दीपावली पूजा मुहूर्त 2019

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant), top best astrologer in india

दीपावली पांच पर्वों का सम्मीलित महापर्व है, जिस का आरम्भ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) से कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई-दूज) तक रहता है। दीपावली के पर्व पर धन-धान्य की प्राप्ति के लिये धन की अधिष्ठात्रि धनदा भगवती लक्ष्मी का समारोह पूर्वक आवाहन, षोडशोपचार पूजन किया जाता है। इस वर्ष के पंचांग के अनुसार 27 अक्टूबर 2019 कार्तिक कृष्ण अमावस्या रविवार के दिन चित्रा नक्षत्र, के सुखद संयोग में दीपावली का पावन पर्व मनाया जायेगा। चित्रा नक्षत्र सांय 22 बजकर 30 मिनट तक रहेगा। पिछले दिनों से में दीपावली पूजन मुहूर्त के विषय में अध्ययन तथा खोज कर रहा था। अनेक ग्रंथों का अध्ययन करने पर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य सामने आये हैं, जिन का वर्णन इस प्रकार है-

1. ‘शक्ति संगम तंत्र’ के काली खण्ड में अनेक विशिष्ट मुहूर्तों का वर्णन मिलता है, जिन मुहूर्तों में लक्ष्मी जी की विशेष कृपा पाने के लिये विशेष उपाय बताये गये हैं। तथा उन में भी दीपावली की रात्रि को विशेष रूप से लक्ष्मी साधना के लिये गोपनीय मुहूर्त बताये गये हैं।

2. रूद्रयामल तंत्र’ में लिखा है कि जब सूर्य और चंद्रमा तुला राशि में गोचरवश भ्रमण करते हैं, तब लक्ष्मी साधना करने से अधिक धन-धान्य की प्राप्ति होती है।

3. ‘श्री विद्यार्णव तंत्र’ में कालरात्रि को महाशक्ति रात्रि माना गया है। कालरात्रि मातृकाओं का भी इस ग्रंथ में उल्लेख मिलता है। कालरात्रि को (श्रीविद्या लक्ष्मी साधना के लिये जो विशेष साधना आदि शंकराचार्य द्वारा बताई गई है।) का अंग कहा गया है। श्रीविद्या की साधना से सुख-सौभाग्य और समृद्धि की स्वतः ही प्राप्ति होने लगती है। मंत्र शास्त्र में इसको गणेश्वरी विद्या कहा गया है, जो ऋद्धि-सिद्धि को देने वाली है।

4. मंत्र महोदघि में उनके विषय में वर्णन इस प्रकार से मिलता है, ‘उदीयमान सूर्य जैसी आभावाली, बिखरे हुये बालों वाली, काले वस्त्र वाली, त्रिनेत्री, चारों हाथों में दण्ड, लिंग, वर तथा भुवन को धारण करने वाली, आभूषणों से सुशोभित, प्रसन्न वदंना, देवगणों से सेवित तथा कामबाण से विकसित शरीर वाली माया तथा काल रात्रि का ध्यान करता हूँ।

5. मुहूर्त चिन्तामणि तथा ज्योतिष ग्रंथो में इस रात्रि का महत्व इस प्रकार से मिलता है- दीपावली की रात्रि को आधी रात्रि के बाद जो दो मुहूर्त का समय है, उसको महानिशीथ काल कहते हैं। उस काल में आराधना, साधना करने से अक्ष्य-लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इस काल में सूर्य तथा चंद्रमा तुला राशि में होते हैं। इस राशि के स्वामी शुक्र को धन-धान्य तथा ऐश्वर्य का प्रतीक माना गया है।

पूजन का समय (मुहूर्त) निर्णय-
इस लेख में आगे दिये गये निर्दिष्ट शुभ मुहूतों में अपने निवास स्थान में किसी स्वच्छ एवं पवित्र स्थान पर आटा, हल्दी, अक्षत् एवं पुष्पादि से अष्टदल कमल बनाकर श्रीमहालक्ष्मी का आवाहन एवं स्थापना करके देवों की विधिवत पूजार्चना करनी चाहिये। पूजन सामग्री में विभिन्न प्रकार की मिठाई, फल-पुष्पाक्षत, धूप, दीपदि सुगंधित वस्तुयें सम्मीलित करनी चाहियें।

