प्रेमी-प्रेमिका और शुक्र

प्रेम और विलासिता का कारक शुक्र :-

Dr.R.B.Dhawan

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प्रेमी-प्रेमिका में झगडे क्यों होते हैं? आईये इसका कारण ज्योतिष शास्त्र से जानते हैं- किसी भी जन्मकुण्डली में प्रेमी का स्थान पाँचवां होता है, जातक का अपना स्थान प्रथम स्थान है। अच्छी रिलेशनशिप तभी रह सकती है, जब प्रथम स्थान के स्वामी ग्रह और कुण्डली से पाँचवे स्थान के स्वामी ग्रह मित्र होंगे। यह तो हुई साधारण बात, अब यह भी देखना होगा की जातक की रिलेशनशिप से किसी दूसरे का हाजमा तो खराब नहीं हो रहा ? :- (रिलेशनशिप से प्राब्लम) कहीं वह गुप्त दुश्मनी तो नहीं निभा रहा ? यह पता चलेगा जातक की कुण्डली के पंचमेश की सेहत देखने से! पंचमेश की सेहत खराब करने के लिये कुण्डली के षष्ठेश या अष्ठमेश जिम्मेदार हो सकते हैं, अर्थात् पंचमेश षष्ठ या अष्ठम में नहीं होना चाहिए, अथवा षष्ठेश या अष्ठमेश के साथ नहीं होना चाहिए, या फिर षष्ठेश या अष्ठमेश पंचम में नहीं होना चाहिए। यह तो हुई बड़ी वजह, इसके अतिरिक्त एेसा भी हो सकता है की जातक का कोई सगा सम्बंधी ही इस खेल को बिगाड़ने में लगा हो।

वैवाहिक सुख का कारक ग्रह शुक्र :-

आज का युग बहुत तेज गति से शुक्र प्रधान हो रहा है, बेशक ज्योतिष के विद्वानों को मेरी यह बात कुछ अटपटी सी लगेगी। परंतु तथ्य यही बताते हैं कि बढ़ी तेजी से यह युग बदल रहा है। पहले एक छोटा सा उदाहरण प्रस्तुत है- आज से 50-100 वर्ष पूर्व लोग या तो पैदल यात्रा करते थे या फिर पशुओं का अथवा पशुओं द्वारा चलित वाहनों का प्रयोग करते थे। अर्थात् गुरू (जीव प्रधान) वाहन का प्रयोग किया जाता था। जो आज धीरे-धीरे करके आरामदायक (शुक्र प्रधान) वाहन ने ले ली है। पशुओं से चलने वाले वाहनों की जगह अब स्वचालित लग्जरी वाहनों ने ले ली है। इस प्रकार प्राणीयों का प्रतीक गुरू शीण हो गया है। दूसरा उदाहरण- एक जमाना था जब बड़ी-बूढी अपनी बहुओं को आशिर्वाद देती थी- “दूधों नहाओ पूतों फलो” आज इसमें से दूधों नहाओ तो ठीक है, परंतु “पूतों फलो” भला किस नवविवाहिता को पसंद आती है? इस आशिर्वाद का पूतों फलो वाला भाग भी गुरू का विभाग है। जो नवविवाहिता बहुओं को पसंद नहीं, क्योंकि अधिक संतान के लिये आज इस वर्ग के विचार बदल गये हैं, यहाँ भी गुरू निर्बल प्रतीत होता है। तीसरा उदाहरण- विद्वान, आचार्य व गुरू जो अपने प्रवचन के द्वारा समाज को धर्म के मार्ग पर चलने के लिये दिशा दिखाने का कार्य करते थे, आज इन्हें सुनने का समय किसके पास है, यदि गलती से कहीं आमना-सामना हो भी जाये तो आज की नई पीढ़ी उनसे जान छुडाना चाहते हैं। इसी प्रकार वह अध्यापक जिनके चरण छूकर विद्यार्थी मान-सम्मान करते थे, आज वह कितनी दयनीय स्थिति में हैं? यह अध्यापक एेसे शिल्पकार हैं, जिनसे शिक्षा पाकर विद्यार्थीकाल अपने और देश के भाग्य का निर्माण करने की ताकत रखते हैं, परंतु जिस गुरू ने उन्हें इस योग्य बनाया है। उस गुरू की कितनी इज्जत हो रही है? किसी से छिपा नहीं। क्या यह गुरू का बल कम नहीं हो रहा? दूसरी ओर शिक्षा का आधुनिकीकरण करती शिक्षण संस्थायें (शुुक्र) फल-फूल रही हैं। एक उदाहरण और देता हूँ- बच्चे जवान हो जायें तो आज कितने एेसे माता-पिता हैं जिन्हें कन्या के लिये वर और बालक के लिये वधु ढूडने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। माता-पिता द्वारा पसंद युवक के लिये युवती, तथा कन्या के लिये वर (गुरू बल) के स्थान पर आजकल लव मेरिज (शुक्र बल) का प्रचलन अधिक हो चला है। आध्यात्मिकता, सहनशीलता, विवेक, बुद्धिमत्ता तथा अध्ययनशीलता (गुरू) की जगह आज सुंदरता, विलासिता और अश्लीलता (शुक्र) ने ले ली है। अब आप ही बतायें पूर्वकाल में विश्वगुरू कहलाने वाला हमारा भारत आने वाले कुच्छ ही वर्षों में क्या कहलायेगा ?

