कैरियर

कैरियर अर्थात् आजीविका के साधन :-

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant)

Telephonic Astrological Appointment

जिस कैरियर में आप किस्मत आजमाना चाहते हैं, या जिस मंजिल को पाना चाहते हैं, आवश्यक नहीं वही आप के लिये सही हो, दुनिया में बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं, जो अपनी मनचाही मंजिल पा लेते हैं। बाकी लोगों को लाख कोशिश के बाद भी वह मंजिल नहीं मिलती। आखिर क्यों? इसका जवाब ज्योतिष शास्त्र में छिपा हैं। आपकी कुंडली के ग्रह यह बताते हैं कि आप किस क्षेत्र में उन्नति करेंगे ? और आपका भविष्य का कैरियर क्या होगा। कुंडली केवल आपका भविष्य ही नहीं बताती बल्कि आपका कार्यक्षेत्र भी बतलाती है, यदि कार्यक्षेत्र पहले से पता लग जाये तो उसी दिशा में प्रयास किया जा सकता है। कैरियर के विषय में सबसे अधिक महत्त्व कुंडली के दशम भाव को दिया जाता है। सभी ग्रंथ एकमत है कि आजीविका का विचार लग्न, चन्द्र और सूर्य में से जो बलवान हो, उससे दशम भाव में स्थित ग्रह के कारकत्व के अनुसार करना चाहिए। यदि दशम भाव में कोई ग्रह न बैठा हो तो, ऐसी स्थिति में दशमेश जिस ग्रह के नवांश में हो, उस ग्रह के अनुसार कार्यक्षेत्र का विचार करना चाहिए।

व्यावहारिक तौर पर देखने में आया है कि द्वितीय या एकादश भाव में यदि बलवान ग्रह बैठा है तो जातक को आजीविका क्षेत्र में सफल बनाने में अपनी भूमिका अदा करते हैं। सही व्यवसाय का चयन ही उज्ज्वल भविष्य का मानक होता है जो लोग अपने अनुकूल व्यवसाय का चयन नहीं कर पाते हैं, वो जातक इस लेख के सार को समझकर सही व्यवसाय का श्रीगणेश कर सकते हैं। सही समय पर सही फैसला ही सफलता का मूल मंत्र है। ग्रहों के आधार पर स्थिर कैरियर का निर्धारण करना वर्तमान युग के युवा वर्ग के लिए एक समस्या बनी हुई है। वैसे तो व्यवसाय के अनेक साधन हैं, यदि जातक के माता-पिता छात्र जीवन में ही उसकी जन्मपत्रिका एवं हाथ का अध्ययन कर उसके भावी व्यवसाय अथवा नौकरी से संबंधित तथ्यों का मनन-चिंतन कर उसे उसी के अनुकूल शिक्षा दिलवाते हैं तो, वह भविष्य में अधिक तीव्र गति से सही दिशा में सार्थक विकास कर समाज और परिवार का कल्याण कर सकता है।

विद्या के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए विद्वानों ने चतुर्थ और पंचम भाव को भी अत्याधिक महत्त्व दिया है, जिसमें द्वितीय भाव वाक्पटुता या वाणी की क्षमता को इंगित करता है। उच्च योगों के रहने से ही जातक शैक्षणिक क्षेत्र में आगे हो सकता है। लेकिन यदि इन योगों का अभाव हो तो शिक्षा में बाधा से रू-ब-रू होना अवश्यंभावी है। चतुर्थ स्थान उच्च शिक्षा और सुख को व्यक्त करता है। पंचम भाव का संबंध बुद्धि से है। इनके कारक ग्रह भी अनुकूल स्थिति में होने चाहिए द्वितीय भाव का कारक बृहस्पति है, चतुर्थ भाव का कारक चन्द्रमा और बुध हैं। पंचम का कारक भी बृहस्पति ग्रह है, द्वितीय भाव और द्वितीयेश यदि शुभ स्थिति में हों तो, जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करता है। यदि अष्टम में पाप ग्रह पड़ें तो, विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने का योग बनता है। महर्षि जैमिनी ने यह भी सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि द्वितीय और चतुर्थ की अनुकूल स्थिति जातक के विद्या प्राप्ति में आने वाली समस्त बाधाओं का शमन करती है। पंचम भाव शिक्षा से अधिक बुद्धि का स्थान है।

