कैरियर

कैरियर अर्थात् आजीविका के साधन :-

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant)

Telephonic Astrological Appointment

जिस कैरियर में आप किस्मत आजमाना चाहते हैं, या जिस मंजिल को पाना चाहते हैं, आवश्यक नहीं वही आप के लिये सही हो, दुनिया में बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं, जो अपनी मनचाही मंजिल पा लेते हैं। बाकी लोगों को लाख कोशिश के बाद भी वह मंजिल नहीं मिलती। आखिर क्यों? इसका जवाब ज्योतिष शास्त्र में छिपा हैं। आपकी कुंडली के ग्रह यह बताते हैं कि आप किस क्षेत्र में उन्नति करेंगे ? और आपका भविष्य का कैरियर क्या होगा। कुंडली केवल आपका भविष्य ही नहीं बताती बल्कि आपका कार्यक्षेत्र भी बतलाती है, यदि कार्यक्षेत्र पहले से पता लग जाये तो उसी दिशा में प्रयास किया जा सकता है। कैरियर के विषय में सबसे अधिक महत्त्व कुंडली के दशम भाव को दिया जाता है। सभी ग्रंथ एकमत है कि आजीविका का विचार लग्न, चन्द्र और सूर्य में से जो बलवान हो, उससे दशम भाव में स्थित ग्रह के कारकत्व के अनुसार करना चाहिए। यदि दशम भाव में कोई ग्रह न बैठा हो तो, ऐसी स्थिति में दशमेश जिस ग्रह के नवांश में हो, उस ग्रह के अनुसार कार्यक्षेत्र का विचार करना चाहिए।

व्यावहारिक तौर पर देखने में आया है कि द्वितीय या एकादश भाव में यदि बलवान ग्रह बैठा है तो जातक को आजीविका क्षेत्र में सफल बनाने में अपनी भूमिका अदा करते हैं। सही व्यवसाय का चयन ही उज्ज्वल भविष्य का मानक होता है जो लोग अपने अनुकूल व्यवसाय का चयन नहीं कर पाते हैं, वो जातक इस लेख के सार को समझकर सही व्यवसाय का श्रीगणेश कर सकते हैं। सही समय पर सही फैसला ही सफलता का मूल मंत्र है। ग्रहों के आधार पर स्थिर कैरियर का निर्धारण करना वर्तमान युग के युवा वर्ग के लिए एक समस्या बनी हुई है। वैसे तो व्यवसाय के अनेक साधन हैं, यदि जातक के माता-पिता छात्र जीवन में ही उसकी जन्मपत्रिका एवं हाथ का अध्ययन कर उसके भावी व्यवसाय अथवा नौकरी से संबंधित तथ्यों का मनन-चिंतन कर उसे उसी के अनुकूल शिक्षा दिलवाते हैं तो, वह भविष्य में अधिक तीव्र गति से सही दिशा में सार्थक विकास कर समाज और परिवार का कल्याण कर सकता है।

विद्या के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए विद्वानों ने चतुर्थ और पंचम भाव को भी अत्याधिक महत्त्व दिया है, जिसमें द्वितीय भाव वाक्पटुता या वाणी की क्षमता को इंगित करता है। उच्च योगों के रहने से ही जातक शैक्षणिक क्षेत्र में आगे हो सकता है। लेकिन यदि इन योगों का अभाव हो तो शिक्षा में बाधा से रू-ब-रू होना अवश्यंभावी है। चतुर्थ स्थान उच्च शिक्षा और सुख को व्यक्त करता है। पंचम भाव का संबंध बुद्धि से है। इनके कारक ग्रह भी अनुकूल स्थिति में होने चाहिए द्वितीय भाव का कारक बृहस्पति है, चतुर्थ भाव का कारक चन्द्रमा और बुध हैं। पंचम का कारक भी बृहस्पति ग्रह है, द्वितीय भाव और द्वितीयेश यदि शुभ स्थिति में हों तो, जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करता है। यदि अष्टम में पाप ग्रह पड़ें तो, विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने का योग बनता है। महर्षि जैमिनी ने यह भी सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि द्वितीय और चतुर्थ की अनुकूल स्थिति जातक के विद्या प्राप्ति में आने वाली समस्त बाधाओं का शमन करती है। पंचम भाव शिक्षा से अधिक बुद्धि का स्थान है।

यदि द्वितीय भाव शक्तिहीन हो, लेकिन पंचम शुभ स्थिति में होने से कम शिक्षित व्यक्ति भी उन्नत मस्तिष्क का धनी होता है। उसके वार्तालाप के आधार पर उसकी शिक्षा का आंकलन करना गलत सिद्ध होता है।

पंचम और बृहस्पति व्यावहारिक शिक्षा में आनेवाली बाधाओं को दूर करने में सक्षम होता है। यदि द्वितीयेश और गुरु एक दूसरे से केन्द्र त्रिकोण में हों तो, अच्छी शिक्षा का संकेत हैं। शिक्षा समाप्ति के पहले कैरियर की चिन्ता सबको लगी रहती है। प्रतिदिन मेरे पास अस्थिर कैरियर को लेकर जातक आते रहते हैं। उसकी प्रमुख समस्या होती है कैरियर कैसा हो?
मैं इस लेख के माध्यम से युवा वर्ग की उन सभी समस्याओं का निदान दे रहा हूं। आप भी Telephonic Astrological Appointment द्वारा सलाह ले सकते हैं।

वस्तुत: जन्मकुंडली जातक के भावी जीवन का आईना है। इसकी सार्थकता तभी संभव है, जब हम इससे समुचित लाभ ले सकें। इसके द्वारा ऐसे कैरियर का चयन करें जिससे अर्थ लाभ ही नहीं बल्कि वह व्यवसाय पीढ़ी दर पीढ़ी उन्नति करे, शिखर पर अपना नाम रोशन करे। सेठ धीरू भाई अंबानी इसका उदाहरण हैं। नौकरी करें या व्यवसाय? स्थाई कैरियर कुंडली के ग्रहों के आधार पर चयन किया जाना चाहिए।

जन्मकुंडली के लग्न, दशम भाव, एकादश भाव, सप्तमभाव आदि के सर्वाधिक प्रबल भावेश अथवा उक्त भावों में स्थित ग्रह ही जातक के कैरियर का संकेत देते हैं। विभिन्न ग्रह किस कैरियर की ओर संकेत दे रहे हैं, वह प्रस्तुत लेख की विषय-वस्तु है। ग्रह और उनसे संबंधित कैरियर क्षेत्र निम्नलिखित है-

