाय दिये गये हैं। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

13. उपाय आचार्य (Remedial Astrology) :- यह पाठ्यक्रम ज्योतिषीय उपायों में रूचि रखने वाले उन जिज्ञासुओं व विद्यार्थियों के लिये स्वाध्याय उपकरण व प्रथम सीढ़ी है, जो उपाय-शास्त्र के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त करना तथा सामान्य सिद्धांतों के अनुसार उपायों का प्रयोग कर सकारात्मक परिणाम चाहते हैं। उपाय शास्त्र के सिद्धांतों को समझकर आगे के पाठ्यक्रम में प्रवेश ले सकते हैं। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

14. उपाय शिरोमणी (Adwance Remedial Astrology) :- इस पाठ्यक्रम में उपाय-शास्त्र के नियमों के अनुसार मंत्र-तंत्र का हमारे जीवन में क्या महत्व है, तथा शास्त्रीय प्रयोगों के द्वारा मारण-मोहन आदि भयंकर अभिचारों से रक्षा करने वाले, व्याधिनाश तथा कष्टकारी ग्रहों से रक्षा करने वाले, अकालमृत्यु शमन प्रयोग, ऐश्वर्य एवं आरोग्य प्रदायक प्रयोग, तथा नजरदोष की पहचान व उपाय सम्मीलित हैं। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

Shukracharya, F-265, Gali No 22, Laxmi Nagar, Delhi -110092, Tel. 011-22455184, mobile : 09810143516

जब राहु खराब हो

क्या करें, कुंडली में जब राहु खराब हो:-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

ज्योतिष के जनक महर्षि पराशर के अनुसार राहु ग्रह को पितामह (दादा), समाज एवं जाती से अलग लोग (विद्रोही भी), सर्प, सामाजिक जहर का फैलाना, क्रानिक बीमारियां, भय, विधवा, दुर्वचन, तीर्थ यात्रायें, निष्ठुर वाणी, विदेश में जीवन, त्वचा पर दाग, सरीसृप, महामारी, किसी महिला से अनैतिक संबन्ध, नानी, व्यर्थ के तर्क, भडकाऊ भाषण, बनावटीपन, दर्द और सूजन, डूबना, अंधेरा, दु:ख पहुंचाने वाले शब्द, निम्न जाति, दुष्ट स्त्री, जुआरी, विधर्मी, चालाकी, संक्रीण सोच, पीठ पीछे बुराई करने वाले, पाखण्डी, बुरी आदतों के आदी, जहाज के साथ जलमग्न होना, डूबना, रोगी स्त्री के साथ आनन्द लेना, अंगच्छेदन होना, डूबना, पथरी, कोढ, बल, व्यय,आत्मसम्मान, शत्रु, मिलावट दुर्घटना, नितम्ब, देश निकाला, विकलांग, खोजकर्ता, शराब, झगडा, गैरकानूनी, तरकीब से सामान देश से अन्दर बाहर ले जाना, जासूसी करना, आत्महत्या, विषैला, विधवा, पहलवान, शिकारी, दासता, शीघ्र उत्तेजित होने इत्यादि का कारक होता है

कौन कौन से दोष आ जाते हैं, राहु खराब होने पर :-

जैसे की कहा जाता है, पीपल की छाया में सोने वाले को किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता परंतु यदि बबूल की छाया में सोते रहें तो श्वास रोग या चर्म रोग हो सकता है।

इसी प्रकार ग्रहों की छाया का भी हमारे जीवन पर प्रभाव पढ़ता है। नवग्रहों में राहु ग्रह हमारी बुद्धि भ्रमित करता है, लेकिन जो चतुराई हमारी बुद्धि में पैदा होती है, उसका कारक भी राहु ही है। ज्योतिष शास्त्र में राहु के दोषपूर्ण या खराब होने पर जातक चतुराई से घोटाले तो करता है, परंतु एक दिन अपने ही बुने जाल में बुरी तरह फंस जाता है।

क्यों होता है राहु खराब ? :-

1 :- यदि कोई व्यक्ति अपने गुरु या फिर अपने धर्म का अपमान करता है, तो उस व्यक्ति का राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

2 :- यदि कोई व्यक्ति शराब का सेवन नियमित करता है, या फिर पराई स्त्री के साथ सम्बन्ध बनाने की इच्छा रखता है, तो उसका राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

3 :- यदि कोई व्यक्ति ब्याज वाले पैसों का प्रयोग घर में करता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

4 :- यदि कोई व्यक्ति चतुराई से किसी को धोखा देता है, और झूठ बोलने की आदत को नहीं छोड़ता तो उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देता है।

5 :- यदि कोई व्यक्ति हमेशा तामसिक भोजन करता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देता है।

6 :- यदि कोई व्यक्ति खाना हमेशा घर से बाहर खाता है, या बाहर का खाना हमेशा खाता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देने लगता है।

खराब राहु को कैसे पहचानेगे ? :-

1 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके ससुर, साले या साली से झगडा बढ़ने लगेगा।

2 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके सोचने की ताकत कम हो जायेगी।

