कुंडली का फलकथन (कुछ सूत्र):-

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

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कुंडली का फलकथन करने से पूर्व इन ज्योतिषीय सूत्रों को ध्यान में रखकर फलादेश करना चाहिए :-

1. किसी भी ग्रह की महादशा में उसी ग्रह की अन्तर्दशा अनुकूल फल नहीं देती।

2. योगकारक ग्रह (केन्द्र और त्रकोण का स्वामी ग्रह) की महादशा में पापी या मारक (त्रिषडाय) ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में शुभ फल तथा उत्तरार्द्ध में अशुभ फल मिलता है।

3. अकारक ग्रह की महादशा में कारक ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में अशुभ तथा उत्तरार्द्ध में शुभ फल की प्राप्ति होती है।

4. भाग्य स्थान का स्वामी यदि भाग्य भाव में बैठा हो, और उस पर गुरु की दृष्टि हो तो, ऐसा व्यक्ति प्रबल भाग्यशाली माना जाता है।

5. लग्न का स्वामी सूर्य के साथ बैठकर विशेष अनुकूल रहता है।

6. सूर्य के समीप निम्न अंशों तक जाने पर ग्रह अस्त हो जाते हैं, (चन्द्र-12 अंश, मंगल-17 अंश, बुध-13 अंश, गुरु-11 अंश, शुक्र-9 अंश, शनि-15 अंश) फलस्वरूप ऐसे ग्रहों का फल शून्य होता है। अस्त ग्रह जिन भावों के अधिपति होते हैं, उन भावों का फल शून्य ही समझना चाहिए।

7. सूर्य उच्च का होकर यदि ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली तथा पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त व्यक्तित्व वाले होते हैं।

8. सूर्य और चन्द्र को छोड़कर यदि कोई ग्रह अपनी राशि में बैठा हो तो, वह अपनी दूसरी राशि के प्रभाव को बहुत अधिक बढ़ा देता है।

9. किसी भी भाव में जो ग्रह बैठा है, इसकी अपेक्षा जो ग्रह उस भाव को देख रहा होता है, उसका प्रभाव ज़्यादा रहता है।

10. जिन भावों में शुभ ग्रह बैठे हों, या जिन भावों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो, वे भाव शुभ फल देने में सहायक होते हैं।

11. यदि एक ग्रह दो भावों का अधिपति होता है तो, ऐसी स्थिति में वह ग्रह अपनी दशा में लग्न से गिनने पर उस ग्रह की जो राशि पहले आएगी उसका फल वह पहले प्रदान करेगा।

12. दो केन्द्रों का स्वामी ग्रह यदि त्रिकोण के स्वामी के साथ बैठा है तो, उसे केंद्रत्व दोष नहीं लगता, और वह शुभ फल देने में सहायक हो जाता है। सामान्य नियमों के अनुसार यदि कोई ग्रह दो केंद्र भावों का स्वामी होता है तो, वह अशुभ फल देने लग जाता है, चाहे वह जन्म-कुंडली में करक ग्रह ही क्यों न हो।

13. अपने भाव से केन्द्र व त्रिकोण में पड़ा हुआ ग्रह शुभ होता है।

14. केंद्र के स्वामी तथा त्रिकोण के स्वामी के बीच यदि संबंध हो तो, वे एक दूसरे की दशा में शुभ फल देते हैं। यदि संबंध न हो तो, एक की महादशा में जब दूसरे की अंतर्दशा आती है तो, अशुभ फल ही प्राप्त होता है।

15. वक्री होने पर ग्रह अधिक बलवान हो जाता है, तथा वह ग्रह जन्म-कुंडली में जिस भाव का स्वामी है, उस भाव को विशेष फल प्रदान करता है।

16. यदि भावाधिपति उच्च, मूल त्रिकोणी, स्वक्षेत्री अथवा मित्रक्षेत्री हो तो शुभ फल करता है।

17. यदि केन्द्र का स्वामी त्रिकोण में बैठा हो, या त्रिकोण केंद्र में हो तो, वह ग्रह अत्यन्त ही श्रेष्ठ फल देने में समर्थ होता है। जन्म-कुंडली में पहला, पाँचवा तथा नवाँ स्थान त्रिकोण स्थान कहलाते हैं। परन्तु कोई ग्रह त्रिकोण में बैठकर केंद्र के स्वामी के साथ संबंध स्थापित करता है तो, वह न्यून योगकारक ही माना जाता है।

