विवाह बाधा योग का निवारण?

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

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कैसे हो, विवाह बाधा योग का निवारण ? यदि इस प्रश्न पर हम ज्योतिषीय संदर्भ में विचार करें तो उत्तर होगा कि मनोनुकूल पत्नी/पति पाना लड़का/लड़की के हाथ में नहीं है। इसके पीछे भारतीय धर्म, सिद्धांत में पुनर्जन्म का सिद्धांत कार्य करता है।

वस्तुत: मनुष्य अपने पूर्वजन्मार्जित कर्मों के अनुसार कर्म फल भोगने के लिये संसार में जन्म लेता है। विधाता तद्नुसार उसका भाग्य निर्धारण कर देते हैं। कौन किसका पति बनेगा और कौन किसकी पत्नी यह भी विधाता के द्वारा तय कर दिया जाता है। वैसे ही योग जन्मांग में दिखाई देते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार लड़कियों की कुंडली में गुरू पति सुख का कारक ग्रह होता है, और लड़कों की कुंडली में शुक्र। कुंडली का सप्तम भाव दाम्पत्य सुख का स्थान होता है। अतः सप्तम स्थान, सप्तमेश तथा गुरू/शुक्र की स्थिति से ही तय होता है कि लड़के/लड़की को कैसा पत्नी पति मिलेगा? भले ही वह अपने मन में कैसे भी पत्नी पति की स्वप्न सजाये हुए हो।

विवाह बाधा योग लड़के, लड़कियों की कुंडलियों में समान रूप से लागू होते हैं, अंतर केवल इतना है कि लड़कियों की कुंडली में गुरू की स्थिति पर विचार तथा लड़कों की कुंडलियों में शुक्र की विशेष स्थिति पर विचार करना होता है।

(1) यदि कुंडली में सप्तम भाव ग्रह रहित हो और सप्तमेश बलहीन हो, सप्तम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तो, अच्छा पति/पत्नी मिल पाना संभव नहीं हो पाता है।

(2) सप्तम भाव में बुध-शनि की युति होने पर भी दाम्पत्य सुख की हानि होती है। सप्तम भाव में यदि सूर्य, शनि, राहू-केतू आदि में से एकाधिक ग्रह हों अथवा इनमें से एकाधिक ग्रहों की दृष्टि हो तो भी दाम्पत्य सुख बिगड़ जाता है।

(3) यदि कुण्डली में सप्तम भाव पर शुभाशुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो पुनर्विवाह की संभावना रहती है। नवांश कुंडली में यदि मंगल या शुक्र का राशि परिवर्तन हो, या जन्म कुंडली में चंद्र, मंगल, शुक्र संयुक्त रूप से सप्तम भाव में हों, तो ये योग चरित्रहीनता का कारण बनते हैं, और इस कारण दाम्पत्य सुख बिगड़ सकता है।

(4) यदि जन्मलग्न या चंद्र लग्न से सातवें या आठवें भाव में पाप ग्रह हों, या आठवें स्थान का स्वामी सातवें भाव में हो, तथा सातवें भाव के स्वामी पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो, तो दाम्पत्य सुख की कल्पना करना भी मुश्किल है।

(5) यदि नवम भाव या दशम भाव के स्वामी, अष्टमेश या षष्ठेश के साथ स्थित हों, या लग्नेश तथा शनि बलहीन हों, चार या चार से अधिक ग्रह कुंडली में कहीं भी एक साथ स्थित हों अथवा द्रेष्काण कुंडली में चन्द्रमा शनि के द्रेष्काण में गया हो, और नवांश कुंडली में मंगल के नवांश में शनि हो, और उस पर मंगल की दृष्टि हो या सूर्य, गुरू, चन्द्रमा में से एक भी ग्रह बलहीन होकर लग्न में दशम में, या बारहवें भाव में हो और बलवान शनि की पूर्ण दृष्टि में हो, तो ये योग जातक या जातिका को सन्यासी प्रवृत्ति देते हैं, या फिर वैराग्य भाव के कारण अलगाव की स्थिति आ जाती है, विवाह की ओर उनका लगाव बहुत कम होता है।