सूर्य:-
1. सरकारी सेवा विशेषरूप से प्रशासनिक सेवा।

2. विद्युत एवं उससे संबंधित संस्थानों में नौकरी अथवा विद्युत एवं उससे संबंधित वस्तुओं का व्यापार।

3. न्यूरोलाॅजी, नाक, कान, गला, हीमोटोलाॅजी, नेत्र चिकित्सक, अस्थिरोग, शल्य चिकित्सा इत्यादि विषयों चिकित्सक अथवा इन चिकित्साओं से संबंधित वस्तुओं का व्यापार, अस्पताल में नौकरी।

4. दवाइयों का व्यापार अथवा फार्मास्यूटिकल कंपनी में नौकरी।

5. जवाहरात का व्यापार अथवा जवाहरात से संबंधित संस्थान में नौकरी।

6. प्रयोगशाला वैज्ञानिक संस्थान, अनुसंधान केन्द्र एवं अविष्कार से संबंधित जलाधिपूर्ति विभाग, सिचाई विभाग इत्यादि में नौकरी।

7. नेतृत्व और संगठनकर्ता।

8. समुद्री व्यापार, जहाजरानी, जलापूर्ति विभाग, सिचाई विभाग इत्यादि में नौकरी।

9. तेल एवं गैस कंपनी में नौकरी अथवा इनका व्यापार।

10. राजनीति और कूटनीतिक राजनयिक।

11. सरकारी कार्यों के ठेकेदार।

चन्द्रमा:-
1. पशुपालन, पशुपालन से संबंधित संस्थानों में नौकरी, पशुओं एवं पशुपालन से संबंधित वस्तुओं का व्यापार, डेयरी, दूध, दही, घी, पनीर आदि का व्यापार अथवा डेयरी में नौकरी।

2. कृषि कार्य, खेती में काम आनेवाली वस्तुओं का व्यापार, भूमि से संबंधित अन्य कार्य, कृषि एवं सिंचाई से संबंधित विभागों और संस्थानों में नौकरी।

3. चाँदी के आभूषणों, बर्तन एवं वस्तुओं का व्यापार अथवा ऐसे व्यापारिक संस्थानों में नौकरी।

4. होटल, रेस्टोरेंट इत्यादि का व्यापार तथा इनमें नौकरी।

5. पर्यटन, ट्रेवल एजेन्सी में नौकरी।

6. लेखन, संपादन, प्रकाशन एवं पत्रकारिता अथवा इनसें संबंधित संस्थानों में नौकरी।

7. बर्फ की फैक्ट्री, चीनी की मिल, कागज की मिल, तेल मिल अथवा इनका व्यापार और इनमें नौकरी।

8. तरल एवं रसदार पदार्थों का निर्माण और व्यापार इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

9. एजेन्ट जैसे अन्य कार्य।

10. रत्न, उपरत्न एवं मणियों का व्यापार, निर्माण कार्य अथवा इनसे संबंधित अन्य कार्य अथवा ऐसे कार्य करने वाले संस्थानों में नौकरी।

11. नृत्य, संगीत, अभिनय, फिल्म, चित्रकला, कविता, कहानी इत्यादि से संबंधित लेखन अथवा इन सबसे संबंधित अन्य कार्य अथवा इनसे संबंधित वस्तुओं का निर्माण और व्यापार अथवा इस प्रकार के संस्थानों में नौकरी।

12. मनोचिकित्सा, हृदयरोग, यूरोलाॅजी, न्यूरोलाॅजी, हीमोटोलाॅजी नेत्र चिकित्सा इत्यादि विषयों में चिकित्सक अथवा इनसे संबंधित वस्तुओं का निर्माण और व्यापार तथा संबंधित संस्थानों में नौकरी।

13. आर्किटेक्चर एवं इससे संबंधित अन्य कार्य।

14. जहाजरानी तथा समुद्री जहाजों से व्यापार अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

मंगल:
1. सेना और पुलिस विभाग में नौकरी अथवा इन जैसे अन्य कार्य।

2. ज्योतिष, धर्म, दर्शन, अध्यात्मक एवं अन्य पराविद्याओं से संबंधित व्यवसाय।

3. नेतृत्व एवं संगठनकर्ता के कार्य।

4. ताँबा आदि धातुओं एवं इनसे बनने वाले उपकरणों का उत्पादन और व्यापार।

5. खान, रेल एवं वन विभाग में नौकरी अथवा इन विषयों से संबंधित कार्य।

6. राजनीति एवं कूटनीति तथा विदेशी विभाग में नौकरी।

7. वकील, कानून एवं न्याय से संबंधित कार्य।

8. अग्नि से संबंधित कार्य।

9. केमिकल, मैकेनिकल, माईंस, इलेक्ट्राॅनिक, एग्रीकल्चर आदि विषयों में इंजीनियरिींग अथवा निपुणता।

10. त्वचा रोग, उदर रोग, रक्त विकार, नेत्र रोग, विषजनित रोग, यूरोलाॅजी, नाक-कान-गले से संबंधित अन्य कार्य।

11. औषधि निर्माण, विक्रेता अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

बुध:-
1. लेखन, संपादन, प्रकाशन, पुस्तक विक्रेता, लाइब्रेरी, प्रिटिंग प्रेस, पत्रकारिता इत्यादि से संबंधित कार्य तथा इस प्रकार के कार्यो को करने वाले संस्थानों में नौकरी।

2. दूरसंचार विभाग में नौकरी अथवा तार, कोरियर, डाक, टेलीफोन, रेडियो, दूरदर्शन, टी.वी. मोबाइल इत्यादि के निर्माण, विक्रय एवं अन्य कार्यों से संबंधित संस्थाओं का संचालन अथवा नौकरी।

3. आर्थिक विभाग, एकाउंटस विभाग, वाणिज्य विभाग, बीमा विभाग, बैंक अथवा फाइनेंस कंपनी में नौकरी, सी.ए. अथवा इनसे संबंधित कार्य।

4. ज्योतिष हस्तरेखा एवं पराविद्याओं से संबंधित कार्य।

5. व्यापार और राजनीति।

6. विज्ञान, प्रयोगशाला, अनुसंधान एवं अविष्कार अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

7. त्वचा रोग, नाक-कान-गला रोग, श्वास संबंधी रोग (अस्थमा, टी.बी. आदि), न्यूरोलाॅजी आदि से संबंधित चिकित्सक अथवा चिकित्सा के अन्य कार्य।

8. दूरसंचार सिविल, आर्किटेक्चर आदि में इंजीनियरिंग अथवा इस प्रकार के अन्य वास्तु के कार्य।