18. त्रिक स्थान (कुंडली के 6, 8, 12वें भाव को त्रिक स्थान कहते हैं) में यदि शुभ ग्रह बैठे हों तो, त्रिक स्थान को शुभ फल देते हैं परन्तु स्वयं दूषित हो जाते हैं, और अपनी शुभता खो देते हैं।

19. यदि त्रिक स्थान में पाप ग्रह बैठे हों तो, त्रिक भावों को पापयुक्त बना देते हैं, पर वे ग्रह स्वयं शुभ रहते हैं, और अपनी दशा में शुभ फल देते हैं।

19. त्रिक स्थान के स्वामी यदि किसी भी या अन्य त्रिक स्थान में बैठे हों तो, वे त्रिक स्वामी अपनी दशा या अंतरदशा में शुभ रहते हैं।

20. चाहे अशुभ या पाप ग्रह ही हों, पर यदि वह त्रिकोण भाव में या त्रिकोण भाव का स्वामी होता है तो, उसमे शुभता आ जाती है।

21. एक ही त्रिकोण का स्वामी यदि दूसरे त्रिकोण भाव में बैठा हो तो, उसकी शुभता समाप्त हो जाती है और वह विपरीत फल देते हैं। जैसे पंचम भाव का स्वामी नवम भाव में हो तो, संतान से संबंधित परेशानी रहती है, या संतान योग्य नहीं होती।

22. यदि एक ही ग्रह जन्म-कुंडली में दो केंद्र स्थानों का स्वामी हो तो, शुभफलदायक नहीं रहता। जन्म-कुंडली में पहला, चौथा, सातवाँ तथा दसवां भाव केन्द्र स्थान कहलाते हैं।

23. शनि और राहु विछेदात्मक ग्रह हैं, अतः ये दोनों ग्रह जिस भाव में भी होंगे संबंधित फल में विच्छेद करेंगे, जैसे अगर ये ग्रह सप्तम भाव में हों तो, पत्नी से विछेद रहता है। यदि पुत्र भाव में हों तो, पुत्र-सुख में न्यूनता रहती है।

24. राहू या केतू जिस भाव में बैठते हैं, उस भाव की राशि के स्वामी समान बन जाते हैं, तथा जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उस ग्रह के गुण ग्रहण कर लेते हैं।

25. केतु जिस ग्रह के साथ बैठ जाता है, उस ग्रह के प्रभाव को बहुत अधिक बड़ा देता है।

26. लग्न का स्वामी जिस भाव में भी बैठा होता है उस भाव को वह विशेष फल देता है, तथा उस भाव की वृद्धि करता है।

27. लग्न से तीसरे स्थान पर पापी ग्रह शुभ प्रभाव करता है, लेकिन शुभ ग्रह हो तो मध्यम फल मिलता है।

28. तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में पापी ग्रहों का रहना शुभ माना जाता जाता है।

29. तीसरे भाव का स्वामी तीसरे में, छठे भाव का स्वामी छठे में या ग्यारहवें भाव का स्वामी ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो, ऐसे ग्रह पापी नहीं रहते अपितु शुभ फल देने लग जाते हैं।

30. चौथे भाव में यदि अकेला शनि हो तो उस व्यक्ति की वृद्धावस्था अत्यंत दुःखमय व्यतीत होती है।

31. यदि मंगल चौथे, सातवें , दसवें भाव में से किसी भी एक भाव में हो तो, ऐसे व्यक्ति का गृहस्थ जीवन दुःखमय होता है। पिता से कुछ भी सहायता नहीं मिल पाती और जीवन में भाग्यहीन बना रहता है।

32. यदि चौथे भाव का स्वामी पाँचवे भाव में हो, और पाँचवें भाव का स्वामी चौथे भाव में हो तो, विशेष फलदायक होता है। इसी प्रकार नवम भाव का स्वामी दशम भाव में बैठा हो, तथा दशम भाव का स्वामी नवम भाव में बैठा हो तो, विशेष अनुकूलता देने में समर्थ होता है।

33. अकेला गुरु यदि पंचम भाव में हो तो संतान से न्यून सुख प्राप्त होता है, या प्रथम पुत्र से मतभेद रहते हैं।

34. जिस भाव की जो राशि होती है, उस राशि के स्वामी ग्रह को उस भाव का अधिपति या भावेश कहा जाता है। छठे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी जिन भावों में रहते हैं, उनको बिगाड़ते हैं, किन्तु अपवाद रूप में यदि यह स्वगृही ग्रह हों तो अनिष्ट फल नहीं करते, क्योंकि स्वगृही ग्रह का फल शुभ होता है।

