पंद्रह मुखी रूद्राक्ष, 15 Mukhi Rudraksh

पंद्रह मुखी रूद्राक्ष, 15 Mukhi Rudraksh Nepal, 15 Mukhi Rudraksh Original Nepal,

Dr.R.B.Dhawan (गुरूजी) astrologer, Astrological Consultant, specialist : marriage problems, top best astrologer in delhi

रक्ष जाति के आचार्य shukracharya का वचन है कि- पंद्रहमुखी रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ रूद्राक्षों की श्रेणी में आता है। यह रूद्राक्ष परम प्रभावशाली तथा अल्प कालावधि में ही शिवजी को प्रसन्न करने वाला रूद्राक्ष है, यह रूद्राक्ष साक्षात् देवमणि है। गुरू जी (Dr.R.B.Dhawan) और पुराणों के अनुसार पंद्रह विद्या, का साक्षात रूप है। इसमें महादेव की विशेष शक्ति निहित होती है, इसलिये नवग्रहों से उत्पन्न दोष इसे धारण करने मात्र से शांत होते हैं। यह रूद्राक्ष कठिन से कठिन परिस्थितियों में धारण करने वाले का मार्गदर्शन करता है। जो व्यक्ति इस रूद्राक्ष को कंठ के मध्य में धारण करते हैं, वह सर्वत्र पूजित होते हैं, और अंत समय वे स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। चमड़ी के जटिल से जटिल रोगों को दूर करने की इसमें शक्ति है। धारक को आत्मरक्षा करने में समर्थ बनाता है। यह रूद्राक्ष धारक को हानि, दुर्घटना, जटिल रोग, आर्थिक चिन्ता से मुक्त रखकर धारक को सुरक्षा-समृद्धि देता है। वैसे तो यह रूद्राक्ष सभी जटिल रोगों को दूर करने वाला माना गया है, फिर भी Dr.R.B.Dhawan के अनुभव अनुसार इस रूद्राक्ष में पौरुष रोग को दूर करने की महान शक्ति है। इसी लिए दुर्बल पुरुष के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, और इसीलिये इस की मांग अधिक होने से यह अधिक मूल्यावान भी होता है। वैसे भी यह रूद्राक्ष बहुत ही कम मात्रा में उत्पन्न होता है, और इसकी मांग इसकी उपलब्धता से कहीं अधिक है। पंद्रहमुखी रूद्राक्ष स्वास्थ्य लाभ, रोगमुक्ति और शारीरिक तथा मानसिक-व्यापारिक उन्नति में सहायक होता है। धारण करने पर आध्यात्मिक तथा भौतिक सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इस रूद्राक्ष को धारण करने से शत्रुओं का नाश होता है, इस लिए यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक है, यह समस्त रोगों का हरण करने वाला, सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला है। इसके धारण करने से कुल की मर्यादा और कुल वृद्धि अवश्य होती है। इससे बल और उत्साह का वर्धन होता है, और निर्भयता प्राप्त होती है, तथा संकट काल में सरंक्षण भी प्राप्त होता है। पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति सदा सही निर्णय लेता है, और संकटों, कुपरिस्थितियों एवं चिंताओं से छुटकारा पाता है, धारणकर्ता में विशेष ओजस गुणों का विकास होने लगते हैं। यह शास्त्रोक्त सत्य है कि जिसने पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण कर लिया, उसेे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है, और गृहस्थ जीवन भी अच्छा होता है। गर्भपात रूक जाता है, व गुणवान संतान उत्पन्न होती है।

पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण का मंत्र है- ॐ पशुपतय नम:’ मंत्र का 108 बार जाप करते हुए धारण करें।
लाभ- अलौकिक मार्गदर्शन, जटिल और पौरुष रोगों की शांति।

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गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

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चौदह मुखी रूद्राक्ष, 14 Mukhi Rudraksh

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असुराचार्य shukracharya के अनुसार- चौदह मुखी रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ रूद्राक्षों की श्रेणी में आता है। परम प्रभावशाली तथा अल्प समय में ही शिवजी को प्रसन्न करने वाला यह चौदह मुखी रूद्राक्ष साक्षात् देवमणि है। Dr.R.B.Dhawana जी का कथन है कि- पुराणों में वर्णित है कि यह रूद्राक्ष चौदह विद्या, 14 लोक, 14 मनु का साक्षात् रूप है। इसमें हनुमानजी की शक्ति भी निहित होती है, इसलिये शनि से संबंधित सभी दोष इसे धारण करने मात्र से शांत होते हैं। यह रूद्राक्ष आज्ञाचक्र का नियन्ता है। जो व्यक्ति इस रूद्राक्ष को कपाल के मध्य में धारण करते हैं, उनकी पूजा देवता और ब्राह्यण करते हैं, और वे निर्वाण (स्वर्ग) को प्राप्त हो जाते हैं। यह शिवजी तीसरे नेत्र के समान है, और धारक को आत्म रक्षा एवं कार्य के सही नियोजन में सहायक बनाता है। यह रूद्राक्ष धारक को हानि, दुर्घटना, रोग, चिन्ता से मुक्त रखकर साधक को सुरक्षा-समृद्धि देता है, यह रूद्राक्ष सभी रूद्राक्षों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, और इसीलिये यह अधिक मूल्यावान होता है। ये बहुत ही कम संख्याओं में उत्पन्न होता है, और इसकी मांग इसकी उपलब्धता से कहीं अधिक होती है। चौदह मुखी रूद्राक्ष shukracharya संस्थान में उपलब्ध है, क्योंकि इस रूद्राक्ष को स्वयं भगवान शिव ने धारण किया था, इसे धारण करने से परिवार का कल्याण होता है, चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष स्वास्थ्य लाभ, रोगमुक्ति और शारीरिक तथा मानसिक-व्यापारिक उन्नति में सहायक होता है। 14 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से आध्यात्मिक लाभ तथा भौतिक सुख तथा सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इस रूद्राक्ष को मस्तक पर धारण करना चाहिये। जो मनष्य इसे मंत्र सिद्ध करके धारण करते हैं, वह रूद्रलोक में जाकर बसते हैं। इससे परमपद की प्राप्ति होती है, शत्रुओं का नाश होता है, बैकुंठ की प्राप्ति होती है। यह जेल भय से मुक्ति भी दिलाता है। यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक है, यह समस्त रोगों का हरण करने वाला सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला है। इसके धारण करने से वंशवृद्धि अवश्य होती है। इससे बल और उत्साह का वर्धन होता है। इससे निर्भयता प्राप्त होती है, और संकट काल में सरंक्षण प्राप्त होता है। विपत्ति और दुर्घटना से बचाव के लिये हनुमान जी (रूद्र) के प्रतीक माने जाने वाले इस 14 मुखी रूद्राक्ष को अवश्य प्रयोग करना चाहिये। चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष धारक को भविष्य देखने की दृष्टि प्रदान करता है, यह ‘देवमणि’ रूद्राक्ष है। चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति सदा सही निर्णय लेता है, और संकटों, कुपरिस्थितियों एवं चिंताओं से छुटकारा पाता है, तथा भूत-पिशाच, डाकिनी, शाकिनी का प्रकोप उसके निकट भी नहीं आता। धारणकर्ता में विशेष गुण विकसित होने लगते हैं। यह आचार्य shukracharya द्वारा शास्त्रोक्त सिद्ध है कि जिसने 14 मुखी रूद्राक्ष धारण कर लिया, शनि जैसा प्रतिकूल ग्रह भी अनुकूल हो जाता है। चौदह मुखी रूद्राक्ष की माला पुरूष या स्त्री द्वारा धारण करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है, और गृहस्थ जीवन भी अच्छा होता है। ग्यारह मुखी तथा चौदह मुखी दोनों रूद्राक्ष की माला को पेट पर बांधने से बार-बार हो जाने वाला गर्भपात नहीं होता। और उच्च कोटि की संतान उत्पन्न होती है।

