नवरात्रि पूजा

नवरात्र पूजा और कलश स्थापना

Dr.R.B.Dhawan

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नवरात्र के 9 दिनों में नवदुर्गा की आराधना पूजा की जाती है। नवरात्र चाहे चैत्र के हों, या आषाढ़, अथवा आश्विन तथा माघ के हों, इन चार नवरात्रि (दो प्रत्यक्ष – चैत्र और आश्विन तथा दो गुप्त नवरात्र – आषाढ़ तथा माघ) महिनों में आते हैं। चैत्र नवरात्र के समय देवशयन तथा आश्विन नवरात्र के समय देव बोधन कहा गया है। आश्विन माह शुक्ल पक्ष में प्रथम 9 दिनों में पड़नें वाले नवरात्र शारदीय नवरात्रि भी कहलाते हैं। सभी नवरात्रि का अपना-अपना विशेष महत्व है। दुर्गा पूजा का वार्षिकोत्सव शारदीय नवरात्र में सम्पन्न किया जाता है। शास्त्रों में नवरात्र की विशेष महिमा बताई गई है। चैत्र और आश्विन मास शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तक (जो नवदुर्गा का समय है) यह समय साधना उपासना द्वारा शक्ति का संचय करने के लिए सबसे उत्तम समय है। नवरात्र नव शक्तियों से संयुक्त हैं, इस की एक-एक तिथि को एक-एक शक्ति के पूजन का विधान है। मार्कण्डेय पुराण में इन शक्तियों का नाम इस प्रकार बताया गया है :-

प्रथमं शैलपुत्रीति, द्वितीयं ब्रह्मचारिणी, तृतीयं चन्द्र-घण्टेति कुष्माणडेति चतुर्थकम् । पंचमम् स्कन्द मातेति, षष्ठं कात्यायनी तथा, सप्तम कालरात्रिति महागौरी चाष्टमम्।। नवमं सिद्धिदात्रिति नव दुर्गाः प्रर्कीर्तिताः।

सनातन मत के प्राचीन शास्त्रों के अनुसार दुर्गा देवी नौ रूपों में प्रकट हुई हैं। उन सब रूपों की अलग-अलग कथा इस प्रकार है :-
1. महाकाली- एक बार पूरा संसार प्रलय ग्रस्त हो गया था। चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देता था। उस समय ‘भगवान विष्णु’ की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ उस कमल में से ‘ब्रह्मा जी’ प्रकट हुए इसके अतिरिक्त भगवान नारायण के कानों से कुछ मैल भी निकला, उस मैल से कैटभ और मधु नाम के दो दैत्य उत्पन्न हुये। जब उन दोनों दैत्यों ने इधर-उधर देखा तो ब्रह्माजी के अलावा उन्हें कोई नहीं दिखाई दिया, तब ब्रह्माजी को देखकर वे दैत्य उनको मारने दौड़े। उस समय भयभीत ब्रह्माजी ने विष्णु भगवान की स्तुति की, स्तुति से विष्णु भगवान की आँखों में जो महामाया योग निद्रा के रूप में निवास करती थी वह लोप हो गई और विष्णु भगवान की नींद खुल गई उनके जागते ही दोनों दैत्य भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे और पांच हजार वर्ष तक युद्ध चलता रहा, अंत में भगवान विष्णु की रक्षा के लिए महामाया ने असुरों की बुद्धि को परिवर्तित कर दिया। जब असुरों तथा देवताओं का युद्ध हुआ, तब असुर विष्णु भगवान से बोले, ‘‘हम आपके युद्ध से प्रसन्न हैं, जो चाहो वर मांग लो’’ भगवान ने मौका पाया और कहने लगे, ‘‘यदि हमें वर देना है तो यह वर दो कि दैत्यों का नाष हो।’’ दैत्यों ने कहा ‘‘ऐसा ही होगा’’ ऐसा कहते ही दैत्यों का नाश हो गया। जिसने असुरों की बुद्धि को बदला था वह ‘महाकाली’ थीं।

2. महालक्ष्मी- एक समय में महिषासुर नाम का दैत्य हुआ। उसने पृथ्वी और पाताल पर अपना अधिकार जमा लिया। तो देवता भी उस युद्ध में पराजित होकर भागने लगे। वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उस दैत्य से बचने के लिए भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। देवताओं की स्तुति से भगवान विष्णु और शंकर जी प्रसन्न हुए, तब उनके शरीर से एक तेज निकला, जिसने महालक्ष्मी जी का रूप धारण किया। इन्हीं महालक्ष्मी जी ने महिषासुर को युद्ध में मारकर देवताओं के कष्ट को दूर किया।

