ज्योतिष या अंधविश्वास ?

ज्योतिष अंधविश्वास नहीं, विज्ञान है :-

Dr.R.B.Dhawan

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अनेक लोग कुण्डली दिखाते समय प्रश्न करते हैं कि क्या मेरी किस्मत ही खराब है, कब और कैसे अच्छे दिन आयेंगे? अर्थात अच्छे के लिये अच्छी किस्मत या भाग्य का योगदान जरूरी है। दूसरी तरफ बहुत से लोग हैं, जो किस्मत जैसी किसी चीज को स्वीकार ही नहीं करते। और उनका कहना है कि जो कुछ मिलता है, कर्म करने से ही मिलता है। वास्तव में देखा जाए तो दोनों ही बातें सही हैं। एक तरफ कर्म का चक्र चल रहा है, और दूसरी ओर जीवन चक्र। कर्म चक्र वो चक्र है जिसमें मनुष्य कर्म करता है और कर्म का कुछ फल मिल जाता है, और शेष कर्मफल भविष्य काल के लिए संचित हो जाता है, क्योंकि उस समय कर्मफल के लिए उचित समय या वातावरण उपलब्ध नहीं होता। इस लिए भविष्य में जब भी उस कर्मफल को उचित वातावरण मिलता है, उसी समय वह कर्मफल अंकुरित होकर पोधा और फिर वृक्ष बनकर अपना फल देेेने लगता है।

भाग्य या किस्मत क्या है? :- भाग्य का अर्थ यह है, बिना परिश्रम किये सुख के साधन मिलना। भाग्य या किस्मत संचित कर्म से बनता है, कर्म के बाद हर कर्म का फल न भोग पाना इसका कारण है, जीवन चक्र सीमित वर्ष का होता है। मित्रो हम जो भी कर्म करते हैं, प्रकृति उस कर्म की प्रतिक्रिया करती है, इसी को कर्मफल कहते हैं। “क्रिया की प्रतिक्रिया” या कर्म और कर्म का फल एक ही बात है।

इस प्रकार मनुष्य अपने जीवनकाल में कुछ कर्मों का फल इस जीवन तथा शेष कर्मों का फल पुनर्जन्म प्राप्त होने पर ही भोग पाता है।

एक तरफ मनुष्य कर्म करता है, दूसरी ओर भाग्य (कर्मफल) भोगता है। अर्थात् कर्म भी करता चला जाता है, दूसरी और भाग्य का भोग भी भोगता रहता है। इस लिये मनुष्य यदि भाग्य को जानकर कर्म करे तभी हर प्रकार से सफल जीवन व्यतीत कर सकता है।

मेरा अपना विचार है कि चांद तारों से हम और चांद तारे हमसे प्रभावित होते हैं, क्योंकि प्रभाव कभी एक तरफा नहीं होता। सूर्य पर दाग दिखाई पड़ते हैं और तूफान उठते हैं, या धरती पर बीमारियाँ फैलती हैं। विश्वास करो एक छोटा सा तिनका भी सूर्य को या किसी भी ग्रह को प्रभावित करता है और सूर्य भी तिनके को प्रभावित करता है। यहाँ छोटा-बडा कोई नहीं, एक आॅरगनिक यूनिटी है। आप देखें परमाणु है, परमाणु से भी सूक्ष्म कुछ है, उसका एक प्रभाव है। सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा है, अजुड़ा कुछ भी नहीं। हम हर समय एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं, सड़क पर पड़ा हुआ पत्थर भी। हर अणु-परमाणु का एक-दूसरे से पक्का रिश्ता है। इस संयुक्त सृष्टि का बोध यदि हो जाये तभी ज्योतिष और इसका महत्व समझ आ सकता है।

ज्योतिष:- (ज्योति+ईश= ज्योतिष) विज्ञान से बढ़कर पराविज्ञान है, कैसै? आईये मैं बताता हूँ – सभी जानते हैं की ज्योतिष ग्रह-नक्षत्रों की विद्या है। ईसके तीन स्तम्भ (भाग) हैं, प्रथम भाग सिद्धांत जिसे ज्योतिषीय गणना कहा जा सकता है। दूसरा भाग संहिता जिस के सिद्धांत समझकर विद्वान पृथ्वी पर घटने वाली किसी भी भौगोलिक तथा राष्ट्रीय (किसी भी देश या विश्व में घटने वाली राजनैतिक) भविष्यवाणीयां कर सकता है। तीसरा और महत्वपूर्ण भाग “होरा” है, जिसका विशेषज्ञ विद्वान जातक के जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति (जन्मकुण्डली) को देखकर भविष्यवाणी (फलादेश) करता है। जन्मकुण्डली का फलादेश करने वाला विद्वान किसी भी व्यक्ति की कुण्डली देखकर उसके भूत-भविष्य और वर्तमान तीनो काल में घटित तथा घटने वाली घटनाओं का विवरण बता सकता है। केवल इतना ही नहीं इस के गहन अध्ययन व अभ्यास से पूर्व जन्म, वर्तमान तथा पुनर्जन्म के विषय में भी संकेत मिलते हैं।

क्या आज विज्ञान के युग में अभी तक भी ज्योतिष के अतिरिक्त कोई पद्धति है, जो भूत-भविष्य तथा वर्तमान तीन काल की जानकारी देती हो ? आधुनिक विज्ञान केवल भौतिक जगत के बारे में जानकारी दे सकता है। सूक्ष्म जगत में तो इसने अभी प्रवेश ही नहीं किया। जबकी वेदों की इस विद्या (ज्योतिष) के रचनाकार हमारे पूर्वज ऋषियों ने सूक्ष्म जगत में न केवल प्रवेश किया बल्कि सूक्ष्म जगत के करोड़ो रहस्यों को जाना समझा और उनके सिद्धांतों सहित हजारों रहस्यों को ग्रन्थों में लिखकर आगे की पीढियों को लाभान्वित किया है। आत्मा से परमात्मा का सम्बंध, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और विनाश के रहस्य, हर ग्रह-नक्षत्र का मनुष्य या धरती पर पढने वाला प्रभाव, खगोलिक घटनाओं तथा ग्रहणादि के सिद्धांत वेदों के रूप में हमें सौंप गये। वेद की 6 विद्याओं में एक महत्वपूर्ण विद्या ज्योतिष है, यह विद्या भौतिक और सूक्षम (लौकिक-पारलौकिक) दोनों के रहस्य अपने भीतर समेटे हुये है। इसी लिये यह विद्या विज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण (अलौकिक) है।

जैसी इंसान की सोच होती है, उसी तरह उसका नजरिया (दृष्टि) हो जाती है। जैसे- काम भाव दृष्टि, प्रेम दृष्टि, क्रोध की दृष्टि, लोभ दृष्टि, मोह दृष्टि, ईर्ष्या दृष्टि, विद्वेष दृष्टि प्रमाद तथा अहंकार दृष्टि। (उसकी आंखें दूसरे को वैसे ही भाव से देखती हैं, जैसा उस का नजरिया होता है) किसी के नेत्र हमें किस भाव से देख रहे हैं ? यह आसानी से पहचाना जा सकता है। जिन्हें पहचान नहीं होती वे यदि इस के लिये थोड़ा ध्यान (एकाग्रता) या अभ्यास करें तो जरूर पहचान होने लगेगी। यह तो हुई आंखो की भाषा। इस प्रकार मनुष्य किसी के नेत्रों की भाषा को समझ कर (जो उसने समझा) उसके अनुसार वह भी प्रतिक्रिया करता है। यह हुई क्रिया की प्रतिक्रिया। अर्थात् – सोच भी एक कर्म है, और प्रतिक्रिया उस कर्म का फल है। अब प्रश्न यह है, कि इंसान की सोच कैसे बनती है? उसे कौन बनाता है? 1. हालात?, 2. ईश्वर या प्रकृति?, या 3. वह स्वयं? इस पर फिर किसी समय चर्चा करूँगा। सिद्धांत तथा सत्य के अनुसार भूत-प्रेत योनि का अस्तित्व भी है, और वह सक्रिय भी होते हैं। परंतु इतना अवश्य है कि भूत-प्रेतों के नाम से जितनी बातें कही जाती हैं, उनमें सभी बातें सचमुच भूत-प्रेतों की नहीं होती। कुछ काल्पनिक भी होती हैं, और कुछ मनोविकार से ग्रस्त रोगीयों के रोग के कारण होती हैं, कुछ मानसिक दुर्बलताओं के कारण भी होती हैं। कुछ तो ढोंग तथा कुछ भोले-भाले लोगों को ठगने के उद्देेश्य से दिखावा अथवा जादूगरी के खेल के रूप में होती हैं। वस्तुत: चित्त पर पड़ने वाले संस्कार अपने अनुरूप कार्य करने के लिये ललचाते हैं। और ललचा जाने वाला मनुष्य पराधीन बन जाता है।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणेः कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

