गुरू की महिमा

जब महादेवजी ने बताई पार्वतीजी को गुरु की महिमा :-

(गुरू पूर्णिमा 27/07/2018 पर विशेष) :-

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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येनं तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

एक बार पार्वतीजी ने महादेवजी से गुरु की महिमा बताने के लिए कहा। तब महादेवजी ने कहा :-

गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही शिव और गुरु ही परमब्रह्म है; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है। अखण्ड मण्डलरूप इस चराचर जगत में व्याप्त परमात्मा के चरणकमलों का दर्शन जो कराते हैं; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति: पूजामूलं गुरो: पदम्। मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरो: कृपा।।

अर्थात्– गुरुमूर्ति का ध्यान ही सब ध्यानों का मूल है, गुरु के चरणकमल की पूजा ही सब पूजाओं का मूल है, गुरुवाक्य ही सब मन्त्रों का मूल है, और गुरु की कृपा ही मुक्ति प्राप्त करने का प्रधान साधन है। गुरु शब्द का अभिप्राय जो अज्ञान के अंधकार से बंद मनुष्य के नेत्रों को ज्ञानरूपी सलाई से खोल देता है, वह गुरु है। जो शिष्य के कानों में ज्ञानरूपी अमृत का सिंचन करता है, वह गुरु है। जो शिष्य को धर्म, नीति आदि का ज्ञान कराए, वह गुरु है। जो शिष्य को वेद आदि शास्त्रों के रहस्य को समझाए, वह गुरु है।

गुरुपूजा का अर्थ :-
गुरुपूजा का अर्थ किसी व्यक्ति का पूजन या आदर नहीं है वरन् उस गुरु की देह में स्थित ज्ञान का आदर है, ब्रह्मज्ञान का पूजन है।

गुरुपूर्णिमा मनाने का कारण :-
वैसे तो गुरू सदा पूजनीय हैं, परंतु आषाढ़ पूर्णिमा के दिन सभी अपने-अपने गुरु की पूजा विशेष रूप से करते हैं। यह सद्गुरु के पूजन का पर्व है, इसलिए इसे गुरुपूर्णिमा कहते हैं। जिन ऋषियों-गुरुओं ने इस संसार को इतना ज्ञान दिया, उनके प्रति कृतज्ञता दिखाने का, ऋषिऋण चुकाने का और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का पर्व है गुरुपूर्णिमा। यह श्रद्धा और समर्पण का पर्व है। गुरुपूर्णिमा का पर्व पूरे वर्षभर की पूर्णिमा मनाने के पुण्य का फल तो देता ही है, साथ ही मनुष्य में कृतज्ञता का सद्गुण भी भरता है। गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।।
माता-पिता जन्म देने के कारण पूजनीय हैं, किन्तु गुरु धर्म और अधर्म का ज्ञान कराने से अधिक पूजनीय हैं। इष्टदेव के रुष्ट हो जाने पर तो गुरु बचाने वाले हैं,‌ परन्तु गुरु के अप्रसन्न होने पर कोई भी बचाने वाला नहीं हैं। गुरुदेव की सेवा-पूजा से जीवन जीने की कला के साथ परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग भी दिखाई पड़ जाता है। कवच अभेद विप्र गुरु पूजा। एहि सम विजय उपाय न दूजा।।

अर्थात् :- वेदज्ञ ब्राह्मण ही गुरु है, उन गुरुदेव की सेवा करके, उनके आशीर्वाद के अभेद्य कवच से सुरक्षित हुए बिना संसार रूपी युद्ध में विजय प्राप्त करना मुश्किल है।