9. ट्रेवल एजेन्सी, ट्रांसपोर्ट कंपनी आदि का संचालन अथवा इस प्रकार के संस्थानों में नौकरी, चालक और परिचालक बनता है।

गुरु:-
1. शिक्षण संस्थानों का संचालन, व्याख्याता, शिक्षा से संबंधित अन्य संस्थान, शिक्षा एवं शिक्षा से संबंधित संस्थानों में नौकरी।

2. दार्शनिक, कथावाचक, धार्मिक उपदेशक अथवा इनसे संबंधित अन्य कार्य।

3. वकील, न्यायाधीश, न्यायालयों एवं न्याय विभाग में नौकरी, न्यायालयों में प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं का व्यापार तथा कानून एवं न्याय से संबंधित अन्य कार्य।

4. पुलिस विभाग अथवा संबंध विभागों में नौकरी और इनसे संबंधित अन्य कार्य।

5. बैंक अथवा फाइनेंस कंपनी का संचालन, ऐसे संस्थानों में नौकरी और ब्याज पर धन देना।

6. मैनजेजर अथवा मैनजमेंट से संबंधित अन्य कार्य।

7. सेल्समैन, एजेन्ट और कमीशन पर आधारित अन्य कार्य तथा व्यापार।

8. विज्ञापन एजेन्सी, विज्ञापन निर्माण, माॅडलिंग अथवा अन्य कार्य।

10. मंत्री, राजदूत, राजनेता और कार्य।

11. जलीय यात्रा अथवा व्यापार अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

12. विज्ञान, प्रयोगशाला, अनुसंधान एवं अविष्कार अथवा इनसे संबंधित कार्यों में संलग्नता।

13. कृषि, सिंचाई, आॅटोमोबाइल, टेक्सटाइल्स आदि विषयों में इंजीनियर या इंजीनियर जैसे अन्य कार्य।

14. त्वचा, रक्त, उदर, गुप्तरोग, आनुवांशिकी, गायनोकोलाॅजी, नाक-कान-गला, हृदय रोग से संबंधित अथवा दवाइयां और उपकरण के विक्रेता भी हो सकते हैं।

शुक्र:-
1. विलासितापूर्ण वस्तुओं का उत्पादन, व्यापार अथवा ऐसे कार्य करने वाले संस्थानों में नौकरी।

2. आभूषण, वस्त्र, वस्त्र डिजाइनर, माॅडलिंग, सौन्दर्य प्रसाधन, इत्र और अन्य सुगंधित वस्तुएं, घड़ियां, पुष्य, पेंटिंग जैसी वस्तुओं का उत्पादन और विक्रय अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

3. पर्यटन विभाग में नौकरी तथा होटल, रेस्टोरेंट आदि का संचालन अथवा इनमें नौकरी।

4. नृत्य, संगीत, फोटोग्राफी, चित्रकला, फिल्म, अभिनय इत्यादि क्षेत्रों में निपुणता अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी अथवा इनमें प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं का उत्पादन और व्यापार।

5. इंटीरियर डेकोरेशन, टेन्ट हाउस, लाइट डेकोरेशन इत्यादि से संबंधित कार्य।

6. लेखन एवं प्रकाशन से संबंधित व्यापार अथवा इनसे संबंधित संस्थान में नौकरी।

7. विदेश व्यापार, विदेशी बैंकों में विदेशी मुद्रा विनिमय में कार्य।

8. टेक्सटाइल्स, फूड प्रोसेसिंग, आर्किटेक्चर आदि विषयों में इंजीनियरिंग या विशेषज्ञता।

9. गायनोकोलाॅजी, आनुवंशिकी, रक्त एवं गुप्तरोग, नाक-कान-गला रोग, फेफड़े एवं श्वास नली से संबंधित रोग, नेत्र रोग, यूरोलाॅजी उदर रोग आदि से संबंधित चिकित्सक अथवा ऐसी चिकित्सा से संबंधित अन्य कार्य।

10. राजनीति एवं न्याय से संबंधित क्षेत्र।

11. दर्शन, अध्यात्म एवं अन्य गूढ़ विज्ञान।

12. विज्ञान, प्रयोगशाला, आविष्कार एवं अनुसंधान तथा इनसे संबंधित कार्य तथा तांत्रिक कार्य कर भी अपना नाम रोशन कर सकता है।

शनि:-
1. मशीनों एवं लौह उपकरणों का निर्माण अथवा व्यापार का कार्य अथवा इस प्रकार के कार्यों संलग्न संस्थाओं में नौकरी।

2. कोयला और लकड़ी से संबंधित व्यायसाय।

3. न्याय विभाग अथवा न्यायालयों में नौकरी, न्यायाधीश एवं वकील जैसे व्यवसाय तथा न्यायालय से संबंधित अन्य कार्य।

4. पुलिस विभाग एवं जेल विभाग तथा अन्य सम्बद्ध विभागों में नौकरी अथवा इनसे संबंधित निजी कार्य।

5. लोहे की वस्तुएं, फर्नीचर, घड़ी, खेलकूद के समान, कृषि से संबंधित सामान आदि का उत्पादन एवं व्यवसाय अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

6. स्थानीय स्वायत संस्थानों में नौकरी अथवा अन्य कोई पद निर्वाचन से प्राप्त करना।

7. खान-विभाग, भूगर्भ विभाग आदि में नौकरी खनिजों का व्यापार आदि।

8. खेलकूद एवं शारीरिक परिश्रम मजदूरी से संबंधित कार्य।

9. ज्योतिष, धर्म, अध्यात्म एवं अन्य पराविद्याओं से संबंधित कार्य।

10. मुर्गी पालन, बागवानी जैसे कार्य।

11. विभिन्न प्रकार की ठेकेदारी।

12. संगीत एवं शिक्षण से संबंधित कार्य।

13. मैकेनिकल, माईंस, सिविल इत्यादि विषयों में इंजीनियरिंग अथवा निपुणता।

राहु:-
1. ऐसे व्यवसाय जिनमें उतार-चढ़ाव अधिक आते है। जैसे शेयर, सट्टा, लाॅटरी, राजनीति आदि।

2. यात्रा से संबंधित नौकरी या व्यवसाय।

3. कम्प्यूटर एप्लीकेशन से संबंधित व्यवसाय अथवा नौकरी।

4. इलेक्ट्राॅनिक्स से संबंधित व्यवसाय अथवा नौकरी।

5. ओकल्ट साइंसेज अध्यात्म आदि से संबंधित व्यवसाय अथवा नौकरी।

6. अवैध अथवा अनैतिक प्रकार के व्यवसाय।

केतु:-
1. ऐसे व्यवसाय जिनमें उतार-चढ़ाव अधिक आते हैं। शेयर, सट्टा लाॅटरी, राजनीति आदि।