3. चामुण्डा- एक समय था जब शुम्भ-निषुम्भ नाम के दो दैत्य बहुत बलशाली हुए थे, उनसे युद्ध में देवता हार मान गए जब देवताओं ने देखा कि अब युद्ध नहीं जीता जा सकता तब वह स्वर्ग छोड़कर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे उस समय भगवान विष्णु के शरीर से एक ज्योति प्रकट हुई जो कि ‘महासरस्वती’ या ‘चामुण्डा’ थी। महासरस्वती अत्यन्त रूपवान थी, उनका रूप देख कर दैत्य मुग्ध हो गए और अपनी इच्छा प्रकट करने के लिए अपना दूत उस देवी के पास भेजा, उस दूत को देवी ने वापिस कर दिया। इसके पश्चात् बाद उन दोनों ने अपने सेनापति धूम्राक्ष को सेना सहित भेजा, जो देवी द्वारा सेना सहित मार दिया गया और फिर चण्ड-मुण्ड लड़ने आए और वह भी मार दिए गये इसके पश्चात् रक्तबीज आया जिसके रक्त की बूँद जमीन पर गिरने से एक और रक्तबीज पैदा होता था, उसे भी देवी ने मार दिया। अन्त में शुम्भ-निषुम्भ स्वयं लड़ने आये और देवी के हाथों मारे गए। सभी देवता दैत्यों की मृत्यु से प्रसन्न हुए।

4. योगमाया – जब कंस ने वासुदेव-देवकी के छः पुत्रों का वध कर दिया था और सातवें गर्भ में शेषनाग बलराम जी आये, जो रोहिणी के गर्भ में प्रविष्ट होकर प्रकट हुए। तब आठवाँ जन्म श्री कृष्ण जी का हुआ। साथ ही साथ गोकुल में यशोदा जी के गर्भ में योगमाया का जन्म हुआ जो वासुदेव जी के द्वारा कृष्ण के बदले मथुरा लाई गई। जब कंस ने कन्या स्वरूप उस योगमाया को मारने के लिए पटकना चाहा, तब वह हाथ से छूट आकाश में चली गई आकाश में जाकर उसने देवी का रूप धारण कर लिया। आगे चलकर इसी योगमाया ने श्री कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बन कर कंस, चाणूर आदि शक्तिशाली असुरों का संहार करवाया।

5. रक्त दन्तिका – एक बार वैप्रचित्ति नाम के असुर ने बहुत से कुकर्म करके देव तथा मानवों को आतंकित कर दिया। देवताओं और पृथ्वी की प्रार्थना पर उस समय दुर्गा देवी ने रक्तदन्तिका नाम से अवतार लिया और वैप्रचित्ति आदि असुरों का मान मर्दन कर डाला। यह देवी असुरों को मारकर उनका रक्तपान किया करती थी, इस कारण से इनका नाम ‘‘रक्तदन्तिका’’ हुआ।

6. शाकुम्भरी देवी – एक समय पृथ्वी पर लगातार सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, जिसके के कारण चारों ओर हा-हाकार मच गयी, सभी जीव भूख और प्यास से व्याकुल हो मरने लगे। उस समय मुनियों ने मिलकर देवी भगवती की उपासना की, तब जगदम्बा ने ‘‘शाकुम्भरी’’ नाम से स्त्री रूप में अवतार लिया और उनकी कृपा से जल की वर्षा हुई जिससे पृथ्वी के समस्त जीवों को नया जीवन प्राप्त हुआ।

7. श्री दुर्गा जी – एक समय धरती पर दुर्गम नाम का राक्षस हुआ, उसके अत्याचार से पृथ्वी ही नहीं, स्वर्ग और पाताल के निवासी भी भयभीत रहते थे। ऐसे समय भगवान की शक्ति ने दुर्गा या दुर्गसेनी के नाम से अवतार लिया और दुर्गम राक्षस को मारकर ब्राह्मणों और भक्तों की रक्षा की। दुर्गम राक्षस को मारने के कारण ही इनका नाम ‘‘दुर्गा देवी’’ प्रसिद्ध हुआ।

8. भ्रामरी देवी – एक बार महा अत्याचारी अरूण नाम का एक असुर पैदा हुआ, उसने स्वर्ग में जाकर उपद्रव करना शुरू कर दिया, देवताओं की पत्नियों का सतीत्व नष्ट करने की कुचेष्टा करने लगा, अपने सतीत्व की रक्षा के लिए देव-पत्नियों ने भौरों का रूप धारण कर लिया और दुर्गा देवी की प्रार्थना करने लगीं। देव पत्नियों को दुःखी देखकर माँ दुर्गा ने ‘‘भ्रामरी’’ का रूप धारण कर उन असुरों का उनकी सेना सहित संहार किया और देव-पत्नियों के सतीत्व की रक्षा की।

9. चण्डिका देवी – एक बार पृथ्वी पर चण्ड-मुण्ड नाम के दो राक्षस पैदा हुए, वे दोनों इतने बलवान थे कि पृथ्वी पर अपना राज्य फैला, देवताओं को हराकर स्वर्ग पर भी अपना अधिकार जमा लिया। तब देवता बहुत दुःखी हुए और देवी की स्तुति करने लगे, देवी ‘‘चण्डिका’’ के रूप में अवतरित हुई और चण्ड-मुण्ड नामक राक्षसों को मारकर संसार का दुःख दूर किया। देवताओं का स्वर्ग पुनः उन्हें प्राप्त हुआ। इस प्रकार चारों और प्रसन्नता का वातावरण छा गया।