प्रेम सम्बन्ध :-
अब देखते हैं, जन्म कुंडली मे कौन से एेसे योग होते हैं, जो प्रेम संबंध की सूचना देते हैं- कब ये शारीरिक सम्बन्ध स्तर पर भी होते है ? क्या कुण्डली में ऐसी स्थितियाँ भी है जो संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा तनाव भी देंगी ? क्या ये संबंध दुनियाँ से छिपे रह सकते है ? क्या प्रेम संबंधों में अलगाव (Break up) तो नही है ? क्या एक से अधिक भी प्रेम संबंध होंगे ? क्या प्रेम संबंध विवाह में परिणित होगें ? यह सब प्रश्न हैं आज के युवा वर्ग के।
भारतीय ज्योतिष पद्धति के द्वारा हम इन सभी स्थितियों को जन्म पत्रिका के माध्यम से देख सकते हैं ।और विश्लेषित भी कर सकते हैं, और उस समय विशेष की गणना भी कर सकते हैं । जब इनमे से कोई भी स्थिति हमारे जीवन मे घटित होगी ? आईये देखें जन्म पत्रिका में कौन सी स्थितियाँ बनाती है प्रेम संबंध ?- जन्म कुण्डली का पंचम भाव (5th house) हमारी कला कौशल के साथ प्रेम तथा भावनाओं का ओर दिल से किये गए कार्य का स्थान होता है । जन्म कुंडली मे चंद्रमा, शुक्र और मंगल प्रमुख ग्रह हैं, जो अपने आपसी सम्बन्धो के आधार पर व्यक्ति को एक विशेष आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करते हैं, तथा जातक को प्रेम करने को वशीभूत करते हैं। चंद्रमा मन का कारक है । जन्म पत्रिका में मजबूत चंद्रमा विचारों को शक्ति प्रदान करता है। मन में कल्पनाशीलता ओर भावनाएँ जगाता है, और जातक परम्पराओ को तोड़कर दुनिया की परवाह किये बगैर प्रेम के रास्ते पर आगे बढ़ता है, जब कुण्डली में चंद्रमा का संबध किसी भी प्रकार से शुक्र से होता है तो, व्यक्ति प्यार में कल्पनाओ की उड़ान भरता है, और शीघ्र ही विपरीत लिंग की तरफ आकर्षित हो जाता है।

जन्म कुंडली में मंगल + शुक्र का संबंध जब जन्म कुंडली में 1, 2, 3, 5, 7, 11,12 भावो में बनता है, तब व्यक्ति आकर्षण का केंद्र होता है, और साथ ही स्वयं भी विपरीत लिंग की ओर शीघ्र आकर्षित होता है।जन्म कुंडली में जब इन स्थितियों के साथ पंचम भाव तथा पमचमेश से संबंध बनाने वाले किसी भी ग्रह की अथवा चंद्रमा, शुक्र, मंगल से संबंधित दशाएँ अन्तरदशाएँ आती हैं तो, जातक प्रेम करता है ।