यदि द्वितीय भाव शक्तिहीन हो, लेकिन पंचम शुभ स्थिति में होने से कम शिक्षित व्यक्ति भी उन्नत मस्तिष्क का धनी होता है। उसके वार्तालाप के आधार पर उसकी शिक्षा का आंकलन करना गलत सिद्ध होता है।

पंचम और बृहस्पति व्यावहारिक शिक्षा में आनेवाली बाधाओं को दूर करने में सक्षम होता है। यदि द्वितीयेश और गुरु एक दूसरे से केन्द्र त्रिकोण में हों तो, अच्छी शिक्षा का संकेत हैं। शिक्षा समाप्ति के पहले कैरियर की चिन्ता सबको लगी रहती है। प्रतिदिन मेरे पास अस्थिर कैरियर को लेकर जातक आते रहते हैं। उसकी प्रमुख समस्या होती है कैरियर कैसा हो?
मैं इस लेख के माध्यम से युवा वर्ग की उन सभी समस्याओं का निदान दे रहा हूं। आप भी Telephonic Astrological Appointment द्वारा सलाह ले सकते हैं।

वस्तुत: जन्मकुंडली जातक के भावी जीवन का आईना है। इसकी सार्थकता तभी संभव है, जब हम इससे समुचित लाभ ले सकें। इसके द्वारा ऐसे कैरियर का चयन करें जिससे अर्थ लाभ ही नहीं बल्कि वह व्यवसाय पीढ़ी दर पीढ़ी उन्नति करे, शिखर पर अपना नाम रोशन करे। सेठ धीरू भाई अंबानी इसका उदाहरण हैं। नौकरी करें या व्यवसाय? स्थाई कैरियर कुंडली के ग्रहों के आधार पर चयन किया जाना चाहिए।

जन्मकुंडली के लग्न, दशम भाव, एकादश भाव, सप्तमभाव आदि के सर्वाधिक प्रबल भावेश अथवा उक्त भावों में स्थित ग्रह ही जातक के कैरियर का संकेत देते हैं। विभिन्न ग्रह किस कैरियर की ओर संकेत दे रहे हैं, वह प्रस्तुत लेख की विषय-वस्तु है। ग्रह और उनसे संबंधित कैरियर क्षेत्र निम्नलिखित है-

सूर्य:-
1. सरकारी सेवा विशेषरूप से प्रशासनिक सेवा।

2. विद्युत एवं उससे संबंधित संस्थानों में नौकरी अथवा विद्युत एवं उससे संबंधित वस्तुओं का व्यापार।

3. न्यूरोलाॅजी, नाक, कान, गला, हीमोटोलाॅजी, नेत्र चिकित्सक, अस्थिरोग, शल्य चिकित्सा इत्यादि विषयों चिकित्सक अथवा इन चिकित्साओं से संबंधित वस्तुओं का व्यापार, अस्पताल में नौकरी।

4. दवाइयों का व्यापार अथवा फार्मास्यूटिकल कंपनी में नौकरी।

5. जवाहरात का व्यापार अथवा जवाहरात से संबंधित संस्थान में नौकरी।

6. प्रयोगशाला वैज्ञानिक संस्थान, अनुसंधान केन्द्र एवं अविष्कार से संबंधित जलाधिपूर्ति विभाग, सिचाई विभाग इत्यादि में नौकरी।

7. नेतृत्व और संगठनकर्ता।

8. समुद्री व्यापार, जहाजरानी, जलापूर्ति विभाग, सिचाई विभाग इत्यादि में नौकरी।

9. तेल एवं गैस कंपनी में नौकरी अथवा इनका व्यापार।

10. राजनीति और कूटनीतिक राजनयिक।

11. सरकारी कार्यों के ठेकेदार।

चन्द्रमा:-
1. पशुपालन, पशुपालन से संबंधित संस्थानों में नौकरी, पशुओं एवं पशुपालन से संबंधित वस्तुओं का व्यापार, डेयरी, दूध, दही, घी, पनीर आदि का व्यापार अथवा डेयरी में नौकरी।