आवाहन मंत्र:-

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामाद्र्रां ज्वलंती तृप्तां तर्पयंतीम्। पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप हव्ये श्रियम्।। (श्री सूक्तम्)

पूजा मंत्र:-

ॐ गं गणपतये नमः।। लक्ष्म्यै नमः।। नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रनत्रानां सा मे भूयात्त्वदर्चनात्।।
से लक्ष्मी की, एरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः। शतयज्ञाधिपो देवस्तस्मा इन्द्राय ते नमः

अग्रलिखित मंत्र से इंद्र की और कुबेर की पूजा करें:- कुबेराय नमः, धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च। भवंतु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादि सम्पदः।।

नमस्कार प्रार्थना मंत्र-
ॐ नमः कमलवासिन्य नारायण्यै नमो नमः।
कृष्णप्रियायै सारायै पद्मायै च नमो नमः।।
पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नमः।
पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नमः।।
सर्वसम्पतत्स्वरूपायै सर्वदात्र्यै नमो नमः।
सुखदायै मोक्षदायै सिद्धिदायै नमो नमः।।

जप मंत्र –

ॐ हृीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः।।

ॐ श्री हृीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं हृीं श्रीं ॐ महालक्ष्मयै नमः।।

ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ।।

दीपावली मुहूर्त गणना :-

1. सूर्य और चंद्रमा का संचार – दीपावली का पर्व तभी शुभ होगा जब सूर्य व चंद्रमा (दोनों ग्रह) तुला रात्रि में ही हों। सूर्य का संचार 17 अक्तूबर 2019 से 16 नवम्बर 2019 तक तुला में ही है, तथा चन्द्रमा का तुला में संचार 27 अक्तूबर 2019 साॅय 16 बजकर 31 मिनट से तुला राशि में प्रवेश होगा। अतः 27 अक्तूबर 2019 की रात्रि में दीपावली मुहूर्त के समय सूर्य तथा चंद्रमा (दोनो) तुला राशि में ही संचार कर रहे होंगे।

2. शुभ लग्न (स्थिर) – दीपावली की रात्रि, दीपावली पूजन स्थिर लग्न दीपावली मुहूर्त (वृष लग्न अथवा सिंह लग्न) के समय करना चाहिये- इस वर्ष वृष लग्न 27 अक्तूबरShukracharya.com के दिन 18ः40 से 20ः35 बजे के मध्य विद्यमान रहेगा, तथा सिंह लग्न मध्य रात्रि 01ः09 से 03ः28 तक रहेगा।

3. शुभ की चैघड़िया – दीपावली पूजन, कुबेर-पूजा, दीपावली मुहूर्त रात्रि चर, लाभ, अमृत एवं शुभ की चैघड़िया में करना चाहिये। इस वर्ष 27 अक्तूबर की रात्रि शुभ की चैघड़िया 17 बजकर 40 मिनट से 20 बजकर 52 मिनट तक है, और अमृत का चैघड़िया 19 बजकर 16 मिनट से 20 बजकर 52 मिनट तक रहेगा। इस के उपरांत चर का चैघड़िया 20 बजकर 52 मिनट से 22 बजकर 58 मिनट तक भी शुभ मुहूर्त रहेगा। इस के पश्चात लाभ का चैघड़िया मध्य रात्रि 01 बजकर 42 मिनट से 03 बजकर 18 मिनट तक रहेगा।