नवरात्र की महिमा :-
चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक नवरात्र व्रत होता है। नवरात्र मुख्य रूप से दो होते हैं- वासन्तिक और शारदीय। वासन्तिक में विष्णु की उपासना की प्राधानता रहती है, और शारदीय में शक्ति की उपासना का। वस्तुतः दोनों नवरात्र मुख्य एवं व्यापक हैं, और दोनों में दोनों की उपासना उचित है। इस उपासना में वर्ण, जाति का वैशिष्ट्य अपेक्षित नहीं है, अतः सभी वर्ण एवं जाति के लोग अपने इष्टदेव की उपासना करते हैं। देवी की उपासना व्यापक है। दुर्गा पूजक प्रतिपदा से नवमी तक व्रत रहते हैं। कुछ लोग अन्न त्याग देते हैं। कुछ एक भुक्त रहकर शक्ति उपासना करते हैं। कुछ ‘श्री दुर्गा सप्तशती’ का सकाम या निष्काम भाव से पाठ करते हैं। संयत रहकर पाठ करना आवश्यक है, अतः यम-नियम का पालन करते हुए भगवती दुर्गा की आराधना या पाठ करना चाहिये। नवरात्र व्रत का अनुष्ठान करने वाले जितने संयत, नियमित, अन्तर्बाह्य शुद्धि रखेंगे उतनी ही मात्रा में उन्हें सफलता मिलेगी, यह निःसंदिग्ध है।

प्रतिपदा से नवरात्र प्रारम्भ होता है। प्रारम्भ करते समय यदि चित्रा और वैधृतियोग हो तो उनकी समाप्ति होने के बाद व्रत प्रारम्भ करना चाहिये, परंतु देवी का आवाह्न, स्थापन और विसर्जन-ये तीनों प्रातःकाल में होने चाहिये। अतः यदि चित्रा, वैधृति अधिक समय तक हों तो उसी दिन अभिजित् मुहूर्त (दिन के आठवें मुहूर्त यानी दोपहर के एक घड़ी पहले से एक घड़ी बाद तक के समय) में आरम्भ करना चाहिये।

आरम्भिक कर्तव्य- आरम्भ में पवित्र स्थान की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूँ बोयें। फिर उनके ऊपर अपनी शक्ति के अनुसार बनवाये गये सोने, ताँबे आदि अथवा मिट्टी के कलश को विधिपूर्वक स्थापित करें। कलश के ऊपर सोना, चाँदी, ताँबा, मृत्तिका, पाषाण अथवा चित्रमयी मूर्ति की प्रतिष्ठा करें। मूर्ति यदि कच्ची मिट्टी, कागज या सिंदूर आदि से बनी हो और स्नानादि से उसमें विकृति होने की आशंका हो तो उसके ऊपर शीशा लगा दें। मूर्ति न हो तो कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके दोनों पार्शवों में त्रिशूल बनाकर दुर्गाजी का चित्र पुस्तक तथा शालिग्राम को विराजित कर विष्णु पूजन करें।

नवरात्र व्रत के आरम्भ में स्वस्तिवाचन-शान्ति पाठ करके संकल्प करें और तब सर्वप्रथम गणपति की पूजा कर मातृका, लोकपाल नवग्रह एवं वरूण का सविधि पूजन करें। फिर प्रधान मूर्ति का षोडशोपचार पूजन करना चाहिये। अपने इष्टदेव-राम, कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण या भगवती दुर्गादेवी आदि की मूर्ति ही प्रधानमूर्ति कही जाती है। पूजन वेद-विधि या सम्प्रदाय-निर्दिष्ट विधि से होना चाहिये। दुर्गा देवी की आराधना अनुष्ठान में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन तथा मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत निहित ‘श्रीदुर्गा सप्तशती’ का पाठ मुख्य अनुष्ठेय कर्तव्य है।

पाठ विधि:-

‘श्रीदुर्गासप्तशती’ पुस्तक का – नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्।।

इस मंत्र से पंचोपचार पूजन कर यथाविधि पाठ करें, देवी व्रत में कुमारी-पूजन परम आवश्यक माना गया है। सामर्थ्य हो तो, नवरात्र भर प्रतिदिन, अन्यथा समाप्ति के दिन सौ कुमारियों के चरण धोकर उन्हें देवीरूप मानकर गंध-पुष्पादि से अर्चन कर आदर के साथ यथारूचि मिष्टान्न भोजन कराना चाहिये एवं वस्त्रादि से सत्कृत करना चाहिये।

शास्त्रों में वर्णित है कि एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य की, दो की पूजा से भोग और मोक्ष की, तीन की अर्चना से धर्म, अर्थ, काम-त्रिवर्ग की, चार की अर्चना से राज्य पद की, पाँच की पूजा से विद्या की, छः की पूजा से षट्कर्म सिद्धि की, सात की पूजा से राज्य की, आठ की अचर्ना से सम्पदा की और नौ कुमारी कन्याओं की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।