35. छठे भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठेगा, उस भाव में परेशानियाँ रहेगी। उदहारण के लिए छठे भाव का स्वामी यदि आय भाव में हो तो वह व्यक्ति जितना परिश्रम करेगा उतनी आय उसको प्राप्त नहीं हो सकेगी।

36. यदि सप्तम भाव में अकेला शुक्र हो तो उस व्यक्ति का गृहस्थ जीवन सुखमय नहीं रहता और पति-पत्नी में परस्पर अनबन बनी रहती है।

37. अष्टम भाव का स्वामी जहाँ भी बैठेगा उस भाव को कमजोर ही करेगा।

38. शनि यदि अष्टम भाव में हो तो, उस व्यक्ति की आयु लम्बी होती है।

39. अष्टम भाव में प्रत्येक ग्रह कमजोर होता है, परन्तु सूर्य या चन्द्रमा अष्टम भाव में हो तो कमजोर नहीं रहते।

40. आठवें और बारहवें भाव में सभी ग्रह अनिष्टप्रद होते हैं, लेकिन बारहवें घर में शुक्र इसका अपवाद है, क्योंकि शुक्र भोग का ग्रह है, बारहवां भाव भोग का स्थान है। यदि शुक्र बारहवें भाव में हो तो, ऐसा व्यक्ति अतुलनीय धनवान एवं प्रसिद्ध व्यक्ति होता है।

41. द्वादश भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठता है, उस भाव को हानि पहुँचाता है।

42. दशम भाव में सूर्य और मंगल स्वतः ही बलवान माने गए हैं, इसी प्रकार चतुर्थ भाव में चन्द्र और शुक्र, लग्न में बुध तथा गुरु और सप्तम भाव में शनि स्वतः ही बलवान हो जाते हैं, तथा विशेष फल देने में सहायक होते हैं।

43. ग्यारहवें भाव में सभी ग्रह अच्छा फल करते हैं।

44. अपने स्वामी ग्रह से दृष्ट, युत या शुभ ग्रह से दृष्ट भाव बलवान होता है।

45. किस भाव का स्वामी कहाँ स्थित है, तथा उस भाव के स्वामी का क्या फल है, यह भी देख लेना चाहिए।

46. यदि कोई ग्रह जिस राशि में है, उसी नवमांश में भी हो तो, वह वर्गोत्तम ग्रह कहलाता है, और ऐसा ग्रह पूर्णतया बलवान माना जाता है, तथा श्रेष्ठ फल देने में सहायक होता है।

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गर्भाधान मुहूर्त

गर्भाधान और आधान लग्न :-

Dr.R.B.Dhawan

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जातक शास्त्र में जन्म लग्न को शुद्ध करने के लिये कुछ ज्योतिषीय योगों का उल्लेख मिलता है। जब किसी जातक का लग्न संधिकाल में हो और निर्णय करना कठिन हो, कि किस लग्न को स्वीकार किया जाये, तब लग्न को शुद्ध करने के लिये इन योगों की सहायता ली जा सकती है अथवा इन योगों की सहायता से किसी हद तक लग्न को शुद्धरूप में प्राप्त किया जा सकता है। यहां जातक ग्रन्थों से आधान लग्न के कुछ चुने हुये योग प्रस्तुत हैं, जिनकी सहायता से विद्वान ज्योतिषाचार्य लग्न निर्णय कर सकते हैं। आधान ज्ञान- प्रति मास मंगल और चन्द्रमा की राशि स्थिति के योग से स्त्रियों को ऋतु-धर्म हुआ करता है। जिस समय चन्द्रमा स्त्री जातिका की राशि से नेष्ट स्थान में हो, और शुभ पुरूष ग्रह (बृहस्पति) से देखा जाता हो, तथा पुरुष की राशि से दृष्ट-उपचय स्थान में हो, और बृहस्पति से दृष्ट हो तो, उस स्त्री को पुरूष का संयोग प्राप्त होगा। आधान लग्न से सप्तम भाव पर पाप ग्रह का योग या दृष्टि हो तो, रोषपूर्वक और शुभ ग्रह का योग एवं दृष्टि हो तो प्रसन्नतापूर्वक पति-पत्नी का संयोग होता है। आधान काल में जिस द्वादशांश में चन्द्रमा हो, उससे उतनी ही संख्या की अगली राशि में चन्द्रमा के जाने पर बालक का जन्म होता है। आधान काल में शुक्र, रवि, चन्द्रमा और मंगल अपने-अपने नवमांश में हों गुरू, लग्न अथवा केन्द्र या त्रिकोण में हों तो वीर्यवान पुरुष को निश्चय ही सन्तान प्राप्त होती है। यदि मंगल और शनि सूर्य से सप्तम भाव में हो तो, वे पुरुष के लिये तथा चन्द्रमा से सप्तम में हों तो स्त्री के लिये रोगप्रद होते हैं।

