कुबेर पूजन

धन त्रयोदशी तिथि पर किया जाता है- कुबेर पूजन।

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवलोक में वास करने वाले देवताओं के धनाध्यक्ष कुबेर हैं। कुबेर न केवल देवताओं के धनाध्यक्ष हैं, बल्कि समस्त यक्षों, गुह्यकों और किन्नरों, इन तीन देवयोनियों के अधिपति भी कहे गये हैं। ये नवनिधियों में पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और वर्चस् के स्वामी भी हैं। जब एक निधि भी अनन्त वैभवों को देने वाली मानी गयी है, और धनाध्यक्ष कुबेर तो गुप्त या प्रकट संसार के समस्त वैभवों के अधिष्ठाता देव हैं। यह देव उत्तर दिशा के अधिपति हैं, इसी लिये प्रायः सभी यज्ञ, पूजा उत्सवों तथा दस दिक्पालों के पूजन में उत्तर दिशा के अधिपति के रूप में कुबेर का पूजन होता है।

कुबेर कैसे बने धनाध्यक्ष ? :-
अधिकांश पुराण कथाओं के अनुसार पूर्वजन्म में कुबेर गुणनिधि नामक एक वेदज्ञ ब्राह्मण थे। उन्हें सभी शास्त्रों का ज्ञान था और सन्ध्या, देववंदन, पितृपूजन, अतिथि सेवा तथा सभी प्राणियों के प्रति सदा दया, सेवा एवं मैत्री का भाव रखते थे। वे बड़े धर्मात्मा थे, किंतु द्यूतकर्मियों की कुसंगति में पड़कर धीरे-धीरे अपनी सारी पैतृक सम्पत्ति गंवा बैठे थे। इतना ही नहीं, आदर्श आचरणों से भी च्युत हो गये थे। परंतु इनकी माता इनसे अत्यंत स्नेह करती थीं और इसी कारण वे इनके पिता से पुत्र के दुष्कर्मों की चर्चा न कर पाती थीं। एक दिन किसी अन्य माध्यम से उनके पिता को पता चला और उन्होंने गुणनिधि की माता से अपनी सम्पत्ति तथा पुत्र के विषय में पूछा तो पिता के कोपभय से गुणनिधि घर छोड़कर वन में चले गये। इधर-उधर भटकते हुये संध्या के समय वहां गुणनिधि को एक शिवालय दिखाई पड़ा। उस शिवालय में समीपवर्ती ग्राम के कुछ शिवभक्तों ने शिवरात्रिव्रत के लिए समस्त पूजन-सामग्री और नैवेद्यादि के साथ शिवाराधना का प्रबंध किया हुआ था। गुणनिधि भूखे तो थे ही, नैवेद्यादि देखकर उसकी भूख और तीव्र हो गयी। वह वहीं समीप में छुपकर उन भक्तों के सोने की प्रतीक्षा में उनके संपूर्ण क्रियाकलापों को बड़े ध्यान से देख रहे थे। रात्रि में उनके सो जाने पर जब एक कपड़े की बत्ती जलाकर पकवानों को लेकर भाग ही रहे थे कि उसका पैर एक सोये हुये पुजारी के पैर से टकरा गया और वह व्यक्ति चोर-चोर चिल्लाने लगा। गुणनिधि भागे जा रहे थे कि चोर-चोर की ध्वनि सुनकर नगर रक्षक ने उनके ऊपर बाण छोड़ा, जिससे उसी क्षण गुणनिधि के प्राण निकल गये। यमदूत जब उन्हेे लेकर जाने लगे तो भगवान् शंकर की आज्ञा से उनके गणों ने वहाँ पहुँचकर उन्हें यमदूतों से छुड़ा लिया और उन्हें कैलाशपुरी में ले आये। आशुतोष भगवान् शिव उनके अज्ञान में ही हो गये व्रतोपवास, रात्रि जागरण, पूजा-दर्शन तथा प्रकाश के निमित्त जलाये गये वस्त्रवर्तिका को आर्तिक्य मानकर उन पर पूर्ण प्रसन्न हो गये और उन्हें अपना शिवपद प्रदान किया। बहुत दिनों के पश्चात् वही गुणनिधि भगवान शंकर की कृपा से कलिंग नरेश होकर शिवाराधना करते रहे। पुनः पाद्मकल्प में वही गुणनिधि प्रजापति पुलस्त्य के पुत्र विश्रवामुनि की पत्नी और भारद्वाज मुनि की कन्या इडविडा (इलविला) के गर्भ से उत्पन्न हुये। विश्रवा के पुत्र होने से ये वैश्रवण कुबेर के नाम से प्रसिद्ध हुये तथा इडविडा के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण ऐडविड भी कहलाये। उत्तम कुल में उत्पन्न होने तथा जन्मान्तरीय शिवाराधना के अभ्यास योग के कारण वे बाल्यकाल से ही दिव्य तेज से सम्पन्न, सदाचारी एवं देवताओं के भक्त थे। उन्होंने दीर्घकाल तक ब्रह्माजी की तपस्या द्वारा आराधना की, इससे प्रसन्न होकर ब्रह्माजी देवताओं के साथ प्रकट हो गये और उन्होंने उसे लोकपाल पद, अक्षय निधियों का स्वामी, सूर्य के समान तेजस्वी पुष्पक विमान तथा देवपद प्रदान किया-