2. कृषि कार्य, खेती में काम आनेवाली वस्तुओं का व्यापार, भूमि से संबंधित अन्य कार्य, कृषि एवं सिंचाई से संबंधित विभागों और संस्थानों में नौकरी।

3. चाँदी के आभूषणों, बर्तन एवं वस्तुओं का व्यापार अथवा ऐसे व्यापारिक संस्थानों में नौकरी।

4. होटल, रेस्टोरेंट इत्यादि का व्यापार तथा इनमें नौकरी।

5. पर्यटन, ट्रेवल एजेन्सी में नौकरी।

6. लेखन, संपादन, प्रकाशन एवं पत्रकारिता अथवा इनसें संबंधित संस्थानों में नौकरी।

7. बर्फ की फैक्ट्री, चीनी की मिल, कागज की मिल, तेल मिल अथवा इनका व्यापार और इनमें नौकरी।

8. तरल एवं रसदार पदार्थों का निर्माण और व्यापार इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

9. एजेन्ट जैसे अन्य कार्य।

10. रत्न, उपरत्न एवं मणियों का व्यापार, निर्माण कार्य अथवा इनसे संबंधित अन्य कार्य अथवा ऐसे कार्य करने वाले संस्थानों में नौकरी।

11. नृत्य, संगीत, अभिनय, फिल्म, चित्रकला, कविता, कहानी इत्यादि से संबंधित लेखन अथवा इन सबसे संबंधित अन्य कार्य अथवा इनसे संबंधित वस्तुओं का निर्माण और व्यापार अथवा इस प्रकार के संस्थानों में नौकरी।

12. मनोचिकित्सा, हृदयरोग, यूरोलाॅजी, न्यूरोलाॅजी, हीमोटोलाॅजी नेत्र चिकित्सा इत्यादि विषयों में चिकित्सक अथवा इनसे संबंधित वस्तुओं का निर्माण और व्यापार तथा संबंधित संस्थानों में नौकरी।

13. आर्किटेक्चर एवं इससे संबंधित अन्य कार्य।

14. जहाजरानी तथा समुद्री जहाजों से व्यापार अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

मंगल:
1. सेना और पुलिस विभाग में नौकरी अथवा इन जैसे अन्य कार्य।

2. ज्योतिष, धर्म, दर्शन, अध्यात्मक एवं अन्य पराविद्याओं से संबंधित व्यवसाय।

3. नेतृत्व एवं संगठनकर्ता के कार्य।

4. ताँबा आदि धातुओं एवं इनसे बनने वाले उपकरणों का उत्पादन और व्यापार।

5. खान, रेल एवं वन विभाग में नौकरी अथवा इन विषयों से संबंधित कार्य।

6. राजनीति एवं कूटनीति तथा विदेशी विभाग में नौकरी।

7. वकील, कानून एवं न्याय से संबंधित कार्य।

8. अग्नि से संबंधित कार्य।

9. केमिकल, मैकेनिकल, माईंस, इलेक्ट्राॅनिक, एग्रीकल्चर आदि विषयों में इंजीनियरिींग अथवा निपुणता।

10. त्वचा रोग, उदर रोग, रक्त विकार, नेत्र रोग, विषजनित रोग, यूरोलाॅजी, नाक-कान-गले से संबंधित अन्य कार्य।

11. औषधि निर्माण, विक्रेता अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

बुध:-
1. लेखन, संपादन, प्रकाशन, पुस्तक विक्रेता, लाइब्रेरी, प्रिटिंग प्रेस, पत्रकारिता इत्यादि से संबंधित कार्य तथा इस प्रकार के कार्यो को करने वाले संस्थानों में नौकरी।

2. दूरसंचार विभाग में नौकरी अथवा तार, कोरियर, डाक, टेलीफोन, रेडियो, दूरदर्शन, टी.वी. मोबाइल इत्यादि के निर्माण, विक्रय एवं अन्य कार्यों से संबंधित संस्थाओं का संचालन अथवा नौकरी।