सूर्य से 12, 2 में शनि और मंगल हों तो, पुरुष के लिये और चन्द्रमा से 12-2 में ये दोनों हों तो, स्त्री के लिये घातक योग होता है, अथवा इन शनि, मंगल में से एक युत और अन्य से दृष्ट रवि हो तो, वह पुरुष के लिये और चन्द्रमा यदि एक से युत तथा अन्य से दृष्ट हो तो, स्त्री के लिये घातक होता है। दिन में गर्भाधान हो तो, शुक्र मातृग्रह और सूर्य पितृग्रह होते हैं। रात्रि में गर्भाधान हो तो, चन्द्रमा मातृग्रह और शनि पितृग्रह होते हैं। पितृग्रह यदि विषम राशियों में हो तो, पिता के लिये और मातृग्रह सम राशि में हो तो, माता के लिये शुभ कारक होता है। यदि पापग्रह बारहवें भाव में स्थित होकर पापग्रहों से देखा जाता हो, और शुभ ग्रहों से न देखा जाता हो, अथवा लग्न में शनि हो, तथा उस पर क्षीण चन्द्रमा और मंगल की दृष्टि हो, तो उस समय गर्भाधान होने से स्त्री का मरण होता है। लग्न और चन्द्रमा दोनों या उनमें से एक भी दो पापग्रहों के बीच में हो तो गर्भाधान होने पर स्त्री गर्भ के सहित मृत्यु को प्राप्त होती है।

लग्न अथवा चन्द्रमा से चतुर्थ स्थान में पापग्रह हो, मंगल अष्टम भाव में हो, अथवा लग्न से 4-12वें स्थान में मंगल और शनि हों, तथा चन्द्रमा क्षीण हो तो, गर्भवती स्त्री का मरण होता है। गर्भाधान काल में मास का स्वामी अस्त हो, तो गर्भपात होता है, इसलिये इस प्रकार के लग्न को गर्भाधान हेतु त्याग देना चाहिये। आधान कालिक लग्न या चन्द्रमा के साथ अथवा इन दोनों से 5-6-7-4-10वें स्थान में सब शुभ ग्रह हों, और 3-6-10वें भाव में सब पापग्रह हों तथा लग्न और चन्द्रमा पर सूर्य की दृष्टि हो तो, गर्भ सुखी रहता है। रवि, गुरू, चन्द्रमा, और लग्न-ये विषम राशि एवं नवमांश में हों, अथवा रवि और गुरू विषम राशि में स्थित हों तो, पुत्र का जन्म होता है, अथवा नपुंसक का जन्म होता है। शुक्र और चन्द्रमा सम राशि में हो तथा बुध मंगल लग्न और बृहस्पति विषम राशि में स्थित होकर पुरुष ग्रह से देखे जाते हों, अथवा लग्न एवं चन्द्रमा समराशि में हो या पूर्वोक्त बुध, मंगल लग्न एवं गुरू सम राशियों में हों तो यमल (जुड़वी सन्तान) को जन्म देने वाले होते हैं। उक्त सभी ग्रह यदि सम राशि और सम नवमांश में हों, अथवा मंगल चन्द्रमा और शुक्र ये समराशि में हों तो, विद्वजनों को कन्या का जन्म समझना चाहिये। ये सब द्विस्वभाव राशि में हों, और बुध से देखे जाते हों, तो अपने-अपने पक्ष के यमल (जुड़वी सन्तान) केे जन्म कारक होते हैं, अर्थात् पुरुष ग्रह दो पुत्रों के और स्त्री ग्रह दो कन्याओं के जन्मदाता होते हैं। यदि दोनों प्रकार के ग्रह हों तो, एक पुत्र और एक कन्या का जन्म समझना चाहिये। लग्न में विषम (3-5 आदि) स्थानों में स्थित शनि भी पुत्र जन्म का कारक होता है। क्रमशः विषम एवं समराशि में स्थित रवि और चन्द्रमा अथवा बुध और शनि एक दूसरे को देखते हों, अथवा सम राशिस्थ सूर्य को विषम राशिस्थ लग्न एवं चन्द्रमा पर मंगल की दृष्टि हो, अथवा चन्द्रमा समराशि और लग्न विषम राशि में स्थित हो, तथा उन पर मंगल की दृष्टि हो अथवा लग्न चन्द्रमा और शुक्र ये तीनों पुरुष राशियों के नवमांश में हों तो, इन सब योगों में नपुंसक का जन्म होता है।