तग्दच्छ बत धर्मज्ञ निधीशत्वमपाप्रुहि।।
शक्राम्बुपयमानां च चतुर्थस्त्वं भविष्यसि।
एतच्च पुष्पकं नाम विमानं सूर्यसंनिभम्।।
प्रतिगृण्हीष्व यानार्थं त्रिदशैः समतां व्रज।
वा. रा. उ. 3। 18-20

वर देकर ब्रह्मादि देवगण चले गये। तब कुबेर ने अपने पिता विश्रवा से हाथ जोड़कर कहा कि ‘भगवन् ब्रह्माजी ने सब कुछ तो मुझे प्रदान कर दिया, किंतु मेरे निवास का कोई स्थान नियत नहीं किया। अतः आप ही मेरे योग्य कोई ऐसा सुखद स्थान बतलाइये, जहां रहने से किसी भी प्राणी को कोई कष्ट न हो।’ इस पर उनके पिता विश्रवा ने दक्षिण समुद्रतट पर त्रिकूट नामक पर्वत पर स्थित विश्वकर्मा द्वारा निर्मित, देवराज इन्द्र की अमरावती के समान अद्वितीय लंका नगरी कुबेर को प्रदान की और कहा कि वह नगरी स्वर्णनिर्मित है और वहां कोई कष्ट, बाधा नहीं है। पिता की आज्ञा से कुबेर लंकाध्यक्ष होकर बड़ी प्रसन्नता के साथ वहां निवास करने लगे। कुबेर शंकरजी के परम भक्त थे। बाद में इन्होंने भगवान शंकर की विशेष रूप में आराधना की तथा भगवान शंकर की कृपा से उन्होंने उत्तर दिशा का आधिपत्य, अलकानाम की दिव्यपुरी, नन्दनवन के समान दिव्य उद्यानयुक्त चैत्ररथ नामक वन तथा एक दिव्य सभा प्राप्त की। साथ ही वे माता पार्वती के कृपापात्र और भगवान शंकर के घनिष्ठ मित्र भी बन गये। भगवान शंकर ने कहा-

तत्सखित्वं मया सौम्य रोचयस्व धनेश्वर।
तपसा निर्जितश्चैव सखा भव ममानघ।।

‘हे सौम्य धनेश्वर! अब तुम मेरे साथ मित्रता का संबंध स्थापित करो, यह संबंध तुम्हें रूचिकर लगना चाहिये। तुमने अपने तप से मुझे जीत लिया है, अतः मेरा मित्र बनकर (यहां अलकापुरी में) रहो।’