(6) यदि लग्नेश भाग्य भाव में हो तथा नवमेश पति स्थान में स्थित हो, तो ऐसी लड़की भाग्यशाली पति के साथ स्वयं भाग्यशाली होती है। उसको अपने कुटुम्बी सदस्यों द्वारा एवं समाज द्वारा पूर्ण मान-सम्मान दिया जाता है। इसी प्रकार यदि लग्नेश, चतुर्थेश तथा पंचमेश त्रिकोण या केंद्र में स्थित हों तो भी उपरोक्त फल प्राप्त होता है।

(7) यदि सप्तम भाव में शनि और बुध एक साथ हों और चंद्रमा विषम राशि में हो, तो दाम्पत्य जीवन कलहयुक्त बनता है और अलगाव की संभावना होती है।

(8) यदि जातिका की कुुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश एवं गुरू तथा जातक की कुण्डली में सप्तम भाव सप्तमेश एवं शुक्र पाप प्रभाव में हों, तथा द्वितीय भाव का स्वामी छठवें, आठवें या बारहवें भाव में हो, तो इस योग वाले जातक-जातिकाओं को अविवाहित रह जाना पड़ता है।

(9) शुक्र, गुरू बलहीन हों या अस्त हों, सप्तमेश भी बलहीन हो या अस्त हो, तथा सातवें भाव में राहू एवं शनि स्थित हों, तो विवाह नहीं होता है।

(10) लग्न, दूसरा भाव और सप्तम भाव पाप ग्रहोें से युक्त हों, और उन पर शुभ ग्रह की पूर्ण दृष्टि न हो, तो विवाह नहीं होता है।

(11) यदि शुक्र, सूर्य तथा चंद्रमा पुरूषों की कुंडली में तथा सूर्य, गुरू, चंद्रमा, महिलाओं की कुंडली में एक ही नवांश में हों, तथा छठवें, आठवें तथा बारहवें भाव में हों, तो भी विवाह नहीं होता है।
इस प्रकार ज्योतिषीय ग्रंथों में अनेकानेक कुयोग मिलते हैं जो या तो विवाह होने ही नहीं देते हैं, अथवा विवाह हो भी जाये तो दाम्पत्य सुख को तहस-नहस कर देते हैं।

बाधा निवारण हेतु कुछ उपाय:-
इन कुयोगों को काटने के लिए शिव-पार्वती का अनुष्ठान, माँ दुर्गा जी की पूजा अर्चना, कारक ग्रहों के रत्न धारण करना, कुयोग दायक ग्रहों से संबधित मंत्र जप, पूजा अनुष्ठान, दानादि करने से बाधाओं का निराकरण हो जाता है।

(1) वे कन्यायें जिनकी शादी में किसी कारण विलम्ब बाधायें आ रही हों, तो वे इस मंत्र का जप नियमित करें तो उन्हें मनोवांछित वर प्राप्त होता है।

एंव देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः।
सूर्याज्जनम समासाद्य सावर्णिभतिता मनुः।।

(2) वे युवक जिनका किसी कारण से विवाह नहीं हो रहा हो, इस मंत्र का नियमित जप करें तो उन्हें मनोवांछित पत्नी प्राप्त होती है।

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिहणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भ्वाम्।।

(3) गुरूवार का व्रत, सोमवार का व्रत एवं लड़कों के लिए शुक्रवार का व्रत करने से शादी की शीघ्र संभावना बनती है।

(4) माँ कात्यायिनी देवी का मंत्र जाप भी शादी में आने वाली बाधाओं को दूर कर देता है।

‘‘कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरी।
नंद गोप सुतं देवि पतिं में कुरूते नमः’’।

(5) माँ पार्वती के निम्नलिखित मंत्र का नियमित जप करने से भी शीघ्र विवाह की संभावना बनती है।

