कुबेर पूजन

धन त्रयोदशी तिथि पर किया जाता है- कुबेर पूजन।

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवलोक में वास करने वाले देवताओं के धनाध्यक्ष कुबेर हैं। कुबेर न केवल देवताओं के धनाध्यक्ष हैं, बल्कि समस्त यक्षों, गुह्यकों और किन्नरों, इन तीन देवयोनियों के अधिपति भी कहे गये हैं। ये नवनिधियों में पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और वर्चस् के स्वामी भी हैं। जब एक निधि भी अनन्त वैभवों को देने वाली मानी गयी है, और धनाध्यक्ष कुबेर तो गुप्त या प्रकट संसार के समस्त वैभवों के अधिष्ठाता देव हैं। यह देव उत्तर दिशा के अधिपति हैं, इसी लिये प्रायः सभी यज्ञ, पूजा उत्सवों तथा दस दिक्पालों के पूजन में उत्तर दिशा के अधिपति के रूप में कुबेर का पूजन होता है।

कुबेर कैसे बने धनाध्यक्ष ? :-
अधिकांश पुराण कथाओं के अनुसार पूर्वजन्म में कुबेर गुणनिधि नामक एक वेदज्ञ ब्राह्मण थे। उन्हें सभी शास्त्रों का ज्ञान था और सन्ध्या, देववंदन, पितृपूजन, अतिथि सेवा तथा सभी प्राणियों के प्रति सदा दया, सेवा एवं मैत्री का भाव रखते थे। वे बड़े धर्मात्मा थे, किंतु द्यूतकर्मियों की कुसंगति में पड़कर धीरे-धीरे अपनी सारी पैतृक सम्पत्ति गंवा बैठे थे। इतना ही नहीं, आदर्श आचरणों से भी च्युत हो गये थे। परंतु इनकी माता इनसे अत्यंत स्नेह करती थीं और इसी कारण वे इनके पिता से पुत्र के दुष्कर्मों की चर्चा न कर पाती थीं। एक दिन किसी अन्य माध्यम से उनके पिता को पता चला और उन्होंने गुणनिधि की माता से अपनी सम्पत्ति तथा पुत्र के विषय में पूछा तो पिता के कोपभय से गुणनिधि घर छोड़कर वन में चले गये। इधर-उधर भटकते हुये संध्या के समय वहां गुणनिधि को एक शिवालय दिखाई पड़ा। उस शिवालय में समीपवर्ती ग्राम के कुछ शिवभक्तों ने शिवरात्रिव्रत के लिए समस्त पूजन-सामग्री और नैवेद्यादि के साथ शिवाराधना का प्रबंध किया हुआ था। गुणनिधि भूखे तो थे ही, नैवेद्यादि देखकर उसकी भूख और तीव्र हो गयी। वह वहीं समीप में छुपकर उन भक्तों के सोने की प्रतीक्षा में उनके संपूर्ण क्रियाकलापों को बड़े ध्यान से देख रहे थे। रात्रि में उनके सो जाने पर जब एक कपड़े की बत्ती जलाकर पकवानों को लेकर भाग ही रहे थे कि उसका पैर एक सोये हुये पुजारी के पैर से टकरा गया और वह व्यक्ति चोर-चोर चिल्लाने लगा। गुणनिधि भागे जा रहे थे कि चोर-चोर की ध्वनि सुनकर नगर रक्षक ने उनके ऊपर बाण छोड़ा, जिससे उसी क्षण गुणनिधि के प्राण निकल गये। यमदूत जब उन्हेे लेकर जाने लगे तो भगवान् शंकर की आज्ञा से उनके गणों ने वहाँ पहुँचकर उन्हें यमदूतों से छुड़ा लिया और उन्हें कैलाशपुरी में ले आये। आशुतोष भगवान् शिव उनके अज्ञान में ही हो गये व्रतोपवास, रात्रि जागरण, पूजा-दर्शन तथा प्रकाश के निमित्त जलाये गये वस्त्रवर्तिका को आर्तिक्य मानकर उन पर पूर्ण प्रसन्न हो गये और उन्हें अपना शिवपद प्रदान किया। बहुत दिनों के पश्चात् वही गुणनिधि भगवान शंकर की कृपा से कलिंग नरेश होकर शिवाराधना करते रहे। पुनः पाद्मकल्प में वही गुणनिधि प्रजापति पुलस्त्य के पुत्र विश्रवामुनि की पत्नी और भारद्वाज मुनि की कन्या इडविडा (इलविला) के गर्भ से उत्पन्न हुये। विश्रवा के पुत्र होने से ये वैश्रवण कुबेर के नाम से प्रसिद्ध हुये तथा इडविडा के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण ऐडविड भी कहलाये। उत्तम कुल में उत्पन्न होने तथा जन्मान्तरीय शिवाराधना के अभ्यास योग के कारण वे बाल्यकाल से ही दिव्य तेज से सम्पन्न, सदाचारी एवं देवताओं के भक्त थे। उन्होंने दीर्घकाल तक ब्रह्माजी की तपस्या द्वारा आराधना की, इससे प्रसन्न होकर ब्रह्माजी देवताओं के साथ प्रकट हो गये और उन्होंने उसे लोकपाल पद, अक्षय निधियों का स्वामी, सूर्य के समान तेजस्वी पुष्पक विमान तथा देवपद प्रदान किया-

तग्दच्छ बत धर्मज्ञ निधीशत्वमपाप्रुहि।।
शक्राम्बुपयमानां च चतुर्थस्त्वं भविष्यसि।
एतच्च पुष्पकं नाम विमानं सूर्यसंनिभम्।।
प्रतिगृण्हीष्व यानार्थं त्रिदशैः समतां व्रज।
वा. रा. उ. 3। 18-20

वर देकर ब्रह्मादि देवगण चले गये। तब कुबेर ने अपने पिता विश्रवा से हाथ जोड़कर कहा कि ‘भगवन् ब्रह्माजी ने सब कुछ तो मुझे प्रदान कर दिया, किंतु मेरे निवास का कोई स्थान नियत नहीं किया। अतः आप ही मेरे योग्य कोई ऐसा सुखद स्थान बतलाइये, जहां रहने से किसी भी प्राणी को कोई कष्ट न हो।’ इस पर उनके पिता विश्रवा ने दक्षिण समुद्रतट पर त्रिकूट नामक पर्वत पर स्थित विश्वकर्मा द्वारा निर्मित, देवराज इन्द्र की अमरावती के समान अद्वितीय लंका नगरी कुबेर को प्रदान की और कहा कि वह नगरी स्वर्णनिर्मित है और वहां कोई कष्ट, बाधा नहीं है। पिता की आज्ञा से कुबेर लंकाध्यक्ष होकर बड़ी प्रसन्नता के साथ वहां निवास करने लगे। कुबेर शंकरजी के परम भक्त थे। बाद में इन्होंने भगवान शंकर की विशेष रूप में आराधना की तथा भगवान शंकर की कृपा से उन्होंने उत्तर दिशा का आधिपत्य, अलकानाम की दिव्यपुरी, नन्दनवन के समान दिव्य उद्यानयुक्त चैत्ररथ नामक वन तथा एक दिव्य सभा प्राप्त की। साथ ही वे माता पार्वती के कृपापात्र और भगवान शंकर के घनिष्ठ मित्र भी बन गये। भगवान शंकर ने कहा-

तत्सखित्वं मया सौम्य रोचयस्व धनेश्वर।
तपसा निर्जितश्चैव सखा भव ममानघ।।

‘हे सौम्य धनेश्वर! अब तुम मेरे साथ मित्रता का संबंध स्थापित करो, यह संबंध तुम्हें रूचिकर लगना चाहिये। तुमने अपने तप से मुझे जीत लिया है, अतः मेरा मित्र बनकर (यहां अलकापुरी में) रहो।’

