अकाल मृत्यु योग

क्या जन्म कुंडली द्वारा अकाल-मृत्यु (एक्सीडेंट) योग का पता लगाया जा सकता है ? :-

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

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वस्तुत: मृत्यु एक ऐसा अटल सत्य है, जिसे कोई बदल नहीं सकता। कब, किस कारण से, मौत को गले लगाना होगा, यह कोई भी नहीं जानता। कुछ लोगों की असमय और अस्वाभाविक मृत्यु हो जाती है। ऐसी मौत को ही अकाल मृत्यु कहते हैं। प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या जातक की कुंडली के आधार पर अकाल मृत्यु के संबंध में जाना जा सकता है? इसका उत्तर है हां जाना तो जा सकता है, परंतु यह सरल बिल्कुल भी नहीं है, इसके लिए बहुत जटिल ज्योतिषीय गणनाओं का गुणा-भाग करना होता है, और इस के साथ-साथ ज्योतिषीय योगों का सामंजस्य बैठाना होता है। आगे की पंक्तियों में कुछ मान्य ग्रंथों से अकाल मृत्यु के योग लिख रहे हैं, परंतु ध्यान रहे केवल इन योगों को आधार मानकर अकाल मृत्यु की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, बल्कि इस के साथ साथ ज्योतिष के अन्य नियमों का मिलान होना भी आवश्यक है, तभी इन में से कोई योग घटित हो सकता है।

ज्योतिष शास्त्र के कुछ मान्य ग्रंथों में – वृहद्पराशर होराशास्त्र, जातक पारिजात, फल दीपिका इत्यादि के आयुर्दाय अध्याय में कुछ अपमृत्यु (अकाल मृत्यु) के योगों का वर्णन मिलता है :-

1- लग्नेश तथा मंगल की युति यदि लग्न कुंडली के छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो, जातक को शस्त्र से घाव होता है। इसी प्रकार का फल इन भावों में शनि और मंगल के होने से भी मिलता है।

2- यदि मंगल किसी जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव, सप्तम भाव अथवा अष्टम भाव में स्थित हो, और उस मंगल पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो, जातक की मृत्यु अग्नि से हो सकती है।

3- लग्न, द्वितीय भाव तथा बारहवें भाव में क्रूर ग्रहों की स्थिति हत्या का कारण बनती है।

4- दशम भाव की नवांश राशि का स्वामी राहु अथवा केतु के साथ स्थित हो तो, जातक की मृत्यु अस्वाभाविक होती है।

5- यदि जातक की कुंडली के लग्न में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि हो तो, दुर्घटना में मृत्यु होने की आशंका रहती है।

6- राहु-मंगल की युति अथवा दोनों का सम-सप्तक होकर एक-दूसरे से दृष्ट होना भी दुर्घटना का कारण हो सकता है।

7- षष्ठ भाव का स्वामी पापग्रह से युक्त होकर षष्ठ अथवा अष्टम भाव में हो तो, दुर्घटना होने का भय रहता है।

8- अष्टम भाव और लग्न भाव के स्वामी बलहीन हों और मंगल 6 घर के स्वामी के साथ बैठा हो तो, ये योग बनता है –

9- क्षीण चन्द्रमा 8वें भाव में हो तो भी यह योग बनता है, या लग्न में शनि हो, और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो, तथा उसके साथ सूर्य, चन्द्रमा, या सूर्य राहू हो तो भी यह योग बनता है..

ऐसे योंगों में मृत्यु के निम्न कारण होते हैं जैसे

शस्त्र से , 2- विष से, 3- फांसी लगाने से, 4- आग में जलने से, 5- पानी में डूबने से या 6- मोटर-वाहन की दुर्घटना से –

1- यदि जातक की कुंडली के लग्न में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि हो तो दुर्घटना में मृत्यु होने की आशंका रहती है।

2- राहु-मंगल की युति अथवा दोनों का सम-सप्तक होकर एक-दूसरे से दृष्ट होना भी दुर्घटना का कारण हो सकता है।

3- षष्ठ भाव का स्वामी पापग्रह से युक्त होकर षष्ठ अथवा अष्टम भाव में हो तो, दुर्घटना होने का भय रहता है।

4- लग्न, द्वितीय भाव तथा बारहवें भाव में क्रूर ग्रह की स्थिति हत्या का कारण बनती है।

5- दशम भाव की नवांश राशि का स्वामी राहु अथवा केतु के साथ स्थित हो तो, जातक की मृत्यु अस्वाभाविक होती है।

6- लग्नेश तथा मंगल की युति छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो, जातक को शस्त्र से घाव होता है। इसी प्रकार का फल इन भावों में शनि और मंगल के होने से मिलता है।

7- यदि मंगल जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव, सप्तम भाव अथवा अष्टम भाव में स्थित हो, और उस पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो, जातक की मृत्यु आग से हो सकती है।

विशेष :- कुंडली में अनेक अपमृत्यु योगों को भंग करने वाले योग भी साथ-साथ बन रहे होते हैं, इस लिये कुंडली का सभी दृष्टियों से विचार करना आवश्यक है।
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अपमृत्यु अथवा अल्पायु योगों का निवारण —

लग्नेश को मजबूत करें, उपाय के द्वारा और रत्नादि धारण अथवा रत्न दान के द्वारा, और इसके बाद भी यदि दुर्घटना होती है तो, महामृत्युंजय मंत्र का जाप या मृत्संजनी मंत्र का अनुष्ठान ही ऐसे जातक के जीवन रक्षा करता है।

क्या आप अल्पायु या अपमृत्यु योग का निवारण चाहते हैं तो, निम्न मंत्र का नित्य 11 बार जाप किया करें …

”अश्वत्थामा बलीर व्यासो हनुमानाश च विभिशाना कृपाचार्य च परशुरामम सप्तैता चिरंजीवानाम ”

1- अश्वत्थामा, 2 – राजा बलि, 3 – व्यास ऋषि, 4 – अंजनी नंदन श्री राम भक्त हनुमान, 5 – लंका के राजा विभीषण, 6 – महातपस्वी परशुराम, 7 – कृपाचार्य। ये सात नाम हैं जो अजर अमर हैं, और आज भी पृथ्वी पर विराजमान हैं।

