नीलम Neelam धारण

नीलम कब धारण करें-

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नीलम रत्न शनि ग्रह का रत्न है, यह रत्न नवरत्नों में से एक और मूल्यवान तथा अति प्रभावशाली रत्न है, शनि ग्रह का प्रतिनिधि यह रत्न चमत्कारी और तुरंत अपना प्रभाव प्रकट करने वाला, किस्मत पलटने की ताकत रखने वाला माना गया है।
इस रत्न के विषय में लोक मान्यता यह है कि, यह रत्न विरले ही किसी जातक को अनुकूल बैठता है। जिस किसी को अनुकूल बैठता है, उसकी किस्मत ही पलट देता है। यह रत्न रंक से राजा भी बना देता है, और अनूकूल नहीं बैठने पर राजा से रंक भी बना देता है।
मैने अनेक ऐसे जातकों को नीलम धारण करने की सलाह दी है, जिनकी जन्म कुंडली में शनि ग्रह योगकारक है, अथवा योगकारक होकर शुभ ग्रहों के साथ युति बना रहा है, या फिर योगकारक होकर शुभ स्थान में स्थित है।

वस्तुत: मैंने नीलम धारण करवाने के बाद उन जातकों के जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन देखा है। उनमें से कुछ तो आर्थिक संकट के चलते न केवल अपना व्यापार ही बंद कर चुके थे, बल्कि भयंकर कर्ज से दबे हुये भी थे, और कुछ का व्यापार बंद होने के कागार पर था। कुछ लोग ऐसे भी थे जो नौकरी-पेशा थे, और अपने अधिकारियों से तंग आकर नौकरी छोड चुके थे, उनके सामने भी भयंकर आर्थिक संकट मंडरा रहा था। ऐसी स्थिति में कुंडली का पूर्ण विश्लेषण करने की आवश्यकता होती है, मैंने अपने 32 वर्ष के अनुभव से और ज्योतिष के मूल सिद्धांतों को कुंडलियों पर लागू करने के बाद ही कहा कि, जातक की कुंडली में शनि ग्रह विशेष स्थिति में स्थित है। इस लिये नीलम धारण करने से न केवल समस्या का समाधान होगा अपितु अत्यंत आर्थिक सहायता भी प्राप्त होगी।
नीलम धारण करने के मामले में पहले किसी दीर्घ-अनुभवी विद्वान ज्योतिषाचार्य से सलाह अवश्य लेनी चाहिये। क्योकि कभी-कभी शनि ग्रह का चमत्कारी रत्न ‘‘नीलम’’ शनिग्रह जैसे क्रूर स्वाभाव को भी धारक पर प्रकट कर देता है, इसी लिये विशेष परिस्थितीयों में ही तथा शनि ग्रह की अनुकूलता प्राप्त करने के लिये ‘‘नीलम रत्न’’ धारण करने की सलाह अवश्य दी जाती है।

कब धारण करें नीलम :-
नीलम के विषय में मेरा अपना पिछले 32 वर्ष का अनुभव रहा है कि, नीलम रत्न केवल वृष एवं तुला लग्न वालों को ही धारण करना चाहिये, वह भी कुंडली का पूर्ण विश्लेषण के उपरांत क्योकि तुला लग्न के लिये शनि चतुर्थेश-पंचमेश होता है, और वृष लग्न के लिये शनि नवम और दशम स्थान का स्वामी होकर योगकारक ग्रह कहलता है। परंतु वृष-तुला लग्न में जब शनि की स्थिति कुंडली के किसी केन्द्र या त्रिकोण स्थान में हो। जैसे-

1. वृष लग्न की कुंडली में नवमेश-दशमेश शनि की स्थिति यदि नवम स्थान में हो, तो (शनि इस लग्न में केन्द्र-त्रिकोण नवम-दशम दोनो स्थान) का स्वामी होगा, और नवम स्थान में स्वगृही (अपनी मकर राशि) में योगकारक स्थित में होने के कारण अत्यंत शुभ फल प्रकट करेगा। परंतु इस शुभ योग के लिये शर्त यह है कि इस स्थान में शनि के साथ कोई पाप स्थान का स्वामी ग्रह स्थित नहीं होना चाहिये, अथवा कुंडली के इस स्थान में शनि वक्री नहीं होना चाहिये। यदि शनि नवम में वक्री या किसी पाप स्थान के स्वामी के साथ स्थित होगा, तब शनि रत्न नीलम का अशुभ फल होगा अथवा नीलम धारण के शुभ प्रभाव में कमी हो जायेगी। वृष लग्न की कुंडली में नवम भाव स्थित शनि के शुभ प्रभाव में कमी तब भी होती है, जब शनि ग्रह अपनी इस राशि में वाल्यावस्था, कुमारावस्था, वृद्धावस्था अथवा मृतावस्था में हो। वृष लग्न और नवम भाव में पाप युक्त या वक्री स्थिति में शनि नहीं है, तब भी अवस्था देखना आवश्यक है।