जब पंचम भाव अथवा पंचमेश का शुभ संबंध केंद्र त्रिकोण से अथवा एकादश भाव (11th house) से शुभ भावों में होता है तो, ये सच्चा ओर आदर्श प्रेम संबध होता है । यदि इन संबंधों में द्वादश भाव भी सम्मलित हो जाता है तो, ये प्रेम शारीरिक स्तर पर भी प्रकट हो जाता है। जब इन सम्बन्धो में द्वादश भाव के साथ अष्टम भाव या अष्टमेश सम्मलित होता है तोे, संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा, तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है । जब प्रेम संबंधों में सप्तम भाव अथवा सप्तमेश का समावेश होता है तो, ये संबंध अन्य स्थितियों के सकारात्मक होने पर प्रेम विवाह में परिणित हो जाते हैं। शुभ गुरु और शनि प्रेम संबंधों ओर विवाह की स्थितियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां तक कि इनसे गुरु का सबंध कभी भी प्रेम संबंधों को दुनियां के समक्ष उजागर तक नही होने देता ।

सभी वर्ग कुंडलियों, अष्टक वर्ग, ग्रहो के किसी विशेष बल, कुण्डली में बने विशेष संबंधों ओर योगायोगों का, संबंधित शुभ अशुभ दशाओं अन्तरदशाओं, संबंधित शुभ अशुभ गोचर का गहन अध्ययन तथा विश्लेशण करने के बाद ही कहा जा सकता है कि – प्रेम संबधो का कोई दर्दनाक अंत होगा या ये संबंध विवाह के रूप में जीवन को महकाएँगे! जन्म कुंडली मे जैसा दिखता है वैसा कभी नही होता, और जो होता है वह तो बहुत ही गहराई में ही छिपा है, जिसे देख पाना गहन कुण्डली विश्लेषण से ही संभव होता है। कुछ आसान, आवश्यक तथा सही समय पर किये गए सही उपाय, कुछ जन्म पत्रिका के अनुसार सकारात्मक ग्रहों का सहयोग, और कुछ सही मार्ग का चयन और सही दिशा में किया गया परिश्रम। सुखी और खुशियों से भरा जीवन दे सकते हैं।

एक निश्चित आयु में प्रत्येक युवक अथवा युवती की उत्कृट इच्छा रहती है कि उसे अपने मनोनुकूल सुंदर जीवन साथी मिले। एेसे हार्दिक तथा प्रबल आकर्षण का मूल श्रोत संगीत, आदर्षवादिता, कला-क्रीड़ा-सौंदर्य एवं शारीरिक विधान तथा प्रसाधन में ही अंतर्निहित है। उत्तरोत्तर परिवर्तनीय सभ्यता संस्कृति के कारण हमारे देश में भी पाश्चात्य देशों की तरह परिवार की सम्मति अथवा स्वीकृति का महत्व समाप्त होता जा रहा है, युवक व युवतियों का दृष्टिकोण इस प्रसंग में दिनानुदिन लोचपूर्ण तथा उदार होता जा रहा है, अतः स्वजातीय विवाह arenge marriage की अपेक्षा अंतर्जातीय विवाह love marriage की ओर इनका रूझान होता जा रहा है। ज्योतिष शास्त्र की दृिष्टि से देखें तो ज्ञात होता है कि ज्योतिष भी इन बंधनों को नही मानता। इसका मूल कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन ग्रहों के मूलभूत सिद्धांतों पर निर्भर है। अतएव युवक-युवतीयों अथवा नर-नारियों के प्रेम विवाह Love marriage की भावी संभावनाओं का निरूपण प्रस्तुत करना मेरी इस पुस्तक “विवाह एवं दाम्पत्य सुख” का एक उद्देश्य है। विवाह एवं दाम्पत्य सुख (Marriage & Happy Married Life) हाल ही में प्रकाशित हुई नयी पुस्तक है। इस पुस्तक में विवाह सुख के योग, विवाह में क्यों विलम्ब marriage delay होता है? विवाह के लिये तथा विवाहित दम्पतियों के गृहस्थ सुख में बाधाओं का निवारण marriage Life problems and solutions बताया गया है। अभी तक मेरी 10 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन सभी की जानकारी http://www.shukracharya.com पर उपलब्ध है।

मेरे और लेख देखें :- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in, gurujiketotke.com,vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com पर भी।

