नारायण नागबली

नारायण नागबली (संतान बाधा निवारण हेतु पितृ दोष का प्रभावशाली उपाय):-

Dr.R.B.Dhawan astrological consultant, top Best Astrologer in Delhi,

नारायण नागबली छविनारायण नागबलि ये दोनो अनुष्ठान पद्धतियां संतान सुख की अपूर्ण इच्छा, कामना पूर्ति के उद्देश से किय जाते हैं, इसीलिए ये दोनो अनुष्ठान काम्य प्रयोग कहलाते हैं। वस्तुत: नारायणबलि और नागबलि ये अलग-अलग पूजा अनुष्ठान हैं। नारायण बलि का उद्देश मुखत: पितृदोष निवारण करना है। और नागबलि का उद्देश सर्प शाप, नाग हत्या का दोष निवारण करना है। इन में से केवल एक नारायण बलि या नागबलि अकेले नहीं कर सकते, इस लिए ये दोनो अनुष्ठान एक साथ ही करने पड़ते हैं।

पितृदोष निवारण के लिए ही नारायण नागबलि अनुष्ठान करने के लिये शास्त्रों मे निर्देशित किया गया है । प्राय: यह अनुष्ठान जातक के पूर्वजन्म के दुर्भाग्य संबधी दोषों से मुक्ति दिलाने के लिए किये जाते हैं। ये अनुष्ठान किस प्रकार व कौन इन्हें कर सकता है? इसकी पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है। ये अनुष्ठान जिन जातकों के माता पिता जिवित हैं, वे भी विधिवत सम्पन्न कर सकते हैं, यज्ञोपवीत धारण करने के बाद कुंवारा ब्राह्मण यह अनुष्ठान सम्पन्न करा सकता है। संतान प्राप्ति एवं वंशवृद्धि के लिए ये अनुष्ठान सपत्नीक करने चाहीयें। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी ये कर्म किये जा सकते हैं। यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पाचवें महीने तक यह अनुष्ठान किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये अनुष्ठान एक साल तक नही किये जाते हैं। माता या पिता की मृत्यु् होने पर भी एक साल तक ये अनुष्ठान करने निषिद्ध माने गये हैं।

दोनों प्रकार यह अनुष्ठान एक साथ और निम्नलिखित इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए किये जाते हैं :-

1. काला जादू के प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए।
2. संतान प्राप्ति के लिए।
3. भूत प्रेत से छुटकारा पाने के लिए।
4. घर के किसी व्यक्ति की दुर्घटना के कारण मृत्यु होती है (अपघात, आत्महत्या, पानी में डूबना) इस की वजह से अगर घर में कोई समस्याए आती है तो, उन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है।

संतान प्राप्ति के लिए :-
सनातन मान्यता के अनुसार प्रत्येक दम्पत्ती की कम से कम एक पुत्र संतान प्राप्ति की प्रबल इच्छा होती है, और इस इच्छा की पूर्ति न होना दम्पत्ती के लिए बहुत दुःखदाई होता है, हालांकि इस आधुनिक युग में टेस्ट ट्यूब बेबी जैसी उपचार पद्धतियां उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ जोड़ों की कमाई के हिसाब से यह बहुत खर्चीली होती हैं। इस लिये बहुत से लोग इन महेंगे उपचारों के कारण खर्च करने में समर्थ नहीं होते, और कुछ इस के लिए कर्जा लेते हैं, लेकिन जब कभी इस महेंगे उपचारों का भी कोई लाभ नहीं होता, तब यह जोड़े ज्योतिषीयों के पास जाते हैं, और एक अच्छा अनुभवी ज्योतिषी ही इस समस्या का समाधान और उपचारों की विफलता का कारण बता सकता है।

शास्त्र कहते हैं :- जहां रोग है, वहां उपचार भी है। इसी नियम को ध्यान में रखते हुऐ हमारे पूर्वज ऋषियों ने इन समस्याओं के समाधान हेतु ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशेष उपाय सुझाए हुए है, सब से पहेले ज्योतिषी यह देखते हैं की इस की पीड़ित दंपति की जन्म कुंडली में संतान प्राप्ति का योग है या नहीं? अगर है, तो गर्भधारण करने में समस्या का कारण क्या है? जैसे की पूर्व जन्म के पाप, पितरों का श्राप, कुलविनाश का योग, इनमें से कोई विशेष कारण पता चलने के बाद वह उस समस्या का निराकरण सुझाते खोजते हैं। इन उपायों में से नारायण नागबली सर्वश्रेष्ठ उपाय माना जाता है। यदि यह अनुष्ठान उचित प्रकार से और मनोभाव से किया जाए, तो संतानोत्पत्ति की काफी संभावनाए हो जाती हैं।

भूत-प्रेत बाधा के कारण संतानोत्पत्ति में रूकावटें :-
कोई स्थाई अस्थाई संपत्ति जैसे के, घर जमीन या पैसा किसी से जबरन या ठग कर हासिल की जाती है तो, मृत्यु पश्चात् उस व्यक्ति की आत्मा उसी संपत्ति के मोह रहती है, उस व्यक्ति को मृत्यु पश्चात् जलाया या दफनाया भी जाए तो भी उस की इच्छाओं की आपूर्ति न होने के कारण उस की आत्मा को माया से मुक्ति नहीं मिल पाती, और वह आत्मा प्रेत योनी में भटकती है, और उस के पतन के कारण व्यक्ति को वह पीड़ा देने लगती है, यदि किसी शापित व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उसकी अंतेष्ठि विधि शास्त्रों अनुसार संपन्न न हो, या श्राद्ध न किया गया हो, तब उस वजह से उस से सम्बंधित व्यक्तिओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि– संतति का आभाव, यदि संतान होती भी है, तो उस का अल्प जीवी होना
संतति का ना होना ही है।

1. काफी कष्टों के बावजूद आर्थिक अड़चनों का सामना करना
खेती में नुकसान।
2. व्यवसाय में हानि, नौकरी छूट जाना, कर्जे में डूब जाना,
परिवार में बिमारीयाँ।
3. मानसिक या शारीरिक परेशानी, विकलांग संतति का जन्म होना, या अज्ञात कारणों से पशुधन का विनाश।
4. परिवार के किसी सदस्यों को भूत बाधा होना।
5. परिवार के सदस्यों में झगड़े या तनाव होना।
6. महिलाओं में मासिक धर्म का अनियमित होना, या गर्भपात होना।
ऊपर लिखे हुये सभी या किसी भी परेशानी से व्यक्ति झूंज रहा हो तोतो, उसे नारायण-नागबली करने की सलाह दी जाती है।

श्राप सूचक स्वप्न :-
कोई व्यक्ति यदि निम्नलिखित स्वप्न देखता है, तो वह पिछले या इसी जन्म में श्रापित होता है :-
1. स्वप्न में नाग दिखना, या नाग को मारते हुवे दिखना, या टुकड़ो में कटा हुवा नाग दिखना।
2. किसी ऐसी स्त्री को देखना, जिसके बच्चे की मृत्यु हो गई है, वह उस बच्चे के प्रेत के पास बैठ कर अपने बच्चे को उठने को कह रही है, और लोग उसे उस प्रेत से दूर कर रहे है।
3. विधवा या किसी रोगी सम्बन्धी को देखना।
4. किसी ईमारत को गिरते हुए देखना।
5. स्वप्न में झगड़े देखना।
6. खुद को पानी में डूबते हुये देखना।
इस प्रकार के स्वप्नों से मुक्ति पाने के लिए नारायण-नागबली अनुष्ठान किया जाता है। धर्मसिंधु और धर्मनिर्णय इन प्राचीन ग्रंथो में इस अनुष्ठान के विषय में लिखा हुआ है।

दुर्मरण :-
किसी भी प्रकार से दुर्घटना यदि मृत्यु का कारण हो, और अल्पायु में मृत्यु होना दुर्मरण कहा जाता है। किसी मनुष्य की इस प्रकार से मृत्यु उस मनुष्य के परिवार के लिए अनेक परेशानियों का कारण बनती है। निम्नलिखित कारण से आने वाली मृत्यु दुर्मरण कहलाती है :-

1. विवाह से पहले मृत्यु होना।
2. परदेस में मृत्यु होना।
3. गले में अन्न अटक कर श्वास रुकने से मृत्यु होना।
4. पंचक, त्रिपाद या दक्षिणायन काल में मृत्यु होना।
5. आग में जल कर मृत्यु होना।
6. किसी खतरनाक जानवर के हमले से मृत्यु होना।
7. छोटे बच्चे का किसी के हाथों मारा जाना।
8. पानी में डूब जाने से मृत्यु होना।
9. आत्महत्या करना।
10. आकाशीय बिजली गिरने या बिजली के झटके से मृत्यु।
यह सब कारण हैं, जिसके कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो, परिवार में आर्थिक, मानसिक वा शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं, इं परेशानियों को दूर करने के लिए परिजनों को नारायण-नागबली करवाने की सलाह दी जाती ।

——————————————————————————–

अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

Astrological products and astrology course के लिए विजिट कीजिए :- http://www.shukracharya.com

Advertisements

Astrology Course in Distance

SHUKRACHARYA

(Professional Astrological Course)

ज्योतिष/ज्योतिषीय पाठ्यक्रम पत्राचार से उपलब्ध –

परिचय- Shukracharya Astrological Research Centre, शुक्राचार्य (एस्ट्रोलाॅजिकल रिसर्च सेंटर) की स्थापना ज्योतिष जैसी वैदिक विद्याओं तथा अन्य भारतीय गूढ़ विद्याओं का विश्व स्तर पर प्रसार-प्रचार करने के उद्देश्य से Dr.R.B.Dhawan धवन द्वारा 1995 में की गई थीं, जिससे कि इस वैदिक विज्ञान वाले विषय की उपयोगिता का विश्वस्तर पर प्रकाश हो, और इसके उपयोग से मानवता की सेवा की जा सके।

संस्थान के मुख्य कार्यक्रम एवं उद्देशय:-
यह संस्थान प्राचीन वैदिक ज्योतिष vaidic astrology के आधार पर ज्योतिष विज्ञान में रूची रखने वाले जिज्ञासुओं को ज्योतिष विषय के पाठ्यक्रमों की सुविधा प्रदान करता है।

संस्थान के संस्थापक एवं मुख्य संचालक Dr.R.B.Dhawan जी हैं। ये अपनी टीम के साथ निरंतर अनुसंधान एवं शिक्षण कार्य में समर्पित भाव से कार्यरत हैं।

ज्योतिर्विद्या, हस्तरेखा-शास्त्र, अंक-शास्त्र, वास्तु शास्त्र, लाल किताब एवं ज्योतिषीय उपाय आदि विषयों की शिक्षा पत्राचार पाठ्यक्रम के माध्यम से उपलब्ध करवाई जा रही है।

पारम्परिक ज्योतिष एवं इससे जुड़ी अन्य सभी विद्याओं के ज्ञान को सुरक्षित रखने की दृष्टि से इन सभी अति विशिष्ट विद्याओं के अध्ययन अध्यापन की व्यवस्था करना संस्थान का मुख्य उद्देश्य है।