अभेद्य महामृत्युंजय कवच : — जब जन्म कुंडली में मृत्यु का योग न हो लेकिन फिर भी व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो इसे अकाल मृत्यु कहा जाता है। हर समय किसी अनहोनी का डर लगा रहता है। इन्हीं कारणों से बचाव के लिए मां भगवती ने भगवान शिव से पूछा कि प्रभू अकाल मृत्यु से रक्षा करने और सभी प्रकार के अशुभों से रक्षा का कोई उपाय बताइए। तब भगवान शिव ने महामृत्युंजय कवच के बारे में बताया। महामृत्युंजय कवच को धारण करके मनुष्य सभी प्रकार के अशुभों से बच सकता है, और अकाल मृत्यु को भी टाल सकता है।

अकाल मृत्यु का भय नाश करता है, महामृत्युंजयग्रहों के द्वारा पिड़ीत आम जन मानस को मुक्ति सरलता से मिल सकती है। सोमवार के व्रत में भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की जाती है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार सोमवार के व्रत तीन तरह के होते हैं। सोमवार, सोलह सोमवार और सौम्य प्रदोष। इस व्रत को सावन माह में आरंभ करना शुभ माना जाता है।

सावन में शिव-शंकर की पूजा :-
सावन के महीने में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरूआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, शमीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भाँग और श्रीफल महादेव को चढ़ाया जाता है।

क्यों किया जाता है महादेव का अभिषेक ? –
महादेव का अभिषेक करने के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है कि, समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने के बाद जब महादेव इस विष का पान करते हैं तो वह मूर्छित हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं, और उन्हें होश में लाने के लिए निकट में जो चीजें उपलब्ध होती हैं, उनसे महादेव को स्नान कराने लगते हैं। इसके बाद से ही जल से लेकर तमाम उन चीजों से महादेव का अभिषेक किया जाता है।

‘मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये’

इसके पश्चात निम्न मंत्र से ध्यान करें-
‘ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥
ध्यान के पश्चात ‘ऊँ नम: शिवाय’ से शिवजी का तथा ‘ऊँ नम: शिवायै’ के अलावा जन साधारण को महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है । अत: शिव-पार्वती जी का षोडशोपचार पूजन कर राशियों के अनुसार दिये मंत्र से अलग-अलग प्रकार से पुष्प अर्पित करें।

राशियों के अनुसार क्या चढ़ावें भगवान शिव को..?-
भगवान शिव को भक्त प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और समीपत्र चढ़ाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 88 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक शमीपत्र का महत्व होता है।

मेष:- ॐ ह्रौं जूं स:, इस त्र्यक्षरी महामृत्युञ्जय मंत्र बोलते हुए 11 बेलपत्र चढ़ावें।

वृषभ:- ॐ शशीशेषराय नम:, इस मंत्र से 84 शमीपत्र चढ़ावें।

मिथुन:- ॐ महा कालेश्वराय नम:, (बेलपत्र 51)।

कर्क:- ॐ त्र्यम्बकाय नम:, (नील कमल 61)।

सिंह:- ॐ व्योमाय पाय्घर्याय नम:, (मंदार पुष्प 108)

कन्या:- ॐ नम: कैलाश वासिने नंदिकेश्वराय नम:, (शमी पत्र 41)

तुला:- ॐ शशिमौलिने नम:, (बेलपत्र 81)

वृश्चिक:- ॐ महाकालेश्वराय नम:, ( नील कमल 11 फूल)

धनु:- ॐ कपालिक भैरवाय नम:, (जंवाफूल कनेर 108)

मकर:- ॐ भव्याय मयोभवाय नम:, (गन्ना रस और बेल पत्र 108)

कुम्भ:- ॐ कृत्सनाय नम:, (शमी पत्र 108)

मीन:- ॐ पिंङगलाय नम: (बेलपत्र में पीला चंदन से राम नाम लिख कर 108)

सावन सोमवार व्रत नियमित रूप से करने पर भगवान शिव तथा देवी पार्वती की अनुकम्पा बनी रहती है।जीवन धन-धान्य से भर जाता है।

सभी अनिष्टों का भगवान शिव हरण कर भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं।

कुंडली में मृत्यु के प्रकार :-
हमारे प्राचीन ऋषि-महर्षियों ने ज्योतिष की गणना के आधार पर जीवन और मृत्यु के बारे में कुछ योग बताएं हैं, जसके आधार पर मृत्यु कैसे होगी किस प्रकार से होगी आइये देखते हैं-

लग्नेश के नवांश से मृत्यु का ज्ञान:- जन्म कुंडली में लग्न चक्र और नवांश को देखकर यह बताया जा सकता है की मृत्यु कैसे होगी ..

लग्नेश का नवांश मेष हो तो, पितदोष, पीलिया, ज्वर, जठराग्नि आदि से संबंधित बीमारी से मृत्यु होती है।

लग्नेश का नवांश वृष हो तो एपेंडिसाइटिस, शूल या दमा आदि से मृत्यु होती है।

लग्नेश का मिथुन नवांश हो तो, मेनिन्जाइटिस, सिर शूल, दमा आदि से मृत्यु होती है।

लग्नेश कर्क नवांश में हो तो, वात रोग से मृत्यु हो सकती है।

लग्नेश सिंह नवांश में हो तो, व्रण, हथियार या अम्ल से अथवा अफीम, नशा आदि के सेवन से मृत्यु होती है।

कन्या नवांश में लग्नेश के होने से बवासीर, मस्से आदि रोग से मृत्यु होती है।

तुला नवांश में लग्नेश के होने से घुटने तथा जोड़ों के दर्द अथवा किसी जानवर के आक्रमण चतुष्पद (पशु) के कारण मृत्यु होती है।

लग्नेश वृश्चिक नवांश में हो तो, संग्रहणी, यक्ष्मा आदि से मृत्यु होती है।

लग्नेश धनु नवांश में हो तो, विष ज्वर, गठिया आदि के कारण मृत्यु हो सकती है।

लग्नेश मकर नवांश में हो तो, अजीर्ण, अथवा, पेट की किसी अन्य व्याधि से मृत्यु हो सकती है।

लग्नेश कुंभ नवांश में हो तो, श्वास संबंधी रोग, क्षय, भीषण ताप, लू आदि से मृत्यु हो सकती है।

लग्नेश मीन नवांश में हो तो, धातु रोग, बवासीर, भगंदर, प्रमेह, गर्भाशय के कैंसर आदि से मृत्यु होती है।

