अंक ज्योतिष

कीरो गोल्ड सॉफ्टवेयर (हिन्दी और अंग्रेजी दो भाषाओं में) :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top best astrologer in Delhi)

कहा जाता है कि आज तक के मानव इतिहास में सम्पूर्ण विश्व में भविष्य बताने वाली लगभग 160 विद्यायें खोजी गई हैं। इनमें अनेको विद्यायें तो ऐसी हैं, जिनका प्रचार तथा उपयोग केवल उसी देश तक ही सामित होकर रह गया, जिसमें वे खोजी गई हैं। कुछ ऐसी भी हैं जिनका प्रचार और भी सीमित छेत्र लगभग प्रदेश विशेष तक ही सीमित रह गया, और धीरे-धीरे यह विद्यायें अधिक प्रचलन में न आने के कारण लुप्त सी हो गई। ऐसा नहीं है की यह लुप्त हुई विद्याओं की प्रमाणिकता कम थी, बल्कि ऐसा इसलिये हुआ क्यों कि इनको उचित प्रचार ही नहीं मिला या फिर इनमें से कुछ को छिपाकर रखने की प्रवृति कारण बनी थी।

भविष्य का ज्ञान देने वाली जो तीन विद्यायें सम्पूर्ण विश्व में अधिक प्रसिद्ध हुई हैं- 1. हस्तरेखा विज्ञान, जो कि समुद्रिक विज्ञान का एक भाग है। 2. अंक ज्योतिष Numerology तथा 3. जन्मकुण्डली द्वारा भविष्य कथन। देखा जाये तो तीनों ही विद्याओं के जनक भारतीय विद्धान थे। भारत के 18 ऋषियों ने अपने-अपने समय में इन विद्याओं को खोजा तथा प्रस्तुत किया था। इसके अतिरिक्त भारत में भी भविष्य का ज्ञान देने वाली अनेक अन्य विद्यायें उचित प्रचार न पाने तथा छिपाकर रखने की प्रवृति के कारण लुप्त हांकर रह गई या कह सकते हैं, वह स्थान न पा सकी जैसा इन तीन विद्याओं ने प्राप्त किया। भारत में इन में से एक विद्या ‘जन्मकुण्डली द्वारा फलादेश’ पर महर्षि पराशर, का योगदान सर्वाधिक उल्लेखनीय था, इसके उपरांत विक्रमादित्य के शासनकाल में महर्षि वराहमिहिर ने इसमें बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इस के अतिरिक्त भी बहुत से विद्वानों ने अपना-अपना योगदान समय-समय पर दिया है। वराहमिहिर ने केवल कुण्डली विज्ञान पर ही नहीं अपितु अंक ज्योतिष तथा सामुद्रिक विज्ञान पर भी अनेक ग्रंन्थों की रचना की है। युरोप के विद्वान कीरो, पैथागोरस, स्फेरियल, हिब्रयू ने अंक ज्योतिष तथा सामुद्रिक शास्त्र के एक भाग ‘हस्तरेखा विज्ञान’ पर तो बहुत परिश्रम किया और प्रसिद्धि भी पाई अनेक अंग्रेजी के ग्रन्थ भी लिखे परंतु जन्मकुण्डली विज्ञान के रहस्यों को अधिक नहीं समझ पाये। कहा जाता है पैथागोरस और कीरो भविष्य ज्ञान की विद्याओं की शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से कई वर्ष तक भारत में भारतीय विद्वानों के साथ रहे थे और अनेक विद्यायें यहां से सीखकर गये थे। यह सच है की कीरो ने अंकविद्या ‘अंक ज्योतिष’ पर बहुत सूक्षम अध्ययन किया और इसी लिये अपने क्षेत्र (देश) में बहुत प्रसिद्धि भी पाई थी। यहां तक की इस विद्या के जनक ‘सामुद्र ऋषि’ को बहुत अधिक विद्वान नहीं जानते परंतु कीरो का नाम सभी की जुबान पर रहा है। विद्वान चाहे भारतीय हो या विदेशी सम्मान पाने का अधिकारी तो बराबर है। यहां आपका ध्यान अब Shukracharya संस्थान द्वारा कडे परिश्रम द्वारा बनाया गया Keero Gold की ओर ले जाना चाहता हूं। कीरो गोल्ड एक साॅफ्टवेयर है, जो शुद्ध अंक ज्योतिष पर आधारित है।

कीरो गोल्ड की विशेषतायें-
सर्व प्रथम कीरो-06 नाम से अंक शास्त्र का साॅफ्टवेयर तैयार किया गया था, जो कि वर्तमान कीरो गोल्ड का आधार है। जिसको Keero Gold प्रोफेशनल संस्करण के नाम से जाना जाने लगा। जिसमें व्यक्ति अपनी अंक ज्योतिष से संबंधित अधिकतम आवश्यकताओं को देख व प्रिंट कर सकता है। आप इसके नाम से ही समझ सकते हैं, इस संस्करण का उदेश्य है अंक ज्योतिष द्वारा अंक जन्मपत्री छापकर व विस्तृत फलादेश व गणना देखकर व्यापारिक दृष्टि से प्रयोग करना। किसी भी एडवांस चीज की आवश्यकता तब तक महसूस नहीं होती जब तक कि उसके द्वारा प्राप्त होने वाली सारी सुविधाओं का पता न चले। यह ठीक उसी प्रकार है, जैसे काम तो तब भी चल जाया करता था जब संचार माध्यम सीमित थे, केवल डाक द्वारा पत्र भेजे और पढ़े जाते थे, परंतु आज के आधुनिक समय में ई-मेल, एस. एम. एस. आदि द्वारा संदेश भेजे व प्राप्त किये जाते हैं। आज इन आधुनिक चीजों के बिना जीवन यापन संभव नही लगता है।

कीरो गोल्ड की विशेषतायें :-
यह संस्करण हिन्दी और अंग्रेजी दो भाषाओं में उपलब्ध है। यह संस्करण मुख्यतः पाँच भागों में संगठित है।
1. प्रश्न खण्ड
2. अंक कुण्डली खण्ड
3. मिलापक खण्ड
4. राम शलाका
5. बायोरिद्म