3. आर्थिक विभाग, एकाउंटस विभाग, वाणिज्य विभाग, बीमा विभाग, बैंक अथवा फाइनेंस कंपनी में नौकरी, सी.ए. अथवा इनसे संबंधित कार्य।

4. ज्योतिष हस्तरेखा एवं पराविद्याओं से संबंधित कार्य।

5. व्यापार और राजनीति।

6. विज्ञान, प्रयोगशाला, अनुसंधान एवं अविष्कार अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

7. त्वचा रोग, नाक-कान-गला रोग, श्वास संबंधी रोग (अस्थमा, टी.बी. आदि), न्यूरोलाॅजी आदि से संबंधित चिकित्सक अथवा चिकित्सा के अन्य कार्य।

8. दूरसंचार सिविल, आर्किटेक्चर आदि में इंजीनियरिंग अथवा इस प्रकार के अन्य वास्तु के कार्य।

9. ट्रेवल एजेन्सी, ट्रांसपोर्ट कंपनी आदि का संचालन अथवा इस प्रकार के संस्थानों में नौकरी, चालक और परिचालक बनता है।

गुरु:-
1. शिक्षण संस्थानों का संचालन, व्याख्याता, शिक्षा से संबंधित अन्य संस्थान, शिक्षा एवं शिक्षा से संबंधित संस्थानों में नौकरी।

2. दार्शनिक, कथावाचक, धार्मिक उपदेशक अथवा इनसे संबंधित अन्य कार्य।

3. वकील, न्यायाधीश, न्यायालयों एवं न्याय विभाग में नौकरी, न्यायालयों में प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं का व्यापार तथा कानून एवं न्याय से संबंधित अन्य कार्य।

4. पुलिस विभाग अथवा संबंध विभागों में नौकरी और इनसे संबंधित अन्य कार्य।

5. बैंक अथवा फाइनेंस कंपनी का संचालन, ऐसे संस्थानों में नौकरी और ब्याज पर धन देना।

6. मैनजेजर अथवा मैनजमेंट से संबंधित अन्य कार्य।

7. सेल्समैन, एजेन्ट और कमीशन पर आधारित अन्य कार्य तथा व्यापार।

8. विज्ञापन एजेन्सी, विज्ञापन निर्माण, माॅडलिंग अथवा अन्य कार्य।

10. मंत्री, राजदूत, राजनेता और कार्य।

11. जलीय यात्रा अथवा व्यापार अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

12. विज्ञान, प्रयोगशाला, अनुसंधान एवं अविष्कार अथवा इनसे संबंधित कार्यों में संलग्नता।

13. कृषि, सिंचाई, आॅटोमोबाइल, टेक्सटाइल्स आदि विषयों में इंजीनियर या इंजीनियर जैसे अन्य कार्य।

14. त्वचा, रक्त, उदर, गुप्तरोग, आनुवांशिकी, गायनोकोलाॅजी, नाक-कान-गला, हृदय रोग से संबंधित अथवा दवाइयां और उपकरण के विक्रेता भी हो सकते हैं।

शुक्र:-
1. विलासितापूर्ण वस्तुओं का उत्पादन, व्यापार अथवा ऐसे कार्य करने वाले संस्थानों में नौकरी।

2. आभूषण, वस्त्र, वस्त्र डिजाइनर, माॅडलिंग, सौन्दर्य प्रसाधन, इत्र और अन्य सुगंधित वस्तुएं, घड़ियां, पुष्य, पेंटिंग जैसी वस्तुओं का उत्पादन और विक्रय अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

3. पर्यटन विभाग में नौकरी तथा होटल, रेस्टोरेंट आदि का संचालन अथवा इनमें नौकरी।

4. नृत्य, संगीत, फोटोग्राफी, चित्रकला, फिल्म, अभिनय इत्यादि क्षेत्रों में निपुणता अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी अथवा इनमें प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं का उत्पादन और व्यापार।

