संतान का योग

Dr.R.B.Dhawan

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“संतान होगी या नही?” इस विषय पर ज्योतिष शास्त्र में महर्षि पराशर ने बहुत स्टीक ग्रह गणना पद्धति प्रस्तुत की है। पुरुष के लिए “बीज स्फुट” और स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट”। हालांकि इस ग्रह गणना के परिणाम कोई अंतिम और निर्णायक नहीं हो सकते, किन्तु फिर भी, संतानोत्पत्ति के प्रश्न का उत्तर काफी हद तक स्पष्ट हो जाता है। वृहदपराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर कहते हैं- पुरूष का शुक्राणु (वीर्य) संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा अयोग्य! और यदि योग्य है, तो उत्तम है, या मध्यम श्रेणी का‌ है! इस प्रश्न का उत्तर बीज स्फुट गणना से देखना चाहिए-।

इसी प्रकार स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट” ग्रह गणना से अनुमान हो सकता है कि स्त्री का गर्भाशय संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा उत्तम या मध्यम है, या फिर अयोग्य है। महर्षि ने वृहद पराशर होरा शास्त्र में उल्लेख किया है कि जिस प्रकार उपजाऊ भूमि में उत्तम बीज बोया जाये तो अच्छी फसल होती है, मध्यम भूमि में उत्तम बीज से मध्यम श्रेणी की फसल होती है, और मध्यम भूमि में मध्यम श्रेणी का बीज परिणाम इसी अनुसार होता है। और इसी प्रकार बंजर भूमि में कितना ही उत्तम बीज बोने से परिणाम शून्य ही होता है। और मध्यम बीज से भी परिणाम शून्य होता है, इसी प्रकार स्त्री के गर्भाशय को महर्षि ने क्षेत्र बताते हुए कहा है कि, इस ज्योतिषीय गणना पद्धति से देखना चाहिए कि स्त्री का गर्भाशय स्वस्थ (गर्भ धारण योग्य) है या नहीं।

डाॅक्टर विभिन्न प्रकार कि जाँच करने के बाद भी जो नही बता पाते, वो ज्योतिषी चंद मिनटों मे गणना करके बता सकते हैं। दम्पत्ती के जीवन मे संतान होने या ना होने के विचार के लिये ज्योतिष मे पंचम भाव, पंचमेश, संतान कारक बृहस्पति आदि पर विचार करने के ज्योतिषीय नियम बताये गये हैं, किन्तु महर्षि पाराशर ने संतान के विषय में एक क्रान्तिकारी ज्योतिषीय सूत्र दिया है, सूत्र यह है- पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट कि गणना, तथा स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना करना। डाॅक्टर अनेक प्रकार कि जाँच करने के बाद भी यह ठीक से निर्णय नही कर पाते हैं कि समस्या पुरूष के शुक्राणुओं मे है, या स्त्री के गर्भाशय में। डाॅक्टर अनेक बार शारीरिक तौर पर पति-पत्नी को फिट बताते हैं, लेकिन फिर भी संतान के जन्म में बाधा उत्पन्न हो जाती है। लेकिन बीज स्फुट ओर क्षेत्र स्फुट कि गणना करके नि:संतान दंपत्ति को यह स्पष्ट रूप से बताया जा सकता है कि, रोग किसके शरीर में है।

क्या मेडिकल कि सहायता से संतान का जन्म हो सकेगा? बीज के वृक्ष बनने के लिये उसे उपजाऊ भूमि कि आवश्यकता होती है, अगर भूमि बंजर है तो बीज वृक्ष ना बन सकेगा। स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना गर्भ के ठीक भूमि कि तरह उपजाऊ, बंजर या मध्यम होने का पता लगाने जैसा है। अगर स्त्री कि जन्मकुंडली मे क्षेत्र स्फुट सही आता है ओर पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट मध्यम आता हो या सही नही आता है तो मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय वहाँ निःसंतान दंपत्ति कि सहायता कर सकते है। लेकिन क्षेत्र स्फुट के खराब होने पर मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय सहायक नही हो पाते है।