4. अमावस्या व प्रदोषकाल का योग- भविष्यपुराण में भी महालक्ष्मी पूजन, दीपावली मुहूर्त के लिये प्रदोषकाल विशेष शुभ माना गया है। इस वर्ष कार्तिक कृष्ण अमावस्य का संयोग 2 दिन हो रहा है। 27 अक्तूबर 2019 ई. रविवार को दोपहर 12 बजकर 23 मिनट के तत्पश्चात् अमावस आरम्भ होगी और 28 अक्तूबर सोमवार को प्रातः 9 बजकर 9 मिनट तक रहेगी।
प्रदोष काल 27 अक्तूबर 2019 ई को दिल्ली एवं निकटवर्ती नगरों में सूर्यास्त (17ः41) से लेकर 2 घ. 36 मि. तक 20 घ. 17 मि. तक प्रदोषकाल रहेगा। दीपावली पूजन के लिये आमवस्या रहते सायं सूर्यास्त (प्रदोषकाल आरम्भ) के बाद की समयावधि श्रीगणेश, श्रीमहालक्ष्मी पूजन आदि के आरम्भ के लिये विशेष शुभ रहेगी।
प्रदोषकाल से महालक्ष्मी पूजन, कुबेर-पूजा, प्रारम्भ करके अर्धरात्रि तक जप-अनुष्ठानादि करने का विशेष महत्व होता है। प्रदोषकाल से कुछ समय पहले स्नानादि उपरांत धर्मस्थल पर मंत्रपूर्वक दीपदान करके अपने निवास स्थान पर श्रीगणेश सहित महालक्ष्मी, कुबेर पूजनादि करके अल्पाहार करना चाहिये। तदुपरांत यथोपलब्ध निशीथ काल मुहूर्त में मंत्र-जप, यंत्र-सिद्धि आदि अनुष्ठान सम्पादित करने चाहियें। कारखाने, दुकान, मकान, व्यवसाय, फैक्ट्री, कार्यालय, विद्यालय, बही खाता पूजन, कलम दान, रोकड़ा पूजन, के लिये शुभ हैं।

5. निशीथकाल /महानिशीथ काल- इस वर्ष दीपावली के दिन निशीथकाल 20ः20 से 22ः53 रहेगा। महानिशीथ काल रात्रि 22ः53 से 01ः29 तक तक रहेगा। यह समय लक्ष्मी पूजन के लिये विशेष उत्तम कहा जाता है। प्रदोष, निशीथ एवं महानिशीथ काल के अतिरिक्त चैघड़िया मुहूर्त में भी महालक्ष्मी पूजन, बही-खाता पूजन, कुबेर-पूजा, जपादि अनुष्ठान की दृष्टि से विशेष प्रशस्त एवं शुभ माने जाते हैं।

27 अक्तूबर 2019 ई. के चौघड़िया मुहूर्त:-

दिन की चौघड़िया घ. मि.
उद्वेग 06ः29 से 07ः53
चर 07ः53 से 09ः17
लाभ 09ः17 से 10ः41
अमृत 10ः41 से 12ः05
काल 12ः05 से 13ः28
शुभ 13ः28 से 14ः52
रोग 14ः52 से 16ः16
उद्वेग 16ः16 से 17ः40

रात्रि की चौघड़िया घ. मि.
शुभ 17ः40 से 19ः16
अमृत 19ः16 से 20ः52
चर 20ः52 से 22ः28
रोग 22ः28 से 24ः06
काल 24ः06 से 01ः42
लाभ। 01ः42 से 03ः18
उद्वेग 03ः18 से 04ः54
शुभ 04ः54 से 06ः30

नोट- चर, लाभ, अमृत, और शुभ चौघड़िया दीपावली पूजन के लिये उत्तम हैं।

दीपावली मुहूर्त की शुद्ध गणाना-

1. सूर्य व चंद्रमा दोनो शुभ राशि में हैं।

2. लग्न-
(क) वृष 18ः40 से 20ः35 तक।
(ख) सिंह मध्य रात्रि 01ः09 से 03ः28 तक।

3. चौघड़िया-
(क) शुभ 17ः40 से 19ः16 तक।
(ख) अमृत 19ः16 से 20ः52 तक।
(ग) चर 20ः52 से 22ः28 तक।
(घ) लाभ 01ः42 से 03ः18 तक।

4. अमावस- 27 अक्तूबर दोपहर 12ः23 से 28 अक्तूबर प्रातः 09ः09 तक।

5. प्रदोष काल- 17ः41 से 20ः17 तक।

6. निशीथ काल- रात्रि 20ः20 से 22ः54 तक।
महानिशीथ काल-रात्रि 22ः53 से 01ः29 तक।

प्रथम शोधित मुहूर्त (वृष लग्न)- 27 अक्तूबर 2019 रविवार साॅय 18 बजकर 40 मिनट से 20 बजकर 17 मिनट तक।