‘‘हे गौरि शंकरार्धागि यथा त्वं शंकरप्रिया।
तथा माँ कुरू कलयाणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्।।

(6) श्री रामचरितमानस में सीता जी द्वारा गिरिजा पूजन प्रसंग ‘जय-जय गिरिवर राज किशोरी’ से लेकर सोरठा– जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरष न जात कहि। मंगल मंजुल मूल, बाम अंग फरकन लगे।। तक का पाठ करना अथवा राम-जानकी विवाह प्रसंग चैपाई ‘‘समय बिलोकि बशिष्ठ बोलाए। सादर सतानंद सुनि आए।।’’ से लेकर दोहा-

मुदित अवध पति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि।
जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि।।

का पाठ करना चाहिए। इस पाठ को करने से पहले राम-जानकी का फोटो अपने सामने रखें। संकल्प लेकर पाठ करें और अंत में समर्पण कर दें।

(7) यदि विवाह में बाधा का कारण मंगल हो, तो मंगल चंडिका स्तोत्र का पाठ एवं मंगल चंडिका मंत्र का जप करने से भी विवाह हो जाता है। गणेश जी की जप पूजा भी विवाह बाधा का निवारण करती है।

(8) अघोर गौरी का मंत्र भी विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करता है। यह मंत्र इस्लामी साधना का मंत्र कहलाता है। इस मंत्र को प्रतिदिन 1000 बार जपना चाहिए। इसमें रूद्राक्ष की माला का प्रयोग नहीं करते हैं। ऊनी आसन पर पश्चिम की ओर मुख करके बैठा जाता है। सुगंधित अगरबत्ती जलाई जाती है। इसका जप उसी लड़की को करना होता है जिसकी शादी में बाधायें आ रही हों:-

मखनो हाथी जर्द अम्बारी उस पर बैठी कमाल खाँ की सवारी कमाल खाँ कमाल खाँ मुगल पठान बैठे चबूतरे पढ़े कुरान हजार काम दुनिया का करे एक काम मेरा कर ना करे तो तीन लाख तैंतीस हजार पैगम्बरों की दुहाई।

(9) यह एक अनुभूत उपाय है। इसे मैंने कई बार आजमाया है। पीला पुखराज कम से कम सवा पाँच रत्ती वजन का सोने की अँगूठी में गुरूवार के दिन बायें हाथ की तर्जनी में पहना दिया जाये और कम से कम सात रत्ती वजन का फिरोजा चाँदी की अंगूठी में शुक्रवार के दिन बायें हाथ की कनिष्ठिका में धारण किया जाये तो शादी की शीघ्र संभावना बनती है।
इस प्रकार विभिन्न प्रकार के उपाय विवाह बाधा निवारण हेतु मिलते हैं इनमें धारण करने के यंत्र भी सम्मिलित हैं जिन्हें अपनाकर बाधा निवारण किया जा सकता है और दाम्पत्य सुख पाया जा सकता है। यदि कुंडली में वैधव्य योग हों तो शादी के पहले घट विवाह, अश्वत्थ विवाह, विष्णु प्रतिमा या शलिग्राम विवाह में से कोई न कोई विवाह सम्पन्न कराकर विवाह करना चाहिए।

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प्रेमी-प्रेमिका और शुक्र

प्रेम और विलासिता का कारक शुक्र :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