1. प्रश्न खण्ड :-
प्रश्न खण्ड में ‘प्रश्न अंक ज्योतिष’ की पद्धतियों के द्वारा गणना और उसके के फल (उत्तर) उपलब्ध हैं। जैसे कभी-कभी जतक के मन में ऐसे प्रश्न होते हैं, जिनका उत्तर एक शब्द में ही होता है (हाँ, ना, शुभ, सम, अशुभ आदि) इसमें इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर देने वाली विशेषतायें उपलब्ध हैं।

इसमें 7 विभाग हैं-

पहला- नाम सुधारक :-
इस विभाग में आप अपने नाम की त्रुटियां सुधार कर, इसे अपने भाग्यांक के अनुकूल बना सकते हैं, जिससे आपका नाम आपके लिये भाग्य वृद्धि करने वाला हो जायेगा। इनमें से कुछ स्पेलिंग प्रयोग करने योग्य नहीं होते, इस लिये इस के उत्तर में एक से अधिक उत्तर मिलेंगे, यह उत्तर 100 प्रतीशत या 50 प्रतीशत के पैमाने में अनुकूलता के रूप में मिलेंगे।

दूसरा- व्यक्तिगत शुभ घंटे :-
यह होरा शास्त्र पर आधारित गणना आपको किसी भी दिन के शुभ घंटों का ज्ञान देगी, जो की आपके लिये शुभ घंटे होंगे। इन शुभ घंटों में आप अपना कोई भी शुभ कार्य आरम्भ कर सकते है।

तीसरा- ग्राफ :-
इस सुविधा में आप अपने भाग्य स्तर और ऊर्जा स्तर तथा समय (दिन) के बीच बनता हुआ ग्राफ देख सकते हैं, जिससे आपको प्रतिदिन के लिये दिनचर्या बनाने में मदद मिलेगी। भाग्य ग्राफ में आप अपने भाग्य के स्तर का अवलोकन दिन, महीने, वर्ष के रूप में कर सकते हैं। ऊर्जा ग्राफ में आप अपने भाग्य के स्तर का अवलोकन दिन, महीने, वर्ष के रूप में कर सकते हैं। यह सभी गणनायें आपके वर्षांक, मासांक और दैनिकांक पर आधारित होगी।

चौथा- अंक गोचर :-
इस सुविधा में आप अपना वर्तमान, व्यक्तिगत अंक गोचर घडी के आकार में मनचाही गति से देख सकते हैं। साथ में निर्देशरूप में शुभाशुभ समय की जानकारी दी गई है। यह जानकारी आपको अति-उत्तम, उत्तम, मध्यम, कठिन तथा अशुभादि के रूप में मिलेगी। यह गणना व्यक्तिगत वर्षांक, मासांक और दिनांक के पारवहन चक्र पर आधारित है।

पाँचवा- प्रवासी आगमन :-
इस सुविधा में प्रवासी के विषय में जानकारी मिलेगी। जैसे प्रवासी सुरक्षित है या नहीं, किस दिशा में, कम, मध्यम या अधिक दूरी पर है, अथवा वह कितने समय में लौटेगा इत्यादि।

छटा- खोई पाई वस्तु ज्ञान :-
कभी-कभी घर की कोई वस्तु खो जाती है, उस स्थिति में वस्तु की प्राप्ति या ना प्राप्ति की जानकारी मिलती है। यदि मिलेगी तो कैसी अवस्था में, किस ओर मिलेगी।

सातवां- नाम, फोन या वाहन नम्बर जांचना :-
इसमें आपके भाग्यांक के अनुसार आपके लिये आपके फोन, घर, कार्यस्थान या वाहन का नम्बर जांचने की सुविधा शुभ (भाग्यशाली) प्रतीशत में मिलेगी।

2. अंक कुंडली खण्ड :

इस खण्ड में अंक कुंडली के सभी प्रकार का विस्तृत फलादेश रिपोर्ट के रूप में प्रिंटाऊट लेने की सुविधा है। सभी रिपोर्ट के प्रिंटाऊट हिन्दी व अंग्रेजी दोनो भाषाओं में लिये जा सकते हैं।

इसमें 9 विभाग हैं-
पहला- विभाग मूलांक विचार :-
इस अंक पत्रिका में जातक के मूलांक पर आधारित वितृत फलादेश किया गया है। इस के साथ-साथ जातक के भयांक, नामांक, शुभांक, शुभ दिन, शुभ तारीख, शुभ वार, शुभ माह, शुभ वर्ष, अंकों द्वारा स्वास्थ्य, अंकों द्वारा आजीविका के साधन, मित्रांक, शत्रु अंक, महत्वपूर्ण वर्ष, शुभ रंग, शुभ यंत्र, शुभ व्रत आदि का विस्तृत विवरण फलादेश सहित उपलब्ध है। सामान्यतः 8 से 10 पृष्ठ का प्रिंटाऊट इसमें मिलता है।

दूसरा- विभाग अंक कुण्डली :-
इस कुण्डली में जातक की अंक कुण्डली पर आधारित फलित कथन किया गया है। इसके साथ जातक की अंक दशाओं का भी विवरण आरम्भ और समाप्तिकाल सहित हैै। इस कुंडली में जातक की अंक कुंडली में बनने वाले विभिन्न अंक योगों का भी विस्तृत फलादेश है।

तीसरा- विभाग नाम कुण्डली :-
इस कुंडली में जातक के अंग्रेजी नामाक्षरों की विस्तृत फलकथन की सुविधा उपलब्ध है।

चौथा- विभाग वार्षिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक के 9-10 वर्षो का सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुंडली जातक के वर्षांक पर आधारित बनाई जाती है।

पाँचवा- विभाग मासिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक के 12 महीने का सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुण्डली जातक के व्यक्तिगत मासांक पर आधारित बनाई जाती है।

