Married life

वैवाहिक जीवन :-  

जन्म कुंडली का सप्तम भाव विवाह सुख एवं व्यापार का हाल बताता है। सप्तम भाव “काम-त्रिकोण” का द्वितीय कोण कहलाता है । काम त्रिकोण में तृतीय भाव पुरुष जातक का बल (वीर्य) है, और जैसा कि त्रिकोण के नाम से ही पता चलता है कि काम अर्थात कामवासना का मूल या जड़, अर्थात वीर्य तृतीय भाव होता है, इसलिए तृतीय भाव काम त्रिकोण का प्रथम कोण होता है, इसी प्रकार त्रिकोण का दूसरा कोण सप्तम भाव में पड़ता है, अर्थात हमारी पत्नी (कामिनी) जो कि काम अर्थात वीर्य की धारक होती है, और इसी तरह तीसरा कोण इच्छा पूर्ति  का भाव 11वां भाव होता है। अब काम त्रिकोण के चक्र को आप इस तरह समझ सकते हैं:- जैसे वीर्य यानी तृतीय (बल) की उत्पत्ति होती है, वीर्य को सप्तम (कामिनी) अर्थात पत्नी ग्रहण करती हैं, जिसके फलस्वरूप हमारी इच्छा यानी कि 11वां भाव का आनंद पूरा होता है। इसी तरह “काम-त्रिकोण” का चक्र गृहस्थ आश्रम में चलता रहता है।

सप्तम भाव मुख्य रूप से साझेदारी का कहा जाता है, और जीवन में जीवन साथी जीवन की साझेदार (पत्नी/पति) ही होते हैं, जो कि जीवन भर हमारा साथ निभाते हैं, तथा जीवन साथी/संगिनी कहलाते हैं। इस तरह एक साझेदार हमारे वह भी होते हैं, जो हमारे साथ मिलकर व्यापार करते हैं। जैसे पार्टनरशिप में काम करना, साथ ही सप्तम भाव विवाह का भी होता है, और विवाह होने में एक बिचोलिया का भी रोल होता है, इसलिये बिचौलियो का भी, सप्तम भाव ही होता है |

भाव भावात के अनुसार …

सातवां भाव दूसरे भाव (धन संचय) से छटा होता है, इसलिये यह हमे बताता है कि धन संचित करने के लिये हमे कितना संघर्ष करना पड़ेगा? क्यूंकि पत्नी के आने के बाद ही हमे धन संचय के लिये प्रेरणा और संघर्ष मिलता है।

हमारे मामा मौसियो के धन की स्थिति भी यही भाव बताता है। दूसरे भाव के अनुरूप सातवां भाव दाल, दूध, घी, गुड, शर्बत, सूप तथा तला हुआ स्वादिष्ट भोजन भी बताता है । सातवें भाव को अन्य नामो जैसे अस्त, अध्वन, मद, चित्तोत्थ, गमन, मार्ग, द्यूत, जामित्र, काम, सम्पत, स्मर से भी जाना जाता है । यह शरीर मे भीतरी प्रजनन्न अंग गुदा-मार्ग, वीर्य-वाहिनी नली, गुप्तांगो का रक्त संचार, गुर्दे, मल, मूत्र-कोष को भी बताता है। यह भाव मार्ग, सड़क, परदेश, समुद्र पार को भी बताता है ।

तीसरे भाव से पंचम होने के नाते सातवां भाव हमारे पराक्रम को अतिरिक्त सफल बनाने वाली बुद्धि व योजना भी प्रदान करता है। जैसा कि हमारी पत्नी हमे समय-समय पर सुझाव देती है, कि अमुक काम इस ढंग से करो। साथ यह भाव हमारे छोटे भाई बहनो के बच्चो की स्थिति भी बताता है, व उनके प्रेम संबधो को भी बताता है। अक्सर आपने देखा होगा कि देवर (तृतीय) भाव भाभी (सातवें भाव) से स्नेह संबध रखते हैं, इसका यही कारण है, कि सप्तम भाव तीसरे से पंचम होता है।

चतुर्थ भाव से चौथा होने के कारण सातवां भाव हमारे घर-गृहस्थ, माता के सुख को भी बढ़ा देता है, क्यूंकि सातवें भाव अर्थात पत्नी के आने के बाद घर की सुख-सुविधा मे चार चांद लग जाते हैं, तथा माता को भी एक साथी (बहु 7वां भाव) से सुख मिलता है। इसी तरह बहु, यानी सातवे भाव की वजह से ही हमारी पैतृक जमीन जायदाद हमारे हिस्से मे आने से हम उसका सुख ले पाते हैं ।

