ज्योतिष या अंधविश्वास ?

ज्योतिष अंधविश्वास नहीं, विज्ञान है :-

Dr.R.B.Dhawan

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अनेक लोग कुण्डली दिखाते समय प्रश्न करते हैं कि क्या मेरी किस्मत ही खराब है, कब और कैसे अच्छे दिन आयेंगे? अर्थात अच्छे के लिये अच्छी किस्मत या भाग्य का योगदान जरूरी है। दूसरी तरफ बहुत से लोग हैं, जो किस्मत जैसी किसी चीज को स्वीकार ही नहीं करते। और उनका कहना है कि जो कुछ मिलता है, कर्म करने से ही मिलता है। वास्तव में देखा जाए तो दोनों ही बातें सही हैं। एक तरफ कर्म का चक्र चल रहा है, और दूसरी ओर जीवन चक्र। कर्म चक्र वो चक्र है जिसमें मनुष्य कर्म करता है और कर्म का कुछ फल मिल जाता है, और शेष कर्मफल भविष्य काल के लिए संचित हो जाता है, क्योंकि उस समय कर्मफल के लिए उचित समय या वातावरण उपलब्ध नहीं होता। इस लिए भविष्य में जब भी उस कर्मफल को उचित वातावरण मिलता है, उसी समय वह कर्मफल अंकुरित होकर पोधा और फिर वृक्ष बनकर अपना फल देेेने लगता है।

भाग्य या किस्मत क्या है? :- भाग्य का अर्थ यह है, बिना परिश्रम किये सुख के साधन मिलना। भाग्य या किस्मत संचित कर्म से बनता है, कर्म के बाद हर कर्म का फल न भोग पाना इसका कारण है, जीवन चक्र सीमित वर्ष का होता है। मित्रो हम जो भी कर्म करते हैं, प्रकृति उस कर्म की प्रतिक्रिया करती है, इसी को कर्मफल कहते हैं। “क्रिया की प्रतिक्रिया” या कर्म और कर्म का फल एक ही बात है।

इस प्रकार मनुष्य अपने जीवनकाल में कुछ कर्मों का फल इस जीवन तथा शेष कर्मों का फल पुनर्जन्म प्राप्त होने पर ही भोग पाता है।

एक तरफ मनुष्य कर्म करता है, दूसरी ओर भाग्य (कर्मफल) भोगता है। अर्थात् कर्म भी करता चला जाता है, दूसरी और भाग्य का भोग भी भोगता रहता है। इस लिये मनुष्य यदि भाग्य को जानकर कर्म करे तभी हर प्रकार से सफल जीवन व्यतीत कर सकता है।

मेरा अपना विचार है कि चांद तारों से हम और चांद तारे हमसे प्रभावित होते हैं, क्योंकि प्रभाव कभी एक तरफा नहीं होता। सूर्य पर दाग दिखाई पड़ते हैं और तूफान उठते हैं, या धरती पर बीमारियाँ फैलती हैं। विश्वास करो एक छोटा सा तिनका भी सूर्य को या किसी भी ग्रह को प्रभावित करता है और सूर्य भी तिनके को प्रभावित करता है। यहाँ छोटा-बडा कोई नहीं, एक आॅरगनिक यूनिटी है। आप देखें परमाणु है, परमाणु से भी सूक्ष्म कुछ है, उसका एक प्रभाव है। सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा है, अजुड़ा कुछ भी नहीं। हम हर समय एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं, सड़क पर पड़ा हुआ पत्थर भी। हर अणु-परमाणु का एक-दूसरे से पक्का रिश्ता है। इस संयुक्त सृष्टि का बोध यदि हो जाये तभी ज्योतिष और इसका महत्व समझ आ सकता है।

ज्योतिष:- (ज्योति+ईश= ज्योतिष) विज्ञान से बढ़कर पराविज्ञान है, कैसै? आईये मैं बताता हूँ – सभी जानते हैं की ज्योतिष ग्रह-नक्षत्रों की विद्या है। ईसके तीन स्तम्भ (भाग) हैं, प्रथम भाग सिद्धांत जिसे ज्योतिषीय गणना कहा जा सकता है। दूसरा भाग संहिता जिस के सिद्धांत समझकर विद्वान पृथ्वी पर घटने वाली किसी भी भौगोलिक तथा राष्ट्रीय (किसी भी देश या विश्व में घटने वाली राजनैतिक) भविष्यवाणीयां कर सकता है। तीसरा और महत्वपूर्ण भाग “होरा” है, जिसका विशेषज्ञ विद्वान जातक के जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति (जन्मकुण्डली) को देखकर भविष्यवाणी (फलादेश) करता है। जन्मकुण्डली का फलादेश करने वाला विद्वान किसी भी व्यक्ति की कुण्डली देखकर उसके भूत-भविष्य और वर्तमान तीनो काल में घटित तथा घटने वाली घटनाओं का विवरण बता सकता है। केवल इतना ही नहीं इस के गहन अध्ययन व अभ्यास से पूर्व जन्म, वर्तमान तथा पुनर्जन्म के विषय में भी संकेत मिलते हैं।