कुमारी-पूजन में दस वर्ष तक की कन्याओं का अर्चन विहित है। दस वर्ष से ऊपर की आयु वाली कन्या का पूजन वर्जित किया गया है। दो वर्ष की कन्या कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्तिनी, चार वर्ष की कल्याणी, पाँच वर्ष की रोहिणी, छः वर्ष की काली, सात वर्ष की चण्डिका, आठ वर्ष की शाम्भवी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष वाली सुभद्रा-स्वरूपा होती है।

दुर्गा-पूजा में प्रतिदिन का वैशिष्ट्य रहना चाहिये। प्रतिपदा को केश संस्कारक द्रव्य – आँवला, सुगन्धित तैल आदि केश प्रसाधन संभार, द्वितीया को बाल बाँधने-गूँथने वाले रेशमी सूत, फीते आदि, तृतीया को सिंदूर और दर्पण आदि, चतुर्थी को मधुपर्क, तिलक और नेत्राजंन, पंचमी को अंगराग-चंदनादि एवं आभूषण, षष्ठी को पुष्प तथा पुष्पमालादि समर्पित करें। सप्तमी को गृह मध्य पूजा, अष्टमी को उपवास पूर्वक पूजन, नवमी को महापूजा और कुमारी पूजा करें। दशमी को पूजन के अनन्तर पाठकर्ता की पूजा कर दक्षिणा दें एवं आरती के बाद विसर्जन करें। श्रवण-नक्षत्र में विसर्जनांग पूजन प्रशस्त कहा गया है। दशमांश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण-भोजन कराकर व्रत की समाप्ति करें।

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वशीकरण

गायत्री तंत्र से वशीकरण :-

Dr.R.B.Dhawan

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वशीकरण एक ऐसा शब्द है, जो रहस्यमय लगता है, शायद इसी लिए हर कोई इसका प्रयोग कर अपना कार्य सिद्ध करना चाहता है। आज के युग में अधिकांश लोग इसे बकवास मानते हैं। किसी भी कार्य को करने की कम से कम दो कार्य प्रणाली होती हैं, एक सीधे रास्ते से और दूसरे शार्टकट रास्ते से, कोई भी कार्य सम्पन्न किया जा सकता है। सीधे रास्ते चलने में समय बेशक अधिक लगता है, थकावट भी अधिक होगी, परंतु खतरा कम होगा। और शार्टकट रास्ते में खतरे अधिक होंगे, क्योंकि वे अनजान व ऊबड-खाबड रास्ता होगा, परंतु ठीकठाक रहा तो समय भी बचेगा और थकावट भी कम होगी। इसको आप एेसे भी समझ सकते हैं- हवा के रूख को देख कर हवा के साथ चलना, और हवा के विपरीत चलना, परंतु एक निश्चित मार्ग पर ही चलना। इन दोनो में हवा के साथ चलना सरल प्रतीत होता है, तथा हवा के विपरीत चलना संघर्ष व कठिनाइयों से भरा होता है। शार्टकट तथा हवा के रूख को देख कर उसके साथ बहना तांत्रिक विधि से किसी कार्य को संयोजित करने जैसा हुआ, पर हवा का बहाव (तांत्रिक विधि से किया कार्य) आपका बैलेंस बिगाढ सकता है। तांत्रिक किसी कार्य को शीघ्र व चमत्कारी ढंग से कर तो लेता है, परंतु उस कार्य का जीवनकाल भी कम ही होता है। इसके विपरीत सात्विक विधि से सम्पन्न किया गया कार्य खर्चीला तथा समय अधिक लगने के कारण थकाऊ तो होता है, परंतु इसका जीवन काल कहीं अधिक और टिकाऊ होता है।

पौराणिक काल में इस विद्या का मानव जीवन पर कितना प्रभाव रहा है? या इसका भी कोई विज्ञान है ? यही जानने का प्रयास करते है : – वशीकरण क्रिया का ये रहस्य समझने के लिए सबसे पहले अपने शारीरिक, अपने मन तथा अपने मस्तिष्क की कार्यपद्धति के रहस्य को समझना होगा, जिसके द्वारा हम सोचने और समझने की शक्ति रखते हैं, और हम कल्पना करने की क्षमता रखते हैं, अपने मन में शुभ या अशुभ विचार लाते हैं। तो ऐसी कौन सी शक्ति या क्रिया है, जिसके द्वारा हम लोगों के मन पर अपना प्रभाव डाल सकते हैं, अथवा ऐसी क्षमता प्राप्त करके दूसरों को वशीभूत कर सकते हैं। आइए इस विज्ञान को समझें :-