छटा- विभाग दैनिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक का दैनिक सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुण्डली जातक के व्यक्तिगत दैनिक फल पर आधारित बनाई जाती है।

सातवां- विभाग वार्षिक व मासिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक के वर्ष तथा मास का संयुक्त सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुण्डली जातक के वर्षांक व मासंक पर आधारित है।

आठवां- विभाग मासिक फलादेश व दैनिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक के मासिक तथा दैनिक संयुक्त सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुण्डली जातक के मासांक व दैनिक अंक पर आधारित है।

नौवां- विभाग लोशु चक्र (चायनीज अंक शास्त्र) फलादेश :-
इस रिपोर्ट में जातक के लिये लोशु चक्र द्वारा फल कथन किया गया है। डेस्टिनेशन नम्बर का भी विस्तृत फलादेश है। इस के साथ दिनांक का फल सशक्त प्लेन और बनने वाले ऐरो का विस्तृत फलादेश है। व्यक्तिगत लोशु वर्षांक, एवं व्यक्तिगल लोशु मासांक का भी फलादेश है।

3. मेलापक खण्ड :-
इस खण्ड में अंक शास्त्र के आधार पर किन्ही दो व्यक्तियों का मेलापक फल दिया गया है। यह फलादेश प्रतिशत में दिया गया है। इसकी गणना का आधार मूलांक, भाग्यांक और नामांक है, यह इनकी परस्पर अनुकूलता पर आधारित है।

4. राम शलाका :
जीवन में अनेक अवसर ऐसे आते हैं, जब किसी प्रश्न के उत्तर को लेकर दुविधा की स्थिति हो, और आप प्रभु श्रीराम के संकेतात्मक उत्तर चाहते हों, या आप कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने जा रहे हैं, तथा यह तय नहीं कर पा रहे कि क्या किया जाये, क्या नहीं किया जाये? ऐसी स्थिति में अपनी दुविधा भगवान राम को सौंप दीजिये। समझ लीजिये आपका यह उत्तर तो भगवान के द्वार से आ गया। क्या करें और क्या नहीं करें? ऐसी भटकाव वाली स्थिति से उबरने के लिये ही तुलसीदास जी ने इस शलाका की रचना की है। आप मान सकते हैं कि श्री राम शलाका प्रश्नावली के रूप में एक मूल्यवान चाबी हमें हमारी ऋषि परम्परा से प्राप्त हुई है, इसकी उपयोग विधि बिलकुल सरल है-

श्री राम शलाका एक ऐसी प्रश्नावली है, जो गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘श्री राम चरित मानस’ पर आधारित है। इस प्रश्नावली का प्रयोग कर आप जीवन के कई उपयोगी तथा महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रश्नावली का प्रयोग करना बेहद सरल है। सबसे पहले अपने नेत्र बंद करके भगवान श्री राम का स्मरण करते हुये अपने प्रश्न को अपने मन में अच्छी तरह विचार लें। इसके बाद इस में दिये गये किसी भी एक अक्षर पर अपने नेत्र बंद किये हुये ही क्लिक करें। आपके द्वारा क्लिक किये हुये अक्षर से प्रत्येक 9वें नम्बर के अक्षर को जोड़कर एक चैपाई बनेगी, जो की आपके प्रश्न का उत्तर होगी।

5. बायोरिद्म ग्राफ :-
बायोरिद्म ग्राफ बायोरिद्म सिद्धांत पर आधारित है, इस में जिस समय गणना की जा रही है, उस दिन से 30 दिन पूर्व तथा 30 दिन आगे तक का यह ग्राफ अंकित हो जाता है। इस के अलावा आप इस ग्राफ को कम्प्यूटर स्क्रीन पर भी देख सकते हैं। इमेज के रूप में सहेज सकते हैं, प्रिटर से प्रिट कर सकते हैं। इस में तीत रेखायें दिखई गई हैं, प्रथम रेखा जातक की शारीरिक स्थिति को ग्राफ के रूप में दर्शाती है, इसी प्रकार दूसरी रेखा मन की स्थिति को ग्राफ के रूप में दिखाती है, तथा तीसरी रेखा बौद्धिक स्तर को ग्राफ के रूप में दर्शाने वाली रेखा है।

अन्य विशेषतायें-
1. यह साॅफ्टवेयर windows Pc और Laptop पर compatible है। window XP/7/8/10 आॅपरेटिंग सिस्टम के लिये तैय्यार किया गया है।

2. यह (Numerology Software) अंक ज्योतिष पर आधारित साॅफ्टवेयर Singale user licence पर आधारित है।

3. इस Numerology Software में वैदिक सूर्यांक, वैदिक चंद्रांक, कीरो, सिफेरियल, हिब्रयु, पाईथागोरस द्वारा दी गई अंक-शास्त्र पद्धतियाँ सम्मिलित हैं।

4. यह Numerology Software हिन्दी व अंग्रेजी दोनो भाषाओं में उपलब्ध है।

5. यह Keero Gold साॅफ्टवेयर विख्यात अंक-शास्त्रीयों द्वारा सत्यापित व परिक्षित है।

6. यह साॅफ्टवेयर (Numerology Software) अंक-शास्त्र की विविध पद्धतियों पर आधारित अंकशास्त्र का विस्तृत व विशालतम संस्करण है।

7. A-4 Size में अनेक प्रिंटर्स से प्रिंटिग की व्यवस्था है।
8. MS word में html में Export कर E-Mail भेजने की सुविधा इस साॅफ्टवेयर में है।

9. सभी विद्वान अपने लिये अपने तरीके से या अपने अनुकूल साॅफ्टवेयर बनवाने के लिये भी सम्पर्क कर सकते हैं।

10. प्रिंट की जाने वाली सभी रिर्पोट में सम्पर्क स्थान पर, प्रयोग कर्ता अपना नाम डाल सकता है, यह सुविधा साॅफ्टवेयर में User management के रूप में उपलब्ध है।

11. Numerology पर आधारित इस Keero Gold साॅफ्टवेयर में जातक के जन्म विवरण को Save करने की सुविधा और भविष्य में किसी भी समय उस विवरण को प्रयोग में लाने की सुविधा भी उपलब्ध है।

Numerology पर आधारित सॉफ्टवेयर का मूल्य 6000/- Rs. है। विशेष छूट के साथ यह सॉफ्टवेयर अभी केवल 4500/- में उपलब्ध है।

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अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

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ज्योतिष या अंधविश्वास ?