क्या आज विज्ञान के युग में अभी तक भी ज्योतिष के अतिरिक्त कोई पद्धति है, जो भूत-भविष्य तथा वर्तमान तीन काल की जानकारी देती हो ? आधुनिक विज्ञान केवल भौतिक जगत के बारे में जानकारी दे सकता है। सूक्ष्म जगत में तो इसने अभी प्रवेश ही नहीं किया। जबकी वेदों की इस विद्या (ज्योतिष) के रचनाकार हमारे पूर्वज ऋषियों ने सूक्ष्म जगत में न केवल प्रवेश किया बल्कि सूक्ष्म जगत के करोड़ो रहस्यों को जाना समझा और उनके सिद्धांतों सहित हजारों रहस्यों को ग्रन्थों में लिखकर आगे की पीढियों को लाभान्वित किया है। आत्मा से परमात्मा का सम्बंध, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और विनाश के रहस्य, हर ग्रह-नक्षत्र का मनुष्य या धरती पर पढने वाला प्रभाव, खगोलिक घटनाओं तथा ग्रहणादि के सिद्धांत वेदों के रूप में हमें सौंप गये। वेद की 6 विद्याओं में एक महत्वपूर्ण विद्या ज्योतिष है, यह विद्या भौतिक और सूक्षम (लौकिक-पारलौकिक) दोनों के रहस्य अपने भीतर समेटे हुये है। इसी लिये यह विद्या विज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण (अलौकिक) है।

जैसी इंसान की सोच होती है, उसी तरह उसका नजरिया (दृष्टि) हो जाती है। जैसे- काम भाव दृष्टि, प्रेम दृष्टि, क्रोध की दृष्टि, लोभ दृष्टि, मोह दृष्टि, ईर्ष्या दृष्टि, विद्वेष दृष्टि प्रमाद तथा अहंकार दृष्टि। (उसकी आंखें दूसरे को वैसे ही भाव से देखती हैं, जैसा उस का नजरिया होता है) किसी के नेत्र हमें किस भाव से देख रहे हैं ? यह आसानी से पहचाना जा सकता है। जिन्हें पहचान नहीं होती वे यदि इस के लिये थोड़ा ध्यान (एकाग्रता) या अभ्यास करें तो जरूर पहचान होने लगेगी। यह तो हुई आंखो की भाषा। इस प्रकार मनुष्य किसी के नेत्रों की भाषा को समझ कर (जो उसने समझा) उसके अनुसार वह भी प्रतिक्रिया करता है। यह हुई क्रिया की प्रतिक्रिया। अर्थात् – सोच भी एक कर्म है, और प्रतिक्रिया उस कर्म का फल है। अब प्रश्न यह है, कि इंसान की सोच कैसे बनती है? उसे कौन बनाता है? 1. हालात?, 2. ईश्वर या प्रकृति?, या 3. वह स्वयं? इस पर फिर किसी समय चर्चा करूँगा। सिद्धांत तथा सत्य के अनुसार भूत-प्रेत योनि का अस्तित्व भी है, और वह सक्रिय भी होते हैं। परंतु इतना अवश्य है कि भूत-प्रेतों के नाम से जितनी बातें कही जाती हैं, उनमें सभी बातें सचमुच भूत-प्रेतों की नहीं होती। कुछ काल्पनिक भी होती हैं, और कुछ मनोविकार से ग्रस्त रोगीयों के रोग के कारण होती हैं, कुछ मानसिक दुर्बलताओं के कारण भी होती हैं। कुछ तो ढोंग तथा कुछ भोले-भाले लोगों को ठगने के उद्देेश्य से दिखावा अथवा जादूगरी के खेल के रूप में होती हैं। वस्तुत: चित्त पर पड़ने वाले संस्कार अपने अनुरूप कार्य करने के लिये ललचाते हैं। और ललचा जाने वाला मनुष्य पराधीन बन जाता है।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणेः कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

भावार्थ- वास्तव में हमारे सब प्रकार के कर्म प्राकृतिक गुणों द्वारा किये जाते हैं, परंतु अहंकार से मूढ़ बना मनुष्य मानता है कि मैं ही करता हूँ।