2. अवैध अथवा अनैतिक प्रकार के व्यवसाय।

राशियों से कैरियर :-

1. मेष- लोहा, चंदन, गोंद, औषधि, लाल रंग की वस्तुएं, सोना, वस्त्र, कम्बल आदि।

2. वृष- घी, सफेद रंग की वस्तुएं, दूध, जौ, नमक, बैल, चाँदी आदि।

3. मिथुन- चावल, बिनौला, जूट, उत्तरी राजस्थान में उत्पन्न बाजरा और गंवार, मोंठ कस्तूरी, हल्दी, समाचार पत्र, प्लास्टिक या रबर जनित वस्तुएं, मूंगफली आदि।

4. कर्क- प्याज, चाँदी, तेजपत्ता, मछली, पानी से उत्पन्न वस्तुएं, मोती शंख, पानी की बोतलें, सोडा, पेय पदार्थ, शराब, बीयर, केला, कमल के फूल आदि।

5. सिंह- चमड़ा, चना, गुड़, एंटीबाॅयटिक औषधियां, रेशेदार पदार्थ आदि।

6. कन्या- मकर, ग्वार, हरे रंग के सर्व पदार्थ, दूब लगाना, पुस्तकें असली मोंठ, अधोवस्त्र, गर्भनिरोधक आदि।

7. तुला- फिल्म रोल, सरसों, प्रसाधन, रूई, गेहूंँ, विलासिता की वस्तुएं, अरहर, केसर और रंग आदि।

8. वृश्चिक- तिल, पालतू पशु, हल्के हथियार, चीनी भवनादि खरीद-फरोख्त, मिठाई, कच्चा गन्ना, बीज आदि।

9. धनु- जल्दी खराब हो जाने वाली वस्तुएं फलों के रस सफेद खाद्यान्न, आलू लचीले पदार्थ, स्टेशनरी मोम आदि।

10. मकर- शीशा, वृक्षों या पौधों की जड़ों से निर्मित द्रव्य, कांसी, मोटरयान या गतिशील वस्तुएं आदि।

11. कुम्भ- सभी काले रंग की वस्तुएं काले उड़द और तिल, छोटे-छोटे सिक्कों का लेन देन विद्युतीय उपकरण एवं स्पेयर पाटर््स फूलों की सजावट और बेचना कम्प्यूटर और फ्लोपी, पानी में घोल कर पीये जा सकने वाले मादक पदार्थ पुस्तक लेखन और प्रकाशन आदि ।

12. मीन- समुद्र से प्राप्त जैविक खाद्य पदार्थ, मछली, हथियार, तेल, मोती, पुखराज, चिकित्सा में काम आने वाले उपकरण, टैंट ओर सजावट आदि इस तरह से आप अपने ग्रहों के आधार पर व्यापार कर समृद्धि प्राप्त कर सकते है।

ज्योतिष शास्त्र हमारे जीवन की भावी योजनाओं के लिए प्रमाणिक विज्ञान (विद्या) है, अत: कैरियर सम्बंधित मार्गदर्शन भी बेहतर मिल सकता है।

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मानसिक रोग और ज्योतिष

मानसिक रोगों के ज्योतिषीय कारण :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

जन्मकुंडली में शरीर के सभी अंगों का विचार तथा उनमें होने वाले रोगों या विकारों का विचार भिन्न-भिन्न भावों से किया जाता है। रोग तथा शरीर के अंगों के लिये लग्न कुण्डली में मस्तिष्क का विचार प्रथम स्थान से, बुद्धि का विचार पंचम भाव से तथा मनःस्थिति का विचार चन्द्रमा से किया जाता है। इस के अतिरिक्त शनि, बुध, शुक्र तथा सूर्य का मानसिक स्थिति को सामान्य बनाये रखने में विशेष योगदान है। शरीर क्रिया विज्ञान के अनुसार मानव शरीर में मस्तिष्क एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है। यह शरीर का केन्द्रीय कार्यालय है, यहीं से सभी संदेश व आदेश प्रसारित होकर शरीर में बडे़ से लेकर सूक्षमातिसूक्ष्म अंगों तक को भेजे जाते हैं।

मानव मस्तिष्क को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, एक वह जिसमें बुद्धि कार्य करती है, सोचने-विचारने, तर्क विश्लेषण और निर्णय करने की क्षमता इसी में है, इसी को अवचेतन मस्तिष्क कहते हैं। ज्योतिष मतानुसार इसका कारक ग्रह सूर्य है। विचारशील (अवचेतन) मस्तिष्क रात्रि में सो जाता है, विश्राम ले लेता है, अथवा कभी-कभी नशा या बेहोशी की दवा लेने से मूर्छाग्रस्त हो जाता है। अवचेतन मस्तिष्क के इसी भाग के विकार ग्रस्त होने से जातक मूर्ख, मंद बुद्धि और अनपढ़ अविकसित मस्तिष्क वाला व्यक्ति या तो सुख के साधन प्राप्त नहीं कर पाता, और यदि कमाता भी है तो, उसका समुचित उपयोग करके सुखी नहीं रह पाता। सभी वस्तुयें उसके लिये जान का जंजाल बन जाती हैं। एेसे जातक मंदबुद्धि तो कहलाते हैं, परंतु इनमें शरीर के लिये भूख, मल-त्याग, श्वास-प्रश्वास, रक्तसंचार, तथा पलकों का झपकना आदि क्रियायें सामान्य ढंग से होती हैं। मस्तिष्क की इस विकृति का शरीर के सामान्य क्रम संचालन पर बहुत ही कम असर पड़ता है। मस्तिष्क का दूसरा भाग वह है, जिसमें आदतें संग्रहित रहती हैं, और शरीर के क्रियाकलापों का निर्देश निर्धारण किया जाता है। हमारी नाड़ियों में रक्त बहता है, ह्रदय धड़कता है, फेफड़े श्वास-प्रश्वास क्रिया में संलग्न रहते हैं, मांसपेशीयां सिकुड़ती-फैलती हैं, पलकें झपकती-खुलती हैं, सोने-जागने का खाने-पीने और मल त्याग का क्रम स्वयं संचालित होता है। पर यह सब अनायास ही नहीं होता, इसके पीछे सक्रिय (चेतन) मस्तिष्क की शक्ति कार्य करती है, इसे ही हम “मन” कहते हैं। ज्योतिष मतानुसार इस मन का कारक ग्रह चंद्रमा है। उपरोक्त सभी शक्तियां मस्तिष्क (मन) के इसी भाग से मिलती हैं, उन्माद, आवेश आदि विकारों से ग्रसित भी यही होता है, डाक्टर इसी को निद्रित करके आप्रेशन करते हैं। किसी अंग विशेष में सुन्न करने की सूई लगाकर भी मस्तिष्क तक सूचना पहुँचाने वाले ज्ञान तन्तुओं को संज्ञाशून्य कर देते हैं, फलस्वरूप पीड़ा का अनुभव नहीं होता, और आप्रेशन कर लिया जाता है। पागलखानों में इसी चेतन मस्तिष्क का ही ईलाज होता है। अवचेतन की तो एक छोटी सी परत ही मानसिक अस्पतालों की पकड़ मे आई है, वे इसे प्रभावित करने में भी थोड़ा-बहुत सफल हुये हैं, किन्तु इसका अधिकांश भाग अभी भी डाक्टरों की समझ से परे है।