शनि की अवस्था (शनि की स्थिति वृष या तुला लग्न तथा कुम्भ राशि में) –

बाल्यावस्था- में शनि (24 से 30 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
कुमारावस्था- में शनि (18 से 24 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
युवावस्था- में शनि (12 से 18 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 100 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
वृद्धावस्था- में शनि (06 से 12 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
मृतावस्था- में शनि (00 से 06 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।

शनि की अवस्था- (शनि की स्थिति वृष या तुला लग्न तथा मकर राशि में) –

मृतावस्था- में शनि (00 से 06 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
वृद्धावस्था- में शनि (06 से 12 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
युवावस्था- में शनि (12 से 18 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 100 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
कुमारावस्था- में शनि (18 से 24 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
बाल्यावस्था- में शनि (24 से 30 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।

2. वृष लग्न की कुंडली में दशम स्थान कुम्भ राशि (मूल त्रिकोण राशि) का शनि न केवल योगकारक होता है, मकर से अधिक शुभ फल प्रदान करता है। इस कुम्भ राशि में दशम (केन्द्र) में स्थित शनि भी यदि किसी पाप स्थान के स्वामी के साथ स्थित नहीं, वक्री नहीं है, और युवावस्था में भी है, शनि ग्रह शुभ व बलवान माना जाता है, और नीलम धारण करने वाले धारक को अत्यंत शुभफल की प्राप्ति होती है। परंतु यदि अवस्था में भी कमजोर हो, तो तब यह शनि का रत्न नीलम पूर्ण शुभ फल नहीं देता, अपितु नीलम धारण करने वाले को न्यून शुभफल ही प्राप्त होता है।

3. तुला लग्न की कुंडली में शनि चतुर्थ व पंचम स्थान का स्वामी होकर योगकारक होता है, इस लिये तुला लग्न वाले जातक की कुंडली में शनि की स्थिति यदि चतुर्थ या पंचम में हो, और शनि ग्रह के मार्गी तथा युवावस्था में होने पर जातक नीलम धारण करके 100 प्रतीशत शुभ फल प्राप्त करते हैं। तथा बाल्य, कुमार, वृद्ध और मृत अवस्था में अथवा शनि ग्रह का पाप स्थान के स्वामी से सम्बंध अथवा शनि के वक्री होने पर शुभ फल में कमी हो जाती है।
विशेष– वृष तथा तुला लग्न वाले जातक के लिये शनि की स्थिति इन दो स्थानों (नवम-दशम अथवा चतुर्थ-पंचम स्थान) के अतिरिक्त भी (कुंडली के अन्य भावों में) शुभ हो सकती है, परंतु वह स्थिति कितनी शुभ या अशुभ होगी, कुंडली के अन्य ग्रहों की स्थिति के अनुसार ही निर्णय किया जा सकता है। अतः नीलम धारण से शुभाशुभ फल प्राप्त हो सकता है, अथवा नहीं? यदि शुभफल प्राप्त हो सकता है, तो कितने प्रतीशत? इस शुभाशुभ का निर्णय कुंडली का पूर्ण विश्लेषण करने के पश्चात ही हो सकता है।