हत्या एवं आत्महत्या के योग :-
शरीर के संवेदनशील तंत्र पर चंद्रमा का अधिकार होता है। कुंडली में चंद्रमा अगर शनि, मंगल, राहु-केतु, नेप्च्यून आदि ग्रहों के प्रभाव में हो तो, मन व्यग्रता का अनुभव करता है। दूषित ग्रहों के प्रभाव से मन में कृतघ्नता के भाव अंकुरित होते हैं, पाप की प्रवृत्ति पैदा होती है, और मनुष्य अपराध, आत्महत्या, हिंसक कर्म आदि की ओर उन्मुख हो जाता है। चंद्रमा की कलाओं में अस्थिरता के कारण आत्महत्या की घटनाएं अक्सर एकादशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा के आस-पास होती हैं। मनुष्य के शरीर में शारीरिक और मानसिक बल कार्य करते हैं। मनोबल की कमी के कारण मनुष्य का विवेक काम करना बंद कर देता है, और अवसाद में हार कर वह आत्महत्या जैसा पाप कर बैठता है।
आत्महत्या करने वालों में 60 प्रतिशत से अधिक लोग अवसाद या किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रस्त होते हैं।
आत्महत्या के कारण मृत्यु योग- जन्म कुंडली में निम्न स्थितियां हों तो जातक आत्महत्या की तरफ उन्मुख होता है।
लग्न व सप्तम स्थान में नीच ग्रह हो।

अष्टमेश पाप ग्रह शनि राहु से पीड़ित हो।

अष्टम स्थान के दोनों तरफ अर्थात् सप्तम व हो, उच्च या नीच राशिस्थ हो, अथवा मंगल व केतु की युति में हो।

सप्तमेश और सूर्य नीच भाव का हो, तथा राहु शनि से दृष्टि संबंध रखता हो।

लग्नेश व अष्टमेश का संबंध व्ययेश से हो।

मंगल व षष्ठेश की युति हो, तृतीयेश, शनि और मंगल अष्टम में हों।

अष्टमेश यदि जल तत्वीय हो तो जातक पानी में डूबकर और यदि अग्नि तत्वीय हो तो जल कर आत्महत्या करता है।

कर्क राशि का मंगल अष्टम भाव में हो तो जातक पानी में डूबकर आत्महत्या करता है।

हत्या या आत्महत्या के कारण होने वाली मृत्यु के अन्य योग:-

यदि मकर या कुंभ राशिस्थ चंद्र दो पापग्रहों के मध्य हो तो जातक की मृत्यु फांसी, आत्महत्या या अग्नि से होती है।

चतुर्थ भाव में सूर्य एवं मंगल तथा दशम भाव में शनि हो तो जातक की मृत्यु फांसी से होती है।

यदि अष्टम भाव में एक या अधिक अशुभ ग्रह हों तो जातक की मृत्यु हत्या, आत्महत्या, बीमारी या दुर्घटना के कारण होती है।

यदि अष्टम भाव में बुध और शनि स्थित हों तो जातक की मृत्यु फांसी से होती है।

यदि मंगल और सूर्य राशि परिवर्तन योग में हों और अष्टमेश से केंद्र में स्थित हों तो जातक को सरकार द्वारा मृत्यु दण्ड अर्थात् फांसी मिलती है।

शनि लग्न में हो और उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तथा सूर्य, राहु और क्षीण चंद्र युत हों तो जातक की गोली या छुरे से हत्या होती है।

यदि नवांश लग्न से सप्तमेश, राहु या केतु से युत हो तथा भाव 6, 8 या 12 में स्थित हो तो जातक की मृत्यु फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेने से होती है।

यदि चंद्र से पंचम या नवम राशि पर किसी अशुभ ग्रह की दृष्टि या उससे युति हो और अष्टम भाव अर्थात 22वें द्रेष्काण में सर्प, निगड़, पाश या आयुध द्रेष्काण का उदय हो रहा हो तो जातक फांसी लगाकर आत्महत्या करने से मृत्यु को प्राप्त होता है।

चौथे और दसवें या त्रिकोण भाव में अशुभ ग्रह स्थित हो या अष्टमेश लग्न में मंगल से युत हो तो जातक फांसी लगाकर आत्महत्या करता है।

दुर्घटना के कारण मृत्यु योग:-
जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ और दशम भाव में से किसी एक में सूर्य और दूसरे में मंगल हो, उसकी मृत्यु पत्थर से चोट लगने के कारण होती है।

यदि शनि, चंद्र और मंगल क्रमशः चतुर्थ, सप्तम और दशम भाव में हो तो, जातक की मृत्यु कुएं में गिरने से होती है।

सूर्य और चंद्रमा दोनों कन्या राशि में हों, और पाप ग्रह से दृष्ट हों तो, जातक की उसके घर में बंधुओं के सामने मृत्यु होती है।

यदि कोई द्विस्वभाव राशि लग्न में हो, और उस में सूर्य तथा चंद्र हों तो, जातक की मृत्यु जल में डूबने से होती है।

यदि चंद्रमा मेष या वृश्चिक राशि में दो पाप ग्रहों के मध्य स्थित हो तो जातक की मृत्यु शस्त्र या अग्नि दुर्घटना से होती है।

जिस जातक के जन्म लग्न से पंचम और नवम भावों में पाप ग्रह हों, और उन दोनों पर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो, उसकी मृत्यु बंधन से होती है।

जिस जातक के जन्मकाल में किसी पाप ग्रह से युत चंद्रमा कन्या राशि में स्थित हो, उसकी मृत्यु उसके घर की किसी स्त्री के कारण होती है।

जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ भाव में सूर्य या मंगल और दशम में शनि हो, उसकी मृत्यु चाकू से होती है।

यदि दशम भाव में क्षीण चंद्र, नवम में मंगल, लग्न में शनि और पंचम में सूर्य हो तो, जातक की मृत्यु अग्नि, धुआं, बंधन या काष्ठादि के प्रहार के कारण होती है।

जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ भाव में मंगल, सप्तम में सूर्य और दशम में शनि स्थित हो तो, उसकी मृत्यु शस्त्र या अग्नि दुर्घटना से होती है।

जिस जातक के जन्म लग्न से दशम भाव में सूर्य और चतुर्थ में मंगल स्थित हो, उसकी मृत्यु सवारी से गिरने से या वाहन दुर्घटना में होती है।

यदि लग्न से सप्तम भाव में मंगल और लग्न में शनि, सूर्य एवं चंद्र हों उसकी मृत्यु मशीन आदि से होती है।