यदि हम ज्योतिष की दृिष्टि से विचार करें तो मस्तिष्क (अवचेतन मस्तिष्क) Subconscious Mind का कारक ग्रह सूर्य है। जन्मकुण्डली में सूर्य तथा प्रथम स्थान पीड़ित हो तो, उस जातक में किसी हद तक गहरी सोच का आभाव होता है, अथवा वह गम्भीर प्रकृति का होता है, तथा मन (चेतन मस्तिष्क) Conscious Mind का कारक ग्रह चन्द्रमा है। ऐसा जातक मनमुखी होता है, जो भी मन में आता है वैसा ही करने लगता है। मन में आता है तो, नाचने लगता है, मन करता है तो गाने लगता है, परंतु उस समय की जरूरत क्या है? इसकी उसे फिक्र नहीं होती। विचित्र बाते करना, किसी एक ओर ध्यान जाने पर उसी प्रकार के कार्य करने लगता है। यह सब मनमुखी जातक के लक्षण हैं, ऐसे जातक की कुंडली में चन्द्रमा तथा कुण्डली के चतुर्थ व पंचम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है। इस के अलावा बुध विद्या देने वाला, गुरू ज्ञान देने वाला, तथा शनि वैराग्य देने वाले ग्रह हैं। किसी भी जातक की कुंडली में नवम् भाग्य का, तृतीय बल और पराक्रम का, एकादश लाभ का तथा सप्तम भाव वैवाहिक सुख के विचारणीय भाव होते हैं। यह सब ग्रहस्थितियाँ मन व मस्तिष्क पर किसी न किसी प्रकार से अपना प्रभाव ड़ालती हैं। आगे की पंक्तियों में मैं उन्माद (विक्षिप्त अवस्था) का कुंडली में कैसे विचार किया जाता है? यह बताऊँगा, जिससे ज्योतिष के विद्यार्थी लाभान्वित होंगे।

1. कुण्डली (Horoscope) में पंचम, नवम, लग्न व लाभ स्थान में से किसी भी एक स्थान पर पापयुक्त सूर्य, मंगल, शनि, पापी बुध अथवा राहु-केतु के साथ क्षीण चन्द्रमा जो की मन (चेतन मस्तिष्क) Conscious Mind का कारक है, की स्थिति पंचम अर्थात् बुद्धि के स्थान पर होकर शिक्षा के मामले में अल्पबुद्धि (Unintelligent) बनाती है। यही चन्द्रमा यदि किसी पापग्रह से दृष्ट अथवा युक्त होकर लग्न में हो तो, गहरी समझ वाला नहीं होता, और यदि यह नवम में हो तो, बार-बार भाग्य में रूकावटें होने से जातक विक्षिप्त अवस्था में आ जाता है। यही चन्द्रमा एकादश मे होने पर अनेक प्रकार के आरोप तथा उलझनों के कारण उन्माद ग्रस्त हो सकता है।

2. जन्मकुण्डली (Horoscope) में क्षीण चन्द्रमा और बुध का योग हो तो, जातक अल्पबुद्धि (Unintelligent) वाला होता है, इस योग में दो मुख्य तत्व क्षीण चन्द्रमा और बुध का योग अल्पबुद्धि (Unintlligent) बनाता है। चन्द्रमा जो की मन (चेतन मस्तिष्क) Conscious Mind का कारक है, यदि क्षीण होगा तो, वह जातक की सतत् सोच को दूषित करता है, तथा क्षीण बुध जो की बौद्धिक ज्ञान की कमी कर जातक को गहरी सोच वाला नहीं बनने देता। कुण्डली में यह सब विचार एक कुशल ज्योतिषी (Intelligent Astrologer) ही कर सकता है।

3. कुण्डली (Horoscope) के व्यय भाव में शनि युक्त क्षीण चन्द्रमा हो तो, व्यय स्थान में राहु तथा पाप युक्त चन्द्रमा हो, और अष्ठम में शुभ ग्रह हों तो, यह दोनो योग क्षीण तथा पापयुक्त चन्द्रमा को उन्माद का कारण बताते हैं। व्यय जो की कुण्डली में सैक्स का स्थान है, वहाँ वैराग्य कारक शनि की स्थिति क्षीण चन्द्रमा के साथ हो तो, पति या पत्नी के साथ सैक्स में असंतोष के कारण दुःखी होकर मानसिक रोगी हो जाता है। राहु तथा पापयुक्त चन्द्रमा की स्थिति भी एेसा ही योग बनाती है, परंतु यहां अंतर इतना होता है कि राहु के कारण जातक या जातिका स्वयं ही कामरोग से पीड़ित होकर जीवनसाथी से विमुख हो जाता है। ज्योतिष के विद्वानों (Intelligent Astrologer) ने इस प्रकार के पागलपन या उन्माद के अनेक ज्योतिषीय योगों का वर्णन अपने ग्रन्थों में किया है, ज्योतिष के विद्यार्थीयों (Students Of Astrology) को ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। इस प्रकार के योगों में मुख्य तत्व सूर्य अथवा चन्द्रमा अवश्य पीड़ित पाये जाते हैं। ज्योतिष के विद्यार्थीयों (Students Of Astrology) को विशेष ध्यान यह भी रखना चाहिए कि जातक की जनमकुंडली (Horoscope) में शनि के साथ सूर्य का सम्बंध होने से राज्याधिकारी के क्रोध से प्रमाद रोग का भय होता है, एवं वे दोनों ग्रह मंगल से युक्त हों तो, पित्तजन्य उन्माद का भय होता है।

