कालसर्प योग

कुंडली में कालसर्प योग का क्या प्रभाव होता है? कालसर्प योग जातक पर किस प्रकार अपना शुभ या अशुभ प्रभाव डालता है ? :-

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विविध धर्मग्रन्थों एवं शास्त्रों में सर्पदोषों का वर्णन मिलता है। वर्तमान में प्राचीन एवं नवीन ज्योतिषाचार्यों के मध्य कालसर्प योग के विषय में मन्त्रणा प्रारम्भ हो चुकी है। यदि हम प्राचीन ग्रन्थ मानसागरी, बृहज्जातक तथा बृहत्पाराशर होराशास्त्र का अवलोकन करें तो यह सिद्ध हो जाता है कि इन ग्रन्थों में कालसर्पयोग अथवा सर्पयोग का उल्लेख किया गया है।

भारतीय संस्कृति में नागों का विशेष महत्व है। प्राचीन काल से ही नागपूजा की जाती रही है। नागपंचमी का पर्व पूरे देश में पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन प्रत्येक गृहस्थ घर के प्रवेशद्वार पर नाग की आकृति बनाकर पूजन करता है। इस दिन नागदर्शन को अत्यन्त शुभ माना जाता है। इन्हें शक्ति एवं सूर्य का अवतार माना गया है। मानव-सभ्यता के प्रारम्भ से ही नागों के प्रति विशेष भय की भावना रही है। भारत के प्रत्येक क्षेत्र में भगवान् आशुतोष के पूजन का विधान होता है। नाग भगवान् शिव के गले का हार हैं।

सप्ताह के सात दिनों के नाम किसी-न-किसी ग्रह के ऊपर रखे गये हैं, किंतु राहु केतु के नाम पर कोई नाम नहीं रखा गया; क्योंकि इन्हें छायाग्रह माना जाता है। इसलिये इनका प्रभाव भी परोक्ष रूप से पड़ता है। राहु का स्वभाव शनिवत् एवं केतु का मंगलवत् माना जाता है। एक शरीर के भागों में राहु को सिर एवं केतु को धड़ मानने पर सिर में विचार-शक्ति होती है, किंतु शरीर न होने पर यह स्वयं क्रिया करने में असमर्थ होता है। राहु जिस भाव में होता है, उसके भावेश, उस भाव में स्थित ग्रह या जहाँ दृष्टि डालता है उस राशि, राशीश एवं उस भाव में स्थित ग्रह को अपनी विचारशक्ति से प्रभावित कर क्रिया करने को प्रेरित करता है। केतु जिस भाव में बैठता है उस राशि, उसके भावेश, केतु पर दृष्टिपात करने वाले ग्रह के प्रभाव में क्रिया करता है। केतु को मंगल के समान मान लेने पर उसका प्रभाव मंगल के समान विध्वंसकारी हो जाता है। अपनी महादशा एवं अन्तर्दशा में व्यक्ति के कर्म को भ्रमित कर सुख-समृद्धि का हृास करता है।

राहु की महादशा बाधाकारक होती है। यहाँ विचारणीय यह है कि राहु सम्बन्धित ग्रह के माध्यम से बुद्धि को प्रभावित करता है, एवं केतु सम्बन्धित ग्रह के प्रभाव में आकर उस ग्रह के अनुिसार कार्य करवाता है।

राहु के सम्बन्ध में एक बात अवश्य विचारणीय है कि राहु जिस ग्रह के सम्पर्क में हो, उसके अंश राहु से कम होने पर राहु प्रभावी रहेगा, जबकि राहु के अंश कम होने पर उस ग्रह का प्रभाव अधिक होगा एवं राहु निस्तेज हो जायगा, उस स्थिति में कालसर्प योग का प्रभाव भी न्यूनतम रहेगा। कालसर्प योग राहु से केतु एवं केतु से राहु की ओर बनता है। यहाँ विचारणीय यह है कि राहु से केतु की ओर बननेवला योग निष्प्रभावी होता है। यह कहना उपयुक्त होता है कि केतु से राहु की ओर बननेवाले योग को कालसर्प की संज्ञा देना उपयुक्त नहीं होगा।

वैज्ञानिक रूप से यदि कालसर्प योग की व्याख्या करें तो जन्मांग-चक्र में राहु-केतु की स्थिति हमेशा आमने-सामने की होती है। जब अन्य सभी ग्रह इनके मध्य अर्थात् प्रभावक्षेत्र में आ जाते हैं, तब वे अपना प्रभाव त्यागकर राहु केतु के चुम्बकीय क्षेत्र से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते एवं राहु-केतु के गुण-दोषों का प्रभाव पड़ना इन ग्रहों पर अवश्यम्भावी हो जाता है।

राहु-केतु हमेशा वक्रगति से चलते हैं। इनमें वाम गोलार्ध एवं दक्षिण गोलार्ध दो स्थितियाँ बनती हैं। राहु का बायाँ भाग काल कहलाता है। इसीलिये राहु से केतु की ओर बननेवाला योग ही कालसर्प योग की श्रेणी में आता है। केतु से राहु की ओर बनने वाले योग को अनेक आचार्यों ने कालसर्प योग नहीं माना है। इतना अवश्य है कि कालसर्प योग का निर्माण किसी-न-किसी पूर्वजन्मकृत दोष अथवा पितृदोष के कारण बनाता है।

निम्न चक्रद्वारा कालसर्प योग को स्पष्टतः समझा जा सकता है-

उदित गोलार्ध कालसर्प योग कुंडली

अनुदित गोलार्ध कालसर्प योग कुंडली

उदित गोलार्ध कालसर्प योग जन्म से ही प्रभावी हो जाता है, जबकि अनुदित का प्रभाव गोचर में ग्रह के राहु के प्रभाव में आने पर होता है। अतः उदित का प्रभाव अधिक भयावह होता देखा गया है।

किसी जन्मांग में कालसर्प योग का निर्धारण अत्यन्त सावधानी से करना चाहिये। केवल राहु-केतु के मध्य ग्रहों का होना ही प्रर्याप्त नहीं है। यहाँ अनेक ऐसे बिन्दु हैं, जिनका ध्यान न रखें तो हमारी दिशा एवं जातक की दशा खराब होने में अधिक समय नहीं लगेगा। सर्वप्रथम यह देखें कि कालसर्प योग किस भाव से किस भावतक है एवं ग्रह का भाव कया है उस भाव में ग्रहों की क्या स्थति बन रही है? ग्रहों की युति का क्या प्रभाव पड़ रहा है। यदि राहु के साथ किसी अन्य ग्रह की युति है तो यहाँ यह भी देखना है कि युति वाले ग्रह का बल राहु से कम है या अधिक। ऐसी स्थिति है तो राहु का न केवल प्रभाव कम होगा, अपितु कालसर्प योग भंग भी हो सकता है। यही स्थिति किसी ग्रह के राहु-केतु की पकड़ से बाहर निकले पर भी हो सकती है। अतः कालसर्प का निर्धारण सतही स्तर के विश्लेषण द्वारा करना चाहिए। यह योग जातक के लिये अत्यन्त ही दुःखदायी हो सकता है।
यहाँ पर एक बात और कहने योग्य है कि कालसर्प हमेशा कष्टकारक ही नहीं होते। कभी-कभी तो ये इतने अधिक अनुकूल होते हैं कि व्यक्ति को विश्वास्तर पर न केवल प्रसिद्ध बनाते हैं। अपितु सम्पत्ति, वैभव, नाम प्रसिद्धि के देनेवाले भी बन जाते हैं। आप विश्व के महापुरूषों के जन्मांगों का अध्ययन करें तो पायेंगे कि उनकी कुण्डली में कालसर्प योग होने के बाद भी वे प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचे। इतना अवश्यक है कि उनके जीवन का कोई-न-कोई पक्ष ऐसा अवश्य रहा है जो अपूर्णता का प्रतीक बन गया हो। कालसर्प योग से डरने या भयाक्रान्त होने की आवश्यकता बिलकुल भी नहीं है। जन्मकुण्डली में अनेक शुभ योग जैसे पंचमहापुरूष योग, बुधादित्य योग आदि बनते हैं, जिनके कारण कालसर्प योग का प्रभाव अत्यधिक नहीं होकर अल्पकालिक होता है। यदि आप विश्व के सफलतम व्यक्तियों के जीवन का अध्ययन करें तो निश्चित ही यह पायेंगे कि उनकी कुण्डली के कालसर्प योग ने ही उन्हें इस उच्चतम शिखर पर पहुँचाया।