यदि मंगल, शनि और चंद्रमा क्रम से तुला, मेष और मकर या कुंभ में स्थित हों तो, जातक की मृत्यु विष्ठा में गिरने से होती है।

मंगल और सूर्य सप्तम भाव में, शनि अष्टम में और क्षीण चंद्र में स्थित हो तो, उसकी मृत्यु पक्षी के कारण होती है।

यदि लग्न में सूर्य, पंचम में मंगल, अष्टम में शनि और नवम में क्षीण चंद्र हो तो जातक की मृत्यु पर्वत के शिखर या दीवार से गिरने अथवा वज्रपात से होती है।

सूर्य, शनि, चंद्र और मंगल लग्न से अष्टमस्थ या त्रिकोणस्थ हों तो, वज्र या शूल के कारण अथवा दीवार से टकराकर या मोटर दुर्घटना से जातक की मृत्यु होती है।

चंद्रमा लग्न में, गुरु द्वादश भाव में हो, कोई पाप ग्रह चतुर्थ में और सूर्य अष्टम में निर्बल हो तो जातक की मृत्यु किसी दुर्घटना से होती है।

यदि दशम भाव का स्वामी नवांशपति शनि से युत होकर भाव 6, 8 या 12 में स्थित हो तो, जातक की मृत्यु विष भक्षण से होती है।

यदि चंद्र या गुरु जल राशि (कर्क, वृश्चिक या मीन) में अष्टम भाव में स्थित हो, और साथ में राहु हो तथा उसे पाप ग्रह देखता हो तो सर्पदंश से मृत्यु होती है।

यदि लग्न में शनि, सप्तम में राहु और क्षीण चंद्रमा तथा कन्या में शुक्र हो तो, जातक की शस्त्राघात से मृत्यु होती है।

यदि अष्टम भाव तथा अष्टमेश से सूर्य, मंगल और केतु की युति हो अथवा दोनों पर उक्त तीनों ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक की मृत्यु अग्नि दुर्घटना से होती है।

यदि शनि और चंद्र भाव 4, 6, 8 या 12 में हो तथा अष्टमेश अष्टम भाव में दो पाप ग्रहों से घिरा हो तो, जातक की मृत्यु नदी या समुद्र में डूबने से होती है।

लग्नेश, अष्टमेश और सप्तमेश यदि एक साथ बैठे हों तो जातक की मृत्यु स्त्री के साथ होती है।

यदि कर्क या सिंह राशिस्थ चंद्रमा सप्तम या अष्टम भाव में हो और राहु से युत हो तो, मृत्यु पशु के आक्रमण के कारण होती है।

दशम भाव में सूर्य और चतुर्थ में मंगल स्थित हो तो, वाहन के टकराने से मृत्यु होती है।

अष्टमेश एवं द्वादशेश में भाव परिवर्तन हो, तथा इन पर मंगल की दृष्टि हो तो, जातक की अकाल मृत्यु होती है।

षष्ठ, अष्टम अथवा द्वादश भाव में चंद्रमा, शनि एवं राहु हों तो, जातक की मृत्यु अस्वाभाविक तरीके से होती है।

लग्नेश एवं अष्टमेश बलहीन हों, तथा मंगल षष्ठेश के साथ हो तो, जातक की मृत्यु कष्टदायक होती है।

चंद्रमा, मंगल एवं शनि अष्टमस्थ हों तो, मृत्यु शस्त्र से होती है।

षष्ठ भाव में लग्नेश एवं अष्टमेश हों, तथा षष्ठेश मंगल से दृष्ट हो तो, जातक की मृत्यु शत्रु द्वारा या शस्त्राघात से होती है।

लग्नेश और अष्टमेश अष्टम भाव में हों, तथा पाप ग्रहों से युत दृष्ट हों तो, जातक की मृत्यु प्रायः दुर्घटना के कारण होती है।

चतुर्थेश, षष्ठेश एवं अष्टमेश में संबंध हो तो, जातक की मृत्यु वाहन दुर्घटना में होती है।

अष्टमस्थ केतु 25 वें वर्ष में भयंकर कष्ट अर्थात् मृत्युतुल्य कष्ट देता है।

यदि अष्टम भाव में चंद्रमा, मंगल, और शनि हों तो, जातक की मृत्यु हथियार से होती है।

यदि द्वादश भाव में मंगल, और अष्टम भाव में शनि हो तो, भी जातक की मृत्यु हथियार द्वारा होती है।

यदि षष्ठ भाव में मंगल हो तो, भी जातक की मृत्यु हथियार से होती है।

यदि राहु चतुर्थेश के साथ षष्ठ भाव में हो तो, मृत्यु डकैती या चोरी के समय उग्र आवेग के कारण होती है।

यदि चंद्रमा मेष या वृश्चिक राशि में पापकर्तरी योग में हो तो, जातक जलने से या हथियार के प्रहार से मृत्यु को प्राप्त होता है।

यदि अष्टम भाव में चंद्रमा, दशम में मंगल, चतुर्थ में शनि और लग्न में सूर्य हो तो, मृत्यु कुंद वस्तु से होती है।

यदि सप्तम भाव में मंगल और लग्न में चंद्र तथा शनि हों तो, मृत्यु संताप के कारण या विचार गोष्ठी कारण होती है।

यदि लग्नेश और अष्टमेश कमजोर हों और मंगल षष्ठेश से युत हो तो, मृत्यु युद्ध में होती है।

यदि नवांश लग्न से सप्तमेश, शनि से युत हो, या भाव 6, 8 या 12 में हो तो मृत्यु जहर खाने से होती है।

यदि चंद्रमा और शनि अष्टम भाव में हो और मंगल चतुर्थ में हो, या सूर्य सप्तम में अथवा चंद और बुध षष्ठ भाव में हो तो, जातक की मृत्यु जहर खाने से होती है।

यदि शुक्र मेष राशि में, सूर्य लग्न में, और चंद्रमा सप्तम भाव में अशुभ ग्रह से युत हो तो, स्त्री के कारण मृत्यु होती है।

यदि लग्न स्थित मीन राशि में सूर्य, चंद्रमा और अशुभ ग्रह हों तथा, अष्टम भाव में भी अशुभ ग्रह हों तो, दुष्ट स्त्री के कारण मृत्यु होती है।