ज्योतिषीय चिकित्सा (Madical Astrology) का नियम है कि, कालपुरुष के शरीर का कारक ग्रह सूर्य है, इस लिये सूर्य पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव दैहिक व्याधियाँ अर्थात् अधिभौतिक दुःख देता है। इस पर पाप प्रभाव मनुष्य को प्रेत, पितर आदि के द्वारा प्रदत्त व्याधियों के साथ-साथ पापी और क्रूर ग्रहों का उत्पीड़न, मानसिक व दीर्घकालिक व्याधियाें का जनक होता है। प्रेत-पितरों से जनित व्याधियों को असेव कहा जाता है। यह व्याधियाँ मनोचिकित्सक के कार्य क्षेत्र में आती हैं, ज्योतिषीय चिकित्सा (Madical Astrology) के द्वारा भी इसका उपचार सम्भव है, परंतु एलोपैथी चिकित्सा द्वारा 80 प्रतीशत रोगियों में मनोचिकित्सा असफल पाई गई है, इन रोगों का उपचार दो प्रकार से क्रमिक रूप से होता है। तंत्र और साथ-साथ आयुर्वैदिक औषधियों के द्वारा, प्रेतों या पितरों का प्रभाव पुच्छ भूत स्वरूप होता है। मुख्य 70 प्रतीशत प्रभाव को “क्लीं” मंत्र के सिद्ध तांत्रिक हटा देते हैं, और शेष 30 प्रतीशत का आयुर्वेदाचार्य अपने उपचार से ठीक कर देते हैं। इसमें इतना स्पष्ट है कि, इस प्रकार के रोगों के आरम्भ होने से पूर्व इनकी पहचान के लिये एकमात्र ज्योतिषीय चिकित्सा (Madical Astrology) ही कारगर सिद्ध हुई है। रोग आरम्भ होने के बाद सम्मोहन क्रिया Reiki या ईष्टमंत्र भी कारगक सिद्ध होते हैं, परंतु ध्यान रहे- प्रेत आवेशित व्यक्ति को स्वंय ईष्ट की पूजा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि आवेशित व्यक्ति की अपनी पूजा-अर्चना प्रेत को और भी शक्तिशाली बना देती है।

ग्रहों में चन्द्रमा मानसिक शक्ति से सम्बन्धित ग्रह है, चन्द्रमा और सूर्य मिलकर ही मंत्र साधक को संजीवनी शक्ति प्रदान करते हैं। संजीवनी साधना में सूर्य बीज “ह्रां” और चन्द्र बीज “वं” का समावेश होता है। स्वास्थ्य के लिये दोनों ग्रहों का पापी ग्रहों (राहु-केतु और शनि) के प्रभाव से बचा रहना आवश्यक है। मन के कारकत्व के अलावा चन्द्रमा को गले, छाती और ह्रदय का कारकत्व भी प्राप्त है। वृश्चिक राशि स्थित (नीच चन्द्रमा) का सम्बंध सूर्य से हो जैसे- सूर्य वृश्चिक राशि में या वृष राशि में तथा चन्द्रमा पर शनि और मंगल की पूर्ण दृष्टि हो तो, राजयक्ष्मा (tuberculosis) होने का पूरा भय रहता है।

यदि चन्द्रमा मंगल से सम्बंध बनाये या उस पर मंगल की सातवीं या आठवीं दृष्टि हो तो, जीवन में जीवन में अनेक दुर्घटनाओं का दुःख जातक को झेलना पड़ता है, ऐसे जातक को अनेक बीमारियां घेरे रहती हैं, उसका दाम्पत्य जीवन भी दुःख से भरा होता है। जातक को अनेक रूकावटों और अड़चनों का सामना अपने जीवन में करना पड़ता है। वराहमिहर ने एेसे जातक के लिये कहा है- चन्द के साथ यदि मंगल का संयोग हो जाये तो, जातक औरतों का व्यापारी होता है, या वे अपनी पत्नी के अन्य से सैक्स सम्बंधों के प्रति बेपरवाह होता है, घर के बर्तनों तक को बेच देता है, यह जातक अपनी माता के प्रति भी नीचता का व्यवहार करता है। चन्द्र-शनि का कुण्डली में साथ होना दुःख व विपत्ति का कारण बनता है, यह योग सन्यास या वैराग्य दायक भी होता है, परंतु यही योग वैराग्य होने पर दैव सानिध्य भी दिलाता है, अर्थात् जातक को अड़चनों में से गुजार कर वैरागी बना देता है, चन्द्र-शनि की युति हो, और मंगल की दृष्टि उन पर हो तो जातक राजयक्ष्मा रोग से पीड़ित होता है। एेसे जातक को सूखा रोग भी हो सकता है। छटे भाव में चंद्रमा पर रक्त सम्बंधी त्वचा रोग या पागलपन की बीमारी हो सकती है। ऐसे जातक को रति-जनित रोग सिफलिस या एड्स हो सकते हैं। यदि शनि-चन्द्र की युति सातवें भाव में हो तो, विवाह में बाधायें आती हैं, विवाह यदि होता भी है तो, दाम्पत्य जीवन दुःखमय होता है, न तो जीवन-साथी साथ ही रहता है, न ही संतान होती है, यदि विवाह सुख होता है तो वृद्ध या वृद्धा साथी से। यह योग सातवें भाव में कर्क या वृष राशि में होने पर निष्फल होता है, अर्थात् वृष या कर्क का चन्द्रमा जातक का बचाव कर देता है, इसके लिये मकर या वृश्चिक राशि लग्न में होनी चाहिए।

आठवें भाव का क्षीण चन्द्र यदि उच्च के शनि द्वारा देखा जाता हो, तो जातक को पागलपन या मिरगी का रोग होता है, शीण चन्द्र शनि के साथ हो, और उस पर मंगल की दृष्टि हो तो, जातक की मृत्यु बवासीर, पागलपन, आपरेशन या चोट के कारण होती है। चीरफाड़ का होना निश्चित है, या खुंखार जानवर के द्वारा भी मृत्यु हो सकती है। बारहवें भाव में चन्द्र-शनि की युति पागलपन का कारण बनती है। प्रायः मानसिक रोगों का कारक 5, 6, 8 या 12 भाव का चन्द्रमा शनि और मंगल के प्रभाव में आकर हो जाता है।