प्रेमी-प्रेमिका में झगडे क्यों होते हैं? आईये इसका कारण ज्योतिष शास्त्र से जानते हैं- किसी भी जन्मकुण्डली में प्रेमी का स्थान पाँचवां होता है, जातक का अपना स्थान प्रथम स्थान है। अच्छी रिलेशनशिप तभी रह सकती है, जब प्रथम स्थान के स्वामी ग्रह और कुण्डली से पाँचवे स्थान के स्वामी ग्रह मित्र होंगे। यह तो हुई साधारण बात, अब यह भी देखना होगा की जातक की रिलेशनशिप से किसी दूसरे का हाजमा तो खराब नहीं हो रहा ? :- (रिलेशनशिप से प्राब्लम) कहीं वह गुप्त दुश्मनी तो नहीं निभा रहा ? यह पता चलेगा जातक की कुण्डली के पंचमेश की सेहत देखने से! पंचमेश की सेहत खराब करने के लिये कुण्डली के षष्ठेश या अष्ठमेश जिम्मेदार हो सकते हैं, अर्थात् पंचमेश षष्ठ या अष्ठम में नहीं होना चाहिए, अथवा षष्ठेश या अष्ठमेश के साथ नहीं होना चाहिए, या फिर षष्ठेश या अष्ठमेश पंचम में नहीं होना चाहिए। यह तो हुई बड़ी वजह, इसके अतिरिक्त एेसा भी हो सकता है की जातक का कोई सगा सम्बंधी ही इस खेल को बिगाड़ने में लगा हो।

वैवाहिक सुख का कारक ग्रह शुक्र :-

आज का युग बहुत तेज गति से शुक्र प्रधान हो रहा है, बेशक ज्योतिष के विद्वानों को मेरी यह बात कुछ अटपटी सी लगेगी। परंतु तथ्य यही बताते हैं कि बढ़ी तेजी से यह युग बदल रहा है। पहले एक छोटा सा उदाहरण प्रस्तुत है- आज से 50-100 वर्ष पूर्व लोग या तो पैदल यात्रा करते थे या फिर पशुओं का अथवा पशुओं द्वारा चलित वाहनों का प्रयोग करते थे। अर्थात् गुरू (जीव प्रधान) वाहन का प्रयोग किया जाता था। जो आज धीरे-धीरे करके आरामदायक (शुक्र प्रधान) वाहन ने ले ली है। पशुओं से चलने वाले वाहनों की जगह अब स्वचालित लग्जरी वाहनों ने ले ली है। इस प्रकार प्राणीयों का प्रतीक गुरू शीण हो गया है। दूसरा उदाहरण- एक जमाना था जब बड़ी-बूढी अपनी बहुओं को आशिर्वाद देती थी- “दूधों नहाओ पूतों फलो” आज इसमें से दूधों नहाओ तो ठीक है, परंतु “पूतों फलो” भला किस नवविवाहिता को पसंद आती है? इस आशिर्वाद का पूतों फलो वाला भाग भी गुरू का विभाग है। जो नवविवाहिता बहुओं को पसंद नहीं, क्योंकि अधिक संतान के लिये आज इस वर्ग के विचार बदल गये हैं, यहाँ भी गुरू निर्बल प्रतीत होता है। तीसरा उदाहरण- विद्वान, आचार्य व गुरू जो अपने प्रवचन के द्वारा समाज को धर्म के मार्ग पर चलने के लिये दिशा दिखाने का कार्य करते थे, आज इन्हें सुनने का समय किसके पास है, यदि गलती से कहीं आमना-सामना हो भी जाये तो आज की नई पीढ़ी उनसे जान छुडाना चाहते हैं। इसी प्रकार वह अध्यापक जिनके चरण छूकर विद्यार्थी मान-सम्मान करते थे, आज वह कितनी दयनीय स्थिति में हैं? यह अध्यापक एेसे शिल्पकार हैं, जिनसे शिक्षा पाकर विद्यार्थीकाल अपने और देश के भाग्य का निर्माण करने की ताकत रखते हैं, परंतु जिस गुरू ने उन्हें इस योग्य बनाया है। उस गुरू की कितनी इज्जत हो रही है? किसी से छिपा नहीं। क्या यह गुरू का बल कम नहीं हो रहा? दूसरी ओर शिक्षा का आधुनिकीकरण करती शिक्षण संस्थायें (शुुक्र) फल-फूल रही हैं। एक उदाहरण और देता हूँ- बच्चे जवान हो जायें तो आज कितने एेसे माता-पिता हैं जिन्हें कन्या के लिये वर और बालक के लिये वधु ढूडने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। माता-पिता द्वारा पसंद युवक के लिये युवती, तथा कन्या के लिये वर (गुरू बल) के स्थान पर आजकल लव मेरिज (शुक्र बल) का प्रचलन अधिक हो चला है। आध्यात्मिकता, सहनशीलता, विवेक, बुद्धिमत्ता तथा अध्ययनशीलता (गुरू) की जगह आज सुंदरता, विलासिता और अश्लीलता (शुक्र) ने ले ली है। अब आप ही बतायें पूर्वकाल में विश्वगुरू कहलाने वाला हमारा भारत आने वाले कुच्छ ही वर्षों में क्या कहलायेगा ?