पुराणों में कुबेर सभा का वर्णन:-
महाभारत, सभापर्व के 10वें अध्याय में राजाधिराज कुबेर की सभा का विस्तार से वर्णन है। तदनुसार उस सभा का विस्तार सौ योजन लम्बा और सत्तर योजन चौड़ा है। उसमें चन्द्रमा की शीतल श्वेतवर्ण की आभा उदित होती रहती है। इस सभा को कुबेर ने अपनी दीर्घ तपस्या के बलपर प्राप्त किया था। यह वैश्रवणी अथवा कौबेरी नाम की सभा कैलास के पार्श्रवभाग में स्थित है। इसमें अनेक दिव्य सुवर्णमय प्रासाद बने हुए हैं।
बीच-बीच में मणिजड़ित स्वर्णस्तम्भ बने हैं, जिसके मध्य में मणिमयमण्डित चित्र-विचित्र दिव्य सिंहासन पर ज्वलित कुण्डलमण्डित और दिव्य आभरणों से अलंकृत महाराज कुबेर सुशोभित रहते हैं। देवगण, यक्ष, गुह्यक, किन्नर तथा ऋषि-मुनि एवं दिव्य अप्सरायें उनकी महिमा का गान करते हुये वहाँ स्थित रहती हैं। इस सभा के चारों ओर मंदार, पारिजात और सौगन्धिक वृक्षों के उद्यान तथा उपवन हैं, जहां से सुगन्धित, सुखद शीतल, मंद हवा सभामंडप में प्रविष्ट होती रहती है। देवता, गंधर्व और अप्सरा के गण संगीत एवं नृत्य आदि से सभा को सुशोभित करते रहते हैं। इनकी सभा में रम्भा, चित्रसेना, मिश्रकेशी, घृताची, पुजिंकस्थला तथा उर्वशी आदि दिव्य अप्सरा नृत्य-गीत के द्वारा इनकी सेवा में तत्पर रहती हैं। यह सभा सदा ही नृत्य-वाद्य आदि से निनादित रहती है, कभी शून्य नहीं होती। कुबेर के सेवकों में मणिभद्र, श्वेतभद्र, प्रद्योत, कुस्तुम्बुरु, हंसचूड, विभीषण, पुष्पानन तथा पिंगलक आदि मुख्य सेवक हैं। राज्यश्री के रूप में साक्षात् महालक्ष्मी भी वहां नित्य निवास करती हैं। महाराज कुबेर के पुत्र मणिग्रीव और नलकूबर भी वहां स्थित होकर अपने पिता की उपासना करते हैं। साथ ही अनेक ब्रह्मर्षि, देवर्षि, राजर्षि भी महात्मा वैश्रवण की उपासना में रत रहते हैं।

गंधर्वों में तुम्बुरु, पर्वत, शैलूष, विश्वावसु, हाहा, हूहू, चित्रसेन तथा अनेक विद्याधर आदि भी अपने दिव्य गीतों द्वारा महाराज वैश्रवण की महिमा का गान करते रहते हैं। हिमवान्, पारियात्र, विन्ध्यादि पर्वत सेवा में प्रस्तुत रहते हैं तथा सभी देवयोनियाँ और शंख, पद्म आदि निधियां भी मूर्तिमान् रूप धारण कर उनकी सभा में नित्य उपस्थित रहती हैं। उमापति भगवान शिव भी महाराज कुबेर के अभिन्न मित्र होने के कारण त्रिशूल धारण किये हुये भगवती पार्वती के साथ वहां सुशोभित रहते हैं। इस प्रकार महाराज वैश्रवण की सभा ब्रह्मा तथा सभी लोकपाल की सभा से अति विचित्र एवं दिव्य है। राजाधिराज कुबेर इस सभा में स्थित होकर अपने वैभव का दान करते रहते हैं।

धनकुबेर और धन त्रयोदशी :-

धन त्रयोदशी तथा दीपावली के दिन धनाधिपति कुबेर के साथ साथ महालक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। देवताओं के धनाध्यक्ष महाराज कुबेर राजाओं के भी अधिपति हैं, क्योकि सभी निधियों, धनों के स्वामी यही देव हैं, अतः सभी प्रकार की निधियों या सुख, वैभव तथा वर्चस्व की कामना की पूर्ति, फल की वृष्टि करने में वैश्रवण कुबेर समर्थ हैं। सारांश में कहा जा सकता है कि धनाध्यक्ष कुबेर की साधना ध्यान करने से मनुष्य का दुःख-दारिद्रय दूर होता है और अनन्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। सनातन धर्म में गहरा विश्वास रखने वालों का अटल विश्वास है कि शिव के अभिन्न मित्र होने से कुबेर अपने भक्त की सभी विपत्तियों से रक्षा करते हैं, और उनकी कृपा से साधक में आध्यात्मिक ज्ञान-वैराग्य आदि के साथ-साथ उदारता, सौम्यता, शांति तथा तृप्ति आदि सात्त्विक गुण भी स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाते हैं।

राजाधिराज कुबेर की साधना-
महाराज वैश्रवण कुबेर की उपासना से संबंधित मंत्र, यंत्र, ध्यान एवं उपासना आदि की सारी प्रक्रियायें श्रीविद्यार्णव, मंत्रमहार्णव, मंत्रमहोदधि, श्रीतत्त्वनिधि तथा विष्णुधर्मोत्तरादि पुराणों में विस्तार से निर्दिष्ट हैं। तदनुसार इनके अष्टाक्षर, षोडशाक्षर तथा पंचत्रिंशदक्षरात्मक छोटे-बड़े अनेक मंत्र प्राप्त होते हैं। मंत्रों के अलग-अलग ध्यान भी निर्दिष्ट हैं। मंत्र साधना में गहन रूची रखने वाले साधक उपरोक्त ग्रन्थों का अवलोकन करें। यहाँ पाठकों के लिये धनाध्यक्ष कुबेर की एक सहज व सरल साधना पद्धति दी जा रही है। यह साधना धनत्रयोदशी के दिन की जानी चाहिये यदि कोई साधक इस साधना को दीपावली की रात्रि में करना चाहे तो उस महापर्व पर भी यह साधना कर सकते हैं। अथवा दोनो ही दिन (धनत्रयोदशी तथा दीपावली) यह साधना सम्पन्न की जा सकती है।

इस वर्ष धन त्रयोदशी 5 नवम्बर 2018 तथा दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है। यह साधना स्थिर लग्न में ही सम्पन्न की जाती है। क्योंकि स्थिर लग्न में जिस कार्य को किया जाता है वह स्थिरता को प्राप्त होता है, और लक्ष्मी को तो सभी स्थिर ही रखना चाहते हैं। अतः यह साधना तो अवश्य स्थिर लग्न में ही करनी चाहिये। ‘स्थिर लग्न’ इन दिनों में वृष तथा सिंह लग्न ही पढ रही हैं। वृषभ लग्न 5 नवम्बर 2018 धनत्रयोदशी के दिन सांयकाल 18 बजकर 05 मिनट से रात्रि 20 बजकर 00 मिनट तक रहेगी। तथा सिंह लग्न मध्य रात्रि में ठीक 24 बजकर 35 मिनट से 02 बजकर 52 मिनट तक रहेगी।

साधना पद्धति:- धनत्रयोदशी की रात्रि में उत्तर दिशा की ओर मुख करके पुरूष साधक पीले वस्त्र तथा महिलायें पीली साड़ी पहनकर बैठें सामने एक लकड़ी के पटरे पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाकर उस पर शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण प्राण प्रतिष्ठित श्री कुबेर यंत्र स्थापित करें, और साथ ही शुद्ध घी का दीपक जलाकर पंचोपचार पूजा करें मिठाई का भोग लगावें तथा विनियोगादि क्रिया करके 11 माला सप्तमुखी रूद्राक्ष की माला से कुबेर मंत्र का जप करें। जप सम्पूर्ण होने पर प्रसादरूप में मिठाई का परिजनों को वितरण करें और फिर रात्रि में उसी पूजा स्थल में ही निद्रा विश्राम करें। प्रातः शेष फूलादि सामग्री जल में विसर्जित कर दें तथा ‘शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण तथा प्राणप्रतिष्ठित श्री कुबेर यंत्र’ को पीले आसन सहित अपनी तिजोरी कैश बाॅक्स या अलमारी अथवा संदूक में रख दें। तथा रूद्राक्ष की जप माला को गले में धारण करें।

सम्पन्नता के लिये कुबेर मंत्र-
यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय स्वाहा।

वैसे तो इस मंत्र की जप संख्या एक लक्ष (एक लाख) कही गयी है। परंतु धन त्रयोदशी की रात्रि में जितना हो सके विधि-विधान से इस मंत्र का जप करना ही पर्याप्त होता है। मंत्र का जप सम्पन्न होने पर तिल एवं शुद्ध घी से दशांश हवन करना चाहिये। यह साधना कार्तिक कृष्ण 13 अर्थात् धन त्रयोदशी पर की जाती है, पूरे भारतवर्ष के लोग धन त्रयोदशी के दिन धनाधिपति कुबेर के साथ महालक्ष्मी तथा आरोग्य प्रदान करने वाले देव धनवंतरि की पूजा-आराधना एवं साधना करते हैं, और सुख संपदा के अभिलाषी तो इस दिन कुछ विशेष प्रयोग सम्पन्न करते हैं जिससे कि अगले पूरे वर्ष तक घर के सभी सदस्य प्रसन्न व निरोगी रहें, और उनके घर में श्रीलक्ष्मी का निवास और प्रसन्नता बनी रहे।

