ज्योतिष या अंधविश्वास ?

ज्योतिष अंधविश्वास नहीं, विज्ञान है :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

अनेक लोग कुण्डली दिखाते समय प्रश्न करते हैं कि क्या मेरी किस्मत ही खराब है, कब और कैसे अच्छे दिन आयेंगे? अर्थात अच्छे के लिये अच्छी किस्मत या भाग्य का योगदान जरूरी है। दूसरी तरफ बहुत से लोग हैं, जो किस्मत जैसी किसी चीज को स्वीकार ही नहीं करते। और उनका कहना है कि जो कुछ मिलता है, कर्म करने से ही मिलता है। वास्तव में देखा जाए तो दोनों ही बातें सही हैं। एक तरफ कर्म का चक्र चल रहा है, और दूसरी ओर जीवन चक्र। कर्म चक्र वो चक्र है जिसमें मनुष्य कर्म करता है और कर्म का कुछ फल मिल जाता है, और शेष कर्मफल भविष्य काल के लिए संचित हो जाता है, क्योंकि उस समय कर्मफल के लिए उचित समय या वातावरण उपलब्ध नहीं होता। इस लिए भविष्य में जब भी उस कर्मफल को उचित वातावरण मिलता है, उसी समय वह कर्मफल अंकुरित होकर पोधा और फिर वृक्ष बनकर अपना फल देेेने लगता है।

भाग्य या किस्मत क्या है? :- भाग्य का अर्थ यह है, बिना परिश्रम किये सुख के साधन मिलना। भाग्य या किस्मत संचित कर्म से बनता है, कर्म के बाद हर कर्म का फल न भोग पाना इसका कारण है, जीवन चक्र सीमित वर्ष का होता है। मित्रो हम जो भी कर्म करते हैं, प्रकृति उस कर्म की प्रतिक्रिया करती है, इसी को कर्मफल कहते हैं। “क्रिया की प्रतिक्रिया” या कर्म और कर्म का फल एक ही बात है।

इस प्रकार मनुष्य अपने जीवनकाल में कुछ कर्मों का फल इस जीवन तथा शेष कर्मों का फल पुनर्जन्म प्राप्त होने पर ही भोग पाता है।

एक तरफ मनुष्य कर्म करता है, दूसरी ओर भाग्य (कर्मफल) भोगता है। अर्थात् कर्म भी करता चला जाता है, दूसरी और भाग्य का भोग भी भोगता रहता है। इस लिये मनुष्य यदि भाग्य को जानकर कर्म करे तभी हर प्रकार से सफल जीवन व्यतीत कर सकता है।

मेरा अपना विचार है कि चांद तारों से हम और चांद तारे हमसे प्रभावित होते हैं, क्योंकि प्रभाव कभी एक तरफा नहीं होता। सूर्य पर दाग दिखाई पड़ते हैं और तूफान उठते हैं, या धरती पर बीमारियाँ फैलती हैं। विश्वास करो एक छोटा सा तिनका भी सूर्य को या किसी भी ग्रह को प्रभावित करता है और सूर्य भी तिनके को प्रभावित करता है। यहाँ छोटा-बडा कोई नहीं, एक आॅरगनिक यूनिटी है। आप देखें परमाणु है, परमाणु से भी सूक्ष्म कुछ है, उसका एक प्रभाव है। सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा है, अजुड़ा कुछ भी नहीं। हम हर समय एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं, सड़क पर पड़ा हुआ पत्थर भी। हर अणु-परमाणु का एक-दूसरे से पक्का रिश्ता है। इस संयुक्त सृष्टि का बोध यदि हो जाये तभी ज्योतिष और इसका महत्व समझ आ सकता है।