विभिन्न दुर्घटना योग:-
लग्नेश और अष्टमेश दोनों अष्टम में हो, अष्टमेश पर लाभेश की दृष्टि हो, (क्योंकि लाभेश षष्ठ से षष्ठम भाव का स्वामी होता है)।

द्वितीयेश, चतुर्थेश और षष्ठेश का परस्पर संबंध हो।

मंगल, शनि और राहु भाव 2, 4 अथवा 6 में हों।

तृतीयेश क्रूर हो तो, परिवार के किसी सदस्य से तथा चतुर्थेश क्रूर हो तो, जनता से आघात होता है।

अष्टमेश पर मंगल का प्रभाव हो, तो जातक गोली का शिकार होता है।

अगर शनि की दृष्टि अष्टमेश पर हो, और लग्नेश भी वहीं हो तो, गाड़ी, जीप, मोटर या ट्राॅली से दुर्घटना हो सकती है।

बीमारी के कारण मृत्यु योग:-
जिस जातक के जन्मकाल में शनि कर्क में एवं चंद्रमा मकर में बैठा हो, अर्थात् देानों ही ग्रहों में राशि परिवर्तन हो, उसकी मृत्यु जलोदर रोग से या जल में डूबने से होती है।

यदि कन्या राशि में चंद्रमा दो पाप ग्रहों के मध्य स्थित हो तो, जातक की मृत्यु रक्त विकार या क्षय रोग से होती है।

यदि शनि द्वितीय भाव में और मंगल दशम में हों तो, मृत्यु शरीर में कीड़े पड़ने से होती है।

जिस जातक के जन्मकाल में क्षीण चंद्रमा बलवान मंगल से दृष्ट हो, और शनि लग्न से अष्टम भाव में स्थित हो तो, उसकी मृत्यु गुप्त रोग या शरीर में कीड़े पड़ने से या शस्त्र से या अग्नि से होती है।

अष्टम भाव में पाप ग्रह स्थित हो तो, मृत्यु अत्यंत कष्टकारी होती है। इसी भाव में शुभ ग्रह स्थित हो, और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो, गुप्त रोग या नेत्ररोग की पीड़ा से मृत्यु होती है।

क्षीण चंद्र अष्टमस्थ हो, और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो, इस स्थिति में भी उक्त रोगों से मृत्यु होती है।

यदि अष्टम भाव में शनि एवं राहु हो तो, मृत्यु पुराने रोग के कारण होती है।

यदि अष्टम भाव में चंद्रमा हो, और साथ में मंगल, शनि या राहु हो तो, जातक की मृत्यु मिरगी से होती है।

यदि अष्टम भाव में मंगल हो, और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो, मृत्यु सर्जरी या गुप्त रोग अथवा आंख की बीमारी के कारण होती है।

यदि बुध और शुक्र अष्टम भाव में हो तो, जातक की मृत्यु नींद में होती है।

यदि मंगल लग्नेश हो (यदि मंगल नवांशेश हो) और लग्न में सूर्य और राहु तथा सिंह राशि में बुध और क्षीण चंद्रमा स्थित हों तो, जातक की मृत्यु पेट के आपरेशन के कारण होती है।

जब लग्नेश या सप्तमेश, द्वितीयेश और चतुर्थेश से युत हो तो, अपच के कारण मृत्यु होती है।

यदि बुध सिंह राशि में अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो, जातक की मृत्यु बुखार से होती है।

यदि अष्टमस्थ शुक्र अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो, मृत्यु गठिया या मधुमेह के कारण होती है।

यदि बृहस्पति अष्टम भाव में जलीय राशि में हो तो, मृत्यु फेफड़े की बीमारी के कारण होती है।

यदि राहु अष्टम भाव में अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो, मृत्यु चेचक, घाव, सांप के काटने, गिरने या पितृदोष से मृत्यु होती है।

यदि मंगल षष्ठ भाव में सूर्य से दृष्ट हो तो, मृत्यु हैजे से होती है।

यदि मंगल और शनि अष्टम भाव में स्थित हों तो धमनी में खराबी के कारण मृत्यु होती है।

नवम भाव में बुध और शुक्र हों तो, हृदय रोग से मृत्यु होती है।

यदि चंद्र कन्या राशि में अशुभ ग्रहों के घेरे में हो तो, मृत्यु रक्त की कमी के कारण होती है।

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नारायण नागबली

नारायण नागबली (संतान बाधा निवारण हेतु पितृ दोष का प्रभावशाली उपाय):-

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नारायण नागबली छविनारायण नागबलि ये दोनो अनुष्ठान पद्धतियां संतान सुख की अपूर्ण इच्छा, कामना पूर्ति के उद्देश से किय जाते हैं, इसीलिए ये दोनो अनुष्ठान काम्य प्रयोग कहलाते हैं। वस्तुत: नारायणबलि और नागबलि ये अलग-अलग पूजा अनुष्ठान हैं। नारायण बलि का उद्देश मुखत: पितृदोष निवारण करना है। और नागबलि का उद्देश सर्प शाप, नाग हत्या का दोष निवारण करना है। इन में से केवल एक नारायण बलि या नागबलि अकेले नहीं कर सकते, इस लिए ये दोनो अनुष्ठान एक साथ ही करने पड़ते हैं।

पितृदोष निवारण के लिए ही नारायण नागबलि अनुष्ठान करने के लिये शास्त्रों मे निर्देशित किया गया है । प्राय: यह अनुष्ठान जातक के पूर्वजन्म के दुर्भाग्य संबधी दोषों से मुक्ति दिलाने के लिए किये जाते हैं। ये अनुष्ठान किस प्रकार व कौन इन्हें कर सकता है? इसकी पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है। ये अनुष्ठान जिन जातकों के माता पिता जिवित हैं, वे भी विधिवत सम्पन्न कर सकते हैं, यज्ञोपवीत धारण करने के बाद कुंवारा ब्राह्मण यह अनुष्ठान सम्पन्न करा सकता है। संतान प्राप्ति एवं वंशवृद्धि के लिए ये अनुष्ठान सपत्नीक करने चाहीयें। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी ये कर्म किये जा सकते हैं। यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पाचवें महीने तक यह अनुष्ठान किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये अनुष्ठान एक साल तक नही किये जाते हैं। माता या पिता की मृत्यु् होने पर भी एक साल तक ये अनुष्ठान करने निषिद्ध माने गये हैं।

दोनों प्रकार यह अनुष्ठान एक साथ और निम्नलिखित इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए किये जाते हैं :-