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रुद्राष्टकम्

श्री गोस्वामी तुलसीदास कृतं शिव रूद्राष्टक स्तोत्रं : –

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यूं तो भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सनातन ग्रंथों में, पुराणों में अनेक मंत्र उल्लेखित हैं, अनेक स्तुति व स्त्रोत भी हैं, जिनकी रचना अनेक ऋषियों और आचार्यों ने की है। जिनके जप व गान करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं, परंतु श्री शिव रुद्राष्टक स्त्रोत्र का महत्व और प्रभाव विलक्षण है। प्रतिदिन शिव रुद्राष्टक का पाठ किया जाए तो हर प्रकार की समस्याओं का समाधान स्वत: ही हो जाता है। साथ ही भगवान शिव की कृपा भी प्राप्त होती है। महाशिवरात्रि, श्रावण मास अथवा चतुर्दशी तिथि (मासिक शिवरात्रि) को इसका जप व गान किया जाए तो विशेष फल मिलता है।

श्री रामचरित मानस के उत्तर काण्ड में वर्णित इस रूद्राष्टक की कथा इस प्रकार है :- कागभुशुण्डि जो कि परम शिवभक्त थे। वह भगवान शिव को परमेश्वर एवं अन्य देवों से अतुल्य मानते थे। उनके गुरू श्री लोमेश थे जो भगवान शिव के साथ-साथ राम में भी असिम श्रद्धा रखते थे। इस कारण कागभुशुण्डि का अपने गुरू के साथ मत-भेद रहता था।
एक बार गुरूजी ने समझाया कि; स्वयं शिव भी राम नाम से आनन्दित रहते हैं, तो तू राम की महिमा को क्यों स्वीकार करने से इन्कार करता है। ऐसे प्रसंग को शिव विरोधी मान कर कागभुशुण्डि अपने गुरू से ही रूष्ट हो गए। इसके उपरांत कागभुशुण्डि ने एक बार एक महायज्ञ का आयोजन किया, परंतु अपने इस यज्ञ की सूचना अपने गुरू को नहीं दी। फिर भी सरल हृदय गुरू अपने भक्त के यज्ञ में समलित होने के लिए पहुँच गए। शिव पुजन में बैठे कागभुशुण्डि ने अपने गुरू लोमश को आया देखा। किन्तु अपने आसन से न उठे, न ही उनका कोई आदर सत्कार ही किया। सरल हृदय गुरू लोमश ने एक बार फिर इसका बुरा नहीं माना। पर महादेव तो महादेव ही हैं। वो अनाचार क्यों सहन करने लगे ? भविष्यवाणी हुई – अरे मुर्ख, अभिमानी ! तेरे सत्यज्ञानी गुरू ने सरलता वश तुझ पर क्रोध नहीं किया। लेकिन, मैं तुझे श्राप दुंगा। क्योंकि नीति का विरोध मुझे पसंद नहीं। यदि तुझे दण्ड ना मिला तो वेद मार्गी भ्रष्ट हो जाएंगे। जो गुरू से ईर्ष्या करते हैं, वो नर्क के भागी होते हैं। तू गुरू के समुख भी अजगर की भांति ही बैठा हुआ है। अत: अधोगति को पाकर अजगर बन जा तथा किसी वृक्ष की कोटर में ही रहना।
इस श्राप से दुःखी हो कर तथा अपने शिष्य के लिए क्षमा दान पाने की अपेक्षा से, शिव को प्रसन्न करने हेतु; ही गुरू लोमश ने प्रार्थना की तथा रूद्राष्टक की रचना और वाचना की तथा आशुतोष भगवान को प्रसन्न किया। इस कथा का सार है – शिव अनाचारी को क्षमा नहीं करते; बेशक वो उनका परम भक्त ही क्यूँ ना हो। परम शिव भक्त कागभुशुण्डि ने जब अपने गुरू की अवहेलना की तो; वे भगवान शिव के क्रोध-भाजन हुए। अपने शिष्य के लिए क्षमादान की अपेक्षा रखने वाले सहृदय गुरू लोमश ने रूद्राष्टक की रचना की तथा महादेव को प्रसन्न किया। गुरु के तप व शिव भक्ति के प्रभाव से यह शिव स्तुति मंगलकारी शक्तियों से सम्पन्न मानी जाती है। तथा मनुष्य के अहंकार को दूर कर उसे विनम्र बनाती है। शिव की इस स्तुति का वाचन करने से मन में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा, तनाव, द्वेष, ईर्ष्या और अहं दूर होता है। यह स्तुति सरल, सरस और भक्तिमय होने से शिव व शिव भक्तों को बहुत प्रिय है। इस स्तुति के पाठ से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं। यह कथा रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में वर्णित है।
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं

चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम।

हे भगवन ईशान को मेरा प्रणाम ऐसे भगवान जो कि निर्वाण रूप हैं, जो कि महान ॐ के दाता हैं, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण में व्यापत हैं, जो अपने आपको धारण किये हुए हैं, जिनके सामने गुण अवगुण का कोई महत्व नहीं, जिनका कोई विकल्प नहीं, जो निष्पक्ष हैं, जिनका आकार आकाश के सामान है, जिसे नापा नहीं जा सकता, उनकी मैं उपासना करता हूँ।
निराकारमोङ्करमूल, तुरीयं,

गिराज्ञानगोतीतमीशं, गिरीशम् ।

करालं महाकालकालं कृपालं

गुणागारसंसारपारं, नतोहम।

जिनका कोई आकार नहीं, जो ॐ के मूल हैं, जिनका कोई राज्य नहीं, जो गिरी के वासी हैं, जो कि सभी ज्ञान, शब्द से परे हैं, जो कि कैलाश के स्वामी हैं, जिनका रूप भयावह है, जो कि काल के स्वामी हैं, जो उदार एवम् दयालु हैं, जो गुणों का खजाना हैं, जो पुरे संसार के परे हैं उनके सामने मैं नत मस्तक हूँ।

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं

मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ।

स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा

लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा।

जो कि बर्फ के समान शील हैं, जिनका मुख सुंदर है, जो गौर वर्ण के हैं, जो गहन चिंतन में हैं, जो सभी प्राणियों के मन में हैं, जिनका वैभव अपार है, जिनकी देह सुंदर है, जिनके मस्तक पर तेज है, जिनकी जटाओ में लहलहाती गंगा हैं, जिनके चमकते हुए मस्तक पर चाँद हैं, और जिनके कंठ पर सर्प का वास हैं।

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं

प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं

प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि।

जिनके कानों में बालियाँ हैं, जिनकी सुन्दर भोहे और बड़ी-बड़ी आँखे हैं, जिनके चेहरे पर सुख का भाव है, जिनके कंठ में विष का वास है, जो दयालु हैं, जिनके वस्त्र शेर की खाल हैं, जिनके गले में मुंड माला है, ऐसे प्रिय शंकर पूरे संसार के नाथ हैं, उनको मैं पूजता हूँ।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं

अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।

त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं

भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम।

जो भयंकर हैं, जो परिपक्व साहसी हैं, जो श्रेष्ठ हैं अखंड हैं, जो अजन्मे हैं, जो सहस्त्र सूर्य के सामान प्रकाशवान हैं, जिनके पास त्रिशूल है, जिनका कोई मूल नहीं है, जिनमे किसी भी मूल का नाश करने की शक्ति है, ऐसे त्रिशूल धारी माँ भगवती के पति जो प्रेम से जीते जा सकते हैं, उन्हें मैं वन्दन करता हूँ।

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी

सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।

चिदानन्दसंदोह मोहापहारी

प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।

जो काल से बंधे नहीं हैं, जो कल्याणकारी हैं, जो विनाशक भी हैं,जो हमेशा आशीर्वाद देते हैं, और धर्म का साथ देते हैं, जो अधर्मी का नाश करते हैं, जो चित्त का आनंद हैं, जो जूनून हैं, जो मुझसे खुश रहें, ऐसे भगवान जो कामदेव के नाशी हैं, उन्हें मेरा प्रणाम।

न यावद्, उमानाथपादारविन्दं

भजन्तीह लोके परे वा नराणाम।

न तावत्सुखं शान्ति, सन्तापनाशं

प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।

जो यथावत नहीं हैं, ऐसे उमा पति के चरणों में वन्दन करता हूं, ऐसे भगवान को पूरे लोक के नर नारी पूजते हैं, जो सुख के सागर हैं, शांति हैं, जो सारे दु:खों का नाश करते हैं, जो सभी जगह वास करते हैं।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां

नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्।

जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं

प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।

मैं कुछ नहीं जानता, ना योग, ना ध्यान, आप देव के सामने मेरा मस्तक झुकता है, सभी संसारिक कष्टों, दुःख दर्द से मेरी रक्षा करें, मेरी बुढ़ापे के कष्टों से से रक्षा करें। मैं सदा ऐसे शिव शम्भु को प्रणाम करता हूँ।