पहले तो ये जान लीजिए “वशीकरण” शब्द अधूरा है, पूर्ण शब्द “वशीभूत” है, वशीकरण शब्द तो वशीभूत क्रिया के लिए के लिए प्रयोग होता है। किसी दूसरे मनुष्य या प्राणी को वशीभूत करने के लिए पंचभूत सिद्धांत को समझना होगा, क्योंकि मनुष्य शरीर पांच भूतों से बना है, 1. पृथ्वी 2. अग्नि 3. वायु 4. जल और 5. आकाश, ये सभी पंचमहाभूत हैं। ये सभी परस्पर बलवान हैं, इनमें सबसे बलवान आकाश भूत है, आकाश अर्थात आत्मा (आत्मा का निवास मस्तिष्क भाग में है)। वशीभूत होने के पश्चात वशीभूत होने वाले मनुष्य या प्राणी के मस्तिष्क पर वशीभूत करने वाले मनुष्य का आकाश भूत अपना अधिकार कर लेता है, और वे वशीभूत करने वाले की किसी निश्चित समय के लिए संबंधित (केवल प्रयोजन से संबंधित) आज्ञा का पालन करने लगता है, अर्थात यह अधिकार वशीकृत करने वाले को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होता, अपितु जिस स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए वशीकृत किया जाता है, केवल उसी विशेष प्रयोजन के लिए जितना भाग (आकाश तत्व का भाग) ही वशीकृत होता है। किसी विशेष प्रयोजन, कर्म या क्रिया के लिए, और किसी निश्चित अवधि के लिए ही किसी को वशीकृत किया जा सकता है। पूरी तरह इस विज्ञान को (इस पद्धति को) बिना समझे हम वशीकरण vashikaran की क्रिया को नहीं समझ सकते है, ना ही इस क्रिया को सफल बना सकते है। किसी विकट स्थिति में जब कोई अपना दूर होता दिखाई दे या फिर कोई रिश्ता टूट रहा हो और उस रिश्ते को बचाना जरूरी लगता हो, इसी स्थिती में वशीभूत क्रिया का यह प्रयोग संपन्न किया जा सकता है, यहां आगे की पंक्तियों में गायत्री तंत्र का एक प्रयोग प्रस्तुत कर रहे हैं, आवश्यकता होने पर इस तंत्र प्रयोग को आप सम्पन्न कर सकते हैं, और कभी-कभी एेसा प्रयोग करना जरूरी भी हो जाता है :-

यह गायत्री तंत्र प्रयोग बहुत प्रभावशाली है, इस प्रयोग का अन्य उग्र तांत्रिक प्रयोगों की तरह कोई दुष्प्रभाव नहीं है, परंतु यह सफल तभी होता है जब इस ‘तंत्र प्रयोग’ का नाजायज इस्तेमाल नहीं किया जाये।
सरल वशीकरण जब कोई अधिकारी, मालिक, रिश्ते में सम्बंधी अथवा पति या पत्नी नाराज हो जायें, तब उन्हें मनाना जरूरी हो जाता है। एेसे में कठिनाइयां अधिक हो रही हों, तब यह ‘तंत्र प्रयोग’ प्रयोग जायज है।

प्रयोग व सामग्री-
एक पीपल का पत्ता, अनार की कलम, लाल चंदन की लकड़ी, एक थाली, एक आचमनी या चम्मच, और एक तांबे का लोटा। रात्रि में पवित्र भाव से एक शुद्ध आसन पर उत्तराभिमुख होकर बैठें, सामने एक थाली में पीपल के पत्ते पर लाल चंदन की स्याही से अनार की कलम द्वारा जिसका वशीकरण करना हो, उसका नाम लिखकर पत्ता उल्टा करके रख दें। लोटा जो जल से भरा हो, उसमें से एक-एक आचमनी या चम्मच पानी लेकर पीपल के पत्ते पर एक-एक मंत्र का उच्चारण करते हुये डालते रहें, 108 बार जल मंत्र पढ़ते हुये डालना है। मंत्र पाठ के समय दुर्गा वेशधारी माता गायत्री का ध्यान करें। साधारण अवस्था में यह प्रयोग एक सप्ताह (सात दिन) में ही अपना प्रभाव दिखा देता है, परंतु यदि समस्या गहरी हो तो, अधिक दिन भी करना पड़ता है।

मंत्र- ॐ क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

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शत्रु नाशक मंत्र

(श्री दुर्गा सप्तशति बीजमंत्रात्मक साधना)

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इस मंत्र की साधना से शत्रु की शत्रुता नष्ट हो जाती है। (शत्रु नहीं)

ॐ श्री गणेशाय नमः [११ बार]
ॐ ह्रों जुं सः सिद्ध गुरूवे नमः [११ बार]
ॐ दुर्गे दुर्गे रक्ष्णी ठः ठः स्वाहः [१३ बार]

[सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम..]

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दीनि। नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दीनि।।

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भसुरघातिनि। जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।।

ऐंकारी सृष्टीरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका। क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तुते।।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि।।

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी। क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुंभ कुरू।।

हुं हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रै भवान्यै ते नमो नमः।।

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं। धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।।

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा। सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे।।

ॐ नमश्चण्डिका:। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
प्रथमचरित्र…

ॐ अस्य श्री प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा रूषिः महाकाली देवता गायत्री छन्दः नन्दा शक्तिः रक्तदन्तिका बीजम् अग्निस्तत्त्वम् रूग्वेद स्वरूपम् श्रीमहाकाली प्रीत्यर्थे प्रथमचरित्र जपे विनियोगः।