सम्पूर्ण भारतवर्ष में ज्योतिष विज्ञान के अध्यन अध्यापन हेतु क्षेत्रिय प्रशिक्षण केन्द्र खोलने का संकल्प। और उनके संचालन व देख-रेख हेतु क्षेत्रीय फ्रेन्चाईजी (सेंटर) आरम्भ करने का संकल्प है।

मुख्य केन्द्र (दिल्ली) तथा देश के सभी स्थानीय केन्द्रों में ज्योतिष तथा इस से सम्बंधित अन्य वैदिक विद्याओं की निरंतर कक्षाओं एवं शिक्षा (अध्यन अध्यापन) की व्यवस्था करवाना एक लक्ष्य है।

मुख्य केन्द्र (दिल्ली) तथा देश के सभी स्थानीय केन्द्रों में ज्योतिष तथा इस से सम्बंधित अन्य वैदिक विद्याओं vaidic astrology की पत्राचार पाठ्यक्रम द्वारा शिक्षा (अध्यन अध्यापन) के लिये व्यवस्था करना उद्देश्य है।

निरंतर तथा पत्राचार द्वारा देश के अधिकांश शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में ज्योतिष पठ्यक्रम उपलब्ध करवाने का लक्ष्य है।

मासिक ज्योतिषीय पत्रिका (वर्तमान में AAP ka Bhavishya) तथा अन्य उपयोगी पुस्तकें एवं सम्बंधित विषयों के मौलिक ग्रंथ, भाष्य और अनुवाद आदि प्रकाशित करना निरंतर जारी है।

ज्योतिष विज्ञान की पाठ्य पुस्तकों तथा अन्य आधुनिक माध्यमों जैसे-इलैक्ट्रानिक मीडिया, साॅफ्टवेयर, मोबाईल एप, कैसेट या सी. डी. इत्यादि के माध्यम से शोध-निष्कर्षों और भारतीय विद्याओं की उपयोगी अनुसंधानात्मक सामग्री को प्रकाशित करना निरंतर जारी है।

उपरोक्त विषय के विद्वानों को प्रोत्साहित कर उनके विचार प्रकाशित करना। संगोष्टियों तथा सभाओं का आयोजन कर विद्वानों को समय-समय पर सम्मानित करना तथा भारतीय वैदिक विद्याओं vaidic astrology के उत्थान में समर्पित अन्य संस्थाओं को सहयोग देना निरंतर जारी है।

उपरोक्त विद्याओं के विकास के लिये उपयोगी सामग्री जैसे- धर्म-ग्रंथ, सभी प्रकार की पूजा एवं साधना सामग्री, Jyotish software साफ्टवेयर एवं उपयोगी टी. वी. कार्यक्रमों की सी. डी. इत्यादि उचित मूल्य पर विद्वानों को उपलब्ध करवाना निरंतर जारी है।

शुक्राचार्य द्वारा उपलब्ध पाठ्यक्रम:-

वह विद्यार्थी जिन्हें ज्योतिष फलादेश या ज्योतिषीय गणना, अंकशास्त्र, वास्तुशास्त्र अथवा हस्तरेखा शास्त्र जैसे वैदिक विषयों की शिक्षा प्राप्त करने में रुचि है, वे शुक्राचार्य संस्थान द्वारा संचालित सर्टिफिकेट कोर्स Certificate Cource में प्रवेश ले सकते हैं। इन पाठ्यक्रमों को इस प्रकार बनाया गया है कि वह प्रत्येक विद्यार्थी के लिए व्यवसायिक उपयोग के लिये उपयोगी हों।

1. ज्योतिष दैवज्ञ (Jyotish Daivagya) :- यह पाठ्यक्रम नवीन विद्यार्थियों के लिए है, जो ज्योतिष जगत में पहला कदम रख रहे हैं, जो ज्योतिष शास्त्र horoscope के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। मूल रूप से यह एक स्वाध्याय उपकरण Astrological Hobby Course है। यह उन नये विद्यार्थीयों के लिये उपयोगी है, जो ज्योतिष जगत को समझकर ज्योतिष के पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेना चाहते हैं। इस पाठ्यक्रम में ज्योतिष की उत्पत्ति ज्योतिष शास्त्र की विशेषताएं, नक्षत्र व 9 ग्रहों का परिचय और स्वभाव, 12 राशियां और उनका स्वभाव तथा कुण्डली के 12 भावों का परिचय और उन भावों का फलादेश में प्रयोग, ग्रहों की दृष्टियां, ग्रहों की मैत्री-शत्रुता, ग्रहों की अवस्था इत्यादि समझाते हुये पंचांग देखना भी सिखाया जाता है। यह Certificate Cource है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

2. ज्योतिष दैवज्ञाचार्य (Jyotish Daivagyacharya) :– यह पाठ्यक्रम ज्योतिष शास्त्र की गहराइयों को समझने के लिये Professional Course है, इस पाठ्यक्रम में ज्योतिषीय फलादेश तथा ज्योतिषीय गणना के अतिरिक्त ग्रहों की युतियों, दृष्टियों को समझाते हुये फलादेश करने के गोपनीय सूत्र Secret Astrological formulas तथा जीवन के प्रमुख अंगों, अवसरों, सम्बंधियों, आर्थिक तथा व्यक्तिगत आवश्यकताओं, शारीरिक अंगों का फलादेश करना तथा जीवन की लगभग सभी आवश्यकताओं के लिये फलादेश करना समझाया जाता है। यह ज्योतिष पाठ्यक्रम ज्योतिष शास्त्र horoscope की गहराइयों को समझने की मुख्य सीढ़ी है। (एक प्रकार से जन्मपत्रिका का पूर्ण विवेचन करना सिखाया जाता है।) इस के द्वितीय भाग में खगोलीय परिचय, लग्न की गणना, ग्रहों की गणना, नक्षत्र nakshatra गणना वर्ग कुण्डलियों की रचना तथा प्रमुख खगोलीय (ज्योतिषीय) गणनायें, आधुनिक विधि से जन्मकुण्डली का निर्माण एवं ग्रहों की महादशा vimshotari mahadasha व अंतरदशाओं की गणना, अष्टकवर्ग Astakvarga गणना व अष्टकवर्ग निमार्ण की शिक्षा दी जाती है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।) Professional Astrological Course

3. ज्योतिष शिरोमणी (Jyotish Shiromani) :- यह पाठ्यक्रम ज्योतिष शास्त्र की गहराइयों को समझने के लिये Expert Astrology Cource है। इस पाठ्यक्रम के प्रथम भाग में अष्टकवर्ग की अतिरिक्त गणना, आयु की गणना तथा आयुविचार में जातक की आयु की गणना करना सिखाया जाता है।, कुंडली Kundli Milan मिलान एवं मुहूर्त की गणना, तथा वर्षफल गणना की पूर्ण जानकारी दी जाती है। द्वितीय भाग में कुण्डली मिलान एवं मुहूर्त आदि देखना। Astakvarga अष्टकवर्ग के अतिरिक्त फलादेश, कुंडली मिलान एवं फलादेश, मुहूर्त का फलादेश, तथा वर्षफल के फलादेश की पूर्ण रूप से जानकारी तथा प्रश्न कुण्डली prashna kundli के सिद्धांत एवं प्रश्न कर्ता के प्रश्न पूछने के समय की कुण्डली बनाकर उत्तर देना सिखाया जाता है। यह प्रश्न कुण्डली सिद्धांत इस पाठ्यक्रम में सिखाया जाता है। इस पाठ्यक्रम में विद्यार्थी प्रतिदिन काम आने वाली भविष्यवाणी vimshotari mahadasha फलादेश या मिलान एवं मुहूर्त आदि देख सकता है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 1वर्ष है।) Professional Astrological Course

4. ज्योतिष तत्ववेत्ता (Jyotish Tatvaveta) :- यह पाठ्यक्रम केवल शोध एवं अनुसंधान Astrological Research पर आधारित है। इस पाठ्यक्रम में शोध के लिए डाटा इकट्ठा कर अनुसंधान करवाया जाता है। ग्रंथों में दिए गए नियम कितने सही हैं? यह प्रमाणित करना एवं नए नियम प्रस्तावित करना इसका मुख्य उद्देश्य है। इसमें छात्रों को शोध पत्र Astrology Theses लिखना होगा, एवं पत्र पत्रिकाओं में छपवाना आवश्यक होगा। इसमें ग्रह-नक्षत्रों nakshatra के आधार पर कुण्डली के किसी एक भाव पर भी शोध कर सकते हैं, अथवा अपनी रूची तथा अर्जित ज्ञान के अनुसार- गोचर विचार, मांगलिक विचार, कुण्डली मिलान, प्रश्न-कुण्डली, अष्टकवर्ग फलादेश या पंचांग एवं मुहूर्त में से किसी भी एक विषय पर अनुसंधान कर सकते हैं। यह पाठ्यक्रम केवल शोध एवं अनुसंधान कार्य के लिए Dr.R.B.Dhawan द्वारा प्रस्तुत किया गया है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 1वर्ष है।)

5. अंक शास्त्राचार्य (Numerology) :- यह पाठ्यक्रम नवीन विद्यार्थियों के लिए है, जो अंक शास्त्र सीखना चाहते हैं, इस के द्वारा आप शुभ अंक एवं नामांक आदि के बारे में जान सकते हैं। नाम को भाग्यशाली व अनुकूल बनाना इसका मुख्य विषय है। इसमें अंकशास्त्र के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त करना तथा अंकशास्त्र के सामान्य सिद्धांतों के अनुसार अंकों का प्रयोग कर भविष्यफल ज्ञात करना सम्मीलित है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

6. अंक शिरोमणी (Adwance Numerology) :- इस पाठ्यक्रम में अंकशास्त्र के नियमों के अनुसार अंकों का हमारे जीवन में क्या महत्व है, तथा अंकशास्त्र से अपने नाम, कम्पनी के नाम, अपने एकाऊँट नम्बर या वाहन नम्बर को कैसे भाग्यशाली बना सकते हैं? विस्तार पूर्वक समझाया गया है यह पाठ्यक्रम अंकशास्त्र की द्वितीय सीढ़ी है, इसमें अंकों के अनुसार प्रश्न फल का विचार तथा पद्धति का फार्मूला भी दिया गया है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

7. वास्तु आचार्य (Vastushastra) :- यह पाठ्यक्रम नवीन विद्यार्थियों के लिए है, जो वास्तुशास्त्र के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त कर वास्तु विशेषज्ञ बनना चाहते हैं। इस में वास्तु के मूल ग्रन्थों का स्वाध्याय करना होता है। आर्किटेक्ट, बिल्डर एवं उन सब के लिए जो कोई भवन, कार्यालय आदि निर्माण करने का विचार कर रहे हैं, उनके लिए यह पाठ्यक्रम अत्युत्तम है। गृहिणीयों के लिये भी उपयोगी है, जो अपने घर या कार्यालय को वास्तु सम्मत सजाना चाहती हैं। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