प्रेम सम्बन्ध :-
अब देखते हैं, जन्म कुंडली मे कौन से एेसे योग होते हैं, जो प्रेम संबंध की सूचना देते हैं- कब ये शारीरिक सम्बन्ध स्तर पर भी होते है ? क्या कुण्डली में ऐसी स्थितियाँ भी है जो संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा तनाव भी देंगी ? क्या ये संबंध दुनियाँ से छिपे रह सकते है ? क्या प्रेम संबंधों में अलगाव (Break up) तो नही है ? क्या एक से अधिक भी प्रेम संबंध होंगे ? क्या प्रेम संबंध विवाह में परिणित होगें ? यह सब प्रश्न हैं आज के युवा वर्ग के।
भारतीय ज्योतिष पद्धति के द्वारा हम इन सभी स्थितियों को जन्म पत्रिका के माध्यम से देख सकते हैं ।और विश्लेषित भी कर सकते हैं, और उस समय विशेष की गणना भी कर सकते हैं । जब इनमे से कोई भी स्थिति हमारे जीवन मे घटित होगी ? आईये देखें जन्म पत्रिका में कौन सी स्थितियाँ बनाती है प्रेम संबंध ?- जन्म कुण्डली का पंचम भाव (5th house) हमारी कला कौशल के साथ प्रेम तथा भावनाओं का ओर दिल से किये गए कार्य का स्थान होता है । जन्म कुंडली मे चंद्रमा, शुक्र और मंगल प्रमुख ग्रह हैं, जो अपने आपसी सम्बन्धो के आधार पर व्यक्ति को एक विशेष आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करते हैं, तथा जातक को प्रेम करने को वशीभूत करते हैं। चंद्रमा मन का कारक है । जन्म पत्रिका में मजबूत चंद्रमा विचारों को शक्ति प्रदान करता है। मन में कल्पनाशीलता ओर भावनाएँ जगाता है, और जातक परम्पराओ को तोड़कर दुनिया की परवाह किये बगैर प्रेम के रास्ते पर आगे बढ़ता है, जब कुण्डली में चंद्रमा का संबध किसी भी प्रकार से शुक्र से होता है तो, व्यक्ति प्यार में कल्पनाओ की उड़ान भरता है, और शीघ्र ही विपरीत लिंग की तरफ आकर्षित हो जाता है।

जन्म कुंडली में मंगल + शुक्र का संबंध जब जन्म कुंडली में 1, 2, 3, 5, 7, 11,12 भावो में बनता है, तब व्यक्ति आकर्षण का केंद्र होता है, और साथ ही स्वयं भी विपरीत लिंग की ओर शीघ्र आकर्षित होता है।जन्म कुंडली में जब इन स्थितियों के साथ पंचम भाव तथा पमचमेश से संबंध बनाने वाले किसी भी ग्रह की अथवा चंद्रमा, शुक्र, मंगल से संबंधित दशाएँ अन्तरदशाएँ आती हैं तो, जातक प्रेम करता है ।