14 मुखी रूद्राक्ष धारण का मंत्र है- ॐ नमः ॐ हनुमते नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ औं हस्फ्रें हसख्फ्रें। इस मंत्र से रूद्राक्ष को चैतन्य कर धारण करना चाहिये।
उपयोग- यह रूद्राक्ष भविष्य दर्शन, कल्पना शक्ति एवं ध्यान में सहायक है।

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गर्भगौरी रूद्राक्ष Garbh Gori Rudraksh

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यह रूद्राक्ष गौरी-शंकर रूद्राक्ष का वह रूप है, जिसमें दो रूद्राक्ष एक दूसरे से जुड़े होते हैं, और इनमें से एक दाना दूसरे से छोटा होता है। असुर गुरु shukracharya का कथन है कि इस रुद्राक्ष को धारण करने से गर्भरक्षा होती है, यह भगवान गणेश और माता गौरी की शक्ति तथा सायुज्यता का घोेतक तथा प्रेमपूर्ण संबध का प्रतीक है, इसी लिए इस रूद्राक्ष को गर्भगौरी रूद्राक्ष कहते हैं। उपाय के रूप में यदि किसी गर्भवती को गर्भपात abortion का भय हो तो यह रूद्राक्ष धारण करने से गर्भरक्षा होती है। यह गौरी-शंकर रूद्राक्ष जैसा होता है, परंतु एक रूद्राक्ष छोटा और दूसरा सामान्य आकार का होता है। और जिसमें दो रूद्राक्ष प्राकृतिक ढंग से जुड़े हुये होते हैं। इस रूद्राक्ष को धारण करने से गर्भरक्षा होती है, और गर्भपात abortion होने के भय से मुक्ति मिलती है। किसी स्त्री के गर्भ धारण में शारीरिक कठिनाई हो या बार-बार गर्भपात abortion हो जाता हो तो यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करें।

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शनिदेव

शनि ग्रह हमेशा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं :-

Dr.R.B.Dhawan

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शनि ग्रह हमेशा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं होता। वह बुरे फलों के साथ-साथ अच्छा फल भी देता है। वास्तव में शनि के बारे में जितना भय और जितनी गलतफहमियां हैं उतना खराब वह है नहीं। काल पुरुष की जन्म कुण्डली में शनि कर्मेश दशम भाव का स्वामी एवं लाभेश एकादश भाव का स्वामी होकर स्थित है। कर्मेश होने के साथ-साथ लाभेश भी होने के कारण कर्म का फल है। नवम भाव भाग्य है। कर्म के फल को भाग्य भी कहते हैं। कर्म के व्यय होने पर भाग्य बनता है। कर्म का अगला भाव लाभ तथा कर्म का व्यय भाव भाग्य बनाता है। यदि कर्म अच्छा है तो भाग्य भी अच्छा होगा। यदि कर्म ही नहीं तो लाभ तथा भाग्य कहां से आएंगे। भाग्य भाव धर्म का भी है। अर्थात् कर्म को धर्म पर भी व्यय करें तो भाग्य जागृत होगा। शनि कर्मेश होने के कारण भाग्य विधाता भी है। वही एकादश भाव का स्वामी होकर कर्म फलों का लेखा-जोखा या वेलेन्स शीट के अनुसार न्याय करता है।

कुछ लोग शनि ग्रह को खोटा, बुरा, पापी ग्रह मानते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि भले को छोड़िए, खोटे ग्रह जप व दान। अर्थात पापी ग्रहों को ज्यादातर लोग पूजा, अर्चना, जप, तप से शांत करते हैं। उससे भयभीत व त्रस्त रहते हैं। जरा सा किसी को शनि के दुष्प्रभाव का ज्ञान होते ही वह शनि के दुष्प्रभाव के उपचार हेतु पूजा, अर्चना, जप, तप में लग जाता है। मेरे अनुभव के अनुसार शनि जब साढ़े साती से किसी को प्रभावित करता है तो उस को नया परिष्कृत रूप अपनी साढे़साती के बाद देता है। जितना उसको दंडित करता है। उससे ज्यादा देकर जाता है। अधिकतर शनि की साढ़े साती बरबाद हुए लोगों को जाते-जाते फिर से उन्हें धो-पोछकर चमकाकर जाती है। उनमें लगी जंग को छुड़ा जाती है। भले बुरे के भेद से शनि कोमल व कठोर भी है। शनि दोनों तरह के फल देता है। शनि ही इस भू मंडल का न्यायधीश है। शनि ग्रह को काल भैरव अर्थात् न्याय का स्वामी माना गया है। वह अपने दो सहयोगी ग्रहों राहु एवं केतु की सहायता से न्याय करता है। लेकिन जब जरूरत होती है तो सेनापति मंगल की भी सहायता लेता है। तब रक्तप्रद दंड का निधान करता है। तो सेनापति मंगल की सहायता से दंडित कर अंग-भंग करने का आदेश देता है