5. इंटीरियर डेकोरेशन, टेन्ट हाउस, लाइट डेकोरेशन इत्यादि से संबंधित कार्य।

6. लेखन एवं प्रकाशन से संबंधित व्यापार अथवा इनसे संबंधित संस्थान में नौकरी।

7. विदेश व्यापार, विदेशी बैंकों में विदेशी मुद्रा विनिमय में कार्य।

8. टेक्सटाइल्स, फूड प्रोसेसिंग, आर्किटेक्चर आदि विषयों में इंजीनियरिंग या विशेषज्ञता।

9. गायनोकोलाॅजी, आनुवंशिकी, रक्त एवं गुप्तरोग, नाक-कान-गला रोग, फेफड़े एवं श्वास नली से संबंधित रोग, नेत्र रोग, यूरोलाॅजी उदर रोग आदि से संबंधित चिकित्सक अथवा ऐसी चिकित्सा से संबंधित अन्य कार्य।

10. राजनीति एवं न्याय से संबंधित क्षेत्र।

11. दर्शन, अध्यात्म एवं अन्य गूढ़ विज्ञान।

12. विज्ञान, प्रयोगशाला, आविष्कार एवं अनुसंधान तथा इनसे संबंधित कार्य तथा तांत्रिक कार्य कर भी अपना नाम रोशन कर सकता है।

शनि:-
1. मशीनों एवं लौह उपकरणों का निर्माण अथवा व्यापार का कार्य अथवा इस प्रकार के कार्यों संलग्न संस्थाओं में नौकरी।

2. कोयला और लकड़ी से संबंधित व्यायसाय।

3. न्याय विभाग अथवा न्यायालयों में नौकरी, न्यायाधीश एवं वकील जैसे व्यवसाय तथा न्यायालय से संबंधित अन्य कार्य।

4. पुलिस विभाग एवं जेल विभाग तथा अन्य सम्बद्ध विभागों में नौकरी अथवा इनसे संबंधित निजी कार्य।

5. लोहे की वस्तुएं, फर्नीचर, घड़ी, खेलकूद के समान, कृषि से संबंधित सामान आदि का उत्पादन एवं व्यवसाय अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।

6. स्थानीय स्वायत संस्थानों में नौकरी अथवा अन्य कोई पद निर्वाचन से प्राप्त करना।

7. खान-विभाग, भूगर्भ विभाग आदि में नौकरी खनिजों का व्यापार आदि।

8. खेलकूद एवं शारीरिक परिश्रम मजदूरी से संबंधित कार्य।

9. ज्योतिष, धर्म, अध्यात्म एवं अन्य पराविद्याओं से संबंधित कार्य।

10. मुर्गी पालन, बागवानी जैसे कार्य।

11. विभिन्न प्रकार की ठेकेदारी।

12. संगीत एवं शिक्षण से संबंधित कार्य।

13. मैकेनिकल, माईंस, सिविल इत्यादि विषयों में इंजीनियरिंग अथवा निपुणता।

राहु:-
1. ऐसे व्यवसाय जिनमें उतार-चढ़ाव अधिक आते है। जैसे शेयर, सट्टा, लाॅटरी, राजनीति आदि।

2. यात्रा से संबंधित नौकरी या व्यवसाय।

3. कम्प्यूटर एप्लीकेशन से संबंधित व्यवसाय अथवा नौकरी।

4. इलेक्ट्राॅनिक्स से संबंधित व्यवसाय अथवा नौकरी।

5. ओकल्ट साइंसेज अध्यात्म आदि से संबंधित व्यवसाय अथवा नौकरी।

6. अवैध अथवा अनैतिक प्रकार के व्यवसाय।

केतु:-
1. ऐसे व्यवसाय जिनमें उतार-चढ़ाव अधिक आते हैं। शेयर, सट्टा लाॅटरी, राजनीति आदि।

2. अवैध अथवा अनैतिक प्रकार के व्यवसाय।

राशियों से कैरियर :-

1. मेष- लोहा, चंदन, गोंद, औषधि, लाल रंग की वस्तुएं, सोना, वस्त्र, कम्बल आदि।

2. वृष- घी, सफेद रंग की वस्तुएं, दूध, जौ, नमक, बैल, चाँदी आदि।

3. मिथुन- चावल, बिनौला, जूट, उत्तरी राजस्थान में उत्पन्न बाजरा और गंवार, मोंठ कस्तूरी, हल्दी, समाचार पत्र, प्लास्टिक या रबर जनित वस्तुएं, मूंगफली आदि।