मेरे और लेख देखें :- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in, gurujiketotke.com, vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com पर भी।

तंत्र के रहस्य

तंत्र के रहस्य, सिद्धांत और पंचमकार :-

Dr.R.B.Dhawan

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तंत्र का उल्लेख वैदिक साहित्य में तो नहीं मिलता, परंतु लौकिक साहित्य में अवश्य मिलता है। संभवतः तंत्र की उत्पत्ति वैदिक काल के बाद पौराणिक काल में ही हुई है। तंत्र के प्रधान देव भगवान शिव और भगवति देवी हैं। अनेक योगी आचार्य तंत्राचार्य अथवा अधिकारी नाथ संप्रदाय अथवा “शैव‌ या शाक्त” भी तंत्रालोक के रहस्यों के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता व कुछ सर्जनकार भी हुए हैं। इनमें गुरू मछन्दरनाथ, गुरू गोरक्षनाथ तथा अनेकानेक संस्थापक मठाधीश व तंत्र सम्राट हैं, जिनका नाम आदर से लिया जाता है। आगे की पंक्तियों में पंच-मकार का जो वर्णन दिया जा रहा है, वह कुछ तंत्राचार्यों का मत है, अनेक तंत्राचार्य पंच-मकार का अर्थ अन्य प्रकार से मानते हैं। (मेरा स्वयं का मत भी इस प्रकार के पंच-मकार से भिन्न है।) यहां केवल अघोर पक्ष का मत दिया जा रहा है।

तंत्र में पंचमकार (पांच बार म, म, म, म, म) 1. मद्य, 2. मांस, 3. मत्स्य, 4. मुद्रा और 5. मैथुन। कब, कैसे प्रचलित हुये, और इनका क्या रहस्य है? साधारणत: यह विश्वास किया जाता है की मंत्र-तंत्र पंचमकार, जादू-टोना, पंचमकार के ही मुख्य अंग हैं। पंचमकार का अर्थ है, जिसमे पांच मकार अर्थात पांच म शब्द से शुरू होने वाले अवयव आयें यथा मांस-मदिरा-मत्स्य-मुद्रा और मैथुन। कौलावली निर्णय में यह मत दिया है की मैथुन से बढ़कर कोई तत्व् नहीं है।, इससे साधक सिद्ध हो जाता है, जबकि केवल मद्य से भैरव ही रह जाता है, मांस से ब्रह्म, मत्स्य से महाभैरव और मुद्रा से साधकों में श्रेष्ठ हो जाता है। केवल मैथुन से ही सिद्ध हो सकता है। इस सम्बन्ध में कुछ बातें ध्यान देने योग्य हैं, प्रथम: पंचमकार का सेवन बौद्धों की बज्रयान शाखा में विकसित हुआ था। इस परंपरा के अनेक सिद्ध, बौद्ध एवं ब्राह्मण परंपरा में सामान रूप से गिने जाते हैं। बज्रयानी चिंतन, व्यवहार और साधना का रूपांतर ब्राह्मण परंपरा में हुआ है, जिसे वामाचार या वाम मार्ग कहते हैं, अतः पंचमकार केवल वज्रयानी साधना और वाम मार्ग में मान्य है। वैष्णव, शौर्य, शैव, शाक्त व गाणपत्य तंत्रों में पंचमकार को कोई स्थान नहीं मिला। काश्मीरी तंत्र शास्त्र में भी वामाचार को कोई स्थान नहीं है। वैष्णवों को छोड़कर शैव व् शाक्त में कहीं कहीं मद्य, मांस व् बलि को स्वीकार कर लिया है, लेकिन मैथुन को स्थान नहीं देते। वाममार्ग की साधना में भी 15-17वीं सदी में वामाचार के प्रति भयंकर प्रतिक्रिया हुई थी। विशेषकर महानिर्वाण तंत्र, कुलार्णव तंत्र, योगिनी तंत्र, शक्ति-संगम तंत्र आदि तंत्रों में पंचमकार के विकल्प या रहस्यवादी अर्थ कर दिए हैं। जैसे मांस के लिए लवण, मत्स्य के लिए अदरक, मुद्रा के लिए चर्वनिय द्रव्य, मद्य के स्थान पर दूध, शहद, नारियल का पानी, मैथुन के स्थान पर साधक का समर्पण या कुंडलिनी शक्ति का सहस्त्रार में विराजित शिव से मिलन। यद्यपि इन विकल्पों में वस्तु भेद है, लेकिन महत्वपूर्ण यह है की वामाचार के स्थूल पंचतत्व शिव-शक्ति की आराधना के उपकरण हैं।

तांत्रिक साधना क्या है? :-

1–वेदाचार

2– वैष्णवाचार

3–शैवाचार

4–दक्षिणाचार

5–वामाचार

6–सिद्धान्ताचार

7–कुलाचार

तंत्र शास्त्र के अंतर्गत सात प्रकार के साधना पद्धतियों का प्रचलन या वर्णन प्राप्त होता है, जो दो मुख्य धारणाओं में विभाजित हैं :- प्रथम पश्वाचार या पशु भाव तथा द्वितीय–वीराचार। इसके अतिरिक्त दिव्य-भाव त्रय के अंतर्गत सम्पूर्ण प्रकार के सिद्धि पश्चात जब साधक स्वयं शिव तथा शक्ति के समान हो जाता हैं। पशु भाव के अंतर्गत चार प्रकार के साधन पद्धतियों को समाहित किया गया है जो निम्नलिखित हैं।

1. वेदाचार, 2. वैष्णवाचार, 3. शैवाचार 4. दक्षिणाचार।

1. वेदाचार : तंत्र के अनुसार सर्व निम्न कोटि की उपासना पद्धति वेदाचार हैं, जिसके तहत वैदिक याग-यज्ञादि कर्म विहित हैं।

2. वैष्णवाचार : सत्व गुण से सम्बद्ध, सात्विक आहार तथा विहार, निरामिष भोजन, पवित्रता, व्रत, ब्रह्मचर्य, भजन-कीर्तन इत्यादि कर्म विहित हैं।

3. शैवाचार : शिव तथा शक्ति की उपासना, यम-नियम, ध्यान, समाधि कर्म विहित हैं।

4. दक्षिणाचार : उपर्युक्त तीनों पद्धतियों का एक साथ पालन करते हुए, मादक द्रव्य का प्रयोग विहित हैं।

दक्षिणा-चार (पशु भाव), वीरा-चार तथा कुला-चार (वीर भाव), सिद्धान्ताचार (दिव्य भाव) हैं, भिन्न-भिन्न तंत्रों में दक्षिणा-चार, वीरा-चार तथा कुला-चार, इन तीन प्रकार के पद्धति या आचारों से शक्ति साधना करने का वर्णन प्राप्त होता है। शैव तथा शक्ति संप्रदाय के क्रमानुसार साधन मार्ग निम्नलिखित हैं :-

1. दक्षिणा-चार, पश्वाचार (पशु भाव) ; जिसके अंतर्गत, वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार के कर्म निहित हैं जैसे, दिन में पूजन, प्रातः स्नान, शुद्ध तथा सात्विक आचार-विचार तथा आहार, त्रि-संध्या जप तथा पूजन, रात्रि पूजन का पूर्ण रूप से त्याग, रुद्राक्ष माला का प्रयोग, ब्रह्मचर्य इत्यादि नियम सम्मिलित हैं, मांस-मत्स्यादी से पूजन निषिद्ध हैं। ब्रह्मचर्य का पालन अत्यंत आवश्यक है, अथवा अपनी स्त्री में ही रत रहना ब्रह्मचर्य पालन ही समझा जाता है। पंच-मकार से पूजन सर्वथा निषिद्ध है, यदि कही आवश्यकता पड़ जाये तो उनके प्रतिनिधि प्रयुक्त हो सकते हैं। साधना का आरंभ पशु भाव से शुरू होता है, तत्पश्चात शनै-शनै साधक सिद्धि की ओर बढ़ता है।

2. वामा-चार या वीरा-चार (वीर भाव) ; शारीरिक पवित्रता स्नान-शौच इत्यादि का कोई बंधन नहीं हैं, साधक सर्वदा, सर्व स्थान पर जप-पूजन इत्यादि करने का अधिकारी है। मध्य या अर्ध रात्रि में पूजन तय प्रशस्त हैं, मद्य-मांस-मतस्य से देव पूजन, भेद-भाव रहित, सर्व वर्णों के प्रति सम दृष्टि तथा सम्मान इत्यादि निहित है। साधक स्वयं को शक्ति या वामा कल्पना कर साधना करता है।