भावार्थ- वास्तव में हमारे सब प्रकार के कर्म प्राकृतिक गुणों द्वारा किये जाते हैं, परंतु अहंकार से मूढ़ बना मनुष्य मानता है कि मैं ही करता हूँ।

कर्म का सिद्धांत :- सभी जानते हैं- मनुष्य जन्म के बाद (जब से उसे समझ अाती है) से मृत्यु तक “कर्म” करता रहता है। इन्हीं कर्मों को “क्रियमाण कर्म” कहते हैं। अर्थात् मनुष्य के जीवनकाल में जो-जो कर्म किये जाते हैं, वे सभी क्रियमाण कर्म ही कहलाते हैं। यह हुये प्रथम प्रकार के कर्म। द्वितीय प्रकार के कर्म “संचित कर्म” कहलाते हैं, क्रियमाण कर्म जो रोज हुआ करते हैं, में से ही कुछ कर्मों का फल तो भोग लिया जाता है, और शेष प्रतिदिन मन में इकट्ठा होते रहते हैं, इस प्रकार मन रूपी गोदाम में एकत्र हुये कर्मों को संचित कर्म कहा जाता है। जैसे हम प्रतिदिन एक-एक रूपया गोलक में डालते जायें और सालभर के बाद गोलक खोलें तो उसमें जो रूपया निकलेगा वह सब एक वर्ष का संचित धन कहलायेगा। कर्म का एक तीसरा प्रकार “प्रारब्ध कर्म” है, मनुष्य के मन (मस्तिष्क का एक भाग) में अनेक जन्मों के संचित ढेर-के-ढेर कर्म पड़े रहते हैं। मन में जन्म-जन्मांतरों के कर्मों का इतना बड़ा खजाना जमा है कि सृष्टि के अंत तक भी समाप्त नहीं होता। इन्में मनुष्य के जीवनांत में जो कर्म भावी जन्म के लिये परिपक्व हो जाते हैं, उन्हीं कर्मों का फल भोगने के लिये जीव को उसी अनुरूप एक नया जन्म मिलता है। इस प्रकार कालभेद से मनुष्य द्वारा किये जाने वाले कर्म के तीन भेद हुये। 1. क्रियमाण कर्म, 2. संचित कर्म, और 3. प्रारब्ध कर्म। सभी कर्मफल जब तक भोग नहीं लिये जाते तब तक वे नष्ट नहीं होते। वैदिक दर्शनों के अनुसार आत्मा कभी नष्ट नहीं होती, अर्थात्‌- आत्मा अमर है। मनुष्य के शरीर में रहते हुये कर्मबंधन के प्रभाव वश यह परतंत्र, दुःखी, जन्म-मृत्यु एवं जरा (वृद्धावस्था) से युक्त प्रतीत होती है। निष्क्रिय होकर भी आत्मा सक्रिय, स्वतंत्र होते हुये भी परतंत्र, वशी होते हुये भी दुःखदायक भावों से आक्रांत, विभु या सर्वगत होते हुये भी सीमित, तथा निर्विकार होते हुये भी सुख-दुःख आदि विकारों का अनुभव करने लगती है। नित्य शुद्ध और बुद्ध आत्मा को इस स्थिति में लाकर खड़ा करने वाला कारण एकमात्र “कर्मानुबंध” है।किसी कार्य को करने के बाद अनिवार्य रूप से प्राप्त होने वाला परिणाम ही “कर्मानुबंध” है। वस्तुतः आत्मा की स्वतंत्रता या वशित्व केवल कार्य (कर्म) करने में है, परंतु कर्म करने के बाद उसके अपरिहार्य फल से वह अनुबंधित हो जाती है। इसका अर्थ है- कर्म करने या न करने के लिये आत्मा स्वतंत्र है, परंतु कर्म करने के बाद उसका फल भोगने के लिये स्वतंत्र नहीं है।

एक सच्ची बात कहता हूँ, बात तब की है, जब मेरी उम्र 20 से 30 के बीच रही होगी। उस काल में मैं ज्योतिष या ज्योतिष जैसी विद्याओं को नफरत की निगाह से देखा करता था। एेसा होना स्वाभाविक भी था, क्योंकि हर प्रकार से मेरा अच्छा दौर चल रहा था। हर तरफ इज्जत सम्मान भी था, आमदनी अच्छी थी इस लिये आत्मविश्वास की कमी नहीं थी, ईश्वर में आस्था बिलकुल भी नहीं थी, अपने हाथ-पैरों या स्वास्थ शरीर को महत्व देेता था, अपनेे मस्तिष्क तथा तर्कशक्ति से अधिक किसी को महत्व नहीं देता था। फिर कुछ एेसा होने लगा की बिना किसी विशेष कारण के कारोबार व आमदनी तेजी से कम होने लगी, क्योंकि खर्चे बढ चुके थे, उनपर लगाम लगाम ना लग पा रही थी, टेंशने बढती ही चली गई। अपने दूर होने लग गये, तो अपना मनोबल भी डगमगाने लगा, शरीर थका-थका सा रहता, तब मन में आता कोई अनजाना कारण जरूर है, जो दिखाई भी नहीं देता और सुझाई भी नहीं देता। बस सच पूछिए तो उसी दिन से मैं बनने लगा था “ज्योतिषी” और पहुंच गया एक पंडितजी के पास, उन्होंने मेरी कुण्डली बनाई और बताया तुम्हारी तो शनि की साढ़ेसाती चल रही है। मित्रो मैने जब पूछा कि क्या होती है साढ़ेसाती? और क्या होता है इसमें? पंडितजी बोले बस परेशानियाँ रहेंगी। हर क्यों का उत्तर नहीं मिला तो खरीद लाया ज्योतिष की पुस्तकें और लगा दिन-रात पढ़ने। 6-7 वर्ष अध्ययन करते-करते समझ में आने लगा कि क्यों होता है कष्ट, साढ़ेसाती में क्या बात है खास ? और सन 2000 में जब संस्कृत विश्वविद्यालय से मैने ज्योतिष की डिग्री प्राप्त कर स्वयं ज्योतिषी बन बैठा, और आज हजारों कुण्डलियां मेरी निगाहों से गुजर चुकी हैं, तब कभी-कभी मैं उस 20 से 30 की उम्र में अपने विचारों को याद करता हूँ, और महसूस करता हूँ कि यह सब नियति के खेल हैं। कुच्छ तो जन्मों-जन्मों के कर्म हैं, और कुच्छ पूर्व जन्मों की अधूरी इच्छायें या कहिये की अधूरी विद्यायें हैं, जो पीछा करती हैं।

यह आज के विज्ञान के साथ एक दुराग्रह है कि, इसने न केवल प्रत्यक्षवाद को सब कुछ माना है, साथ ही साथ उसी आधार पर हर विषय का प्रतिपादन भी आरम्भ कर दिया है। इस में कमी यह है कि, इस आधार पर हर अनैतिकता को निर्दोष ठहराया जा रहा है। धर्म और आध्यात्म के सिद्धांतों की अवहेलना चल पड़ी है, चरित्रहीनता तो साधारण बात या प्रगतिशीलता की पहचान बनने लगी है, इसका परिणाम क्या होगा? दूसरी ओर भोजन के लिये पशु हत्या! डर है, बात कभी यहाँ तक न पहुंच जाये कि बूढ़ी गाय या बूढ़े बैल की तरह बूढ़े माँ बाप को भी किसी कसाई खाने में पहुंचाने में लाभ न दिखाई देने लगे। आजकल अजन्मे बच्चों का माँस डिब्बाबंद भोजन के रूप में बिकने की खबर सुनकर रूह काँप उठती है। पशुमाँस का सेवन करते-करते मनुष्य में भी पशु स्वभाव का समावेश हो चला है। कभी मनुष्यों को भी एक पशु की तरह मान लिया गया या उस पर भी पशु जैसे अनुबंधों को लागू किया जाने लगा तब क्या होगा?