1. काला जादू के प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए।
2. संतान प्राप्ति के लिए।
3. भूत प्रेत से छुटकारा पाने के लिए।
4. घर के किसी व्यक्ति की दुर्घटना के कारण मृत्यु होती है (अपघात, आत्महत्या, पानी में डूबना) इस की वजह से अगर घर में कोई समस्याए आती है तो, उन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है।

संतान प्राप्ति के लिए :-
सनातन मान्यता के अनुसार प्रत्येक दम्पत्ती की कम से कम एक पुत्र संतान प्राप्ति की प्रबल इच्छा होती है, और इस इच्छा की पूर्ति न होना दम्पत्ती के लिए बहुत दुःखदाई होता है, हालांकि इस आधुनिक युग में टेस्ट ट्यूब बेबी जैसी उपचार पद्धतियां उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ जोड़ों की कमाई के हिसाब से यह बहुत खर्चीली होती हैं। इस लिये बहुत से लोग इन महेंगे उपचारों के कारण खर्च करने में समर्थ नहीं होते, और कुछ इस के लिए कर्जा लेते हैं, लेकिन जब कभी इस महेंगे उपचारों का भी कोई लाभ नहीं होता, तब यह जोड़े ज्योतिषीयों के पास जाते हैं, और एक अच्छा अनुभवी ज्योतिषी ही इस समस्या का समाधान और उपचारों की विफलता का कारण बता सकता है।

शास्त्र कहते हैं :- जहां रोग है, वहां उपचार भी है। इसी नियम को ध्यान में रखते हुऐ हमारे पूर्वज ऋषियों ने इन समस्याओं के समाधान हेतु ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशेष उपाय सुझाए हुए है, सब से पहेले ज्योतिषी यह देखते हैं की इस की पीड़ित दंपति की जन्म कुंडली में संतान प्राप्ति का योग है या नहीं? अगर है, तो गर्भधारण करने में समस्या का कारण क्या है? जैसे की पूर्व जन्म के पाप, पितरों का श्राप, कुलविनाश का योग, इनमें से कोई विशेष कारण पता चलने के बाद वह उस समस्या का निराकरण सुझाते खोजते हैं। इन उपायों में से नारायण नागबली सर्वश्रेष्ठ उपाय माना जाता है। यदि यह अनुष्ठान उचित प्रकार से और मनोभाव से किया जाए, तो संतानोत्पत्ति की काफी संभावनाए हो जाती हैं।

भूत-प्रेत बाधा के कारण संतानोत्पत्ति में रूकावटें :-
कोई स्थाई अस्थाई संपत्ति जैसे के, घर जमीन या पैसा किसी से जबरन या ठग कर हासिल की जाती है तो, मृत्यु पश्चात् उस व्यक्ति की आत्मा उसी संपत्ति के मोह रहती है, उस व्यक्ति को मृत्यु पश्चात् जलाया या दफनाया भी जाए तो भी उस की इच्छाओं की आपूर्ति न होने के कारण उस की आत्मा को माया से मुक्ति नहीं मिल पाती, और वह आत्मा प्रेत योनी में भटकती है, और उस के पतन के कारण व्यक्ति को वह पीड़ा देने लगती है, यदि किसी शापित व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उसकी अंतेष्ठि विधि शास्त्रों अनुसार संपन्न न हो, या श्राद्ध न किया गया हो, तब उस वजह से उस से सम्बंधित व्यक्तिओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि– संतति का आभाव, यदि संतान होती भी है, तो उस का अल्प जीवी होना
संतति का ना होना ही है।

1. काफी कष्टों के बावजूद आर्थिक अड़चनों का सामना करना
खेती में नुकसान।
2. व्यवसाय में हानि, नौकरी छूट जाना, कर्जे में डूब जाना,
परिवार में बिमारीयाँ।
3. मानसिक या शारीरिक परेशानी, विकलांग संतति का जन्म होना, या अज्ञात कारणों से पशुधन का विनाश।
4. परिवार के किसी सदस्यों को भूत बाधा होना।
5. परिवार के सदस्यों में झगड़े या तनाव होना।
6. महिलाओं में मासिक धर्म का अनियमित होना, या गर्भपात होना।
ऊपर लिखे हुये सभी या किसी भी परेशानी से व्यक्ति झूंज रहा हो तोतो, उसे नारायण-नागबली करने की सलाह दी जाती है।

श्राप सूचक स्वप्न :-
कोई व्यक्ति यदि निम्नलिखित स्वप्न देखता है, तो वह पिछले या इसी जन्म में श्रापित होता है :-
1. स्वप्न में नाग दिखना, या नाग को मारते हुवे दिखना, या टुकड़ो में कटा हुवा नाग दिखना।
2. किसी ऐसी स्त्री को देखना, जिसके बच्चे की मृत्यु हो गई है, वह उस बच्चे के प्रेत के पास बैठ कर अपने बच्चे को उठने को कह रही है, और लोग उसे उस प्रेत से दूर कर रहे है।
3. विधवा या किसी रोगी सम्बन्धी को देखना।
4. किसी ईमारत को गिरते हुए देखना।
5. स्वप्न में झगड़े देखना।
6. खुद को पानी में डूबते हुये देखना।
इस प्रकार के स्वप्नों से मुक्ति पाने के लिए नारायण-नागबली अनुष्ठान किया जाता है। धर्मसिंधु और धर्मनिर्णय इन प्राचीन ग्रंथो में इस अनुष्ठान के विषय में लिखा हुआ है।

दुर्मरण :-
किसी भी प्रकार से दुर्घटना यदि मृत्यु का कारण हो, और अल्पायु में मृत्यु होना दुर्मरण कहा जाता है। किसी मनुष्य की इस प्रकार से मृत्यु उस मनुष्य के परिवार के लिए अनेक परेशानियों का कारण बनती है। निम्नलिखित कारण से आने वाली मृत्यु दुर्मरण कहलाती है :-

1. विवाह से पहले मृत्यु होना।
2. परदेस में मृत्यु होना।
3. गले में अन्न अटक कर श्वास रुकने से मृत्यु होना।
4. पंचक, त्रिपाद या दक्षिणायन काल में मृत्यु होना।
5. आग में जल कर मृत्यु होना।
6. किसी खतरनाक जानवर के हमले से मृत्यु होना।
7. छोटे बच्चे का किसी के हाथों मारा जाना।
8. पानी में डूब जाने से मृत्यु होना।
9. आत्महत्या करना।
10. आकाशीय बिजली गिरने या बिजली के झटके से मृत्यु।
यह सब कारण हैं, जिसके कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो, परिवार में आर्थिक, मानसिक वा शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं, इं परेशानियों को दूर करने के लिए परिजनों को नारायण-नागबली करवाने की सलाह दी जाती ।