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रोग और ज्योतिष शास्त्र

रोग और ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन :-

Dr.R.B.Dhawan

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ज्योतिष शास्त्र ग्रह नक्षत्रों पर आधारित एक ऐसा विज्ञान है, जो अपने आप में परिपूर्ण शास्त्र है, यही एक ऐसी विद्या है, जिसका कथन शतप्रतिशत सही हो सकता है, इसमें संभावनाओं का कोई स्थान नहीं है, इस विद्या का वास्तविक जानकार बिलकुल सटीक भविष्यवाणी कर सकता है। इस शास्त्र की सहायता से जीवन के हर अंग, हर रंग, हर भाग में घटने वाली घटना, और हर मानवीय आवश्यकता, तथा मनुष्य के हर कष्ट का निवारण तथा घटना के घटने का समय पता लगाया जा सकता है। आयुर्वेद और ज्योतिष शास्त्र, तंत्र और ज्योतिष शास्त्र इन सब का परस्पर सम्बन्ध है, बल्कि यह कहना ठीक होगा कि इन का चोली-दामन का सम्बंध है। आज से 50-60 वर्ष पहले तक भारत में 90 प्रतीशत लोग आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति पर ही निर्भर थे, उस समय के सभी आयुर्वेदाचार्य ज्योतिष शास्त्र का समुचित ज्ञान रखते थे। दरअसल आयुर्वेद में औषधि निर्माण और औषधि सेवन के लिये सम्बंधित मंत्र और सम्बंधित नक्षत्र की जानकारी होना आवश्यक था। ज्योतिषाचार्य तो जातक की कुंडली देखकर भविष्य में होने वाले रोगों की जानकारी भी प्राप्त कर लेते थे। वे जानते थे कि जातक में किस तत्व की कमी या किस तत्व की अधिकता रहेगी। दरअसल मानव जीवन के साथ ही रोग का इतिहास भी आरम्भ हो जाता है, रोगों से रक्षा हेतु मानव ने प्रारम्भ से ही प्रयास आरम्भ कर दिया था। तथा आज तक इसके निदान एवं उपचार हेतु प्रयत्न कर रहा है। जब हैजा, प्लेग, टी. बी. आदि संक्रामक रोग से ग्रस्त होकर इनसे छुटकारा पाने के लिये विविध प्रकार का अन्वेषण हुआ तो कालांतर में पुनः कैंसर एड्स, डेंगू, स्वाईन फ्लू, ओर फिर ईबोला जैसे अनेक नये रोग पैदा हो गये हैं, जिनके समाधान एवं उपचार हेतु आज समस्त विश्व प्रयत्नशील है। विडंबना है कि मनुष्य जितना ही प्राकृतिक रहस्यों को खोजने का प्रयत्न करता है, प्रकृति उतना ही अपना विस्तार व्यापक करती चली जाती है। जिससे समाधान के समस्त प्रयास विश्व के लिये नगण्य पड़ जाते हैं, इसका एक कारण मनुष्य में सदाचार का आभाव भी प्रतीत होता है। हमारे ऋषियों ने जहां अणुवाद, प्रमाणुवाद को व्याखयायित किया, अध्यात्म की गहराइयों में गोता लगाया, सांख्य के प्रकृति एवं पुरूष से सृष्टि प्रक्रिया को जोड़ा, वहीं आकाशीय ग्रह नक्षत्रों को अपनी समाधि से कोसों दूर धरती पर बैठकर वेधित किया, तथा उनके धरती पर पड़ने वाले शुभाशुभ प्रभाव को मानव जीवन तथा रोगों के साथ जोड़कर व्याखयायित भी किया। विश्व के सर्वप्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद से रोगों का परिज्ञान आरम्भ हो जाता है। जिसमें पाण्डूरोग, ह्रदय रोग, उदररोग, एवं नेत्ररोग आदि की चर्चा प्राप्त होती है। पौराणिक कथाओं में तो विविध रोगों की चर्चा एवं उपचार के लिये औषधि, मंत्र एवं तंत्र आदि का प्रयोग प्राप्त होता है। आर्ष परम्परा में तो रोगों के विनिश्चयार्थ ज्योतिषीय, शास्त्रीय