पुराणों में कुबेर सभा का वर्णन:-
महाभारत, सभापर्व के 10वें अध्याय में राजाधिराज कुबेर की सभा का विस्तार से वर्णन है। तदनुसार उस सभा का विस्तार सौ योजन लम्बा और सत्तर योजन चौड़ा है। उसमें चन्द्रमा की शीतल श्वेतवर्ण की आभा उदित होती रहती है। इस सभा को कुबेर ने अपनी दीर्घ तपस्या के बलपर प्राप्त किया था। यह वैश्रवणी अथवा कौबेरी नाम की सभा कैलास के पार्श्रवभाग में स्थित है। इसमें अनेक दिव्य सुवर्णमय प्रासाद बने हुए हैं।
बीच-बीच में मणिजड़ित स्वर्णस्तम्भ बने हैं, जिसके मध्य में मणिमयमण्डित चित्र-विचित्र दिव्य सिंहासन पर ज्वलित कुण्डलमण्डित और दिव्य आभरणों से अलंकृत महाराज कुबेर सुशोभित रहते हैं। देवगण, यक्ष, गुह्यक, किन्नर तथा ऋषि-मुनि एवं दिव्य अप्सरायें उनकी महिमा का गान करते हुये वहाँ स्थित रहती हैं। इस सभा के चारों ओर मंदार, पारिजात और सौगन्धिक वृक्षों के उद्यान तथा उपवन हैं, जहां से सुगन्धित, सुखद शीतल, मंद हवा सभामंडप में प्रविष्ट होती रहती है। देवता, गंधर्व और अप्सरा के गण संगीत एवं नृत्य आदि से सभा को सुशोभित करते रहते हैं। इनकी सभा में रम्भा, चित्रसेना, मिश्रकेशी, घृताची, पुजिंकस्थला तथा उर्वशी आदि दिव्य अप्सरा नृत्य-गीत के द्वारा इनकी सेवा में तत्पर रहती हैं। यह सभा सदा ही नृत्य-वाद्य आदि से निनादित रहती है, कभी शून्य नहीं होती। कुबेर के सेवकों में मणिभद्र, श्वेतभद्र, प्रद्योत, कुस्तुम्बुरु, हंसचूड, विभीषण, पुष्पानन तथा पिंगलक आदि मुख्य सेवक हैं। राज्यश्री के रूप में साक्षात् महालक्ष्मी भी वहां नित्य निवास करती हैं। महाराज कुबेर के पुत्र मणिग्रीव और नलकूबर भी वहां स्थित होकर अपने पिता की उपासना करते हैं। साथ ही अनेक ब्रह्मर्षि, देवर्षि, राजर्षि भी महात्मा वैश्रवण की उपासना में रत रहते हैं।

गंधर्वों में तुम्बुरु, पर्वत, शैलूष, विश्वावसु, हाहा, हूहू, चित्रसेन तथा अनेक विद्याधर आदि भी अपने दिव्य गीतों द्वारा महाराज वैश्रवण की महिमा का गान करते रहते हैं। हिमवान्, पारियात्र, विन्ध्यादि पर्वत सेवा में प्रस्तुत रहते हैं तथा सभी देवयोनियाँ और शंख, पद्म आदि निधियां भी मूर्तिमान् रूप धारण कर उनकी सभा में नित्य उपस्थित रहती हैं। उमापति भगवान शिव भी महाराज कुबेर के अभिन्न मित्र होने के कारण त्रिशूल धारण किये हुये भगवती पार्वती के साथ वहां सुशोभित रहते हैं। इस प्रकार महाराज वैश्रवण की सभा ब्रह्मा तथा सभी लोकपाल की सभा से अति विचित्र एवं दिव्य है। राजाधिराज कुबेर इस सभा में स्थित होकर अपने वैभव का दान करते रहते हैं।

धनकुबेर और धन त्रयोदशी :-

धन त्रयोदशी तथा दीपावली के दिन धनाधिपति कुबेर के साथ साथ महालक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। देवताओं के धनाध्यक्ष महाराज कुबेर राजाओं के भी अधिपति हैं, क्योकि सभी निधियों, धनों के स्वामी यही देव हैं, अतः सभी प्रकार की निधियों या सुख, वैभव तथा वर्चस्व की कामना की पूर्ति, फल की वृष्टि करने में वैश्रवण कुबेर समर्थ हैं। सारांश में कहा जा सकता है कि धनाध्यक्ष कुबेर की साधना ध्यान करने से मनुष्य का दुःख-दारिद्रय दूर होता है और अनन्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। सनातन धर्म में गहरा विश्वास रखने वालों का अटल विश्वास है कि शिव के अभिन्न मित्र होने से कुबेर अपने भक्त की सभी विपत्तियों से रक्षा करते हैं, और उनकी कृपा से साधक में आध्यात्मिक ज्ञान-वैराग्य आदि के साथ-साथ उदारता, सौम्यता, शांति तथा तृप्ति आदि सात्त्विक गुण भी स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाते हैं।