सातवां भाव पंचम से तीसरा होता है, इसलिये यह हमारी योजनाओं व बुद्धि को मिलने वाले अतिरिक्त बल को दर्शाता है, जैसे पत्नी की सलाह व सहायता। साथ ही हमारी संतान के बल पराक्रम की हालत भी यही भाव बताता है।

सातवां भाव छटे भाव से दूसरा होता है, इसलिये यह हमारे शत्रु की धमकी व उसकी धन स्थिति का विवरण भी देता है, साथ ही मामा मौसियो कि धन स्थिति भी यही भाव बताता है। चोर अगर छटा भाव है तो सातवां चुराया गया सामान है ।

सातवां भाव आठवे से 12वां होने से हमारी आयु मे होने वाली क्षति या गिरावट को बताता है, इसीलिए विवाहित पुरूष/स्त्री का बल धीरे-धीरे क्षीण होता चला जाता है, इसी लिये यह मारक भाव कहा जाता है।

सातवां भाव नवम से 11वां होने कारण हमारे भाग्य व पिता को मिलने वाले लाभ को बताता है, क्यूंकि सातवें (पत्नी) के कारण ही हमारे पिता की वंश वृद्धि होती है, तथा हमारा भाग्य भी अक्सर विवाह के बाद ही लाभ देता है ।

दशम भाव से दशम होने के कारण ही सातवां भाव हमारे पद-प्रतिष्ठा को अतिरिक्त मान-सम्मान दिलाने वाला होता है, क्यूंकि सातवें (पत्नी) के कारण कई बार हमे खूब मान-सम्मान की प्राप्ति होती है । साथ ही यह भाव हमारे कार्य क्षेत्र मे अतिरिक्त कार्य जैसे अपना काम, बिजनेस, साझेदारी का काम या व्यापार भी दर्शाता है ।

सातवां भाव एकादश भाव से नवम् होता है, इसलिये यह हमारी आय व लाभ मे होने वाली उन्नति को भी दर्शाता है, इसलिये यह डेली इनकम का भाव भी कहा जाता है । साथ ही यह भाव हमारे लाभ व आय के लिये होने वाले धार्मिक कृत्यो को भी बताता है, क्युकिं हमारी पत्नी ही हमारे लाभ के लिये पूजा-पाठ इत्यादी करती रहती है।

सातवां भाव 12वें से आठवां होने के कारण हमारे व्यसनों, नशे खर्चो व निवेशो जैसी क्रियाओ के करने वाला होता है। क्यूंकि हमारी पत्नी ही इन सब चीजो से हमे अलग-थलग कराने का प्रयास करती है, अथवा अपनी पत्नी के कारण ही हमे इन उपरोक्त आदतो पर संयम रखना पडता है।

सप्तम भाव का महत्व:-

सातवें भाव का हमारे जीवन में बहुत बड़ा महत्व है । सातवॉ भाव वैवाहिक सुख का स्थान होने के नाते यह हमारे जीवन का सबसे अहम स्थान होता है, क्योंकि विवाह है तो पत्नी है, और पत्नी है तो बच्चे हैं, और बच्चे हैं, तो अपना दुनिया में नाम है, और वंश है।

सातवा भाव यहीं तक सीमित नहीं अपितु बहुत बड़ा महत्व है इसका हमारे जीवन में, जैसे कहा जाता है कि– ”हर कामयाब पुरुष के पीछे एक औरत का हाथ होता है।” महर्षि पराशर ने सप्तम व सप्तमेश के साथ, लग्न पंचम या नवम से योग करने को “राजयोग” का नाम दिया है। क्योंकि अगर हमारे लग्न (शरीर), पचंम (बुद्धि व योजनाएं), नवम (धर्म, भाग्य) अगर कोई अच्छा साथी अथवा हमसफर मिल जाये तो, हम हर मुश्किल से आसानी से निकल जाते हैं, और इसी के सहारे से कहां से कहां तक पहुंच सकते हैं। अर्थात कोई साथी या हमसफर हमारे साथ हो तो हर राह हमे, आसान सी नजर आने लगती है।

सातवें भाव का हमारे जीवन मे इतना महत्व है कि, इसके बारे मे जितना लिखा जाए उतना कम है। इसके लिये आप श्री शिव-शक्ति के आधार पर भी समझ सकते हैं, कि कैसे ये दो होकर भी एक हैं।

इसी लिए महर्षि पराशर व सभी विद्वानो ने सप्तम को केन्द्र स्थान का नाम दिया है, किसी ग्रह की केन्द्र की स्थिति उसे 60 षष्टियांश बल देती है । सप्तम भाव व सप्तमेश पर अगर शुभ प्रभाव है, तो उपरोक्त सभी बातो मे शुभ फल मिलते हैं, अगर अशुभ प्रभाव पिडीत हो तो, जातक को अधिकांशतः प्रतिकूल परिणाम ही मिला करते हैं।

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