गरूड पुराण

क्या यमलोक अथवा परलोक का अस्तित्व है :-

Dr.R.B.Dhawan

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क्या पृथ्वी के बाहर भी कहीं जीवन का अस्तित्व है? क्या यमलोक अथवा परलोक का अस्तित्व है? क्या कोई दूसरी दुनियां है? मनुष्य के लिये सदा से ही यह खोज का विषय रहा है। इस विषय में क्या कहते हैं हमारे धर्मग्रन्थ- हमारे धर्म ग्रंथों गरूड़ पुराण में किसी-न-किसी रूप में सौरमण्डल के सभी ग्रहों पर जीवंतता का विवरण इस प्रकार मिलता है। पृथ्वी पर के जीवों का शरीर पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश) का बना है। और गहन अध्ययन करें तो ज्ञात होता है हमारा शरीर 24 तत्वों का है जिनमें पंचमहाभूत, पंच तन्मात्रा, पंच ज्ञानेन्द्रियाँ पंच कर्मेन्द्रियां तथा मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार का समावेश होता है। इस प्रकार मानव से भिन्न अन्य प्राणियों के शरीर में कुछ तत्वों का अभाव भी हो सकता है, परन्तु पंचमहाभूत का लोप नहीं हो सकता।

मानव शरीर चार प्रकार का होता है- 1. पार्थिव शरीर प्रथम है जिसे स्थूल शरीर भी कहते हैं। 2. दूसरे प्रकार का शरीर सूक्ष्म शरीर कहा जाता है। 3. लिंगम शरीर भी एक तीसरे प्रकार का शरीर है। 4. चौथे प्रकार का शरीर कारण शरीर कहलाता है। (स्थूल शरीर प्राणी की जीवित अवस्था है, शेष तीन शरीर स्थूल शरीर का त्याग करने पर प्राप्त होते हैं।) सूक्ष्म शरीर में पंच महाभूत नहीं होते, यह शरीर पारदर्शी होता है, इसकी छाया नहीं पड़ती। इस शरीर की आकृति ठीक स्थूल शरीर जैसी होती है, परन्तु पंच महाभूतों के न रहने के कारण यह हल्का होता है, तथा उसमें शक्ति बहुत अधिक होती है। उसमें संघटन एवं विघटन की प्रक्रिया अपने आप होती रहती है। भूत-प्रेत आदि की सूक्ष्म देह ही होती है। इन देह धारियों के लिये पृथ्वी जैसे ठोस ग्रहों पर निवास आवश्यक नहीं वे तो अंतरिक्ष में भी रह सकते हैं। जिन सूक्ष्म शरीर धारियों को पुनः पृथ्वी पर जन्म लेना है, वे ही पृथ्वी के निकट विचरण करते हैं। वे अंतरिक्ष में एक निश्चित सीमा से आगे नहीं जा पातेे। भूतकालिक संस्कारों के वशिभूत वे मानव जाति से सम्पर्क भी स्थापित करते हैं। किसी काया में प्रवेश की क्षमता भी उनके पास होती है।
लिंगम शरीर एक तीसरे प्रकार का शरीर है, इसमें मात्र तेरह तत्व मात्र होते हैं। इस शरीर मे केवल पंच कर्मेन्द्रियाँ, पंच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन, बुद्धि एवं अंहकार होता है। पंच महाभूत न होने के कारण यह शरीर भी स्थूल नहीं होता। तेरह तत्व का शरीर पितृवर्ग का होता है। इनका निवास चंद्रलोक में कहा गया है, जहाँ विज्ञान पहुँच चुका है। वहाँ मानव जीवन के कुछ चिन्ह नहीं मिले। स्पष्ट है कि तेरह तत्वों के शरीरधारी को देखने की क्षमता साधारण मनुष्य में नहीं होती, इसी लिये तो चंद्रलोक में मानव जीवन के चिन्ह नहीं मिले। चौथे प्रकार का शरीर कारण शरीर कहलाता है, इस शरीर की आकृति अंगूठे के आकार की मानी जाती है। वस्तुतः आत्मा को ही अंगूष्ठ आकार का कहा गया है, यद्यपि आत्मा एक प्रकाशपुंज है, उसका कोई स्वरूप नहीं होता, भला उसकी आकृति क्या हो सकती है? व्यक्तित्व बोध के कारण ही आत्मा को एक प्रकार का शरीर समझ लिया गया है। ऐसे ही जिन कारण शरीरों को फिर पार्थिव शरीर में नहीं लौटना होता, वे दूरस्थ लोक-लोकान्तरों का परिभ्रमण करते हुये अंत में परमधाम ‘सूर्यलोक’ की ओर प्रस्थान करता है, तथा आत्मा का परमात्मा में विलय हो जाता है।