जब पंचम भाव अथवा पंचमेश का शुभ संबंध केंद्र त्रिकोण से अथवा एकादश भाव (11th house) से शुभ भावों में होता है तो, ये सच्चा ओर आदर्श प्रेम संबध होता है । यदि इन संबंधों में द्वादश भाव भी सम्मलित हो जाता है तो, ये प्रेम शारीरिक स्तर पर भी प्रकट हो जाता है। जब इन सम्बन्धो में द्वादश भाव के साथ अष्टम भाव या अष्टमेश सम्मलित होता है तोे, संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा, तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है । जब प्रेम संबंधों में सप्तम भाव अथवा सप्तमेश का समावेश होता है तो, ये संबंध अन्य स्थितियों के सकारात्मक होने पर प्रेम विवाह में परिणित हो जाते हैं। शुभ गुरु और शनि प्रेम संबंधों ओर विवाह की स्थितियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां तक कि इनसे गुरु का सबंध कभी भी प्रेम संबंधों को दुनियां के समक्ष उजागर तक नही होने देता ।

सभी वर्ग कुंडलियों, अष्टक वर्ग, ग्रहो के किसी विशेष बल, कुण्डली में बने विशेष संबंधों ओर योगायोगों का, संबंधित शुभ अशुभ दशाओं अन्तरदशाओं, संबंधित शुभ अशुभ गोचर का गहन अध्ययन तथा विश्लेशण करने के बाद ही कहा जा सकता है कि – प्रेम संबधो का कोई दर्दनाक अंत होगा या ये संबंध विवाह के रूप में जीवन को महकाएँगे! जन्म कुंडली मे जैसा दिखता है वैसा कभी नही होता, और जो होता है वह तो बहुत ही गहराई में ही छिपा है, जिसे देख पाना गहन कुण्डली विश्लेषण से ही संभव होता है। कुछ आसान, आवश्यक तथा सही समय पर किये गए सही उपाय, कुछ जन्म पत्रिका के अनुसार सकारात्मक ग्रहों का सहयोग, और कुछ सही मार्ग का चयन और सही दिशा में किया गया परिश्रम। सुखी और खुशियों से भरा जीवन दे सकते हैं।

एक निश्चित आयु में प्रत्येक युवक अथवा युवती की उत्कृट इच्छा रहती है कि उसे अपने मनोनुकूल सुंदर जीवन साथी मिले। एेसे हार्दिक तथा प्रबल आकर्षण का मूल श्रोत संगीत, आदर्षवादिता, कला-क्रीड़ा-सौंदर्य एवं शारीरिक विधान तथा प्रसाधन में ही अंतर्निहित है। उत्तरोत्तर परिवर्तनीय सभ्यता संस्कृति के कारण हमारे देश में भी पाश्चात्य देशों की तरह परिवार की सम्मति अथवा स्वीकृति का महत्व समाप्त होता जा रहा है, युवक व युवतियों का दृष्टिकोण इस प्रसंग में दिनानुदिन लोचपूर्ण तथा उदार होता जा रहा है, अतः स्वजातीय विवाह arenge marriage की अपेक्षा अंतर्जातीय विवाह love marriage की ओर इनका रूझान होता जा रहा है। ज्योतिष शास्त्र की दृिष्टि से देखें तो ज्ञात होता है कि ज्योतिष भी इन बंधनों को नही मानता। इसका मूल कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन ग्रहों के मूलभूत सिद्धांतों पर निर्भर है। अतएव युवक-युवतीयों अथवा नर-नारियों के प्रेम विवाह Love marriage की भावी संभावनाओं का निरूपण प्रस्तुत करना मेरी इस पुस्तक “विवाह एवं दाम्पत्य सुख” का एक उद्देश्य है। विवाह एवं दाम्पत्य सुख (Marriage & Happy Married Life) हाल ही में प्रकाशित हुई नयी पुस्तक है। इस पुस्तक में विवाह सुख के योग, विवाह में क्यों विलम्ब marriage delay होता है? विवाह के लिये तथा विवाहित दम्पतियों के गृहस्थ सुख में बाधाओं का निवारण marriage Life problems and solutions बताया गया है। अभी तक मेरी 10 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन सभी की जानकारी http://www.shukracharya.com पर उपलब्ध है।

मेरे और लेख देखें :- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in, gurujiketotke.com,vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com पर भी।