ज्योतिष:- (ज्योति+ईश= ज्योतिष) विज्ञान से बढ़कर पराविज्ञान है, कैसै? आईये मैं बताता हूँ – सभी जानते हैं की ज्योतिष ग्रह-नक्षत्रों की विद्या है। ईसके तीन स्तम्भ (भाग) हैं, प्रथम भाग सिद्धांत जिसे ज्योतिषीय गणना कहा जा सकता है। दूसरा भाग संहिता जिस के सिद्धांत समझकर विद्वान पृथ्वी पर घटने वाली किसी भी भौगोलिक तथा राष्ट्रीय (किसी भी देश या विश्व में घटने वाली राजनैतिक) भविष्यवाणीयां कर सकता है। तीसरा और महत्वपूर्ण भाग “होरा” है, जिसका विशेषज्ञ विद्वान जातक के जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति (जन्मकुण्डली) को देखकर भविष्यवाणी (फलादेश) करता है। जन्मकुण्डली का फलादेश करने वाला विद्वान किसी भी व्यक्ति की कुण्डली देखकर उसके भूत-भविष्य और वर्तमान तीनो काल में घटित तथा घटने वाली घटनाओं का विवरण बता सकता है। केवल इतना ही नहीं इस के गहन अध्ययन व अभ्यास से पूर्व जन्म, वर्तमान तथा पुनर्जन्म के विषय में भी संकेत मिलते हैं।

क्या आज विज्ञान के युग में अभी तक भी ज्योतिष के अतिरिक्त कोई पद्धति है, जो भूत-भविष्य तथा वर्तमान तीन काल की जानकारी देती हो ? आधुनिक विज्ञान केवल भौतिक जगत के बारे में जानकारी दे सकता है। सूक्ष्म जगत में तो इसने अभी प्रवेश ही नहीं किया। जबकी वेदों की इस विद्या (ज्योतिष) के रचनाकार हमारे पूर्वज ऋषियों ने सूक्ष्म जगत में न केवल प्रवेश किया बल्कि सूक्ष्म जगत के करोड़ो रहस्यों को जाना समझा और उनके सिद्धांतों सहित हजारों रहस्यों को ग्रन्थों में लिखकर आगे की पीढियों को लाभान्वित किया है। आत्मा से परमात्मा का सम्बंध, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और विनाश के रहस्य, हर ग्रह-नक्षत्र का मनुष्य या धरती पर पढने वाला प्रभाव, खगोलिक घटनाओं तथा ग्रहणादि के सिद्धांत वेदों के रूप में हमें सौंप गये। वेद की 6 विद्याओं में एक महत्वपूर्ण विद्या ज्योतिष है, यह विद्या भौतिक और सूक्षम (लौकिक-पारलौकिक) दोनों के रहस्य अपने भीतर समेटे हुये है। इसी लिये यह विद्या विज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण (अलौकिक) है।

जैसी इंसान की सोच होती है, उसी तरह उसका नजरिया (दृष्टि) हो जाती है। जैसे- काम भाव दृष्टि, प्रेम दृष्टि, क्रोध की दृष्टि, लोभ दृष्टि, मोह दृष्टि, ईर्ष्या दृष्टि, विद्वेष दृष्टि प्रमाद तथा अहंकार दृष्टि। (उसकी आंखें दूसरे को वैसे ही भाव से देखती हैं, जैसा उस का नजरिया होता है) किसी के नेत्र हमें किस भाव से देख रहे हैं ? यह आसानी से पहचाना जा सकता है। जिन्हें पहचान नहीं होती वे यदि इस के लिये थोड़ा ध्यान (एकाग्रता) या अभ्यास करें तो जरूर पहचान होने लगेगी। यह तो हुई आंखो की भाषा। इस प्रकार मनुष्य किसी के नेत्रों की भाषा को समझ कर (जो उसने समझा) उसके अनुसार वह भी प्रतिक्रिया करता है। यह हुई क्रिया की प्रतिक्रिया। अर्थात् – सोच भी एक कर्म है, और प्रतिक्रिया उस कर्म का फल है। अब प्रश्न यह है, कि इंसान की सोच कैसे बनती है? उसे कौन बनाता है? 1. हालात?, 2. ईश्वर या प्रकृति?, या 3. वह स्वयं? इस पर फिर किसी समय चर्चा करूँगा। सिद्धांत तथा सत्य के अनुसार भूत-प्रेत योनि का अस्तित्व भी है, और वह सक्रिय भी होते हैं। परंतु इतना अवश्य है कि भूत-प्रेतों के नाम से जितनी बातें कही जाती हैं, उनमें सभी बातें सचमुच भूत-प्रेतों की नहीं होती। कुछ काल्पनिक भी होती हैं, और कुछ मनोविकार से ग्रस्त रोगीयों के रोग के कारण होती हैं, कुछ मानसिक दुर्बलताओं के कारण भी होती हैं। कुछ तो ढोंग तथा कुछ भोले-भाले लोगों को ठगने के उद्देेश्य से दिखावा अथवा जादूगरी के खेल के रूप में होती हैं। वस्तुत: चित्त पर पड़ने वाले संस्कार अपने अनुरूप कार्य करने के लिये ललचाते हैं। और ललचा जाने वाला मनुष्य पराधीन बन जाता है।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणेः कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