वैद्यनाथ के अनुसार- लग्नस्थ शनि का जातक कई व्याधियों से ग्रस्त होता है। उसका कोई ना कोई अंग अवश्य दोष युक्त होता है। जबकि स्वगृही या उच्च का शनि जातक को यश वैभव से संपन्न करता है। शनि शुभ संयोग युक्त हो तो जातक संकल्पवान स्वयं परिश्रमी, शनैः शनैः उन्नतिशील, पराक्रमी, विजयी तथा दृढ़ निश्चयी होता है। तथा अथक प्रयास से उच्च पद, सफलता अर्जित करता है। अशुभ संयोग से शनि नीच कर्मरत, वह स्वयं कार्य बिगाड़ता है। अविश्वासी, भयभीत, इर्शालु, अविवेकी, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाला बना देता है। दूरस्थ ग्रह शनि के प्रभाव से एकांत आलसी तथा उदासीन का स्वाभाविक लक्षण होता है।

अरूण सहिंता के अनुसार- सूर्य को विष्णु, चन्द्रमा को शिव, मंगल को हनुमान, स्वामी कार्तिकेय षडानन, बुध को दुर्गा, गुरु को ब्रह्मा, शुक्र को लक्ष्मी जी, शनि को भैरव या काल भैरव राहु को सरस्वती, गायत्री तथा केतु को गणेश माना गया है। ये देवता तथा देवियां ही जातक की कुण्डली में कर्माें के अनुसार राशियों और भावों में आकर शुभ व अशुभ फल प्रदान करते हैं। इसी प्रकार 28 नक्षत्र होते हैं।

नक्षत्रों के नाम :- 1. अश्विनी, 2. भरणी, 3. कृत्तिका, 4. मृगशिरा, 6. आद्र्रा, 7. पुनर्वसु, 8. पुष्य, 9. आश्लेषा, 10. मघा, 11. पूर्वफाल्गुनी, 12. उत्तरफाल्गुनी, 13. हस्त, 14. चित्रा, 15. स्वाति, 16. विशाखा, 17. अनुराधा, 18. ज्येष्ठा, 19. मूल, 20. पूर्वाषाढ़ा, 21. उत्तराषाढ़ा, 22. श्रवण, 23. धनिष्ठा, 24. शतभिषा, 25. पूर्वाभाद्रपद, 26. उत्तराभाद्रपद, 27. रेवती। 28. अभिजित। इन नक्षत्रों के देवता नक्षत्रों तथा ग्रह क्र. नक्षत्र न. स्वामी क्र. नक्षत्र न. स्वामी देवता :-

1. अश्विनी अ. कुमार केतु, 2. भरणी काल शुक्र, 3. कृतिका अग्नि सूर्य, 4. रोहिणी ब्रह्मा चन्द्रमा, 5. मृगशिरा चन्द्रमा मंगल, 6. आद्र्रा रूद्र राहु, 7. पुनर्वसु अदिति बृहस्पति, 8. पुष्य बृहस्पति शनि, 9. आश्लेषा सर्प बुध, 10. मघा पितर केतु, 11. पू.फा भग शुक्र, 12. उ.फा. अर्यमा सूर्य, 13. हस्त सूर्य चन्द्रमा, 14. चित्रा विश्वकर्मा मंगल, 15. स्वाती पवन राहु, 16. विशाखा शुक्राग्नि बृहस्पति, 17. अनुराधा मित्र शनि, 18. ज्येष्ठा इन्द्र बुध, 19. मूल निर्ऋति केतु, 20. पू.आ जल शुक्र, 21. उ.आ. विश्वेदेव सूर्य, 22. श्रवण विष्णु चन्द्रमा, 23. धनिष्ठा वसु मंगल, 24. शतभिषा वरूण राहु, 25. पू.भा. अजैकपाद बृहस्पति, 26. उ.भा. अहिर्बुध्न्य शनि, 27. रेवती पू.षा. बुध, 28. अभिजित ब्रह्मा केतु।

अपने नक्षत्रों में ग्रहों अर्थात् देवताओं के गोचर (आगमन) पर एक दूसरे को प्रभावित कर फल प्रदान करते है। भृगु संहिता के अनुसार- लगनस्थ शनि हो तो जातक शत्रु का नाश करने वाला, समृद्ध, धन धान्य पुत्र, स्थूल शरीर दूर दृष्टि वाला एवं वात से पीड़ित होता है। उच्चस्थ शनि जातक को प्रधान या नगर का मुखिया बनाता है। मकरस्थ या कुम्भस्त शनि जातक को पैतृक धन दौलत का वारिस बनाता है। वृहद पवन में वाला बताया है। यदि शनि मूल त्रिकोणस्थ हो तो जातक को राष्ट्र प्रमुख या प्रांत प्रमुख की प्रतिष्ठा प्रदान करता है। जातक पारिजात में दुर्बल शनि हो तो जातक दुष्कर्मों का फल भोगता है। श्वास रोग, शरीर पीड़ा, पार्श्व, पार्श्व पीड़ा, गुदृ विकार, हृदय ताप, कंपन, संधि रोग तथा वात विकार से पीड़ित होता है। कुछ राशियों में जयदेव ने अच्छा बताया है। धनु, मीन, मकर, तुला, कुम्भ, राशि का शनि पांडित्य, ऐश्वर्य तथा सुदर्शन शरीर, कामावेग एवं आलसी होता है।

वारहमिहिर के अनुसार- स्वगृही शनि,उच्च मीन, धनु, मकर, तुला, कुम्भ, राशि गत शनि श्रेष्ठ फल प्रदान करना है। ऐसे जातक ज्ञान शिरोमणि, सुदर्शन, अग्रणी, नरपति एवं समृद्ध होते हैं।

मानसागरी के अनुसार- मकर तथा कुम्भ राशि लग्न में जातक शत्रुहन्ता सिद्ध करता है। अन्य राशियों में विरल केशी, नीच कर्मी, वासना युक्त, धूर्त एवं आलसी होता है।