जन्मकुण्डली Horoscope में बुध का सम्बंध दांतों, श्वांसनली, फेफड़ों और कटि प्रदेश से है। बुध पर शनि और मंगल का प्रभाव निमोनिया (पसली चलने का रोग) श्वांस का रोग, बुध-मंगल की युति पर सूर्य और शनि का प्रभाव ज्वर और आंतों के रोग देता है। नजला-जुकाम भी बुध पर पापी ग्रहों के प्रभाव से होता है। बुध जब शनि क्षेत्रीय हो, या राहु के प्रभाव में हो, अर्थात् बुध पर पाप प्रभाव वाणी सम्बंधी रोग तथा हकलाहट देता है, बुध के पापी हो जाने पर बुद्धि जड़ हो जाती है। बुध पर क्रूर और पापी ग्रहों का प्रभाव जेल यात्रा करवा देता है। क्रूर एवं पापी ग्रहों का प्रभाव बुध पर होने से नपुंसकता या दिल के दौरे पड़ सकते हैं, शर्त यह है कि, बुध पर बृहस्पति की दृष्टि नहीं होनी चाहिए। ऐसा असर अधिक होता है, जब बुध तीसरे या छटे भाव में हो, और पाप प्रभाव इस पर पड़ रहा हो, मेष, कर्क या मकर लग्न वाले जातकों के लिये पाप प्रभाव वाला बुध अति दुःख दायक होता है। अपने शत्रु मंगल की राशियों (मेष व वृश्चिक) का पाप प्रभाव युक्त बुध क्रमशः मानसिक रोग और जननेन्द्रियों के रोग देने वाला होता है। पाप प्रभाव युक्त बुध यदि सिंह राशि में हो तो, टायफाईड जैसे रोग देता हेै। शनि से दृष्ट होने पर मकर-कुम्भ का बुध हकलाहट देता है। क्षीण चन्द्र और बुध की युति बांझपन देती है। मंगल के प्रभाव क्षेत्र में शनि की दृष्टि या युति बुध पर होने पर जब मंगल का प्रभाव बुध पर हो तो, हिस्टीरिया रोग हो सकता है, परंतु इसके लिये बुध पर राहु का प्रभाव भी होना चाहिए।

जन्मकुंडली Horoscope के लग्न, चौथे या पाँचवें भाव का बुध यदि मंगल और शनि के साथ हो तो, बांध्यत्व देता है। यदि बुध, शनि, मंगल की युति पर राहु का प्रभाव पड़े तो, गठियावात के रोग होते हैं। दाम्पत्य दुःख और अंग-भंग देने वाला हो सकता है, यदि यह ग्रह सातवें भाव में हो। आठवें भावस्थ पापी बुध चर्म और मानसिक रोग देता है।

बुध का सम्बंध बौद्धिकता से है, विज्ञानमय कोष से सम्बंधित पूर्वजन्मों के कर्मों का फल बुध से प्राप्त होता है। जब बुध नवम् भाव धनु राशि या गुरू से होता है, तो यह योग पितृऋण का परिचायक है। पिछली पीढ़ियों के पापकर्मों का फल वर्तमान पीढ़ी में इस ग्रहयोग से पता चलता है। इस का असर प्रायः जातक की वृद्धावस्था में दिखाई देता है। जब ग्रहजनित रोग परिलक्षित न हों, और जातक उलझनों परेशानियों में फंसा हो, तथा एेसे रोग सामने आ रहे हों, जो कुण्डली Horoscope में दिखाई न देते हों, उस समय कुण्डली में पितृऋण की खोज करनी चाहिए। पितृऋण का सम्बंध पूर्वजों के पापों से होता है, ये पाप पूर्वजों से विरासत में प्राप्त होते है। इस विषय में साधारण ज्योतिषी या कम्प्यूटर की बनी कुण्डली कोई सहायता नहीं कर सकते। इसी लिये ज्योतिष के माध्यम से जातक को कोई लाभ नहीं हो पाता, और अधिकतर रोग अबाधित रह जाते हैं। पितृऋण Pitrarin बृहस्पति के कारकत्व में आते हैं, और इसका सम्बंध विज्ञानमय कोश से होता है। पूर्वजन्म या पितृऋण Pitrarin सम्बंधित दोषों को मिटाने की क्षमता केवल भगवान शिव में है, और उनके बताये उपाय पितृऋण Pitrarin से पूर्णतः छुटकारा दिला सकते है।

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धनवान बनाने वाले योग

क्या आपकी कुण्डली में महाधनी बनने के योग है?-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

हालांकि पैसा ही सब कुछ नहीं होता, परंतु आज का समय शुक्र प्रधान समय है, इस कारण आज के समय में पैसे के बिना इज्जत नहीं मिलती, पैसा है तो रिश्तेदार तो रिश्तेदार दुश्मन भी मित्र बन जाते हैं। रिश्तेदार कुछ अधिक अपनापन दिखाते हैं। वर्तमान में आर्थिक युग का दौर चल रहा है। धन के बगैर इस भौतिक काल में जीवन की आवश्यकता से अधिक भी बढ गई हैं, इंसान का गुजारा बिना धन के करना असम्भव है। महान सन्त कबीर दास जी ने क्या खूब कहा है। सांई इतना दीजिये जामे कुटम्ब समाय, मैं भी भूखन न रहॅू महमान भी भूखा न जाये। कबीर दास जैसे महान सन्त ने जीवन में धन की आवश्यकता को सीमित रखने का सुझाव दिया है, तो फिर आम आदमी क्यों नहीं संत वचन को स्वीकार करता। आज हर इंसान की आवश्यकतायें बढ गई हैं, धर में ऐशो-आराम की हर वस्तु चाहिए, इस लिए बेचारा बिना अर्थ के अपने जीवन की नैय्या को पार भला कैसे लगा पायेगा ?

आज के भौतिक युग में प्रत्येक मनुष्य की आकांक्षा रहती है कि वह अपने जीवन में अधिक से अधिक धन दौलत कमा कर ऐशो-आराम से अपना जीवन व्यतीत कर सकें। किन्तु सबके नसीब में ऐसा होता नहीं है। कर्म करके दो वक्त की रोटी का जुगाड़ किया जा सकता पर लजीज व्यजंनो का स्वाद चखने के लिए भाग्य का प्रबल होना जरूरी है।