ग्रहयोगों सहित आयुर्वेदीय परम्परा का प्रयोग दर्शनीय है। विषय को अधिक न बढाते हुए आगे की पंक्तियों में पक्षाघात और पक्षाघात के ज्योतिषीय योग लिख रहा हूं, जो मेरी ही लिखी एक पुस्तक “रोग एवं ज्योतिष” के अंश हैं :- पक्षाघात, लकवा या फालिज़ एक ऐसा रोग है जिस में शरीर के दाहिने या बायें या फिर किसी पार्शव के कुछ या सब अंग क्रियाहीन या चेतनाहीन हो जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह रोग वायु के कूपित हो जाने के कारण होता है। अंग्रेजी भाषा में इसे paralysis कहा जाता है, इसमें तंत्रिका-तंत्र संस्थान nerves system के कार्य में बाधा या कार्यक्षमता की क्षीणता हो जाती है। फलित ज्योतिष की दृष्टि में तंत्रिका-तंत्र संस्थान nerves system से सम्बंधित रोगों का सूचक बुध ग्रह है। इस बुध ग्रह के कारकत्व में तंत्रिका-तंत्र तथा स्नायु प्रदेश के लिये कारक ग्रह शनि है, इस स्नायु संस्थान तथा तंत्रिका-तंत्र के बाधित होने के पीछे कुण्डली में बुध ग्रह पर शनि ग्रह का प्रभाव होता है। शनि ग्रह जब कुण्डली के बुध ग्रह पर अपना दूषित प्रभाव डाल रहा हो, तब शरीर के किसी अंग का संज्ञाहीन होना या अंगहीनता होती है। शनि ग्रह स्वंय लंगडा ग्रह माना गया है। इस के साथ-साथ कुण्डली में रोग का विचार छटे भाव या या उस भाव के कारक शनि एवं मंगल से किया जाता है। इसी प्रकार राशि वर्ग की छटी राशि कन्या भी इस रोग के निर्धारण में विचारणीय मानी जाती है। कुण्डली के आठवें और बारहवें भाव का विचार भी आवश्यक है, क्योकि इनसे यह जानने में सहायता मिलती है कि रोग दीर्घकाल तक चलेगा या अल्प काल तक? पक्षाघात paralysis या लकवा मुख्यतः एक जटिल रोग है, जातक की कुंडली मे इस रोग की कितनी संभावना है? यह जानने के लिये कुछ ज्योतिष के ग्रन्थों में ग्रहयोग वर्णित हैं- यदि कुण्डली का लग्न कन्या है, और लग्न व लग्नेश बुध अशुभ ग्रहों से पीड़ित है तो, तंत्रिका-तंत्र nerves system पर अवश्य इस रोग का आक्रमण संम्भव है। धनु या कुम्भ के मामले में भी इस रोग का आक्रमण हो सकता है। यह राशियां अशुभ ग्रहों द्वारा पीड़ित होने पर ही इस रोग की सूचना देती हैं। अशुभ शनि छटे भाव में पैर के रोग की ओर संकेत करता है, जातक लचक कर या लंगडाकर चलता है। यह पक्षाघात के अलावा जन्म से या फिर पैर में कोई गंभीर चोट लगने से भी हो सकता है। आयुर्वेद के मतानुसार इस रोग की गणना वात रोगों में की जाती है, आयुर्वेद में वात रोग लगभग 80 प्रकार के बताये गये हैं। यहां इस सम्बन्ध में अधिक न लिखकर यह कहना चाहूंगा की मेरी एक पुस्तक “रोग एवं ज्योतिष” (medical astrology) का अध्ययन अवश्य करें, जिसमें अधिकांश रोगों के ज्योतिषीय कारण या कह लीजिये रोगों के ग्रहयोग जो प्राचीन तथा नवीन खोजों पर आधारित हैं दिये गये हैं, साथ ही इन रोगों की शास्त्रीय मंत्रादि द्वारा उपचार भी यथासम्भव दिया गया है,‌ यह पुस्तक इस विषय की खोज करनेवाले विद्यार्थियों की बहुत सहायता कर सकती है। मेरे विचार से यह पुस्तक ज्योतिष का रोगात्मक अध्ययन करने वाले विद्वानों तथा खोज करने, अनुसंधान करने वालो के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।