जातक पर शनि का प्रभाव- रूखे-सूखे बाल, लम्बे बड़े अंग, दांत तथा वृद्ध शरीर काला रंग का दिखता है। यह अशुभ ग्रह है। मंद गति ग्रह है। नैतिक पतन का द्योतक है। वायु संबंधी बीमारियों का प्रतिनिधि है। यह दुःख, निराशा तथा जुआ का प्रतीक है। गंदा स्थान, अंधेरा स्थान का कारक ग्रह है।

शनि से प्रभावित वस्तुएं- लोहा, काला, चना, भांग, तेल, नीलम, दाह संस्कार गृह, कब्रिस्तान, जेल, बिस्तरे पर लिटाएं रखना, पुरानी बीमारियां, लाइलाज बीमारियां, वृद्धावस्था का स्वामी है। शनि से प्रभावित शरीर के अंग- दांत, वात, कलाई, पेशियां, पीठ, पैर।

शनि से प्रभावित रोग- गुदा के रोग, व्रण, जख्म व जोड़ों का और पुराने दर्द, लाइलाज रोग, दांत, सांस, क्षय, वातज यह शुद्र वर्ण, वायु तत्व, नपुंसक तथा पश्चिमी स्वामी है।

जन्मकुण्डली में शनि के लग्न भाव से स्थित का फल-
1 लग्न (प्रथम) भावस्थ शनि मकर, कुम्भ तथा तुला का हो तो धनाढ्य, सुखी, धनु और मीन राशियों में हो तो अत्यंत धनवान और सम्मानित एवं अन्य राशियों का हो तो अशुभ होता है।

2 द्वितीय भावस्थ शनि हो तो जातक, कटुभाषी, साधुद्वेषी, मुखरोगी और कुम्भ या तुला का शनि हो तो धनी, लाभवान् एवं कुटुम्ब तथा भातृवियोगी होता है।

3 तृतीय भावस्थ शनि हो तो जातक शीघ्रकार्यकर्ता, सभाचतुर, चंचल, भाग्यवान, शत्रुहन्ता, निरोगी, विद्वान योग, मल्ल एवं विवेकी होता हैै।

4 चतुर्थ भावस्थ शनि हो तो जातक अपयशी, बलहीन, धूर्त, कपटी, शीघ्रकोपी, कृशदेही, उदासीन, वातपित्तयुक्त एवं भाग्यवान होता है।

5 पंचम भावस्थ शनि हो तो जातक आलसी, संतानयुक्त, चंचल, उदासीन, विद्वान, भ्रमणशील एवं वातरोगी होता है।

6 षष्ठ भावस्थ शनि जातक को बलवान, आचारहीन, व्रणी, जाति विरोधी, श्वास रोगी, कण्ठ रोगी, योगी, शत्रु हन्ता भोगी एवं कवि बनता है।

7 सप्तम भावस्थ शनि हो तो जातक क्रोधी, कामी, विलासी, अविवाहित रहने वाला, या दुःखी अविवाहित जीवन, धन सुख हीन, भ्रमणशील, नीचकर्मरत, स्त्रीभक्त होता है।

8 अष्टम भावस्थ शनि जातक को विद्वान स्थूल शरीर, उदार प्रकृति, कपटी, गुप्तरोगी, वाचाल, डरपोक, कुष्ठरोगी एवं धूर्त बनाता है।

9 नवम भावस्थ शनि हो तो जातक धर्मात्मा, साहसी, प्रवासी, कृशदेही, भीरू, भ्रातृहीन, शत्रुनाशक वात रोगी, भ्रमणशील एवं वाचाल होता है।

10 दशम भावस्थ शनि हो तो जातक विद्वान, ज्योतिषी, राजयोगी, न्यायी, नेता, धनवान, राजमान्य, उदरविकारी, अधिकारी, चतुर, भाग्यवान, परिश्रमी, निरूद्पयोगी एवं महात्वाकांक्षी होता है।

11 ग्यारहवें भावस्थ शनि हो तो जातक बलवान विद्वान, दीर्घायु, शिल्पी, सुखी, चंचल, क्रोधी, योगाभ्यासी, नीतिवान, परिश्रमी, व्यवसायी, पुत्रहीन, कन्याप्रज्ञ एवं रोगहीन होता है

12 बारहवें भावस्थ शनि हो तो जातक आलसी, दुष्ट, व्यसनी, अपस्मार, उन्माद रोगी, मातुल कष्टदायक, अविश्वासी एवं कटुभाषी होता है।

शनि की दशा आ गयी हैः-
प्रत्येक ग्रह का अपना-अपना अस्तित्व है। यहां शनि ग्रह के बारे में कहना चाहूंगा कि शनि ग्रह सर्वथा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं होता। शनि बुरे फलों के साथ-साथ अच्छे फल भी बहुत देता है। शनि के बारे में जितना भय या जितनी भ्रांतियां लोगों को हैं, उतना खराब वह नहीं है। शनि का नाम आते ही लोग ज्यादातर डरने लगते हैं-‘शनि की दशा आ गयी है’ या ‘शनि की साढे़साती’ लघु ढैय्या है। इस कारण कुछ लोग डर या वहम बैठा देते हैं, जिसकी वजह से साधारण व्यक्ति तरह-तरह से भ्रमित होकर परेशान हो उठता है। ग्रहों को शुभ व अशुभ भागों में बांटा जाता है। जब शुभ ग्रह राशि परिवर्तित करते हैं तो उस समय गोचर का चन्द्रमा जन्म चन्द्रमा से किस भाव में स्थित है उसके अनुसार गोचर के शुभाशुभ ग्रह का फल बतलाते हैं।
कई अन्य मत भी प्रचलित हैं जिससे गोचर के ग्रह या ‘शनि की साढ़ेसाती’ का शुभाशुभ फल निकालते हैं। दैवज्ञ श्री काटवे, का कहना है कि जब शनि चन्द्रमा से 13 अंश 20 कला पीछे होता है शनि की साढ़ेसाती उस समय आरम्भ होती है, तथा जब तक वह 13 अंश 20 कला आगे रहते हैं, तब तक रहती है। इस प्रकार जन्म चन्द्रमा के अंशों में से 13 अंश 20 कला घटाओ तथा 13 अंश 20 कला जोड़ो। इससे प्राप्त होने वाली चाप पर जब तक शनि रहता है शनि की साढ़ेसाती रहती है। इस प्रकार ग्रह की राशि परिवर्तन समय कोई महत्व नहीं रखता। इस 13 अंश 20 कला मूर्ति निर्णय पद्धति महत्वहीन हो जाती है। परन्तु लग्न, सप्तशलाका, तारा तथा अष्टक वर्ग से ग्रह को शुभाशुभ उत्तम है।