3. सिद्धान्ताचार : शुद्ध बुद्धि! इसी पद्धति या आचार के साधन काल में उदय होता है, अपने अन्दर साधक शिव तथा शक्ति का साक्षात् अनुभव कर पाने में समर्थ होता है। संसार की प्रत्येक वस्तु या तत्व, साधक को शुद्ध तथा परमेश्वर या परमशिव से युक्त या सम्बंधित लगी है, अहंकार, घृणा, लज्जा इत्यादि पाशों का पूर्ण रूप से त्याग कर देता है। अंतिम स्थान कौलाचार या राज-योग ही है, साधक साधना के सर्वोच्च स्थान को प्राप्त कर लेता है। इस स्तर तक पहुँचने पर साधक सोना और मिट्टी में, श्मशान तथा गृह में, प्रिय तथा शत्रु में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं रखता है, उनके निमित्त सब एक हैं, उसे अद्वैत ज्ञान की प्राप्ति हो जाती हैं। इन्हीं आचार-पद्धतियों को भाव त्रय भी कहा गया है।

1. पशु भाव 2. वीर भाव 3. दिव्य भाव कहा जाता है।

तंत्र साधना हेतु उत्तम स्थान :- मणिकर्णिका घाट, वाराणसी या काशी। यह स्थान तंत्र साधना हेतु सर्वोत्तम माना जाता है, भगवान शिव यहाँ सर्वदा, साक्षात विराजमान रहते हैं। आदि काल से ही, काशी या वाराणसी का प्रयोग तांत्रिक साधनाओं हेतु किया जाता है। पश्वाचार, कौलाचार या कुलाचार, दिव्याचार, शैव-शाक्त के साधन क्रम हैं।

अष्ट पाश : घृणा, शंका, भय, लज्जा, जुगुप्सा, कुल, शील तथा जाति, पशु भाव आदि भाव हैं, मनुष्य पशुओं में सर्वश्रेष्ठ तथा सोचने-समझने या बुद्धि युक्त है। जब तक मनुष्य के बुद्धि का पूर्ण रूप से विकास ना हो, वह पशु के ही श्रेणी में आता है। जिसकी जितनी बुद्धि होगी उसका ज्ञान भी उतना ही श्रेष्ठ होगा। यहां पशु भाव से ही साधन प्रारंभ करने का विधान है, यह प्रारंभिक साधन का क्रम है, आत्म तथा सर्व समर्पण भाव उदय का प्रथम कारक पशु भाव क्रम से साधना करना है। यह भाव निम्न कोटि का माना गया है, स्वयं त्रिपुर-सुंदरी, श्री देवी ने अपने मुखारविंद से भाव चूड़ामणि तंत्र में पशु भाव को सर्व-निन्दित तथा सर्व-निम्न श्रेणी का बताया है। अपनी साधना द्वारा प्राप्त ज्ञान द्वारा जब अज्ञान का अन्धकार समाप्त हो जाता है, पशु भाव स्वतः ही लुप्त हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार पशुत्व लक्षण आठ प्रकार से युक्त मानव स्वभाव लक्षणों या पाशों से है; 1. घृणा, 2. शंका, 3. भय, 4. लज्जा, 5. जुगुप्सा, 6. कुल, 7. शील तथा 8. जाति। यही अष्टपाश युक्त मानव लक्षण सर्वदा ही मनुष्य के आध्यात्मिक उन्नति हेतु बाधक माने गए हैं, तथा साधना पथ में त्याज्य हैं। पशु भाव साधना क्रम के अनुसार साधक इन्हीं लक्षणों या पाशों पर विजय पाने का प्रयास करता है।

1. घृणा : व्यक्ति-विशेष के शरीर, इन्द्रियां तथा मन को न भाने वाली तथा तिरस्कृत करने वाला लक्षण घृणा कहलाती है। संसार के समस्त तत्व या पञ्च तत्व से निर्मित प्रत्येक वस्तुओं में किसी भी प्रकार का विकार अनुभव करना ही घृणा है, जो अभिमान, अहंकार इत्यादि विकारों को जन्म देता है। मनुष्य के हृदय पर किसी वस्तु या तत्व के प्रति प्रेम तथा किसी के प्रति तिरस्कार यदि विद्यमान है तो, वह मनुष्य परमात्मा तथा प्रत्येक तत्व में विद्यमान परमात्मा के अस्तित्व से अनभिज्ञ है।

2. शंका : किसी व्यक्ति के प्रति संदेह की भावना शंका है। विषय-आसक्त, माया-मोह में पड़ा हुआ मनुष्य, अपने विकास के लिये नाना प्रकार के छल-प्रपंच में लिप्त रहता है, कपट व्यवहार करता है, झूठ बोलता है, देहाभिमानी है, परिणाम स्वरूप वह दूसरे को भी ऐसा ही समझ कर उस पर संदेह करता है।

3. भय : मनुष्य को अपने शरीर, प्रिय-जन, संपत्ति, अभिलषित वस्तुओं से प्रेम रहता है, तथा इसके नष्ट होने का सर्वदा भय रहता है। भौतिक वस्तुओं के नाश का उसे सर्वदा भय रहता है, परन्तु आत्म के नाश का नहीं तथा आत्म तत्व को जानने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। अन्य कई कारण हैं, जो भय को उत्पन्न करते हैं; जैसे अपने सन्मुख होने वाली कोई अप्रिय घटना इत्यादि।

4. लज्जा : सामान्यतः मनुष्य के हृदय में मान-अपमान भावना का उदय होना लज्जा कहलाता है। मनुष्य का शरीर नश्वर है, फिर शरीर के मान-अपमान का कितना महत्व हो सकता है? तथा शरीर को जीवन देने वाली आत्म साक्षात् परमात्मा ही है, तथा मान-अपमान से परे है।

5. जुगुप्सा : दूसरों की निंदा-चर्चा करना जुगुप्सा कहलाती है, मनुष्य दूसरों के गुण तथा दोषों को देखता है, तथा अपने दोषों का मनन नहीं कर पाता।

6. कुल : उच्च कुल या वंश में जन्म कुल-भाव से है, जैसे उच्च कुल में पैदा हुआ अपने आप को उच्च मानता है, तथा दूसरे के कुल को छोटा। यह भाव मनुष्य के अन्दर छोटा या बड़ा होने की प्रवृति को उदित करता है, तथा उसके विचार भेद-भाव युक्त हो जाते हैं।

7. शील : शिष्टाचार का अभिप्राय शील है, अन्य लोगों के प्रति मानव का व्यवहार, सेवा, उठने-बैठने का तरीका शिष्टाचार या शील कहलाता है। शीलता के बंधन को काट देने पर साधक विचार तथा कर्म में स्वतंत्र हो जाता है, तथा उसे ये चिंता नहीं रहती की कोई अन्य उसके बारे में क्या सोच रहा है।

8. जाती : मनुष्य का अपना जात्यभिमान, उसके हृदय में बड़े या छोटे भावना का प्रतिपादन करता है। जाती भेद को समदर्शी न मानने वाला पशु भाव से ग्रस्त है, चारों जातियां क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र सभी परम-पिता ब्रह्मा जी के संतान हैं।

शक्ति साधना मार्ग में प्रयुक्त होने वाले, पञ्च-मकार (मद्ध, मांस, मत्स्य, मुद्रा तथा मैथुन) के कारण साधक को शिवत्व प्राप्त करने हेतु इन सभी पाशों या लक्षणों से मुक्त होना अत्यंत आवश्यक है। जो इन अष्ट-पाशों में से किसी एक से भी ग्रस्त है, मनोविकार युक्त है, वह सर्वदा, सर्व-काल तथा सर्व-व्यवस्था में साधना करने में समर्थ नहीं हो सकता। चित निर्मल हुए बिना, समदर्शिता तथा त्याग की भावना का उदय होना अत्यंत कठिन है, चित को निर्मल निर्विकार करने हेतु पशु भाव का त्याग अत्यंत आवश्यक है। पशु भाव से साधना प्रारंभ कर अष्ट पाशों, मनोविकार पर विजय पाकर ही साधक वीर-भाव में गमन का अधिकारी है। वस्तुतः पशु भाव युक्त साधना कर साधक इन अष्ट-पाशों या विकारों से मुक्त होने का प्रयास करता है।