किसी जातक की कुण्डली में कालसर्प योग है तो यह मानकर चलिये कि परिवार के अन्य सदस्यों के जन्मांग में भी यह योग देखने को मिलेगा; क्योंकि यह अनुबन्धित ऋण है, जो हमें पूर्वजों से मिलता है, एवं इससे परिवार के सभी सदस्य किसी-न-किसी रूप में प्रभावित होते हैं। इसे ही पितृदोष का नाम दिया जाता है। कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि ज्योतिषाचार्य द्वारा व्यक्ति इतना डरा दिया गया है कि वह ठीक ढंग से सोने भी नहीं पाता, जबकि कुंडली में कालसर्प योग था ही नहीं, या आंशिक प्रभाव पड़ रहा था, जिसका सहज निदान किया जा सकता था। अतः कालसर्प योग का निर्णय किसी योग्य एवं अनुभवी ज्योतिषी से कराकर उसका निदान करा लेना चाहिये।

आज समाज में ऐसे भी विद्वान ज्योतिषाचार्य हैं, जो अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर सही सलाह दे रहे हैं। इस लिये अनुभवहीन ज्योतिषियों को कुंडली दिखाने से बचने का प्रयास करना चाहिये।

कालसर्प योग के प्रकार :-
ज्योतिष में 12 राशियाँ हैं। इनके आधार पर 12 लग्न होते हैं, और इनके विविध योगों के आधार पर कुल 288 प्रकार के कालसर्प योग निर्मित हो सकते हैं। प्रमुख रूप से भाव के आधार पर कालसर्प योग 12 प्रकार के होते हैं, जिसके मान एवं प्रभाव निम्नानुसार हैं-

1- अनन्त कालसर्प योग- लग्न से सप्तम भाव तक बननेवाले इस योग को अनन्त कालसर्प योग कहा जाता है। इस योग के कारण जातक को मानसिक अशान्ति, जीवन की अस्थिरता, कपटबुद्धि, प्रतिष्ठाहानि, वैवाहिक जीवन का दुःखमय होना इत्यादि प्रभाव देखने को मिलते हैं। जातक को आगे बढ़ने के लिये काफी संघर्ष करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति निरन्तर मानसिक रूप से अशान्त रहता है।

2- कुलिक कालसर्प योग- द्वितीय स्थान से अष्टम स्थान तक पड़नेवाले इस योग के कारण जातक का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। जीवन में आर्थिक पक्ष को लेकर अत्यन्त संघर्ष करना पड़ता है। जातक कर्कश वाणी से युक्त होता है, साथ ही वह पारिवारिक विरोध एवं अपयशका भागी भी बनता है। योग की तीव्रता के कारण विवाह में विलम्ब के साथ विच्छेदतक भी होता रहता है।

3- वासुकि कालसर्प योग- यह योग तृतीय से नवमतक बनता है। पारिवारिक विरोध, भाई-बहनों से मनमुटाव, मित्रों से धोखा, भाग्य की प्रतिकूलता, व्यावसाय या नौकरी में रूकावटें, धर्म के प्रति नास्तिकता, कानूनी रूकावटें आदि बातें देखने को मिलती हैं। जातक धन अवश्य कमाता है, किंतु कोई-न-कोई बदनामी उसके साथ जुड़ी ही रहती है। उसे यश पद, प्रतिष्ठा पाने के लिये संघर्ष करना ही पड़ता है।

4- शंखपाल कालसर्प योग- यह योग चतुर्थ से दशम भाव में निर्मित होता है। इसके प्रभाव से व्यवसाय, नौकरी, विद्याध्ययन इत्यादि पक्षों में रूकावटें आती हैं। घाटे का सामना करना पड़ता है। वाहन एवं भृत्यों (नौकर) तथा कर्मचारियों को लेकर कोई-न-कोई समस्या हमेशा बनी रहती है। आर्थिक स्थिति इतनी अधिक खराब हो जाती है कि दिवालिया होने तक की परिस्थितियाँ आ सकती है।

5-पग कालसर्प योग- पंचम से एकादश भाव में राहु-केतु होने से यह योग होता है। इसके कारण सन्तान सुख में कमी या सन्तान का दूर रहना अथवा विच्छेद तथा गुप्तरोगों से जूझना पड़ता है। असाध्यरोग हो सकते हैं, जिनकी चिकित्सा में अत्यधिक धन का अपव्यय होता है। दुर्घटना एवं हाथों में तकलीफ हो सकती है। मित्रों एवं पत्नी से विश्वासघात मिलता है। यदि सट्टा, लाटरी, जुआ की लत हो तो इसमें सर्वस्व स्वाहा होने में देर नहीं लगती। शिक्षा प्राप्ति में अनेक अवरोध आते हैं। जातक की शिक्षा भी अपूर्ण रह सकती है। जिस व्यक्ति पर सर्वाधिक विश्वास करेंगे, उसी से धोखा मिलता है। सुख में प्रयत्न करने पर भी इच्छित फल की प्राप्ति नहीं हो पाती। संघर्षपूर्ण जीवन बीतता है।

6-महापग कालसर्प योग- छह से बारह भाव के इस योग में पत्नी-विछोह, चरित्र की गिरावट, शत्रुओं से निरन्तर पराभव आदि बातें होती हैं। यात्राओं की अधिकता रहती है। आत्मबल की गिरावट देखने को मिल जाती है। प्रयत्न करने पर भी बीमारी से छुटकारा नहीं मिलता। गुप्त शत्रु निरन्तर षड्यन्त्र करते ही रहते हैं।

7- तक्षक कालसर्प योग- सप्तम से लग्न तक यह योग होता है। इसमें सर्वाधिक प्रभाव वैवाहिक जीवन एवं सम्पत्ति के स्थायित्व पर पड़ता है। जातक को शत्रुओं से हमेशा हानि मिलती है, और असाध्य रोगों से जूझना पड़ता है। पदोन्नति में निरन्तर अवरोध आते हैं। मानसिक परेशानी का कोई-न-कोई कारण उपस्थित होता रहता है।

8-कर्कोटक कालसर्प योग- अष्टम भाव से द्वितीय भाव तक कर्कोटक योग होता है। जातक रोग और दुर्घटना से कष्ट उठाता है, ऊपरी बाधाएँ भी आती हैं। अर्थहानि, व्यापार में नुकसान, नौकरी में परेशानी, अधिकारियों से मनमुटाव, पदावनति, मित्रों से हानि एवं साझेदारी में धोखा मिलता है। रोगों की अधिकता, शल्यक्रिया, जहर का प्रकोप एवं अकाल मृत्यु आदि योग बनते हैं।

9-शंखनाद/शंखचूड़/कालसर्प योग- यह योग नवम से तृतीय भाव तक निर्मित होता है। यह योग भाग्य को दूषित करता है। व्यापार में हानि एवं पारिवारिक तथा अधिकारियों से मनमुटाव कराता है, फलतःशासन से कार्यो में अवरोध होते हैं। जातक के सुख में कमी देखने को मिलती है।

10-पातक कालसर्प योग- दशम से चतुर्थ भाव तक यह योग होता है दश भाव से व्यवसाय की जानकारी मिलती है। सन्तान पक्ष को बीमारी भी होती है। दशम एवं चतुर्थ से माता-पिता का अध्ययन किया जाता है, अतः माता-पिता, दादा-दादी का वियोग राहु की महादशा/अन्तर्दशा में सम्भाव्य है।

11-विषाक्त/विषधर कालसर्प योग- राहु-केतु के एकादश-पंचम में स्थित होने पर इस योग से नेत्रपीडा, हृदयरोग, बन्धुविरोध, अनिद्रारोग आदि स्थितियाँ बनती हैं। जातक को जन्मस्थान से दूर रहने को बाध्य होना पड़ता है। किसी लम्बी बीमारी की सम्भावना रहती है।

12- शेषनाग कालसर्प योग- द्वादश से षष्ठ भाव के इस योग में जातक के गुप्त शत्रुओं की अधिकता तो होती ही है वे जातक को निरन्तर नुकसान भी पहुँचाते रहते हैं। जिन्दगी में बदनामी अधिक होती है। नेत्र की शल्यक्रिया करवानी पड़ सकती है। कोर्ट-कचहरी के मामलों में पराजय मिलती है।