राजाधिराज कुबेर की साधना-
महाराज वैश्रवण कुबेर की उपासना से संबंधित मंत्र, यंत्र, ध्यान एवं उपासना आदि की सारी प्रक्रियायें श्रीविद्यार्णव, मंत्रमहार्णव, मंत्रमहोदधि, श्रीतत्त्वनिधि तथा विष्णुधर्मोत्तरादि पुराणों में विस्तार से निर्दिष्ट हैं। तदनुसार इनके अष्टाक्षर, षोडशाक्षर तथा पंचत्रिंशदक्षरात्मक छोटे-बड़े अनेक मंत्र प्राप्त होते हैं। मंत्रों के अलग-अलग ध्यान भी निर्दिष्ट हैं। मंत्र साधना में गहन रूची रखने वाले साधक उपरोक्त ग्रन्थों का अवलोकन करें। यहाँ पाठकों के लिये धनाध्यक्ष कुबेर की एक सहज व सरल साधना पद्धति दी जा रही है। यह साधना धनत्रयोदशी के दिन की जानी चाहिये यदि कोई साधक इस साधना को दीपावली की रात्रि में करना चाहे तो उस महापर्व पर भी यह साधना कर सकते हैं। अथवा दोनो ही दिन (धनत्रयोदशी तथा दीपावली) यह साधना सम्पन्न की जा सकती है।

इस वर्ष धन त्रयोदशी 5 नवम्बर 2018 तथा दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है। यह साधना स्थिर लग्न में ही सम्पन्न की जाती है। क्योंकि स्थिर लग्न में जिस कार्य को किया जाता है वह स्थिरता को प्राप्त होता है, और लक्ष्मी को तो सभी स्थिर ही रखना चाहते हैं। अतः यह साधना तो अवश्य स्थिर लग्न में ही करनी चाहिये। ‘स्थिर लग्न’ इन दिनों में वृष तथा सिंह लग्न ही पढ रही हैं। वृषभ लग्न 5 नवम्बर 2018 धनत्रयोदशी के दिन सांयकाल 18 बजकर 05 मिनट से रात्रि 20 बजकर 00 मिनट तक रहेगी। तथा सिंह लग्न मध्य रात्रि में ठीक 24 बजकर 35 मिनट से 02 बजकर 52 मिनट तक रहेगी।

साधना पद्धति:- धनत्रयोदशी की रात्रि में उत्तर दिशा की ओर मुख करके पुरूष साधक पीले वस्त्र तथा महिलायें पीली साड़ी पहनकर बैठें सामने एक लकड़ी के पटरे पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाकर उस पर शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण प्राण प्रतिष्ठित श्री कुबेर यंत्र स्थापित करें, और साथ ही शुद्ध घी का दीपक जलाकर पंचोपचार पूजा करें मिठाई का भोग लगावें तथा विनियोगादि क्रिया करके 11 माला सप्तमुखी रूद्राक्ष की माला से कुबेर मंत्र का जप करें। जप सम्पूर्ण होने पर प्रसादरूप में मिठाई का परिजनों को वितरण करें और फिर रात्रि में उसी पूजा स्थल में ही निद्रा विश्राम करें। प्रातः शेष फूलादि सामग्री जल में विसर्जित कर दें तथा ‘शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण तथा प्राणप्रतिष्ठित श्री कुबेर यंत्र’ को पीले आसन सहित अपनी तिजोरी कैश बाॅक्स या अलमारी अथवा संदूक में रख दें। तथा रूद्राक्ष की जप माला को गले में धारण करें।

सम्पन्नता के लिये कुबेर मंत्र-
यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय स्वाहा।

वैसे तो इस मंत्र की जप संख्या एक लक्ष (एक लाख) कही गयी है। परंतु धन त्रयोदशी की रात्रि में जितना हो सके विधि-विधान से इस मंत्र का जप करना ही पर्याप्त होता है। मंत्र का जप सम्पन्न होने पर तिल एवं शुद्ध घी से दशांश हवन करना चाहिये। यह साधना कार्तिक कृष्ण 13 अर्थात् धन त्रयोदशी पर की जाती है, पूरे भारतवर्ष के लोग धन त्रयोदशी के दिन धनाधिपति कुबेर के साथ महालक्ष्मी तथा आरोग्य प्रदान करने वाले देव धनवंतरि की पूजा-आराधना एवं साधना करते हैं, और सुख संपदा के अभिलाषी तो इस दिन कुछ विशेष प्रयोग सम्पन्न करते हैं जिससे कि अगले पूरे वर्ष तक घर के सभी सदस्य प्रसन्न व निरोगी रहें, और उनके घर में श्रीलक्ष्मी का निवास और प्रसन्नता बनी रहे।