कर्म का सिद्धांत :- सभी जानते हैं- मनुष्य जन्म के बाद (जब से उसे समझ अाती है) से मृत्यु तक “कर्म” करता रहता है। इन्हीं कर्मों को “क्रियमाण कर्म” कहते हैं। अर्थात् मनुष्य के जीवनकाल में जो-जो कर्म किये जाते हैं, वे सभी क्रियमाण कर्म ही कहलाते हैं। यह हुये प्रथम प्रकार के कर्म। द्वितीय प्रकार के कर्म “संचित कर्म” कहलाते हैं, क्रियमाण कर्म जो रोज हुआ करते हैं, में से ही कुछ कर्मों का फल तो भोग लिया जाता है, और शेष प्रतिदिन मन में इकट्ठा होते रहते हैं, इस प्रकार मन रूपी गोदाम में एकत्र हुये कर्मों को संचित कर्म कहा जाता है। जैसे हम प्रतिदिन एक-एक रूपया गोलक में डालते जायें और सालभर के बाद गोलक खोलें तो उसमें जो रूपया निकलेगा वह सब एक वर्ष का संचित धन कहलायेगा। कर्म का एक तीसरा प्रकार “प्रारब्ध कर्म” है, मनुष्य के मन (मस्तिष्क का एक भाग) में अनेक जन्मों के संचित ढेर-के-ढेर कर्म पड़े रहते हैं। मन में जन्म-जन्मांतरों के कर्मों का इतना बड़ा खजाना जमा है कि सृष्टि के अंत तक भी समाप्त नहीं होता। इन्में मनुष्य के जीवनांत में जो कर्म भावी जन्म के लिये परिपक्व हो जाते हैं, उन्हीं कर्मों का फल भोगने के लिये जीव को उसी अनुरूप एक नया जन्म मिलता है। इस प्रकार कालभेद से मनुष्य द्वारा किये जाने वाले कर्म के तीन भेद हुये। 1. क्रियमाण कर्म, 2. संचित कर्म, और 3. प्रारब्ध कर्म। सभी कर्मफल जब तक भोग नहीं लिये जाते तब तक वे नष्ट नहीं होते। वैदिक दर्शनों के अनुसार आत्मा कभी नष्ट नहीं होती, अर्थात्‌- आत्मा अमर है। मनुष्य के शरीर में रहते हुये कर्मबंधन के प्रभाव वश यह परतंत्र, दुःखी, जन्म-मृत्यु एवं जरा (वृद्धावस्था) से युक्त प्रतीत होती है। निष्क्रिय होकर भी आत्मा सक्रिय, स्वतंत्र होते हुये भी परतंत्र, वशी होते हुये भी दुःखदायक भावों से आक्रांत, विभु या सर्वगत होते हुये भी सीमित, तथा निर्विकार होते हुये भी सुख-दुःख आदि विकारों का अनुभव करने लगती है। नित्य शुद्ध और बुद्ध आत्मा को इस स्थिति में लाकर खड़ा करने वाला कारण एकमात्र “कर्मानुबंध” है।किसी कार्य को करने के बाद अनिवार्य रूप से प्राप्त होने वाला परिणाम ही “कर्मानुबंध” है। वस्तुतः आत्मा की स्वतंत्रता या वशित्व केवल कार्य (कर्म) करने में है, परंतु कर्म करने के बाद उसके अपरिहार्य फल से वह अनुबंधित हो जाती है। इसका अर्थ है- कर्म करने या न करने के लिये आत्मा स्वतंत्र है, परंतु कर्म करने के बाद उसका फल भोगने के लिये स्वतंत्र नहीं है।