भावार्थ- वास्तव में हमारे सब प्रकार के कर्म प्राकृतिक गुणों द्वारा किये जाते हैं, परंतु अहंकार से मूढ़ बना मनुष्य मानता है कि मैं ही करता हूँ।

कर्म का सिद्धांत :- सभी जानते हैं- मनुष्य जन्म के बाद (जब से उसे समझ अाती है) से मृत्यु तक “कर्म” करता रहता है। इन्हीं कर्मों को “क्रियमाण कर्म” कहते हैं। अर्थात् मनुष्य के जीवनकाल में जो-जो कर्म किये जाते हैं, वे सभी क्रियमाण कर्म ही कहलाते हैं। यह हुये प्रथम प्रकार के कर्म। द्वितीय प्रकार के कर्म “संचित कर्म” कहलाते हैं, क्रियमाण कर्म जो रोज हुआ करते हैं, में से ही कुछ कर्मों का फल तो भोग लिया जाता है, और शेष प्रतिदिन मन में इकट्ठा होते रहते हैं, इस प्रकार मन रूपी गोदाम में एकत्र हुये कर्मों को संचित कर्म कहा जाता है। जैसे हम प्रतिदिन एक-एक रूपया गोलक में डालते जायें और सालभर के बाद गोलक खोलें तो उसमें जो रूपया निकलेगा वह सब एक वर्ष का संचित धन कहलायेगा। कर्म का एक तीसरा प्रकार “प्रारब्ध कर्म” है, मनुष्य के मन (मस्तिष्क का एक भाग) में अनेक जन्मों के संचित ढेर-के-ढेर कर्म पड़े रहते हैं। मन में जन्म-जन्मांतरों के कर्मों का इतना बड़ा खजाना जमा है कि सृष्टि के अंत तक भी समाप्त नहीं होता। इन्में मनुष्य के जीवनांत में जो कर्म भावी जन्म के लिये परिपक्व हो जाते हैं, उन्हीं कर्मों का फल भोगने के लिये जीव को उसी अनुरूप एक नया जन्म मिलता है। इस प्रकार कालभेद से मनुष्य द्वारा किये जाने वाले कर्म के तीन भेद हुये। 1. क्रियमाण कर्म, 2. संचित कर्म, और 3. प्रारब्ध कर्म। सभी कर्मफल जब तक भोग नहीं लिये जाते तब तक वे नष्ट नहीं होते। वैदिक दर्शनों के अनुसार आत्मा कभी नष्ट नहीं होती, अर्थात्‌- आत्मा अमर है। मनुष्य के शरीर में रहते हुये कर्मबंधन के प्रभाव वश यह परतंत्र, दुःखी, जन्म-मृत्यु एवं जरा (वृद्धावस्था) से युक्त प्रतीत होती है। निष्क्रिय होकर भी आत्मा सक्रिय, स्वतंत्र होते हुये भी परतंत्र, वशी होते हुये भी दुःखदायक भावों से आक्रांत, विभु या सर्वगत होते हुये भी सीमित, तथा निर्विकार होते हुये भी सुख-दुःख आदि विकारों का अनुभव करने लगती है। नित्य शुद्ध और बुद्ध आत्मा को इस स्थिति में लाकर खड़ा करने वाला कारण एकमात्र “कर्मानुबंध” है।किसी कार्य को करने के बाद अनिवार्य रूप से प्राप्त होने वाला परिणाम ही “कर्मानुबंध” है। वस्तुतः आत्मा की स्वतंत्रता या वशित्व केवल कार्य (कर्म) करने में है, परंतु कर्म करने के बाद उसके अपरिहार्य फल से वह अनुबंधित हो जाती है। इसका अर्थ है- कर्म करने या न करने के लिये आत्मा स्वतंत्र है, परंतु कर्म करने के बाद उसका फल भोगने के लिये स्वतंत्र नहीं है।