4. कर्क- प्याज, चाँदी, तेजपत्ता, मछली, पानी से उत्पन्न वस्तुएं, मोती शंख, पानी की बोतलें, सोडा, पेय पदार्थ, शराब, बीयर, केला, कमल के फूल आदि।

5. सिंह- चमड़ा, चना, गुड़, एंटीबाॅयटिक औषधियां, रेशेदार पदार्थ आदि।

6. कन्या- मकर, ग्वार, हरे रंग के सर्व पदार्थ, दूब लगाना, पुस्तकें असली मोंठ, अधोवस्त्र, गर्भनिरोधक आदि।

7. तुला- फिल्म रोल, सरसों, प्रसाधन, रूई, गेहूंँ, विलासिता की वस्तुएं, अरहर, केसर और रंग आदि।

8. वृश्चिक- तिल, पालतू पशु, हल्के हथियार, चीनी भवनादि खरीद-फरोख्त, मिठाई, कच्चा गन्ना, बीज आदि।

9. धनु- जल्दी खराब हो जाने वाली वस्तुएं फलों के रस सफेद खाद्यान्न, आलू लचीले पदार्थ, स्टेशनरी मोम आदि।

10. मकर- शीशा, वृक्षों या पौधों की जड़ों से निर्मित द्रव्य, कांसी, मोटरयान या गतिशील वस्तुएं आदि।

11. कुम्भ- सभी काले रंग की वस्तुएं काले उड़द और तिल, छोटे-छोटे सिक्कों का लेन देन विद्युतीय उपकरण एवं स्पेयर पाटर््स फूलों की सजावट और बेचना कम्प्यूटर और फ्लोपी, पानी में घोल कर पीये जा सकने वाले मादक पदार्थ पुस्तक लेखन और प्रकाशन आदि ।

12. मीन- समुद्र से प्राप्त जैविक खाद्य पदार्थ, मछली, हथियार, तेल, मोती, पुखराज, चिकित्सा में काम आने वाले उपकरण, टैंट ओर सजावट आदि इस तरह से आप अपने ग्रहों के आधार पर व्यापार कर समृद्धि प्राप्त कर सकते है।

ज्योतिष शास्त्र हमारे जीवन की भावी योजनाओं के लिए प्रमाणिक विज्ञान (विद्या) है, अत: कैरियर सम्बंधित मार्गदर्शन भी बेहतर मिल सकता है।

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सोमवती अमावस्या

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

सोमवती अमावस्या अर्थात्- सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को ही सोमवती अमावस्या कहते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार सोमवती अमावस्या बड़े भाग्य से पड़ती है। पांडव सोमवती अमावस्या के लिए तरसते रहे, लेकिन उनके जीवन में कभी सोमवती अमावस्या पड़ी ही नहीं। सोमवार का दिन भगवान चन्द्रमा को समर्पित दिन है। भगवान चन्द्रमा को ज्योतिष शास्त्र में मन का कारक माना गया है। अत: इस दिन अमावस्या पड़ने का अर्थ है कि यह दिन मन सम्बन्धी दोषों के समाधान के लिये अति उत्तम है। चूंकि हमारे शास्त्रों में चन्द्रमा को ही समस्त दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों का कारक माना जाता है, अत: पूरे वर्ष में एक या दो बार पड़ने वाले इस दिन का बहुत महत्व है। विवाहित स्त्रियों द्वारा इस दिन अपने पतियों के दीर्घायु की कामना के लिए व्रत का विधान है।

सोमवती अमावस्या एक पर्व के रूप में जाना और माना जाता है, यह कल्याणकारी पर्वो में से एक है, लेकिन सोमवती अमावस्या को अन्य अमावस्याओं से अधिक पुण्य कारक मानने के पीछे भी शास्त्रीय और पौराणिक कारण हैं। सोमवार को भगवान शिव और चंद्रमा का दिन कहा गया है। सोम यानि चंद्रमा! अमावस्या और पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का सोमांश यानि अमृतांश सीधे पृथ्वी पर पड़ता है। शास्त्रों के अनुसार सोमवती अमावस्या पर चंद्रमा का अमृतांश पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पड़ता है।