कालसर्प योग के सामान्य लक्षण:-
कालसर्प योग से जो जातक प्रभावित होते हैं, उन्हें प्रायः स्पप्न में सर्प दिखायी देते हैं। जातक अपने कार्यो में अथक परिश्रम करने के बावजूद आशातीय सफलता प्राप्त नहीं कर पाता। हमेशा मानसिक तनाव से ग्रस्त रहता है, जिसके कारण सही निर्णय लेने में असमर्थ रहता है। अकारण लोगों से शत्रुता मिलती है। गुप्त शत्रु सक्रिय रहते हैं, जो कार्यो में अवरोध पैदा करते हैं। पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण हो जाता है। विवाह में विलम्ब या वैवाहिक जीवन के साथ विच्छेद तक की स्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं।

सर्वाधिक अनिष्टकारी समय- जातक के जीवन में सर्वाधिक अनिष्टकारी समय निम्न अवस्था में होता है-

1- राहु की महादशा, राहु की प्रत्यन्तर दशा में अथवा शनि, सूर्य तथा मंगल की अन्तर्दशा में।

2- जीवन के मध्यकाल लगभग 40से 45 वर्ष की आयु में।

3- ग्रह-गोचर में कुण्डली में जब-जब कालसर्प योग बनता हो।

उपर्युक्त अवस्थाओं में कालसर्प योग सर्वाधिक प्रभावकारी होता है एवं जातक को इस समय शारीरिक, मानसिक पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक, व्यावसायिक इत्यादि क्षेत्र में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

कालसर्प योग शान्ति के कुछ स्थान:-
1- कालहस्ती शिवमन्दिर, विरूपति।
2- त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग, नासिक।
3- त्रिवेणीसंगम, इलाहाबाद।
4- त्रियुगी नारायण मन्दिर, केदारनाथ।
5- त्रिनागेश्वर मन्दिर, जिला तंजौर।
6- सिद्धशक्तिपीठ, कालीपीठ, कलकत्ता।
7- भूतेश्वर महादेवमन्दिर नीमतल्लाघाट, कलकत्ता।
8- गरूड़-गोविन्द मन्दिर छटीकारा गाँव एवं गरूड़ेश्वर मन्दिर बडोदरा।
9- नागमन्दिर, जैतगाँव, मथुरा।
10- चामुण्डादेवी मन्दिर, हिमालय प्रदेश।
11- मनसादेवी मन्दिर, चण्डीगड़।
12- नागमन्दिर ग्वारीघाट, जबलपुर।
13- महाकालमन्दिर उज्जैन।

कालसर्प योग की शान्ति किसी पवित्र नदी तट, नदी संगम, नदी किनारे के श्मशान, नदी किनारे स्थित शिवमन्दिर अथवा किसी भी नाग मन्दिर में की जाती है। कभी-कभी देखने में आता है कि अनेक आचार्य यजमान के घरों (निवास)- में ही कालसर्प योग की शान्ति करवा देते हैं। ऐसा ठीक नहीं प्रतीत होता। रूद्राभिषेक तो घर में किया जा सकता है, किंतु कालसर्प योग की शान्ति निवास स्थल में नहीं करनी चाहिये।

राहुकृत पीड़ा के उपाय:-
यदि जन्मांग में राहु अशुभ स्थिति में हो तो उससे बचने के लिये कस्तूरी, तारपीन, गजदन्त भस्म, लोबान एवं चंदन का इत्र जल में मिलाकर स्नान करने से राहु की पीड़ा से शान्ति मिलती है। इसके लिये नक्षत्र, योग दिन, दिशा एवं समय का विशेष ध्यान रखना चाहिये। ऐसे जातक को गोमेद का दान करना चाहिये।

राहु शांति के लिए दान:-
राहु की पीड़ा के निवारण हेतु जातकों को निम्न वस्तुओं का दान बुधवार या शनिवार के दिन करना चाहिये-

1-सरसों का तेल, 2- सीसा (रांगा), 3- काला तिल, 4-कम्बल, 5-तलवार, 6-स्वर्ण, 7-नीला वस्त्र, 8- सूप, 9- गोमेद, 10-काले रंग का पुष्प, 11-अभ्रक, 12-दक्षिणा।

उपर्युक्त वस्तुओं का दान किसी शनि का दान लेने वाले को दें, अथवा किसी शिव मन्दिर, शनि मंदिर में रात्रिकाल में बुधवार या शनिवार को छोड़ दें।

कालसर्प योग शान्ति के अन्य उपाय:-
1- कालसर्प योग का सर्वमन्य शान्ति-उपाय रूद्राभिषेक है। श्रावण मास में अवश्य निर्यमित करें।

2- बहते जल में विधान सहित पूजन कर दूध से पूरितकर चाँदी के नाग-नागिन के जोड़े को प्रवाहित करें।

3- तीर्थराज प्रयाग में तर्पण एवं श्राद्धकर्म सम्पन्न करें।

4- कालसर्प योग में राहु की शान्ति का उपाय रात्रि के समय किया जाये। राहु के सभी पूजन शिव मन्दिर में रात्रि के समय या राहुकाल में करें।

5- राहु के हवन हेतु दूर्वा का उपयोग आवश्यक है। राहु के पूजन में धूप एवं अगरबत्ती का उपयोग न करें। इसके स्थान पर कपूर, चन्दन का इत्र उपयोग करें।

6- शिवलिंग पर मिसरी एवं दूध अर्पित करें। शिवताण्डवस्तोत्र का नियमित पाठ करें।

7- घर के पूजा स्थल में भगवान् श्रीकृष्ण की मोरपंखयुक्त मूर्ति का नियमित पूजन करें।

8- पंचाक्षर मंत्र का नियमित जप करें। नियमित मौली (कलावा) का दान करें, एवं बहते जल में कोयले प्रवाहित करते रहने से स्थायी शान्ति प्राप्त होती है।

9- मसूर की दाल एवं कुछ पैसे सफाई कर्मचारी को प्रातःकाल दें।

10- निम्न नवनागस्तोत्र के नौ पाठ प्रतिदिन करें-

अनन्तं वासुकिं शेषं पगनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
सायकांले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः।।

भावों के अनुसार कालसर्पयोग का निवारण :-
1- प्रथम भाव- गले में हमेशा चाँदी का चैकोर टुकड़ा धारण करें।

2- द्वितीय भाव- घर के उत्तर-पश्चिम-कोण में सफाईकर मिट्टी के बर्तन में पानी भर दें, प्रतिदिन पानी बदलें। बदले हुए पानी को चैराहे में डालें।

3- तृतीय भाव- अपने जन्मदिन पर गुड़, गेहूँ एवं ताँबे का दान करें।

4- चतुर्थ भाव- प्रतिदिन बहते हुए जल में दूध बहायें।

5- पंचम भाव- घर के ईशानकोण में सफेद हाथी की मूर्ति रखें।

6- षष्ट भाव- प्रत्येक माह की पंचमी तिथि को एक नारियल बहते हुए जल में प्रभावित करें।

7- सप्तम भाव- मिट्टी के बर्तन में दूध भरकर निर्जन स्थान में रख आयें।

8- अष्टम भाव- प्रतिदिन काली गाय को गुड़, रोटी, काले तिल एवं उड़द खिलायें।

9- नवम भाव- शिवरात्रि के दिन 18 नारियल सूर्योदय से सूर्यास्त तक 18 मन्दिरों में रखें। यदि 18 मन्दिर पास में न हों तो दुबारा उसी क्रम से मन्दिरों में दान कर सकते हैं।

10- दशम भाव- किसी महत्वपूर्ण कार्य को घर से जाते समय काली उड़द के दाने सिर से सात घुमाकर बिखेर दें।

11- एकादश भाव- प्रत्येक बुधवार को घर की सफाई कर कचरा बाहर फेंक दें। उस दिन फटा वस्त्र पहनें।

12- द्वादश भाव- प्रत्येक अमावास्या को काले कपड़े में काला तिल, दूध में भीगे जौ, नारियल एवं कोयला बाँधकर जल में बहायें।

शिवपंचाक्षर मंत्र एवं शिवपंचाक्षरस्तोत्र का नियमित जप करने एवं कालसर्प यंत्र नियमित पूजन, शिवलिंग तथा चित्र पर चंदन का इत्र लगाने से शान्ति प्राप्त होती है। लगातार 45 दिन का अनुष्ठान निश्चित शान्ति देता है। अनुष्ठान के समय अथवा मंत्र जप के दौरान केवल इत्र एवं कपूर का प्रयोग ही करें। अगरबत्ती के धुएँ एवं दीप से नागों को गर्माहट मिलती है, जिससे वे क्रोधित होते हैं, अतः इन वस्तुओं का उपयोग न करें।