8. वास्तु शिरोमणी (Adwance Vastushastra) :- पाठ्यक्रम के इस भाग में जो विद्यार्थी वास्तु नियम जानते हैं, लेकिन उनका उपयोग करने में सक्षम नहीं हैं, इसमें प्रवेश ले सकते हैं। इसमें वास्तु दोष एवं निवारण पर विशेष बल दिया जाता है। वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार अनेक प्रकार के उदाहरणों के द्वारा भवन, मंदिर, कार्यालय, फैक्ट्री इत्यादि में वास्तुदोष की बारीकियों को समझाते हुये उन दोषों का वास्तु अनुरूप निवारण दिया गया है। इस में वास्तु संबंधित उच्च स्तरीय उपायों का भी अध्ययन होता है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

9. हस्तरेखा आचार्य (palmistry) :- यह पाठ्यक्रम उन सभी नवीन विद्यार्थियों के लिए है जो हस्तरेखा विज्ञान सीखना चाहते हैं। जो हस्तरेखा शास्त्र के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। यह नये विद्यार्थीयों के लिये भी उपयोगी है, इस पाठ्यक्रम में हस्तरेखा परीक्षण के सामान्य सिद्धांतों के अतिरिक्त, हस्त की प्रमुख रेखाओं, चिन्हों, पर्वों व पवर्तों के अतिरिक्त शरीर लक्षणों Body Language को समझकर हस्त परीक्षण, अंगुष्ठ विचार, पर्व एवं चिह्न विचार एवं अनेक प्रकार की छोटी-बड़ी रेखाओं के बारे में बताया जाता है, जिससे कि हाथ देखकर भविष्यवाणी की जा सके। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

10. हस्तरेखा शिरोमणी (Adwance Palmistry) :- यह पाठ्यक्रम हस्तरेखा शास्त्र की गहराईयों को समझने की दूसरी सीढ़ी है, इस पाठ्यक्रम में हाथ की बनानट और भेद, ग्रह रेखाओं के अनुसार मानव स्वाभाव, हस्तरेखाओं के सभी 16 भेद, शुभ-अशुभ चिन्ह, अनेक महत्वपूर्ण हस्तरेखाओं और लक्षणों का तुलनात्मक विचार किया गया है। हस्तरेखा ज्ञान में पूर्णता हेतु यह पाठ्यक्रम आवश्यक है। इस पाठ्यक्रम में अनेक प्रकार के प्रश्न जैसे स्वास्थ्य, धन, व्यवसाय, शिक्षा, आयु आदि का विचार किया जाता है। अनेक प्रकार के उपायों के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाती है। मुखाकृति विज्ञान Face Reading की पूर्ण जानकारी भी इसमें दी जाती है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

11. लाल किताब आचार्य (Lal Kitab Acharya) :- पाठ्यक्रम के प्रथम भाग में लाल-किताब के नियमों के अनुसार ग्रहों का लाल किताब में प्रकार जैसे- अंधे ग्रह, रतांध ग्रह, धर्मी ग्रह, मुकाबले के ग्रह, टकराव के ग्रह इत्यादि के रहस्य विस्तार पूर्वक समझाये गये हैं। इस पाठ्यक्रम में लाल किताब के अनुसार वर्षफल बनाने तथा फलादेश का फार्मूला भी दिया गया है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

12. लाल किताब शिरोमणी (Adwance Lal Kitab Acharya) :- पाठ्यक्रम के इस भाग में लाल किताब के अनुसार प्रथम से लेकर द्वादश भाव तक का लाल किताब के अनुसार फलादेश, सूर्य से लेकर केतु तक सभी 9 ग्रहों का लाल किताब के अनुसार फलादेश, अनेक प्रकार की ग्रहस्थितियों एवं योगों का फलादेश तथा प्रत्येक ग्रह, भाव या योग के विपरीत प्रभाव को दूर करने के लाल किताब अनुसार उपाय दिये गये हैं। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

13. उपाय आचार्य (Remedial Astrology) :- यह पाठ्यक्रम ज्योतिषीय उपायों में रूचि रखने वाले उन जिज्ञासुओं व विद्यार्थियों के लिये स्वाध्याय उपकरण व प्रथम सीढ़ी है, जो उपाय-शास्त्र के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त करना तथा सामान्य सिद्धांतों के अनुसार उपायों का प्रयोग कर सकारात्मक परिणाम चाहते हैं। उपाय शास्त्र के सिद्धांतों को समझकर आगे के पाठ्यक्रम में प्रवेश ले सकते हैं। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

14. उपाय शिरोमणी (Adwance Remedial Astrology) :- इस पाठ्यक्रम में उपाय-शास्त्र के नियमों के अनुसार मंत्र-तंत्र का हमारे जीवन में क्या महत्व है, तथा शास्त्रीय प्रयोगों के द्वारा मारण-मोहन आदि भयंकर अभिचारों से रक्षा करने वाले, व्याधिनाश तथा कष्टकारी ग्रहों से रक्षा करने वाले, अकालमृत्यु शमन प्रयोग, ऐश्वर्य एवं आरोग्य प्रदायक प्रयोग, तथा नजरदोष की पहचान व उपाय सम्मीलित हैं। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

Shukracharya, F-265, Gali No 22, Laxmi Nagar, Delhi -110092, Tel. 011-22455184, mobile : 09810143516

संतान का योग

Dr.R.B.Dhawan

(Top astrologer in delhi,best astrologer in delhi)

“संतान होगी या नही?” इस विषय पर ज्योतिष शास्त्र में महर्षि पराशर ने बहुत स्टीक ग्रह गणना पद्धति प्रस्तुत की है। पुरुष के लिए “बीज स्फुट” और स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट”। हालांकि इस ग्रह गणना के परिणाम कोई अंतिम और निर्णायक नहीं हो सकते, किन्तु फिर भी, संतानोत्पत्ति के प्रश्न का उत्तर काफी हद तक स्पष्ट हो जाता है। वृहदपराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर कहते हैं- पुरूष का शुक्राणु (वीर्य) संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा अयोग्य! और यदि योग्य है, तो उत्तम है, या मध्यम श्रेणी का‌ है! इस प्रश्न का उत्तर बीज स्फुट गणना से देखना चाहिए-।

इसी प्रकार स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट” ग्रह गणना से अनुमान हो सकता है कि स्त्री का गर्भाशय संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा उत्तम या मध्यम है, या फिर अयोग्य है। महर्षि ने वृहद पराशर होरा शास्त्र में उल्लेख किया है कि जिस प्रकार उपजाऊ भूमि में उत्तम बीज बोया जाये तो अच्छी फसल होती है, मध्यम भूमि में उत्तम बीज से मध्यम श्रेणी की फसल होती है, और मध्यम भूमि में मध्यम श्रेणी का बीज परिणाम इसी अनुसार होता है। और इसी प्रकार बंजर भूमि में कितना ही उत्तम बीज बोने से परिणाम शून्य ही होता है। और मध्यम बीज से भी परिणाम शून्य होता है, इसी प्रकार स्त्री के गर्भाशय को महर्षि ने क्षेत्र बताते हुए कहा है कि, इस ज्योतिषीय गणना पद्धति से देखना चाहिए कि स्त्री का गर्भाशय स्वस्थ (गर्भ धारण योग्य) है या नहीं।

डाॅक्टर विभिन्न प्रकार कि जाँच करने के बाद भी जो नही बता पाते, वो ज्योतिषी चंद मिनटों मे गणना करके बता सकते हैं। दम्पत्ती के जीवन मे संतान होने या ना होने के विचार के लिये ज्योतिष मे पंचम भाव, पंचमेश, संतान कारक बृहस्पति आदि पर विचार करने के ज्योतिषीय नियम बताये गये हैं, किन्तु महर्षि पाराशर ने संतान के विषय में एक क्रान्तिकारी ज्योतिषीय सूत्र दिया है, सूत्र यह है- पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट कि गणना, तथा स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना करना। डाॅक्टर अनेक प्रकार कि जाँच करने के बाद भी यह ठीक से निर्णय नही कर पाते हैं कि समस्या पुरूष के शुक्राणुओं मे है, या स्त्री के गर्भाशय में। डाॅक्टर अनेक बार शारीरिक तौर पर पति-पत्नी को फिट बताते हैं, लेकिन फिर भी संतान के जन्म में बाधा उत्पन्न हो जाती है। लेकिन बीज स्फुट ओर क्षेत्र स्फुट कि गणना करके नि:संतान दंपत्ति को यह स्पष्ट रूप से बताया जा सकता है कि, रोग किसके शरीर में है।

क्या मेडिकल कि सहायता से संतान का जन्म हो सकेगा? बीज के वृक्ष बनने के लिये उसे उपजाऊ भूमि कि आवश्यकता होती है, अगर भूमि बंजर है तो बीज वृक्ष ना बन सकेगा। स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना गर्भ के ठीक भूमि कि तरह उपजाऊ, बंजर या मध्यम होने का पता लगाने जैसा है। अगर स्त्री कि जन्मकुंडली मे क्षेत्र स्फुट सही आता है ओर पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट मध्यम आता हो या सही नही आता है तो मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय वहाँ निःसंतान दंपत्ति कि सहायता कर सकते है। लेकिन क्षेत्र स्फुट के खराब होने पर मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय सहायक नही हो पाते है।

आज के समय मे चिकित्सा विज्ञान के साथ यदि ज्योतिष विज्ञान को जोड़कर कार्य किया जाये तो चिकित्सा विज्ञान ओर अधिक सरल बन सकेगा। कुंडली में संतानोत्पत्ति और संतान सुख के लिए विशेष तौर पर पंचम भाव से देखा जाता है, किंतु कुंडली विश्लेषण करते समय हमें बहुत से तथ्यों पर ध्यान देना बहुत ही आवश्यक है। संतान के सुख-दु:ख का विचार सप्तमेश, नवमेश, पंचमेश तथा गुरु से किया जाता है। नवम स्थान जातक का भाग्य स्थान भी है, और पंचम स्थान से पांचवा स्थान भी होता है, इस कारण भी नवमेश पर दृष्टि रखना बतलाया गया है। बृहस्पति संतान और पुत्र का कारक है, अतएव बृहस्पति पर दृष्टि रखना आवश्यक है।

इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पुराने शास्त्रों में एक मंत्र लिखा है, कारकों भावः नाशयः इसका अर्थ यह हुआ कि जिस भाव का जो कारक होता है, वह उस भाव में स्थित हो तो, उस भाव का नाश करता है। इसलिए गुरु यदि पंचम भाव में हो तो बहुत बार देखा गया है कि संतान संबंधी चिंता व कष्ट रहते हैं। लग्न, चंद्रमा और बृहस्पति से पंचम भाव यदि पाप ग्रहों से युत अथवा दृष्ट हो, शुभ ग्रहों से युति या दृष्ट ना हो तो तीनो पंचम भाव पापग्रहों के मध्य पापकर्तरी स्थित हो तथा उनके स्वामी त्रिक 6 8 12 वे भाव में स्थित हो तो, जातक संतानहीन होता है। फलित शास्त्र के सभी ग्रंथो में इसका उल्लेख मिलता है।