ज्योतिष अंधविश्वास नहीं, विज्ञान है :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

अनेक लोग कुण्डली दिखाते समय प्रश्न करते हैं कि क्या मेरी किस्मत ही खराब है, कब और कैसे अच्छे दिन आयेंगे? अर्थात अच्छे के लिये अच्छी किस्मत या भाग्य का योगदान जरूरी है। दूसरी तरफ बहुत से लोग हैं, जो किस्मत जैसी किसी चीज को स्वीकार ही नहीं करते। और उनका कहना है कि जो कुछ मिलता है, कर्म करने से ही मिलता है। वास्तव में देखा जाए तो दोनों ही बातें सही हैं। एक तरफ कर्म का चक्र चल रहा है, और दूसरी ओर जीवन चक्र। कर्म चक्र वो चक्र है जिसमें मनुष्य कर्म करता है और कर्म का कुछ फल मिल जाता है, और शेष कर्मफल भविष्य काल के लिए संचित हो जाता है, क्योंकि उस समय कर्मफल के लिए उचित समय या वातावरण उपलब्ध नहीं होता। इस लिए भविष्य में जब भी उस कर्मफल को उचित वातावरण मिलता है, उसी समय वह कर्मफल अंकुरित होकर पोधा और फिर वृक्ष बनकर अपना फल देेेने लगता है।

भाग्य या किस्मत क्या है? :- भाग्य का अर्थ यह है, बिना परिश्रम किये सुख के साधन मिलना। भाग्य या किस्मत संचित कर्म से बनता है, कर्म के बाद हर कर्म का फल न भोग पाना इसका कारण है, जीवन चक्र सीमित वर्ष का होता है। मित्रो हम जो भी कर्म करते हैं, प्रकृति उस कर्म की प्रतिक्रिया करती है, इसी को कर्मफल कहते हैं। “क्रिया की प्रतिक्रिया” या कर्म और कर्म का फल एक ही बात है।

इस प्रकार मनुष्य अपने जीवनकाल में कुछ कर्मों का फल इस जीवन तथा शेष कर्मों का फल पुनर्जन्म प्राप्त होने पर ही भोग पाता है।

एक तरफ मनुष्य कर्म करता है, दूसरी ओर भाग्य (कर्मफल) भोगता है। अर्थात् कर्म भी करता चला जाता है, दूसरी और भाग्य का भोग भी भोगता रहता है। इस लिये मनुष्य यदि भाग्य को जानकर कर्म करे तभी हर प्रकार से सफल जीवन व्यतीत कर सकता है।

मेरा अपना विचार है कि चांद तारों से हम और चांद तारे हमसे प्रभावित होते हैं, क्योंकि प्रभाव कभी एक तरफा नहीं होता। सूर्य पर दाग दिखाई पड़ते हैं और तूफान उठते हैं, या धरती पर बीमारियाँ फैलती हैं। विश्वास करो एक छोटा सा तिनका भी सूर्य को या किसी भी ग्रह को प्रभावित करता है और सूर्य भी तिनके को प्रभावित करता है। यहाँ छोटा-बडा कोई नहीं, एक आॅरगनिक यूनिटी है। आप देखें परमाणु है, परमाणु से भी सूक्ष्म कुछ है, उसका एक प्रभाव है। सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा है, अजुड़ा कुछ भी नहीं। हम हर समय एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं, सड़क पर पड़ा हुआ पत्थर भी। हर अणु-परमाणु का एक-दूसरे से पक्का रिश्ता है। इस संयुक्त सृष्टि का बोध यदि हो जाये तभी ज्योतिष और इसका महत्व समझ आ सकता है।

ज्योतिष:- (ज्योति+ईश= ज्योतिष) विज्ञान से बढ़कर पराविज्ञान है, कैसै? आईये मैं बताता हूँ – सभी जानते हैं की ज्योतिष ग्रह-नक्षत्रों की विद्या है। ईसके तीन स्तम्भ (भाग) हैं, प्रथम भाग सिद्धांत जिसे ज्योतिषीय गणना कहा जा सकता है। दूसरा भाग संहिता जिस के सिद्धांत समझकर विद्वान पृथ्वी पर घटने वाली किसी भी भौगोलिक तथा राष्ट्रीय (किसी भी देश या विश्व में घटने वाली राजनैतिक) भविष्यवाणीयां कर सकता है। तीसरा और महत्वपूर्ण भाग “होरा” है, जिसका विशेषज्ञ विद्वान जातक के जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति (जन्मकुण्डली) को देखकर भविष्यवाणी (फलादेश) करता है। जन्मकुण्डली का फलादेश करने वाला विद्वान किसी भी व्यक्ति की कुण्डली देखकर उसके भूत-भविष्य और वर्तमान तीनो काल में घटित तथा घटने वाली घटनाओं का विवरण बता सकता है। केवल इतना ही नहीं इस के गहन अध्ययन व अभ्यास से पूर्व जन्म, वर्तमान तथा पुनर्जन्म के विषय में भी संकेत मिलते हैं।