शुक्राचार्य संस्थान द्वारा ज्योर्तिविज्ञान के साथ साथ सरल उपाय की कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित की गई हैं, जिन में प्रमुख हैं –

  1. गुरूजी के टोटके
  2. गुरूजी की साधनाएँ
  3. वास्तु सूत्र
  4. कैसे बदलें भाग्य
  5. दुर्लभ समृद्धि प्रदायक वस्तुयें
  6. भृगु संहिता योग एंव फलादेश
  7. लाल किताब योग एंव उपाय
  8. ज्योतिष के योग एवं फलादेश
  9. रोग एवं ज्योतिष
  10. विवाह एवं दाम्पत्य सुख

मेरे और लेख देखें :- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in,gurujiketotke.com, vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com पर भी।

कुंडली का नवम स्थान

Dr.R.B.Dhawan

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सदा से ही मनुष्य की यह जानने की इच्छा रही है कि उसका भाग्य कब व कैसे उदय होगा? भविष्य कैसा होगा? वर्तमान की स्थिति क्या है? जीवन में सफलता व असफलता कब-कब व किस-किस मात्रा में प्राप्त होगी? गृहस्थ जीवन, आर्थिक स्थिति, नौकरी या व्यापार, लॉटरी आदि ऐसे भी प्रश्न हैं जिनका हल मनुष्य चाहता है, और इसके लिये वह यहाँ-वहाँ भटकता है। परन्तु इन सभी समस्याओं का हल यदि है तो वह केवल ज्योतिषी के पास।
ज्योतिषी के पास जाकर मनुष्य दो बातें जानने को विशेष ही उत्सुक रहता है- एक अर्थ व दूसरा भाग्य। मैं यहाँ इन्हीं दो भावों पर अर्थात् नवम एवं द्वितीय भाव पर ही इस लेख को केन्द्रित रखना चाहूँगा।
द्वितीय भाव से वह द्रव्य जो पैत्रिक संपत्ति के रूप में प्राप्त होता है, का ज्ञान प्राप्त हो सके अतिरिक्त इस भाव से कुटुम्ब, स्नेही, भाषण कला, सुखभोग, मृत्यु के कारण, प्रारम्भिक शिक्षा आदि का ज्ञान भी प्राप्त किया जाता है। हर उस विद्वान को जो ज्योतिष विषय में रुचि रखता हो, सर्वप्रथम निम्न बातों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिये –

  1. दूसरे भाव की राशि।
  2. द्वितीय स्वामी व उसकी स्थिति।
  3. दूसरे भाव में स्थित ग्रह।
  4. द्वितीय या द्वितीयेश पर दृष्टि।
  5. कारक, अकारक एवं तटस्थ ग्रह।
  6. विशेष योग।
  7. मैत्री व शत्रुता।

यदि इस स्थान में मेष राशि है तो वह व्यक्ति आर्थिक मामलों में अनिश्चित रहता है। धन जिस प्रकार आता है उसी प्रकार खर्च भी हो जाता है। भाग्योदय विवाह के उपरांत होता है, परन्तु स्त्री से अनबन सदैव रहती है। इनकी प्रवृत्ति प्रदर्शनमय रहती है।
द्वितीय स्थान में वृषभ राशि होने पर अर्थ संचय होता है, पर टिकता नहीं। जीवन में कठिनाइयाँ कभी साथ नहीं छोड़तीं। जीवन में 18, 22, 24, 33, तथा 35वाँ वर्ष सफल कहा जा सकता है।
मिथुन राशि आर्थिक स्थिति को कमजोर बनाती है। जातक की भावुकता अर्थ लाभ में बाधक बनी रहती है। ये जातक व्यापार में सफल रहते हैं तथा छोटे लघु उद्योग, शिक्षा आदि के क्षेत्रों में ही सफलता प्राप्त करते हैं।
कर्क राशि कजूंसी की सूचक है। परिश्रम के अनुपात में जातक को लाभ नहीं मिलता। 20, 26, 27, 33, 34, 36, 45, 53, एवं 54वाँ वर्ष महत्वपूर्ण रहता है।
सिंह राशि द्वितीय भाव में होने पर बाल्यकाल आनन्दमय निकलता है। मध्यआयु में ये धन उड़ा देते हैं या व्यापार आदि में हानि होती है तथा भाग्य हमेशा इन्हें साथ देता है।
कन्या राशि होने पर जातक सम्पन्न नहीं होता। प्रारंभिक काल अर्थ संकट में गुजारते हुये परिश्रम से अर्थोपार्जन करते हैं। गर्म मिजाज व शीघ्र निर्णय हानि करवाता है। इन्हें व्यापार विशेष कर श्रृंगारिक वस्तुओं से लाभ होता है।
तुला राशि होने पर जातक शानो-शौकत में धन अधिक खर्च करता है, व्यापार इन्हें लाभ देता है। ये च्संद बना सकते हैं, पर निभा नहीं सकते। धन अनुचित कार्यों में व्यय होता है पर भाग्य फिर भी साथ देता है।
इस भाव में वृश्चिक राशि हो तो जातक के जीवन को डावांडोल कर देती है। नौकरी इन्हें हितकर नहीं होती। प्रवृत्ति वाणिज्य प्रधान होती है। कुटुम्ब व स्नेही ही इन्हें हानि देते हैं।
धनु राशि दूसरे घर में हो तो जातक लापरवाह होता है। साझेदारी इन्हें हानिकारक होती है। सहयोगी सदैव धोखा देते हैं। जीवन में कई उजार-चढ़ाव आते हैं। 24, 27, 28, 32, से 34, 37, 42, 48, 52, 54 तथा 58वाँ वर्ष उत्तम रहता है।
मकर राशि द्वितीय भाव में होने पर जातक सौभाग्यशाली होते हैं। ये हर योजना में सफल रहते हैं, इन्हें चाहिये कि ये स्वतन्त्र व्यापार करें।
कुंभ राशि होने पर भी जातक सम्पन्न होता है। इनकी आय के स्त्रोत कई होते हैं। पत्रकारिता, लेखन, प्रकाशन, व्यापार, राजनीति के कार्यों में लाभ प्राप्त करते हैं। अधिक विश्वासी इन्हें धोखा देता है, उत्तरार्ध जीवन को बनाता है।
मीन राशि दूसरे भाव में होने पर 22, 24, 28, 32, 33, 34, 37, 42, 48, 52, 54 एवं 55 वाँ वर्ष महत्वपूर्ण होता है। इन्हें अपने मनोभावों व विचारों पर नियंत्रण नहीं होता। ये जातक डॉक्टरी, वैद्यक दवाइयों के विक्रेता बनकर धन प्राप्त कर सकते हैं। यह धन संग्रह करने में सिद्ध हस्त होते हैं।