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गरूड पुराण

क्या यमलोक अथवा परलोक का अस्तित्व है :-

Dr.R.B.Dhawan

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क्या पृथ्वी के बाहर भी कहीं जीवन का अस्तित्व है? क्या यमलोक अथवा परलोक का अस्तित्व है? क्या कोई दूसरी दुनियां है? मनुष्य के लिये सदा से ही यह खोज का विषय रहा है। इस विषय में क्या कहते हैं हमारे धर्मग्रन्थ- हमारे धर्म ग्रंथों गरूड़ पुराण में किसी-न-किसी रूप में सौरमण्डल के सभी ग्रहों पर जीवंतता का विवरण इस प्रकार मिलता है। पृथ्वी पर के जीवों का शरीर पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश) का बना है। और गहन अध्ययन करें तो ज्ञात होता है हमारा शरीर 24 तत्वों का है जिनमें पंचमहाभूत, पंच तन्मात्रा, पंच ज्ञानेन्द्रियाँ पंच कर्मेन्द्रियां तथा मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार का समावेश होता है। इस प्रकार मानव से भिन्न अन्य प्राणियों के शरीर में कुछ तत्वों का अभाव भी हो सकता है, परन्तु पंचमहाभूत का लोप नहीं हो सकता।

मानव शरीर चार प्रकार का होता है- 1. पार्थिव शरीर प्रथम है जिसे स्थूल शरीर भी कहते हैं। 2. दूसरे प्रकार का शरीर सूक्ष्म शरीर कहा जाता है। 3. लिंगम शरीर भी एक तीसरे प्रकार का शरीर है। 4. चौथे प्रकार का शरीर कारण शरीर कहलाता है। (स्थूल शरीर प्राणी की जीवित अवस्था है, शेष तीन शरीर स्थूल शरीर का त्याग करने पर प्राप्त होते हैं।) सूक्ष्म शरीर में पंच महाभूत नहीं होते, यह शरीर पारदर्शी होता है, इसकी छाया नहीं पड़ती। इस शरीर की आकृति ठीक स्थूल शरीर जैसी होती है, परन्तु पंच महाभूतों के न रहने के कारण यह हल्का होता है, तथा उसमें शक्ति बहुत अधिक होती है। उसमें संघटन एवं विघटन की प्रक्रिया अपने आप होती रहती है। भूत-प्रेत आदि की सूक्ष्म देह ही होती है। इन देह धारियों के लिये पृथ्वी जैसे ठोस ग्रहों पर निवास आवश्यक नहीं वे तो अंतरिक्ष में भी रह सकते हैं। जिन सूक्ष्म शरीर धारियों को पुनः पृथ्वी पर जन्म लेना है, वे ही पृथ्वी के निकट विचरण करते हैं। वे अंतरिक्ष में एक निश्चित सीमा से आगे नहीं जा पातेे। भूतकालिक संस्कारों के वशिभूत वे मानव जाति से सम्पर्क भी स्थापित करते हैं। किसी काया में प्रवेश की क्षमता भी उनके पास होती है।
लिंगम शरीर एक तीसरे प्रकार का शरीर है, इसमें मात्र तेरह तत्व मात्र होते हैं। इस शरीर मे केवल पंच कर्मेन्द्रियाँ, पंच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन, बुद्धि एवं अंहकार होता है। पंच महाभूत न होने के कारण यह शरीर भी स्थूल नहीं होता। तेरह तत्व का शरीर पितृवर्ग का होता है। इनका निवास चंद्रलोक में कहा गया है, जहाँ विज्ञान पहुँच चुका है। वहाँ मानव जीवन के कुछ चिन्ह नहीं मिले। स्पष्ट है कि तेरह तत्वों के शरीरधारी को देखने की क्षमता साधारण मनुष्य में नहीं होती, इसी लिये तो चंद्रलोक में मानव जीवन के चिन्ह नहीं मिले। चौथे प्रकार का शरीर कारण शरीर कहलाता है, इस शरीर की आकृति अंगूठे के आकार की मानी जाती है। वस्तुतः आत्मा को ही अंगूष्ठ आकार का कहा गया है, यद्यपि आत्मा एक प्रकाशपुंज है, उसका कोई स्वरूप नहीं होता, भला उसकी आकृति क्या हो सकती है? व्यक्तित्व बोध के कारण ही आत्मा को एक प्रकार का शरीर समझ लिया गया है। ऐसे ही जिन कारण शरीरों को फिर पार्थिव शरीर में नहीं लौटना होता, वे दूरस्थ लोक-लोकान्तरों का परिभ्रमण करते हुये अंत में परमधाम ‘सूर्यलोक’ की ओर प्रस्थान करता है, तथा आत्मा का परमात्मा में विलय हो जाता है।

श्री मद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध के इक्कीसवें अध्याय में सूर्य के रथ और उसकी गति का वर्णन आया है। इसमें श्लोक 12 में सूर्य के रथ की गति एक मुहूर्त में चौतिस लाख आठ सौ योजन लिखा है। पुनः श्लोक 19 मे लिखा है कि, सूर्य भूमण्डल के नौ करोड़ इक्यावन लाख योजन लम्बे घेरे को प्रत्येक क्षण में दो हजार दो योजन की गति से पार करते हैं। पृथ्वी से सूर्य की दूरी विज्ञानविद् जितना मानते हैं, उसकी पुष्टि इस श्लोक से हो जाती है। बाईसवें अध्याय मे भिन्न-भिन्न ग्रहों की स्थिति एवं गति का वर्णन है, जिसमें क्रमशः चंद्रमा, शुक्र, बुध, मंगल, बृहस्पति तथा शनि का वर्णन आया है। भागवत पुराण में चंद्रमा को ग्रह माना गया है, तथा इन्हें सर्वमय कहा गया है। इस अध्याय के आठवें श्लोक में चंद्रमा को सूर्य किरणों से दो लाख योजन ऊपर बतलाया गया है।
ज्योतिष विज्ञान में सूर्य आत्मकारक कहा गया है। चंद्रमा को मन का कारक अमृतमय ग्रह कहा गया है। तथा बृहस्पति ग्रह को ज्ञान एवं जीवकारक कहा गया है। इसी प्रकार शनि को न्यायकर्ता, मृत्यु एवं आयु का कारक ग्रह कहा गया है। शनि के कारकत्व से ऐसा लगता है कि वह यमराज एवं धर्मराज दोनों के कारकत्व रखते हैं। जहाँ तक दूरी का प्रसंग है, और भागवत पुराण में जो विवरण है, उससे वर्तमान सभी ग्रह मृतिका-पिण्ड सिद्ध होते हैं। क्योंकि इन सभी ग्रहों पर सूर्य किरणों की पहुँच है। साथ ही प्रत्येक ग्रह में मात्र दो लाख योजन का अन्तर बताया गया है। जबकि शनि की दूरी 15 करोड़ 38 लाख मील सूर्य से बताई गई है। ग्रहों की पारस्परिक दूरी में भागवत पुराण का विवरण अस्पष्ट है तथा सूर्य किरणों से ऊपर होने का अर्थ भी स्पष्ट नहीं है। किन्तु ग्रहों का क्रमिक स्थान युतियुक्त है।

गरूड़ पुराण में प्रेत कर्म एवं मृत्यु का विवरण मिलता है- देहावसान के बाद स्थूल शरीर छूट जाने पर जीव कुछ क्षण के लिये कारण शरीर में निवास करता है, इस का कारण यह है कि- एक से लेकर दो क्षण तक मृत्यु के पूर्व प्रत्येक प्राणी को सर्वात्म दृष्टि प्राप्त हो जाती है। (एक क्षण चार मिनट का होता है।) सर्वात्म दृष्टि में माया-मोह का बंधन नहीं रह जाता। इसी अवस्था में स्थूल शरीर से कारण शरीर में जीव का वहिर्गमन होता है, परंतु यह परिर्वतन अस्थायी होता है। कारण शरीर की गति प्रकाश की गति जैसी होती है, इसलिये शरीर छूटते ही दो मुहूर्त में जीव यमलोक पहुंच जाता है। एक मुहूर्त 48 मिनट का होता है। इस तरह यमलोक जाने में 96 मिनट लगते हैं। इस अवधि में प्रकाश की गति से 96 करोड़ मील की दूरी तय हो सकती है। इस तथ्य के अनुसार मृत्यु के बाद जीव शनि लोक में जाता है, क्योंकि शनि की दूरी 95 करोड़ 38 लाख मील है। गरूड़ पुराण का कथन है कि दो मुहूर्त में जीव यमराज के पास जाता है, वहाँ एक मुहूर्त में उसके कर्म-अकर्म की छानबीन होती है, तथा पुनः दो मुहूर्त में वह अपने मृत-शरीर के पास वापिस भेज दिया जाता है। किन्तु उसे स्थूल शरीर में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं होती। तब एकबार फिर से वह सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करता है।