श्री मद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध के इक्कीसवें अध्याय में सूर्य के रथ और उसकी गति का वर्णन आया है। इसमें श्लोक 12 में सूर्य के रथ की गति एक मुहूर्त में चौतिस लाख आठ सौ योजन लिखा है। पुनः श्लोक 19 मे लिखा है कि, सूर्य भूमण्डल के नौ करोड़ इक्यावन लाख योजन लम्बे घेरे को प्रत्येक क्षण में दो हजार दो योजन की गति से पार करते हैं। पृथ्वी से सूर्य की दूरी विज्ञानविद् जितना मानते हैं, उसकी पुष्टि इस श्लोक से हो जाती है। बाईसवें अध्याय मे भिन्न-भिन्न ग्रहों की स्थिति एवं गति का वर्णन है, जिसमें क्रमशः चंद्रमा, शुक्र, बुध, मंगल, बृहस्पति तथा शनि का वर्णन आया है। भागवत पुराण में चंद्रमा को ग्रह माना गया है, तथा इन्हें सर्वमय कहा गया है। इस अध्याय के आठवें श्लोक में चंद्रमा को सूर्य किरणों से दो लाख योजन ऊपर बतलाया गया है।
ज्योतिष विज्ञान में सूर्य आत्मकारक कहा गया है। चंद्रमा को मन का कारक अमृतमय ग्रह कहा गया है। तथा बृहस्पति ग्रह को ज्ञान एवं जीवकारक कहा गया है। इसी प्रकार शनि को न्यायकर्ता, मृत्यु एवं आयु का कारक ग्रह कहा गया है। शनि के कारकत्व से ऐसा लगता है कि वह यमराज एवं धर्मराज दोनों के कारकत्व रखते हैं। जहाँ तक दूरी का प्रसंग है, और भागवत पुराण में जो विवरण है, उससे वर्तमान सभी ग्रह मृतिका-पिण्ड सिद्ध होते हैं। क्योंकि इन सभी ग्रहों पर सूर्य किरणों की पहुँच है। साथ ही प्रत्येक ग्रह में मात्र दो लाख योजन का अन्तर बताया गया है। जबकि शनि की दूरी 15 करोड़ 38 लाख मील सूर्य से बताई गई है। ग्रहों की पारस्परिक दूरी में भागवत पुराण का विवरण अस्पष्ट है तथा सूर्य किरणों से ऊपर होने का अर्थ भी स्पष्ट नहीं है। किन्तु ग्रहों का क्रमिक स्थान युतियुक्त है।

गरूड़ पुराण में प्रेत कर्म एवं मृत्यु का विवरण मिलता है- देहावसान के बाद स्थूल शरीर छूट जाने पर जीव कुछ क्षण के लिये कारण शरीर में निवास करता है, इस का कारण यह है कि- एक से लेकर दो क्षण तक मृत्यु के पूर्व प्रत्येक प्राणी को सर्वात्म दृष्टि प्राप्त हो जाती है। (एक क्षण चार मिनट का होता है।) सर्वात्म दृष्टि में माया-मोह का बंधन नहीं रह जाता। इसी अवस्था में स्थूल शरीर से कारण शरीर में जीव का वहिर्गमन होता है, परंतु यह परिर्वतन अस्थायी होता है। कारण शरीर की गति प्रकाश की गति जैसी होती है, इसलिये शरीर छूटते ही दो मुहूर्त में जीव यमलोक पहुंच जाता है। एक मुहूर्त 48 मिनट का होता है। इस तरह यमलोक जाने में 96 मिनट लगते हैं। इस अवधि में प्रकाश की गति से 96 करोड़ मील की दूरी तय हो सकती है। इस तथ्य के अनुसार मृत्यु के बाद जीव शनि लोक में जाता है, क्योंकि शनि की दूरी 95 करोड़ 38 लाख मील है। गरूड़ पुराण का कथन है कि दो मुहूर्त में जीव यमराज के पास जाता है, वहाँ एक मुहूर्त में उसके कर्म-अकर्म की छानबीन होती है, तथा पुनः दो मुहूर्त में वह अपने मृत-शरीर के पास वापिस भेज दिया जाता है। किन्तु उसे स्थूल शरीर में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं होती। तब एकबार फिर से वह सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करता है।