शिवपंचाक्षरस्त्रोत्र :-
नागेन्द्रहराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय हेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नराय नमः शिवाय।।
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय।
चन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नमः शिवाय।।
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय।।
वसिष्ठकुम्भोभ्दवगौतमार्य – मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय।।
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
व्यियाय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय।।
पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।

शिवकृपा से कुछ भी अप्राप्य नहीं है। माँ नर्मदा का नाम-जप करते हुए शिवलिंग पर नर्मदाजल की निरन्तर धार छोड़ते हुए निम्न मंत्र का जप करने से कालसर्प दोष, पितृ दोष, शापित कुंडली के दोषों का पूर्णतः शमन सम्भव हो जाता है-

नर्मदायै नमः प्रातर्नर्मदायै नमो निशि।
नमोऽस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहि मां विषसर्पतः।।

मेरे और लेख देखें :- shukracharya.com, aap kabhavishya.in, aapkabhavishya.com, astroguruji.in, gurujiketotke.com पर भी।

रोग और ज्योतिष

आयुर्वेद के अनुसार कुछ जटिल रोग पूर्वजन्मों के दोष के कारण शरीर के लिए कष्टकारी होते हैं –

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आयुर्वेद और ज्योतिष शास्त्र का चोली-दामन का संबंध रहा है, पूर्वकाल में हर वैद्य आयुर्वेद के साथ ग्रह-नक्षत्रों का भी अच्छा खासा ज्ञान रखता था। औषधि किस मुहूर्त में ग्रहण करनी है, और किस नक्षत्र में रोगी को सेवन करना आरम्भ करनी है? रोग किस नक्षत्र में आरम्भ हुआ है, वह साध्य होगा या असाध्य अथवा कष्ट साध्य होगा, इस का अच्छा-खासा ज्ञान वैद्य को होता था। वात-पित्त-कफ तीनों प्रकृतियों के साथ ग्रहों का सम्बन्ध, शरीरांगों में राशियों एवं ग्रहों का विनिवेश, बालारिष्ट, आयु आदि विषयों का ज्योतिषीय विश्लेषण, रोग की स्थिति में महत्वपूर्ण उपाय प्राप्त करने के लिए मंत्र-अनुष्ठान व दान अथवा रत्न धारण, यह सब औषधियों के सहायक अंग हैं। ज्योतिष में रोगों का वर्गीकरण, लक्षण (ग्रहयोग) तथा ज्योतिष शास्त्र ग्रहों की प्रकृति, धातु, रस, अंग, अवयव, स्थान, बल एवं अन्यान्य विशेषताओं के आधार पर रोगों का निर्णय करता है, तथा निदान के ज्योतिषीय उपाय भी इस शास्त्र में बताये गये हैं। ज्योतिष शास्त्र ही एक ऐसा शास्त्र है, जिसकी सहायता से भविष्य में होने वाले किसी भी रोग की सूचना प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार रोग का पूर्व ज्ञान प्राप्त कर तथा उसके लिये ग्रहोपचार द्वारा अथवा सावधान रहकर मनुष्य उस रोग के कष्ट से किसी सीमा तक सुरक्षित रह सकता है।

ब्रह्माण्ड और मानव शरीर की समानता पर पुराणों व अन्य धर्मग्रन्थों में व्यापक विचार हुआ है। जो ब्रह्माण्ड में है, वह मानव शरीर में भी है। ब्रह्माण्ड को समझने का श्रेष्ठ साधन मानव शरीर ही है। वैज्ञानिको ने भी सावययी-सादृश्यता के सिद्धांत को इसी आधार पर निर्मित किया है। मानव शरीर व संपूर्ण समाज को एक दूसरे का प्रतिबिंब माना गया है। आज का मानव सौर मंडल को भली-भांति जानता है, इसी सौरमंडल में व्याप्त पंचतत्वों को प्रकृति ने मानव निर्माण हेतु पृथ्वी को प्रदान किया है। मानव शरीर जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु व आकाश तत्व से निर्मित हुआ है। ज्योतिष ने सौरमंडल के ग्रहों, राशियों तथा नक्षत्रों में इन तत्वों का साक्षात्कार कर प्राकृतिक सिद्धांतो को समझा है।
ज्योतिष का फलित भाग इन ग्रह, नक्षत्रों व राशियों के मानव शरीर पर पढ़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करता है, जो पंचतत्व इन ग्रह नक्षत्र व राशियों में हैं। वही मानव शरीर में भी हैं, तो निश्चित ही इनका मानव शरीर पर गहरा प्रभाव होगा ही।
वैदिक ज्योतिष ने सात ग्रहों को प्राथमिकता दी है। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि। राहु व केतु छाया ग्रह हैं। पाश्चात्य ज्योतिष जगत में युरेनस, नेप्चयुन व प्लुटो का भी महत्व है। ज्योतिष ने पंचतत्वों में प्रधानता के आधार पर ग्रहों में इन तत्वों को अनुभव किया है, सूर्य व मंगल अग्नि तत्व प्रधान ग्रह हैं। अग्नि तत्व शरीर की ऊर्जा व जीने की शक्ति का कारक है। अग्नि तत्व की कमी शरीर के विकास को अवरूद्ध कर रोगों से लड़ने की शक्ति को कम करती है। शुक्र व चंद्रमा जल तत्व प्रधान ग्रह हैं, शरीर में व्याप्त जल पर चंद्रमा का आधिपत्य है। शरीर में स्थित जल शरीर का पोषण करता है। जल तत्व की कमी आलस्य या तनाव उत्पन्न कर, शरीर की संचार व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालती है। जल व मन दोनो की प्रकृति चंचल है, इसलिये चंद्रमा को मन का कारकत्व भी प्रदान किया गया है। उदाहारणार्थ देखें:- शुक्राणु जो तरल में ही जीवित रहते हैं, और यह सृष्टि के निर्माण में व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शुक्र काम जीवन का कारक है, यही कारण है कि, शुक्र के अस्त होने पर विवाह के मुहुर्त नहीें निकाले जाते। बृहस्पति व राहु आकाश तत्व से सम्बंध रखते हैं। यह व्यक्ति के पर्यावरण व आध्यात्मिक जीवन से सीधा सम्बंध रखते हैं। बुध पृथ्वी तत्व का कारक ग्रह है। यह बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति शरीर को देता है। इस तत्व की कमी बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति पर विपरीत असर डालती है। शनि वायु तत्व प्रधान ग्रह है। शरीर में व्याप्त वायु तत्व पर इसका पूर्ण आधिपत्य है। केतु को मंगल की तरह माना गया है।
मानव जीवन के कुछ गुण मूल प्रकृति के रूप में भी मौजूद होते हैं। प्रत्येक मनुष्य में प्राकृतिक रूप से आत्मा, मन, वाँणी, ज्ञान, काम, व दुखः विद्यमान होते हैं। यह उसके जन्म समय की ग्रहस्थिति पर निर्भर करता है, कि किस मानव में इनकी प्रबलता कितनी है? विशेष रूप से प्रथम दो तत्वों को छोड़कर क्योंकि आत्मा से ही शरीर है। यह सूर्य का अधिकार क्षेत्र है। मन चंद्रमा का, बल मंगल का, वाँणी बुध का, ज्ञान बृहस्पति का, काम शुक्र व दुखः पर शनि का आधिपत्य है। आधुनिक मनोविज्ञान मानव की चार मूल प्रवृत्तियाँ मानता है- भय, भूख, यौन व सुरक्षा। भय पर शनि व केतु का आधिपत्य है। भूख पर सूर्य व बृहस्पति का, यौन पर शुक्र तथा सुरक्षा पर चंद्र व मंगल का। मानव शरीर के विभिन्न धातु तत्वों का भी बह्माण्ड के ग्रहों से सीधा सम्बंध है। शरीर की हड्ढियों पर सूर्य, रक्त की तरलता पर चंद्रमा, शरीर के माँस व गर्मी पर मंगल, त्वचा पर बुध, चर्बी पर बृहस्पति, वीर्य पर शुक्र तथा स्नायुमंडल पर शनि का अधिपत्य है। राहु एवं केतु चेतना से सम्बंधित ग्रह हैं। शरीर क्रिया-विज्ञान के अनुसार मानव शरीर त्रिदोष से पीड़ित होता है, जो विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होते हैं। वात-पित्त-कफ, सूर्य, मंगल, पित्त, चंद्रमा व शुक्र कफ, शनि वायु तथा बुध त्रिदोष; यह प्रतीकात्मक हैं। नेत्र व्यक्ति को अच्छा या बुरा देखने व समझने का शक्तिशाली माध्यम है। आंतरिक व बाह्य रहस्यों को देखने में नेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्राचीन ज्योतिष के सभी सिद्धांत योगियों व ऋषियोें ने सिर्फ नेत्रों से देखकर व योगमार्ग से अनुभव करके बनाये हैं। बिना कोई वैज्ञानिक यंत्रों की सहायता से यह अपने आप में आंतरिक व बाह्य रहस्यों में ज्योतिष के महत्व को स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त हैं। सूर्य व चंद्रमा साक्षी हैं, अतः ज्योतिष के विज्ञान या सत्य होने में कोई संदेह नही है।