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रुद्राष्टकम्

श्री गोस्वामी तुलसीदास कृतं शिव रूद्राष्टक स्तोत्रं : –

Dr.R.B.Dhawan

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यूं तो भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सनातन ग्रंथों में, पुराणों में अनेक मंत्र उल्लेखित हैं, अनेक स्तुति व स्त्रोत भी हैं, जिनकी रचना अनेक ऋषियों और आचार्यों ने की है। जिनके जप व गान करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं, परंतु श्री शिव रुद्राष्टक स्त्रोत्र का महत्व और प्रभाव विलक्षण है। प्रतिदिन शिव रुद्राष्टक का पाठ किया जाए तो हर प्रकार की समस्याओं का समाधान स्वत: ही हो जाता है। साथ ही भगवान शिव की कृपा भी प्राप्त होती है। महाशिवरात्रि, श्रावण मास अथवा चतुर्दशी तिथि (मासिक शिवरात्रि) को इसका जप व गान किया जाए तो विशेष फल मिलता है।

श्री रामचरित मानस के उत्तर काण्ड में वर्णित इस रूद्राष्टक की कथा इस प्रकार है :- कागभुशुण्डि जो कि परम शिवभक्त थे। वह भगवान शिव को परमेश्वर एवं अन्य देवों से अतुल्य मानते थे। उनके गुरू श्री लोमेश थे जो भगवान शिव के साथ-साथ राम में भी असिम श्रद्धा रखते थे। इस कारण कागभुशुण्डि का अपने गुरू के साथ मत-भेद रहता था।
एक बार गुरूजी ने समझाया कि; स्वयं शिव भी राम नाम से आनन्दित रहते हैं, तो तू राम की महिमा को क्यों स्वीकार करने से इन्कार करता है। ऐसे प्रसंग को शिव विरोधी मान कर कागभुशुण्डि अपने गुरू से ही रूष्ट हो गए। इसके उपरांत कागभुशुण्डि ने एक बार एक महायज्ञ का आयोजन किया, परंतु अपने इस यज्ञ की सूचना अपने गुरू को नहीं दी। फिर भी सरल हृदय गुरू अपने भक्त के यज्ञ में समलित होने के लिए पहुँच गए। शिव पुजन में बैठे कागभुशुण्डि ने अपने गुरू लोमश को आया देखा। किन्तु अपने आसन से न उठे, न ही उनका कोई आदर सत्कार ही किया। सरल हृदय गुरू लोमश ने एक बार फिर इसका बुरा नहीं माना। पर महादेव तो महादेव ही हैं। वो अनाचार क्यों सहन करने लगे ? भविष्यवाणी हुई – अरे मुर्ख, अभिमानी ! तेरे सत्यज्ञानी गुरू ने सरलता वश तुझ पर क्रोध नहीं किया। लेकिन, मैं तुझे श्राप दुंगा। क्योंकि नीति का विरोध मुझे पसंद नहीं। यदि तुझे दण्ड ना मिला तो वेद मार्गी भ्रष्ट हो जाएंगे। जो गुरू से ईर्ष्या करते हैं, वो नर्क के भागी होते हैं। तू गुरू के समुख भी अजगर की भांति ही बैठा हुआ है। अत: अधोगति को पाकर अजगर बन जा तथा किसी वृक्ष की कोटर में ही रहना।
इस श्राप से दुःखी हो कर तथा अपने शिष्य के लिए क्षमा दान पाने की अपेक्षा से, शिव को प्रसन्न करने हेतु; ही गुरू लोमश ने प्रार्थना की तथा रूद्राष्टक की रचना और वाचना की तथा आशुतोष भगवान को प्रसन्न किया। इस कथा का सार है – शिव अनाचारी को क्षमा नहीं करते; बेशक वो उनका परम भक्त ही क्यूँ ना हो। परम शिव भक्त कागभुशुण्डि ने जब अपने गुरू की अवहेलना की तो; वे भगवान शिव के क्रोध-भाजन हुए। अपने शिष्य के लिए क्षमादान की अपेक्षा रखने वाले सहृदय गुरू लोमश ने रूद्राष्टक की रचना की तथा महादेव को प्रसन्न किया। गुरु के तप व शिव भक्ति के प्रभाव से यह शिव स्तुति मंगलकारी शक्तियों से सम्पन्न मानी जाती है। तथा मनुष्य के अहंकार को दूर कर उसे विनम्र बनाती है। शिव की इस स्तुति का वाचन करने से मन में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा, तनाव, द्वेष, ईर्ष्या और अहं दूर होता है। यह स्तुति सरल, सरस और भक्तिमय होने से शिव व शिव भक्तों को बहुत प्रिय है। इस स्तुति के पाठ से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं। यह कथा रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में वर्णित है।
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं

चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम।

हे भगवन ईशान को मेरा प्रणाम ऐसे भगवान जो कि निर्वाण रूप हैं, जो कि महान ॐ के दाता हैं, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण में व्यापत हैं, जो अपने आपको धारण किये हुए हैं, जिनके सामने गुण अवगुण का कोई महत्व नहीं, जिनका कोई विकल्प नहीं, जो निष्पक्ष हैं, जिनका आकार आकाश के सामान है, जिसे नापा नहीं जा सकता, उनकी मैं उपासना करता हूँ।
निराकारमोङ्करमूल, तुरीयं,

गिराज्ञानगोतीतमीशं, गिरीशम् ।

करालं महाकालकालं कृपालं

गुणागारसंसारपारं, नतोहम।

जिनका कोई आकार नहीं, जो ॐ के मूल हैं, जिनका कोई राज्य नहीं, जो गिरी के वासी हैं, जो कि सभी ज्ञान, शब्द से परे हैं, जो कि कैलाश के स्वामी हैं, जिनका रूप भयावह है, जो कि काल के स्वामी हैं, जो उदार एवम् दयालु हैं, जो गुणों का खजाना हैं, जो पुरे संसार के परे हैं उनके सामने मैं नत मस्तक हूँ।

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं

मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ।

स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा

लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा।

जो कि बर्फ के समान शील हैं, जिनका मुख सुंदर है, जो गौर वर्ण के हैं, जो गहन चिंतन में हैं, जो सभी प्राणियों के मन में हैं, जिनका वैभव अपार है, जिनकी देह सुंदर है, जिनके मस्तक पर तेज है, जिनकी जटाओ में लहलहाती गंगा हैं, जिनके चमकते हुए मस्तक पर चाँद हैं, और जिनके कंठ पर सर्प का वास हैं।

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं

प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं

प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि।

जिनके कानों में बालियाँ हैं, जिनकी सुन्दर भोहे और बड़ी-बड़ी आँखे हैं, जिनके चेहरे पर सुख का भाव है, जिनके कंठ में विष का वास है, जो दयालु हैं, जिनके वस्त्र शेर की खाल हैं, जिनके गले में मुंड माला है, ऐसे प्रिय शंकर पूरे संसार के नाथ हैं, उनको मैं पूजता हूँ।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं

अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।

त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं

भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम।

जो भयंकर हैं, जो परिपक्व साहसी हैं, जो श्रेष्ठ हैं अखंड हैं, जो अजन्मे हैं, जो सहस्त्र सूर्य के सामान प्रकाशवान हैं, जिनके पास त्रिशूल है, जिनका कोई मूल नहीं है, जिनमे किसी भी मूल का नाश करने की शक्ति है, ऐसे त्रिशूल धारी माँ भगवती के पति जो प्रेम से जीते जा सकते हैं, उन्हें मैं वन्दन करता हूँ।

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी

सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।

चिदानन्दसंदोह मोहापहारी

प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।

जो काल से बंधे नहीं हैं, जो कल्याणकारी हैं, जो विनाशक भी हैं,जो हमेशा आशीर्वाद देते हैं, और धर्म का साथ देते हैं, जो अधर्मी का नाश करते हैं, जो चित्त का आनंद हैं, जो जूनून हैं, जो मुझसे खुश रहें, ऐसे भगवान जो कामदेव के नाशी हैं, उन्हें मेरा प्रणाम।

न यावद्, उमानाथपादारविन्दं

भजन्तीह लोके परे वा नराणाम।

न तावत्सुखं शान्ति, सन्तापनाशं

प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।

जो यथावत नहीं हैं, ऐसे उमा पति के चरणों में वन्दन करता हूं, ऐसे भगवान को पूरे लोक के नर नारी पूजते हैं, जो सुख के सागर हैं, शांति हैं, जो सारे दु:खों का नाश करते हैं, जो सभी जगह वास करते हैं।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां

नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्।

जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं

प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।

मैं कुछ नहीं जानता, ना योग, ना ध्यान, आप देव के सामने मेरा मस्तक झुकता है, सभी संसारिक कष्टों, दुःख दर्द से मेरी रक्षा करें, मेरी बुढ़ापे के कष्टों से से रक्षा करें। मैं सदा ऐसे शिव शम्भु को प्रणाम करता हूँ।

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