वीर भाव : इस भाव तक आते-आते साधक! अष्ट-पाशों के कारण होने वाले दुष्परिणामों को समझने लगता है, परन्तु उनका पूर्ण रूप से वह त्याग नहीं कर पाता है, परन्तु करना चाहता है। इसी प्रकार पशु भाव से अपने देह तथा मन की शुद्धि करने के प्रयासरत साधक, वीर-भाव से साधना कर पाता है। वीर-भाव का मुख्य आधार केवल यह है कि! साधक अपने आप में तथा अपने इष्ट देवता में कोई अंतर न समझे, तथा साधना में रत रहा कर अपने इष्ट देव के समान ही गुण-स्वभाव वाला बने। वीर-भाव बहुत ही कठिन मार्ग है, बिना गुरु आज्ञा तथा मार्गदर्शन के यह साधन हानिकारक ही होता है, इस मार्ग को कुल, वाम, कौल, वीरा-चार नाम से भी जाना जाता है। साथ ही साधक का दृढ़ निश्चयी भी होना अत्यंत आवश्यक है, किसी भी कारण इस मार्ग का मध्य में त्याग करना उचित नहीं है, अन्यथा दुष्परिणाम अवश्य प्रकट होते हैं। जिस साधक में किसी भी प्रकार से कोई शंका नहीं है, वह भय मुक्त है, निर्भीक है, निर्भय हो किसी भी समय कही पर भी चला जाये, लज्जा व कुतूहल से रहित है, वेद तथा शास्त्रों के अध्ययन में सर्वदा रत रहता है, वह वीर साधन करने का अधिकारी है। साधन के इस क्रम में मूल पञ्च-तत्व के प्रतीक पञ्च-तत्वों से साधना करने का विधान है, जिसे पञ्च-मकार नाम से जाना जाता है।

इसी मार्ग का अनुसरण कर महर्षि वशिष्ठ ने, नील वर्णा महा-विद्या तारा की सिद्धि प्राप्त की थी। सर्वप्रथम, अपने पिता ब्रह्मा जी की आज्ञा से महर्षि वशिष्ठ ने देवी तारा की वैदिक रीति से साधना प्रारंभ की परन्तु सहस्त्र वर्षों तक कठोर साधना करने पर भी मुनि-राज सफल न हो सके। परिणामस्वरूप क्रोध-वश उन्होंने तारा मंत्र को श्राप दे दिया। तदनंतर दैवीय आकाशवाणी के अनुसार, मुनि राज ने कौल या कुलागम मार्ग का ज्ञान प्राप्त किया, तथा देवी के प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त कर, सिद्धि प्राप्त की। साधना के इस क्रम में साधना पञ्च-मकार विधि से की जाती हैं! यह पञ्च या पांच तत्व हैं 1. मद्य, 2. मांस 3. मतस्य 4. मुद्रा तथा 5. मैथुन, इन समस्त द्रव्यों को कुल-द्रव्य भी कहा जाता है। सामान्यतः इनमें से केवल मुद्रा (चवर्ण अन्न तथा हस्त मुद्रायें) को छोड़ कर सभी को निन्दित वस्तु माना जाता है, वैष्णव सम्प्रदाय तो इन समस्त वस्तुओं को महा-पाप का कारण मानता है, मद्य या सुरा पान पञ्च-महा पापों में से एक है। परन्तु आदि काल से ही वीर-साधना में इन सब वस्तुओं के प्रयोग किये जाने का विधान है। कुला-चार केवल साधन का एक मार्ग है, तथा इस मार्ग में प्रयोग किये जाने वाले इन पञ्च-तत्वों को केवल अष्ट-पाशों का भेदन कर, साधक को स्वतंत्र-उन्मुक्त बनाने हेतु प्रयोग किया जाता है। साधक इन समस्त तत्वों का प्रयोग अपनी आत्म-तृप्ति हेतु नहीं कर सकता, इनका कदापि आदि नहीं हो सकता, साधक केवल अपने इष्ट देवता को समर्पित कर ग्रहण करने का अधिकारी है, यह केवल उपासना की सामग्री है, उपभोग की नहीं। अति-प्रिय होने पर भी, इन तत्वों से साधक किसी प्रकार की आसक्ति नहीं रख सकता है, यह ही साधक के साधना की चरम पराकाष्ठा है। देखा जाये तो आदि काल से ही शैव तथा विशेषकर शक्ति संप्रदाय से सम्बंधित पूजा-साधना तथा पितृ यज्ञ कर्मों में मद्य, मांस, मीन इत्यादि का प्रयोग किया जाता रहा है।

कुछ तंत्राचार्यों का मत है (मेरा स्वयं का मत इस पक्ष में नहीं है):- ऋग्-वेद! देव तथा पितृ कार्यों हेतु हिंसा को पाप नहीं मानता। कुलार्णव तंत्र (कौल या कुल धर्म के विवरण सम्बन्धी तंत्र) के अनुसार, शास्त्रोक्त विधि से देवता तथा पितरों का पूजन कर मांस खानेवाला तथा मद्य पीने वाला किसी भी प्रकार के दोष का भागी नहीं होता। बिना यज्ञ कर्मों के मांस-मदिरा सेवन दोष युक्त माना गया है, तथा पाप की श्रेणी में आता हैं। मंत्रों द्वारा पवित्र किया गया या शास्त्रोक्त विधि से कुल द्रव्य या तत्व, गुरु तथा देवता को अर्पण कर पान करने वाला भव सागर के बंधन से मुक्त हो जाता है, तथा किसी भी प्रकार के दोष का भागी नहीं है। मतस्य-मांस, सुरा इत्यादि मादक द्रव्यों का कौल मार्ग में दीक्षा संस्कार के पश्चात, देव कार्य पूजन के अतिरिक्त सेवन दोष युक्त माना गया है।
कुछ तंत्राचार्यों का मत :- मद्य, मांस, मतस्य, मुद्रा के सेवन का मुख्य कारण यह है कि सामान्यतः मद्य निन्दित वस्तुओं में माना जाता है, परन्तु मादक द्रव्यों में मद्य या सुरा सर्वोत्तम द्रव्य माना जाता है, इसके सेवन से मनुष्य नशे में लिप्त हो, आत्म विस्मृत की अवस्था को प्राप्त कर उन्मत हो जाता है। अन्य मादक द्रव्यों के समान मद्य मनुष्य में आलस्य नहीं लाता है, आलसी मनुष्य को क्रिया-शील करने में मद्य विशेष प्रभाव दिखता है। अष्ट-पाशों का जो सादाहरण या मानसिक बल से परित्याग कर विमुक्त होने में समर्थ नहीं है, वह सुरा पान रूपी औषधि का प्रयोग कर, इन पाशों का त्याग करने या नियंत्रण करने में सफल हो सकता है। मद्यपान ध्यान केन्द्रित करने में पूर्णतः सक्षम है, तथा इसी करण वश शक्ति साधनाओं में प्रयुक्त होता है। साधक जिस किसी ओर चाहे, अपना ध्यान पूर्ण केन्द्रित कर सकता है, वास्तव में मद्यपान कर साधक आत्म-विस्मृत की अवस्था को प्राप्त करता है, तथा सर्व प्रकार से चिंता रहित हो, ध्यान केन्द्रित कर पाता है। मद्य उत्कट उत्तेजक पदार्थ है, तथा इसका प्रयोग मांस, मतस्य, चर्वण अन्न के साथ प्रयोग किया जाता है। मदिरा के साथ, मांस-मत्स्य इत्यादि का प्रयोग, मदिरा में व्याप्त विष को शांत करने हेतु किया जाता है, साथ ही पौष्टिक भोजन के अलावा मदिरा का सेवन मनुष्य को मृत्यु की ओर ले जाता है। मदिरा के साथ या अन्य मादक द्रव्यों के साथ मांस इत्यादि का सेवन मनुष्य को बलवान एवं तेजस्वी बनता है।

स्त्री सेवन का मुख्य कारण :- स्त्री के प्रति मोह या प्रेम! काम वासना या कामुकता, किसी भी साधना पथ का सबसे बड़ा विघ्न है, तथा विघ्न से दूर रह कर या कहें तो स्त्री से दूर रहकर इस विघ्न पर विजय नहीं पाया जा सकता है। प्रेम में लिप्त मनुष्य, सही और गलत भूल कर, मनमाने तरीके से कार्य करता है। अघोर तंत्र में स्त्री सेवन में रहते हुए, काम-वासना, प्रेम इत्यादि आसक्ति का आत्म त्याग सर्वश्रेष्ठ माना गया है। पूजन, केवल विभिन्न द्रव्यों को देवताओं पर अर्पित करना ही नहीं होता, अपितु देवता के पूर्ण रूप से संतुष्टि होने से भी सम्बंधित है। समस्त वस्तु या तत्व परमात्मा द्वारा ही बनायी गई हैं, पंच-मकार मार्ग! समस्त प्रकार के वैभव-भोगो में रत रहते हुए, धीरे-धीरे त्याग का मार्ग है। साधक का सदाचारी होना भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, संस्कार (दीक्षा) विहीन होने पर, गुरु आज्ञा का उलंघन करने पर तथा सदाचार विहीन होने पर साधक पाप का अधिकारी हो पतन की ओर अग्रसर होता है। शक्ति संगम तंत्र के अनुसार मैथुन हेतु सर्वोत्तम स्त्री संग, दीक्षिता तथा देवताओं पर भक्ति भाव रखने वाली, मंत्र-जप इत्यादि देव कर्म करने वाली होना आवश्यक है। किसी भी स्त्री को केवल देखकर मन में विकार जागृत होना, साधक के नाश का कारण बनता है। कुल-धर्म दीक्षा रहित स्त्री का संग, सर्व सिद्धियों की हानि करने वाला होता है। स्त्री संग से पूर्व स्त्री-पूजन अनिवार्य है, तथा स्त्रियों से द्वेष निषेध है, स्त्री सेवन या सम्भोग आत्म सुख के लिये करने वाला पापी तथा नरक गामी होता है। पर-द्रव्य, पर-अन्य, प्रतिग्रह, पर-स्त्री, पर-निंदा, से सर्वदा दूर रहकर! सदाचार पालन अत्यंत आवश्यक है।