क्या आज विज्ञान के युग में अभी तक भी ज्योतिष के अतिरिक्त कोई पद्धति है, जो भूत-भविष्य तथा वर्तमान तीन काल की जानकारी देती हो ? आधुनिक विज्ञान केवल भौतिक जगत के बारे में जानकारी दे सकता है। सूक्ष्म जगत में तो इसने अभी प्रवेश ही नहीं किया। जबकी वेदों की इस विद्या (ज्योतिष) के रचनाकार हमारे पूर्वज ऋषियों ने सूक्ष्म जगत में न केवल प्रवेश किया बल्कि सूक्ष्म जगत के करोड़ो रहस्यों को जाना समझा और उनके सिद्धांतों सहित हजारों रहस्यों को ग्रन्थों में लिखकर आगे की पीढियों को लाभान्वित किया है। आत्मा से परमात्मा का सम्बंध, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और विनाश के रहस्य, हर ग्रह-नक्षत्र का मनुष्य या धरती पर पढने वाला प्रभाव, खगोलिक घटनाओं तथा ग्रहणादि के सिद्धांत वेदों के रूप में हमें सौंप गये। वेद की 6 विद्याओं में एक महत्वपूर्ण विद्या ज्योतिष है, यह विद्या भौतिक और सूक्षम (लौकिक-पारलौकिक) दोनों के रहस्य अपने भीतर समेटे हुये है। इसी लिये यह विद्या विज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण (अलौकिक) है।

जैसी इंसान की सोच होती है, उसी तरह उसका नजरिया (दृष्टि) हो जाती है। जैसे- काम भाव दृष्टि, प्रेम दृष्टि, क्रोध की दृष्टि, लोभ दृष्टि, मोह दृष्टि, ईर्ष्या दृष्टि, विद्वेष दृष्टि प्रमाद तथा अहंकार दृष्टि। (उसकी आंखें दूसरे को वैसे ही भाव से देखती हैं, जैसा उस का नजरिया होता है) किसी के नेत्र हमें किस भाव से देख रहे हैं ? यह आसानी से पहचाना जा सकता है। जिन्हें पहचान नहीं होती वे यदि इस के लिये थोड़ा ध्यान (एकाग्रता) या अभ्यास करें तो जरूर पहचान होने लगेगी। यह तो हुई आंखो की भाषा। इस प्रकार मनुष्य किसी के नेत्रों की भाषा को समझ कर (जो उसने समझा) उसके अनुसार वह भी प्रतिक्रिया करता है। यह हुई क्रिया की प्रतिक्रिया। अर्थात् – सोच भी एक कर्म है, और प्रतिक्रिया उस कर्म का फल है। अब प्रश्न यह है, कि इंसान की सोच कैसे बनती है? उसे कौन बनाता है? 1. हालात?, 2. ईश्वर या प्रकृति?, या 3. वह स्वयं? इस पर फिर किसी समय चर्चा करूँगा। सिद्धांत तथा सत्य के अनुसार भूत-प्रेत योनि का अस्तित्व भी है, और वह सक्रिय भी होते हैं। परंतु इतना अवश्य है कि भूत-प्रेतों के नाम से जितनी बातें कही जाती हैं, उनमें सभी बातें सचमुच भूत-प्रेतों की नहीं होती। कुछ काल्पनिक भी होती हैं, और कुछ मनोविकार से ग्रस्त रोगीयों के रोग के कारण होती हैं, कुछ मानसिक दुर्बलताओं के कारण भी होती हैं। कुछ तो ढोंग तथा कुछ भोले-भाले लोगों को ठगने के उद्देेश्य से दिखावा अथवा जादूगरी के खेल के रूप में होती हैं। वस्तुत: चित्त पर पड़ने वाले संस्कार अपने अनुरूप कार्य करने के लिये ललचाते हैं। और ललचा जाने वाला मनुष्य पराधीन बन जाता है।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणेः कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

भावार्थ- वास्तव में हमारे सब प्रकार के कर्म प्राकृतिक गुणों द्वारा किये जाते हैं, परंतु अहंकार से मूढ़ बना मनुष्य मानता है कि मैं ही करता हूँ।

कर्म का सिद्धांत :- सभी जानते हैं- मनुष्य जन्म के बाद (जब से उसे समझ अाती है) से मृत्यु तक “कर्म” करता रहता है। इन्हीं कर्मों को “क्रियमाण कर्म” कहते हैं। अर्थात् मनुष्य के जीवनकाल में जो-जो कर्म किये जाते हैं, वे सभी क्रियमाण कर्म ही कहलाते हैं। यह हुये प्रथम प्रकार के कर्म। द्वितीय प्रकार के कर्म “संचित कर्म” कहलाते हैं, क्रियमाण कर्म जो रोज हुआ करते हैं, में से ही कुछ कर्मों का फल तो भोग लिया जाता है, और शेष प्रतिदिन मन में इकट्ठा होते रहते हैं, इस प्रकार मन रूपी गोदाम में एकत्र हुये कर्मों को संचित कर्म कहा जाता है। जैसे हम प्रतिदिन एक-एक रूपया गोलक में डालते जायें और सालभर के बाद गोलक खोलें तो उसमें जो रूपया निकलेगा वह सब एक वर्ष का संचित धन कहलायेगा। कर्म का एक तीसरा प्रकार “प्रारब्ध कर्म” है, मनुष्य के मन (मस्तिष्क का एक भाग) में अनेक जन्मों के संचित ढेर-के-ढेर कर्म पड़े रहते हैं। मन में जन्म-जन्मांतरों के कर्मों का इतना बड़ा खजाना जमा है कि सृष्टि के अंत तक भी समाप्त नहीं होता। इन्में मनुष्य के जीवनांत में जो कर्म भावी जन्म के लिये परिपक्व हो जाते हैं, उन्हीं कर्मों का फल भोगने के लिये जीव को उसी अनुरूप एक नया जन्म मिलता है। इस प्रकार कालभेद से मनुष्य द्वारा किये जाने वाले कर्म के तीन भेद हुये। 1. क्रियमाण कर्म, 2. संचित कर्म, और 3. प्रारब्ध कर्म। सभी कर्मफल जब तक भोग नहीं लिये जाते तब तक वे नष्ट नहीं होते। वैदिक दर्शनों के अनुसार आत्मा कभी नष्ट नहीं होती, अर्थात्‌- आत्मा अमर है। मनुष्य के शरीर में रहते हुये कर्मबंधन के प्रभाव वश यह परतंत्र, दुःखी, जन्म-मृत्यु एवं जरा (वृद्धावस्था) से युक्त प्रतीत होती है। निष्क्रिय होकर भी आत्मा सक्रिय, स्वतंत्र होते हुये भी परतंत्र, वशी होते हुये भी दुःखदायक भावों से आक्रांत, विभु या सर्वगत होते हुये भी सीमित, तथा निर्विकार होते हुये भी सुख-दुःख आदि विकारों का अनुभव करने लगती है। नित्य शुद्ध और बुद्ध आत्मा को इस स्थिति में लाकर खड़ा करने वाला कारण एकमात्र “कर्मानुबंध” है।किसी कार्य को करने के बाद अनिवार्य रूप से प्राप्त होने वाला परिणाम ही “कर्मानुबंध” है। वस्तुतः आत्मा की स्वतंत्रता या वशित्व केवल कार्य (कर्म) करने में है, परंतु कर्म करने के बाद उसके अपरिहार्य फल से वह अनुबंधित हो जाती है। इसका अर्थ है- कर्म करने या न करने के लिये आत्मा स्वतंत्र है, परंतु कर्म करने के बाद उसका फल भोगने के लिये स्वतंत्र नहीं है।