द्वितीय शोधित मुहूर्त (सिंह लग्न)- 27 अक्तूबर 2019 रविवार मध्य रात्रि 01 बजकर 42 मिनट से 03 बजकर 18 मिनट तक।

विशेष- तंत्र विधान से कुबेर-पूजा, महालक्ष्मी साधना करने वालों को 27 अक्तूबर की मध्य रात्रि 01ः09 से पूजा व्यवस्था आरम्भ करके 01ः42 से विशेष साधना मंत्र जप आरम्भ कर लेना चाहिये, तथा 03ः18 तक यह जप साधना सम्पन्न कर लेनी चाहिये।

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शिवलिंग पूजा

महाशिवरात्रि और शिव पूजन :-

Dr.R.B.Dhawan

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महाशिवरात्रि पर्व रात्रि प्रधान पर्व है, इस दिन अर्धरात्रि की पूजा का विशेष महत्व है। अर्ध रात्रि की पूजा के लिये स्कन्दपुराण में लिखा है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को –

निशिभ्रमन्ति भूतानि शक्तयः शूलभृद यतः ।

अतस्तस्यां चतुर्दश्यां सत्यां तत्पूजनं भवेत् ॥

अर्थात् रात्रि के समय भूत, प्रेत, पिशाच, शक्तियाँ और स्वयं शिवजी भ्रमण करते हैं; अतः उस समय इनका पूजन करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट होते हैं ।

शिवपुराण में आया है-

“कालो निशीथो वै प्रोक्तोमध्ययामद्वयं निशि ।

शिवपूजा विशेषेण तत्काले ऽभीष्टसिद्धिदा ॥

एवं “ज्ञात्वा नरः कुर्वन्यथोक्तफलभाग्भवेत्” अर्थात रात के चार प्रहरों में से जो बीच के दो प्रहर हैं, उन्हें निशीथकाल कहा गया है। विशेषत: उसी काल में की हुई भगवान शिव की पूजा-प्रार्थना अभीष्ट फल को देनेवाली होती है। ऐसा जानकर कर्म करनेवाला मनुष्य यथोक्त फल का भागी होता है। चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं, अत: ज्योतिष शास्त्र में इसे परम कल्याणकारी कहा गया है। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है, परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि कहा गया है। शिव रहस्य में कहा गया है-

