नवरात्र में कलश स्थापना

नवरात्रि में कलश स्थापना का भी एक विधि-विधान होता है :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Best Astrologer in Delhi)

इस वर्ष :- चैत्र नवरात्र 2018, मार्च में 18 तारीख से आरम्भ हो रहे हैं। सनातन मत अनुसार चैत्र या शरद् दोनों नवरात्र के प्रथम दिन अर्थात् शुक्ल प्रतिपदा (प्रथम नवरात्र) के दिन सर्वप्रथम कलश स्थापना की जाती है।

कलश स्थापना का भी एक विधि-विधान होता है। यदि कोई परिवार इस विधि को नहीं जानता तो, नवरात्रों में किसी विद्वान पुजारी को बुलाकर भी स्थापना करवा सकते हैं। 9 दिन के इस शक्ति पर्व नवरात्रो में दुर्गा माँ के नव रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्र के आरंभ में प्रतिपदा तिथि को उत्तम मुहर्त में कलश की स्थापना की जाती है। कलश को भगवान गणेश का रूप माना गया है जो की किसी भी पूजा में प्रथम पूजनीय हैं, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित भविष्य पुराण में बताया गया है की कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को साफ-सुथरा करके शुद्ध किया जाना चाहिए। उसके उपरान्त एक लकड़ी का पाटे पर लाल कपडा बिछाकर उस पर थोड़े अक्षत् (चावल) गणेश भगवान को याद करते हुए रखने चाहिए, फिर जिस जगह कलश को स्थापित करना है, उस जगह बालु मिश्रित मिट्टी रख कर उसमे जौ बो देने चाहियें, फिर इसी मिट्टी पर कलश स्थापना करनी चाहिए। कलश में पवित्र (शुद्ध) जल भरकर रोली से स्वास्तिक और ॐ बनाकर कलश के मुख पर मोली से रक्षा सूत्र बांध दें, कलश में सुपारी, और एक सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रख दें, और फिर कलश के मुख को ढक्कन से ढक देना चाहिए। ढक्कन को चावल से भर दें, ढक्कन के ऊपर या पास में ही एक नारियल लाल चुनरी से लपेटकर रक्षा सूत्र से बांध देना चाहिए। इस नारियल को कलश के ढक्कन रखते समय सभी देवी देवताओं का आवाहन करें, और अंत में दीपक जलाकर कलश की पूजा करें। अंत में कलश पर फूल और मिठाइयां चढ़ा दे। इस प्रकार हर दिन नवरात्रों में इस कलश की पूजा करें।

किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य के लिए देव पूजा में साधक द्वारा पूजा सामग्री के साथ-साथ अन्य कई वस्तुओं का उपयोग भी किया जाता है। जैसे-जल, पुष्प, दीपक, घंटी, शंख, आसन, कलश आदि, जिनका अलग-अलग एक विशिष्ट महत्व एवं प्रतीकात्मक अर्थ होता है। इनमें कलश या कुंभ की भारतीय संस्कृति में एक कल्पना की गई है। कुंभ को समस्त, ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना गया है, क्योंकि ब्रह्माण्ड या आकाश भी घट के समान है। इसको इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि घट में समस्त सृष्टि का समावेश है। इसी में सभी देवी-देवता, नदी-पर्वत, तीर्थ आदि उपस्थित रहते हैं-

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रूद्रः समाश्रितः। मूले तवस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।। कुक्षौ तु सागराः सर्वे, सप्तद्वीपाः वसुन्धरा।

ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः।।
अंगैश्च सहिताः सर्वे कलशन्तु समाश्रिताः।
अत्र गायत्री सावित्री, शांति-पुष्टिकरी सदा।।
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि, त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः।
शिवः स्वयं त्वमेवासि, विष्णुस्तवं च प्रजापतिः।।
आदित्या वसवो रूद्रा, विश्वेदेवाः सपैतृकाः।
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि, यतः कामफलप्रदा।।
त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं, कर्तुमीहे जलोद्भव।
सान्निध्यं कुरू मे देव! प्रसन्नो भव सर्वदा।।

अतः नवरात्र के अतिरिक्त भी (किसी भी) पूजा, पर्व व संस्कार में सबसे पहले कलश स्थापना करने का विधान है। कलश स्थापना तथा पूजन के बिना कोई भी मंगल कार्य प्रारंभ नहीं किया जाता है। कलश स्थापना का भी एक विधान है। इसे पूजा स्थल पर ईशान कोण में स्थापित किया जाना चाहिए। प्रायः कलश ताम्बे का ही सर्वोत्तम माना गया है। यदि यह उपलब्ध न हो तो मिट्टी का भी प्रयोग में लिया जा सकता है। सोने व चांदी का भी कलश प्रयोग में ले सकते हैं। शास्त्रों में कलश कितना बडा या छोटा हो इसका भी वर्णन मिलता है। मध्य में पचास अंगुल चौडा और सोलह अंगुल ऊंचा, नीचे बारह अंगुल चौडा और ऊपर से आठ अंगुल का मुख रखें तो यह कलश सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सामान्यता कलश को जल से भरा जाता है, परन्तु विशेष प्रयोजन में किए जाने वाले अनुष्ठानों में विशेष वस्तुए भी रखे जाने का विधान है:-

धर्म लाभ हेतु अनुष्ठान किया जा रहा हो तो कलश में जल के स्थान में यज्ञ भस्म का प्रयोग होता है। धन के लाभ हेतु मोती व कमल का प्रयोग करते है, विषय भोग हेतु गोरोचन, मोक्ष हेतु वस्त्र, युद्ध अथवा मुकदमें में विजय के लिए अपराजिता का प्रयोग करते हैं। किसी का उच्चाटन करना हो तो व्याघ्री (छोटी कटेरी), वशीकरण के लिए मोर पंखी, मारण हेतु काली मिर्च तथा आकर्षण करने हेतु धतूरा भरने का विधान है।

कलश को भूमि पर नहीं रखना चाहिए। इसको रखने से पूर्व भूमि की शुद्धि करना आवश्यक है। फिर बिन्दू षटकोण अष्टदल आदि बना कर उसके ऊपर कलश की स्थापना करनी चाहिये अथवा इसे धान्य (जौ) के ऊपर भी रखा जा सकता है। कलश उपरोक्त में से किसी भी पदार्थ से भरकर विभिन्न देवताओं का कलश में आवाहन किया जाता है। इसके पश्चात प्रधान देवता (जिसकी आराधना या अनुष्ठान किया जाना है) का आवाहन किया जाता है। साथ ही नवग्रहों एवं पितरों की स्थापना की जाती है, तत्पश्चात ही मांगलिक कार्य का शुभारम्भ किया जाता है।

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