अब आगे की पक्तियों में द्वितीय भावस्थ ग्रहों का फल स्पष्ट करने का प्रयास करूंगा-
द्वितीय भाव में सूर्य – घन के संबंध में चिन्तित, पितृअर्जित धन नहीं मिलता, उत्तरार्ध-पूर्वाद्ध से सफल होता है। मध्यकाल में रोग, व्यापारिक कार्यों में सफल होते हैं।
द्वितीय भाव में चंद्र – सुखी, सम्पन्न, वृहद परिवार, स्त्रीपक्ष से सौभाग्यशाली, स्त्रीपक्ष के सम्पर्क से धनोपार्जन। चंद्रमा व्यक्ति को पत्रकार या लेखक बनाता है। पुस्तक व्यवसाय, प्रकाशन या लेखन से भाग्योदय होता है।
द्वितीय भाव में मंगल – दूसरे भाव में मंगल कमजोर आर्थिक स्थिति, धन गतिमान, कमजोर विद्या क्षेत्र, वार्तालाप मे पटु बनाता है। ऐसे जातक सेल्समेन बन सकते हैं।
द्वितीय भाव में बुध – कट्टर धर्म प्रिय, अर्थ संचय में प्रवीण, भाषण कला में दक्ष।
द्वितीय भाव में गुरू – दूसरे भाव में गुरू हो तो जातक धार्मिक नेता बनता है। कवि, लेखक या धर्मोपदेशक। लेखन कार्य से अर्थाेंपार्जन। सफल वैज्ञानिक हो सकता है। स्त्री पक्ष प्रबल ससुराल से अर्थ लाभ।
द्वितीय भाव में शुक्र – बड़ा परिवार, काम निकालने में चतुर, अर्थाभाव इन्हें कभी नहीं होता। ऐसे व्यक्ति डॉक्टर, वैद्य, पत्रकार या व्यवसायी होते हैं।
द्वितीय भाव में शनि – यह शुभ सूचक नहीं होता। यदि शनि स्वग्रही न हो तो जातक को धनहीन, परेशान व दुःखी करता है। धन के लिये संघर्ष करना पड़ता है। पर शनि स्वग्रही बन द्वितीय स्थानस्थ हो तो जातक का बाल्यकाल दुःख व अभाव में व्यतीत होता है परंतु युवावस्था तथा वृद्धावस्था शुभ सूचक होती है। अर्थ का आभाव नहीं रहता है।
द्वितीय भाव में राहु – जातक रोगी, स्वभाव से चिड़चिड़ा, कष्टप्रद, छोटे परिवार की स्थिति वाला होता है।
द्वितीय भाव में केतु – कटुभाषी धोखा देने वाला, दृढ़ निश्चयी। पिता की संपत्ति इन्हें कभी प्राप्त नहीं होती। उत्तरार्द्ध सुन्दर व धन सूचक। यदि सूर्य उच्च का होकर 11 वें भाव में हो तो जातक लखपति बनता है।

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नोट: व्यक्तिगत समस्या या कुंडली का विश्लेषण नहीं बताया जायेगा।

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