पाठकों को याद दिला दूं कि जिस जन्म कुण्डली में योग नहीं वह दशा अन्तर दशा नहीं दे सकती। इसलिए फल के लिए योग का होना आवश्यक होता है। माना कि जातक की जन्म कुण्डली में शादी का योग ही नहीं हो, तो दशान्तर दशा सप्तमेश की हो, या कारक ग्रह की, शादी नहीं हो सकती। इसलिए फल के लिए योग का होना आवश्यक है इसी प्रकार जो ग्रह की दशान्तरदशा नहीं दे सकती, वह उस फल को देता है। यदि दशान्तर दशा ही हो तो गोचर कितना भी शुभाशुभ हो, फल नहीं दे सकता। पहले दशान्तर दशा का होना आवश्यक है फिर गोचर उस फल को देता है। यदि महादशा, अंतरदशा ही नहीं तो गोचर कितना भी शुभाशुभ हो वह फल नहीं दे सकता। इसको इस प्रकार भी कहा जा सकता है।

सबसे पहले जातक के लिए फल होना चाहिए। दशा अन्तरदशा उस फल को संदेश वाहक, गोचर को देती है। संदेश वाहक, गोचर वह फल जातक को देता है। यदि दशान्तर दशा संदेश वाहक को फल नहीं देगी तो संदेश वाहक जातक को फल कहां से देगा? इसलिए क्रम निश्चित है, पहले फल होना चाहिए। (योग) दूसरे उन ग्रहों की दशान्तर दशा होनी चाहिए तब गोचर जातक को फल देता है। अन्यथा फल प्राप्त नहीं होता गोचर केवल सहायक है। गोचर के फल को प्रभावित करने वाले भिन्न-भिन्न पहलुओं का अध्ययन करने के बाद साढ़े साती का अध्ययन करते हैं। जन्म राशि से 12वें स्थान जन्म राशि पर एवं द्वितीय भाव पर जब शनि गोचर करता है उसे शनि की साढ़ेसाती कहते हैं। शनि एक राशि पर लगभग 2.5 वर्ष रहता है। इस प्रकार तीन राशियों पर 7.5 वर्ष हुए। इसलिए इसे साढ़ेसाती कहते हैं। साढ़ेसाती अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी। यह सब जन्मकुण्डली में चन्द्रमा तथा शनि की स्थिति तथा बल पर निर्भर करता है। लग्न, सप्तशलाका, तारा तथा अष्टक वर्ग के बल पर भी निर्भर करता है। परन्तु फिर भी यह मानसिक कष्ट कारक हो सकती है। जब शनि चन्द्रमा से 13 अंश 20 कला कम पर 12वें भाव में रहता है तो, शनि का प्रभाव आरंभ हो जाता है। यदि शनि वक्री हो जाए तो 7.5 वर्ष से भी ज्यादा समय तक तीनों राशियों पर रह सकता है।

जिनका दीर्घ जीवन है उनके जीवन में 3 बार साढे़साती आती है। पहले फेरे में कुछ बुरा फल देती है, परन्तु आक्रमण बड़े वेग से होता है। दूसरे फेरे में वेग तो कम हो जाता है परन्तु फिर भी कष्ट तो मिलता ही है, परन्तु इतना हानिकारक नहीं होता तथा कुछ शुभ फल भी प्राप्त होता है। परन्तु तीसरे पर्याय में जातक की मृत्यु हो जाती है। बहुत कम भाग्यवान जातक ही इस तीसरे फेरे को झेल पाते हैं। साढे़साती में साधारणतया हम यह देखते हैं कि शनि किस राशि से गोचर कर रहा है। उस राशि के स्वामी से उसका कैसा संबंध है। यदि उसका संबंध मित्रता का है तो अशुभ फल नहीं होता। वैसा तो यह संबंध पंचधा मैत्री से देखना चाहिए। परन्तु पंचधा मैत्री तो कुण्डली के अनुसार बनेगी। समझाने के लिए हम लिखते हैं मित्र राशि की रााशि से गोचर कर रहा है। माना कि शनि गोचर कर रहा है। मेष राशि से प्रथम 2.5 वर्ष मीन, जिसका स्वामी बृहस्पति है तथा शनि के गुरु के साथ सम नैसर्गिक संबंध हैं तो प्रथम 2.5 वर्ष सम होंगे। द्वितीय 2.5 वर्ष मेष, जिसमें चन्द्रमा स्थित हैं उसका स्वामी मंगल है जो शनि का शत्रु है। अर्थात द्वितीय ढैय्या अशुभ। तीसरी ढैय्या में शनि वृष राशि मे गोचर करेगा। वृष के स्वामी शुक्र को शनि मित्र समझता है, इसलिए तीसरे ढैय्या शुभ अथात् मेष राशि वालों के लिए केवल दूसरे ढैय्या अशुभ हुई इस प्रकार इसको इस तालिका में लिख सकते हैं।
कुछ विशेष नियमः-

1 जन्म कुण्डली में 6, 8, 12 भाव में शनि गोचर में अशुभ ग्रह से दृष्ट या युक्त हो तो अशुभ फल प्राप्त होता है।

2 जन्म चन्द्रमा यदि 2 या 12 भाव में अशुभ ग्रह से युक्त हो तो शनि की साढे़साती अशुभ होती है।

3 जन्म चन्द्रमा निर्बल हो तथा अशुभ भाव में स्थित हो तो शनि की साढे़साती अशुभ होती है।

4 जन्म चन्द्रमा से 2 या 12वें भाव में शुभ ग्रह हो तथा शुभ दृष्ट हो तो शनि की साढे़साती शुभ फल देती है।

5 जन्म चन्द्रमा शनि से युक्त हो, मंगल से दृष्ट न हो, तो साढे़ साती शुभ फल देती है।