गुरुपूर्णिमा को व्यासपूजा क्यों कहते हैं? :-
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को भगवान वेदव्यास का अवतरण पृथ्वी पर हुआ था इसलिए यह व्यासपूजा या व्यासपूर्णिमा कहलाती है। व्यासजी ऋषि वशिष्ठ के पौत्र व पराशर ऋषि के पुत्र हैं। व्यासदेवजी गुरुओं के भी गुरु माने जाते हैं। वेदव्यासजी ज्ञान, भक्ति, विद्वत्ता और अथाह कवित्व शक्ति से सम्पन्न थे। इनसे बड़ा कवि मिलना मुश्किल है। उन्होंने ब्रह्मसूत्र बनाया, संसार में वेदों का विस्तार करके ज्ञान, उपासना और कर्म की त्रिवेणी बहा दी, इसलिए उनका नाम ‘वेदव्यास’ पड़ा। पांचवा वेद ‘महाभारत’ और श्रीमद्भागवतपुराण की रचना व्यासजी ने की। अठारह पुराणों की रचना करके छोटी-छोटी कहानियों द्वारा वेदों को समझाने की चेष्टा की। संसार में जितने भी धर्मग्रन्थ हैं, चाहे वे किसी भी धर्म या पन्थ के हों, उनमें अगर कोई कल्याणकारी बात लिखी है तो वह भगवान वेदव्यास के शास्त्रों से ली गयी है। इसलिए कहा जाता है–‘व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्’ अर्थात् जगत में सब कुछ व्यासजी का ही उच्छिष्ट है।
विलक्षण गुरु समर्थ रामदास के अदम्य साहसी शिष्य छत्रपति शिवाजी छत्रपति शिवाजी महाराज समर्थ गुरु रामदास स्वामी के शिष्य थे। एक बार सभी शिष्यों के मन में यह बात आयी कि शिवाजी के राजा होने से समर्थ गुरु उन्हें ज्यादा प्यार करते हैं। स्वामी रामदास शिष्यों का भ्रम दूर करने के लिए सबको लेकर जंगल में गए और एक गुफा में जाकर पेटदर्द का बहाना बनाकर लेट गए। शिवाजी ने जब पीड़ा से विकल गुरुदेव को देखा तो पूछा– ‘महाराज! इसकी क्या दवा है?’
गुरु समर्थ ने कहा – शिवा! रोग असाध्य है। परन्तु एक दवा काम कर सकती है, पर जाने दो।
शिवा ने कहा ‘गुरुदेव दवा बताएं, मैं आपको स्वस्थ किए बिना चैन से नहीं रह सकता।’
गुरुदेव ने कहा इसकी दवा है– सिंहनी का दूध और वह भी ताजा निकला हुआ; परन्तु यह मिलना असंभव सा है।
शिवा ने पास में पड़ा गुरुजी का तुंबा उठाया और गुरुदेव को प्रणाम कर सिंहनी की खोज में चल दिए। कुछ दूर जाने पर उन्हें एक सिंहनी अपने दो शावकों (बच्चों) के साथ दिखायी पड़ी। अपने बच्चों के पास अनजान मनुष्य को देखकर वह शिवा पर टूट पड़ी और उनका गला पकड़ लिया। शूरवीर शिवा ने हाथ जोड़कर सिंहनी से विनती की– ‘गुरुदेव की दवा के लिए तुम्हारा दूध चाहिए’ उसे निकाल लेने दो। गुरुदेव को दूध दे आऊँ, फिर तुम मुझे खा लेना।’ ऐसा कहकर उन्होंने ममता भरे हाथों से सिंहनी की पीठ सहलाई। मूक प्राणी भी ममता की भाषा समझते हैं। सिंहनी ने शिवा का गला छोड़ा और बिल्ली की तरह शिवा को चाटने लगी। मौका देखकर शिवा ने उसका दूध निचोड़कर तुंबा में भर लिया और सिंहनी पर हाथ फेरते हुए गुरुजी के पास चल दिए।
उधर गुरुजी सभी शिष्यों को आश्चर्य दिखाने के लिए शिवा का पीछा कर रहे थे। शिवा जब सिंहनी का दूध लेकर लौट रहे थे तो रास्ते में गुरुजी को शिष्यों के साथ देखकर शिवा ने पूछा– ‘गुरुजी, पेटदर्द कैसा है?’
गुरु समर्थ ने शिवा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा– ‘आखिर तुम सिंहनी का दूध ले आए। तुम्हारे जैसे शिष्य के होते गुरु की पीड़ा कैसे रह सकती है?’
भारतीय परम्परा में गुरुसेवा से ही भक्ति की सिद्धि हो जाती है। गुरु की सेवा तथा प्रणाम करने से देवताओं की कृपा भी मिलने लगती है।
‘गुरु को राखौ शीश पर सब विधि करै सहाय।’
कलिकाल में सद्गुरु न मिलने पर भगवान शिव ही सभी के गुरु हैं क्योंकि ‘गुरु’ शब्द से जगद्गुरु परमात्मा ईश्वर का ही बोध होता है; इसलिए कहा भी गया है :-