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शनि ग्रह

कैसा फल देता है शनि, अन्य ग्रहों के साथ? :-


Dr.R.B.Dhawan

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खगोलीय दृष्टि से शनि हमारे सौरमंडल में सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण में बारह राशियों में शनि को मकर और कुम्भ राशि का स्वामी मना गया है, शनि की उच्च राशि तुला तथा नीच राशि मेष है, शनि को एक क्रोधित ग्रह के रूप में उल्लेखित किया गया है। शनि का रंग काला है। शनि की गति नवग्रहों में सबसे धीमी है, इसी लिए शनि एक राशि में ढाई वर्ष तक गतिमान रहता है, और बारह राशियों के चक्र को तीस साल में पूरा करता है। ज्योतिष में शनि को कर्म, आजीविका, जनता, सेवक, नौकरी, अनुशाशन, दूरदृष्टि, प्राचीन वस्तु, लोहा, स्टील, कोयला, पेट्रोल, पेट्रोलयम प्रोडक्ट, चमड़ा, मशीन, औजार, तपस्या और अध्यात्म का कारक माना गया है। स्वास्थ की दृष्टि से शनि हमारे पाचन–तंत्र, हड्डियों के जोड़, बाल, नाखून,और दांत को नियंत्रित करता है। जन्मकुण्डली में यदि शनि का यदि अन्य ग्रहों से योग हो तो भिन्न भिन्न प्रकार के फल व्यक्ति को प्राप्त होते हैं, आईये उन्हें जानते हैं :-

शनि सूर्य – कुण्डली में शनि और सूर्य का योग बहुत शुभ नहीं माना गया है, यह जीवन में संघर्ष बढ़ाने वाला योग माना गया है, फलित ज्योतिष में सूर्य, शनि को परस्पर शत्रु ग्रह माना गया है, कुंडली में शनि सूर्य का योग होने पर व्यक्ति को आजीविका के लिए संघर्ष का सामना करना पड़ता है, विशेष रूप से करियर का आरंभिक पक्ष संघर्षपूर्ण होता है, और यदि शनि अंशों में सूर्य के बहुत अधिक निकट हो तो, आजीविका में बार बार उतार-चढ़ाव रहते हैं, शनि सूर्य का योग होने पर जातक को या तो पिता के सुख में कमी होती है, या पिता के साथ वैचारिक मतभेद रहते हैं, यदि शनि और सूर्य का योग शुभ भाव में बन रहा हो तो, ऐसे में संघर्ष के बाद सरकारी नौकरी का योग बनता है।

शनि चन्द्रमा – कुंडली में शनि और चन्द्रमा का योग होने पर व्यक्ति मानसिक रूप से हमेशा परेशान रहता है, मानसिक अस्थिरता की स्थिति रहती है, इस योग के होने पर नकारात्मक विचार, डिप्रेशन, एंग्जायटी और अन्य साइकैट्रिकल समस्याएं उत्पन्न होती हैं, व्यक्ति एकाग्रता की कमी के कारण अपने कार्यों को करने में समस्या आती है, यह योग माता के सुख में कमी या वैचारिक मतभेद भी उत्पन्न करता है, पर यदि शनि चन्द्रमा का योग शुभ भाव में बन रहा हो तो, ऐसे में विदेश यात्रा या विदेश से जुड़कर आजीविका का साधन बनता है।

शनि मंगल – कुंडली में शनि मंगल का योग भी करियर के लिए संघर्ष देने वाला होता है, करियर की स्थिरता में बहुत समय लगता है, और व्यक्ति को बहुत अधिक पुरुषार्थ करने पर ही सफलता मिलती है, शनि मंगल का योग व्यक्ति को तकनीकी कार्यों जैसे इंजीनियरिंग आदि में आगे ले जाता है, और यह योग कुंडली के शुभ भावों में होने पर व्यक्ति पुरुषार्थ से अपनी तकनीकी प्रतिभाओं के द्वारा सफलता पाता है, शनि मंगल का योग यदि कुंडली के छटे या आठवे भाव में हो तो, स्वास्थ में कष्ट उत्पन्न करता है, शनि मंगल का योग विशेष रूप से पाचन तंत्र की समस्या, जॉइंट्स पेन और एक्सीडेंट जैसी समस्याएं देता है।