आज के समय मे चिकित्सा विज्ञान के साथ यदि ज्योतिष विज्ञान को जोड़कर कार्य किया जाये तो चिकित्सा विज्ञान ओर अधिक सरल बन सकेगा। कुंडली में संतानोत्पत्ति और संतान सुख के लिए विशेष तौर पर पंचम भाव से देखा जाता है, किंतु कुंडली विश्लेषण करते समय हमें बहुत से तथ्यों पर ध्यान देना बहुत ही आवश्यक है। संतान के सुख-दु:ख का विचार सप्तमेश, नवमेश, पंचमेश तथा गुरु से किया जाता है। नवम स्थान जातक का भाग्य स्थान भी है, और पंचम स्थान से पांचवा स्थान भी होता है, इस कारण भी नवमेश पर दृष्टि रखना बतलाया गया है। बृहस्पति संतान और पुत्र का कारक है, अतएव बृहस्पति पर दृष्टि रखना आवश्यक है।

इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पुराने शास्त्रों में एक मंत्र लिखा है, कारकों भावः नाशयः इसका अर्थ यह हुआ कि जिस भाव का जो कारक होता है, वह उस भाव में स्थित हो तो, उस भाव का नाश करता है। इसलिए गुरु यदि पंचम भाव में हो तो बहुत बार देखा गया है कि संतान संबंधी चिंता व कष्ट रहते हैं। लग्न, चंद्रमा और बृहस्पति से पंचम भाव यदि पाप ग्रहों से युत अथवा दृष्ट हो, शुभ ग्रहों से युति या दृष्ट ना हो तो तीनो पंचम भाव पापग्रहों के मध्य पापकर्तरी स्थित हो तथा उनके स्वामी त्रिक 6 8 12 वे भाव में स्थित हो तो, जातक संतानहीन होता है। फलित शास्त्र के सभी ग्रंथो में इसका उल्लेख मिलता है।

अनेक प्राचीन विज्ञजनों ने यह लिखा है कि, यदि पंचम भाव में वृषभ, सिंह, कन्या अथवा वृश्चिक राशि हो तो, अल्प संतति होती है, या दीर्घ अवधि के बाद संतान लाभ मिलता है। ज्योतिष में हर विषय पर बहुत ही विस्तृत और बहुत ही बड़ा साहित्य मिलता है, और अनेक प्रकार के उपाय या विधियां दी हुई हैं, लेकिन मुख्य तौर पर कुछ सूत्र हैं, जिनके आधार पर हम संतान योग को अच्छी तरह से पता लगा सकते हैं, इसमें सबसे बड़ा सूत्र है बीज स्फुट और क्षेत्र स्फुट। बीज स्फुट से तात्पर्य पुरुष की कुंडली के ग्रहो की स्तिथि से है। अगर कोई फसल बोई तो बीज हमको उत्तम चाहिए यदि बीज अच्छा नहीं होगा तो कभी भी फसल अच्छी नहीं होगी। इसी प्रकार क्षेत्र स्फुट मतलब हम खेत से भी समझ सकते हैं,‌ यदि खेत अच्छा नहीं होगा तो कितने भी अच्छे बीज बो देवें उसके अंदर फसल अच्छी नहीं होगी, अतः पुरुष की कुंडली में बीज स्फुट और स्त्री की कुंडली मे क्षेत्र स्फुट की गणना बतलाई गयी है, जिससे भी संतान योग का अंदाज लगाया जा सकता है।

बीज स्फुट की गणना में हम पुरुष की कुंडली में सूर्य गुरु और शुक्र के भोगांश को जोड़कर एक राशि निकालते हैं, यदि वह राशि विषम होगी और नवांश में भी उसकी विषम में स्थिति होगी तो बीज शुभ होगा, और साथ ही यदि एक सम और दूसरा विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों सम राशियां होगी तो, अशुभ फल होंगे, और बीज अशुभ होगा।
स्त्री की कुंडली में क्षेत्र स्फुट की गणना में हमें चंद्रमा मंगल और गुरु के भोगांशों को जोड़ना पड़ेगा, और भोगांशो को जोड़ने के बाद जो राशि आएगी वह राशि यदि सम होगी और नवमांश में भी उसकी सम स्थिति होगी तो, क्षेत्र स्फुट अच्छा होगा साथ ही एक सम व दूसरी विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों विषम हुई तो अशुभ फल होंगे व स्त्री सन्तान उत्पन्न करने में सक्षम नही होगी।