उसी पुराण में पुनः कहा गया है कि षोड़श श्राद्ध (16 दिन में) के फलस्वरूप जीव को क्रमशः सूक्ष्म एवं छ माह के उपरांत लिंगम् शरीर प्राप्त होते हैं, तथा अन्त में पुनः कारण शरीर में आना होता है। यह प्रक्रिया इस प्रकार है- दसकर्म (10 दिन में) सूक्ष्म शरीर बनता है, 11वें दिन से जीव पुनः सूक्ष्म शरीर धारण कर पृथ्वी से बृहस्पति ग्रह तक यात्रा आरम्भ करता है। अर्थात् सूक्ष्म शरीर प्राप्त कर जीव दूसरी बार फिर से यमपुरी के लिये रवाना होता है। इस बार उसे वहाँ तक जाने में एक वर्ष लग जाता है। कारण स्पष्ट है। पहली बार जीव कारण शरीर में प्रकाश की गति से गया था, दूसरी बार वह सूक्ष्म शरीर में चलता है, और मार्ग में उसे अंतरिक्ष की अठारह सूक्ष्म पुरियां में विश्राम लेना पड़ता है। इस यात्रा के एक वर्ष में छः माह तक वह सूक्ष्म शरीर में होने के कारण मंदगति हो जाता है। इस शरीर से पहला ठहराव उसे 18 दिन के बाद ही सौम्यपुर में मिलता है। दूसरे पाँच ठहराव हैं- सौरोपुर नरेन्द्रभवन, गंधर्व, शैलागय तथा कौंचपुर। पृथ्वी से चलकर चंद्रमा, मंगल, एवं ग्रहगुच्छ तक पुरलोक में प्रवाहवायु के भेद से ये छः ठहराव नियत हैं। इन स्थानों पर जीव अपने पूर्वार्जित पुण्य कर्म का भोग करता है। ग्रह गुच्छ में कोई दो हजार छोटे-बड़े ग्रह पिण्ड हैं। इसकी तुलना वैतरणी नदी से की गई है। इनकी दूरी सूर्य से 31 करोड़ मील है। यहाँ तक जीव सूक्ष्म शरीर में जाता है। वैतरणी पार कर लेने पर उसे लिंगम् शरीर मिलता है। इस शरीर में वह बृहस्पति ग्रह तक जाता हैै बृहस्पति की दूरी 56 करोड़ मील है। बृहस्पति ग्रह से आगे बढ़ने पर पुनः जीव कारण शरीर में चला जाता है, वैतरणी के बाद बारह ठहराव इस प्रकार हैं- क्रूरपुर, विचित्र भवन, वहवापदपुर, दुःखपुर, नाना-क्रंदपुर, सुतप्त भवन, रौद्रपुर, पयोवर्षण, शीताड्य नगर, बहुभीतिपुर, धर्म भवन एवं संजीवनी नगर।
गरूड़ पुराण में जिस प्रकार यमलोक का वर्णन आया है। उसमें कहा गया है कि यमपुरी के बाहर एक विशाल घेरा है। यह घेरा शनि ग्रह के चारों और कोहरे की बैल्ट के रूप में दीखाई पड़ता है। सार रूप में यह संकेत मिलता है कि वहाँ के रहने वाले मात्र कारण शरीर में रहते हैं। कारण शरीर प्रकाश-पुंज भर होता है। इस तरह वहाँ की जीवंतता प्रकाश किरणों के रूप में हमें दृष्टिगत हो सकती है। गरूड़ पुराण के अनुसार आज विज्ञानविद् ग्रह स्थिति एवं गति का जैसा विवरण दे रहे हैं, वह ठीक सिद्ध हो जाता है। शरीर की भिन्नता के कारण वहाँ की जीवंतता में भी संदेह नहीं रह जाता मानव अपनी सीमित शक्ति के सहारे यदि उन जीवंतताओं को नहीं देख पाता तो उन्हें झुठलाया भी नहीं जा सकता। इस प्रकार गरूड़ पुराण में वर्णित जीव की मृत्योपरांत यमपुरी या परलोक यात्रा सत्य जान पड़ती है।

Dr.R.B.Dhawan

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रुद्राष्टकम्

श्री गोस्वामी तुलसीदास कृतं शिव रूद्राष्टक स्तोत्रं : –

Dr.R.B.Dhawan

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यूं तो भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सनातन ग्रंथों में, पुराणों में अनेक मंत्र उल्लेखित हैं, अनेक स्तुति व स्त्रोत भी हैं, जिनकी रचना अनेक ऋषियों और आचार्यों ने की है। जिनके जप व गान करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं, परंतु श्री शिव रुद्राष्टक स्त्रोत्र का महत्व और प्रभाव विलक्षण है। प्रतिदिन शिव रुद्राष्टक का पाठ किया जाए तो हर प्रकार की समस्याओं का समाधान स्वत: ही हो जाता है। साथ ही भगवान शिव की कृपा भी प्राप्त होती है। महाशिवरात्रि, श्रावण मास अथवा चतुर्दशी तिथि (मासिक शिवरात्रि) को इसका जप व गान किया जाए तो विशेष फल मिलता है।

श्री रामचरित मानस के उत्तर काण्ड में वर्णित इस रूद्राष्टक की कथा इस प्रकार है :- कागभुशुण्डि जो कि परम शिवभक्त थे। वह भगवान शिव को परमेश्वर एवं अन्य देवों से अतुल्य मानते थे। उनके गुरू श्री लोमेश थे जो भगवान शिव के साथ-साथ राम में भी असिम श्रद्धा रखते थे। इस कारण कागभुशुण्डि का अपने गुरू के साथ मत-भेद रहता था।
एक बार गुरूजी ने समझाया कि; स्वयं शिव भी राम नाम से आनन्दित रहते हैं, तो तू राम की महिमा को क्यों स्वीकार करने से इन्कार करता है। ऐसे प्रसंग को शिव विरोधी मान कर कागभुशुण्डि अपने गुरू से ही रूष्ट हो गए। इसके उपरांत कागभुशुण्डि ने एक बार एक महायज्ञ का आयोजन किया, परंतु अपने इस यज्ञ की सूचना अपने गुरू को नहीं दी। फिर भी सरल हृदय गुरू अपने भक्त के यज्ञ में समलित होने के लिए पहुँच गए। शिव पुजन में बैठे कागभुशुण्डि ने अपने गुरू लोमश को आया देखा। किन्तु अपने आसन से न उठे, न ही उनका कोई आदर सत्कार ही किया। सरल हृदय गुरू लोमश ने एक बार फिर इसका बुरा नहीं माना। पर महादेव तो महादेव ही हैं। वो अनाचार क्यों सहन करने लगे ? भविष्यवाणी हुई – अरे मुर्ख, अभिमानी ! तेरे सत्यज्ञानी गुरू ने सरलता वश तुझ पर क्रोध नहीं किया। लेकिन, मैं तुझे श्राप दुंगा। क्योंकि नीति का विरोध मुझे पसंद नहीं। यदि तुझे दण्ड ना मिला तो वेद मार्गी भ्रष्ट हो जाएंगे। जो गुरू से ईर्ष्या करते हैं, वो नर्क के भागी होते हैं। तू गुरू के समुख भी अजगर की भांति ही बैठा हुआ है। अत: अधोगति को पाकर अजगर बन जा तथा किसी वृक्ष की कोटर में ही रहना।
इस श्राप से दुःखी हो कर तथा अपने शिष्य के लिए क्षमा दान पाने की अपेक्षा से, शिव को प्रसन्न करने हेतु; ही गुरू लोमश ने प्रार्थना की तथा रूद्राष्टक की रचना और वाचना की तथा आशुतोष भगवान को प्रसन्न किया। इस कथा का सार है – शिव अनाचारी को क्षमा नहीं करते; बेशक वो उनका परम भक्त ही क्यूँ ना हो। परम शिव भक्त कागभुशुण्डि ने जब अपने गुरू की अवहेलना की तो; वे भगवान शिव के क्रोध-भाजन हुए। अपने शिष्य के लिए क्षमादान की अपेक्षा रखने वाले सहृदय गुरू लोमश ने रूद्राष्टक की रचना की तथा महादेव को प्रसन्न किया। गुरु के तप व शिव भक्ति के प्रभाव से यह शिव स्तुति मंगलकारी शक्तियों से सम्पन्न मानी जाती है। तथा मनुष्य के अहंकार को दूर कर उसे विनम्र बनाती है। शिव की इस स्तुति का वाचन करने से मन में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा, तनाव, द्वेष, ईर्ष्या और अहं दूर होता है। यह स्तुति सरल, सरस और भक्तिमय होने से शिव व शिव भक्तों को बहुत प्रिय है। इस स्तुति के पाठ से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं। यह कथा रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में वर्णित है।
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं

चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम।

हे भगवन ईशान को मेरा प्रणाम ऐसे भगवान जो कि निर्वाण रूप हैं, जो कि महान ॐ के दाता हैं, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण में व्यापत हैं, जो अपने आपको धारण किये हुए हैं, जिनके सामने गुण अवगुण का कोई महत्व नहीं, जिनका कोई विकल्प नहीं, जो निष्पक्ष हैं, जिनका आकार आकाश के सामान है, जिसे नापा नहीं जा सकता, उनकी मैं उपासना करता हूँ।
निराकारमोङ्करमूल, तुरीयं,

गिराज्ञानगोतीतमीशं, गिरीशम् ।

करालं महाकालकालं कृपालं

गुणागारसंसारपारं, नतोहम।

जिनका कोई आकार नहीं, जो ॐ के मूल हैं, जिनका कोई राज्य नहीं, जो गिरी के वासी हैं, जो कि सभी ज्ञान, शब्द से परे हैं, जो कि कैलाश के स्वामी हैं, जिनका रूप भयावह है, जो कि काल के स्वामी हैं, जो उदार एवम् दयालु हैं, जो गुणों का खजाना हैं, जो पुरे संसार के परे हैं उनके सामने मैं नत मस्तक हूँ।

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं

मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ।

स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा

लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा।

जो कि बर्फ के समान शील हैं, जिनका मुख सुंदर है, जो गौर वर्ण के हैं, जो गहन चिंतन में हैं, जो सभी प्राणियों के मन में हैं, जिनका वैभव अपार है, जिनकी देह सुंदर है, जिनके मस्तक पर तेज है, जिनकी जटाओ में लहलहाती गंगा हैं, जिनके चमकते हुए मस्तक पर चाँद हैं, और जिनके कंठ पर सर्प का वास हैं।

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं

प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं

प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि।

जिनके कानों में बालियाँ हैं, जिनकी सुन्दर भोहे और बड़ी-बड़ी आँखे हैं, जिनके चेहरे पर सुख का भाव है, जिनके कंठ में विष का वास है, जो दयालु हैं, जिनके वस्त्र शेर की खाल हैं, जिनके गले में मुंड माला है, ऐसे प्रिय शंकर पूरे संसार के नाथ हैं, उनको मैं पूजता हूँ।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं

अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।

त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं

भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम।

जो भयंकर हैं, जो परिपक्व साहसी हैं, जो श्रेष्ठ हैं अखंड हैं, जो अजन्मे हैं, जो सहस्त्र सूर्य के सामान प्रकाशवान हैं, जिनके पास त्रिशूल है, जिनका कोई मूल नहीं है, जिनमे किसी भी मूल का नाश करने की शक्ति है, ऐसे त्रिशूल धारी माँ भगवती के पति जो प्रेम से जीते जा सकते हैं, उन्हें मैं वन्दन करता हूँ।

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी

सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।

चिदानन्दसंदोह मोहापहारी

प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।

जो काल से बंधे नहीं हैं, जो कल्याणकारी हैं, जो विनाशक भी हैं,जो हमेशा आशीर्वाद देते हैं, और धर्म का साथ देते हैं, जो अधर्मी का नाश करते हैं, जो चित्त का आनंद हैं, जो जूनून हैं, जो मुझसे खुश रहें, ऐसे भगवान जो कामदेव के नाशी हैं, उन्हें मेरा प्रणाम।

न यावद्, उमानाथपादारविन्दं

भजन्तीह लोके परे वा नराणाम।

न तावत्सुखं शान्ति, सन्तापनाशं

प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।

जो यथावत नहीं हैं, ऐसे उमा पति के चरणों में वन्दन करता हूं, ऐसे भगवान को पूरे लोक के नर नारी पूजते हैं, जो सुख के सागर हैं, शांति हैं, जो सारे दु:खों का नाश करते हैं, जो सभी जगह वास करते हैं।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां

नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्।

जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं

प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।

मैं कुछ नहीं जानता, ना योग, ना ध्यान, आप देव के सामने मेरा मस्तक झुकता है, सभी संसारिक कष्टों, दुःख दर्द से मेरी रक्षा करें, मेरी बुढ़ापे के कष्टों से से रक्षा करें। मैं सदा ऐसे शिव शम्भु को प्रणाम करता हूँ।

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तंत्र के रहस्य

तंत्र के रहस्य, सिद्धांत और पंचमकार :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

तंत्र का उल्लेख वैदिक साहित्य में तो नहीं मिलता, परंतु लौकिक साहित्य में अवश्य मिलता है। संभवतः तंत्र की उत्पत्ति वैदिक काल के बाद पौराणिक काल में ही हुई है। तंत्र के प्रधान देव भगवान शिव और भगवति देवी हैं। अनेक योगी आचार्य तंत्राचार्य अथवा अधिकारी नाथ संप्रदाय अथवा “शैव‌ या शाक्त” भी तंत्रालोक के रहस्यों के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता व कुछ सर्जनकार भी हुए हैं। इनमें गुरू मछन्दरनाथ, गुरू गोरक्षनाथ तथा अनेकानेक संस्थापक मठाधीश व तंत्र सम्राट हैं, जिनका नाम आदर से लिया जाता है। आगे की पंक्तियों में पंच-मकार का जो वर्णन दिया जा रहा है, वह कुछ तंत्राचार्यों का मत है, अनेक तंत्राचार्य पंच-मकार का अर्थ अन्य प्रकार से मानते हैं। (मेरा स्वयं का मत भी इस प्रकार के पंच-मकार से भिन्न है।) यहां केवल अघोर पक्ष का मत दिया जा रहा है।

तंत्र में पंचमकार (पांच बार म, म, म, म, म) 1. मद्य, 2. मांस, 3. मत्स्य, 4. मुद्रा और 5. मैथुन। कब, कैसे प्रचलित हुये, और इनका क्या रहस्य है? साधारणत: यह विश्वास किया जाता है की मंत्र-तंत्र पंचमकार, जादू-टोना, पंचमकार के ही मुख्य अंग हैं। पंचमकार का अर्थ है, जिसमे पांच मकार अर्थात पांच म शब्द से शुरू होने वाले अवयव आयें यथा मांस-मदिरा-मत्स्य-मुद्रा और मैथुन। कौलावली निर्णय में यह मत दिया है की मैथुन से बढ़कर कोई तत्व् नहीं है।, इससे साधक सिद्ध हो जाता है, जबकि केवल मद्य से भैरव ही रह जाता है, मांस से ब्रह्म, मत्स्य से महाभैरव और मुद्रा से साधकों में श्रेष्ठ हो जाता है। केवल मैथुन से ही सिद्ध हो सकता है। इस सम्बन्ध में कुछ बातें ध्यान देने योग्य हैं, प्रथम: पंचमकार का सेवन बौद्धों की बज्रयान शाखा में विकसित हुआ था। इस परंपरा के अनेक सिद्ध, बौद्ध एवं ब्राह्मण परंपरा में सामान रूप से गिने जाते हैं। बज्रयानी चिंतन, व्यवहार और साधना का रूपांतर ब्राह्मण परंपरा में हुआ है, जिसे वामाचार या वाम मार्ग कहते हैं, अतः पंचमकार केवल वज्रयानी साधना और वाम मार्ग में मान्य है। वैष्णव, शौर्य, शैव, शाक्त व गाणपत्य तंत्रों में पंचमकार को कोई स्थान नहीं मिला। काश्मीरी तंत्र शास्त्र में भी वामाचार को कोई स्थान नहीं है। वैष्णवों को छोड़कर शैव व् शाक्त में कहीं कहीं मद्य, मांस व् बलि को स्वीकार कर लिया है, लेकिन मैथुन को स्थान नहीं देते। वाममार्ग की साधना में भी 15-17वीं सदी में वामाचार के प्रति भयंकर प्रतिक्रिया हुई थी। विशेषकर महानिर्वाण तंत्र, कुलार्णव तंत्र, योगिनी तंत्र, शक्ति-संगम तंत्र आदि तंत्रों में पंचमकार के विकल्प या रहस्यवादी अर्थ कर दिए हैं। जैसे मांस के लिए लवण, मत्स्य के लिए अदरक, मुद्रा के लिए चर्वनिय द्रव्य, मद्य के स्थान पर दूध, शहद, नारियल का पानी, मैथुन के स्थान पर साधक का समर्पण या कुंडलिनी शक्ति का सहस्त्रार में विराजित शिव से मिलन। यद्यपि इन विकल्पों में वस्तु भेद है, लेकिन महत्वपूर्ण यह है की वामाचार के स्थूल पंचतत्व शिव-शक्ति की आराधना के उपकरण हैं।