पंच-मकार विधि से साधना करने का मुख्य उद्देश्य :- पञ्च-मकार साधना केवल मात्र इष्ट देवता की पूजा हेतु विहित है, न की स्व-तृप्ति या विषय-भोग के लिए, समस्त भौतिक सुखों से पंच-मकार विधि मुक्ति पाने हेतु केवल साधन मात्र है। साधारण मनुष्य विषय-भोगों में सर्वदा आसक्त रहता है, और अधिक प्राप्त करने का प्रयास करता है, तथा सर्वदा उनमें लिप्त रहता है, आदी हो जाता है। परन्तु वीराचारी आसक्ति से सर्वदा दूर रहता है। किसी भी प्रकार से विषय-भोगो में आसक्ति, लिप्त रहने का उसे अधिकार उसे नहीं है, सर्वदा ही उसे उन्मुक्त रहना पड़ता है, वह आदी नहीं हो सकता है। स्त्री संग करने पर साधक पर स्त्री का कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये, न मोह न प्रेम। इसी तरह मद्य, मांस तथा मतस्य के सेवन के पश्चात भी, शरीर पर इनका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये। मद्यपान करने पर साधक के शरीर में पूर्ण चेतना रहनी चाहिये।

वास्तव में देखा जाये तो, यह पंच-मकार मनुष्य के अष्ट पाशों के बंधन से मुक्त होने में सहायक है, सर्वश्रेष्ठ विषय भोगो को भोग करते हुए भी, विषय भोगो के प्रति अनासक्ति का भाव, इस मार्ग का परम उद्देश्य है। जब तक मानव पाश-बद्ध, विषय-भोगो के प्रति आसक्त, देहाभिमानी है, वह केवल जीव कहलाता है, पाश-मुक्त होने पर वह स्वयं शिव के समान हो जाता है। वीर-साधना या शक्ति साधना का मुख्य उद्देश्य शिव तथा समस्त जीवों में ऐक्य प्राप्त करना है। यहाँ मानव देह देवालय है तथा आत्म स्वरूप में शिव इसी देवालय में विराजमान है, अष्ट पाशों से मुक्त हुए बिना देह में व्याप्त सदा-शिव का अनुभव संभव नहीं है। शक्ति साधना के अंतर्गत पशु भाव, वीर-भाव जैसे साधन कर्मों का पालन कर मनुष्य सफल योगी बन पाता है। (संकलन)

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सोमवती अमावस्या

Dr.R.B.Dhawan

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सोमवती अमावस्या अर्थात्- सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को ही सोमवती अमावस्या कहते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार सोमवती अमावस्या बड़े भाग्य से पड़ती है। पांडव सोमवती अमावस्या के लिए तरसते रहे, लेकिन उनके जीवन में कभी सोमवती अमावस्या पड़ी ही नहीं। सोमवार का दिन भगवान चन्द्रमा को समर्पित दिन है। भगवान चन्द्रमा को ज्योतिष शास्त्र में मन का कारक माना गया है। अत: इस दिन अमावस्या पड़ने का अर्थ है कि यह दिन मन सम्बन्धी दोषों के समाधान के लिये अति उत्तम है। चूंकि हमारे शास्त्रों में चन्द्रमा को ही समस्त दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों का कारक माना जाता है, अत: पूरे वर्ष में एक या दो बार पड़ने वाले इस दिन का बहुत महत्व है। विवाहित स्त्रियों द्वारा इस दिन अपने पतियों के दीर्घायु की कामना के लिए व्रत का विधान है।

सोमवती अमावस्या एक पर्व के रूप में जाना और माना जाता है, यह कल्याणकारी पर्वो में से एक है, लेकिन सोमवती अमावस्या को अन्य अमावस्याओं से अधिक पुण्य कारक मानने के पीछे भी शास्त्रीय और पौराणिक कारण हैं। सोमवार को भगवान शिव और चंद्रमा का दिन कहा गया है। सोम यानि चंद्रमा! अमावस्या और पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का सोमांश यानि अमृतांश सीधे पृथ्वी पर पड़ता है। शास्त्रों के अनुसार सोमवती अमावस्या पर चंद्रमा का अमृतांश पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पड़ता है।

अमावस्या अमा+वस्या दो शब्दों से मिलकर बना है। शिव महापुराण में इस संधि विच्छेद को भगवान शिव ने माता पार्वती को समझाया था। क्योंकि सोम को अमृत भी कहा जाता है, अमा का अर्थ है एकत्र करना और वस्या वास को कहा गया है। यानि जिसमें सब एक साथ वास करते हों वह अमावस्या अति पवित्र सोमवती अमावस्या कहलाती है। यह भी माना जाता है की सोमवती अमावस्या में भक्तों को अमृत की प्राप्ति होती है।

निर्णय सिंधु व्यास के वचनानुसार इस दिन मौन रहकर स्नान-ध्यान करने से सहस्र गोदान का पुण्य फल प्राप्त होता है। हिन्दु धर्म शास्त्रों में इसे अश्वत्थ प्रदक्षिणा व्रत की भी संज्ञा दी गयी है। अश्वत्थ यानि पीपल वृक्ष। इस दिन पीपल कि सेवा-पूजा, परिक्रमा का अति विशेष महत्व है।

शास्त्रों के अनुसार में पीपल की छाया से, स्पर्श करने से और प्रदक्षिणा करने से समस्त पापों का नाश, अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति और आयु में वृद्धि होती है।

पीपल के पूजन में दूध, दही, मीठा,फल,फूल, जल,जनेऊ जोड़ा चढ़ाने और दीप दिखाने से भक्तों कि सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कहते हैं कि पीपल के मूल में भगवान विष्णु, तने में भगवान शिव जी तथा अग्रभाग में भगवान ब्रह्मा जी का निवास है। इसलिए सोमवार को यदि अमावस्या हो तो, पीपल के पूजन से अक्षय पुण्य, लाभ तथा सौभाग्य की वृद्धि होती है।

इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चन्दन इत्यादि से पूजा और वृक्ष के चारों ओर 108 बार धागा लपेट कर परिक्रमा करने का विधान होता है, और प्रत्येक परिक्रमा में कोई भी एक मिठाई, फल या मेवा चढ़ाने से विशेष लाभ होता है । प्रदक्षिणा के समय 108 फल अलग रखकर समापन के समय वे सभी वस्तुएं ब्राह्मणों और निर्धनों को दान करें। इस प्रक्रिया को कम से कम तीन सोमवती अमावस्या तक करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है और समस्याओं से मुक्ति मिलती है। इस प्रक्रिया से पितृदोष का भी समाधान होता है।

इस दिन जो स्त्री तुलसी व माता पार्वती पर सिन्दूर चढ़ाकर अपनी माँग में लगाती है, वह अखण्ड सौभाग्यवती बनी रहती है। आज के दिन महिलाएँ कपड़ा, गहना, बरतन, अनाज अथवा कोई भी खाने की वस्तु वस्तुयें दान कर सकती हैं, जिससे उनके जीवन में शुभता आती है, समाज में उनके परिवार का नाम होता है, यश मिलता है ।

जिन जातकों की जन्मपत्रिका में घातक कालसर्प दोष है, वे लोग यदि सोमवती अमवस्या पर चांदी के बने नाग-नागिन की विधिवत पूजा करके उन्हे नदीं में प्रवाहित कर दें, भगवान भोले भण्डारी पर कच्चा दूध चढ़ायें, पीपल पर मीठा जल चढ़ाकर उसकी परिक्रमा करें, धूप दीप जलाएं, ब्राह्मणों को यथाशक्ति दान दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद ग्रहण करें तो, उन्हें निश्चित ही कालसर्प दोष से छुटकारा मिलता है।

सोमवती अमावस्या को अत्यंत पुण्य तिथि माना जाता है। मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन किये गए किसी भी प्रकार के उपाय शीघ्र ही फलीभूत होते हैं। सोमवती अमावस्या के दिन उपाय करने से मनुष्यों को सभी तरह के शुभ फल प्राप्त होते हैं, अगर उनको कोई कष्ट है तो, उसका शीघ्र ही निराकरण होता है, और उस व्यक्ति तथा उसके परिवार पर आने वाले सभी तरह के संकट टल जाते हैं।