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प्रेमी-प्रेमिका और शुक्र

प्रेम और विलासिता का कारक शुक्र :-

Dr.R.B.Dhawan

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प्रेमी-प्रेमिका में झगडे क्यों होते हैं? आईये इसका कारण ज्योतिष शास्त्र से जानते हैं- किसी भी जन्मकुण्डली में प्रेमी का स्थान पाँचवां होता है, जातक का अपना स्थान प्रथम स्थान है। अच्छी रिलेशनशिप तभी रह सकती है, जब प्रथम स्थान के स्वामी ग्रह और कुण्डली से पाँचवे स्थान के स्वामी ग्रह मित्र होंगे। यह तो हुई साधारण बात, अब यह भी देखना होगा की जातक की रिलेशनशिप से किसी दूसरे का हाजमा तो खराब नहीं हो रहा ? :- (रिलेशनशिप से प्राब्लम) कहीं वह गुप्त दुश्मनी तो नहीं निभा रहा ? यह पता चलेगा जातक की कुण्डली के पंचमेश की सेहत देखने से! पंचमेश की सेहत खराब करने के लिये कुण्डली के षष्ठेश या अष्ठमेश जिम्मेदार हो सकते हैं, अर्थात् पंचमेश षष्ठ या अष्ठम में नहीं होना चाहिए, अथवा षष्ठेश या अष्ठमेश के साथ नहीं होना चाहिए, या फिर षष्ठेश या अष्ठमेश पंचम में नहीं होना चाहिए। यह तो हुई बड़ी वजह, इसके अतिरिक्त एेसा भी हो सकता है की जातक का कोई सगा सम्बंधी ही इस खेल को बिगाड़ने में लगा हो।

वैवाहिक सुख का कारक ग्रह शुक्र :-

आज का युग बहुत तेज गति से शुक्र प्रधान हो रहा है, बेशक ज्योतिष के विद्वानों को मेरी यह बात कुछ अटपटी सी लगेगी। परंतु तथ्य यही बताते हैं कि बढ़ी तेजी से यह युग बदल रहा है। पहले एक छोटा सा उदाहरण प्रस्तुत है- आज से 50-100 वर्ष पूर्व लोग या तो पैदल यात्रा करते थे या फिर पशुओं का अथवा पशुओं द्वारा चलित वाहनों का प्रयोग करते थे। अर्थात् गुरू (जीव प्रधान) वाहन का प्रयोग किया जाता था। जो आज धीरे-धीरे करके आरामदायक (शुक्र प्रधान) वाहन ने ले ली है। पशुओं से चलने वाले वाहनों की जगह अब स्वचालित लग्जरी वाहनों ने ले ली है। इस प्रकार प्राणीयों का प्रतीक गुरू शीण हो गया है। दूसरा उदाहरण- एक जमाना था जब बड़ी-बूढी अपनी बहुओं को आशिर्वाद देती थी- “दूधों नहाओ पूतों फलो” आज इसमें से दूधों नहाओ तो ठीक है, परंतु “पूतों फलो” भला किस नवविवाहिता को पसंद आती है? इस आशिर्वाद का पूतों फलो वाला भाग भी गुरू का विभाग है। जो नवविवाहिता बहुओं को पसंद नहीं, क्योंकि अधिक संतान के लिये आज इस वर्ग के विचार बदल गये हैं, यहाँ भी गुरू निर्बल प्रतीत होता है। तीसरा उदाहरण- विद्वान, आचार्य व गुरू जो अपने प्रवचन के द्वारा समाज को धर्म के मार्ग पर चलने के लिये दिशा दिखाने का कार्य करते थे, आज इन्हें सुनने का समय किसके पास है, यदि गलती से कहीं आमना-सामना हो भी जाये तो आज की नई पीढ़ी उनसे जान छुडाना चाहते हैं। इसी प्रकार वह अध्यापक जिनके चरण छूकर विद्यार्थी मान-सम्मान करते थे, आज वह कितनी दयनीय स्थिति में हैं? यह अध्यापक एेसे शिल्पकार हैं, जिनसे शिक्षा पाकर विद्यार्थीकाल अपने और देश के भाग्य का निर्माण करने की ताकत रखते हैं, परंतु जिस गुरू ने उन्हें इस योग्य बनाया है। उस गुरू की कितनी इज्जत हो रही है? किसी से छिपा नहीं। क्या यह गुरू का बल कम नहीं हो रहा? दूसरी ओर शिक्षा का आधुनिकीकरण करती शिक्षण संस्थायें (शुुक्र) फल-फूल रही हैं। एक उदाहरण और देता हूँ- बच्चे जवान हो जायें तो आज कितने एेसे माता-पिता हैं जिन्हें कन्या के लिये वर और बालक के लिये वधु ढूडने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। माता-पिता द्वारा पसंद युवक के लिये युवती, तथा कन्या के लिये वर (गुरू बल) के स्थान पर आजकल लव मेरिज (शुक्र बल) का प्रचलन अधिक हो चला है। आध्यात्मिकता, सहनशीलता, विवेक, बुद्धिमत्ता तथा अध्ययनशीलता (गुरू) की जगह आज सुंदरता, विलासिता और अश्लीलता (शुक्र) ने ले ली है। अब आप ही बतायें पूर्वकाल में विश्वगुरू कहलाने वाला हमारा भारत आने वाले कुच्छ ही वर्षों में क्या कहलायेगा ?