(१) श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं प्रीं ह्रां ह्रीं सौं प्रें म्रें ल्ह्रीं म्लीं स्त्रीं क्रां स्ल्हीं क्रीं चां भें क्रीं वैं ह्रौं युं जुं हं शं रौं यं विं वैं चें ह्रीं क्रं सं कं श्रीं त्रों स्त्रां ज्यैं रौं द्रां द्रों ह्रां द्रूं शां म्रीं श्रौं जूं ल्ह्रूं श्रूं प्रीं रं वं व्रीं ब्लूं स्त्रौं ब्लां लूं सां रौं हसौं क्रूं शौं श्रौं वं त्रूं क्रौं क्लूं क्लीं श्रीं व्लूं ठां ठ्रीं स्त्रां स्लूं क्रैं च्रां फ्रां जीं लूं स्लूं नों स्त्रीं प्रूं स्त्रूं ज्रां वौं ओं श्रौं रीं रूं क्लीं दुं ह्रीं गूं लां ह्रां गं ऐं श्रौं जूं डें श्रौं छ्रां क्लीं

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
मध्यमचरित्र..

ॐ अस्य श्री मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्रूषिः महालक्ष्मीर्देवता उष्णिक छन्दः शाकम्भरी शक्तिः दुर्गा बीजम् वायुस्तत्त्वम् यजुर्वेदः स्वरूपम् श्रीमहालक्ष्मी प्रीत्यर्थे मध्यमचरित्र जपे विनियोगः।

(२) श्रौं श्रीं ह्सूं हौं ह्रीं अं क्लीं चां मुं डां यैं विं च्चें ईं सौं व्रां त्रौं लूं वं ह्रां क्रीं सौं यं ऐं मूं सः हं सं सों शं हं ह्रौं म्लीं यूं त्रूं स्त्रीं आं प्रें शं ह्रां स्मूं ऊं गूं व्र्यूं ह्रूं भैं ह्रां क्रूं मूं ल्ह्रीं श्रां द्रूं द्व्रूं ह्सौं क्रां स्हौं म्लूं श्रीं गैं क्रूं त्रीं क्ष्फीं क्सीं फ्रों ह्रीं शां क्ष्म्रीं रों डुं

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(३) श्रौं क्लीं सां त्रों प्रूं ग्लौं क्रौं व्रीं स्लीं ह्रीं हौं श्रां ग्रीं क्रूं क्रीं यां द्लूं द्रूं क्षं ह्रीं क्रौं क्ष्म्ल्रीं वां श्रूं ग्लूं ल्रीं प्रें हूं ह्रौं दें नूं आं फ्रां प्रीं दं फ्रीं ह्रीं गूं श्रौं सां श्रीं जुं हं सं

।ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(४) श्रौं सौं दीं प्रें यां रूं भं सूं श्रां औं लूं डूं जूं धूं त्रें ल्हीं श्रीं ईं ह्रां ल्ह्रूं क्लूं क्रां लूं फ्रें क्रीं म्लूं घ्रें श्रौं ह्रौं व्रीं ह्रीं त्रौं हलौं गीं यूं ल्हीं ल्हूं श्रौं ओं अं म्हौं प्री

।ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
उत्तमचरित्र..

ॐ अस्य श्री उत्तरचरित्रस्य रुद्र रूषिः महासरस्वती देवता अनुष्टुप् छन्दः भीमा शक्तिः भ्रामरी बीजम सूर्यस्तत्त्वम सामवेदः स्वरूपम श्री महासरस्वती प्रीत्यर्थे उत्तरचरित्र जपे विनियोगः।

(५) श्रौं प्रीं ओं ह्रीं ल्रीं त्रों क्रीं ह्लौं ह्रीं श्रीं हूं क्लीं रौं स्त्रीं म्लीं प्लूं ह्सौं स्त्रीं ग्लूं व्रीं सौः लूं ल्लूं द्रां क्सां क्ष्म्रीं ग्लौं स्कं त्रूं स्क्लूं क्रौं च्छ्रीं म्लूं क्लूं शां ल्हीं स्त्रूं ल्लीं लीं सं लूं हस्त्रूं श्रूं जूं हस्ल्रीं स्कीं क्लां श्रूं हं ह्लीं क्स्त्रूं द्रौं क्लूं गां सं ल्स्त्रां फ्रीं स्लां ल्लूं फ्रें ओं स्म्लीं ह्रां ऊं ल्हूं हूं नं स्त्रां वं मं म्क्लीं शां लं भैं ल्लूं हौं ईं चें क्ल्रीं ल्ह्रीं क्ष्म्ल्रीं पूं श्रौं ह्रौं भ्रूं क्स्त्रीं आं क्रूं त्रूं डूं जां ल्ह्रूं फ्रौं क्रौं किं ग्लूं छ्रंक्लीं रं क्सैं स्हुं श्रौं श्रीं ओं लूं ल्हूं ल्लूं स्क्रीं स्स्त्रौं स्भ्रूं क्ष्मक्लीं व्रीं सीं भूं लां श्रौं स्हैं ह्रीं श्रीं फ्रें रूं च्छ्रूं ल्हूं कं द्रें श्रीं सां ह्रौं ऐं स्कीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(६) श्रौं ओं त्रूं ह्रौं क्रौं श्रौं त्रीं क्लीं प्रीं ह्रीं ह्रौं श्रौं अरैं अरौं श्रीं क्रां हूं छ्रां क्ष्मक्ल्रीं ल्लुं सौः ह्लौं क्रूं सौं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(७) श्रौं कुं ल्हीं ह्रं मूं त्रौं ह्रौं ओं ह्सूं क्लूं क्रें नें लूं ह्स्लीं प्लूं शां स्लूं प्लीं प्रें अं औं म्ल्रीं श्रां सौं श्रौं प्रीं हस्व्रीं।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(८) श्रौं म्हल्रीं प्रूं एं क्रों ईं एं ल्रीं फ्रौं म्लूं नों हूं फ्रौं ग्लौं स्मौं सौं स्हों श्रीं ख्सें क्ष्म्लीं ल्सीं ह्रौं वीं लूं व्लीं त्स्त्रों ब्रूं श्क्लीं श्रूं ह्रीं शीं क्लीं फ्रूं क्लौं ह्रूं क्लूं तीं म्लूं हं स्लूं औं ल्हौं श्ल्रीं यां थ्लीं ल्हीं ग्लौं ह्रौं प्रां क्रीं क्लीं न्स्लुं हीं ह्लौं ह्रैं भ्रं सौं श्रीं प्सूं द्रौं स्स्त्रां ह्स्लीं स्ल्ल्रीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।