शनि बुध – शनि और बुध का योग शुभ फल देने वाला होता है। कुंडली में शनि बुध के एक साथ होने पर ऐसा व्यक्ति गहन अध्ययन की प्रवृति रखने वाला होता है, और प्राचीन वस्तुएं, इतिहास और गणनात्मक विषयों में रुचि रखने वाला होता है, और व्यक्ति प्रत्येक बात को तार्किक दृष्टिकोण से देखने वाला होता है, कुंडली में शनि बुध का योग व्यक्ति को बौद्धिक कार्य, गणनात्मक और वाणी से जुड़े कार्यों में सफलता दिलाता है।

शनि बृहस्पति – शनि और बृहस्पति के योग को बहुत अच्छा और शुभ फल देने वाला माना गया है, कुंडली में शनि बृहस्पति एक साथ होने पर व्यक्ति अपने कार्य को बहुत समर्पण भाव और लगन के साथ करने वाला होता है, यह योग आजीविका की दृष्टि से बहुत शुभ फल देने वाला होता है, व्यक्ति अपने आजीविका के क्षेत्र में सम्मान और यश तो प्राप्त करता ही है, पर शनि बृहस्पति का योग होने पर व्यक्ति अपने कार्य क्षेत्र में कुछ ऐसा विशेष करता है, जिससे उसकी कीर्ति बहुत बढ़ जाती है। कुंडली में शनि और बृहस्पति का योग होने पर ऐसे व्यक्ति के करियर या आजीविका की सफलता में उसके गुरु का बहुत बड़ा विशेष योगदान होता है, यह योग धार्मिक, समाजसेवा और आध्यात्मिक कार्य से व्यक्ति को जोड़कर परमार्थ के पग पर भी ले जाता है।

शनि शुक्र – शनि और शुक्र का योग भी बहुत शुभ माना गया है, कुंडली में शनि और शुक्र का योग होने पर व्यक्ति रचनात्मक या कलात्मक कार्यों से सफलता पाता है, जीवन में आजीविका के द्वारा अच्छी धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, व्यक्ति विलासिता पूर्ण कार्य से आजीविका चलाता है, यदि पुरुष जातक की कुंडलीं में शनि शुक्र का योग हो तो, ऐसे व्यक्तियों के जीवन में उनके विवाह के बाद विशेष उन्नति और भाग्योदय होता है, तथा उनकी पत्नी जीवन निर्वाह में विशेष सहायक होती है।

शनि राहु – शनि और राहु का योग कुंडली में होने पर व्यक्ति वाक्-चातुर्य और तर्क से अपने कार्य सिद्ध करने वाला होता है, ऐसे में व्यक्ति को आकस्मिक धन प्राप्ति वाले कार्यों से लाभ होता है, व्यक्ति अपनी मुख्य आजीविका से अलग भी गुप्त रूप से धन लाभ प्राप्त करता है, और शुभ प्रभाव के आभाव में यह योग व्यक्ति को छल के कार्यों से भी जोड़ देता है।

शनि केतु – शनि और केतु का योग बहुत संघर्षपूर्ण योग माना गया है कुंडली में यदि शनि और केतु एक साथ हों तो, ऐसे में व्यक्ति की आजीविका या करियर बहुत संघर्ष पूर्ण होता है, व्यक्ति को पूरी मेहनत करने पर भी आपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, कई बार व्यक्ति अपनी आजीविका का क्षेत्र बदलने पर मजबूर हो जाता है, यह योग व्यक्ति में आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी उत्पन्न करता है, यदि कुंडली में अन्य अच्छे योग भी हों तो भी व्यक्ति के करियर की स्थिति तो अस्थिर ही बनी रहती है, शनि केतु का योग व्यक्ति को पाचनतंत्र, जोड़ो के दर्द और आंतो से जुडी समस्याएं भी देता है। यह तो हैं शनि के सामान्य लक्षण, अब बात कर लेते हैं, शनि देव की साढ़ेसाती की, क्योंकि शनि साढ़ेसाती अक्सर लोगों को भयभीत किसे रहती है।

शनि की साढ़ेसाती :-

साढ़ेसाती का नाम सुनते ही, अच्छे-अच्छे भयभीत हो उठते हैं। जैसे शनि ग्रह कोई भयानक राक्षस है! ‘बस जैसे ही आयेगा हमें कच्चा ही चबा जायेगा।