उसी पुराण में पुनः कहा गया है कि षोड़श श्राद्ध (16 दिन में) के फलस्वरूप जीव को क्रमशः सूक्ष्म एवं छ माह के उपरांत लिंगम् शरीर प्राप्त होते हैं, तथा अन्त में पुनः कारण शरीर में आना होता है। यह प्रक्रिया इस प्रकार है- दसकर्म (10 दिन में) सूक्ष्म शरीर बनता है, 11वें दिन से जीव पुनः सूक्ष्म शरीर धारण कर पृथ्वी से बृहस्पति ग्रह तक यात्रा आरम्भ करता है। अर्थात् सूक्ष्म शरीर प्राप्त कर जीव दूसरी बार फिर से यमपुरी के लिये रवाना होता है। इस बार उसे वहाँ तक जाने में एक वर्ष लग जाता है। कारण स्पष्ट है। पहली बार जीव कारण शरीर में प्रकाश की गति से गया था, दूसरी बार वह सूक्ष्म शरीर में चलता है, और मार्ग में उसे अंतरिक्ष की अठारह सूक्ष्म पुरियां में विश्राम लेना पड़ता है। इस यात्रा के एक वर्ष में छः माह तक वह सूक्ष्म शरीर में होने के कारण मंदगति हो जाता है। इस शरीर से पहला ठहराव उसे 18 दिन के बाद ही सौम्यपुर में मिलता है। दूसरे पाँच ठहराव हैं- सौरोपुर नरेन्द्रभवन, गंधर्व, शैलागय तथा कौंचपुर। पृथ्वी से चलकर चंद्रमा, मंगल, एवं ग्रहगुच्छ तक पुरलोक में प्रवाहवायु के भेद से ये छः ठहराव नियत हैं। इन स्थानों पर जीव अपने पूर्वार्जित पुण्य कर्म का भोग करता है। ग्रह गुच्छ में कोई दो हजार छोटे-बड़े ग्रह पिण्ड हैं। इसकी तुलना वैतरणी नदी से की गई है। इनकी दूरी सूर्य से 31 करोड़ मील है। यहाँ तक जीव सूक्ष्म शरीर में जाता है। वैतरणी पार कर लेने पर उसे लिंगम् शरीर मिलता है। इस शरीर में वह बृहस्पति ग्रह तक जाता हैै बृहस्पति की दूरी 56 करोड़ मील है। बृहस्पति ग्रह से आगे बढ़ने पर पुनः जीव कारण शरीर में चला जाता है, वैतरणी के बाद बारह ठहराव इस प्रकार हैं- क्रूरपुर, विचित्र भवन, वहवापदपुर, दुःखपुर, नाना-क्रंदपुर, सुतप्त भवन, रौद्रपुर, पयोवर्षण, शीताड्य नगर, बहुभीतिपुर, धर्म भवन एवं संजीवनी नगर।
गरूड़ पुराण में जिस प्रकार यमलोक का वर्णन आया है। उसमें कहा गया है कि यमपुरी के बाहर एक विशाल घेरा है। यह घेरा शनि ग्रह के चारों और कोहरे की बैल्ट के रूप में दीखाई पड़ता है। सार रूप में यह संकेत मिलता है कि वहाँ के रहने वाले मात्र कारण शरीर में रहते हैं। कारण शरीर प्रकाश-पुंज भर होता है। इस तरह वहाँ की जीवंतता प्रकाश किरणों के रूप में हमें दृष्टिगत हो सकती है। गरूड़ पुराण के अनुसार आज विज्ञानविद् ग्रह स्थिति एवं गति का जैसा विवरण दे रहे हैं, वह ठीक सिद्ध हो जाता है। शरीर की भिन्नता के कारण वहाँ की जीवंतता में भी संदेह नहीं रह जाता मानव अपनी सीमित शक्ति के सहारे यदि उन जीवंतताओं को नहीं देख पाता तो उन्हें झुठलाया भी नहीं जा सकता। इस प्रकार गरूड़ पुराण में वर्णित जीव की मृत्योपरांत यमपुरी या परलोक यात्रा सत्य जान पड़ती है।