तांत्रिक साधना क्या है? :-

1–वेदाचार

2– वैष्णवाचार

3–शैवाचार

4–दक्षिणाचार

5–वामाचार

6–सिद्धान्ताचार

7–कुलाचार

तंत्र शास्त्र के अंतर्गत सात प्रकार के साधना पद्धतियों का प्रचलन या वर्णन प्राप्त होता है, जो दो मुख्य धारणाओं में विभाजित हैं :- प्रथम पश्वाचार या पशु भाव तथा द्वितीय–वीराचार। इसके अतिरिक्त दिव्य-भाव त्रय के अंतर्गत सम्पूर्ण प्रकार के सिद्धि पश्चात जब साधक स्वयं शिव तथा शक्ति के समान हो जाता हैं। पशु भाव के अंतर्गत चार प्रकार के साधन पद्धतियों को समाहित किया गया है जो निम्नलिखित हैं।

1. वेदाचार, 2. वैष्णवाचार, 3. शैवाचार 4. दक्षिणाचार।

1. वेदाचार : तंत्र के अनुसार सर्व निम्न कोटि की उपासना पद्धति वेदाचार हैं, जिसके तहत वैदिक याग-यज्ञादि कर्म विहित हैं।

2. वैष्णवाचार : सत्व गुण से सम्बद्ध, सात्विक आहार तथा विहार, निरामिष भोजन, पवित्रता, व्रत, ब्रह्मचर्य, भजन-कीर्तन इत्यादि कर्म विहित हैं।

3. शैवाचार : शिव तथा शक्ति की उपासना, यम-नियम, ध्यान, समाधि कर्म विहित हैं।

4. दक्षिणाचार : उपर्युक्त तीनों पद्धतियों का एक साथ पालन करते हुए, मादक द्रव्य का प्रयोग विहित हैं।

दक्षिणा-चार (पशु भाव), वीरा-चार तथा कुला-चार (वीर भाव), सिद्धान्ताचार (दिव्य भाव) हैं, भिन्न-भिन्न तंत्रों में दक्षिणा-चार, वीरा-चार तथा कुला-चार, इन तीन प्रकार के पद्धति या आचारों से शक्ति साधना करने का वर्णन प्राप्त होता है। शैव तथा शक्ति संप्रदाय के क्रमानुसार साधन मार्ग निम्नलिखित हैं :-

1. दक्षिणा-चार, पश्वाचार (पशु भाव) ; जिसके अंतर्गत, वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार के कर्म निहित हैं जैसे, दिन में पूजन, प्रातः स्नान, शुद्ध तथा सात्विक आचार-विचार तथा आहार, त्रि-संध्या जप तथा पूजन, रात्रि पूजन का पूर्ण रूप से त्याग, रुद्राक्ष माला का प्रयोग, ब्रह्मचर्य इत्यादि नियम सम्मिलित हैं, मांस-मत्स्यादी से पूजन निषिद्ध हैं। ब्रह्मचर्य का पालन अत्यंत आवश्यक है, अथवा अपनी स्त्री में ही रत रहना ब्रह्मचर्य पालन ही समझा जाता है। पंच-मकार से पूजन सर्वथा निषिद्ध है, यदि कही आवश्यकता पड़ जाये तो उनके प्रतिनिधि प्रयुक्त हो सकते हैं। साधना का आरंभ पशु भाव से शुरू होता है, तत्पश्चात शनै-शनै साधक सिद्धि की ओर बढ़ता है।

2. वामा-चार या वीरा-चार (वीर भाव) ; शारीरिक पवित्रता स्नान-शौच इत्यादि का कोई बंधन नहीं हैं, साधक सर्वदा, सर्व स्थान पर जप-पूजन इत्यादि करने का अधिकारी है। मध्य या अर्ध रात्रि में पूजन तय प्रशस्त हैं, मद्य-मांस-मतस्य से देव पूजन, भेद-भाव रहित, सर्व वर्णों के प्रति सम दृष्टि तथा सम्मान इत्यादि निहित है। साधक स्वयं को शक्ति या वामा कल्पना कर साधना करता है।

3. सिद्धान्ताचार : शुद्ध बुद्धि! इसी पद्धति या आचार के साधन काल में उदय होता है, अपने अन्दर साधक शिव तथा शक्ति का साक्षात् अनुभव कर पाने में समर्थ होता है। संसार की प्रत्येक वस्तु या तत्व, साधक को शुद्ध तथा परमेश्वर या परमशिव से युक्त या सम्बंधित लगी है, अहंकार, घृणा, लज्जा इत्यादि पाशों का पूर्ण रूप से त्याग कर देता है। अंतिम स्थान कौलाचार या राज-योग ही है, साधक साधना के सर्वोच्च स्थान को प्राप्त कर लेता है। इस स्तर तक पहुँचने पर साधक सोना और मिट्टी में, श्मशान तथा गृह में, प्रिय तथा शत्रु में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं रखता है, उनके निमित्त सब एक हैं, उसे अद्वैत ज्ञान की प्राप्ति हो जाती हैं। इन्हीं आचार-पद्धतियों को भाव त्रय भी कहा गया है।

1. पशु भाव 2. वीर भाव 3. दिव्य भाव कहा जाता है।

तंत्र साधना हेतु उत्तम स्थान :- मणिकर्णिका घाट, वाराणसी या काशी। यह स्थान तंत्र साधना हेतु सर्वोत्तम माना जाता है, भगवान शिव यहाँ सर्वदा, साक्षात विराजमान रहते हैं। आदि काल से ही, काशी या वाराणसी का प्रयोग तांत्रिक साधनाओं हेतु किया जाता है। पश्वाचार, कौलाचार या कुलाचार, दिव्याचार, शैव-शाक्त के साधन क्रम हैं।

अष्ट पाश : घृणा, शंका, भय, लज्जा, जुगुप्सा, कुल, शील तथा जाति, पशु भाव आदि भाव हैं, मनुष्य पशुओं में सर्वश्रेष्ठ तथा सोचने-समझने या बुद्धि युक्त है। जब तक मनुष्य के बुद्धि का पूर्ण रूप से विकास ना हो, वह पशु के ही श्रेणी में आता है। जिसकी जितनी बुद्धि होगी उसका ज्ञान भी उतना ही श्रेष्ठ होगा। यहां पशु भाव से ही साधन प्रारंभ करने का विधान है, यह प्रारंभिक साधन का क्रम है, आत्म तथा सर्व समर्पण भाव उदय का प्रथम कारक पशु भाव क्रम से साधना करना है। यह भाव निम्न कोटि का माना गया है, स्वयं त्रिपुर-सुंदरी, श्री देवी ने अपने मुखारविंद से भाव चूड़ामणि तंत्र में पशु भाव को सर्व-निन्दित तथा सर्व-निम्न श्रेणी का बताया है। अपनी साधना द्वारा प्राप्त ज्ञान द्वारा जब अज्ञान का अन्धकार समाप्त हो जाता है, पशु भाव स्वतः ही लुप्त हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार पशुत्व लक्षण आठ प्रकार से युक्त मानव स्वभाव लक्षणों या पाशों से है; 1. घृणा, 2. शंका, 3. भय, 4. लज्जा, 5. जुगुप्सा, 6. कुल, 7. शील तथा 8. जाति। यही अष्टपाश युक्त मानव लक्षण सर्वदा ही मनुष्य के आध्यात्मिक उन्नति हेतु बाधक माने गए हैं, तथा साधना पथ में त्याज्य हैं। पशु भाव साधना क्रम के अनुसार साधक इन्हीं लक्षणों या पाशों पर विजय पाने का प्रयास करता है।