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जब राहु खराब हो

क्या करें, कुंडली में जब राहु खराब हो:-

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ज्योतिष के जनक महर्षि पराशर के अनुसार राहु ग्रह को पितामह (दादा), समाज एवं जाती से अलग लोग (विद्रोही भी), सर्प, सामाजिक जहर का फैलाना, क्रानिक बीमारियां, भय, विधवा, दुर्वचन, तीर्थ यात्रायें, निष्ठुर वाणी, विदेश में जीवन, त्वचा पर दाग, सरीसृप, महामारी, किसी महिला से अनैतिक संबन्ध, नानी, व्यर्थ के तर्क, भडकाऊ भाषण, बनावटीपन, दर्द और सूजन, डूबना, अंधेरा, दु:ख पहुंचाने वाले शब्द, निम्न जाति, दुष्ट स्त्री, जुआरी, विधर्मी, चालाकी, संक्रीण सोच, पीठ पीछे बुराई करने वाले, पाखण्डी, बुरी आदतों के आदी, जहाज के साथ जलमग्न होना, डूबना, रोगी स्त्री के साथ आनन्द लेना, अंगच्छेदन होना, डूबना, पथरी, कोढ, बल, व्यय,आत्मसम्मान, शत्रु, मिलावट दुर्घटना, नितम्ब, देश निकाला, विकलांग, खोजकर्ता, शराब, झगडा, गैरकानूनी, तरकीब से सामान देश से अन्दर बाहर ले जाना, जासूसी करना, आत्महत्या, विषैला, विधवा, पहलवान, शिकारी, दासता, शीघ्र उत्तेजित होने इत्यादि का कारक होता है

कौन कौन से दोष आ जाते हैं, राहु खराब होने पर :-

जैसे की कहा जाता है, पीपल की छाया में सोने वाले को किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता परंतु यदि बबूल की छाया में सोते रहें तो श्वास रोग या चर्म रोग हो सकता है।

इसी प्रकार ग्रहों की छाया का भी हमारे जीवन पर प्रभाव पढ़ता है। नवग्रहों में राहु ग्रह हमारी बुद्धि भ्रमित करता है, लेकिन जो चतुराई हमारी बुद्धि में पैदा होती है, उसका कारक भी राहु ही है। ज्योतिष शास्त्र में राहु के दोषपूर्ण या खराब होने पर जातक चतुराई से घोटाले तो करता है, परंतु एक दिन अपने ही बुने जाल में बुरी तरह फंस जाता है।

क्यों होता है राहु खराब ? :-

1 :- यदि कोई व्यक्ति अपने गुरु या फिर अपने धर्म का अपमान करता है, तो उस व्यक्ति का राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

2 :- यदि कोई व्यक्ति शराब का सेवन नियमित करता है, या फिर पराई स्त्री के साथ सम्बन्ध बनाने की इच्छा रखता है, तो उसका राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

3 :- यदि कोई व्यक्ति ब्याज वाले पैसों का प्रयोग घर में करता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

4 :- यदि कोई व्यक्ति चतुराई से किसी को धोखा देता है, और झूठ बोलने की आदत को नहीं छोड़ता तो उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देता है।

5 :- यदि कोई व्यक्ति हमेशा तामसिक भोजन करता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देता है।

6 :- यदि कोई व्यक्ति खाना हमेशा घर से बाहर खाता है, या बाहर का खाना हमेशा खाता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देने लगता है।

खराब राहु को कैसे पहचानेगे ? :-

1 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके ससुर, साले या साली से झगडा बढ़ने लगेगा।

2 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके सोचने की ताकत कम हो जायेगी।

3 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके जीवन में शत्रु बढ़ जायेंगे, और सोचने की क्षमता कम होने लगती है।

4 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके साथ दुर्घटना, पुलिस केस, या पत्नी के साथ लड़ाई झगडे में बढ़ोत्तरी हो जायेगी।

5 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वो व्यक्ति छोटी छोटी बातों पर गुस्सा होने लगता है, और लोगों के साथ सही तालमेल नहीं बिठा पाता है।

6 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उस व्यक्ति का एक तरह से दिमाग खराब होने लगता है, और उस व्यक्ति के सर में फालतू में छोटी छोटी चोट लगने लगती है या चक्कर आते हैं।

7 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वह व्यक्ति अधिक मदिरापान या फिर सम्भोग/हस्तमैथुन की तरफ भागने लगता है।

8 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो व्यक्ति नीच हरकते करने लगता है, और निर्दयी हो जाता है।

राहु ग्रह खराब होने से होने वाले रोग :-

1 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो सबसे पहले उसको गैस से सम्बन्धित शिकायत बढ़ने लगती है।

2 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके बाल झड़ने लगते हैं, तथा बवासीर से सम्बन्धित भी समस्या होने लगती है।

3 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वो जातक पागलों की तरह व्यवहार करेगा और लगातार मानसिक तनाव में रहेगा।

4 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके नाखून अपने आप ही टूटने लगते हैं और व्यक्ति के सर में पीड़ा या दर्द बनी रहती है।

5 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उस व्यक्ति को अचानक पता चलेगा की मुझे कोई बीमारी है और उस पर पैसा भी खूब खर्चा होगा तथा व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।