अनेक प्राचीन विज्ञजनों ने यह लिखा है कि, यदि पंचम भाव में वृषभ, सिंह, कन्या अथवा वृश्चिक राशि हो तो, अल्प संतति होती है, या दीर्घ अवधि के बाद संतान लाभ मिलता है। ज्योतिष में हर विषय पर बहुत ही विस्तृत और बहुत ही बड़ा साहित्य मिलता है, और अनेक प्रकार के उपाय या विधियां दी हुई हैं, लेकिन मुख्य तौर पर कुछ सूत्र हैं, जिनके आधार पर हम संतान योग को अच्छी तरह से पता लगा सकते हैं, इसमें सबसे बड़ा सूत्र है बीज स्फुट और क्षेत्र स्फुट। बीज स्फुट से तात्पर्य पुरुष की कुंडली के ग्रहो की स्तिथि से है। अगर कोई फसल बोई तो बीज हमको उत्तम चाहिए यदि बीज अच्छा नहीं होगा तो कभी भी फसल अच्छी नहीं होगी। इसी प्रकार क्षेत्र स्फुट मतलब हम खेत से भी समझ सकते हैं,‌ यदि खेत अच्छा नहीं होगा तो कितने भी अच्छे बीज बो देवें उसके अंदर फसल अच्छी नहीं होगी, अतः पुरुष की कुंडली में बीज स्फुट और स्त्री की कुंडली मे क्षेत्र स्फुट की गणना बतलाई गयी है, जिससे भी संतान योग का अंदाज लगाया जा सकता है।

बीज स्फुट की गणना में हम पुरुष की कुंडली में सूर्य गुरु और शुक्र के भोगांश को जोड़कर एक राशि निकालते हैं, यदि वह राशि विषम होगी और नवांश में भी उसकी विषम में स्थिति होगी तो बीज शुभ होगा, और साथ ही यदि एक सम और दूसरा विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों सम राशियां होगी तो, अशुभ फल होंगे, और बीज अशुभ होगा।
स्त्री की कुंडली में क्षेत्र स्फुट की गणना में हमें चंद्रमा मंगल और गुरु के भोगांशों को जोड़ना पड़ेगा, और भोगांशो को जोड़ने के बाद जो राशि आएगी वह राशि यदि सम होगी और नवमांश में भी उसकी सम स्थिति होगी तो, क्षेत्र स्फुट अच्छा होगा साथ ही एक सम व दूसरी विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों विषम हुई तो अशुभ फल होंगे व स्त्री सन्तान उत्पन्न करने में सक्षम नही होगी।

मेरे और लेख देखें :- aapkabhavishya.in, astroguruji.in, gurujiketotke.com, vaidraj.com, shukracharya.com पर।

धनवान बनाने वाले योग

क्या आपकी कुण्डली में महाधनी बनने के योग है?-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

हालांकि पैसा ही सब कुछ नहीं होता, परंतु आज का समय शुक्र प्रधान समय है, इस कारण आज के समय में पैसे के बिना इज्जत नहीं मिलती, पैसा है तो रिश्तेदार तो रिश्तेदार दुश्मन भी मित्र बन जाते हैं। रिश्तेदार कुछ अधिक अपनापन दिखाते हैं। वर्तमान में आर्थिक युग का दौर चल रहा है। धन के बगैर इस भौतिक काल में जीवन की आवश्यकता से अधिक भी बढ गई हैं, इंसान का गुजारा बिना धन के करना असम्भव है। महान सन्त कबीर दास जी ने क्या खूब कहा है। सांई इतना दीजिये जामे कुटम्ब समाय, मैं भी भूखन न रहॅू महमान भी भूखा न जाये। कबीर दास जैसे महान सन्त ने जीवन में धन की आवश्यकता को सीमित रखने का सुझाव दिया है, तो फिर आम आदमी क्यों नहीं संत वचन को स्वीकार करता। आज हर इंसान की आवश्यकतायें बढ गई हैं, धर में ऐशो-आराम की हर वस्तु चाहिए, इस लिए बेचारा बिना अर्थ के अपने जीवन की नैय्या को पार भला कैसे लगा पायेगा ?

आज के भौतिक युग में प्रत्येक मनुष्य की आकांक्षा रहती है कि वह अपने जीवन में अधिक से अधिक धन दौलत कमा कर ऐशो-आराम से अपना जीवन व्यतीत कर सकें। किन्तु सबके नसीब में ऐसा होता नहीं है। कर्म करके दो वक्त की रोटी का जुगाड़ किया जा सकता पर लजीज व्यजंनो का स्वाद चखने के लिए भाग्य का प्रबल होना जरूरी है।

आइये हम आपको बताते हैं कि ज्योतिष शास्त्र इस विषय में क्या कहता है। क्या आपकी जन्मकुंडली में कुछ ऐसे ग्रहयोग हैं? जो आपको विपुल धनवान बना सकते हैं। जन्मकुंडली में दूसरा भाव पैतृक धन और संचित धन का स्थान होता है। तथा बृहस्पति धन का कारक ग्रह है। इसके अतिरिक्त पंचम, नवम, चतुर्थ, दशम और एकादश भाव भी धन प्राप्ति के योगों की सूचना देते हैं। प्रथम, पंचम, नवम, चतुर्थ, दशम और सप्तम भाव की भूमिका भी धन प्राप्ति में महत्वपूर्ण होती है। दूसरा भाव यानि पैतृक या संचित धन का भाव इस मामले में प्रमुख भूमिका निभाता है, अर्थात इस भाव की भूमिका विशेष होती है। वैसे तो विभिन्न प्रकार के योग जैसे राजयोग, गजकेसरी योग, पांच महापुरूष, चक्रवर्ती योग आदि में लक्ष्मी की विशेष कृपा या विपुल धन प्राप्त होने के संकेत मिलते ही हैं। लेकिन आधुनिक युग में उच्च पदों पर आसीन होने से भी ये योग फलीभूत होते हैं, लक्ष्मी प्राप्ति या महाधनी योग किस प्रकार जन्मकुंडली में बनते हैं? आईये देखें :-

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि निम्न प्रकार के सम्बन्ध धनेश, नवमेश, लग्नेश, पंचमेश और दशमेश आदि के मध्य बनें तो, जातक महाधनी कहा जा सकता है।

1- लग्न और लग्नेश द्वारा धन योग :- यदि लग्नेश धन भाव में और धनेश लग्न भाव में स्थित हो तो, यह योग विपुल धन योग का निर्माण करता है। इसी प्रकार से लग्नेश की लाभ भाव में स्थिति या लाभेश का धन भाव, लग्न या लग्नेश से किसी भी प्रकार का सबंध जातक को अधिक मात्रा में धन दिलाता है। लेकिन शर्त यह है कि इन भावों यो भावेशों पर नीच या शत्रु ग्रहों की दृष्टि नहीं पड़ती हो। ऐसा होने से योग खण्डित हो सकता है।

2- धन भाव या धनेश द्वारा धन योग : – यदि धनेश लाभ स्थान में हो, और लाभेश धन भाव में, यानि लाभेश धनेश का स्थान परिवर्तन योग हो, तो जातक महाधनी होता है। यदि धनेश या लाभेश केन्द्र में या त्रिकोण में मित्र भावस्थ हो, तथा उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो, जातक धनवान होगा। यदि दोनों ही केन्द्र स्थान या त्रिकोण में युति कर लें तो, यह अति शक्तिशाली महाधनी योग हो जाता है। इस योग वाला जातक धनेश या लाभेश की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर्दशा में बहुत धन कमाता है।

3- तृतीय भाव या भावेश द्वारा धन योग :- यदि कुंडली के तीसरे भाव का स्वामी लाभ घर में हो, या लाभेश और धनेश में स्थान परिवर्तन हो तो, जातक अपने पराक्रम से धन कमाता है। यह योग क्रूर ग्रहों के मध्य हो तो, अधिक शक्तिशाली माना जायेगा। इस योग में सौम्य ग्रह कम फलदायी होते हैं।

4- चतुर्थ भाव या भावेश द्वारा धन योग :- यदि कुंडली में चतुर्थेश और धनेश का स्थान परिवर्तन योग हो, या धनेश और सुखेश धन या सुख भाव में परस्पर युति बना रहें हो तो जातक बड़े-2 वाहन और भूमि का मालिक होता है। ऐसा जातक अपनी माता से विरासत में बहुत धन की प्राप्ति करता है।

5- पंचम भाव या पंचमेश द्वारा धन प्राप्ति :- कुंडली में पंचम भाव का स्वामी यदि धन, नवम अथवा लाभ भाव में हो तो भी जातक धनवान होता है। यदि पंचमेश, धनेश और नवमेश लाभ भाव में अथवा पंचमेश धनेश और लाभेश नवम भाव में अथवा पंचमेश, धनेश और नवम भाव में युत हो तो, जातक महाधनी होता है। यदि पंचमेश, धनेश, नवमेश और लाभेश चारों की युति हो तो, सशक्त महाधनी योग होता है। किन्तु यह योग बहुत कम कुंडलीयों में बनता है।

6- षष्ठ भाव और षष्ठेश द्वारा धन योग :- जन्मकुंडली का षष्ठेश लाभ या धन भाव में हो तो, शत्रु दमन द्वारा धन की प्राप्ति होती है। ऐसे योग में धनेश का षष्ठमस्थ होना शुभ नहीं होता है। यह योग कम कुंडलीयों में ही घटित होता है।

7- सप्तम और सप्तमेश द्वारा धन की प्राप्ति :- यदि कुंडली का सप्तमेश धन भावस्थ हो, या धनेश सप्तमस्थ हो, अथवा सप्तमेश नवमस्थ या लाभ भावस्थ हो तो, जातक ससुराल पक्ष से धन प्राप्त करता है। ऐसे जातको का विवाह के बाद भाग्योदय होता है। ऐसे जातक किसी धनकुबेर के दामाद बनते हैं।

8- नवम भाव और नवमेश द्वारा धन योग :- कुंडली का नवमेश यदि धन या लाभ भाव में हो, या धनेश नवमस्थ हो अथवा नवमेश और धनेश युक्त होकर द्वितीयस्थ, लाभस्थ, चतुर्थस्थ या नवमस्थ हो तो, जातक महाभाग्यशाली होते है। किसी भी कार्य में हाथ डालकर अपार धन प्राप्त कर सकता है। यह युति यदि भाग्य स्थान में बने तो योग और अधिक बलवान हो जायेगा।

9- दशम और दशमेश द्वारा धन योग :- कुंडली में धनेश और दशमेश का परिवर्तन, युति आदि होने से पर जातक पिता या राजा द्वारा या अपने कार्य विशेष द्वारा धन प्राप्त करता है। ऐसा जातक धनवान राजनेता होता है।

10- लाभ और लाभेश द्वारा धन योग :- जन्मकुंडली में लाभेश का धन भावस्थ, पंचमस्थ या नवमस्थ होना, या इन भावों के स्वामियों की केन्द्रों या त्रिकोण स्थानों में युति होने से जातक महाधनी होता है।