प्रेम सम्बन्ध :-
अब देखते हैं, जन्म कुंडली मे कौन से एेसे योग होते हैं, जो प्रेम संबंध की सूचना देते हैं- कब ये शारीरिक सम्बन्ध स्तर पर भी होते है ? क्या कुण्डली में ऐसी स्थितियाँ भी है जो संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा तनाव भी देंगी ? क्या ये संबंध दुनियाँ से छिपे रह सकते है ? क्या प्रेम संबंधों में अलगाव (Break up) तो नही है ? क्या एक से अधिक भी प्रेम संबंध होंगे ? क्या प्रेम संबंध विवाह में परिणित होगें ? यह सब प्रश्न हैं आज के युवा वर्ग के।
भारतीय ज्योतिष पद्धति के द्वारा हम इन सभी स्थितियों को जन्म पत्रिका के माध्यम से देख सकते हैं ।और विश्लेषित भी कर सकते हैं, और उस समय विशेष की गणना भी कर सकते हैं । जब इनमे से कोई भी स्थिति हमारे जीवन मे घटित होगी ? आईये देखें जन्म पत्रिका में कौन सी स्थितियाँ बनाती है प्रेम संबंध ?- जन्म कुण्डली का पंचम भाव (5th house) हमारी कला कौशल के साथ प्रेम तथा भावनाओं का ओर दिल से किये गए कार्य का स्थान होता है । जन्म कुंडली मे चंद्रमा, शुक्र और मंगल प्रमुख ग्रह हैं, जो अपने आपसी सम्बन्धो के आधार पर व्यक्ति को एक विशेष आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करते हैं, तथा जातक को प्रेम करने को वशीभूत करते हैं। चंद्रमा मन का कारक है । जन्म पत्रिका में मजबूत चंद्रमा विचारों को शक्ति प्रदान करता है। मन में कल्पनाशीलता ओर भावनाएँ जगाता है, और जातक परम्पराओ को तोड़कर दुनिया की परवाह किये बगैर प्रेम के रास्ते पर आगे बढ़ता है, जब कुण्डली में चंद्रमा का संबध किसी भी प्रकार से शुक्र से होता है तो, व्यक्ति प्यार में कल्पनाओ की उड़ान भरता है, और शीघ्र ही विपरीत लिंग की तरफ आकर्षित हो जाता है।

जन्म कुंडली में मंगल + शुक्र का संबंध जब जन्म कुंडली में 1, 2, 3, 5, 7, 11,12 भावो में बनता है, तब व्यक्ति आकर्षण का केंद्र होता है, और साथ ही स्वयं भी विपरीत लिंग की ओर शीघ्र आकर्षित होता है।जन्म कुंडली में जब इन स्थितियों के साथ पंचम भाव तथा पमचमेश से संबंध बनाने वाले किसी भी ग्रह की अथवा चंद्रमा, शुक्र, मंगल से संबंधित दशाएँ अन्तरदशाएँ आती हैं तो, जातक प्रेम करता है ।