एक सच्ची बात कहता हूँ, बात तब की है, जब मेरी उम्र 20 से 30 के बीच रही होगी। उस काल में मैं ज्योतिष या ज्योतिष जैसी विद्याओं को नफरत की निगाह से देखा करता था। एेसा होना स्वाभाविक भी था, क्योंकि हर प्रकार से मेरा अच्छा दौर चल रहा था। हर तरफ इज्जत सम्मान भी था, आमदनी अच्छी थी इस लिये आत्मविश्वास की कमी नहीं थी, ईश्वर में आस्था बिलकुल भी नहीं थी, अपने हाथ-पैरों या स्वास्थ शरीर को महत्व देेता था, अपनेे मस्तिष्क तथा तर्कशक्ति से अधिक किसी को महत्व नहीं देता था। फिर कुछ एेसा होने लगा की बिना किसी विशेष कारण के कारोबार व आमदनी तेजी से कम होने लगी, क्योंकि खर्चे बढ चुके थे, उनपर लगाम लगाम ना लग पा रही थी, टेंशने बढती ही चली गई। अपने दूर होने लग गये, तो अपना मनोबल भी डगमगाने लगा, शरीर थका-थका सा रहता, तब मन में आता कोई अनजाना कारण जरूर है, जो दिखाई भी नहीं देता और सुझाई भी नहीं देता। बस सच पूछिए तो उसी दिन से मैं बनने लगा था “ज्योतिषी” और पहुंच गया एक पंडितजी के पास, उन्होंने मेरी कुण्डली बनाई और बताया तुम्हारी तो शनि की साढ़ेसाती चल रही है। मित्रो मैने जब पूछा कि क्या होती है साढ़ेसाती? और क्या होता है इसमें? पंडितजी बोले बस परेशानियाँ रहेंगी। हर क्यों का उत्तर नहीं मिला तो खरीद लाया ज्योतिष की पुस्तकें और लगा दिन-रात पढ़ने। 6-7 वर्ष अध्ययन करते-करते समझ में आने लगा कि क्यों होता है कष्ट, साढ़ेसाती में क्या बात है खास ? और सन 2000 में जब संस्कृत विश्वविद्यालय से मैने ज्योतिष की डिग्री प्राप्त कर स्वयं ज्योतिषी बन बैठा, और आज हजारों कुण्डलियां मेरी निगाहों से गुजर चुकी हैं, तब कभी-कभी मैं उस 20 से 30 की उम्र में अपने विचारों को याद करता हूँ, और महसूस करता हूँ कि यह सब नियति के खेल हैं। कुच्छ तो जन्मों-जन्मों के कर्म हैं, और कुच्छ पूर्व जन्मों की अधूरी इच्छायें या कहिये की अधूरी विद्यायें हैं, जो पीछा करती हैं।

यह आज के विज्ञान के साथ एक दुराग्रह है कि, इसने न केवल प्रत्यक्षवाद को सब कुछ माना है, साथ ही साथ उसी आधार पर हर विषय का प्रतिपादन भी आरम्भ कर दिया है। इस में कमी यह है कि, इस आधार पर हर अनैतिकता को निर्दोष ठहराया जा रहा है। धर्म और आध्यात्म के सिद्धांतों की अवहेलना चल पड़ी है, चरित्रहीनता तो साधारण बात या प्रगतिशीलता की पहचान बनने लगी है, इसका परिणाम क्या होगा? दूसरी ओर भोजन के लिये पशु हत्या! डर है, बात कभी यहाँ तक न पहुंच जाये कि बूढ़ी गाय या बूढ़े बैल की तरह बूढ़े माँ बाप को भी किसी कसाई खाने में पहुंचाने में लाभ न दिखाई देने लगे। आजकल अजन्मे बच्चों का माँस डिब्बाबंद भोजन के रूप में बिकने की खबर सुनकर रूह काँप उठती है। पशुमाँस का सेवन करते-करते मनुष्य में भी पशु स्वभाव का समावेश हो चला है। कभी मनुष्यों को भी एक पशु की तरह मान लिया गया या उस पर भी पशु जैसे अनुबंधों को लागू किया जाने लगा तब क्या होगा?

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सरस्वती मंत्र

सरस्वती मंत्र से विद्या प्राप्ति :-

Dr.R.B.Dhawan

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आप भी महान व्यक्तित्व के स्वामी बन सकते हैं, यदि पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी के इन सिद्धांतों को अपनी जीवनशैली में उतार लें-

1. ईश्वर को सर्वव्यापी व न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को स्वीकार करें।
2. अपने शरीर को परमात्मा का मंदिर मानकर (क्योंकि परमात्मा के अंश “आत्मा” का आपके शरीर में भी निवास है।) आत्मसंयम, और नियमितता द्वारा अपने शरीर की रोगों और बुराईयों से रक्षा करें।
3. मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाये रखने के लिये संस्कारी लोगों की संगति करें।
4. इन्द्रियों पर नियंत्रण, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सदा अभ्यास करें।
5. मर्यादाओं का पालन करें, वर्जनाओं से बचें तथा समाजनिष्ठ बनें।
6. अनिति से प्राप्त उपलब्धियों और सफलताओं की उपेक्षा करें।
7. रूढ़िवादी परम्परा की तुलना में विवेक से फैसले लें।
8. मनुष्य का मूल्यांकन उसकी सफलताओं और योग्यताओं से न करके, उसके सद्द्विचारों और सत्कर्मों को महत्व दें।
9. “मनुष्य अपने अच्छे-बुरे कर्मो के द्वारा अपने भाग्य का निर्माण स्वयं ही करता है” इस विश्वास पर चलते हुये आजीवन सद्कर्म करते चलें।