Dr.R.B.Dhawan

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वशीकरण

गायत्री तंत्र से वशीकरण :-

Dr.R.B.Dhawan

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वशीकरण एक ऐसा शब्द है, जो रहस्यमय लगता है, शायद इसी लिए हर कोई इसका प्रयोग कर अपना कार्य सिद्ध करना चाहता है। आज के युग में अधिकांश लोग इसे बकवास मानते हैं। किसी भी कार्य को करने की कम से कम दो कार्य प्रणाली होती हैं, एक सीधे रास्ते से और दूसरे शार्टकट रास्ते से, कोई भी कार्य सम्पन्न किया जा सकता है। सीधे रास्ते चलने में समय बेशक अधिक लगता है, थकावट भी अधिक होगी, परंतु खतरा कम होगा। और शार्टकट रास्ते में खतरे अधिक होंगे, क्योंकि वे अनजान व ऊबड-खाबड रास्ता होगा, परंतु ठीकठाक रहा तो समय भी बचेगा और थकावट भी कम होगी। इसको आप एेसे भी समझ सकते हैं- हवा के रूख को देख कर हवा के साथ चलना, और हवा के विपरीत चलना, परंतु एक निश्चित मार्ग पर ही चलना। इन दोनो में हवा के साथ चलना सरल प्रतीत होता है, तथा हवा के विपरीत चलना संघर्ष व कठिनाइयों से भरा होता है। शार्टकट तथा हवा के रूख को देख कर उसके साथ बहना तांत्रिक विधि से किसी कार्य को संयोजित करने जैसा हुआ, पर हवा का बहाव (तांत्रिक विधि से किया कार्य) आपका बैलेंस बिगाढ सकता है। तांत्रिक किसी कार्य को शीघ्र व चमत्कारी ढंग से कर तो लेता है, परंतु उस कार्य का जीवनकाल भी कम ही होता है। इसके विपरीत सात्विक विधि से सम्पन्न किया गया कार्य खर्चीला तथा समय अधिक लगने के कारण थकाऊ तो होता है, परंतु इसका जीवन काल कहीं अधिक और टिकाऊ होता है।

पौराणिक काल में इस विद्या का मानव जीवन पर कितना प्रभाव रहा है? या इसका भी कोई विज्ञान है ? यही जानने का प्रयास करते है : – वशीकरण क्रिया का ये रहस्य समझने के लिए सबसे पहले अपने शारीरिक, अपने मन तथा अपने मस्तिष्क की कार्यपद्धति के रहस्य को समझना होगा, जिसके द्वारा हम सोचने और समझने की शक्ति रखते हैं, और हम कल्पना करने की क्षमता रखते हैं, अपने मन में शुभ या अशुभ विचार लाते हैं। तो ऐसी कौन सी शक्ति या क्रिया है, जिसके द्वारा हम लोगों के मन पर अपना प्रभाव डाल सकते हैं, अथवा ऐसी क्षमता प्राप्त करके दूसरों को वशीभूत कर सकते हैं। आइए इस विज्ञान को समझें :-