एक सच्ची बात कहता हूँ, बात तब की है, जब मेरी उम्र 20 से 30 के बीच रही होगी। उस काल में मैं ज्योतिष या ज्योतिष जैसी विद्याओं को नफरत की निगाह से देखा करता था। एेसा होना स्वाभाविक भी था, क्योंकि हर प्रकार से मेरा अच्छा दौर चल रहा था। हर तरफ इज्जत सम्मान भी था, आमदनी अच्छी थी इस लिये आत्मविश्वास की कमी नहीं थी, ईश्वर में आस्था बिलकुल भी नहीं थी, अपने हाथ-पैरों या स्वास्थ शरीर को महत्व देेता था, अपनेे मस्तिष्क तथा तर्कशक्ति से अधिक किसी को महत्व नहीं देता था। फिर कुछ एेसा होने लगा की बिना किसी विशेष कारण के कारोबार व आमदनी तेजी से कम होने लगी, क्योंकि खर्चे बढ चुके थे, उनपर लगाम लगाम ना लग पा रही थी, टेंशने बढती ही चली गई। अपने दूर होने लग गये, तो अपना मनोबल भी डगमगाने लगा, शरीर थका-थका सा रहता, तब मन में आता कोई अनजाना कारण जरूर है, जो दिखाई भी नहीं देता और सुझाई भी नहीं देता। बस सच पूछिए तो उसी दिन से मैं बनने लगा था “ज्योतिषी” और पहुंच गया एक पंडितजी के पास, उन्होंने मेरी कुण्डली बनाई और बताया तुम्हारी तो शनि की साढ़ेसाती चल रही है। मित्रो मैने जब पूछा कि क्या होती है साढ़ेसाती? और क्या होता है इसमें? पंडितजी बोले बस परेशानियाँ रहेंगी। हर क्यों का उत्तर नहीं मिला तो खरीद लाया ज्योतिष की पुस्तकें और लगा दिन-रात पढ़ने। 6-7 वर्ष अध्ययन करते-करते समझ में आने लगा कि क्यों होता है कष्ट, साढ़ेसाती में क्या बात है खास ? और सन 2000 में जब संस्कृत विश्वविद्यालय से मैने ज्योतिष की डिग्री प्राप्त कर स्वयं ज्योतिषी बन बैठा, और आज हजारों कुण्डलियां मेरी निगाहों से गुजर चुकी हैं, तब कभी-कभी मैं उस 20 से 30 की उम्र में अपने विचारों को याद करता हूँ, और महसूस करता हूँ कि यह सब नियति के खेल हैं। कुच्छ तो जन्मों-जन्मों के कर्म हैं, और कुच्छ पूर्व जन्मों की अधूरी इच्छायें या कहिये की अधूरी विद्यायें हैं, जो पीछा करती हैं।

यह आज के विज्ञान के साथ एक दुराग्रह है कि, इसने न केवल प्रत्यक्षवाद को सब कुछ माना है, साथ ही साथ उसी आधार पर हर विषय का प्रतिपादन भी आरम्भ कर दिया है। इस में कमी यह है कि, इस आधार पर हर अनैतिकता को निर्दोष ठहराया जा रहा है। धर्म और आध्यात्म के सिद्धांतों की अवहेलना चल पड़ी है, चरित्रहीनता तो साधारण बात या प्रगतिशीलता की पहचान बनने लगी है, इसका परिणाम क्या होगा? दूसरी ओर भोजन के लिये पशु हत्या! डर है, बात कभी यहाँ तक न पहुंच जाये कि बूढ़ी गाय या बूढ़े बैल की तरह बूढ़े माँ बाप को भी किसी कसाई खाने में पहुंचाने में लाभ न दिखाई देने लगे। आजकल अजन्मे बच्चों का माँस डिब्बाबंद भोजन के रूप में बिकने की खबर सुनकर रूह काँप उठती है। पशुमाँस का सेवन करते-करते मनुष्य में भी पशु स्वभाव का समावेश हो चला है। कभी मनुष्यों को भी एक पशु की तरह मान लिया गया या उस पर भी पशु जैसे अनुबंधों को लागू किया जाने लगा तब क्या होगा?