रोग निर्णय-
सूर्य- जब सूर्य रोगकारक ग्रह होता है, तब निम्नलिखित रोगों की संभावना होती है, या यह समझिये कि सूर्य निम्नलिखित रोग और क्लेशों का कारक है- पित्त, उष्ण ज्वर, शरीर में जलन रहना, अपस्मार (मिर्गी), हृदय रोग (हार्ट डिजीज), नेत्र रोग, नाभि से नीचे प्रदेश में या कोख में बीमारी, चर्मरोग, अस्थि श्रुति, शत्रुओं से भय, काष्ठ अग्नि, अस्त्र या विष से पीड़ा, स्त्री या पुत्रों से पीड़ा, चोर या चैपायों से भय, सर्प से भय, राजा, धर्मराज (यम) भगवान् भूतेश (रूद्र) से भय होता है।

चन्द्रमा- चन्द्रमा निम्नलिखित रोग या कष्ट उत्पन्न करता है- निद्रा रोग या तो नींद न आयेगी या बहुत नींद आयेगी, अथवा सोते सोते चलना इसे संन्यास रोग भी कहते हैं। आलस्य, कफवृद्धि, अतिसार (संग्रहणी), पिटक, कारबंकिल, शीतज्वर (ठंड देकर जो बुखार आता है) या ठंड के कारण जो बुखार हो। सींग वाले जानवर या जल में रहने वाले जानवर मगरमच्छ आदि से भय, मंदाग्नि (भूख न लगना), अरुचि (यह भी मन्दाग्नि का एक प्रकार है) जब जठराग्नि के मंद हो जाने से भूख नहीं लगती है तो, भोजन की इच्छा नहीं होती है। स्त्रियों से व्यथा, पीलिया, खून की खराबी, जल से भय, मन की थकावट, बाल ग्रह-दुर्गा-किन्नर-धर्मराज (यम) सर्प और यक्षिणी से भय होता है।

मंगल- जब मंगल रोग और क्लेश उत्पन्न करता है- तृष्णा (बहुत अधिक प्यास लगना) प्रकोप (वायु जनित या पित्त प्रकोप), पित्तज्वर, अग्नि, विष या शस्त्र से भय, कुष्ठ (कोढ़), नेत्र रोग, गुल्म (पेट में फोड़ा या एपिन्डिसाइटीज), अपस्मार (मिर्गी), मज्जा रोग (हड्डी के अन्दर मज्जा होती है, उसकी कमी से जो रोग हो जाते हैं), खुजली, चमड़ी में खुर्दरापन, देह-भंग (शरीर का कोई भाग टूट जाना), राजा, अग्नि और चोरों से भय, भाई, मित्र, पुत्रों से कलह, शत्रुओं से युद्ध, राक्षस, गन्धर्व घोर ग्रह से भय और शरीर के ऊपर के भाग में बीमारियाँ होती हैं।

बुध- बुध नीचे लिखे हुये रोग और कलेश उत्पन्न करता है- भ्रान्ति (बहम), सोचने में अव्यवस्था हो जाना, विचार में तर्क शक्ति का आभाव, व्यर्थ की चिंता से मन उलटा-पुलटा सोचने में लग जाना, मन में मिथ्या चिन्ता, बिना कारण भय, आशंका बनी रहे, जो बात यथार्थ हो उसको भूल कर गलत बात याद रहे या गलत धारणा हो जाती है, यह सब भ्रान्ति के लक्ष्ण हैं। दुर्वचन बोलना, नेत्र-रोग, गले का रोग, नासिका रोग, वात-पित्त-कफ इस त्रिदोष से उत्पन्न ज्वर, विष की बीमारी, चर्मरोग, पीलिया, दुःस्वप्न, खुजली, अग्नि में पड़ने का डर, (लोग जातक के साथ अपरुषता का व्यवहार करते हैं), श्रम (अधिक परिश्रम वाला काम करना पड़े), गन्धर्व आदि से उत्पन्न रोग। यह सब बुध के कारण होने वाले रोग हैं।

बृहस्पति- बृहस्पति के कारण जो रोग, क्लेश आदि होते हैं- गुल्म, पेट का फोड़ा-रसोली आदि का रोग, एपिन्डसाइटीज, अंतड़ियों का ज्वर (टायफाईड़), मूच्र्छा यह सब रोग कफ के दोष से होते हैं, क्योंकि कफ का अधिष्ठाता बृहस्पति है, कान के रोग, देव स्थान सम्बंधी पीड़ा अर्थात मंदिर आदि की जायदाद लेकर मुकद्दमेबाजी, ब्राह्मणों के शाप से कष्ट, किसी खजाने, ट्रस्ट या बैंक के मामलों के कारण कलह, या अदालती कार्रवाई, विद्याधर, यक्ष-किन्नर, देवता, सर्प आदि के द्वारा किया हुआ उपद्रव, अपने गुरुओं माननीयों तथा बड़ों के साथ किया हुआ अभद्र या अशिष्ट अव्यवहार या उनके प्रति कत्र्तव्य पालन न किया हो तो उस अपराध का दंड बृहस्पति की दशा, अन्तर्दशा में होता है, यह दैवी नियम हैं।

शुक्र- शुक्र ग्रह के कारण क्या रस-रक्त की कमी, ओजक्षय के कारण पीलापन, कफ और वायु के दोष से नेत्र रोग, प्रमेह, जननेन्द्रिय आदि में रोग, पेशाब करने में कठिनता या कष्ट (उपदंश, सुजाक आदि के कारण या प्रोस्टेट ग्लैण्ड बढ़ जाने की वजह से), वीर्य की कमी, संभोग में अक्षमता, अत्यंत संभोग के कारण शरीर में कमजोरी तथा चेहरे पर कान्ति हीनता, शोष (शरीर का सूखना), योगिनी, यक्षिणी एवं मातृगण से भय, शुक्र क्लेश कारक होने से मित्रों से मित्रता भी टूट जाती है।

रोग जो शनि के कारण उत्पन्न होते हैं- वात और कफ के द्वारा उत्पन्न रोग, टांग में दर्द या लंगड़ाना, अत्यधिक श्रम के कारण थकान, भ्रांति। कुक्षि (कांख के रोग), शरीर के भीतर बहुत उष्णता हो जाती है, नौकरों से कष्ट, नौकर नौकरी छोड़ कर चले जायें या धोखा या दगा दें, भार्या और पुत्र सम्बंधी विपत्ति, अपने शरीर के किसी भाग में चोट, हृदय ताप (मानसिक चिंता), पेड़ या पत्थर से चोट, पिशाच आदि की पीड़ा, आपत्ति।

राहु ग्रह के कारण होने वाले रोग- क्लेश, रोग व चिन्ता आदि- हृदय रोग, हृदय में ताप (जलन), कोढ़, दुर्मति, भ्रांति, विष के कारण उत्पन्न हुई बीमारियाँ, पैर में पीड़ा या चोट, स्त्री, पुत्र को कष्ट या उनके कारण कष्ट, सर्प और पिशाचों से भय।

केतु क्या कष्ट उत्पन्न करता है- ब्राह्मणों और क्षत्रियों से कलह के कारण कष्ट, शत्रुओं से भय।

गुलिक के कारण होने वाले कष्ट- गुलिक को ही मान्दि भी कहते हैं। गुलिक यदि छठे घर में हो या छठे ग्रह के स्वामी के साथ हो तो शरीर में पीड़ा, किसी स्वजन की मृत्यु और प्रेत से भय होता है।