जब पंचम भाव अथवा पंचमेश का शुभ संबंध केंद्र त्रिकोण से अथवा एकादश भाव (11th house) से शुभ भावों में होता है तो, ये सच्चा ओर आदर्श प्रेम संबध होता है । यदि इन संबंधों में द्वादश भाव भी सम्मलित हो जाता है तो, ये प्रेम शारीरिक स्तर पर भी प्रकट हो जाता है। जब इन सम्बन्धो में द्वादश भाव के साथ अष्टम भाव या अष्टमेश सम्मलित होता है तोे, संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा, तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है । जब प्रेम संबंधों में सप्तम भाव अथवा सप्तमेश का समावेश होता है तो, ये संबंध अन्य स्थितियों के सकारात्मक होने पर प्रेम विवाह में परिणित हो जाते हैं। शुभ गुरु और शनि प्रेम संबंधों ओर विवाह की स्थितियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां तक कि इनसे गुरु का सबंध कभी भी प्रेम संबंधों को दुनियां के समक्ष उजागर तक नही होने देता ।

सभी वर्ग कुंडलियों, अष्टक वर्ग, ग्रहो के किसी विशेष बल, कुण्डली में बने विशेष संबंधों ओर योगायोगों का, संबंधित शुभ अशुभ दशाओं अन्तरदशाओं, संबंधित शुभ अशुभ गोचर का गहन अध्ययन तथा विश्लेशण करने के बाद ही कहा जा सकता है कि – प्रेम संबधो का कोई दर्दनाक अंत होगा या ये संबंध विवाह के रूप में जीवन को महकाएँगे! जन्म कुंडली मे जैसा दिखता है वैसा कभी नही होता, और जो होता है वह तो बहुत ही गहराई में ही छिपा है, जिसे देख पाना गहन कुण्डली विश्लेषण से ही संभव होता है। कुछ आसान, आवश्यक तथा सही समय पर किये गए सही उपाय, कुछ जन्म पत्रिका के अनुसार सकारात्मक ग्रहों का सहयोग, और कुछ सही मार्ग का चयन और सही दिशा में किया गया परिश्रम। सुखी और खुशियों से भरा जीवन दे सकते हैं।

एक निश्चित आयु में प्रत्येक युवक अथवा युवती की उत्कृट इच्छा रहती है कि उसे अपने मनोनुकूल सुंदर जीवन साथी मिले। एेसे हार्दिक तथा प्रबल आकर्षण का मूल श्रोत संगीत, आदर्षवादिता, कला-क्रीड़ा-सौंदर्य एवं शारीरिक विधान तथा प्रसाधन में ही अंतर्निहित है। उत्तरोत्तर परिवर्तनीय सभ्यता संस्कृति के कारण हमारे देश में भी पाश्चात्य देशों की तरह परिवार की सम्मति अथवा स्वीकृति का महत्व समाप्त होता जा रहा है, युवक व युवतियों का दृष्टिकोण इस प्रसंग में दिनानुदिन लोचपूर्ण तथा उदार होता जा रहा है, अतः स्वजातीय विवाह arenge marriage की अपेक्षा अंतर्जातीय विवाह love marriage की ओर इनका रूझान होता जा रहा है। ज्योतिष शास्त्र की दृिष्टि से देखें तो ज्ञात होता है कि ज्योतिष भी इन बंधनों को नही मानता। इसका मूल कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन ग्रहों के मूलभूत सिद्धांतों पर निर्भर है। अतएव युवक-युवतीयों अथवा नर-नारियों के प्रेम विवाह Love marriage की भावी संभावनाओं का निरूपण प्रस्तुत करना मेरी इस पुस्तक “विवाह एवं दाम्पत्य सुख” का एक उद्देश्य है। विवाह एवं दाम्पत्य सुख (Marriage & Happy Married Life) हाल ही में प्रकाशित हुई नयी पुस्तक है। इस पुस्तक में विवाह सुख के योग, विवाह में क्यों विलम्ब marriage delay होता है? विवाह के लिये तथा विवाहित दम्पतियों के गृहस्थ सुख में बाधाओं का निवारण marriage Life problems and solutions बताया गया है। अभी तक मेरी 10 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन सभी की जानकारी http://www.shukracharya.com पर उपलब्ध है।

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