नोटः– इन सभी योगों में एक बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि ग्रहों की युति, स्थान परिवर्तन आदि स्थितियों में शुभ दृष्टि या मित्र दृष्टि हो तो, धनवान योग के फलित होने की सम्भावना प्रबल हो जाती है, साथ ही इन भावों या भावेशों का बलवान होना भी आवश्यक होता है। कई बार अनेक कुण्डलियों में उपर बतायें गये योग होने के उपरांत भी जातक का जीवन सामान्य होता है। ऐसा तभी होगा जब भाव या भावेश कमजोर होंगे, ग्रह बाल्यावस्था या मृतावस्था में होंगे या फिर पाप ग्रहों की दृष्टि से योग खण्डित होंगे।
मेरे और लेख देखें :- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in,gurujiketotke.com, vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com पर भी।

प्रेमी-प्रेमिका और शुक्र

प्रेम और विलासिता का कारक शुक्र :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

प्रेमी-प्रेमिका में झगडे क्यों होते हैं? आईये इसका कारण ज्योतिष शास्त्र से जानते हैं- किसी भी जन्मकुण्डली में प्रेमी का स्थान पाँचवां होता है, जातक का अपना स्थान प्रथम स्थान है। अच्छी रिलेशनशिप तभी रह सकती है, जब प्रथम स्थान के स्वामी ग्रह और कुण्डली से पाँचवे स्थान के स्वामी ग्रह मित्र होंगे। यह तो हुई साधारण बात, अब यह भी देखना होगा की जातक की रिलेशनशिप से किसी दूसरे का हाजमा तो खराब नहीं हो रहा ? :- (रिलेशनशिप से प्राब्लम) कहीं वह गुप्त दुश्मनी तो नहीं निभा रहा ? यह पता चलेगा जातक की कुण्डली के पंचमेश की सेहत देखने से! पंचमेश की सेहत खराब करने के लिये कुण्डली के षष्ठेश या अष्ठमेश जिम्मेदार हो सकते हैं, अर्थात् पंचमेश षष्ठ या अष्ठम में नहीं होना चाहिए, अथवा षष्ठेश या अष्ठमेश के साथ नहीं होना चाहिए, या फिर षष्ठेश या अष्ठमेश पंचम में नहीं होना चाहिए। यह तो हुई बड़ी वजह, इसके अतिरिक्त एेसा भी हो सकता है की जातक का कोई सगा सम्बंधी ही इस खेल को बिगाड़ने में लगा हो।

वैवाहिक सुख का कारक ग्रह शुक्र :-

आज का युग बहुत तेज गति से शुक्र प्रधान हो रहा है, बेशक ज्योतिष के विद्वानों को मेरी यह बात कुछ अटपटी सी लगेगी। परंतु तथ्य यही बताते हैं कि बढ़ी तेजी से यह युग बदल रहा है। पहले एक छोटा सा उदाहरण प्रस्तुत है- आज से 50-100 वर्ष पूर्व लोग या तो पैदल यात्रा करते थे या फिर पशुओं का अथवा पशुओं द्वारा चलित वाहनों का प्रयोग करते थे। अर्थात् गुरू (जीव प्रधान) वाहन का प्रयोग किया जाता था। जो आज धीरे-धीरे करके आरामदायक (शुक्र प्रधान) वाहन ने ले ली है। पशुओं से चलने वाले वाहनों की जगह अब स्वचालित लग्जरी वाहनों ने ले ली है। इस प्रकार प्राणीयों का प्रतीक गुरू शीण हो गया है। दूसरा उदाहरण- एक जमाना था जब बड़ी-बूढी अपनी बहुओं को आशिर्वाद देती थी- “दूधों नहाओ पूतों फलो” आज इसमें से दूधों नहाओ तो ठीक है, परंतु “पूतों फलो” भला किस नवविवाहिता को पसंद आती है? इस आशिर्वाद का पूतों फलो वाला भाग भी गुरू का विभाग है। जो नवविवाहिता बहुओं को पसंद नहीं, क्योंकि अधिक संतान के लिये आज इस वर्ग के विचार बदल गये हैं, यहाँ भी गुरू निर्बल प्रतीत होता है। तीसरा उदाहरण- विद्वान, आचार्य व गुरू जो अपने प्रवचन के द्वारा समाज को धर्म के मार्ग पर चलने के लिये दिशा दिखाने का कार्य करते थे, आज इन्हें सुनने का समय किसके पास है, यदि गलती से कहीं आमना-सामना हो भी जाये तो आज की नई पीढ़ी उनसे जान छुडाना चाहते हैं। इसी प्रकार वह अध्यापक जिनके चरण छूकर विद्यार्थी मान-सम्मान करते थे, आज वह कितनी दयनीय स्थिति में हैं? यह अध्यापक एेसे शिल्पकार हैं, जिनसे शिक्षा पाकर विद्यार्थीकाल अपने और देश के भाग्य का निर्माण करने की ताकत रखते हैं, परंतु जिस गुरू ने उन्हें इस योग्य बनाया है। उस गुरू की कितनी इज्जत हो रही है? किसी से छिपा नहीं। क्या यह गुरू का बल कम नहीं हो रहा? दूसरी ओर शिक्षा का आधुनिकीकरण करती शिक्षण संस्थायें (शुुक्र) फल-फूल रही हैं। एक उदाहरण और देता हूँ- बच्चे जवान हो जायें तो आज कितने एेसे माता-पिता हैं जिन्हें कन्या के लिये वर और बालक के लिये वधु ढूडने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। माता-पिता द्वारा पसंद युवक के लिये युवती, तथा कन्या के लिये वर (गुरू बल) के स्थान पर आजकल लव मेरिज (शुक्र बल) का प्रचलन अधिक हो चला है। आध्यात्मिकता, सहनशीलता, विवेक, बुद्धिमत्ता तथा अध्ययनशीलता (गुरू) की जगह आज सुंदरता, विलासिता और अश्लीलता (शुक्र) ने ले ली है। अब आप ही बतायें पूर्वकाल में विश्वगुरू कहलाने वाला हमारा भारत आने वाले कुच्छ ही वर्षों में क्या कहलायेगा ?

प्रेम सम्बन्ध :-
अब देखते हैं, जन्म कुंडली मे कौन से एेसे योग होते हैं, जो प्रेम संबंध की सूचना देते हैं- कब ये शारीरिक सम्बन्ध स्तर पर भी होते है ? क्या कुण्डली में ऐसी स्थितियाँ भी है जो संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा तनाव भी देंगी ? क्या ये संबंध दुनियाँ से छिपे रह सकते है ? क्या प्रेम संबंधों में अलगाव (Break up) तो नही है ? क्या एक से अधिक भी प्रेम संबंध होंगे ? क्या प्रेम संबंध विवाह में परिणित होगें ? यह सब प्रश्न हैं आज के युवा वर्ग के।
भारतीय ज्योतिष पद्धति के द्वारा हम इन सभी स्थितियों को जन्म पत्रिका के माध्यम से देख सकते हैं ।और विश्लेषित भी कर सकते हैं, और उस समय विशेष की गणना भी कर सकते हैं । जब इनमे से कोई भी स्थिति हमारे जीवन मे घटित होगी ? आईये देखें जन्म पत्रिका में कौन सी स्थितियाँ बनाती है प्रेम संबंध ?- जन्म कुण्डली का पंचम भाव (5th house) हमारी कला कौशल के साथ प्रेम तथा भावनाओं का ओर दिल से किये गए कार्य का स्थान होता है । जन्म कुंडली मे चंद्रमा, शुक्र और मंगल प्रमुख ग्रह हैं, जो अपने आपसी सम्बन्धो के आधार पर व्यक्ति को एक विशेष आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करते हैं, तथा जातक को प्रेम करने को वशीभूत करते हैं। चंद्रमा मन का कारक है । जन्म पत्रिका में मजबूत चंद्रमा विचारों को शक्ति प्रदान करता है। मन में कल्पनाशीलता ओर भावनाएँ जगाता है, और जातक परम्पराओ को तोड़कर दुनिया की परवाह किये बगैर प्रेम के रास्ते पर आगे बढ़ता है, जब कुण्डली में चंद्रमा का संबध किसी भी प्रकार से शुक्र से होता है तो, व्यक्ति प्यार में कल्पनाओ की उड़ान भरता है, और शीघ्र ही विपरीत लिंग की तरफ आकर्षित हो जाता है।

जन्म कुंडली में मंगल + शुक्र का संबंध जब जन्म कुंडली में 1, 2, 3, 5, 7, 11,12 भावो में बनता है, तब व्यक्ति आकर्षण का केंद्र होता है, और साथ ही स्वयं भी विपरीत लिंग की ओर शीघ्र आकर्षित होता है।जन्म कुंडली में जब इन स्थितियों के साथ पंचम भाव तथा पमचमेश से संबंध बनाने वाले किसी भी ग्रह की अथवा चंद्रमा, शुक्र, मंगल से संबंधित दशाएँ अन्तरदशाएँ आती हैं तो, जातक प्रेम करता है ।

जब पंचम भाव अथवा पंचमेश का शुभ संबंध केंद्र त्रिकोण से अथवा एकादश भाव (11th house) से शुभ भावों में होता है तो, ये सच्चा ओर आदर्श प्रेम संबध होता है । यदि इन संबंधों में द्वादश भाव भी सम्मलित हो जाता है तो, ये प्रेम शारीरिक स्तर पर भी प्रकट हो जाता है। जब इन सम्बन्धो में द्वादश भाव के साथ अष्टम भाव या अष्टमेश सम्मलित होता है तोे, संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा, तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है । जब प्रेम संबंधों में सप्तम भाव अथवा सप्तमेश का समावेश होता है तो, ये संबंध अन्य स्थितियों के सकारात्मक होने पर प्रेम विवाह में परिणित हो जाते हैं। शुभ गुरु और शनि प्रेम संबंधों ओर विवाह की स्थितियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां तक कि इनसे गुरु का सबंध कभी भी प्रेम संबंधों को दुनियां के समक्ष उजागर तक नही होने देता ।

सभी वर्ग कुंडलियों, अष्टक वर्ग, ग्रहो के किसी विशेष बल, कुण्डली में बने विशेष संबंधों ओर योगायोगों का, संबंधित शुभ अशुभ दशाओं अन्तरदशाओं, संबंधित शुभ अशुभ गोचर का गहन अध्ययन तथा विश्लेशण करने के बाद ही कहा जा सकता है कि – प्रेम संबधो का कोई दर्दनाक अंत होगा या ये संबंध विवाह के रूप में जीवन को महकाएँगे! जन्म कुंडली मे जैसा दिखता है वैसा कभी नही होता, और जो होता है वह तो बहुत ही गहराई में ही छिपा है, जिसे देख पाना गहन कुण्डली विश्लेषण से ही संभव होता है। कुछ आसान, आवश्यक तथा सही समय पर किये गए सही उपाय, कुछ जन्म पत्रिका के अनुसार सकारात्मक ग्रहों का सहयोग, और कुछ सही मार्ग का चयन और सही दिशा में किया गया परिश्रम। सुखी और खुशियों से भरा जीवन दे सकते हैं।