जहां बहुत से विद्यार्थिंयों कि स्मरण शक्ति अच्छी होती है, वहीं कुछ विद्यार्थी कमजोर स्मरण शक्ति वाले भी होते हैं। बच्चे को एवं उसके माता-पिता को कभी कभी ऐसा लगता है, कि बच्चे का मन पढाई में नहीं लगता, या बच्चे जितनी मेहनत करते हैं, उन्हें उसके अनुरुप फल नहीं मिलता, परीक्षा के प्रश्न पत्र में लिखते समय उसे भय रहता है, बच्चे ने जो पढाई कि है, वह परिक्षा पत्र में लिखते समय भूल जाता हैं, इत्यादी.., कारणो से बच्चे और माता-पिता हमेशा परेशान रहते हैं।

कुछ बच्चे होते हैं, जो एक या दो बार पढने पर याद कर लेते हैं, तो कुछ बच्चे वही पाठ्य सामग्री अधिक समय पढने के उपरांत भी ठीक से याद नहीं कर पाते। ऐसा क्यूं होता है? इस का मुख्य कारण है, अनुचित ढंग से कि गई पढाई या पढाई में एकाग्रता की कमी। विद्या अध्ययन में आने वाली रुकावटों एवं विघ्न बाधाओं को दूर करने हेतु ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशिष्ठ मंत्रो का उल्लेख मिलता है। जिसके जप से पढाई में आने वाली रुकावटे दूर हो सकती हैं, एवं कमजोर यादाश्त की समस्या का निराकरण होता है। इस समस्या के लिए सबसे अच्छा उपाय है : माता सरस्वती की उपासना। आगे की पंक्तियों में माता सरस्वती मंत्र और उनके कुछ प्रयोग जिसे जा रहे हैं, इनका प्रयोग करने से माता सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है :-

सरस्वती मंत्र: –

या कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्र वृस्तावता ।

या वीणा वर दण्ड मंडित करा या श्वेत पद्मसना ।।

या ब्रह्माच्युत्त शंकर: प्रभृतिर्भि देवै सदा वन्दिता ।

सा माम पातु सरस्वती भगवती नि:शेष जाड्या पहा ॥१॥

भावार्थ: जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह श्वेत वर्ण की हैं, और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर अपना आसन ग्रहण किया है, तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हैं, आप हमारी रक्षा करें।

सरस्वती मंत्र तन्त्रोक्तं देवी सूक्त से : –

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेणसंस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

विद्या प्राप्ति के लिये सरस्वती मंत्र:-

घंटाशूलहलानि शंखमुसले चक्रं धनुः सायकं हस्ताब्जैर्दघतीं धनान्तविलसच्छीतांशु तुल्यप्रभाम्‌।

गौरीदेहसमुद्भवा त्रिनयनामांधारभूतां महापूर्वामत्र सरस्वती मनुमजे शुम्भादि दैत्यार्दिनीम्‌॥

भावार्थ: जो अपने हस्त कमल में घंटा, त्रिशूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण को धारण करने वाली, गोरी देह से उत्पन्ना, त्रिनेत्रा, मेघास्थित चंद्रमा के समान कांति वाली, संसार की आधारभूता, शुंभादि दैत्य का नाश करने वाली महासरस्वती को हम नमस्कार करते हैं। माँ सरस्वती जो प्रधानतः जगत की उत्पत्ति और ज्ञान का संचार करती हैं।

अत्यंत सरल सरस्वती मंत्र प्रयोग:-

प्रतिदिन सुबह स्नान इत्यादि से निवृत होने के बाद मंत्र जप आरंभ करें। अपने सामने मां सरस्वती का यंत्र या चित्र स्थापित करें । अब चित्र या यंत्र के ऊपर श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प व अक्षत (चावल) भेंट करें, और धूप-दीप जलाकर देवी की पूजा करें, और अपनी मनोकामना का मन में स्मरण करके स्फटिक की माला से किसी भी सरस्वती मंत्र की शांत मन से एक माला फेरें।

1. सरस्वती मूल मंत्र:-

ॐ ऎं सरस्वत्यै ऎं नमः।

2. सरस्वती मंत्र:-

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वती देव्यै नमः।

3. सरस्वती गायत्री मंत्र:-

१ – ॐ सरस्वत्यै विधमहे, ब्रह्मपुत्रयै धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयात।

२ – ॐ वाग देव्यै विद्दमहे काम राज्या धीमहि । तन्नो सरस्वती: प्रचोदयात।

4. ज्ञान वृद्धि हेतु गायत्री मंत्र :-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

5. परीक्षा भय निवारण हेतु:-

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वीणा पुस्तक धारिणीम् मम् भय निवारय निवारय अभयम् देहि देहि स्वाहा।