इस दिन जो मनुष्य व्यवसाय में परेशानियां से जूझ रहे हों, वे पीपल वृक्ष के नीचे तिल के तेल का दिया जलाकर और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:। मंत्र का जाप करें तो, उनके व्यवसाय में आ रही समस्त रुकावटें दूर हो जायेंगी। सोमवती अमावस्या के पर्व पर अपने पितरों के निमित्त पीपल का वृक्ष लगाने से जातक को सुख-सौभाग्य, संतान, पुत्र, धन की प्राप्ति होती है, और उसके समस्त पारिवारिक क्लेश समाप्त हो जाते हैं।

इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी विशेष महत्व समझा जाता है। कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य निश्चय ही समृद्ध, स्वस्थ और सभी दुखों से मुक्त होगा, ऐसी मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से पितरों कि आत्माओं को शांति मिलती है।

इस दिन पवित्र नदियों, तीर्थों में स्नान, ब्राह्मण भोजन, गौदान, अन्नदान, वस्त्र, स्वर्ण आदि दान का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन गंगा स्नान का भी विशिष्ट महत्त्व है। इस दिन यदि गंगा जी जाना संभव न हो तो प्रात:काल किसी नदी या सरोवर आदि में स्नान करके भगवान शंकर, पार्वती और तुलसी की भक्तिपूर्वक पूजा करें।

सोमवार भगवान शिव जी का दिन माना जाता है और सोमवती अमावस्या तो पूर्णरूपेण शिव जी को समर्पित होती है। इसलिए इस दिन भगवान शिव कि कृपा पाने के लिए शिव जी का अभिषेक करना चाहिए, या प्रभु भोले भंडारी पर बेलपत्र, कच्चा दूध ,मेवे, फल, मीठा, जनेऊ जोड़ा आदि चढ़ाकर ॐ नम: शिवाय का जाप करने से सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है।

मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन सुबह-सुबह नित्यकर्मों से निवृत्त होकर किसी भी शिव मंदिर में जाकर सवा किलो साफ चावल अर्पित करते हुए भगवान शिव का पूजन करें। पूजन के पश्चात यह चावल किसी ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को दान करें। शास्त्रों के अनुसार सोमवती अमवस्या पर शिवलिंग पर चावल चढ़ाकर उसका दान करने से अक्षय पुण्य मिलता है, माँ लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।

शास्त्रों में वर्णित है कि सोमवती अमावस्या के दिन उगते हुए भगवान सूर्य नारायण को गायत्री मंत्र उच्चारण करते हुए अर्घ्य देने से गरीबी और दरिद्रता दूर होगी। यह क्रिया आपको अमोघ फल प्रदान करती है ।

सोमवती अमावस्या के दिन 108 बार तुलसी के पौधे की श्री हरि-श्री हरि अथवा ॐ नमो नारायण का जाप करते हुए परिक्रमा करें, इससे जीवन के सभी आर्थिक संकट निश्चय ही समाप्त हो जाते हैं।

जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, वह यदि गाय को दही और चावल खिलाएं तो उन्हें अवश्य ही मानसिक शांति प्राप्त होगी। इसके अलावा मंत्र जाप, सिद्धि साधना एवं दान कर मौन व्रत को धारण करने से पुण्य प्राप्ति और भगवान का आशीर्वाद मिलता है।

इस दिन स्वास्थ्य, शिक्षा, कानूनी विवाद, आर्थिक परेशानियां और पति-पत्नी सम्बन्धी विवाद के समाधान हेतु किये गये उपाय अवश्य ही सफल होते है ।

इस दिन जो व्यक्ति धोबी, धोबन को भोजन कराता है, सम्मान करता है, दान दक्षिणा देता है, उसके बच्चो को कापी किताबे, फल, मिठाई, खिलौने आदि देता है, उसके सभी मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होते हैं।

इस दिन ब्राह्मण, भांजा और ननद को फल, मिठाई या खाने की सामग्री का दान करना बहुत ही उत्तम फल प्रदान करता है।

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बेलपत्र और भगवान शिव

बेल का वृक्ष और भगवान शिव :-


Dr.R.B.Dhawan

(Top, best Astrologer in Delhi)

बेलपत्र को संस्कृत में ‘बिल्वपत्र’ कहा जाता है, यह औषधी गुणों से भरपूर वृक्ष भगवान शिव को प्रिय है, पौराणिक मान्यता है कि बेलपत्र और जल से भगवान शंकर का अभिषेक करने से और पूजा में इनका प्रयोग करने से शिव जल्द प्रसन्न होते हैं। बेलपत्र का तोड़ने के लिए पुराणों में ऐसे निर्देश दिए गए हैं, जिससे धर्म का पालन भी हो जाये और वृक्षों का संरक्षण भी हो जाए, यही कारण है कि देवी-देवताओं को अर्पित किए जाने वाले फूल और पत्रों को तोड़ने के कुछ नियम हैं, बेलपत्र तोड़ने के भी कुछ नियम हैं :-

1. चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथ‍ियों को, सं‍क्रांति के समय और सोमवार को बेलपत्र न तोड़ें।

2. भगवान शंकर को बेलपत्र चढ़ाने के लिए इन तिथ‍ियों या वार से पहले तोड़ा गया पत्र ही चढ़ाना चाहिए।

3. शास्त्रों में कहा गया है कि अगर नया बेलपत्र न मिल सके, तो किसी दूसरे के चढ़ाए हुए बेलपत्र को भी धोकर कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है।

अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:।
शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि क्वचित्।।
(स्कंदपुराण)

4. टहनी से चुन-चुनकर सिर्फ बेलपत्र ही तोड़ना चाहिए, कभी भी पूरी टहनी नहीं तोड़नी चाहिए। पत्र सावधानी से तोड़ना चाहिए कि वृक्ष को कोई हानि न पहुंचे।

5. बेलपत्र तोड़ने से पहले और बाद में वृक्ष को मन ही मन प्रणाम करना चाहिए।

कैसे चढ़ाएं बेलपत्र :- भगवान शिव को बेल पत्र प्रिय हैं ही। साथ ही भगवान शिव के अंशावतार हनुमान जी को भी बेलपत्र अर्पित किया जा सकता है, भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाने से घर की धन-दौलत में वृद्धि होने लगती है, अधूरी कामनाएं पूर्ण होती हैं।

शिव पुराण के अनुसार सावन के सोमवार को शिवालय में बेलपत्र चढ़ाने से एक करोड़ कन्यादान के बराबर फल मिलता है।
बेलपत्र का वृक्ष हर कामना को पूरी करता है। यही नहीं उसके पत्तों को गंगा जल से धोकर उन्हें बजरंगबली पर अर्पित करने से अनेक तीर्थों का फल मिलता है।

बिल्व वृक्ष (बेल के पेड़) की जड़ सफेद धागे में पिरोकर रविवार को गले में धारण करने से रक्तचाप, क्रोध और असाध्य रोगों से रक्षा होती है।
बिल्व वृक्ष का पूजन पाप व दरिद्रता का अंत कर वैभवशाली बनाने वाला माना गया है। घर में बेल पत्र लगाने से देवी महालक्ष्मी बहुत प्रसन्न होती हैं।

बेल पत्तों को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। इन्हें अपने पास रखने से कभी धन-दौलत का अभाव नहीं होता।

शिव पुराण के अनुसार :- 1. बिल्व वृक्ष के आसपास सर्प नहीं आते ।

2. यदि किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर
गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है ।

3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता
सबसे अधिक बिल्व वृक्ष में होती है ।

4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला
परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल
मिलता है ।

5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल
वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।

6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता
है।

7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।

8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट
लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि
स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे ।

10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी
शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त
हो जाते है ।

11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव
से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को
चढ़ाने से क्या फल मिलता है :-

1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।

3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।यह सभी अन्न भगवान
को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए।

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन सा रस
(द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है :-

1. ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से
शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी
जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2. नपुंसक व्यक्ति अगर शुद्ध घी से भगवान शिव का अभिषेक
करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो
उसकी समस्या का निदान संभव है।

3. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को
चढ़ाएं।

4. सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में
वृद्धि होती है।

5. शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों
की प्राप्ति होती है।

6. शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति
होती है।

7. मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा
(टीबी) रोग में आराम मिलता है।

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन का फूल
चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है :-

1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने
पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।

3. अलसी के फूल से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान
विष्णु को प्रिय होता है।

4. शमी पत्र (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती
है।

6. जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की
कमी नहीं होती।

7. कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वदस्त्र मिलते हैं।

8. हारसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि
होती है।

9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र
प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशनकरता है।

10. लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है।

11. दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

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