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूर मर्दनम्। देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।।

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पूर्णिमा और अमावस्या

हिन्दू संस्कृति में क्यों महत्वपूर्ण हैं,पूर्णिमा और अमावस्या ? :-

Dr.R.B.Dhawan

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पूर्णिमा :- पूर्णिमा का महत्व जहां हिन्दू और सनातन संस्कृति में पर्व के रूप में विशेष है, वहीं आधुनिक विचारधारा सांस्कृतिक विचारधारा से बिल्कुल अलग है। भारतीय सनातन या वैदिक गणना के अनुसार हर माह की पूर्णिमा का कोई न कोई धार्मिक महत्व है, वर्ष की सभी 12 पूर्णिमा के नाम और अपने अपने प्रभाव हैं :- 1. चैत्र की पूर्णिमा के दिन हनुमान जयंती मनाई जाती है। 2. वैशाख की पूर्णिमा के दिन बुद्ध जयंती मनाई जाती है। 3. ज्येष्ठ की पूर्णिमा के दिन वट-सावित्री मनाया जाता है। 4. आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू-पूर्णिमा कहते हैं, इस दिन गुरु पूजा का विधान है। इसी दिन कबीर जयंती भी मनाई जाती है। 5. श्रावण की पूर्णिमा के दिन रक्षाबन्धन का पर्व मनाया जाता है। 6. भाद्रपद की पूर्णिमा के दिन उमा माहेश्वर व्रत मनाया जाता है। 7. अश्विन की पूर्णिमा के दिन शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। 8. कार्तिक की पूर्णिमा के दिन पुष्कर मेला और गुरुनानक जयंती पर्व मनाए जाते हैं। 9. मार्गशीर्ष की पूर्णिमा के दिन श्री दत्तात्रेय जयंती मनाई जाती है। 10. पौष की पूर्णिमा के दिन शाकंभरी जयंती मनाई जाती है, जैन धर्म के मानने वाले पुष्यभिषेक यात्रा प्रारंभ करते हैं। बनारस में दशाश्वमेध तथा प्रयाग में त्रिवेणी संगम पर स्नान का बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। 11. माघ की पूर्णिमा के दिन संत रविदास जयंती, श्री ललित और श्री भैरव जयंती मनाई जाती है, माघी पूर्णिमा के दिन संगम पर माघ-मेले में जाने और स्नान करने का विशेष महत्व है। 12. फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन होली का पर्व मनाया जाता है।

खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार इस दिन चन्द्रमा का प्रभाव काफी तीव्र होता है, इस कारण शरीर के अंदर न्यूरॉन सेल्स क्रियाशील हो जाते हैं, और ऐसी स्थिति में मनुष्य ज्यादा उत्तेजित या या भावुक रहता है। एक बार नहीं, प्रत्येक पूर्णिमा को ऐसा होता रहता है, तो व्यक्ति का भाग्य भी उस क्रिया से प्रभावित होता है। अक्सर देखा जाता है कि पूर्णिमा की रात कुछ लोगों का मन बेचैन रहता है, और नींद कम आती है। संवेदनशील दिमाग वाले लोगों के मन में आत्महत्या करने के विचार बनने लगते हैं। चांद का धरती के जल से सम्बंध है, जब जब पूर्णिमा आती है, समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है, क्योंकि चंद्रमा समुद्र के जल को ऊपर की ओर उठाता है। मानव के शरीर में भी लगभग 66% जल रहता है।