(९) रौं क्लीं म्लौं श्रौं ग्लीं ह्रौं ह्सौं ईं ब्रूं श्रां लूं आं श्रीं क्रौं प्रूं क्लीं भ्रूं ह्रौं क्रीं म्लीं ग्लौं ह्सूं प्लीं ह्रौं ह्स्त्रां स्हौं ल्लूं क्स्लीं श्रीं स्तूं च्रें वीं क्ष्लूं श्लूं क्रूं क्रां स्क्ष्लीं भ्रूं ह्रौं क्रां फ्रूं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।

(१०) श्रौं ह्रीं ब्लूं ह्रीं म्लूं ह्रं ह्रीं ग्लीं श्रौं धूं हुं द्रौं श्रीं त्रों व्रूं फ्रें ह्रां जुं सौः स्लौं प्रें हस्वां प्रीं फ्रां क्रीं श्रीं क्रां सः क्लीं व्रें इं ज्स्हल्रीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(११) श्रौं क्रूं श्रीं ल्लीं प्रें सौः स्हौं श्रूं क्लीं स्क्लीं प्रीं ग्लौं ह्स्ह्रीं स्तौं लीं म्लीं स्तूं ज्स्ह्रीं फ्रूं क्रूं ह्रौं ल्लूं क्ष्म्रीं श्रूं ईं जुं त्रैं द्रूं ह्रौं क्लीं सूं हौं श्व्रं ब्रूं स्फ्रूं ह्रीं लं ह्सौं सें ह्रीं ल्हीं विं प्लीं क्ष्म्क्लीं त्स्त्रां प्रं म्लीं स्त्रूं क्ष्मां स्तूं स्ह्रीं थ्प्रीं क्रौं श्रां म्लीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(१२) ह्रीं ओं श्रीं ईं क्लीं क्रूं श्रूं प्रां स्क्रूं दिं फ्रें हं सः चें सूं प्रीं ब्लूं आं औं ह्रीं क्रीं द्रां श्रीं स्लीं क्लीं स्लूं ह्रीं व्लीं ओं त्त्रों श्रौं ऐं प्रें द्रूं क्लूं औं सूं चें ह्रूं प्लीं क्षीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(१३) श्रौं व्रीं ओं औं ह्रां श्रीं श्रां ओं प्लीं सौं ह्रीं क्रीं ल्लूं ह्रीं क्लीं प्लीं श्रीं ल्लीं श्रूं ह्रूं ह्रीं त्रूं ऊं सूं प्रीं श्रीं ह्लौं आं ओं ह्रीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
दुर्गा दुर्गर्तिशमनी दुर्गापद्विनिवारिणी ।

दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी ।।

दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा ।

दुर्गमग्यानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला ।।

दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी ।

दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता ।।

दुर्गमग्यानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी ।

दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी ।।

दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी ।

दुर्गमाँगी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी ।।

दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी ।।

[३ बार]

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ दुर्गार्पणमस्तु।।
नमः शिवाय्
॥ चण्डिकाहृदयस्तोत्रम् ॥
अस्य श्री चण्डिका हृदय स्तोत्र महामन्त्रस्य ।

मार्क्कण्डेय ऋषिः, अनुष्टुप्च्छन्दः, श्री चण्डिका देवता ।

ह्रां बीजं, ह्रीं शक्तिः, ह्रूं कीलकं,

अस्य श्री चण्डिका प्रसाद सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।

ह्रां इत्यादि षडंग न्यासः ।
ध्यानं ।

सर्वमंगळ मांगल्ये शिवे सर्वार्त्थ साधिके ।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥
ब्रह्मोवाच ।