शुक्र और चन्द्रमा सम राशि में हो तथा बुध मंगल लग्न और बृहस्पति विषम राशि में स्थित होकर पुरुष ग्रह से देखे जाते हों, अथवा लग्न एवं चन्द्रमा समराशि में हो या पूर्वोक्त बुध, मंगल लग्न एवं गुरू सम राशियों में हों तो, यमल (जुड़वी) सन्तान को जन्म देने वाले होते हैं। यदि बुध अपने (मिथुन या कन्या के) नवमांश में स्थित होकर द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह और लग्न को देखता हो तो, गर्भ में तीन सन्तान की स्थिति समझनी चाहिये। उनमें से दो तो बुध नवमांश के सदृश होंगे और एक लग्नांश के सदृश्य। यदि बुध और लग्न दोनाें तुल्य नवमांश में हों तो, तीनों सन्तानों को एक-सा ही समझना चाहिये। यदि धनु राशि का अंतिम नवांश लग्न हो, उसी अंश में बली ग्रह स्थित हों, और बलवान बुध या शनि से देखे जाते हों तो गर्भ में बहुत (तीन से अधिक) सन्तानों की स्थिति समझनी चाहिये। या पूर्वोक्त बुध, मंगल लग्न एवं गुरू सम राशियों में हों तो यमल (जुड़वी) सन्तान को जन्म देने वाले होते हैं।

गर्भ मासों के अधिपति:- शुक्र, मंगल, बृहस्पति, सूर्य, चन्द्रमा, शनि, बुध, आधान-लग्नेश, सूर्य, और चन्द्रमा ये गर्भाधान काल से लेकर प्रसव पर्यन्त दस मासों के क्रमशः स्वामी हैं। आधान समय में जो ग्रह बलवान या निर्बल होता है, उसके मास में उसी प्रकार शुभ या अशुभ फल होता है। बुध त्रिकोण (5-6) में हो, और अन्य ग्रह निर्बल हो तो गर्भस्थ शिशु के दो मुख, चार पैर, और चार हाथ होते हैं। चन्द्रमा वृष में और अन्य सब पाप ग्रह राशि संधि में हों तो, बालक गूंगा होता है। यदि उक्त ग्रहों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, और हाथ से रहित रहता है तो, वह बालक अधिक दिनों में बोलता है। मंगल और शनि यदि बुध की राशि नवमांश में हों तो शिशु गर्भ में ही दांत से युक्त होता है। चन्द्रमा कर्क राशि में होकर लग्न में हो, तथा उस पर शनि और मंगल की दृष्टि हो तो, गर्भस्थ शिशु कुबड़ा होता है। मीन राशि लग्न में हो, और उस पर शनि, चन्द्रमा, तथा मंगल की दृष्टि हो तो, गर्भ का बालक पंगु होता है।

पापग्रह और चन्द्रमा राशि संधि में हों, और उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो, गर्भस्थ शिशु जड़-बुद्धि (मूर्ख) होता है। मकर का अन्तिम अंश लग्न मे हो, और उस पर शनि चन्द्रमा तथा सूर्य की दृष्टि हो तो, गर्भ का बच्चा वामन (बौना) होता है। पंचम तथा नवम लग्न के द्रेष्काण में पापग्रह हो तो, जातक क्रमशः पैर, मस्तक और हाथ से रहित रहता है। गर्भाधान के समय यदि सिंह लग्न में सूर्य और चन्द्रमा हों, तथा उन पर शनि और मंगल की दृष्टि हो तो, शिशु नेत्रहीन अथवा नेत्रविकार से युक्त होता है। यदि शुभ और पापग्रह दोनों की दृष्टि हो तो आंख में फूला होती है। यदि लग्न से बाहरवें भाव में चन्द्रमा हो तो, बालक के वाम नेत्र, सूर्य हो तो दक्षिण नेत्र में कष्ट होता है। अशुभ योगों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो, उन योगों के फल परिवर्तित होकर सम हो जाते हैं।

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