एक निश्चित आयु में प्रत्येक युवक अथवा युवती की उत्कृट इच्छा रहती है कि उसे अपने मनोनुकूल सुंदर जीवन साथी मिले। एेसे हार्दिक तथा प्रबल आकर्षण का मूल श्रोत संगीत, आदर्षवादिता, कला-क्रीड़ा-सौंदर्य एवं शारीरिक विधान तथा प्रसाधन में ही अंतर्निहित है। उत्तरोत्तर परिवर्तनीय सभ्यता संस्कृति के कारण हमारे देश में भी पाश्चात्य देशों की तरह परिवार की सम्मति अथवा स्वीकृति का महत्व समाप्त होता जा रहा है, युवक व युवतियों का दृष्टिकोण इस प्रसंग में दिनानुदिन लोचपूर्ण तथा उदार होता जा रहा है, अतः स्वजातीय विवाह arenge marriage की अपेक्षा अंतर्जातीय विवाह love marriage की ओर इनका रूझान होता जा रहा है। ज्योतिष शास्त्र की दृिष्टि से देखें तो ज्ञात होता है कि ज्योतिष भी इन बंधनों को नही मानता। इसका मूल कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन ग्रहों के मूलभूत सिद्धांतों पर निर्भर है। अतएव युवक-युवतीयों अथवा नर-नारियों के प्रेम विवाह Love marriage की भावी संभावनाओं का निरूपण प्रस्तुत करना मेरी इस पुस्तक “विवाह एवं दाम्पत्य सुख” का एक उद्देश्य है। विवाह एवं दाम्पत्य सुख (Marriage & Happy Married Life) हाल ही में प्रकाशित हुई नयी पुस्तक है। इस पुस्तक में विवाह सुख के योग, विवाह में क्यों विलम्ब marriage delay होता है? विवाह के लिये तथा विवाहित दम्पतियों के गृहस्थ सुख में बाधाओं का निवारण marriage Life problems and solutions बताया गया है। अभी तक मेरी 10 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन सभी की जानकारी http://www.shukracharya.com पर उपलब्ध है।

मेरे और लेख देखें :- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in, gurujiketotke.com,vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com पर भी।

शिवलिंग पूजा

महाशिवरात्रि और शिव पूजन :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

महाशिवरात्रि पर्व रात्रि प्रधान पर्व है, इस दिन अर्धरात्रि की पूजा का विशेष महत्व है। अर्ध रात्रि की पूजा के लिये स्कन्दपुराण में लिखा है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को –

निशिभ्रमन्ति भूतानि शक्तयः शूलभृद यतः ।

अतस्तस्यां चतुर्दश्यां सत्यां तत्पूजनं भवेत् ॥

अर्थात् रात्रि के समय भूत, प्रेत, पिशाच, शक्तियाँ और स्वयं शिवजी भ्रमण करते हैं; अतः उस समय इनका पूजन करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट होते हैं ।

शिवपुराण में आया है-

“कालो निशीथो वै प्रोक्तोमध्ययामद्वयं निशि ।

शिवपूजा विशेषेण तत्काले ऽभीष्टसिद्धिदा ॥

एवं “ज्ञात्वा नरः कुर्वन्यथोक्तफलभाग्भवेत्” अर्थात रात के चार प्रहरों में से जो बीच के दो प्रहर हैं, उन्हें निशीथकाल कहा गया है। विशेषत: उसी काल में की हुई भगवान शिव की पूजा-प्रार्थना अभीष्ट फल को देनेवाली होती है। ऐसा जानकर कर्म करनेवाला मनुष्य यथोक्त फल का भागी होता है। चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं, अत: ज्योतिष शास्त्र में इसे परम कल्याणकारी कहा गया है। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है, परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि कहा गया है। शिव रहस्य में कहा गया है-

चतुर्दश्यां तु कृष्णायां फाल्गुने शिवपूजनम्।

तामुपोष्य प्रयत्नेन विषयान् परिवर्जयेत।।

शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम्।

शिवपुराण में ईशान संहिता के अनुसार :-

फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि।

शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:।।

अर्थात :- फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोडों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए इसलिए इसे महाशिवरात्रि मानते हैं। शिवपुराण में विद्येश्वर संहिता के अनुसार शिवरात्रि के दिन ब्रह्मा जी तथा विष्णु जी ने अन्यान्य दिव्य उपहारों द्वारा सबसे पहले शिव पूजन किया था जिससे प्रसन्न होकर महेश्वर ने कहा था की “आज का दिन एक महान दिन है। इसमें तुम्हारे द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है, इससे मैं तुम देवों पर बहुत प्रसन्न हूँ। इसी कारण यह दिन परम पवित्र और महान होगा। आज की यह तिथि ‘महाशिवरात्रि’ के नाम से विख्यात होकर मेरे लिये परम प्रिय होगी। इसके समय में जो मेरे लिंग (निष्कल अंग– आकृति से रहित निराकार स्वरूप के प्रतीक ) वेर (सकल साकार रूप के प्रतीक विग्रह) की पूजा करेगा, वह पुरुष जगत की सृष्टि और पालन आदि कार्य में भी सक्षम हो सकता है। जो महाशिवरात्रि को दिन-रात निराहार एवं जितेन्द्रिय रहकर अपनी शक्ति के अनुसार निश्चल भाव से मेरी यथोचित पूजा करेगा, उसको मिलने वाले फल का वर्णन सुनो -एक वर्ष तक निरंतर मेरी पूजा करने पर जो फल मिलता हैं, वह सारा शुभ फल केवल महाशिवरात्रि को मेरा पूजन करने से ही मनुष्य तत्काल प्राप्त कर लेता हैं। जैसे पूर्ण चंद्रमा का उदय समुद्र की वृद्धि का अवसर हैं, उसी प्रकार यह महाशिवरात्रि तिथि मेरे धर्म की वृद्धि का समय हैं। इस तिथि में मेरी स्थापना आदि का मंगलमय उत्सव मनाना चाहिये | ॐ नमः शिवाय।
शिवलिंग पूजा से मनेकामना पूर्ति सिद्धि :-
शिव के उस अपादान कारण को, जो अनादि और अनंत है, उसे लिंग कहते हैं। उसी गुणनात्मक मौलिक प्रकृति का नाम माया है, उसी से यह सम्पूर्ण जगत उत्पन्न हुआ है, होता रहेगा। जिसको जाना नहीं जा सकता, जो स्वंय ही कार्य के रूप में व्यक्त हुआ है, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है, और उसी में लीन हो जाना है, उसे ही लिंग कहते हैं। विश्व की उत्पत्ती और लय के हेतु (कारण) होने से ही उस परमपुरूष की लिंगता है। लिंग शिव का शरीर है, क्योंकि वह उसी रूप में अधिष्ठित हैं। लिंग के आधार रूप में जो तीन मेखला युक्त वेदिका है, वह भग रूप में कही जाने वाली जगतदात्री महाशक्ति हैं। इस प्रकार आधार सहित लिंग जगत का कारण है। यह उमा-महेश्वर स्वरूप है। भगवान शिव स्वयं ही ज्योतिर्लिंग स्वरूप तमस से परे हैं, लिंग और वेदी के समायोजन से ये अर्धनारीश्वर हैं।पूज्यो हरस्तु सर्वत्र लिंगे पूर्णोर्चनं भवेत।। (अग्निपुराण अध्याय ५४)

संस्कृत में लिंग का अर्थ “चिन्ह” है। और इसी अर्थ में यह शिवलिंग shivling के लिये प्रयुक्त होता है। देवताओं की पूजा शरीर के रूप में हेती है, लेकिन परमपुरूष अशरीर हैं, इस लिये परम पुरूष की पूजा shivling Pooja दोनों प्रकार से होती है। जब पूजा शरीर के रूप मे होती है, तब वह शरीर अराधक की भावना के अनुरूप होता है। जब पूजा प्रतीक के रूप में होती है, तब यह प्रतीक अनंत होता है। क्यों की ब्रह्माण्ड की कल्पना ही अण्डाकर रूप में होती है, इस लिये कोई जब अनंत या ज्योति का स्वरूप बनाना चाहेगा, तब प्रकृति को अभिव्यक्त करने के लिये लिंग के साथ तीन मेखला वाली वेदी बनानी पड़ती है, क्योंकि प्रकृति त्रिगुणात्मक (सत्व-रज-तम) है, इस वेदी को भग कहते हैं। लेकिन यहां भग का अर्थ स्त्री जननेद्रीय नहीं है। भगवान शब्द में जो भग है उसका अर्थ है:- एेश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य है। सम्पूर्ण जगत में एकीभूत है। इस अर्थ में वेदिका निखिलेश्वर्यमयी महा शक्ति है।परमपुरूष शिव की सनातन (पौराणिक) मत में पांच रूपों में उपासना करने की परम्परा है, इसे ही पंचदेवोपासना कहते हैं:- शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश ओर सूर्य। इन पांचो का ही गोल प्रतीक आपने देखा है। शिवलिंग shivling पर चर्चा हम कर ही रहे हैं। विष्णु के प्रतीक शालिग्राम shaligram आपने सभी वैष्णव मंदिरों में देखा है। विष्णु के जितने अवतार हैं, लक्षणभेद से शालिग्राम shaligram शिला के साथ भी गोमती चक्र रखना पड़ता है। यह महाप्रकृति का एेश्वर्यमय भग स्वरूप है। जो शिवलिंगार्चन में वेदिका के रूप में है। इसी प्रकार शक्ति की गोल पिण्डियां देश के अनेक शक्ति स्थानों में विद्यमान हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो कालीपीठ पर शक्ति केवल पिण्डियों के रूप में ही स्थापित होती हैं। गणेशजी की स्थापना प्राय: प्रत्येक पूजन के आरम्भ में सुपारी अथवा गोबर की गोल पिण्डियाें पर ब्राह्मणों को करवाते आपने देखा ही होगा। भगवान सूर्य का प्रत्यक्ष प्रतीक आकाश का सूर्य-मण्डल जैसा है। आप जानते हैं, जहां भी ग्रहों के चक्र बनाये जाते हैं, सूर्यमण्डल को अण्डाकर ही बनाना पड़ता है। इस प्रकार इन पंचदेवों की लिंग मानकर अर्थात् चिन्ह बनाकर ही इनकी उपासना होती है।पार्थिव लिंग की पूजा और महत्व:-जो लिंग बांबी, गंगा, तलाब, वैश्या के घर, घुड़साल की मिट्टी मक्खन या मिश्री से बनाये जाते हैं, उनका अलग-अलग मनेकामना के लिये उपासना, पूजा व अभिषेक करने के उपरांत उन्हें जल में विसर्जित करने का विधान है। पार्थिव लिंग के तांत्रिक प्रयोगों से प्रयोजन सिद्धियां :-

1. भू सम्पत्ती प्राप्त करने के लिये- फूलों से बनाये गये शिवलिंग shivling का अभिषेक करें।

2. स्वास्थ्य और संतान के लिये- जौ, गेहूं और चावल तीनों के आटे को बराबर मात्रा में लेकर, शिवलिंग shivling बनाकर उसकी पूजा करें।

3. असाध्य रोग से छुटकारा पाने के लिये- मिश्री से बनाये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

4. सुख-शांति के लिये- चीनी की चाशनी से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

5. वंश वृद्धि के लिये- बांस के अंकुर से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

6. आर्थिक समृद्धि के लिये- दही का पानी कपडे से निचोड़ लें और उस बिना पानी वाली दही से जो शिवलिंग shivling बनेगा, उसका पूजन करने से समृद्धि प्राप्त होती है।