वस्तुतः ज्योतिष शास्त्र में शनि ग्रह को दुःख और पीडा का ‘सूचक’ ग्रह कहा गया है। परंतु सूचक का अर्थ यह नहीं की शनि ग्रह का समय केवल दुःख और पीडा ही लेकर आता है। शनि का समय केवल दुःख और पीडा के समय की सूचना मात्र देता है। दुःख और पीडा तो मनुष्य अपने पाप कर्मों के कारण प्राप्त करता है। यह ग्रह मनुष्य के द्वारा किये गये उसके अपने ही पाप कर्मों की सजा देता है।

शास्त्रों में पाप कर्म इस प्रकार वर्णित हैं- कर्मेन्द्रियों (नेत्रों, कर्णों, जिव्हा, नासिका व जन्नेद्रियों द्वारा, मन-वचन-कर्म के तथा मन) के द्वारा जो कर्म किये जाते हैं, अच्छे, बुरे या मध्यम होते हैं।

अच्छे या पुण्य कर्म वे हैं- जो दूसरों को सुख देने वाले होते हैं।

बुरे या पाप कर्म वे हैं- जो दूसरों को दुःख देने वाले होते हैं।

मध्यम कर्म- जो किसी को न तो दुःख ना ही सुख देते हैं।

इन तीनों श्रेणियों के कर्म भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं, जो मानसिक, शारीरिक तथा आर्थिक रूप से दूसरों को प्रभावित करते हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया के प्राकृतिक सिद्धांत के अनुसार मनुष्य अपने कृत कर्मों से दूसरों को जो भी देता है, वही लौटकर एक दिन उसे मिलता है। “अपना ही बीजा हुआ फल मिलता है” यह ‘कर्म सिद्धांत’ है।
कर्म सिद्धांत के अनुसार अच्छे कर्मों की सूचना शुभ ग्रह राजयोगों के रूप में देते हैं, तथा बुरे कर्मों की सूचना मानसिक, शारीरिक या फिर आर्थिक हानि ‘दुःख और पीडा’ के रूप में पाप ग्रह देते हैं। पाप ग्रहों में सर्वाधिक बलवान ग्रह शनि ग्रह है, इसी लिये यह दुःख और पीडा का सूचक ग्रह कहा गया है। शनि ग्रह यदि कुंडली में अत्यधिक कष्ट की सूचना दे रहा हो तो इसकी शांति के लिए छाया दान बहुत ही कारगर उपाय है।

आज इस लेख के माध्यम से में आपको छाया दान के विषय में बताता हूँ, जिसके द्वारा जातक शनि ग्रह महादशा, अंतर्दशा अथवा साढ़ेसाती में होने वाली भिन्न-भिन्न तरह की परेशानियों से निजात पा सकता है, इस लेख के माध्यम से आप समझ सकते हैं की छाया दान क्या है, और क्यों किया जाना चाहिए :- अक्सर ऐसा होता है कि व्यक्ति का बीता हुआ काल अर्थात भूतकाल अगर दर्दनाक रहा हो या अच्छा न रहा हो तो, वह व्यक्ति के आने वाले भविष्य को भी ख़राब करता है, और भविष्य बिगाड़ देता है। ऐसे समय में बिता हुआ कल आप का आज भी बिगड़ रहा हो, और बीता हुआ कल अच्छा न हो तो, निश्चित तोर पर कल भी बिगाड़ देगा। इससे बचने के लिये छाया दान करना चाहिए।
जीवन में जब तरह तरह कि समस्या आप का भूत काल बन गया हो तो, छाया दान से मुक्ति मिलती है, और कष्ट से आराम मिलता है।

1 . बीते हुए समय में पति पत्नी में भयंकर अनबन रही हो तो : –

अगर बीते समय में पति पत्नी के सम्बन्ध मधुर न रहा हों और उसके चलते आज वर्त्तमान समय में भी वो परछाई कि तरह आप का पीछा कर रहा हो तो, ऐसे समय में आप छाया दान करें और छाया दान आप बृहस्पत्ति वार के दिन कांसे कि कटोरी में घी भर कर पति पत्नी अपना मुख देख कर कटोरी समेत मंदिर में दान दें, इससे आप कि खटास भरे भूत काल से मुक्ति मिलेगा। और भविष्य काल मधुरतापूर्ण और सुखमय रहेगा।