6 जन्म कुण्डली में चन्द्रमा की स्थिति युत तथा दृष्टि साढे़साती शुभ फल देती है।

अष्टम शनि का ढैय्या- जब शनि चन्द्रमा से चतुर्थ भाव में जाता है तो चन्द्रमा को दशम दृष्टि से देखता है। उस समय पर भी चन्द्रमा शनि से पीड़ित हो। तो फल चन्द्र, शनि, लग्न, तारा, सप्तशलाका, दशान्तरदशा पर निर्भर करता है। इसको कष्टक शनि भी कहते हैं। इसी प्रकार शनि जब जन्म चन्द्रमा से अष्टम भाव में गोचर करता है तो शुभाशुभ फल देता है। शुभाशुभ फल का निर्णय अष्टक वर्ग, तथा तारा, दशान्तर दशा ही करेगी। यदि सर्वाष्टक वर्ग में 28 से ज्यादा शुभ बिन्दु हों तो शनि का उस भाव में गोचर, जातक को कष्ट न देकर आकस्मिक अच्छा फल देता है। कहावत है कि भले-भले को छोड़िये, खोटे ग्रह जप ध्यान वाली। बुरे दिन किसी को पूछ कर नहीं आते, जब समय अनुकूल रहता है। तब व्यक्ति प्रसन्न रहता है, परन्तु बुरा समय आने पर वह चारों ओर हाथ-पैर मारता है। येनकेन प्रकारेण अपनी स्थिति सुधरने के लिए हर संभव-असंभव प्रयास करता है। दान-दक्षिण, पूजा-पाठ, जप-तप, यंत्र-तंत्र-मंत्र करता है। साधु संन्यासी, ज्योतिषी, तांत्रिक, कोई भी हो, वह उन सब तक जा पहुंचता है। खेद! ग्रहों में शनि-मंगल-राहु पर प्रायः दोष दिया जाता है तो शनि की साढ़ेसाती को सुनकर सब का हृदय कांप उठता है। शनि, अकस्मात, कुप्रभाव देने वाला ग्रह है। अतः भय सहज स्वभाविक है। यह समय मृत्यु, रोग, भिन्न-भिन्न कष्ट, व्यवसाय हानि अपमान धोखा द्वेष, ईर्ष्या का माना जाता है।

कम श्रम अधिक लाभ, भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति, ऐश्वर्य लाभ, दीर्घायु होने व स्वस्थ रहने विघ्न-बाधाओं को नाश करने, ग्रह-शांति, कलह से मुक्ति, ईश-भक्ति, कुटुम्ब-वृद्धि, योग्य संतान उत्पन्न होने, संघर्ष से मुक्ति जैसी इच्छाएं मानव मात्र की सदैव से रही हैं। वह निरन्तर इसके लिए प्रयत्नशील रहता है। इस प्रकार शनि मानव जीवन हेतु अत्यंत ही पीड़ाकारक ग्रह है। हम चाहें तो शनि की पीड़ादायक दृष्टि से छुटकारा पा सकते हैं। कुछ तंत्र-मंत्र एवं टोटकों का उपयोग करें। शनि पीड़ितों को पुराने कम्बल या पुराने लोहे का दान, काला तिल दान, उडद दान करना चाहिए। लोहे का प्रयोग ज्यादा करना चाहिए।

शनैश्चर ग्रह की पूजन विधिः-
नवग्रहों में शनि देवता को सूर्य का पुत्र कहा जाता है। शनि देव विशाल शरीर तथा बड़े-बड़े नेत्रों वाले, कृष्ण वर्ण वाले हैं। शनि देव की साढ़े साती सभी के जीवन को प्रभावित करती है। जीवन की तीसरी साढ़े साती को पार करना बहुत भाग्य वाले को ही नसीब होता है। आरोग्य प्राप्ति, सुख शांति एवं समृद्धि के लिए शनि देव की पूजा करने से अशुभ प्रभाव नष्ट हो जाता है। शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से 21 शनिवार या कार्य पूर्ति न होने तक व्रत करें। गणेश पूजन करने के उपरान्त शनि देव का अवाह्न करना चाहिए। शनि देव की पूजा काले या नीले पुष्प से करें। शनि यंत्र की स्थापना कर शनि के मंत्रों व बीज मंत्रों से पूजन कर, शनि गायत्री मंत्र, शनि कवच व स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। अपनी श्रद्धा व सामर्थ के अनुसार काला वस्त्र, तिल, तेल, काली उड़द व स्वर्ण का दान करें। अाठ मुखी रूद्राक्ष धारण करें, पूजन करने के बाद काले उड़द की खिचड़ी भोजन एक बार करना चाहिए।
शनि ग्रह पीड़ा निवारक यंत्र :-

ध्यान मंत्र-
ऊँ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रहम्।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि श्नैश्चरम्।।

जप- ॐ शं श्नैश्चरायः नमः।
अथवा – ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः श्नैश्चराय नमः

जप संख्या – 23000

जप माला – रूद्राक्ष।

आसन – काला कम्बल।

दीपक – तिल के तेल का दीपक जलाएं।

जल पात्र – दीपक के साथ स्टील का जलपात्र रखें।

जप के लिए दिशा – पश्चिम की ओर मुख करके बैठें।

हवन करें- शमी की लकड़ी से ।

धारण करें – बिछुआ की जड़।

लाल किताब से शनि के उपचारः-

जिसके जन्मांग में चतुर्थ स्थान में शनि हो ऐसा जातक काले सांप को दूध पिलाये। भैंसे को चारा डालें। मजदूरों को भोजन खिलायें। आर्थिक अड़चन हमेशा रहती हो तो थोड़ा दूध कुएं में डालें। चतुर्थ स्थान में शनि हो तो ऐसा जातक रात को दूध न पिये दूध विषाक्त होकर शनि के द्वारा अधिक कष्ट पहुंचाता है

षष्ठ स्थान में शनि गुरु दोनों हों तो नारियल पानी में बहायें। ऐसी ग्रह स्थिति 28 वर्ष की उमर से पूर्व ही जातक का विवाह करायें। और 48 उम्र तक मकान न बनायें। संतति होने में बाधा हो तो काले सांप को दूध पिलायें और पूजा करें।

सप्तम स्थान में शनि हो, ऐसा जातक यदि मद्यपान करे तो यह मद्यपान तुरन्त बंद कर दें, अन्यथा उसका सर्वनाश कोई रोक नहीं सकता। कम से कम तीन सौ ग्राम हल्दी चालू कुएं में गुरुवार को डालें।