7. शिव सायुज्य के लिये- कस्तूरी और चंदन से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

8. वशीकरण के लिये- त्रिकुटा (सोंठ, मिर्च व पीपल के चूर्ण में नमक मिलाकर शिवलिंग shivling बनता है, उसकी पूजा की जाती है।

10. अभिलाषा पूर्ति के लिये- भीगे तिलों को पीसकर बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

11. अभिष्ट फल की प्राप्ति के लिये- यज्ञ कुण्ड से ली गई भस्म का शिवलिंग shivling बनाकर उसकी पूजा करें।

12. प्रीति बढ़ाने के लिये- गुड़ की डली से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

13. कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये- गुड़ में अन्न चिपकाकर उस से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

14. फल वाटिका में फल की अधिक पैदावार के लिये- उसी फल को शिवलिंग shivling के समान रखकर उस फल की पूजा करें।

15. मुक्ति प्राप्त करने के लिये- आंवले को पीसकर उस से बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

16. स्त्रीयों के लिये सौभाग्य प्रदाता- मक्खन को अथवा वृक्षों के पत्तों को पीसकर बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

17. आकाल मृत्यु भय दूर करने के लिये- दूर्वा को शिवलिंगाकार गूंथकर उस की पूजा करें।

18. भक्ति और मुक्ति के लिये- कपूर से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

19. तंत्र में सिद्धि के लिये- लौह से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

20. स्त्रीयों के भाग्य में वृद्धि- मोती से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

21. सुख-समृद्धि के लिये- स्वर्ण से बने शिवलिंग shivling का पूजन करें।

22. धन-धान्य वृद्धि के लिये- चांदी से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

23. दरिद्रता निवारण के लिये- पारद (पारा) के शिवलिंग shivling की पूजा करें।

24. शत्रुता निवारण के लिये- पीतल से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

25. कर्ज निवारण के लिये- कांस्य से निर्मित शिवलिंग shivling की पूजा करें।

मेरे और लेख देखें :- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in, gurujiketotke.com,vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com पर भी।

कुण्डली के राजयोग-

राजयोग उत्तरकालामृत में :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

यदा मुश्तरी कर्कटे वा कमाने, अगर चश्मखोरा पड़े आयुखाने।
भला ज्योतिषी क्या लिखेगा पढ़ेगा, हुआ बालका बादशाही करेगा।।

उत्तरकालामृत ग्रन्थ में उल्लेखित यह ज्योतिषीय खोज अब्दुल रहीम खानखाना की कृति है, जो की मुगल काल के विद्वान थे। सैकड़ो वर्ष के उपरांत आज भी यह खोज सत्य ही प्रतीत होती है। इस ज्योतिषीय योग से स्पष्ट है कि यदि 2, 3, 5, 6, 8, 9 तथा 11, 12 में से किसी भी स्थान में बृहस्पति की स्थिति हो, और शुक्र 8वें स्थान में हो तो ऐसी ग्रह स्थिति में जन्म लेने वाला जातक चाहे साधारण परिवार में ही क्यों न जन्मा हो, वह राज्याधिकारी ही बनता है। यही कारण है कि कभी-कभी अत्यंत साधारण परिवार के बालकों में भी राजसिक लक्षण पायें जाते हैं, और वे किसी न किसी दिन राज्य के अधिकारी घोषित किये जाते हैं। विभिन्न योगों के अनुसार ही मनुष्य की चेष्टायें और क्रियायें विकसित होती हैं, इस विषय पर विभिन्न शास्त्रों का भी उल्लेख दर्शनीय है। सर्वप्रथम ज्योतिष शास्त्र को लीजिये उसमें राजयोग के लक्षण इस प्रकार बतलाये गये हैं।
जिस व्यक्ति के पैर की तर्जनी उंगली में तिल का चिन्ह हो वह पुरूष राज्य-वाहन का अधिकारी होता है। जिसके हाथ की उंगलियों के प्रथम पर्व ऊपर की ओर अधिक झुके हों, वह जनप्रिय तथा नेतृत्व करने वाला होता है। जिसके हाथ में चक्र, दण्ड एवं छत्र युक्त रेखायें हों, वह व्यक्ति निसंदेह राजा अथवा राजतुल्य होता है। जिसके मस्तिष्क में सीधी रेखायें और तिलादि का चिन्ह हो, वह राजा के समान ही सुख को प्राप्त करता है, और उसमें बैद्धिक कुशलता भी पर्याप्त मात्रा में होती है।
किन्तु वृहज्जातक के अनुसार राजयोग के बारह प्रकार होते हैं :-

तीन ग्रह उच्च के होने पर जातक स्वकुलानुसार राजा (राजतुल्य) होता है। यदि उच्चवर्ती तीन पापग्रह हों तो, जातक क्रूर बुद्धि का राजा होता है, और शुभ ग्रह होने पर सद्बुद्धि युक्त। उच्चवर्ती पाप-ग्रहों से राजा की समानता करने वाला होता है, किन्तु राजा नहीं होता। मंगल, शनि, सूर्य और गुरू चारों अपनी-अपनी उच्च राशियों में हों, और कोई एक ग्रह लग्न में उच्चराशि का हो तो, चार प्रकार का राजयोग होता है। चन्द्रमा कर्क लग्न में हो, और मंगल, सूर्य तथा शनि और गुरू में से कोई भी दो ग्रह उच्च हों तो, भी राजयोग होता है। जैसे- मेष लग्न में सूर्य, कर्क में गुरू, तुला का शनि और मकर राशि में मंगल भी प्रबल राजयोग कारक होता है, कर्क लग्न से दूसरा, तुला से तीसरा, मकर से चौथा जो तीन ग्रह उच्च के हों, जैसे मेष में सूर्य, कर्क में गुरू, तुला में शनि तो भी राजयोग माना जाता है। शनि कुंभ में, सूर्य मेष में, बुध मिथुन में, सिंह का गुरू और वृश्चिक का मंगल तथा शनि सूर्य और चन्द्रमा में से एक ग्रह लग्न में हो तो भी पांच प्रकार का राजयोग माना जाता है।

सूर्य बुध कन्या में हो, तुला का शनि, वृष का चंद्रमा और तुला में शुक्र, मेष में मंगल तथा कर्क में बृहस्पति भी राजयोगप्रद ही माने जाते हैं। मंगल उच्च का सूर्य और चन्द्र धनु में और लग्न में मंगल के साथ यदि मकर का शनि भी हो तो, मनुष्य निश्चित ही राजा (राजतुल्य) होता है। शनि चन्द्रमा के साथ सप्तम में हो, और बृहस्पति धनु का हो, तथा सूर्य मेष राशि का हो, और लग्न में हो तो, भी मनुष्य राजा होता है। वृष का चन्द्रमा लग्न में हो, और सिंह का सूर्य तथा वृश्चिक का बृहस्पति और कुंभ का शनि हो तो, मनुष्य निश्चय ही राजा होता है। मकर का शनि, तीसरा चन्द्रमा, छठा मंगल, नवम् बुध, बारहवां बृहस्पति हो तो, मनुष्य अनेक सुंदर गुणों से युक्त राजा होता है। धनु का बृहस्पति चंद्रमा युक्त क्रमश: अपने-अपने उच्च राशिगत हों तो, जातक गुणावान राजा होता है। और मंगल मकर का और बुध शुक्र अपने-अपने उच्च में लग्न गत हों तो, जातक गुणावान राजा होता है। मंगल शनि पंचम गुरू और शुक्र चतुर्थ तथा कन्या लग्न में बुध हों तो, जातक गुणावान राजा होता है। मीन का चंद्रमा लग्न में हो, कुंभ का शनि, मकर का मंगल, सिंह का सूर्य जिसके जन्म कुण्डली में हों, वह जातक भूमि का पालन करने वाला गुणी राजा होता है। मेष का मंगल लग्न में, कर्क का बृहस्पति हो तो, जातक शक्तिशाली राजा होता है। कर्क लग्न में बृहस्पति और ग्याहरवें स्थान में वृष का चंद्रमा शुक्र, बुध और मेष का सूर्य दशम स्थान में होने से जातक पराक्रमी राजा होता है।

मकर लग्न में शनि, मेष लग्न में मंगल, कर्क का चन्द्र, सिंह का सूर्य, मिथुन का बुध और तुला का शुक्र होने से जातक यशस्वी व भूमिपति होता है। कन्या का बुध लग्न में और दशम शुक्र सप्तम् बृहस्पति तथा चन्द्रमा भी जातक राजा होता है। जितने भी राजयोग हैं, इनके अन्तर्गत जन्म पाने पर मनुष्य चाहे जिस जाति स्वभाव और वर्ण का क्यों न हो, वे राजा ही होता है। फिर राजवंश में जन्म प्राप्त करने वाले जातक तो चक्रवर्ती राजा तक हो सकते हैं। किन्तु अब कुछ इस प्रकार के योगों का वर्णन किया जा रहा है जिनमें केवल राजा का पुत्र ही राजा होता है, तथा अन्य जातियों के लोग राजा तुल्य होते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि राजा का पुत्र राजा ही हो, उसके लिये निम्नलिखित में से किसी एक का होना नितांत आवश्यक है, कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि राजवंश में जन्म पाने वाला जातक भी सामान्य व्यक्ति होता है, और सामान्य वंश और स्थिति में जन्म पाने वाला महान हो जाता है, उसका यही कारण है। यदि त्रिकोण में 3-4 ग्रह बलवान हों तो राजवंशीय राजा होते हैं। जब 5-6-7 भाव में ग्रह उच्च अथवा मूल त्रिकोण में हों तो, अन्य वंशीय जातक भी राजा होते हैं। मेष के सूर्य चंद्र लग्नस्थ हों और मंगल मकर का तथा शनि कुंभ का बृहस्पति धनु का हो तो, राजवंशीय राजा होता है।

