चार मुखी रुद्राक्ष, 4 Mukhi Rudraksha

चार मुखी रुद्राक्ष, 4 Mukhi Rudraksha Nepal, 4 Mukhi Rudraksha Original Nepal –

Dr.R.B.Dhawan, top best astrologer in delhi

चार मुखी रूद्राक्ष में ऊपर से नीचे तक चार धारीयाँ होती हैं, और ये इस रूद्राक्ष के जन्म ही बनना शुरू हो जाती हैं, और धीरे-धीरे अपना आकार लेती हैं। पुराणों में, चार मुखी रूद्राक्ष देवी सरस्वती और भगवान् ब्रह्मा की शक्ति से परिपूर्ण होता है, यह रूद्राक्ष ब्रह्माजी की सृजनात्मक बुद्धि से प्रभावित होता है। यह रूद्राक्ष धारक को सृजनात्मक शक्ति, ज्ञान एवं विद्वता प्रदान करता है, यह रूद्राक्ष धारक को चार लाभ प्रदान करता है- 1. धर्म का ज्ञान और विश्वास। 2. आर्थिक मजबूती। 3. स्वास्थ्य, शारीरिक हित और 4. अज्ञान का नाश तथा मोक्ष की प्राप्ति। चार मुखी रूद्राक्ष विद्यार्थीयों के लिये बहुत लाभदायक होता है। चार मुखी रूद्राक्ष ’कल्पतरू वृक्ष’ की तरह है- वह वृक्ष उन प्राणियों की सभी मनोकामनाओं को पूरा करता है, जो शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, या सार्वजनिक रूप से बात करने में सक्षम नहीं होते। जिनकी स्मरण शक्ति कमजोर है, या नकारात्मक विचारों से ग्रस्त है, उन्हें यह रूद्राक्ष धारण करने से अत्मविश्वास की वृद्धि के साथ सकारात्मक विचार भी प्राप्त हाने लगते हैं। महाभारत के अनुसार, वह व्यक्ति जो चार मुख वाला रूद्राक्ष धारण करता है, वह द्विज स्तर प्राप्त करता है, और वह स्वयं को बिल्कुल ऊर्जावान व्यक्तित्व में परिवर्तित कर लेता है, और जीवन में नई और बेहतर भूमिका अपना लेता है। चार मुखी रूद्राक्ष देवों के गुरू बृहस्पति का प्रतीक रूद्राक्ष है। बृहस्पति के गुणों जैसी ऊर्जा धारक को ज्ञान व विवेक के माध्यम से प्राप्त होती है। इस रूद्राक्ष में निहित गुरू ग्रह की ऊर्जा व चेतना के चारों स्तरों का लाभ प्राप्त होता है- जागृत अवस्था, स्वप्न अवस्था, सुशुप्ति या गहरी निद्रा की अवस्था और तुरिया या चेतना अथवा पराचेतना अवस्था। चार मुखी रूद्राक्ष इन सभी अवस्थाओं के ज्ञान को संचित करने में सहायक होता है, और अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करता है। चतुर्मुखी रूद्राक्ष से विद्या प्राप्ति में, बुद्धि को कुशाग्र करने में तथा सद्गुरू को प्राप्त करने में सहायता मिलती है। चार मुखी रूद्राक्ष को दूध में उबाल कर पीने से स्नायु विकार (नर्वस सिस्टम के विकार) दूर होते हैं। इसे धारण करने से विक्षिप्त मनुष्य के मानसिक रोग दूर होते हैं, मन में सात्विक विचार उत्पन्न होते हैं, एवं धर्म का ज्ञान व धर्म में रूचि बढ़ती है। शीघ्र सफलता पाने के लिये इस रूद्राक्ष को धारण करना चाहिये। इससे उदर, गर्भाशय, रक्तचाप व हृदय से सम्बन्धित अनेक रोग समाप्त होते देखे गये हैं। यह रूद्राक्ष मंद बुद्धि जातक को चतुर बनाता है, अर्थात चातुर्य बढ़ा कर कुशाग्र बुद्धि वाला बनाता है। इस रूद्राक्ष में सर्वोच्च रचनात्मक गतिविधि, परमात्मा के ध्यान के साथ तार्किक और ठोस संरचनात्मक सोच को नियंत्रित करने की शक्ति प्राप्त होती है। यह डाॅक्टर, अध्यापक, प्रोफेसर, इंजीनियर के लिये परम गुणकारी रूद्राक्ष है। इसका उपयोग सकारात्मक सोच, रचनात्मकता, कुशाग्र बुद्धि और खुफिया तंत्र, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, लेखकों और पत्रकारों, आत्मविश्वास के साथ बोलने वालों के लिये अधिक उपयुक्त है। यह नाड़ी, चर्म व हायपौथैमलस की बीमारियों से भी बचाता है। इस रूद्राक्ष के देवता सत्तारूढ़ बुध ग्रह हैं।

रूद्राक्ष धारण का मंत्र- ॐ हृी नमः। ॐ ब्रम्हणे नमः। इस मंत्र के साथ ही चारमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिये।
चैतन्य करने का मंत्र- वां क्रां तां हां ई।
उपयोग- एकाग्रता, अध्ययन में सफलता, अनुसंधान में यश।

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