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प्रेमी-प्रेमिका और शुक्र

प्रेम और विलासिता का कारक शुक्र :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

प्रेमी-प्रेमिका में झगडे क्यों होते हैं? आईये इसका कारण ज्योतिष शास्त्र से जानते हैं- किसी भी जन्मकुण्डली में प्रेमी का स्थान पाँचवां होता है, जातक का अपना स्थान प्रथम स्थान है। अच्छी रिलेशनशिप तभी रह सकती है, जब प्रथम स्थान के स्वामी ग्रह और कुण्डली से पाँचवे स्थान के स्वामी ग्रह मित्र होंगे। यह तो हुई साधारण बात, अब यह भी देखना होगा की जातक की रिलेशनशिप से किसी दूसरे का हाजमा तो खराब नहीं हो रहा ? :- (रिलेशनशिप से प्राब्लम) कहीं वह गुप्त दुश्मनी तो नहीं निभा रहा ? यह पता चलेगा जातक की कुण्डली के पंचमेश की सेहत देखने से! पंचमेश की सेहत खराब करने के लिये कुण्डली के षष्ठेश या अष्ठमेश जिम्मेदार हो सकते हैं, अर्थात् पंचमेश षष्ठ या अष्ठम में नहीं होना चाहिए, अथवा षष्ठेश या अष्ठमेश के साथ नहीं होना चाहिए, या फिर षष्ठेश या अष्ठमेश पंचम में नहीं होना चाहिए। यह तो हुई बड़ी वजह, इसके अतिरिक्त एेसा भी हो सकता है की जातक का कोई सगा सम्बंधी ही इस खेल को बिगाड़ने में लगा हो।

वैवाहिक सुख का कारक ग्रह शुक्र :-

आज का युग बहुत तेज गति से शुक्र प्रधान हो रहा है, बेशक ज्योतिष के विद्वानों को मेरी यह बात कुछ अटपटी सी लगेगी। परंतु तथ्य यही बताते हैं कि बढ़ी तेजी से यह युग बदल रहा है। पहले एक छोटा सा उदाहरण प्रस्तुत है- आज से 50-100 वर्ष पूर्व लोग या तो पैदल यात्रा करते थे या फिर पशुओं का अथवा पशुओं द्वारा चलित वाहनों का प्रयोग करते थे। अर्थात् गुरू (जीव प्रधान) वाहन का प्रयोग किया जाता था। जो आज धीरे-धीरे करके आरामदायक (शुक्र प्रधान) वाहन ने ले ली है। पशुओं से चलने वाले वाहनों की जगह अब स्वचालित लग्जरी वाहनों ने ले ली है। इस प्रकार प्राणीयों का प्रतीक गुरू शीण हो गया है। दूसरा उदाहरण- एक जमाना था जब बड़ी-बूढी अपनी बहुओं को आशिर्वाद देती थी- “दूधों नहाओ पूतों फलो” आज इसमें से दूधों नहाओ तो ठीक है, परंतु “पूतों फलो” भला किस नवविवाहिता को पसंद आती है? इस आशिर्वाद का पूतों फलो वाला भाग भी गुरू का विभाग है। जो नवविवाहिता बहुओं को पसंद नहीं, क्योंकि अधिक संतान के लिये आज इस वर्ग के विचार बदल गये हैं, यहाँ भी गुरू निर्बल प्रतीत होता है। तीसरा उदाहरण- विद्वान, आचार्य व गुरू जो अपने प्रवचन के द्वारा समाज को धर्म के मार्ग पर चलने के लिये दिशा दिखाने का कार्य करते थे, आज इन्हें सुनने का समय किसके पास है, यदि गलती से कहीं आमना-सामना हो भी जाये तो आज की नई पीढ़ी उनसे जान छुडाना चाहते हैं। इसी प्रकार वह अध्यापक जिनके चरण छूकर विद्यार्थी मान-सम्मान करते थे, आज वह कितनी दयनीय स्थिति में हैं? यह अध्यापक एेसे शिल्पकार हैं, जिनसे शिक्षा पाकर विद्यार्थीकाल अपने और देश के भाग्य का निर्माण करने की ताकत रखते हैं, परंतु जिस गुरू ने उन्हें इस योग्य बनाया है। उस गुरू की कितनी इज्जत हो रही है? किसी से छिपा नहीं। क्या यह गुरू का बल कम नहीं हो रहा? दूसरी ओर शिक्षा का आधुनिकीकरण करती शिक्षण संस्थायें (शुुक्र) फल-फूल रही हैं। एक उदाहरण और देता हूँ- बच्चे जवान हो जायें तो आज कितने एेसे माता-पिता हैं जिन्हें कन्या के लिये वर और बालक के लिये वधु ढूडने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। माता-पिता द्वारा पसंद युवक के लिये युवती, तथा कन्या के लिये वर (गुरू बल) के स्थान पर आजकल लव मेरिज (शुक्र बल) का प्रचलन अधिक हो चला है। आध्यात्मिकता, सहनशीलता, विवेक, बुद्धिमत्ता तथा अध्ययनशीलता (गुरू) की जगह आज सुंदरता, विलासिता और अश्लीलता (शुक्र) ने ले ली है। अब आप ही बतायें पूर्वकाल में विश्वगुरू कहलाने वाला हमारा भारत आने वाले कुच्छ ही वर्षों में क्या कहलायेगा ?

प्रेम सम्बन्ध :-
अब देखते हैं, जन्म कुंडली मे कौन से एेसे योग होते हैं, जो प्रेम संबंध की सूचना देते हैं- कब ये शारीरिक सम्बन्ध स्तर पर भी होते है ? क्या कुण्डली में ऐसी स्थितियाँ भी है जो संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा तनाव भी देंगी ? क्या ये संबंध दुनियाँ से छिपे रह सकते है ? क्या प्रेम संबंधों में अलगाव (Break up) तो नही है ? क्या एक से अधिक भी प्रेम संबंध होंगे ? क्या प्रेम संबंध विवाह में परिणित होगें ? यह सब प्रश्न हैं आज के युवा वर्ग के।
भारतीय ज्योतिष पद्धति के द्वारा हम इन सभी स्थितियों को जन्म पत्रिका के माध्यम से देख सकते हैं ।और विश्लेषित भी कर सकते हैं, और उस समय विशेष की गणना भी कर सकते हैं । जब इनमे से कोई भी स्थिति हमारे जीवन मे घटित होगी ? आईये देखें जन्म पत्रिका में कौन सी स्थितियाँ बनाती है प्रेम संबंध ?- जन्म कुण्डली का पंचम भाव (5th house) हमारी कला कौशल के साथ प्रेम तथा भावनाओं का ओर दिल से किये गए कार्य का स्थान होता है । जन्म कुंडली मे चंद्रमा, शुक्र और मंगल प्रमुख ग्रह हैं, जो अपने आपसी सम्बन्धो के आधार पर व्यक्ति को एक विशेष आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करते हैं, तथा जातक को प्रेम करने को वशीभूत करते हैं। चंद्रमा मन का कारक है । जन्म पत्रिका में मजबूत चंद्रमा विचारों को शक्ति प्रदान करता है। मन में कल्पनाशीलता ओर भावनाएँ जगाता है, और जातक परम्पराओ को तोड़कर दुनिया की परवाह किये बगैर प्रेम के रास्ते पर आगे बढ़ता है, जब कुण्डली में चंद्रमा का संबध किसी भी प्रकार से शुक्र से होता है तो, व्यक्ति प्यार में कल्पनाओ की उड़ान भरता है, और शीघ्र ही विपरीत लिंग की तरफ आकर्षित हो जाता है।