अमावस्या अमा+वस्या दो शब्दों से मिलकर बना है। शिव महापुराण में इस संधि विच्छेद को भगवान शिव ने माता पार्वती को समझाया था। क्योंकि सोम को अमृत भी कहा जाता है, अमा का अर्थ है एकत्र करना और वस्या वास को कहा गया है। यानि जिसमें सब एक साथ वास करते हों वह अमावस्या अति पवित्र सोमवती अमावस्या कहलाती है। यह भी माना जाता है की सोमवती अमावस्या में भक्तों को अमृत की प्राप्ति होती है।

निर्णय सिंधु व्यास के वचनानुसार इस दिन मौन रहकर स्नान-ध्यान करने से सहस्र गोदान का पुण्य फल प्राप्त होता है। हिन्दु धर्म शास्त्रों में इसे अश्वत्थ प्रदक्षिणा व्रत की भी संज्ञा दी गयी है। अश्वत्थ यानि पीपल वृक्ष। इस दिन पीपल कि सेवा-पूजा, परिक्रमा का अति विशेष महत्व है।

शास्त्रों के अनुसार में पीपल की छाया से, स्पर्श करने से और प्रदक्षिणा करने से समस्त पापों का नाश, अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति और आयु में वृद्धि होती है।

पीपल के पूजन में दूध, दही, मीठा,फल,फूल, जल,जनेऊ जोड़ा चढ़ाने और दीप दिखाने से भक्तों कि सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कहते हैं कि पीपल के मूल में भगवान विष्णु, तने में भगवान शिव जी तथा अग्रभाग में भगवान ब्रह्मा जी का निवास है। इसलिए सोमवार को यदि अमावस्या हो तो, पीपल के पूजन से अक्षय पुण्य, लाभ तथा सौभाग्य की वृद्धि होती है।

इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चन्दन इत्यादि से पूजा और वृक्ष के चारों ओर 108 बार धागा लपेट कर परिक्रमा करने का विधान होता है, और प्रत्येक परिक्रमा में कोई भी एक मिठाई, फल या मेवा चढ़ाने से विशेष लाभ होता है । प्रदक्षिणा के समय 108 फल अलग रखकर समापन के समय वे सभी वस्तुएं ब्राह्मणों और निर्धनों को दान करें। इस प्रक्रिया को कम से कम तीन सोमवती अमावस्या तक करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है और समस्याओं से मुक्ति मिलती है। इस प्रक्रिया से पितृदोष का भी समाधान होता है।

इस दिन जो स्त्री तुलसी व माता पार्वती पर सिन्दूर चढ़ाकर अपनी माँग में लगाती है, वह अखण्ड सौभाग्यवती बनी रहती है। आज के दिन महिलाएँ कपड़ा, गहना, बरतन, अनाज अथवा कोई भी खाने की वस्तु वस्तुयें दान कर सकती हैं, जिससे उनके जीवन में शुभता आती है, समाज में उनके परिवार का नाम होता है, यश मिलता है ।

जिन जातकों की जन्मपत्रिका में घातक कालसर्प दोष है, वे लोग यदि सोमवती अमवस्या पर चांदी के बने नाग-नागिन की विधिवत पूजा करके उन्हे नदीं में प्रवाहित कर दें, भगवान भोले भण्डारी पर कच्चा दूध चढ़ायें, पीपल पर मीठा जल चढ़ाकर उसकी परिक्रमा करें, धूप दीप जलाएं, ब्राह्मणों को यथाशक्ति दान दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद ग्रहण करें तो, उन्हें निश्चित ही कालसर्प दोष से छुटकारा मिलता है।

सोमवती अमावस्या को अत्यंत पुण्य तिथि माना जाता है। मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन किये गए किसी भी प्रकार के उपाय शीघ्र ही फलीभूत होते हैं। सोमवती अमावस्या के दिन उपाय करने से मनुष्यों को सभी तरह के शुभ फल प्राप्त होते हैं, अगर उनको कोई कष्ट है तो, उसका शीघ्र ही निराकरण होता है, और उस व्यक्ति तथा उसके परिवार पर आने वाले सभी तरह के संकट टल जाते हैं।