6. स्मरण शक्ति नियंत्रण हेतु:-

ॐ ऐं स्मृत्यै नमः।

7. विघ्न बाधा निवारण हेतु:-

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अंतरिक्ष सरस्वती परम रक्षिणी मम सर्व विघ्न बाधा निवारय निवारय स्वाहा।

8. स्मरण शक्ति बढा के लिए :-

ऐं नमः भगवति वद वद वाग्देवि स्वाहा।

9. परीक्षा में सफलता के लिए :-

१ – ॐ नमः श्रीं श्रीं अहं वद वद वाग्वादिनी भगवती सरस्वत्यै नमः स्वाहा विद्यां देहि मम ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा।

२ -जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी, कवि उर अजिर नचावहिं बानी।

मोरि सुधारिहिं सो सब भांती, जासु कृपा नहिं कृपा अघाती॥

10. हंसारुढा मां सरस्वती का ध्यान कर मानस-पूजा-पूर्वक निम्न मन्त्र का 21 बार जप करें :-

ॐ ऐं क्लीं सौः ह्रीं श्रीं ध्रीं वद वद वाग्-वादिनि सौः क्लीं ऐं श्रीसरस्वत्यै नमः।

11. विद्या प्राप्ति एवं मातृभाव हेतु:-

विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा: स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।

त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्तिः॥

अर्थातः- देवि! विश्वकि सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं। जगदम्बे! एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थो से परे हो।

उपरोक्त मंत्र का जप हरें, सफेद हकीक या स्फटिक माला से प्रतिदिन सुबह १०८ बार करें, तदुपरांत एक माला जप निम्न मंत्र का भी करें।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं महा सरस्वत्यै नमः।

12. देवी सरस्वती के अन्य प्रभावशाली मंत्र :-

एकाक्षर मंत्र :-

“ऐ”

द्वियक्षर मंत्र :-

१ “आं लृं”,।

२ “ऐं लृं”।

त्र्यक्षर मंत्र :-

“ऐं रुं स्वों”।

चतुर्क्षर मंत्र :-

“ॐ ऎं नमः”।

नवाक्षर मंत्र :-

“ॐ ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः”।

दशाक्षर मंत्र :-

१ – “वद वद वाग्वादिन्यै स्वाहा”।

२ – “ह्रीं ॐ ह्सौः ॐ सरस्वत्यै नमः”।

एकादशाक्षर मंत्र :-

१ – “ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

२ – “ऐं वाचस्पते अमृते प्लुवः प्लुः”।

३ – “ऐं वाचस्पतेऽमृते प्लवः प्लवः”।

एकादशाक्षर-चिन्तामणि-सरस्वती मंत्र :-

“ॐ ह्रीं ह्स्त्रैं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

एकादशाक्षर-पारिजात-सरस्वतीः-

१ – “ॐ ह्रीं ह्सौं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

२ – “ॐ ऐं ह्स्त्रैं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

द्वादशाक्षर मंत्र :-

“ह्रीं वद वद वाग्-वादिनि स्वाहा ह्रीं”।

अन्तरिक्ष-सरस्वती मंत्र :-

“ऐं ह्रीं अन्तरिक्ष-सरस्वती स्वाहा”।

षोडशाक्षर मंत्र :-

“ऐं नमः भगवति वद वद वाग्देवि स्वाहा”।

अन्य मंत्र :-

• ॐ नमः पद्मासने शब्द रुपे ऎं ह्रीं क्लीं वद वद वाग्दादिनि स्वाहा।

• “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा”।

• “ऐंह्रींश्रींक्लींसौं क्लींह्रींऐंब्लूंस्त्रीं नील-तारे सरस्वति द्रांह्रींक्लींब्लूंसःऐं ह्रींश्रींक्लीं सौं: सौं: ह्रीं स्वाहा”।

• “ॐ ह्रीं श्रीं ऐं वाग्वादिनि भगवती अर्हन्मुख-निवासिनि सरस्वति ममास्ये प्रकाशं कुरु कुरु स्वाहा ऐं नमः”।

• ॐ पंचनद्यः सरस्वतीमयपिबंति सस्त्रोतः सरस्वती तु पंचद्या सो देशे भवत्सरित्।

उपरोक्त आवश्यक मंत्र का प्रतिदिन जाप करने से विद्या की प्राप्ति होती है। स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ कपडे पहन कर मंत्र का जप प्रतिदिन एक माला करें। ब्राह्म मुहूर्त मे किये गए मंत्र का जप अधिक फलदायी होता हैं। इस्से अतिरीक्त अपनी सुविधा के अनुसार खाली बैठे हैं तो मंत्र का जप कर सकते हैं। मंत्र जप उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके करें। जप करते समय शरीर का सीधा संपर्क जमीन से न हो इस लिए ऊन के आसन पर बैठकर जप करें। जमीन के संपर्क में रहकर जप करने से जप प्रभाव हीन होते हैं।