1. घृणा : व्यक्ति-विशेष के शरीर, इन्द्रियां तथा मन को न भाने वाली तथा तिरस्कृत करने वाला लक्षण घृणा कहलाती है। संसार के समस्त तत्व या पञ्च तत्व से निर्मित प्रत्येक वस्तुओं में किसी भी प्रकार का विकार अनुभव करना ही घृणा है, जो अभिमान, अहंकार इत्यादि विकारों को जन्म देता है। मनुष्य के हृदय पर किसी वस्तु या तत्व के प्रति प्रेम तथा किसी के प्रति तिरस्कार यदि विद्यमान है तो, वह मनुष्य परमात्मा तथा प्रत्येक तत्व में विद्यमान परमात्मा के अस्तित्व से अनभिज्ञ है।

2. शंका : किसी व्यक्ति के प्रति संदेह की भावना शंका है। विषय-आसक्त, माया-मोह में पड़ा हुआ मनुष्य, अपने विकास के लिये नाना प्रकार के छल-प्रपंच में लिप्त रहता है, कपट व्यवहार करता है, झूठ बोलता है, देहाभिमानी है, परिणाम स्वरूप वह दूसरे को भी ऐसा ही समझ कर उस पर संदेह करता है।

3. भय : मनुष्य को अपने शरीर, प्रिय-जन, संपत्ति, अभिलषित वस्तुओं से प्रेम रहता है, तथा इसके नष्ट होने का सर्वदा भय रहता है। भौतिक वस्तुओं के नाश का उसे सर्वदा भय रहता है, परन्तु आत्म के नाश का नहीं तथा आत्म तत्व को जानने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। अन्य कई कारण हैं, जो भय को उत्पन्न करते हैं; जैसे अपने सन्मुख होने वाली कोई अप्रिय घटना इत्यादि।

4. लज्जा : सामान्यतः मनुष्य के हृदय में मान-अपमान भावना का उदय होना लज्जा कहलाता है। मनुष्य का शरीर नश्वर है, फिर शरीर के मान-अपमान का कितना महत्व हो सकता है? तथा शरीर को जीवन देने वाली आत्म साक्षात् परमात्मा ही है, तथा मान-अपमान से परे है।

5. जुगुप्सा : दूसरों की निंदा-चर्चा करना जुगुप्सा कहलाती है, मनुष्य दूसरों के गुण तथा दोषों को देखता है, तथा अपने दोषों का मनन नहीं कर पाता।

6. कुल : उच्च कुल या वंश में जन्म कुल-भाव से है, जैसे उच्च कुल में पैदा हुआ अपने आप को उच्च मानता है, तथा दूसरे के कुल को छोटा। यह भाव मनुष्य के अन्दर छोटा या बड़ा होने की प्रवृति को उदित करता है, तथा उसके विचार भेद-भाव युक्त हो जाते हैं।

7. शील : शिष्टाचार का अभिप्राय शील है, अन्य लोगों के प्रति मानव का व्यवहार, सेवा, उठने-बैठने का तरीका शिष्टाचार या शील कहलाता है। शीलता के बंधन को काट देने पर साधक विचार तथा कर्म में स्वतंत्र हो जाता है, तथा उसे ये चिंता नहीं रहती की कोई अन्य उसके बारे में क्या सोच रहा है।

8. जाती : मनुष्य का अपना जात्यभिमान, उसके हृदय में बड़े या छोटे भावना का प्रतिपादन करता है। जाती भेद को समदर्शी न मानने वाला पशु भाव से ग्रस्त है, चारों जातियां क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र सभी परम-पिता ब्रह्मा जी के संतान हैं।

शक्ति साधना मार्ग में प्रयुक्त होने वाले, पञ्च-मकार (मद्ध, मांस, मत्स्य, मुद्रा तथा मैथुन) के कारण साधक को शिवत्व प्राप्त करने हेतु इन सभी पाशों या लक्षणों से मुक्त होना अत्यंत आवश्यक है। जो इन अष्ट-पाशों में से किसी एक से भी ग्रस्त है, मनोविकार युक्त है, वह सर्वदा, सर्व-काल तथा सर्व-व्यवस्था में साधना करने में समर्थ नहीं हो सकता। चित निर्मल हुए बिना, समदर्शिता तथा त्याग की भावना का उदय होना अत्यंत कठिन है, चित को निर्मल निर्विकार करने हेतु पशु भाव का त्याग अत्यंत आवश्यक है। पशु भाव से साधना प्रारंभ कर अष्ट पाशों, मनोविकार पर विजय पाकर ही साधक वीर-भाव में गमन का अधिकारी है। वस्तुतः पशु भाव युक्त साधना कर साधक इन अष्ट-पाशों या विकारों से मुक्त होने का प्रयास करता है।

वीर भाव : इस भाव तक आते-आते साधक! अष्ट-पाशों के कारण होने वाले दुष्परिणामों को समझने लगता है, परन्तु उनका पूर्ण रूप से वह त्याग नहीं कर पाता है, परन्तु करना चाहता है। इसी प्रकार पशु भाव से अपने देह तथा मन की शुद्धि करने के प्रयासरत साधक, वीर-भाव से साधना कर पाता है। वीर-भाव का मुख्य आधार केवल यह है कि! साधक अपने आप में तथा अपने इष्ट देवता में कोई अंतर न समझे, तथा साधना में रत रहा कर अपने इष्ट देव के समान ही गुण-स्वभाव वाला बने। वीर-भाव बहुत ही कठिन मार्ग है, बिना गुरु आज्ञा तथा मार्गदर्शन के यह साधन हानिकारक ही होता है, इस मार्ग को कुल, वाम, कौल, वीरा-चार नाम से भी जाना जाता है। साथ ही साधक का दृढ़ निश्चयी भी होना अत्यंत आवश्यक है, किसी भी कारण इस मार्ग का मध्य में त्याग करना उचित नहीं है, अन्यथा दुष्परिणाम अवश्य प्रकट होते हैं। जिस साधक में किसी भी प्रकार से कोई शंका नहीं है, वह भय मुक्त है, निर्भीक है, निर्भय हो किसी भी समय कही पर भी चला जाये, लज्जा व कुतूहल से रहित है, वेद तथा शास्त्रों के अध्ययन में सर्वदा रत रहता है, वह वीर साधन करने का अधिकारी है। साधन के इस क्रम में मूल पञ्च-तत्व के प्रतीक पञ्च-तत्वों से साधना करने का विधान है, जिसे पञ्च-मकार नाम से जाना जाता है।

इसी मार्ग का अनुसरण कर महर्षि वशिष्ठ ने, नील वर्णा महा-विद्या तारा की सिद्धि प्राप्त की थी। सर्वप्रथम, अपने पिता ब्रह्मा जी की आज्ञा से महर्षि वशिष्ठ ने देवी तारा की वैदिक रीति से साधना प्रारंभ की परन्तु सहस्त्र वर्षों तक कठोर साधना करने पर भी मुनि-राज सफल न हो सके। परिणामस्वरूप क्रोध-वश उन्होंने तारा मंत्र को श्राप दे दिया। तदनंतर दैवीय आकाशवाणी के अनुसार, मुनि राज ने कौल या कुलागम मार्ग का ज्ञान प्राप्त किया, तथा देवी के प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त कर, सिद्धि प्राप्त की। साधना के इस क्रम में साधना पञ्च-मकार विधि से की जाती हैं! यह पञ्च या पांच तत्व हैं 1. मद्य, 2. मांस 3. मतस्य 4. मुद्रा तथा 5. मैथुन, इन समस्त द्रव्यों को कुल-द्रव्य भी कहा जाता है। सामान्यतः इनमें से केवल मुद्रा (चवर्ण अन्न तथा हस्त मुद्रायें) को छोड़ कर सभी को निन्दित वस्तु माना जाता है, वैष्णव सम्प्रदाय तो इन समस्त वस्तुओं को महा-पाप का कारण मानता है, मद्य या सुरा पान पञ्च-महा पापों में से एक है। परन्तु आदि काल से ही वीर-साधना में इन सब वस्तुओं के प्रयोग किये जाने का विधान है। कुला-चार केवल साधन का एक मार्ग है, तथा इस मार्ग में प्रयोग किये जाने वाले इन पञ्च-तत्वों को केवल अष्ट-पाशों का भेदन कर, साधक को स्वतंत्र-उन्मुक्त बनाने हेतु प्रयोग किया जाता है। साधक इन समस्त तत्वों का प्रयोग अपनी आत्म-तृप्ति हेतु नहीं कर सकता, इनका कदापि आदि नहीं हो सकता, साधक केवल अपने इष्ट देवता को समर्पित कर ग्रहण करने का अधिकारी है, यह केवल उपासना की सामग्री है, उपभोग की नहीं। अति-प्रिय होने पर भी, इन तत्वों से साधक किसी प्रकार की आसक्ति नहीं रख सकता है, यह ही साधक के साधना की चरम पराकाष्ठा है। देखा जाये तो आदि काल से ही शैव तथा विशेषकर शक्ति संप्रदाय से सम्बंधित पूजा-साधना तथा पितृ यज्ञ कर्मों में मद्य, मांस, मीन इत्यादि का प्रयोग किया जाता रहा है।