रोगों के कुछ अन्य कारण हैं-
1. यदि चन्द्रमा और सूर्य बारहवें या दूसरे स्थान में हों, और उनको मंगल और शनि देखते हों तो, नेत्र रोग होता है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि यदि सूर्य, चन्द्र दोनों एक साथ या एक दूसरे के घर में हों, और उनको मंगल और शनि दोनों पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो, संभवतः उस आंख से दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जायेगा। दूसरा स्थान दाहिने नेत्र का है। इस कारण दाहिने नेत्र में रोग होगा। ऊपर जो योग बताया गया है, वह यदि बारहवें घर में होगा तो बायें नेत्र की दृष्टि नष्ट होगी। इसी प्रकार यदि सूर्य और चन्द्रमा इन दोनों में से कोई एक-दूसरे या बारहवें घर में बैठा हो, और उसको शनि या मंगल देखते हों तो, दूसरे में सूर्य या चन्द्र बैठने से दाहिने नेत्र का रोग होगा, और बारहवें घर में सूर्य या चन्द्र बैठने से और उसको मंगल या शनि के देखने से बायें नेत्र में रोग होगा। दूसरे और बारहवें घर को नेत्र स्थान कहते हैं। नेत्र स्थान में बैठे हुये सूर्य या चन्द्र को केवल मंगल या केवल शनि देखें तो थोड़ा कष्ट और यदि मंगल और शनि दोनों देखें तो, विशेष कष्ट समझाना चाहिये। यदि नेत्र स्थान में सूर्य, चन्द्र न भी बैठे हों अन्य पाप ग्रह बैठे हों या पाप ग्रह की दृष्टि भी हो तो भी नेत्र की दृष्टि में कमी हो जाती है।

2. यदि तीसरे और ग्यारहवें घर और बृहस्पति-मंगल शनि से युक्त या दृष्ट हों तो, कान का रोग होता है। तीसरे से दाहिने कान का विचार किया जाता है, ग्याहरवें से बांये कान का। सुनना (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन पांचो गुणों में से) शब्द से सम्बंध रखता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश यह पांच तत्त्व हैं। सूर्य और मंगल ग्रह का अग्नि तत्त्व, चन्द्रमा और शुक्र का जल तत्त्व, बुध का पृथ्वी तत्त्व, शनि का वायु तत्त्व और बृहस्पति का आकाश तत्त्व है। शब्दगुण का अधिष्ठाता आकाश तत्त्व है। आकाश तत्त्व बृहस्पति से संबंधित होने के कारण यह कहा गया है कि, यदि बृहस्पति, मंगल, शनि से (मंगल से या शनि से या शनि, मंगल दोनों से) पूर्ण दृष्टि से देखा जाता हो, या मंगल, शनि के साथ हो तो कान के रोग अथवा बहरापन होता है। यहाँ तारतम्य से यह विचार कर लेना चाहिये कि तृतीय और एकादश घर जितने निर्बल होंगे, और जितनी अधिक पाप दृष्टि इन दोनों पर पड़ेगी-या जितने अधिक पाप ग्रहों के साथ ये तथा बृहस्पति (शब्द गुण का अधिष्ठाता होने के कारण), होंगे उतना ही तीव्र (अधिक) कान का रोग होगा। मंगल पित्त प्रधान है, इसलिये मंगल की युति या दृष्टि पित्त के कारण या फोड़ा-फुंसी, रक्त स्राव आदि का रोग कान में करेगा। शनि वायु प्रधान है, इस कारण, शनि जब कान के रोग उत्पन्न करेगा तो वात के कारण। वात, पित्त, कफ यही तीन दोष आयुर्वेद के अनुसार त्रिदोष हैं। जिनके कुपित हो जाने से या असांमजस्य से शरीर में रोग होते हैं।

(3) मंगल पंचम में होने से उदर (पेट के विकार) करता है। इनमें से कोई भी उग्र ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु पंचम में होने से पेट में पीड़ा करता है, पांचवा स्थान पेट का है।

(4) शुक्र यदि सप्तम या अष्टम स्थान में हो तो वीर्य सम्बंधी प्रमेहादि या मूत्ररोग करता है।

(5) यदि षष्ठेश या अष्टमेश, सप्तम में या षष्ठेश अष्टम में हो तो, गुदा रोग होता है। सप्तम स्थान गुह्य जननेन्द्रिय प्रदेश, अष्टम गुदा का स्थान है। यहाँ पाप ग्रह बैठे हों, या दुःस्थान (छठे आठवें) के स्वामी बैठे हों, तो शरीर के उस भाग में रोग उत्पन्न करते हैं।
यदि छठे या आठवें घर में सूर्य हो तो, ज्वर (बुखार) का भय, यदि छठे या आठवें घर मंे मंगल या केतु हों तो व्रण (घाव, चोट, जख्म), छठे या आठवें घर में शुक्र हो तो, जननेन्द्रिय प्रदेश में रोग (उदाहरण के लिये मूत्र रोग, वीर्य रोग, सुजाक, आतशक आदि), यदि छठे या आठवें घर में बृहस्पति हो तो (यक्ष्मा, टी. बी. आदि), यदि छठे या आठवें शनि हो तो वात (वायु रोग), यदि छठे या आठवें मंगल राहु हों, या उस पर मंगल की दृष्टि हो तो पिटिका (अदीठ आदि फोड़ा या सामान्य फोड़ा), यदि छठे या आठवें घर में चन्द्रमा और शनि एक साथ हों तो गुल्म (तिल्ली के कारण तथा तिल्ली बढ़ जाने के कारण पेट में पसलियों के नीचे-दाहिनी ओर यकृत (जिगर) और बाँयी और प्लीहा (तिल्ली होती है), यदि कृष्ण पक्ष का क्षीण चन्द्रमा पाप ग्रह के साथ हो, और जिस राशि में छठे या आठवें हों तो, अम्बुर्द रोग (पेट या शरीर के अन्य भाग में पानी भर जाना, जलोदर) या क्षय (यक्ष्मा टी. बी.) का रोग होता है।जो ग्रह अष्टम में होते हैं, या अष्टम को देखते हैं, उनमें जो बलवान होता है, उस ग्रह के रोग से जातक की मृत्यु होती है। आठवाँ आयु का स्थान है। ऊपर बताया जा चुका है कि, कौन-सा ग्रह किस रोग का कारक है। यदि आठवें भाव में ग्रह हों, या ग्रह देखते हों, तब किस प्रकार के रोग से मृत्यु होगी यह ऊपर बताया गया है, परन्तु आठवें घर में कोई ग्रह न हो, और न कोई ग्रह आठवें घर को देखता हो; ऐसी स्थिति में किस रोग से मृत्यु होगी? आठवें घर के जो रोग बताये गये हैं, उनसे या आठवें घर का मालिक जिस राशि या भाव में बैठा हो, उसके दोष से, उदाहरण के लिये आठवें घर का मालिक पांचवे घर में हो तो, उदर (पेट के) रोग से, चैथे घर में बैठा हो तो, हृदय रोग से यदि अष्टमेश सूर्य या मंगल हो तो, पित्तज रोग से, शनि हो तो वात रोग से इत्यादि। जन्म लग्न (द्रेष्काण) से जो 22वां द्रेष्काण होता है, उसका स्वामी भी मृत्यु कारक होता है। ऊपर जो योग अष्टम भाव संबंधी बताये गये हैं कि, वह लागू न हों तो जन्म द्रेष्काण से जो 22वां दे्रष्काण हो उस 22वें द्रेष्काण का जो स्वामी हो, उस स्वामी के जो रोेग हों, उनमें से किसी रोग के कारण मृत्यु होती है। जो ग्रह आठवें घर में हो, या आठवें घर को देखते हैं, उन ग्रहों में जो बलवान हो, उसके रोग या दोष से मृत्यु होती है। यदि कोई ऐसा ग्रह न हो, तो अष्टम भाव में जो राशि हो उसके रोग के कारण मृत्यु होती है।

सूर्य- अग्नि, उष्ण ज्वर, पित्त या शस्त्र से मृत्यु करता है।

चन्द्रमा- विषूचिका (हैजा), जलोदर (इस रोग में हाथ, पैर या अन्य स्थान में पानी इकट्ठा हो जाता है) जल की बीमारियाँ (प्ल्यूरेसी या अन्य बीमारी जिसमें जल कहीं इकट्ठा हो जावे, यक्ष्मा, टी. बी. आदि रोगों से आयु समाप्त करता है।)

मंगल- जलने से (अग्नि प्रकोप, बिजली आदि भी इसी के अन्तर्गत आ जाती है), रक्त विकार या रक्त बहने से, क्षुद्र अभिचार (जादू, टोना, मारण आदि के अनुष्ठानों आदि) के कारण, मृत्यु करता है।

बुध- पाण्डु (पीलिया) या रक्त की कमी, भ्रांति (स्नायु संबंधी विकार) आदि रोगों से जातक के प्राण हरण करता है। रक्त का कम बनना जिससे ‘पाण्डु’ आदि रोग होते हैं, यकृत की खराबी इत्यादि।