चतुर्दश्यां तु कृष्णायां फाल्गुने शिवपूजनम्।

तामुपोष्य प्रयत्नेन विषयान् परिवर्जयेत।।

शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम्।

शिवपुराण में ईशान संहिता के अनुसार :-

फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि।

शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:।।

अर्थात :- फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोडों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए इसलिए इसे महाशिवरात्रि मानते हैं। शिवपुराण में विद्येश्वर संहिता के अनुसार शिवरात्रि के दिन ब्रह्मा जी तथा विष्णु जी ने अन्यान्य दिव्य उपहारों द्वारा सबसे पहले शिव पूजन किया था जिससे प्रसन्न होकर महेश्वर ने कहा था की “आज का दिन एक महान दिन है। इसमें तुम्हारे द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है, इससे मैं तुम देवों पर बहुत प्रसन्न हूँ। इसी कारण यह दिन परम पवित्र और महान होगा। आज की यह तिथि ‘महाशिवरात्रि’ के नाम से विख्यात होकर मेरे लिये परम प्रिय होगी। इसके समय में जो मेरे लिंग (निष्कल अंग– आकृति से रहित निराकार स्वरूप के प्रतीक ) वेर (सकल साकार रूप के प्रतीक विग्रह) की पूजा करेगा, वह पुरुष जगत की सृष्टि और पालन आदि कार्य में भी सक्षम हो सकता है। जो महाशिवरात्रि को दिन-रात निराहार एवं जितेन्द्रिय रहकर अपनी शक्ति के अनुसार निश्चल भाव से मेरी यथोचित पूजा करेगा, उसको मिलने वाले फल का वर्णन सुनो -एक वर्ष तक निरंतर मेरी पूजा करने पर जो फल मिलता हैं, वह सारा शुभ फल केवल महाशिवरात्रि को मेरा पूजन करने से ही मनुष्य तत्काल प्राप्त कर लेता हैं। जैसे पूर्ण चंद्रमा का उदय समुद्र की वृद्धि का अवसर हैं, उसी प्रकार यह महाशिवरात्रि तिथि मेरे धर्म की वृद्धि का समय हैं। इस तिथि में मेरी स्थापना आदि का मंगलमय उत्सव मनाना चाहिये | ॐ नमः शिवाय।
शिवलिंग पूजा से मनेकामना पूर्ति सिद्धि :-
शिव के उस अपादान कारण को, जो अनादि और अनंत है, उसे लिंग कहते हैं। उसी गुणनात्मक मौलिक प्रकृति का नाम माया है, उसी से यह सम्पूर्ण जगत उत्पन्न हुआ है, होता रहेगा। जिसको जाना नहीं जा सकता, जो स्वंय ही कार्य के रूप में व्यक्त हुआ है, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है, और उसी में लीन हो जाना है, उसे ही लिंग कहते हैं। विश्व की उत्पत्ती और लय के हेतु (कारण) होने से ही उस परमपुरूष की लिंगता है। लिंग शिव का शरीर है, क्योंकि वह उसी रूप में अधिष्ठित हैं। लिंग के आधार रूप में जो तीन मेखला युक्त वेदिका है, वह भग रूप में कही जाने वाली जगतदात्री महाशक्ति हैं। इस प्रकार आधार सहित लिंग जगत का कारण है। यह उमा-महेश्वर स्वरूप है। भगवान शिव स्वयं ही ज्योतिर्लिंग स्वरूप तमस से परे हैं, लिंग और वेदी के समायोजन से ये अर्धनारीश्वर हैं।पूज्यो हरस्तु सर्वत्र लिंगे पूर्णोर्चनं भवेत।। (अग्निपुराण अध्याय ५४)

संस्कृत में लिंग का अर्थ “चिन्ह” है। और इसी अर्थ में यह शिवलिंग shivling के लिये प्रयुक्त होता है। देवताओं की पूजा शरीर के रूप में हेती है, लेकिन परमपुरूष अशरीर हैं, इस लिये परम पुरूष की पूजा shivling Pooja दोनों प्रकार से होती है। जब पूजा शरीर के रूप मे होती है, तब वह शरीर अराधक की भावना के अनुरूप होता है। जब पूजा प्रतीक के रूप में होती है, तब यह प्रतीक अनंत होता है। क्यों की ब्रह्माण्ड की कल्पना ही अण्डाकर रूप में होती है, इस लिये कोई जब अनंत या ज्योति का स्वरूप बनाना चाहेगा, तब प्रकृति को अभिव्यक्त करने के लिये लिंग के साथ तीन मेखला वाली वेदी बनानी पड़ती है, क्योंकि प्रकृति त्रिगुणात्मक (सत्व-रज-तम) है, इस वेदी को भग कहते हैं। लेकिन यहां भग का अर्थ स्त्री जननेद्रीय नहीं है। भगवान शब्द में जो भग है उसका अर्थ है:- एेश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य है। सम्पूर्ण जगत में एकीभूत है। इस अर्थ में वेदिका निखिलेश्वर्यमयी महा शक्ति है।परमपुरूष शिव की सनातन (पौराणिक) मत में पांच रूपों में उपासना करने की परम्परा है, इसे ही पंचदेवोपासना कहते हैं:- शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश ओर सूर्य। इन पांचो का ही गोल प्रतीक आपने देखा है। शिवलिंग shivling पर चर्चा हम कर ही रहे हैं। विष्णु के प्रतीक शालिग्राम shaligram आपने सभी वैष्णव मंदिरों में देखा है। विष्णु के जितने अवतार हैं, लक्षणभेद से शालिग्राम shaligram शिला के साथ भी गोमती चक्र रखना पड़ता है। यह महाप्रकृति का एेश्वर्यमय भग स्वरूप है। जो शिवलिंगार्चन में वेदिका के रूप में है। इसी प्रकार शक्ति की गोल पिण्डियां देश के अनेक शक्ति स्थानों में विद्यमान हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो कालीपीठ पर शक्ति केवल पिण्डियों के रूप में ही स्थापित होती हैं। गणेशजी की स्थापना प्राय: प्रत्येक पूजन के आरम्भ में सुपारी अथवा गोबर की गोल पिण्डियाें पर ब्राह्मणों को करवाते आपने देखा ही होगा। भगवान सूर्य का प्रत्यक्ष प्रतीक आकाश का सूर्य-मण्डल जैसा है। आप जानते हैं, जहां भी ग्रहों के चक्र बनाये जाते हैं, सूर्यमण्डल को अण्डाकर ही बनाना पड़ता है। इस प्रकार इन पंचदेवों की लिंग मानकर अर्थात् चिन्ह बनाकर ही इनकी उपासना होती है।पार्थिव लिंग की पूजा और महत्व:-जो लिंग बांबी, गंगा, तलाब, वैश्या के घर, घुड़साल की मिट्टी मक्खन या मिश्री से बनाये जाते हैं, उनका अलग-अलग मनेकामना के लिये उपासना, पूजा व अभिषेक करने के उपरांत उन्हें जल में विसर्जित करने का विधान है। पार्थिव लिंग के तांत्रिक प्रयोगों से प्रयोजन सिद्धियां :-