अथातस्सं प्रवक्ष्यामि विस्तरेण यथातथं ।

चण्डिका हृदयं गुह्यं शृणुष्वैकाग्रमानसः । ।

ॐ ऐं ह्रीं क्ळीं, ह्रां, ह्रीं, ह्रूं जय जय चामुण्डे,

चण्डिके, त्रिदश, मणिमकुटकोटीर संघट्टित चरणारविन्दे,

गायत्री, सावित्री, सरस्वति, महाहिकृताभरणे, भैरवरूप

धारिणी, प्रकटित दंष्ट्रोग्रवदने,घोरे, घोराननेज्वल

ज्वलज्ज्वाला सहस्रपरिवृते, महाट्टहास बधरीकृत दिगन्तरे,

सर्वायुध परिपूर्ण्णे, कपालहस्ते, गजाजिनोत्तरीये,

भूतवेताळबृन्दपरिवृते, प्रकन्पित धराधरे,

मधुकैटमहिषासुर, धूम्रलोचन चण्डमुण्डरक्तबीज

शुंभनिशुंभादि दैत्यनिष्कण्ढके, काळरात्रि,

महामाये, शिवे, नित्ये, इन्द्राग्नियमनिरृति वरुणवायु

सोमेशान प्रधान शक्ति भूते, ब्रह्माविष्णु शिवस्तुते,

त्रिभुवनाधाराधारे, वामे, ज्येष्ठे, रौद्र्यंबिके,

ब्राह्मी, माहेश्वरि, कौमारि, वैष्णवी शंखिनी वाराहीन्द्राणी

चामुण्डा शिवदूति महाकाळि महालक्ष्मी, महासरस्वतीतिस्थिते,

नादमध्यस्थिते, महोग्रविषोरगफणामणिघटित

मकुटकटकादिरत्न महाज्वालामय पादबाहुदण्डोत्तमांगे,

महामहिषोपरि गन्धर्व विद्याधराराधिते,

नवरत्ननिधिकोशे तत्त्वस्वरूपे वाक्पाणिपादपायूपस्थात्मिके,

शब्दस्पर्शरूपरसगन्धादि स्वरूपे,

त्वक्चक्षुः श्रोत्रजिह्वाघ्राणमहाबुद्धिस्थिते,

ॐ ऐंकार ह्रीं कार क्ळीं कारहस्ते आं क्रों आग्नेयनयनपात्रे प्रवेशय,

द्रां शोषय शोषय, द्रीं सुकुमारय सुकुमारय,

श्रीं सर्वं प्रवेशय प्रवेशय, त्रैलोक्यवर वर्ण्णिनि

समस्त चित्तं वशीकरु वशीकरु मम शत्रून्,

शीघ्रं मारय मारय, जाग्रत् स्वप्न सुषुप्त्य वस्थासु अस्मान्

राजचोराग्निजल वात विषभूत-शत्रुमृत्यु-ज्वरादि स्फोटकादि

नानारोगेभ्योः नानाभिचारेभ्यो नानापवादेभ्यः परकर्म मन्त्र

तन्त्र यन्त्रौषध शल्यशून्य क्षुद्रेभ्यः सम्यङ्मां

रक्ष रक्ष, ॐ ऐं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रः,

स्फ्रां स्फ्रीं स्फ्रैं स्फ्रौं स्फ्रः – मम सर्व कार्याणि

साधय साधय हुं फट् स्वाहा –

राज द्वारे श्मशाने वा विवादे शत्रु सङ्कटे ।

भूताग्नि चोर मद्ध्यस्थे मयि कार्याणि साधय ॥ स्वाहा ।

चण्डिका हृदयं गुह्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।

सर्व काम प्रदं पुंसां भुक्ति मुक्तिं प्रियच्चति ।

(देवी के नौ रूपों का एक स्वरूप दक्षिण भारतीय परम्परा में निम्न प्रकार से उपलब्ध होता है) –

प्रथमा वन -दुर्गेति द्वितीया शूलिनी माता।

तृतीया जातवेदा च चतुर्थी शान्तिरिष्यते।।

पंचमी शबरी चैव षष्ठी ज्वालेति गीयते।

सप्तमी लवणा चेति अष्टम्यां आसुरी माता।।

नवमी दीपदुर्गेति नव दुर्गा प्रकीर्तिता।।
महा नवार्ण मंत्र:-

ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं महादुर्गे नवाक्षरी नवदुर्गे नवात्मिके नवचण्डी महामाये महामोहे महायोगनिद्रे जये मधुकैटभ विद्राविणी महिषासुर मर्दिनी धूम्रलोचन संहन्त्रि चण्डमुण्ड विनाशिनी रक्तबीजान्तके निशुम्भध्वंसिनी शुम्भदर्पघ्नि देवि अष्टादश बाहुके कपाल- खट्वांग शूल खड्ग खेटक धारिणी छिन्न मस्तक धारिणी रूधिर मांस भोजिनी समस्त भूत प्रेतादि योग ध्वंसिनी ब्रह्मेन्द्रादि स्तुते देवि मां रक्ष रक्ष मम शत्रून् नाशय नाशय ह्रीं फट् ह्रूं फट् ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।।

यह एक गोपनीय साधना विधान है, इस से अधिक विवरण प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

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