बृहस्पति- कफ का अधिष्ठाता है, और कफ से मृत्यु करता है। इसमें विशेष कष्ट नहीं होता।

शुक्र- जब प्राण हरण करता है, तो इसमें कारण अति स्त्री प्रसंग, वीर्य की कमी से शरीर निस्तेज हो जाना होता है। धातुक्षय इत्यादि बीमारी का शिकार होना, मूत्र रोग, जननेन्द्रिय सम्बंधी रोग शुक्र के अन्तर्गत आते हैं।

शनि- सन्निपात, वातरोग (लकवा आदि के द्वारा) आदि से मृत्यु करता है।

राहु- कुष्ठ (कोढ से) या, आंत्रशोथ, फूड प्रोसेसिंग विष या जम्र्स (रोग कीटाणु) युक्त वस्तु खाने से, सर्प आदि विषैले जन्तुओं के काटने से, जिस रोग में शरीर पर ददोड़े, फुंसियाँ हो जाते हैं, उसमें मृत्यु करता है।

केतु- मृत्यु का कारण दुर्मरण होता है, दुर्मरण का अर्थ है, अपमृत्यु (जैसा आकस्मिक मोटर, रेल आदि से, मकान के गिरने से, कुचल जाने से, कोई कर दे, यह सब दुर्मरण के उदाहरण हैं)। शत्रुओं के विरोध से, कीड़ों या शरीर में किसी कीड़े या जन्तु काटने से सेप्टिक हो जाने या भोजन आदि के द्वारा विषाक्त कीटाणु शरीर में प्रवेश कर जायें। कुण्डली के आठवें घर से जो दोष या रोग सूचित हों, उनसे (इसमें आठवें घर का मालिक, आठवें, घर को जो देखते हैं, वे सभी आ जाते हैं, या आठवें घर का मालिक जिस नवांश में बैठा हो, उस नवांश राशि के रोग स्वाभाविक हैं-

मेष- पित्त के कारण ज्वर, उष्णता (गर्मी के कारण उत्पन्न रोग लू लगना आदि, जठाराग्नि, पेट में भोजन पचाने वाली जो अग्नि है) के रोग।

वृष- त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के उत्पात से, शस्त्र से, अग्नि से जलने के कारण।

मिथुन- श्वास की बीमारी, दमा, उष्ण शूल (पित्त के कारण जो तीव्र दर्द होते हैं)।

कर्क- पागलपन, उन्माद, वात के कारण रोग, अरुचि (भोजन में अरुचि आदि लक्ष्ण वाले रोग, ऐनोरेक्सिया)।

सिंह- जंगली पशुओं के कारण, मृत्यु, ज्वर, स्फोट (फोड़ा) शत्रुओं के कारण।

कन्या- स्त्रियों के कारण, गुप्तरोग (मूत्रेन्द्रिय या जननेन्द्रिय सम्बंधी रोग), ऊपर से गिरने से।

तुला- मस्तिष्क ज्वर (ब्रेन फीवर) सन्निपात।

वृश्चिक- प्लीहा (तिल्ली) संग्रहणी, पाण्डु (पीलिया) रोग।

धनु- पेड़ के कारण (पेड़ से गिरने, या अपने ऊपर पेड़ गिर जाने से), जल लकड़ी के कारण (लकड़ी चीरते समय, या लकड़ी की चोट से), शस्त्र से।

मकर- शूल (पेट का दर्द, एपिण्डीसाइटिज आदि, पेट में फोड़ा, आदि, कोलिक दर्द) अरुचि, मंदाग्नि या बुद्धिभ्रम (नर्वस स्नायु मंडल की अव्यवस्था या रोग के कारण संयत विचार करने की शक्ति जब नष्ट हो जाती है) आदि से।

कुम्भ- खांसी, ज्वर, क्षय।

मीन- पानी से, पानी में डूबने से, जल रोगों से।
यदि आठवें घर का मालिक पापग्रह हो, और आठवें घर में पापग्रह बैठे भी हों (या एक भी पापग्रह अष्टम में हो) तो शस्त्र, अग्नि, व्याघ्र, सर्प आदि की पीड़ा होती है। यदि केन्द्र में बैठे हुये दो पाप ग्रह एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हों, तो सरकार की नाराजगी से, शस्त्र, विष, अग्नि आदि के कारण मृत्यु होती है।
यदि बारहवें घर का मालिक सौम्य ग्रह की राशि या सौम्य ग्रह के नवांश में हो, या सौम्य ग्रह के साथ बैठा हो, अथवा बारहवें घर में सौम्य ग्रह बैठा हो, और बारहवें घर का मालिक भी सौम्य ग्रह हो तो, मरते समय विशेष क्लेश या पीड़ा नहीं होती। यदि उसे उल्टा हो अर्थात बाहरवें घर का मालिक क्रूर ग्रह की राशि या क्रूर ग्रह के नवांश में बैठा हो या क्रूर ग्रह के साथ हो, अथवा बारहवें घर में क्रूर ग्रह बैठा हो, बारहवें घर को क्रूर देखते हों तो कष्ट, पीड़ा क्लेश के साथ मृत्यु होती है। कफ-वात-पित्त तीनों प्रकृतियों के साथ ग्रहों का सम्बन्ध, शरीरांगों में राशियों एवं ग्रहों का विनिवेश, बालारिष्ट, आयु आदि विषयों की प्राप्ति, रोग की स्थिति में महत्वपूर्ण उपाय प्राप्त हैं। ज्योतिष में रोगों का वर्गीकरण, लक्षण (ग्रहयोग) तथा ज्योतिष शास्त्र ग्रहों की प्रकृति, धातु, रस, अंग, अवयव, स्थान, बल एवं अन्यान्य विशेषताओं के आधार पर रोगों का निर्णय करता है, तथा निदान के ज्योतिषीय उपाय भी बताये गये हैं। लेख के अंत में यही कहना चाहूंगा कि ज्योतिष शास्त्र ही एक ऐसा शास्त्र है, जिसकी सहायता से भविष्य में होने वाले किसी भी रोग की सूचना प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार रोग का पूर्व ज्ञान प्राप्त कर तथा उसके लिये ग्रहोपचार द्वारा अथवा सावधान रहकर मनुष्य उस रोग के कष्ट से किसी सीमा तक बच सकता है।

मानव शरीर और ज्योतिष-
ब्रह्माण्ड और मानव शरीर की समानता पर पुराणों व अन्य धर्मग्रन्थों में व्यापक विचार हुआ है। जो ब्रह्माण्ड में है, वह मानव शरीर में भी है। ब्रह्माण्ड को समझने का श्रेष्ठ साधन मानव शरीर ही है। वैज्ञानिको ने भी सावययी-सादृश्यता के सिद्धांत को इसी आधार पर निर्मित किया है। मानव शरीर व संपूर्ण समाज को एक दूसरे का प्रतिबिंब माना गया है।

आज का मानव सौर मंडल को भली-भांति जानता है, इसी सौरमंडल में व्याप्त पंचतत्वों को प्रकृति ने मानव निर्माण हेतु पृथ्वी को प्रदान किया है। मानव शरीर जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु व आकाश तत्व से निर्मित हुआ है। ज्योतिष ने सौरमंडल के ग्रहों, राशियों तथा नक्षत्रों में इन तत्वों का साक्षात्कार कर प्राकृतिक सिद्धांतो को समझा है। ज्योतिष का फलित भाग इन ग्रह, नक्षत्रों व राशियों के मानव शरीर पर पढ़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करता है। जो पंचतत्व इन ग्रह नक्षत्र व राशियों में हैं। वही मानव शरीर में भी हैं, तो निश्चित ही इनका मानव शरीर पर गहरा प्रभाव होगा ही।