1. भू सम्पत्ती प्राप्त करने के लिये- फूलों से बनाये गये शिवलिंग shivling का अभिषेक करें।

2. स्वास्थ्य और संतान के लिये- जौ, गेहूं और चावल तीनों के आटे को बराबर मात्रा में लेकर, शिवलिंग shivling बनाकर उसकी पूजा करें।

3. असाध्य रोग से छुटकारा पाने के लिये- मिश्री से बनाये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

4. सुख-शांति के लिये- चीनी की चाशनी से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

5. वंश वृद्धि के लिये- बांस के अंकुर से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

6. आर्थिक समृद्धि के लिये- दही का पानी कपडे से निचोड़ लें और उस बिना पानी वाली दही से जो शिवलिंग shivling बनेगा, उसका पूजन करने से समृद्धि प्राप्त होती है।

7. शिव सायुज्य के लिये- कस्तूरी और चंदन से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

8. वशीकरण के लिये- त्रिकुटा (सोंठ, मिर्च व पीपल के चूर्ण में नमक मिलाकर शिवलिंग shivling बनता है, उसकी पूजा की जाती है।

10. अभिलाषा पूर्ति के लिये- भीगे तिलों को पीसकर बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

11. अभिष्ट फल की प्राप्ति के लिये- यज्ञ कुण्ड से ली गई भस्म का शिवलिंग shivling बनाकर उसकी पूजा करें।

12. प्रीति बढ़ाने के लिये- गुड़ की डली से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

13. कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये- गुड़ में अन्न चिपकाकर उस से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

14. फल वाटिका में फल की अधिक पैदावार के लिये- उसी फल को शिवलिंग shivling के समान रखकर उस फल की पूजा करें।

15. मुक्ति प्राप्त करने के लिये- आंवले को पीसकर उस से बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

16. स्त्रीयों के लिये सौभाग्य प्रदाता- मक्खन को अथवा वृक्षों के पत्तों को पीसकर बनाये गये शिवलिंग shivling की पूजा करें।

17. आकाल मृत्यु भय दूर करने के लिये- दूर्वा को शिवलिंगाकार गूंथकर उस की पूजा करें।

18. भक्ति और मुक्ति के लिये- कपूर से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

19. तंत्र में सिद्धि के लिये- लौह से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

20. स्त्रीयों के भाग्य में वृद्धि- मोती से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

21. सुख-समृद्धि के लिये- स्वर्ण से बने शिवलिंग shivling का पूजन करें।

22. धन-धान्य वृद्धि के लिये- चांदी से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

23. दरिद्रता निवारण के लिये- पारद (पारा) के शिवलिंग shivling की पूजा करें।

24. शत्रुता निवारण के लिये- पीतल से बने शिवलिंग shivling की पूजा करें।

25. कर्ज निवारण के लिये- कांस्य से निर्मित शिवलिंग shivling की पूजा करें।

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