पूर्णिमा के दिन इस जल की गति और गुण बदल जाते हैं। जिन्हें मंदाग्नि रोग होता है, या जिनके पेट में चय-उपचय की क्रिया शिथिल होती है, तब अक्सर सुनने में आता है कि, ऐसे व्यक्ति भोजन करने के बाद नशा जैसा महसूस करते हैं, और नशे में न्यूरॉन सेल्स शिथिल हो जाते हैं, जिससे दिमाग का नियंत्रण शरीर पर कमजोर हो जाता है, और भावनाओं पर केंद्रित हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों पर चन्द्रमा का प्रभाव कुछ इस प्रकार होता है कि उनका मन गलत दिशा लेने लगता है। इस कारण हर माह पूर्णिमा व्रत रखने की सलाह दी जाती है। व्रत के साथ साथ इस दिन तामसिक वस्तुओं का सेवन भी नहीं करना चाहिए। मदिरा इत्यादि से दूर रहना चाहिए। क्योंकि इस दिन तामसिक भोजन करने से मनुष्य के शरीर पर ही नहीं अपितु मन और फिर कर्म व कर्मफल भी प्रभावित होते हैं। चौदस, पूर्णिमा और प्रतिपदा यह 3 दिन पवित्रता बने रहने में ही भलाई है।

अमावस्या :- चन्द्रमा की सोलह कला हैं, इनमें सोलहवीं कला का नाम “अमा” है, स्कन्द-पुराण में एक श्लोक है :-
अमावस्या षोडशभागेन देवी प्रोक्ता महाकला।

संस्थिता परमा माया देबिना देहधारिणी।।

चन्द्रमण्डल की सोलह कलाओं में ‘अमा’ नाम की भी एक महाकला है, जिसमे चन्द्रमा की सोलह कलाएं समाहित हैं, जिसका कभी क्षय या उदय नहीं होता, आसान शब्दों में कहा जाये तो, सूर्य और चंद्रमा के मिलन काल को अमावस्या कहते हैं, ज्योतिष में चन्द्रमा को मन का देवता माना गया है। अमावस्या के दिन चन्द्रमा दिखाई नहीं देता। ऐसे में जो लोग अति भावुक होते हैं, जैसे लड़कियां और महिलाएं, इन पर इस खगोलीय घटना का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, क्यों की ये मन से बहुत ही भावुक होती हैं, इस दिन संवेदनशील लोगों विशेषकर लड़कियों और महिलाओं के मन में हलचल अधिक बढ़ जाती है। इस के अतिरिक्त जो व्यक्ति नकारात्मक सोच वाला होता है, उसे नकारात्मक शक्ति अपने प्रभाव में ले लेती है। अमावस्या माह में एक दिन आती है। शास्त्रों में अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है। अमावस्या सूर्य और चन्द्र के मिलन का काल है, इस दिन दोनों एक ही राशि में रहते हैं। क्योंकि अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव है, इसी लिए यह धारणा प्रचलित हुई की इस दिन भूत-प्रेत पितृ, पिशाच, निशाचर जीव-जंतु और दैत्य अधिक सक्रिय और उन्मुक्त रहते हैं। अतः इस दिन कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस दिन तामसिक भोजन और मादक वस्तुओ का सेवन करने से बचना चाहिए। मांसाहार का सेवन नहीं करना चाहिए। शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए इन वस्तुओं का शरीर पर ही नहीं, मन पर भी दुष्प्रभाव होता है। अच्छी बात तो यह होगी कि चौदस, अमावस्या और प्रतिपदा इन तीनों दिन पवित्र रहकर सात्विक आहार और ब्रह्मचर्य का पालन करने में ही भलाई है ।कुछ मुख्य अमावस्या : भौमवती अमावस्या, मौनी अमावस्या, शनि अमावस्या, हरियाली अमावस्या, दिवाली अमावस्या, सोमवती अमावस्या, सर्वपितृ अमावस्या।

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