इस दिन जो मनुष्य व्यवसाय में परेशानियां से जूझ रहे हों, वे पीपल वृक्ष के नीचे तिल के तेल का दिया जलाकर और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:। मंत्र का जाप करें तो, उनके व्यवसाय में आ रही समस्त रुकावटें दूर हो जायेंगी। सोमवती अमावस्या के पर्व पर अपने पितरों के निमित्त पीपल का वृक्ष लगाने से जातक को सुख-सौभाग्य, संतान, पुत्र, धन की प्राप्ति होती है, और उसके समस्त पारिवारिक क्लेश समाप्त हो जाते हैं।

इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी विशेष महत्व समझा जाता है। कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य निश्चय ही समृद्ध, स्वस्थ और सभी दुखों से मुक्त होगा, ऐसी मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से पितरों कि आत्माओं को शांति मिलती है।

इस दिन पवित्र नदियों, तीर्थों में स्नान, ब्राह्मण भोजन, गौदान, अन्नदान, वस्त्र, स्वर्ण आदि दान का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन गंगा स्नान का भी विशिष्ट महत्त्व है। इस दिन यदि गंगा जी जाना संभव न हो तो प्रात:काल किसी नदी या सरोवर आदि में स्नान करके भगवान शंकर, पार्वती और तुलसी की भक्तिपूर्वक पूजा करें।

सोमवार भगवान शिव जी का दिन माना जाता है और सोमवती अमावस्या तो पूर्णरूपेण शिव जी को समर्पित होती है। इसलिए इस दिन भगवान शिव कि कृपा पाने के लिए शिव जी का अभिषेक करना चाहिए, या प्रभु भोले भंडारी पर बेलपत्र, कच्चा दूध ,मेवे, फल, मीठा, जनेऊ जोड़ा आदि चढ़ाकर ॐ नम: शिवाय का जाप करने से सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है।

मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन सुबह-सुबह नित्यकर्मों से निवृत्त होकर किसी भी शिव मंदिर में जाकर सवा किलो साफ चावल अर्पित करते हुए भगवान शिव का पूजन करें। पूजन के पश्चात यह चावल किसी ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को दान करें। शास्त्रों के अनुसार सोमवती अमवस्या पर शिवलिंग पर चावल चढ़ाकर उसका दान करने से अक्षय पुण्य मिलता है, माँ लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।

शास्त्रों में वर्णित है कि सोमवती अमावस्या के दिन उगते हुए भगवान सूर्य नारायण को गायत्री मंत्र उच्चारण करते हुए अर्घ्य देने से गरीबी और दरिद्रता दूर होगी। यह क्रिया आपको अमोघ फल प्रदान करती है ।

सोमवती अमावस्या के दिन 108 बार तुलसी के पौधे की श्री हरि-श्री हरि अथवा ॐ नमो नारायण का जाप करते हुए परिक्रमा करें, इससे जीवन के सभी आर्थिक संकट निश्चय ही समाप्त हो जाते हैं।

जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, वह यदि गाय को दही और चावल खिलाएं तो उन्हें अवश्य ही मानसिक शांति प्राप्त होगी। इसके अलावा मंत्र जाप, सिद्धि साधना एवं दान कर मौन व्रत को धारण करने से पुण्य प्राप्ति और भगवान का आशीर्वाद मिलता है।

इस दिन स्वास्थ्य, शिक्षा, कानूनी विवाद, आर्थिक परेशानियां और पति-पत्नी सम्बन्धी विवाद के समाधान हेतु किये गये उपाय अवश्य ही सफल होते है ।

इस दिन जो व्यक्ति धोबी, धोबन को भोजन कराता है, सम्मान करता है, दान दक्षिणा देता है, उसके बच्चो को कापी किताबे, फल, मिठाई, खिलौने आदि देता है, उसके सभी मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होते हैं।

इस दिन ब्राह्मण, भांजा और ननद को फल, मिठाई या खाने की सामग्री का दान करना बहुत ही उत्तम फल प्रदान करता है।

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