एक सच्ची बात कहता हूँ, बात तब की है, जब मेरी उम्र 20 से 30 के बीच रही होगी। उस काल में मैं ज्योतिष या ज्योतिष जैसी विद्याओं को नफरत की निगाह से देखा करता था। एेसा होना स्वाभाविक भी था, क्योंकि हर प्रकार से मेरा अच्छा दौर चल रहा था। हर तरफ इज्जत सम्मान भी था, आमदनी अच्छी थी इस लिये आत्मविश्वास की कमी नहीं थी, ईश्वर में आस्था बिलकुल भी नहीं थी, अपने हाथ-पैरों या स्वास्थ शरीर को महत्व देेता था, अपनेे मस्तिष्क तथा तर्कशक्ति से अधिक किसी को महत्व नहीं देता था। फिर कुछ एेसा होने लगा की बिना किसी विशेष कारण के कारोबार व आमदनी तेजी से कम होने लगी, क्योंकि खर्चे बढ चुके थे, उनपर लगाम लगाम ना लग पा रही थी, टेंशने बढती ही चली गई। अपने दूर होने लग गये, तो अपना मनोबल भी डगमगाने लगा, शरीर थका-थका सा रहता, तब मन में आता कोई अनजाना कारण जरूर है, जो दिखाई भी नहीं देता और सुझाई भी नहीं देता। बस सच पूछिए तो उसी दिन से मैं बनने लगा था “ज्योतिषी” और पहुंच गया एक पंडितजी के पास, उन्होंने मेरी कुण्डली बनाई और बताया तुम्हारी तो शनि की साढ़ेसाती चल रही है। मित्रो मैने जब पूछा कि क्या होती है साढ़ेसाती? और क्या होता है इसमें? पंडितजी बोले बस परेशानियाँ रहेंगी। हर क्यों का उत्तर नहीं मिला तो खरीद लाया ज्योतिष की पुस्तकें और लगा दिन-रात पढ़ने। 6-7 वर्ष अध्ययन करते-करते समझ में आने लगा कि क्यों होता है कष्ट, साढ़ेसाती में क्या बात है खास ? और सन 2000 में जब संस्कृत विश्वविद्यालय से मैने ज्योतिष की डिग्री प्राप्त कर स्वयं ज्योतिषी बन बैठा, और आज हजारों कुण्डलियां मेरी निगाहों से गुजर चुकी हैं, तब कभी-कभी मैं उस 20 से 30 की उम्र में अपने विचारों को याद करता हूँ, और महसूस करता हूँ कि यह सब नियति के खेल हैं। कुच्छ तो जन्मों-जन्मों के कर्म हैं, और कुच्छ पूर्व जन्मों की अधूरी इच्छायें या कहिये की अधूरी विद्यायें हैं, जो पीछा करती हैं।

यह आज के विज्ञान के साथ एक दुराग्रह है कि, इसने न केवल प्रत्यक्षवाद को सब कुछ माना है, साथ ही साथ उसी आधार पर हर विषय का प्रतिपादन भी आरम्भ कर दिया है। इस में कमी यह है कि, इस आधार पर हर अनैतिकता को निर्दोष ठहराया जा रहा है। धर्म और आध्यात्म के सिद्धांतों की अवहेलना चल पड़ी है, चरित्रहीनता तो साधारण बात या प्रगतिशीलता की पहचान बनने लगी है, इसका परिणाम क्या होगा? दूसरी ओर भोजन के लिये पशु हत्या! डर है, बात कभी यहाँ तक न पहुंच जाये कि बूढ़ी गाय या बूढ़े बैल की तरह बूढ़े माँ बाप को भी किसी कसाई खाने में पहुंचाने में लाभ न दिखाई देने लगे। आजकल अजन्मे बच्चों का माँस डिब्बाबंद भोजन के रूप में बिकने की खबर सुनकर रूह काँप उठती है। पशुमाँस का सेवन करते-करते मनुष्य में भी पशु स्वभाव का समावेश हो चला है। कभी मनुष्यों को भी एक पशु की तरह मान लिया गया या उस पर भी पशु जैसे अनुबंधों को लागू किया जाने लगा तब क्या होगा?

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