यदि शुक्र 2, 7 राशि का चतुर्थ भाव में और नवम स्थान में चंद्रमा हो और सभी ग्रह 3,1,11 भाव में ही हों तो, ऐसा जातक राजवंशीय राजा होता है। बलवान बुध लग्न में और बलवान शुक्र तथा बृहस्पति नवम स्थान में हो और शेष ग्रह 4, 2, 3, 6, 10, 11 भाव में ही हों तो, ऐसा राजपुत्र धर्मात्मा और धनी-मानी राजा होता है। यदि वृष का चंद्रमा लग्न में हो और मिथुन का बृहस्पति, तुला का शनि और मीन राशि में अन्य रवि, मंगल, बुध तथा शुक्र ग्रह हों तो, राजपुत्र अत्यंत धनी होता है। दशम चन्द्रमा, ग्याहरवां शनि, लग्न का गुरू, दूसरा बुध और मंगल, से राजपुत्र राजा ही होेता है। किंतु यदि मंगल शनि लग्न में चतुर्थ चंद्रमा और सप्तम बृहस्पति, नवम, शुक्र, दशम सूर्य, ग्यारहवें बुध हो तो, भी यही फल होता है। चतुर्थ में सूर्य और शुक्र होने से राजपुत्र राजा ही होेता है। किंतु यदि मंगल शनि लग्न में चतुर्थ चंद्रमा और सप्तम बृहस्पति, नवम, शुक्र, दशम सूर्य, ग्यारहवें बुध हो तो, भी यही फल होता है। एक बात सबसे अधिक ध्यान देने की यह है कि राजयोग का निर्माण करने वाले समस्त ग्रहों में से जो ग्रह दशम तथा लग्न में स्थित हों तो, उनकी अन्तर्दशा में राज्य लाभ होगा जब दोनों स्थानों में ग्रह हों तो, उनसे भी अधिक शक्तिशाली राज्य लाभ होगा, उसके अन्तर्दशा में जो लग्न, दशम में अनेक ग्रह हों तो, उनमें जो सर्वाेत्तम बली हो, उसके प्रभाव के द्वारा ही राज्य का लाभ हो सकेगा। बलवान ग्रह द्वारा प्राप्त हुआ राज्य भी छिद्र दशा द्वारा समाप्त हो जाता है। यह जन्म कालिक शत्रु या नीच राशिगत ग्रह की अन्तर्दशा छिद्र दशा कहलाती है। जो राज्य को समाप्त करती है, अथवा बाधायें उपस्थित करती है। यदि बृहस्पति, शुक्र और बुध की राशियां 4, 12, 6, 2, 3, 6 लग्न में हों, और सातवां शनि तथा दशम सूर्य हो तो, भी मनुष्य धन रहित होकर भी भाग्यवान होता है, और अच्छे साधन उसके लिये सदा उपलब्ध होते हैं। यदि केन्द्रगत ग्रह पाप राशि में हों, और सौम्य राशियों में पापग्रह होें तो, ऐसा मनुष्य चोरों का राजा होता है। इस प्रकार से विभिन्न राजयोगों के होने पर मनुष्य सुख और ऐश्वर्य का भोग करता।

मेरे और लेख देखें :- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in, gurujiketotke.com,vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com पर भी।

ज्योतिष रोग और उपाय

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर बीमारी का समबन्ध किसी न किसी ग्रह से है, जो आपकी कुंडली में या तो कमजोर है, या फिर दुसरे ग्रहों से बुरी तरह पीड़ित है। यहाँ इस लेख में मैं सभी रोगों की चर्चा नहीं कर पाऊंगा, इसके लिए मेरी पुस्तक “रोग एवं ज्योतिष” का अध्ययन करने की सलाह दूंगा। यहां केवल सामान्य रोग जो आजकल बहुत से लोगों को हैं, उन्ही की चर्चा संक्षेप में करने की कोशिश करता हूँ। यदि स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है तो, आज धनवान कोई नहीं है, हर किसी को कोई न कोई रोग होता ही है। हर व्यक्ति के शरीर की संरचना अलग होती है। किसे कब क्या कष्ट होगा? यह तो डाक्टर भी नहीं बता सकता, परन्तु ज्योतिष इसकी पूर्वसूचना अवश्य दे देता है कि जातक कब और किस रोग से पीड़ित हो सकता है, या क्या व्याधि आपको शीघ्र प्रभावित करने वाली है। आईये ग्रहों की कमजोर स्थिति से कौन कौन से रोग हो सकते हैं जाने :-

सूर्य से संबंधित रोग :-

सूर्य ग्रहों का राजा है, इसलिए यदि सूर्य आपका बलवान है तो बीमारियाँ कुछ भी हों आप कभी परवाह नहीं करेंगे, क्योंकि आपकी आत्मा बलवान होगी, और आप में आत्मबल भरपूर होगा। आप शरीर की मामूली व्याधियों की परवाह नहीं करेंगे। परन्तु सूर्य अच्छा नहीं है, कमजोर है तो, सबसे पहले आपके बाल झड़ेंगे, सर में दर्द अक्सर होगा और आपको अक्सर दर्द-निवारक का सहारा लेना ही पड़ेगा।

चन्द्रमा से सम्बन्धित रोग :-

चन्द्रमा संवेदनशील लोगों का अधिष्ठाता ग्रह है। यदि चन्द्रमा दुर्बल हुआ तो मन कमजोर होगा, और जातक भावुक अधिक होगा, कठोरता से तुरंत प्रभावित हो जाता है, और उसमें सहनशक्ति भी कम होगी। इसके बाद सर्दी जुकाम और खांसी कफ जैसी व्याधियों से शीग्र प्रभावित हो जायेगा, एसे लोगों को सलाह है कि संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में न आयें क्योंकि उनको भी संक्रमित होते देर नहीं लगेगी। चन्द्रमा अधिक कमजोर होने से नजला से पीड़ित होंगे, चन्द्रमा की वजह से नर्वस सिस्टम भी प्रभावित होता है।

मंगल से सम्बन्धित रोग :-

मंगल रक्त में ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है, परन्तु जिनका मंगल कमजोर होता है, रक्त की बीमारियों के अतिरिक्त जोश की कमी होगी। ऐसे व्यक्ति हर काम को धीरे-धीरे करेंगे, आपने देखा होगा कुछ लोग हमेशा सुस्त दिखाई देते हैं, और हर काम को भी उस ऊर्जा से नहीं कर पाते, अधिक खराब मंगल से चोट चपेट और एक्सीडेंट आदि का खतरा भी बना रहता है।

बुध से सम्बन्धित रोग :-

अच्छा बुध वाक्-चातुर्य और व्यक्ति को चालाक बनाता है, और कमजोर बुध बुद्धू या धूर्त बनाता है, आज के समय में यदि आप में वाक्-चातुर्य नहीं है तो दुसरे लोग आपका हर दिन फायदा उठाएंगे। भोले भाले लोगों का बुध अवश्य कमजोर होता है। अधिक खराब बुध से व्यक्ति को एलर्जी व चमड़ी के रोग अधिक होते हैं, नर्वसनेस, साँस की बीमारियाँ बुध के दूषित होने से होती हैं। बेहद खराब बुध से व्यक्ति के फेफड़े खराब होने का भय रहता है। व्यक्ति हकलाता है तो भी बुध के कारण और गूंगा बहरापन भी बुध के कारण ही होता है।

बृहस्पति से सम्बन्धित रोग :-

बृहस्पति जातक को ज्ञान देता है, विद्वान बनाता है, बुद्धिमान बनता है, परन्तु पढ़े लिखे लोग यदि मूर्खों जैसा व्यवहार करें तो, समझ लीजिये कि इस व्यक्ति का बृहस्पति कुंडली में खराब है। बृहस्पति सोचने समझने की शक्ति को प्रभावित करता है, और व्यक्ति जडमति हो जाता है। इसके अतिरिक्त बृहस्पति कमजोर होने से पीलिया या पेट के अन्य रोग होते हैं। बृहस्पति यदि दुष्ट ग्रहों से प्रभावित होकर लग्न को प्रभावित करता है तो, मोटापा देता है। अधिकतर लोग जो शरीर से काफी मोटे होते हैं, उनकी कुंडली में गुरु की स्थिति कुछ ऐसी ही होती है।

शुक्र से सम्बन्धित रोग :-

शुक्र मनोरंजन तथा एशो-आराम का कारक ग्रह है। शुक्र स्त्री, यौन सुख, वीर्य और हर प्रकार के सुख और सुन्दरता का कारक ग्रह है। यदि शुक्र की स्थिति कमजोर हो तो, जातक के जीवन से सुख के साधन तथा मनोरंजन को समाप्त कर देता है। नपुंसकता या सेक्स के प्रति अरुचि का कारण अधिकतर शुक्र ही होता है। मंगल की दृष्टि या प्रभाव निर्बल शुक्र पर हो तो, जातक को ब्लड शुगर हो जाती है। इसके अतिरिक्त शुक्र के अशुभ होने से व्यक्ति के शरीर को बेडोल बना देता है। बहुत अधिक पतला शरीर या ठिगना कद शुक्र की अशुभ स्थिति के कारण होते हैं।

शनि से सम्बन्धित रोग :-

शनि दर्द या दुःख का करता ग्रह है, जितने प्रकार की शारीरिक व्याधियां हैं, उनके परिणामस्वरूप व्यक्ति को जो दुःख और कष्ट प्राप्त होता है, उसका कारक शनि होता है। शनि का प्रभाव दुसरे ग्रहों पर हो तो शनि उसी ग्रह से सम्बन्धित रोग देता है। शनि की दृष्टि सूर्य पर हो तो जातक कुछ भी कर ले सर दर्द कभी पीछा नहीं छोड़ता। चन्द्र पर हो तो जातक को नजला-जुकाम रहता है। मंगल पर हो तो, रक्त में न्यूनता या ब्लडप्रेशर, बुध पर हो तो नपुंसकता, गुरु पर हो तो मोटापा, शुक्र पर हो तो वीर्य के रोग या प्रजनन क्षमता को कमजोर करता है, और राहू पर शनि के प्रभाव से जातक को उच्च और निम्न रक्तचाप दोनों से पीड़ित होना पड़ता है। केतु पर शनि के प्रभाव से जातक को गम्भीर रोग होते हैं, परन्तु कभी रोग का पता नहीं चलता, और एक उम्र निकल जाती है, पर बीमारियों से जातक जूझता रहता है। दवाई असर नहीं करती, और अधिक विकट स्थिति में लाइलाज रोग शनि ही आकर देता है |

राहू से सम्बन्धित रोग:-

राहू एक रहस्यमय ग्रह है, इसलिए राहू से जातक को जो रोग होंगे वह भी रहस्यमय ही होते हैं। एक के बाद दूसरी तकलीफ राहू से ही होती है। राहू अशुभ हो तो जातक की दवाई चलती रहती है, और डाक्टर के पास आना जाना लगा रहता है। किसी दवाई से रिएक्शन या एलर्जी राहू से ही होती है। यदि डाक्टर पूरी उम्र के लिए दवाई निर्धारित कर दे तो वह राहू के अशुभ प्रभाव से ही होती है। वहम यदि एक बीमारी है तो यह राहू देता है। डर के मारे हार्ट-अटैक राहू से ही होता है। अचानक हृदय गति रुक जाना या स्ट्रोक राहू से ही होता है।

केतु से सम्बन्धित रोग :-

केतु का संसार अलग है। यह जीवन और मृत्यु से परे है। जातक को यदि केतु से कुछ होना है तो, उसका पता देर से चलता है, यानी केतु से होने वाली बीमारी का पता चलना मुश्किल हो जाता है। केतु थोडा सा खराब हो तो, फोड़े फुंसियाँ देता है, और यदि थोडा और खराब हो तो, घाव जो देर तक न भरे वह केतु की वजह से ही होता है। केतु मनोविज्ञान से सम्बन्ध रखता है। ऊपरी असर या भूत-प्रेत बाधा केतु के कारण ही होती है। असफल इलाज के बाद दुबारा इलाज केतु के कारण आरंभ होता है।

नोट :- “रोग एवं ज्योतिष” इस सम्बन्ध में गम्भीरता से विचार करके अधिक से अधिक कुंडलियों का अध्ययन करने के पश्चात् यह किताब लिखी है। ज्योतिष के विद्यार्थियों को इस पुस्तक का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।

मेरे और लेख देखें :- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in,gurujiketotke.com, vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com पर भी।