3 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके जीवन में शत्रु बढ़ जायेंगे, और सोचने की क्षमता कम होने लगती है।

4 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके साथ दुर्घटना, पुलिस केस, या पत्नी के साथ लड़ाई झगडे में बढ़ोत्तरी हो जायेगी।

5 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वो व्यक्ति छोटी छोटी बातों पर गुस्सा होने लगता है, और लोगों के साथ सही तालमेल नहीं बिठा पाता है।

6 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उस व्यक्ति का एक तरह से दिमाग खराब होने लगता है, और उस व्यक्ति के सर में फालतू में छोटी छोटी चोट लगने लगती है या चक्कर आते हैं।

7 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वह व्यक्ति अधिक मदिरापान या फिर सम्भोग/हस्तमैथुन की तरफ भागने लगता है।

8 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो व्यक्ति नीच हरकते करने लगता है, और निर्दयी हो जाता है।

राहु ग्रह खराब होने से होने वाले रोग :-

1 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो सबसे पहले उसको गैस से सम्बन्धित शिकायत बढ़ने लगती है।

2 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके बाल झड़ने लगते हैं, तथा बवासीर से सम्बन्धित भी समस्या होने लगती है।

3 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वो जातक पागलों की तरह व्यवहार करेगा और लगातार मानसिक तनाव में रहेगा।

4 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके नाखून अपने आप ही टूटने लगते हैं और व्यक्ति के सर में पीड़ा या दर्द बनी रहती है।

5 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उस व्यक्ति को अचानक पता चलेगा की मुझे कोई बीमारी है और उस पर पैसा भी खूब खर्चा होगा तथा व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।

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अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

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संतान का योग

Dr.R.B.Dhawan

(Top astrologer in delhi,best astrologer in delhi)

“संतान होगी या नही?” इस विषय पर ज्योतिष शास्त्र में महर्षि पराशर ने बहुत स्टीक ग्रह गणना पद्धति प्रस्तुत की है। पुरुष के लिए “बीज स्फुट” और स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट”। हालांकि इस ग्रह गणना के परिणाम कोई अंतिम और निर्णायक नहीं हो सकते, किन्तु फिर भी, संतानोत्पत्ति के प्रश्न का उत्तर काफी हद तक स्पष्ट हो जाता है। वृहदपराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर कहते हैं- पुरूष का शुक्राणु (वीर्य) संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा अयोग्य! और यदि योग्य है, तो उत्तम है, या मध्यम श्रेणी का‌ है! इस प्रश्न का उत्तर बीज स्फुट गणना से देखना चाहिए-।

इसी प्रकार स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट” ग्रह गणना से अनुमान हो सकता है कि स्त्री का गर्भाशय संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा उत्तम या मध्यम है, या फिर अयोग्य है। महर्षि ने वृहद पराशर होरा शास्त्र में उल्लेख किया है कि जिस प्रकार उपजाऊ भूमि में उत्तम बीज बोया जाये तो अच्छी फसल होती है, मध्यम भूमि में उत्तम बीज से मध्यम श्रेणी की फसल होती है, और मध्यम भूमि में मध्यम श्रेणी का बीज परिणाम इसी अनुसार होता है। और इसी प्रकार बंजर भूमि में कितना ही उत्तम बीज बोने से परिणाम शून्य ही होता है। और मध्यम बीज से भी परिणाम शून्य होता है, इसी प्रकार स्त्री के गर्भाशय को महर्षि ने क्षेत्र बताते हुए कहा है कि, इस ज्योतिषीय गणना पद्धति से देखना चाहिए कि स्त्री का गर्भाशय स्वस्थ (गर्भ धारण योग्य) है या नहीं।

डाॅक्टर विभिन्न प्रकार कि जाँच करने के बाद भी जो नही बता पाते, वो ज्योतिषी चंद मिनटों मे गणना करके बता सकते हैं। दम्पत्ती के जीवन मे संतान होने या ना होने के विचार के लिये ज्योतिष मे पंचम भाव, पंचमेश, संतान कारक बृहस्पति आदि पर विचार करने के ज्योतिषीय नियम बताये गये हैं, किन्तु महर्षि पाराशर ने संतान के विषय में एक क्रान्तिकारी ज्योतिषीय सूत्र दिया है, सूत्र यह है- पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट कि गणना, तथा स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना करना। डाॅक्टर अनेक प्रकार कि जाँच करने के बाद भी यह ठीक से निर्णय नही कर पाते हैं कि समस्या पुरूष के शुक्राणुओं मे है, या स्त्री के गर्भाशय में। डाॅक्टर अनेक बार शारीरिक तौर पर पति-पत्नी को फिट बताते हैं, लेकिन फिर भी संतान के जन्म में बाधा उत्पन्न हो जाती है। लेकिन बीज स्फुट ओर क्षेत्र स्फुट कि गणना करके नि:संतान दंपत्ति को यह स्पष्ट रूप से बताया जा सकता है कि, रोग किसके शरीर में है।