अष्टम स्थान में शनि हो एवं द्वितीय स्थान में अन्य कोई ग्रह न हो तो, जातक ब्याज का धंधा, कारखाना, छापाखाना, प्रिंटिंग प्रेस, तेल का व्यापार, लोहे की चीजों का व्यापार, वकालत, चमड़ा, पेट्रोल, आॅयल, मोबाइल, ग्रीस बेचने का व्यापार चुने। व्यापार से पूर्व एक मिट्टी के मटके में राई का तेल भरकर काले कपड़े से मुंह बंद करके तालाब या नदी में प्रवाहित करें। उसके बाद कृष्ण पक्ष के मध्य रात्रि में व्यवसाय का शुभ आरंभ करें। काफी धन मिलेगा।

एकादश स्थान में शनि एवं सप्तम स्थान में शुक्र हो तो ऐसा जातक बहुत ही भाग्यवान होता है। किसी भी कार्यारम्भ के पूर्व पानी से भरा घड़ा दान करें। हर शनिवार को पानी में काली हल्दी डाल कर उस पानी से स्नान करें।

जन्म कुण्डली में शनि शुभ हो, या अधिक शुभ हो तो घर में लोहे का फर्नीचर इस्तेमाल करें। भोजन में काला नमक एवं काली मिर्च का प्रयोग करें आखों में काजल या सुरमा डालें

अनिष्ट शनि की पीड़ा दूर करने के लिए एवं शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या का कष्ट निवारण के लिए भोजन के पूर्व भोजन में सब चीजें थोड़ी-थोड़ी अलग निकाल कर कौआ को खिलाओ

अनिष्ट शनि की पीड़ा दूर करने के लिए राई या तिल का तेल दान करें। शनि संतान की दृष्टि से बाधक होता हो तो, गर्भपात होता है तो, ऐसी स्त्री भोजन की थाली में से भोजन के पूर्व सब चीजें थोड़ी-थोड़ी अलग निकाल कर काले कुत्ते को खिलाये।

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गर्भाधान मुहूर्त

गर्भाधान और आधान लग्न :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

जातक शास्त्र में जन्म लग्न को शुद्ध करने के लिये कुछ ज्योतिषीय योगों का उल्लेख मिलता है। जब किसी जातक का लग्न संधिकाल में हो और निर्णय करना कठिन हो, कि किस लग्न को स्वीकार किया जाये, तब लग्न को शुद्ध करने के लिये इन योगों की सहायता ली जा सकती है अथवा इन योगों की सहायता से किसी हद तक लग्न को शुद्धरूप में प्राप्त किया जा सकता है। यहां जातक ग्रन्थों से आधान लग्न के कुछ चुने हुये योग प्रस्तुत हैं, जिनकी सहायता से विद्वान ज्योतिषाचार्य लग्न निर्णय कर सकते हैं। आधान ज्ञान- प्रति मास मंगल और चन्द्रमा की राशि स्थिति के योग से स्त्रियों को ऋतु-धर्म हुआ करता है। जिस समय चन्द्रमा स्त्री जातिका की राशि से नेष्ट स्थान में हो, और शुभ पुरूष ग्रह (बृहस्पति) से देखा जाता हो, तथा पुरुष की राशि से दृष्ट-उपचय स्थान में हो, और बृहस्पति से दृष्ट हो तो, उस स्त्री को पुरूष का संयोग प्राप्त होगा। आधान लग्न से सप्तम भाव पर पाप ग्रह का योग या दृष्टि हो तो, रोषपूर्वक और शुभ ग्रह का योग एवं दृष्टि हो तो प्रसन्नतापूर्वक पति-पत्नी का संयोग होता है। आधान काल में जिस द्वादशांश में चन्द्रमा हो, उससे उतनी ही संख्या की अगली राशि में चन्द्रमा के जाने पर बालक का जन्म होता है। आधान काल में शुक्र, रवि, चन्द्रमा और मंगल अपने-अपने नवमांश में हों गुरू, लग्न अथवा केन्द्र या त्रिकोण में हों तो वीर्यवान पुरुष को निश्चय ही सन्तान प्राप्त होती है। यदि मंगल और शनि सूर्य से सप्तम भाव में हो तो, वे पुरुष के लिये तथा चन्द्रमा से सप्तम में हों तो स्त्री के लिये रोगप्रद होते हैं।

सूर्य से 12, 2 में शनि और मंगल हों तो, पुरुष के लिये और चन्द्रमा से 12-2 में ये दोनों हों तो, स्त्री के लिये घातक योग होता है, अथवा इन शनि, मंगल में से एक युत और अन्य से दृष्ट रवि हो तो, वह पुरुष के लिये और चन्द्रमा यदि एक से युत तथा अन्य से दृष्ट हो तो, स्त्री के लिये घातक होता है। दिन में गर्भाधान हो तो, शुक्र मातृग्रह और सूर्य पितृग्रह होते हैं। रात्रि में गर्भाधान हो तो, चन्द्रमा मातृग्रह और शनि पितृग्रह होते हैं। पितृग्रह यदि विषम राशियों में हो तो, पिता के लिये और मातृग्रह सम राशि में हो तो, माता के लिये शुभ कारक होता है। यदि पापग्रह बारहवें भाव में स्थित होकर पापग्रहों से देखा जाता हो, और शुभ ग्रहों से न देखा जाता हो, अथवा लग्न में शनि हो, तथा उस पर क्षीण चन्द्रमा और मंगल की दृष्टि हो, तो उस समय गर्भाधान होने से स्त्री का मरण होता है। लग्न और चन्द्रमा दोनों या उनमें से एक भी दो पापग्रहों के बीच में हो तो गर्भाधान होने पर स्त्री गर्भ के सहित मृत्यु को प्राप्त होती है।