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कुंडली का नवम स्थान

Dr.R.B.Dhawan

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सदा से ही मनुष्य की यह जानने की इच्छा रही है कि उसका भाग्य कब व कैसे उदय होगा? भविष्य कैसा होगा? वर्तमान की स्थिति क्या है? जीवन में सफलता व असफलता कब-कब व किस-किस मात्रा में प्राप्त होगी? गृहस्थ जीवन, आर्थिक स्थिति, नौकरी या व्यापार, लॉटरी आदि ऐसे भी प्रश्न हैं जिनका हल मनुष्य चाहता है, और इसके लिये वह यहाँ-वहाँ भटकता है। परन्तु इन सभी समस्याओं का हल यदि है तो वह केवल ज्योतिषी के पास।
ज्योतिषी के पास जाकर मनुष्य दो बातें जानने को विशेष ही उत्सुक रहता है- एक अर्थ व दूसरा भाग्य। मैं यहाँ इन्हीं दो भावों पर अर्थात् नवम एवं द्वितीय भाव पर ही इस लेख को केन्द्रित रखना चाहूँगा।
द्वितीय भाव से वह द्रव्य जो पैत्रिक संपत्ति के रूप में प्राप्त होता है, का ज्ञान प्राप्त हो सके अतिरिक्त इस भाव से कुटुम्ब, स्नेही, भाषण कला, सुखभोग, मृत्यु के कारण, प्रारम्भिक शिक्षा आदि का ज्ञान भी प्राप्त किया जाता है। हर उस विद्वान को जो ज्योतिष विषय में रुचि रखता हो, सर्वप्रथम निम्न बातों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिये –

  1. दूसरे भाव की राशि।
  2. द्वितीय स्वामी व उसकी स्थिति।
  3. दूसरे भाव में स्थित ग्रह।
  4. द्वितीय या द्वितीयेश पर दृष्टि।
  5. कारक, अकारक एवं तटस्थ ग्रह।
  6. विशेष योग।
  7. मैत्री व शत्रुता।

यदि इस स्थान में मेष राशि है तो वह व्यक्ति आर्थिक मामलों में अनिश्चित रहता है। धन जिस प्रकार आता है उसी प्रकार खर्च भी हो जाता है। भाग्योदय विवाह के उपरांत होता है, परन्तु स्त्री से अनबन सदैव रहती है। इनकी प्रवृत्ति प्रदर्शनमय रहती है।
द्वितीय स्थान में वृषभ राशि होने पर अर्थ संचय होता है, पर टिकता नहीं। जीवन में कठिनाइयाँ कभी साथ नहीं छोड़तीं। जीवन में 18, 22, 24, 33, तथा 35वाँ वर्ष सफल कहा जा सकता है।
मिथुन राशि आर्थिक स्थिति को कमजोर बनाती है। जातक की भावुकता अर्थ लाभ में बाधक बनी रहती है। ये जातक व्यापार में सफल रहते हैं तथा छोटे लघु उद्योग, शिक्षा आदि के क्षेत्रों में ही सफलता प्राप्त करते हैं।
कर्क राशि कजूंसी की सूचक है। परिश्रम के अनुपात में जातक को लाभ नहीं मिलता। 20, 26, 27, 33, 34, 36, 45, 53, एवं 54वाँ वर्ष महत्वपूर्ण रहता है।
सिंह राशि द्वितीय भाव में होने पर बाल्यकाल आनन्दमय निकलता है। मध्यआयु में ये धन उड़ा देते हैं या व्यापार आदि में हानि होती है तथा भाग्य हमेशा इन्हें साथ देता है।
कन्या राशि होने पर जातक सम्पन्न नहीं होता। प्रारंभिक काल अर्थ संकट में गुजारते हुये परिश्रम से अर्थोपार्जन करते हैं। गर्म मिजाज व शीघ्र निर्णय हानि करवाता है। इन्हें व्यापार विशेष कर श्रृंगारिक वस्तुओं से लाभ होता है।
तुला राशि होने पर जातक शानो-शौकत में धन अधिक खर्च करता है, व्यापार इन्हें लाभ देता है। ये च्संद बना सकते हैं, पर निभा नहीं सकते। धन अनुचित कार्यों में व्यय होता है पर भाग्य फिर भी साथ देता है।
इस भाव में वृश्चिक राशि हो तो जातक के जीवन को डावांडोल कर देती है। नौकरी इन्हें हितकर नहीं होती। प्रवृत्ति वाणिज्य प्रधान होती है। कुटुम्ब व स्नेही ही इन्हें हानि देते हैं।
धनु राशि दूसरे घर में हो तो जातक लापरवाह होता है। साझेदारी इन्हें हानिकारक होती है। सहयोगी सदैव धोखा देते हैं। जीवन में कई उजार-चढ़ाव आते हैं। 24, 27, 28, 32, से 34, 37, 42, 48, 52, 54 तथा 58वाँ वर्ष उत्तम रहता है।
मकर राशि द्वितीय भाव में होने पर जातक सौभाग्यशाली होते हैं। ये हर योजना में सफल रहते हैं, इन्हें चाहिये कि ये स्वतन्त्र व्यापार करें।
कुंभ राशि होने पर भी जातक सम्पन्न होता है। इनकी आय के स्त्रोत कई होते हैं। पत्रकारिता, लेखन, प्रकाशन, व्यापार, राजनीति के कार्यों में लाभ प्राप्त करते हैं। अधिक विश्वासी इन्हें धोखा देता है, उत्तरार्ध जीवन को बनाता है।
मीन राशि दूसरे भाव में होने पर 22, 24, 28, 32, 33, 34, 37, 42, 48, 52, 54 एवं 55 वाँ वर्ष महत्वपूर्ण होता है। इन्हें अपने मनोभावों व विचारों पर नियंत्रण नहीं होता। ये जातक डॉक्टरी, वैद्यक दवाइयों के विक्रेता बनकर धन प्राप्त कर सकते हैं। यह धन संग्रह करने में सिद्ध हस्त होते हैं।