कुछ तंत्राचार्यों का मत है (मेरा स्वयं का मत इस पक्ष में नहीं है):- ऋग्-वेद! देव तथा पितृ कार्यों हेतु हिंसा को पाप नहीं मानता। कुलार्णव तंत्र (कौल या कुल धर्म के विवरण सम्बन्धी तंत्र) के अनुसार, शास्त्रोक्त विधि से देवता तथा पितरों का पूजन कर मांस खानेवाला तथा मद्य पीने वाला किसी भी प्रकार के दोष का भागी नहीं होता। बिना यज्ञ कर्मों के मांस-मदिरा सेवन दोष युक्त माना गया है, तथा पाप की श्रेणी में आता हैं। मंत्रों द्वारा पवित्र किया गया या शास्त्रोक्त विधि से कुल द्रव्य या तत्व, गुरु तथा देवता को अर्पण कर पान करने वाला भव सागर के बंधन से मुक्त हो जाता है, तथा किसी भी प्रकार के दोष का भागी नहीं है। मतस्य-मांस, सुरा इत्यादि मादक द्रव्यों का कौल मार्ग में दीक्षा संस्कार के पश्चात, देव कार्य पूजन के अतिरिक्त सेवन दोष युक्त माना गया है।
कुछ तंत्राचार्यों का मत :- मद्य, मांस, मतस्य, मुद्रा के सेवन का मुख्य कारण यह है कि सामान्यतः मद्य निन्दित वस्तुओं में माना जाता है, परन्तु मादक द्रव्यों में मद्य या सुरा सर्वोत्तम द्रव्य माना जाता है, इसके सेवन से मनुष्य नशे में लिप्त हो, आत्म विस्मृत की अवस्था को प्राप्त कर उन्मत हो जाता है। अन्य मादक द्रव्यों के समान मद्य मनुष्य में आलस्य नहीं लाता है, आलसी मनुष्य को क्रिया-शील करने में मद्य विशेष प्रभाव दिखता है। अष्ट-पाशों का जो सादाहरण या मानसिक बल से परित्याग कर विमुक्त होने में समर्थ नहीं है, वह सुरा पान रूपी औषधि का प्रयोग कर, इन पाशों का त्याग करने या नियंत्रण करने में सफल हो सकता है। मद्यपान ध्यान केन्द्रित करने में पूर्णतः सक्षम है, तथा इसी करण वश शक्ति साधनाओं में प्रयुक्त होता है। साधक जिस किसी ओर चाहे, अपना ध्यान पूर्ण केन्द्रित कर सकता है, वास्तव में मद्यपान कर साधक आत्म-विस्मृत की अवस्था को प्राप्त करता है, तथा सर्व प्रकार से चिंता रहित हो, ध्यान केन्द्रित कर पाता है। मद्य उत्कट उत्तेजक पदार्थ है, तथा इसका प्रयोग मांस, मतस्य, चर्वण अन्न के साथ प्रयोग किया जाता है। मदिरा के साथ, मांस-मत्स्य इत्यादि का प्रयोग, मदिरा में व्याप्त विष को शांत करने हेतु किया जाता है, साथ ही पौष्टिक भोजन के अलावा मदिरा का सेवन मनुष्य को मृत्यु की ओर ले जाता है। मदिरा के साथ या अन्य मादक द्रव्यों के साथ मांस इत्यादि का सेवन मनुष्य को बलवान एवं तेजस्वी बनता है।

स्त्री सेवन का मुख्य कारण :- स्त्री के प्रति मोह या प्रेम! काम वासना या कामुकता, किसी भी साधना पथ का सबसे बड़ा विघ्न है, तथा विघ्न से दूर रह कर या कहें तो स्त्री से दूर रहकर इस विघ्न पर विजय नहीं पाया जा सकता है। प्रेम में लिप्त मनुष्य, सही और गलत भूल कर, मनमाने तरीके से कार्य करता है। अघोर तंत्र में स्त्री सेवन में रहते हुए, काम-वासना, प्रेम इत्यादि आसक्ति का आत्म त्याग सर्वश्रेष्ठ माना गया है। पूजन, केवल विभिन्न द्रव्यों को देवताओं पर अर्पित करना ही नहीं होता, अपितु देवता के पूर्ण रूप से संतुष्टि होने से भी सम्बंधित है। समस्त वस्तु या तत्व परमात्मा द्वारा ही बनायी गई हैं, पंच-मकार मार्ग! समस्त प्रकार के वैभव-भोगो में रत रहते हुए, धीरे-धीरे त्याग का मार्ग है। साधक का सदाचारी होना भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, संस्कार (दीक्षा) विहीन होने पर, गुरु आज्ञा का उलंघन करने पर तथा सदाचार विहीन होने पर साधक पाप का अधिकारी हो पतन की ओर अग्रसर होता है। शक्ति संगम तंत्र के अनुसार मैथुन हेतु सर्वोत्तम स्त्री संग, दीक्षिता तथा देवताओं पर भक्ति भाव रखने वाली, मंत्र-जप इत्यादि देव कर्म करने वाली होना आवश्यक है। किसी भी स्त्री को केवल देखकर मन में विकार जागृत होना, साधक के नाश का कारण बनता है। कुल-धर्म दीक्षा रहित स्त्री का संग, सर्व सिद्धियों की हानि करने वाला होता है। स्त्री संग से पूर्व स्त्री-पूजन अनिवार्य है, तथा स्त्रियों से द्वेष निषेध है, स्त्री सेवन या सम्भोग आत्म सुख के लिये करने वाला पापी तथा नरक गामी होता है। पर-द्रव्य, पर-अन्य, प्रतिग्रह, पर-स्त्री, पर-निंदा, से सर्वदा दूर रहकर! सदाचार पालन अत्यंत आवश्यक है।

पंच-मकार विधि से साधना करने का मुख्य उद्देश्य :- पञ्च-मकार साधना केवल मात्र इष्ट देवता की पूजा हेतु विहित है, न की स्व-तृप्ति या विषय-भोग के लिए, समस्त भौतिक सुखों से पंच-मकार विधि मुक्ति पाने हेतु केवल साधन मात्र है। साधारण मनुष्य विषय-भोगों में सर्वदा आसक्त रहता है, और अधिक प्राप्त करने का प्रयास करता है, तथा सर्वदा उनमें लिप्त रहता है, आदी हो जाता है। परन्तु वीराचारी आसक्ति से सर्वदा दूर रहता है। किसी भी प्रकार से विषय-भोगो में आसक्ति, लिप्त रहने का उसे अधिकार उसे नहीं है, सर्वदा ही उसे उन्मुक्त रहना पड़ता है, वह आदी नहीं हो सकता है। स्त्री संग करने पर साधक पर स्त्री का कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये, न मोह न प्रेम। इसी तरह मद्य, मांस तथा मतस्य के सेवन के पश्चात भी, शरीर पर इनका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये। मद्यपान करने पर साधक के शरीर में पूर्ण चेतना रहनी चाहिये।

वास्तव में देखा जाये तो, यह पंच-मकार मनुष्य के अष्ट पाशों के बंधन से मुक्त होने में सहायक है, सर्वश्रेष्ठ विषय भोगो को भोग करते हुए भी, विषय भोगो के प्रति अनासक्ति का भाव, इस मार्ग का परम उद्देश्य है। जब तक मानव पाश-बद्ध, विषय-भोगो के प्रति आसक्त, देहाभिमानी है, वह केवल जीव कहलाता है, पाश-मुक्त होने पर वह स्वयं शिव के समान हो जाता है। वीर-साधना या शक्ति साधना का मुख्य उद्देश्य शिव तथा समस्त जीवों में ऐक्य प्राप्त करना है। यहाँ मानव देह देवालय है तथा आत्म स्वरूप में शिव इसी देवालय में विराजमान है, अष्ट पाशों से मुक्त हुए बिना देह में व्याप्त सदा-शिव का अनुभव संभव नहीं है। शक्ति साधना के अंतर्गत पशु भाव, वीर-भाव जैसे साधन कर्मों का पालन कर मनुष्य सफल योगी बन पाता है। (संकलन)

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