2 . बीते हुए समय में हुई हो भयावह दुर्घटना या एक्सीडेंट :

अगर बीते समय में कोई भयंकर दुर्घटना हुई हो, और उस खौफ से आप समय बीतने के बाद भी नहीं उबार पाये हैं। मन में हमेशा एक डर बना रहता है,ओर आप कही भी जाते हैं तो, आप के मन में उस दुर्घटना का भय बना रहता है तो, आप छाया दान करें। आप एक मिटी के बर्तन में सरसों का तेल भर कर शनि वार के दिन अपनी छाया देख कर शनि मंदिर में दान करें। इससे आप को लाभ होगा, बीती हुई दर्दनाक स्मृति से छुटकारा मिलेगा। और भविष्य सुरक्षित रहेगा।

3 . बीते समय में व्यापर में हुआ घाटा आज भी डरा रहा है आप को :

कई बार ऐसा होता है कि बीते समय में व्यापारिक घाटे या बहुत बड़े नुकसान से आप बहुत मुश्किल से उबरे हों, और आज स्थिति ठीक होने के बावजूद भी आप को यह डर सता रहा है कि दुबारा वैसा ही न हो जाये तो, इससे बचने के लिए आप बुधवार के दिन एक पीतल कि कटोरी में घी भर कर उसमे अपनी छाया देख कर छाया पात्र समेत आप किसी ब्राह्मण को दान दें। इससे दुबारा कभी भी आप को व्यापार में घाटा नहीं होगा। और भविष्य में व्यापार भी फलता फूलता रहेगा।

4 . भूत काल कि कोई बड़ी बीमारी आज भी परछाई बन कर डरा रही हो :

बीते समय में कई बार कोई लम्बी बीमारी के कारण व्यक्ति मानसिक तौर पर उससे उबर नहीं पाता है। और ठीक होने के बावजूद भी मानसिक तौर पर अपने भूत काल में ही घिरा रहता है। तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति को शनिवार के दिन एक लोहे के पात्र में तिल का तेल भर कर अपनी मुख छाया देखकर उसका दान शनि मंदिर में करें। इससे आप को इस स्मृति से मुक्ति मिलेगी और भविष्य में बीमार नहीं होंगे, स्वस्थ्य रहेंगे।

5 लम्बे समय के बाद नौकरी मिली है, लेकिन भुतकाल का डर कि फिर बेरोजगार न हो जाये :

बहुत लम्बे समय की बेरोजगारी के बाद नौकरी मिलती है, लेकिन मन में सदेव एक भय सताता है कि दुबार नौकरी न चली जाये, और यह सोच एक प्रेत कि तरह आप का पीछा करती है तो, ऐसे स्थिति में आप सोमवार के दिन तांम्बे की एक कटोरी में शहद भर कर अपनी छाया देख कर ब्राह्मण को दान करना चाहिए, इससे आप को लाभ मिलेगा। इस छाया दान से उन्नति बनी रहती है, रोजगार बना रहता है।

6 .कुछ ऐसा काम कर चुके हैं जो गोपनीय है, लेकिन उसके पश्चाताप से उबर नहीं पाये हैं :
कई बार जीवन में ऐसी गलती आदमी कर देता है कि जो किसी को बता नहीं पता लेकिन मन ही मन हर पल घुटता रहता है, और भूत काल में कि गई गलती से उबर नहीं पता है तो, ऐसी स्थिति में व्यक्ति को पीतल कि कटोरी में बादाम के तेल में मुख देख कर शुक्रवार के दिन छाया दान करना चाहिए। इससे पश्चाताप कि अग्नि से मुक्ति मिलती है, और कि हुई गलती के दोष से मुक्ति मिलती है।

7 . पहली शादी टूट गयी, दूसरी शादी करने जा रहे हैं, लेकिन मन में वह भी टूटने का डर है :

संयोग वश या किसी दुर्घटना वश व्यक्ति कि पहली शादी टूट गयी है, और दूसरी शादी करने जा रहे हैं, और मन में भय है कि जैसे पहले हुआ था वैसे दुबारा न हो जाये तो, इसके लिए व्यक्ति को (स्त्री हो या पुरुष) रविवार के दिन ताँबे के पात्र में घी भरकर उसमे अपना मुख देख कर छाया दान करें। इससे भूत काल में हुई घटना या दुर्घटना का भय नहीं रहेगा। और भविष्य सुखमय रहेगा।

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