आइये हम आपको बताते हैं कि ज्योतिष शास्त्र इस विषय में क्या कहता है। क्या आपकी जन्मकुंडली में कुछ ऐसे ग्रहयोग हैं? जो आपको विपुल धनवान बना सकते हैं। जन्मकुंडली में दूसरा भाव पैतृक धन और संचित धन का स्थान होता है। तथा बृहस्पति धन का कारक ग्रह है। इसके अतिरिक्त पंचम, नवम, चतुर्थ, दशम और एकादश भाव भी धन प्राप्ति के योगों की सूचना देते हैं। प्रथम, पंचम, नवम, चतुर्थ, दशम और सप्तम भाव की भूमिका भी धन प्राप्ति में महत्वपूर्ण होती है। दूसरा भाव यानि पैतृक या संचित धन का भाव इस मामले में प्रमुख भूमिका निभाता है, अर्थात इस भाव की भूमिका विशेष होती है। वैसे तो विभिन्न प्रकार के योग जैसे राजयोग, गजकेसरी योग, पांच महापुरूष, चक्रवर्ती योग आदि में लक्ष्मी की विशेष कृपा या विपुल धन प्राप्त होने के संकेत मिलते ही हैं। लेकिन आधुनिक युग में उच्च पदों पर आसीन होने से भी ये योग फलीभूत होते हैं, लक्ष्मी प्राप्ति या महाधनी योग किस प्रकार जन्मकुंडली में बनते हैं? आईये देखें :-

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि निम्न प्रकार के सम्बन्ध धनेश, नवमेश, लग्नेश, पंचमेश और दशमेश आदि के मध्य बनें तो, जातक महाधनी कहा जा सकता है।

1- लग्न और लग्नेश द्वारा धन योग :- यदि लग्नेश धन भाव में और धनेश लग्न भाव में स्थित हो तो, यह योग विपुल धन योग का निर्माण करता है। इसी प्रकार से लग्नेश की लाभ भाव में स्थिति या लाभेश का धन भाव, लग्न या लग्नेश से किसी भी प्रकार का सबंध जातक को अधिक मात्रा में धन दिलाता है। लेकिन शर्त यह है कि इन भावों यो भावेशों पर नीच या शत्रु ग्रहों की दृष्टि नहीं पड़ती हो। ऐसा होने से योग खण्डित हो सकता है।

2- धन भाव या धनेश द्वारा धन योग : – यदि धनेश लाभ स्थान में हो, और लाभेश धन भाव में, यानि लाभेश धनेश का स्थान परिवर्तन योग हो, तो जातक महाधनी होता है। यदि धनेश या लाभेश केन्द्र में या त्रिकोण में मित्र भावस्थ हो, तथा उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो, जातक धनवान होगा। यदि दोनों ही केन्द्र स्थान या त्रिकोण में युति कर लें तो, यह अति शक्तिशाली महाधनी योग हो जाता है। इस योग वाला जातक धनेश या लाभेश की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर्दशा में बहुत धन कमाता है।

3- तृतीय भाव या भावेश द्वारा धन योग :- यदि कुंडली के तीसरे भाव का स्वामी लाभ घर में हो, या लाभेश और धनेश में स्थान परिवर्तन हो तो, जातक अपने पराक्रम से धन कमाता है। यह योग क्रूर ग्रहों के मध्य हो तो, अधिक शक्तिशाली माना जायेगा। इस योग में सौम्य ग्रह कम फलदायी होते हैं।

4- चतुर्थ भाव या भावेश द्वारा धन योग :- यदि कुंडली में चतुर्थेश और धनेश का स्थान परिवर्तन योग हो, या धनेश और सुखेश धन या सुख भाव में परस्पर युति बना रहें हो तो जातक बड़े-2 वाहन और भूमि का मालिक होता है। ऐसा जातक अपनी माता से विरासत में बहुत धन की प्राप्ति करता है।

5- पंचम भाव या पंचमेश द्वारा धन प्राप्ति :- कुंडली में पंचम भाव का स्वामी यदि धन, नवम अथवा लाभ भाव में हो तो भी जातक धनवान होता है। यदि पंचमेश, धनेश और नवमेश लाभ भाव में अथवा पंचमेश धनेश और लाभेश नवम भाव में अथवा पंचमेश, धनेश और नवम भाव में युत हो तो, जातक महाधनी होता है। यदि पंचमेश, धनेश, नवमेश और लाभेश चारों की युति हो तो, सशक्त महाधनी योग होता है। किन्तु यह योग बहुत कम कुंडलीयों में बनता है।

6- षष्ठ भाव और षष्ठेश द्वारा धन योग :- जन्मकुंडली का षष्ठेश लाभ या धन भाव में हो तो, शत्रु दमन द्वारा धन की प्राप्ति होती है। ऐसे योग में धनेश का षष्ठमस्थ होना शुभ नहीं होता है। यह योग कम कुंडलीयों में ही घटित होता है।

7- सप्तम और सप्तमेश द्वारा धन की प्राप्ति :- यदि कुंडली का सप्तमेश धन भावस्थ हो, या धनेश सप्तमस्थ हो, अथवा सप्तमेश नवमस्थ या लाभ भावस्थ हो तो, जातक ससुराल पक्ष से धन प्राप्त करता है। ऐसे जातको का विवाह के बाद भाग्योदय होता है। ऐसे जातक किसी धनकुबेर के दामाद बनते हैं।

8- नवम भाव और नवमेश द्वारा धन योग :- कुंडली का नवमेश यदि धन या लाभ भाव में हो, या धनेश नवमस्थ हो अथवा नवमेश और धनेश युक्त होकर द्वितीयस्थ, लाभस्थ, चतुर्थस्थ या नवमस्थ हो तो, जातक महाभाग्यशाली होते है। किसी भी कार्य में हाथ डालकर अपार धन प्राप्त कर सकता है। यह युति यदि भाग्य स्थान में बने तो योग और अधिक बलवान हो जायेगा।

9- दशम और दशमेश द्वारा धन योग :- कुंडली में धनेश और दशमेश का परिवर्तन, युति आदि होने से पर जातक पिता या राजा द्वारा या अपने कार्य विशेष द्वारा धन प्राप्त करता है। ऐसा जातक धनवान राजनेता होता है।

10- लाभ और लाभेश द्वारा धन योग :- जन्मकुंडली में लाभेश का धन भावस्थ, पंचमस्थ या नवमस्थ होना, या इन भावों के स्वामियों की केन्द्रों या त्रिकोण स्थानों में युति होने से जातक महाधनी होता है।

नोटः– इन सभी योगों में एक बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि ग्रहों की युति, स्थान परिवर्तन आदि स्थितियों में शुभ दृष्टि या मित्र दृष्टि हो तो, धनवान योग के फलित होने की सम्भावना प्रबल हो जाती है, साथ ही इन भावों या भावेशों का बलवान होना भी आवश्यक होता है। कई बार अनेक कुण्डलियों में उपर बतायें गये योग होने के उपरांत भी जातक का जीवन सामान्य होता है। ऐसा तभी होगा जब भाव या भावेश कमजोर होंगे, ग्रह बाल्यावस्था या मृतावस्था में होंगे या फिर पाप ग्रहों की दृष्टि से योग खण्डित होंगे।
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