अब आगे की पक्तियों में द्वितीय भावस्थ ग्रहों का फल स्पष्ट करने का प्रयास करूंगा-
द्वितीय भाव में सूर्य – घन के संबंध में चिन्तित, पितृअर्जित धन नहीं मिलता, उत्तरार्ध-पूर्वाद्ध से सफल होता है। मध्यकाल में रोग, व्यापारिक कार्यों में सफल होते हैं।
द्वितीय भाव में चंद्र – सुखी, सम्पन्न, वृहद परिवार, स्त्रीपक्ष से सौभाग्यशाली, स्त्रीपक्ष के सम्पर्क से धनोपार्जन। चंद्रमा व्यक्ति को पत्रकार या लेखक बनाता है। पुस्तक व्यवसाय, प्रकाशन या लेखन से भाग्योदय होता है।
द्वितीय भाव में मंगल – दूसरे भाव में मंगल कमजोर आर्थिक स्थिति, धन गतिमान, कमजोर विद्या क्षेत्र, वार्तालाप मे पटु बनाता है। ऐसे जातक सेल्समेन बन सकते हैं।
द्वितीय भाव में बुध – कट्टर धर्म प्रिय, अर्थ संचय में प्रवीण, भाषण कला में दक्ष।
द्वितीय भाव में गुरू – दूसरे भाव में गुरू हो तो जातक धार्मिक नेता बनता है। कवि, लेखक या धर्मोपदेशक। लेखन कार्य से अर्थाेंपार्जन। सफल वैज्ञानिक हो सकता है। स्त्री पक्ष प्रबल ससुराल से अर्थ लाभ।
द्वितीय भाव में शुक्र – बड़ा परिवार, काम निकालने में चतुर, अर्थाभाव इन्हें कभी नहीं होता। ऐसे व्यक्ति डॉक्टर, वैद्य, पत्रकार या व्यवसायी होते हैं।
द्वितीय भाव में शनि – यह शुभ सूचक नहीं होता। यदि शनि स्वग्रही न हो तो जातक को धनहीन, परेशान व दुःखी करता है। धन के लिये संघर्ष करना पड़ता है। पर शनि स्वग्रही बन द्वितीय स्थानस्थ हो तो जातक का बाल्यकाल दुःख व अभाव में व्यतीत होता है परंतु युवावस्था तथा वृद्धावस्था शुभ सूचक होती है। अर्थ का आभाव नहीं रहता है।
द्वितीय भाव में राहु – जातक रोगी, स्वभाव से चिड़चिड़ा, कष्टप्रद, छोटे परिवार की स्थिति वाला होता है।
द्वितीय भाव में केतु – कटुभाषी धोखा देने वाला, दृढ़ निश्चयी। पिता की संपत्ति इन्हें कभी प्राप्त नहीं होती। उत्तरार्द्ध सुन्दर व धन सूचक। यदि सूर्य उच्च का होकर 11 वें भाव में हो तो जातक लखपति बनता है।

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