जन्म कुंडली में मंगल + शुक्र का संबंध जब जन्म कुंडली में 1, 2, 3, 5, 7, 11,12 भावो में बनता है, तब व्यक्ति आकर्षण का केंद्र होता है, और साथ ही स्वयं भी विपरीत लिंग की ओर शीघ्र आकर्षित होता है।जन्म कुंडली में जब इन स्थितियों के साथ पंचम भाव तथा पमचमेश से संबंध बनाने वाले किसी भी ग्रह की अथवा चंद्रमा, शुक्र, मंगल से संबंधित दशाएँ अन्तरदशाएँ आती हैं तो, जातक प्रेम करता है ।

जब पंचम भाव अथवा पंचमेश का शुभ संबंध केंद्र त्रिकोण से अथवा एकादश भाव (11th house) से शुभ भावों में होता है तो, ये सच्चा ओर आदर्श प्रेम संबध होता है । यदि इन संबंधों में द्वादश भाव भी सम्मलित हो जाता है तो, ये प्रेम शारीरिक स्तर पर भी प्रकट हो जाता है। जब इन सम्बन्धो में द्वादश भाव के साथ अष्टम भाव या अष्टमेश सम्मलित होता है तोे, संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा, तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है । जब प्रेम संबंधों में सप्तम भाव अथवा सप्तमेश का समावेश होता है तो, ये संबंध अन्य स्थितियों के सकारात्मक होने पर प्रेम विवाह में परिणित हो जाते हैं। शुभ गुरु और शनि प्रेम संबंधों ओर विवाह की स्थितियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां तक कि इनसे गुरु का सबंध कभी भी प्रेम संबंधों को दुनियां के समक्ष उजागर तक नही होने देता ।

सभी वर्ग कुंडलियों, अष्टक वर्ग, ग्रहो के किसी विशेष बल, कुण्डली में बने विशेष संबंधों ओर योगायोगों का, संबंधित शुभ अशुभ दशाओं अन्तरदशाओं, संबंधित शुभ अशुभ गोचर का गहन अध्ययन तथा विश्लेशण करने के बाद ही कहा जा सकता है कि – प्रेम संबधो का कोई दर्दनाक अंत होगा या ये संबंध विवाह के रूप में जीवन को महकाएँगे! जन्म कुंडली मे जैसा दिखता है वैसा कभी नही होता, और जो होता है वह तो बहुत ही गहराई में ही छिपा है, जिसे देख पाना गहन कुण्डली विश्लेषण से ही संभव होता है। कुछ आसान, आवश्यक तथा सही समय पर किये गए सही उपाय, कुछ जन्म पत्रिका के अनुसार सकारात्मक ग्रहों का सहयोग, और कुछ सही मार्ग का चयन और सही दिशा में किया गया परिश्रम। सुखी और खुशियों से भरा जीवन दे सकते हैं।

एक निश्चित आयु में प्रत्येक युवक अथवा युवती की उत्कृट इच्छा रहती है कि उसे अपने मनोनुकूल सुंदर जीवन साथी मिले। एेसे हार्दिक तथा प्रबल आकर्षण का मूल श्रोत संगीत, आदर्षवादिता, कला-क्रीड़ा-सौंदर्य एवं शारीरिक विधान तथा प्रसाधन में ही अंतर्निहित है। उत्तरोत्तर परिवर्तनीय सभ्यता संस्कृति के कारण हमारे देश में भी पाश्चात्य देशों की तरह परिवार की सम्मति अथवा स्वीकृति का महत्व समाप्त होता जा रहा है, युवक व युवतियों का दृष्टिकोण इस प्रसंग में दिनानुदिन लोचपूर्ण तथा उदार होता जा रहा है, अतः स्वजातीय विवाह arenge marriage की अपेक्षा अंतर्जातीय विवाह love marriage की ओर इनका रूझान होता जा रहा है। ज्योतिष शास्त्र की दृिष्टि से देखें तो ज्ञात होता है कि ज्योतिष भी इन बंधनों को नही मानता। इसका मूल कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन ग्रहों के मूलभूत सिद्धांतों पर निर्भर है। अतएव युवक-युवतीयों अथवा नर-नारियों के प्रेम विवाह Love marriage की भावी संभावनाओं का निरूपण प्रस्तुत करना मेरी इस पुस्तक “विवाह एवं दाम्पत्य सुख” का एक उद्देश्य है। विवाह एवं दाम्पत्य सुख (Marriage & Happy Married Life) हाल ही में प्रकाशित हुई नयी पुस्तक है। इस पुस्तक में विवाह सुख के योग, विवाह में क्यों विलम्ब marriage delay होता है? विवाह के लिये तथा विवाहित दम्पतियों के गृहस्थ सुख में बाधाओं का निवारण marriage Life problems and solutions बताया गया है। अभी तक मेरी 10 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन सभी की जानकारी http://www.shukracharya.com पर उपलब्ध है।

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