क्या मेडिकल कि सहायता से संतान का जन्म हो सकेगा? बीज के वृक्ष बनने के लिये उसे उपजाऊ भूमि कि आवश्यकता होती है, अगर भूमि बंजर है तो बीज वृक्ष ना बन सकेगा। स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना गर्भ के ठीक भूमि कि तरह उपजाऊ, बंजर या मध्यम होने का पता लगाने जैसा है। अगर स्त्री कि जन्मकुंडली मे क्षेत्र स्फुट सही आता है ओर पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट मध्यम आता हो या सही नही आता है तो मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय वहाँ निःसंतान दंपत्ति कि सहायता कर सकते है। लेकिन क्षेत्र स्फुट के खराब होने पर मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय सहायक नही हो पाते है।

आज के समय मे चिकित्सा विज्ञान के साथ यदि ज्योतिष विज्ञान को जोड़कर कार्य किया जाये तो चिकित्सा विज्ञान ओर अधिक सरल बन सकेगा। कुंडली में संतानोत्पत्ति और संतान सुख के लिए विशेष तौर पर पंचम भाव से देखा जाता है, किंतु कुंडली विश्लेषण करते समय हमें बहुत से तथ्यों पर ध्यान देना बहुत ही आवश्यक है। संतान के सुख-दु:ख का विचार सप्तमेश, नवमेश, पंचमेश तथा गुरु से किया जाता है। नवम स्थान जातक का भाग्य स्थान भी है, और पंचम स्थान से पांचवा स्थान भी होता है, इस कारण भी नवमेश पर दृष्टि रखना बतलाया गया है। बृहस्पति संतान और पुत्र का कारक है, अतएव बृहस्पति पर दृष्टि रखना आवश्यक है।

इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पुराने शास्त्रों में एक मंत्र लिखा है, कारकों भावः नाशयः इसका अर्थ यह हुआ कि जिस भाव का जो कारक होता है, वह उस भाव में स्थित हो तो, उस भाव का नाश करता है। इसलिए गुरु यदि पंचम भाव में हो तो बहुत बार देखा गया है कि संतान संबंधी चिंता व कष्ट रहते हैं। लग्न, चंद्रमा और बृहस्पति से पंचम भाव यदि पाप ग्रहों से युत अथवा दृष्ट हो, शुभ ग्रहों से युति या दृष्ट ना हो तो तीनो पंचम भाव पापग्रहों के मध्य पापकर्तरी स्थित हो तथा उनके स्वामी त्रिक 6 8 12 वे भाव में स्थित हो तो, जातक संतानहीन होता है। फलित शास्त्र के सभी ग्रंथो में इसका उल्लेख मिलता है।

अनेक प्राचीन विज्ञजनों ने यह लिखा है कि, यदि पंचम भाव में वृषभ, सिंह, कन्या अथवा वृश्चिक राशि हो तो, अल्प संतति होती है, या दीर्घ अवधि के बाद संतान लाभ मिलता है। ज्योतिष में हर विषय पर बहुत ही विस्तृत और बहुत ही बड़ा साहित्य मिलता है, और अनेक प्रकार के उपाय या विधियां दी हुई हैं, लेकिन मुख्य तौर पर कुछ सूत्र हैं, जिनके आधार पर हम संतान योग को अच्छी तरह से पता लगा सकते हैं, इसमें सबसे बड़ा सूत्र है बीज स्फुट और क्षेत्र स्फुट। बीज स्फुट से तात्पर्य पुरुष की कुंडली के ग्रहो की स्तिथि से है। अगर कोई फसल बोई तो बीज हमको उत्तम चाहिए यदि बीज अच्छा नहीं होगा तो कभी भी फसल अच्छी नहीं होगी। इसी प्रकार क्षेत्र स्फुट मतलब हम खेत से भी समझ सकते हैं,‌ यदि खेत अच्छा नहीं होगा तो कितने भी अच्छे बीज बो देवें उसके अंदर फसल अच्छी नहीं होगी, अतः पुरुष की कुंडली में बीज स्फुट और स्त्री की कुंडली मे क्षेत्र स्फुट की गणना बतलाई गयी है, जिससे भी संतान योग का अंदाज लगाया जा सकता है।

बीज स्फुट की गणना में हम पुरुष की कुंडली में सूर्य गुरु और शुक्र के भोगांश को जोड़कर एक राशि निकालते हैं, यदि वह राशि विषम होगी और नवांश में भी उसकी विषम में स्थिति होगी तो बीज शुभ होगा, और साथ ही यदि एक सम और दूसरा विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों सम राशियां होगी तो, अशुभ फल होंगे, और बीज अशुभ होगा।
स्त्री की कुंडली में क्षेत्र स्फुट की गणना में हमें चंद्रमा मंगल और गुरु के भोगांशों को जोड़ना पड़ेगा, और भोगांशो को जोड़ने के बाद जो राशि आएगी वह राशि यदि सम होगी और नवमांश में भी उसकी सम स्थिति होगी तो, क्षेत्र स्फुट अच्छा होगा साथ ही एक सम व दूसरी विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों विषम हुई तो अशुभ फल होंगे व स्त्री सन्तान उत्पन्न करने में सक्षम नही होगी।

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