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पूर्णिमा और अमावस्या

हिन्दू संस्कृति में क्यों महत्वपूर्ण हैं,पूर्णिमा और अमावस्या ? :-

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पूर्णिमा :- पूर्णिमा का महत्व जहां हिन्दू और सनातन संस्कृति में पर्व के रूप में विशेष है, वहीं आधुनिक विचारधारा सांस्कृतिक विचारधारा से बिल्कुल अलग है। भारतीय सनातन या वैदिक गणना के अनुसार हर माह की पूर्णिमा का कोई न कोई धार्मिक महत्व है, वर्ष की सभी 12 पूर्णिमा के नाम और अपने अपने प्रभाव हैं :- 1. चैत्र की पूर्णिमा के दिन हनुमान जयंती मनाई जाती है। 2. वैशाख की पूर्णिमा के दिन बुद्ध जयंती मनाई जाती है। 3. ज्येष्ठ की पूर्णिमा के दिन वट-सावित्री मनाया जाता है। 4. आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू-पूर्णिमा कहते हैं, इस दिन गुरु पूजा का विधान है। इसी दिन कबीर जयंती भी मनाई जाती है। 5. श्रावण की पूर्णिमा के दिन रक्षाबन्धन का पर्व मनाया जाता है। 6. भाद्रपद की पूर्णिमा के दिन उमा माहेश्वर व्रत मनाया जाता है। 7. अश्विन की पूर्णिमा के दिन शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। 8. कार्तिक की पूर्णिमा के दिन पुष्कर मेला और गुरुनानक जयंती पर्व मनाए जाते हैं। 9. मार्गशीर्ष की पूर्णिमा के दिन श्री दत्तात्रेय जयंती मनाई जाती है। 10. पौष की पूर्णिमा के दिन शाकंभरी जयंती मनाई जाती है, जैन धर्म के मानने वाले पुष्यभिषेक यात्रा प्रारंभ करते हैं। बनारस में दशाश्वमेध तथा प्रयाग में त्रिवेणी संगम पर स्नान का बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। 11. माघ की पूर्णिमा के दिन संत रविदास जयंती, श्री ललित और श्री भैरव जयंती मनाई जाती है, माघी पूर्णिमा के दिन संगम पर माघ-मेले में जाने और स्नान करने का विशेष महत्व है। 12. फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन होली का पर्व मनाया जाता है।

खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार इस दिन चन्द्रमा का प्रभाव काफी तीव्र होता है, इस कारण शरीर के अंदर न्यूरॉन सेल्स क्रियाशील हो जाते हैं, और ऐसी स्थिति में मनुष्य ज्यादा उत्तेजित या या भावुक रहता है। एक बार नहीं, प्रत्येक पूर्णिमा को ऐसा होता रहता है, तो व्यक्ति का भाग्य भी उस क्रिया से प्रभावित होता है। अक्सर देखा जाता है कि पूर्णिमा की रात कुछ लोगों का मन बेचैन रहता है, और नींद कम आती है। संवेदनशील दिमाग वाले लोगों के मन में आत्महत्या करने के विचार बनने लगते हैं। चांद का धरती के जल से सम्बंध है, जब जब पूर्णिमा आती है, समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है, क्योंकि चंद्रमा समुद्र के जल को ऊपर की ओर उठाता है। मानव के शरीर में भी लगभग 66% जल रहता है।

पूर्णिमा के दिन इस जल की गति और गुण बदल जाते हैं। जिन्हें मंदाग्नि रोग होता है, या जिनके पेट में चय-उपचय की क्रिया शिथिल होती है, तब अक्सर सुनने में आता है कि, ऐसे व्यक्ति भोजन करने के बाद नशा जैसा महसूस करते हैं, और नशे में न्यूरॉन सेल्स शिथिल हो जाते हैं, जिससे दिमाग का नियंत्रण शरीर पर कमजोर हो जाता है, और भावनाओं पर केंद्रित हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों पर चन्द्रमा का प्रभाव कुछ इस प्रकार होता है कि उनका मन गलत दिशा लेने लगता है। इस कारण हर माह पूर्णिमा व्रत रखने की सलाह दी जाती है। व्रत के साथ साथ इस दिन तामसिक वस्तुओं का सेवन भी नहीं करना चाहिए। मदिरा इत्यादि से दूर रहना चाहिए। क्योंकि इस दिन तामसिक भोजन करने से मनुष्य के शरीर पर ही नहीं अपितु मन और फिर कर्म व कर्मफल भी प्रभावित होते हैं। चौदस, पूर्णिमा और प्रतिपदा यह 3 दिन पवित्रता बने रहने में ही भलाई है।

अमावस्या :- चन्द्रमा की सोलह कला हैं, इनमें सोलहवीं कला का नाम “अमा” है, स्कन्द-पुराण में एक श्लोक है :-
अमावस्या षोडशभागेन देवी प्रोक्ता महाकला।

संस्थिता परमा माया देबिना देहधारिणी।।

चन्द्रमण्डल की सोलह कलाओं में ‘अमा’ नाम की भी एक महाकला है, जिसमे चन्द्रमा की सोलह कलाएं समाहित हैं, जिसका कभी क्षय या उदय नहीं होता, आसान शब्दों में कहा जाये तो, सूर्य और चंद्रमा के मिलन काल को अमावस्या कहते हैं, ज्योतिष में चन्द्रमा को मन का देवता माना गया है। अमावस्या के दिन चन्द्रमा दिखाई नहीं देता। ऐसे में जो लोग अति भावुक होते हैं, जैसे लड़कियां और महिलाएं, इन पर इस खगोलीय घटना का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, क्यों की ये मन से बहुत ही भावुक होती हैं, इस दिन संवेदनशील लोगों विशेषकर लड़कियों और महिलाओं के मन में हलचल अधिक बढ़ जाती है। इस के अतिरिक्त जो व्यक्ति नकारात्मक सोच वाला होता है, उसे नकारात्मक शक्ति अपने प्रभाव में ले लेती है। अमावस्या माह में एक दिन आती है। शास्त्रों में अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है। अमावस्या सूर्य और चन्द्र के मिलन का काल है, इस दिन दोनों एक ही राशि में रहते हैं। क्योंकि अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव है, इसी लिए यह धारणा प्रचलित हुई की इस दिन भूत-प्रेत पितृ, पिशाच, निशाचर जीव-जंतु और दैत्य अधिक सक्रिय और उन्मुक्त रहते हैं। अतः इस दिन कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस दिन तामसिक भोजन और मादक वस्तुओ का सेवन करने से बचना चाहिए। मांसाहार का सेवन नहीं करना चाहिए। शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए इन वस्तुओं का शरीर पर ही नहीं, मन पर भी दुष्प्रभाव होता है। अच्छी बात तो यह होगी कि चौदस, अमावस्या और प्रतिपदा इन तीनों दिन पवित्र रहकर सात्विक आहार और ब्रह्मचर्य का पालन करने में ही भलाई है ।कुछ मुख्य अमावस्या : भौमवती अमावस्या, मौनी अमावस्या, शनि अमावस्या, हरियाली अमावस्या, दिवाली अमावस्या, सोमवती अमावस्या, सर्वपितृ अमावस्या।

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