लग्न अथवा चन्द्रमा से चतुर्थ स्थान में पापग्रह हो, मंगल अष्टम भाव में हो, अथवा लग्न से 4-12वें स्थान में मंगल और शनि हों, तथा चन्द्रमा क्षीण हो तो, गर्भवती स्त्री का मरण होता है। गर्भाधान काल में मास का स्वामी अस्त हो, तो गर्भपात होता है, इसलिये इस प्रकार के लग्न को गर्भाधान हेतु त्याग देना चाहिये। आधान कालिक लग्न या चन्द्रमा के साथ अथवा इन दोनों से 5-6-7-4-10वें स्थान में सब शुभ ग्रह हों, और 3-6-10वें भाव में सब पापग्रह हों तथा लग्न और चन्द्रमा पर सूर्य की दृष्टि हो तो, गर्भ सुखी रहता है। रवि, गुरू, चन्द्रमा, और लग्न-ये विषम राशि एवं नवमांश में हों, अथवा रवि और गुरू विषम राशि में स्थित हों तो, पुत्र का जन्म होता है, अथवा नपुंसक का जन्म होता है। शुक्र और चन्द्रमा सम राशि में हो तथा बुध मंगल लग्न और बृहस्पति विषम राशि में स्थित होकर पुरुष ग्रह से देखे जाते हों, अथवा लग्न एवं चन्द्रमा समराशि में हो या पूर्वोक्त बुध, मंगल लग्न एवं गुरू सम राशियों में हों तो यमल (जुड़वी सन्तान) को जन्म देने वाले होते हैं। उक्त सभी ग्रह यदि सम राशि और सम नवमांश में हों, अथवा मंगल चन्द्रमा और शुक्र ये समराशि में हों तो, विद्वजनों को कन्या का जन्म समझना चाहिये। ये सब द्विस्वभाव राशि में हों, और बुध से देखे जाते हों, तो अपने-अपने पक्ष के यमल (जुड़वी सन्तान) केे जन्म कारक होते हैं, अर्थात् पुरुष ग्रह दो पुत्रों के और स्त्री ग्रह दो कन्याओं के जन्मदाता होते हैं। यदि दोनों प्रकार के ग्रह हों तो, एक पुत्र और एक कन्या का जन्म समझना चाहिये। लग्न में विषम (3-5 आदि) स्थानों में स्थित शनि भी पुत्र जन्म का कारक होता है। क्रमशः विषम एवं समराशि में स्थित रवि और चन्द्रमा अथवा बुध और शनि एक दूसरे को देखते हों, अथवा सम राशिस्थ सूर्य को विषम राशिस्थ लग्न एवं चन्द्रमा पर मंगल की दृष्टि हो, अथवा चन्द्रमा समराशि और लग्न विषम राशि में स्थित हो, तथा उन पर मंगल की दृष्टि हो अथवा लग्न चन्द्रमा और शुक्र ये तीनों पुरुष राशियों के नवमांश में हों तो, इन सब योगों में नपुंसक का जन्म होता है।

शुक्र और चन्द्रमा सम राशि में हो तथा बुध मंगल लग्न और बृहस्पति विषम राशि में स्थित होकर पुरुष ग्रह से देखे जाते हों, अथवा लग्न एवं चन्द्रमा समराशि में हो या पूर्वोक्त बुध, मंगल लग्न एवं गुरू सम राशियों में हों तो, यमल (जुड़वी) सन्तान को जन्म देने वाले होते हैं। यदि बुध अपने (मिथुन या कन्या के) नवमांश में स्थित होकर द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह और लग्न को देखता हो तो, गर्भ में तीन सन्तान की स्थिति समझनी चाहिये। उनमें से दो तो बुध नवमांश के सदृश होंगे और एक लग्नांश के सदृश्य। यदि बुध और लग्न दोनाें तुल्य नवमांश में हों तो, तीनों सन्तानों को एक-सा ही समझना चाहिये। यदि धनु राशि का अंतिम नवांश लग्न हो, उसी अंश में बली ग्रह स्थित हों, और बलवान बुध या शनि से देखे जाते हों तो गर्भ में बहुत (तीन से अधिक) सन्तानों की स्थिति समझनी चाहिये। या पूर्वोक्त बुध, मंगल लग्न एवं गुरू सम राशियों में हों तो यमल (जुड़वी) सन्तान को जन्म देने वाले होते हैं।

गर्भ मासों के अधिपति:- शुक्र, मंगल, बृहस्पति, सूर्य, चन्द्रमा, शनि, बुध, आधान-लग्नेश, सूर्य, और चन्द्रमा ये गर्भाधान काल से लेकर प्रसव पर्यन्त दस मासों के क्रमशः स्वामी हैं। आधान समय में जो ग्रह बलवान या निर्बल होता है, उसके मास में उसी प्रकार शुभ या अशुभ फल होता है। बुध त्रिकोण (5-6) में हो, और अन्य ग्रह निर्बल हो तो गर्भस्थ शिशु के दो मुख, चार पैर, और चार हाथ होते हैं। चन्द्रमा वृष में और अन्य सब पाप ग्रह राशि संधि में हों तो, बालक गूंगा होता है। यदि उक्त ग्रहों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, और हाथ से रहित रहता है तो, वह बालक अधिक दिनों में बोलता है। मंगल और शनि यदि बुध की राशि नवमांश में हों तो शिशु गर्भ में ही दांत से युक्त होता है। चन्द्रमा कर्क राशि में होकर लग्न में हो, तथा उस पर शनि और मंगल की दृष्टि हो तो, गर्भस्थ शिशु कुबड़ा होता है। मीन राशि लग्न में हो, और उस पर शनि, चन्द्रमा, तथा मंगल की दृष्टि हो तो, गर्भ का बालक पंगु होता है।

पापग्रह और चन्द्रमा राशि संधि में हों, और उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो, गर्भस्थ शिशु जड़-बुद्धि (मूर्ख) होता है। मकर का अन्तिम अंश लग्न मे हो, और उस पर शनि चन्द्रमा तथा सूर्य की दृष्टि हो तो, गर्भ का बच्चा वामन (बौना) होता है। पंचम तथा नवम लग्न के द्रेष्काण में पापग्रह हो तो, जातक क्रमशः पैर, मस्तक और हाथ से रहित रहता है। गर्भाधान के समय यदि सिंह लग्न में सूर्य और चन्द्रमा हों, तथा उन पर शनि और मंगल की दृष्टि हो तो, शिशु नेत्रहीन अथवा नेत्रविकार से युक्त होता है। यदि शुभ और पापग्रह दोनों की दृष्टि हो तो आंख में फूला होती है। यदि लग्न से बाहरवें भाव में चन्द्रमा हो तो, बालक के वाम नेत्र, सूर्य हो तो दक्षिण नेत्र में कष्ट होता है। अशुभ योगों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो, उन योगों के फल परिवर्तित होकर सम हो जाते हैं।

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