वैदिक ज्योतिष ने सात ग्रहों को प्राथमिकता दी है। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि। राहु व केतु छाया ग्रह हैं। पाश्चात्य ज्योतिष जगत में युरेनस, नेप्चयुन व प्लुटो का भी महत्व है। ज्योतिष ने पंचतत्वों में प्रधानता के आधार पर ग्रहों में इन तत्वों को अनुभव किया है, सूर्य व मंगल अग्नि तत्व प्रधान ग्रह हैं। अग्नि तत्व शरीर की ऊर्जा व जीने की शक्ति का कारक है। अग्नि तत्व की कमी शरीर के विकास को अवरूद्ध कर रोगों से लड़ने की शक्ति को कम करती है। शुक्र व चंद्रमा जल तत्व प्रधान ग्रह हैं। शरीर में व्याप्त जल पर चंद्रमा का आधिपत्य है। शरीर में स्थित जल शरीर का पोषण करता है। जल तत्व की कमी आलस्य या तनाव उत्पन्न कर, शरीर की संचार व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालती है। जल व मन दोनो की प्रकृति चंचल है, इसलिये चंद्रमा को मन का कारकत्व भी प्रदान किया गया है। उदाहारणार्थ देखें शुक्राणु जो तरल में ही जीवित रहते हैं, और यह सृष्टि के निर्माण में व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शुक्र काम जीवन का कारक है, यही कारण है कि, शुक्र के अस्त होने पर विवाह के मुहुर्त नहीें निकाले जाते। बृहस्पति व राहु आकाश तत्व से सम्बंध रखते हैं। यह व्यक्ति के पर्यावरण व आध्यात्मिक जीवन से सीधा सम्बंध रखते हैं। बुध पृथ्वी तत्व का कारक ग्रह है। यह बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति शरीर को देता है। इस तत्व की कमी बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति पर विपरीत असर डालती है। शनि वायु तत्व प्रधान ग्रह है। शरीर में व्याप्त वायु पर इसका पूर्ण आधिपत्य है। केतु को मंगल की तरह माना गया है।
मानव जीवन के कुछ गुण मूल प्रकृति के रूप में भी मौजूद होते हैं। प्रत्येक मनुष्य में प्राकृतिक रूप से आत्मा, मन, वाँणी, ज्ञान, काम, व दुखः विद्यमान होते हैं। यह उसके जन्म समय की ग्रहस्थिति पर निर्भर करता है, कि किस मानव में इनकी प्रबलता कितनी है? विशेष रूप से प्रथम दो तत्वों को छोड़कर क्योंकि आत्मा से ही शरीर है। यह सूर्य का अधिकार क्षेत्र है। मन चंद्रमा का, बल मंगल का, वाँणी बुध का, ज्ञान बृहस्पति का, काम शुक्र व दुखः पर शनि का आधिपत्य है।

आधुनिक मनोविज्ञान मानव की चार मूल प्रवृत्तियाँ मानता है- भय, भूख, यौन व सुरक्षा। भय पर शनि व केतु का आधिपत्य है। भूख पर सूर्य व बृहस्पति का, यौन पर शुक्र तथा सुरक्षा पर चंद्र व मंगल का। मानव शरीर के विभिन्न धातु तत्वों का भी बह्माण्ड के ग्रहों से सीधा सम्बंध है। शरीर की हड्ढियों पर सूर्य, रक्त की तरलता पर चंद्र्रमा, शरीर के माँस व गर्मी पर मंगल, त्वचा पर बुध, चर्बी पर बृहस्पति, वीर्य पर शुक्र तथा स्नायुमंडल पर शनि का अधिपत्य है। राहु एवं केतु चेतना से सम्बंधित ग्रह हंै। शरीर क्रिया-विज्ञान के अनुसार मानव शरीर त्रिदोष से पीड़ित होता है, जो विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होते हैं। वात, पित्त व कफ! सूर्य, मंगल, पित्त, चंद्रमा व शुक्र कफ, शनि वायु तथा बुध त्रिदोष; यह प्रतीकात्मक हैं। नेत्र व्यक्ति को अच्छा या बुरा देखने व समझने का शक्तिशाली माध्यम है। आंतरिक व बाह्य रहस्यों को देखने में नेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्राचीन ज्योतिष के सभी सिद्धांत योगियों व ऋषियोें ने सिर्फ नेत्रों से देखकर व योगमार्ग से अनुभव करके बनाये हैं। बिना कोई वैज्ञानिक यंत्रों की सहायता से यह अपने आप में आंतरिक व बाह्य रहस्यों में ज्योतिष के महत्व को स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त हैं। सूर्य व चंद्रमा साक्षी हैं, अतः ज्योतिष के विज्ञान या सत्य होने में कोई संदेह नही है।

यह थे, लेखक की पुस्तक :- “रोग एवं ज्योतिष” के कुछ अंश।

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नक्षत्र और वनस्पति

नक्षत्रों के लिए निर्धारित पेड़ पौधे :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक नक्षत्र के वृक्षों का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। उपाय की दृष्टि से जो जातक अपने जन्म नक्षत्र के वृक्षों या पौधों को रोपित करता है, अथवा सींचता है, या उनका भरण पोषण करता है, उसकी आयु के साथ ऐश्वर्य व धन धान्य में भी वृद्धि होती है। ज्योतिष शास्त्र में 27 नक्षत्रों के जो वृक्ष बताए गये है, उसके अनुसार अश्वनी नक्षत्र के लिए कुचला का वृक्ष, भरणी नक्षत्र के लिए आंवला, कृतिका के लिए गूलर व स्वर्णशीरी, मृगशिरा के लिए खैर, आर्द्रा नक्षत्र का वृक्ष बहेडा, रोहणी के लिए जामुन व तुलसी बताया गया है । इसी प्रकार पुनर्वसु नक्षत्र के लिए बांस, पुष्य नक्षत्र के लिए पीपल, अश्लेशा के लिए नागकेसर, मघा के लिए बड़, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के लिए ढाक (पलास) का वृक्ष, तथा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के लिए रूद्राक्ष या पाकर लगाना उपयोगी माना जाता है। 13 वें स्थान के नक्षत्र हस्त में जन्में व्यक्ति रीठा व पाढ का वृक्ष, चित्रा नक्षत्र वाले बेल नारियल, स्वाती के लिए अर्जुन का वृक्ष, विशाखा नक्षत्र के लिए भटकटैया, अनुराधा नक्षत्र के लिए बकुल या मौलश्री, ज्येष्ठा नक्षत्र के लिए चीड़ या देवदारू व लोध का वृक्ष लगा सकते है। इसी प्रकार मूल नक्षत्र के लिए साल का वृक्ष, पूर्वाषाढ़ा के लिए अशोक या जलवेंत, उत्तराषाढा नक्षत्र के लिए कटहल या फालसा लगायें। श्रवण के लिए आक लगाये, धनिष्ठा नक्षत्र के लिए शमी लगाएं, शतभिषा नक्षत्र के लिए कदम्ब, पूर्वा भाद्रापदा नक्षत्र के लिए आम लगायें, उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र के लिए नीम तथा रेवती नक्षत्र के लिए महुआ का वृक्ष लगाना लाभकारी होता है।
इस प्रकार सरल उपाय करके एक तरफ जहां हम पर्यावरण संरक्षण में सहायता करेंगे वहीं हम भौतिक, अध्यात्मिक तथा परलौकिक लाभ प्राप्त करने के लिए वृक्षारोपण कर अपने तथा समाज व देश के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे होंगे।

नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़-पौधे :-

1. अश्विनी – कुचला

2. भरणी– आंवला

3. कृतिका – गूलर

4. रोहिणी – जामुन

5. मृगशिरा – खैर

6. आर्द्रा– शीशम

7. पुनर्वसु – बांस

8. पुष्य – पीपल

9. अश्लेषा – नागकेसर

10. मघा – वट

11. पूर्वाफाल्गुनी – पलास

12. उत्तराफाल्गुनी – पाकड़

13. हस्त – रीठा

14. चित्रा – बेल

15. स्वाती- अर्जुन

16 विशाखा – भटकटैया

17. अनुराधा – मौलसरी

18. ज्येष्ठा – चीड़

19. मूल – साल

20. पूर्वाषाढ़ा – अशोक

21. उत्तराषाढ़ – फालसा

22. श्रवण – मदार

23. धनिष्ठा – शमी

24. शतभिषा – कदम्ब

25. पूर्वभाद्रपद– आम

26. उत्तराभाद्रपद – नीम

27. रेवती – महुआ

बारह राशि के पेड़-पौधे :-

मेष – आंवला

वृष – जामुन

मिथुन – शीशम

कर्क – नागकेश्वर

सिंह – पलास

कन्या – रीठा

तुला – अर्जुन

वृश्चिक – मौलसरी

धनु – जलवेतस

मकर – अकोल

कुंभ – कदम्ब

मीन – नीम

ग्रहों के पेड़ -पौधे :-

सूर्य – अकोल

चन्द्रमा – पलास

मंगल – खैर

बुद्ध – चिरचिरी

गुरु – पीपल

शुक्र – गुलड़

शनि – शमी

राहु – दुर्वा

केतु – कुश

ग्रह, राशि, नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़ पौधे का प्रयोग करने से अंतश्चेतना में सकारात्मक सोच का संचार होता है, तत्पश्चात हमारी मनोकामनायें शनै शनै पूरी होती है ।

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