पहले तो ये जान लीजिए “वशीकरण” शब्द अधूरा है, पूर्ण शब्द “वशीभूत” है, वशीकरण शब्द तो वशीभूत क्रिया के लिए के लिए प्रयोग होता है। किसी दूसरे मनुष्य या प्राणी को वशीभूत करने के लिए पंचभूत सिद्धांत को समझना होगा, क्योंकि मनुष्य शरीर पांच भूतों से बना है, 1. पृथ्वी 2. अग्नि 3. वायु 4. जल और 5. आकाश, ये सभी पंचमहाभूत हैं। ये सभी परस्पर बलवान हैं, इनमें सबसे बलवान आकाश भूत है, आकाश अर्थात आत्मा (आत्मा का निवास मस्तिष्क भाग में है)। वशीभूत होने के पश्चात वशीभूत होने वाले मनुष्य या प्राणी के मस्तिष्क पर वशीभूत करने वाले मनुष्य का आकाश भूत अपना अधिकार कर लेता है, और वे वशीभूत करने वाले की किसी निश्चित समय के लिए संबंधित (केवल प्रयोजन से संबंधित) आज्ञा का पालन करने लगता है, अर्थात यह अधिकार वशीकृत करने वाले को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होता, अपितु जिस स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए वशीकृत किया जाता है, केवल उसी विशेष प्रयोजन के लिए जितना भाग (आकाश तत्व का भाग) ही वशीकृत होता है। किसी विशेष प्रयोजन, कर्म या क्रिया के लिए, और किसी निश्चित अवधि के लिए ही किसी को वशीकृत किया जा सकता है। पूरी तरह इस विज्ञान को (इस पद्धति को) बिना समझे हम वशीकरण vashikaran की क्रिया को नहीं समझ सकते है, ना ही इस क्रिया को सफल बना सकते है। किसी विकट स्थिति में जब कोई अपना दूर होता दिखाई दे या फिर कोई रिश्ता टूट रहा हो और उस रिश्ते को बचाना जरूरी लगता हो, इसी स्थिती में वशीभूत क्रिया का यह प्रयोग संपन्न किया जा सकता है, यहां आगे की पंक्तियों में गायत्री तंत्र का एक प्रयोग प्रस्तुत कर रहे हैं, आवश्यकता होने पर इस तंत्र प्रयोग को आप सम्पन्न कर सकते हैं, और कभी-कभी एेसा प्रयोग करना जरूरी भी हो जाता है :-

यह गायत्री तंत्र प्रयोग बहुत प्रभावशाली है, इस प्रयोग का अन्य उग्र तांत्रिक प्रयोगों की तरह कोई दुष्प्रभाव नहीं है, परंतु यह सफल तभी होता है जब इस ‘तंत्र प्रयोग’ का नाजायज इस्तेमाल नहीं किया जाये।
सरल वशीकरण जब कोई अधिकारी, मालिक, रिश्ते में सम्बंधी अथवा पति या पत्नी नाराज हो जायें, तब उन्हें मनाना जरूरी हो जाता है। एेसे में कठिनाइयां अधिक हो रही हों, तब यह ‘तंत्र प्रयोग’ प्रयोग जायज है।

प्रयोग व सामग्री-
एक पीपल का पत्ता, अनार की कलम, लाल चंदन की लकड़ी, एक थाली, एक आचमनी या चम्मच, और एक तांबे का लोटा। रात्रि में पवित्र भाव से एक शुद्ध आसन पर उत्तराभिमुख होकर बैठें, सामने एक थाली में पीपल के पत्ते पर लाल चंदन की स्याही से अनार की कलम द्वारा जिसका वशीकरण करना हो, उसका नाम लिखकर पत्ता उल्टा करके रख दें। लोटा जो जल से भरा हो, उसमें से एक-एक आचमनी या चम्मच पानी लेकर पीपल के पत्ते पर एक-एक मंत्र का उच्चारण करते हुये डालते रहें, 108 बार जल मंत्र पढ़ते हुये डालना है। मंत्र पाठ के समय दुर्गा वेशधारी माता गायत्री का ध्यान करें। साधारण अवस्था में यह प्रयोग एक सप्ताह (सात दिन) में ही अपना प्रभाव दिखा देता है, परंतु यदि समस्या गहरी हो तो, अधिक दिन भी करना पड़ता है।

मंत्र- ॐ क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

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