चौदह मुखी रूद्राक्ष, 14 Mukhi Rudraksh

चौदह मुखी रूद्राक्ष, 14 Mukhi Rudraksh Nepal, 14 Mukhi Rudraksh Original Nepal,

Dr.R.B.Dhawan (गुरूजी) Astrologer, Astrological Consultant, specialist : marriage problems, top best astrologer in delhi

असुराचार्य shukracharya के अनुसार- चौदह मुखी रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ रूद्राक्षों की श्रेणी में आता है। परम प्रभावशाली तथा अल्प समय में ही शिवजी को प्रसन्न करने वाला यह चौदह मुखी रूद्राक्ष साक्षात् देवमणि है। Dr.R.B.Dhawana जी का कथन है कि- पुराणों में वर्णित है कि यह रूद्राक्ष चौदह विद्या, 14 लोक, 14 मनु का साक्षात् रूप है। इसमें हनुमानजी की शक्ति भी निहित होती है, इसलिये शनि से संबंधित सभी दोष इसे धारण करने मात्र से शांत होते हैं। यह रूद्राक्ष आज्ञाचक्र का नियन्ता है। जो व्यक्ति इस रूद्राक्ष को कपाल के मध्य में धारण करते हैं, उनकी पूजा देवता और ब्राह्यण करते हैं, और वे निर्वाण (स्वर्ग) को प्राप्त हो जाते हैं। यह शिवजी तीसरे नेत्र के समान है, और धारक को आत्म रक्षा एवं कार्य के सही नियोजन में सहायक बनाता है। यह रूद्राक्ष धारक को हानि, दुर्घटना, रोग, चिन्ता से मुक्त रखकर साधक को सुरक्षा-समृद्धि देता है, यह रूद्राक्ष सभी रूद्राक्षों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, और इसीलिये यह अधिक मूल्यावान होता है। ये बहुत ही कम संख्याओं में उत्पन्न होता है, और इसकी मांग इसकी उपलब्धता से कहीं अधिक होती है। चौदह मुखी रूद्राक्ष shukracharya संस्थान में उपलब्ध है, क्योंकि इस रूद्राक्ष को स्वयं भगवान शिव ने धारण किया था, इसे धारण करने से परिवार का कल्याण होता है, चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष स्वास्थ्य लाभ, रोगमुक्ति और शारीरिक तथा मानसिक-व्यापारिक उन्नति में सहायक होता है। 14 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से आध्यात्मिक लाभ तथा भौतिक सुख तथा सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इस रूद्राक्ष को मस्तक पर धारण करना चाहिये। जो मनष्य इसे मंत्र सिद्ध करके धारण करते हैं, वह रूद्रलोक में जाकर बसते हैं। इससे परमपद की प्राप्ति होती है, शत्रुओं का नाश होता है, बैकुंठ की प्राप्ति होती है। यह जेल भय से मुक्ति भी दिलाता है। यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक है, यह समस्त रोगों का हरण करने वाला सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला है। इसके धारण करने से वंशवृद्धि अवश्य होती है। इससे बल और उत्साह का वर्धन होता है। इससे निर्भयता प्राप्त होती है, और संकट काल में सरंक्षण प्राप्त होता है। विपत्ति और दुर्घटना से बचाव के लिये हनुमान जी (रूद्र) के प्रतीक माने जाने वाले इस 14 मुखी रूद्राक्ष को अवश्य प्रयोग करना चाहिये। चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष धारक को भविष्य देखने की दृष्टि प्रदान करता है, यह ‘देवमणि’ रूद्राक्ष है। चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति सदा सही निर्णय लेता है, और संकटों, कुपरिस्थितियों एवं चिंताओं से छुटकारा पाता है, तथा भूत-पिशाच, डाकिनी, शाकिनी का प्रकोप उसके निकट भी नहीं आता। धारणकर्ता में विशेष गुण विकसित होने लगते हैं। यह आचार्य shukracharya द्वारा शास्त्रोक्त सिद्ध है कि जिसने 14 मुखी रूद्राक्ष धारण कर लिया, शनि जैसा प्रतिकूल ग्रह भी अनुकूल हो जाता है। चौदह मुखी रूद्राक्ष की माला पुरूष या स्त्री द्वारा धारण करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है, और गृहस्थ जीवन भी अच्छा होता है। ग्यारह मुखी तथा चौदह मुखी दोनों रूद्राक्ष की माला को पेट पर बांधने से बार-बार हो जाने वाला गर्भपात नहीं होता। और उच्च कोटि की संतान उत्पन्न होती है।

14 मुखी रूद्राक्ष धारण का मंत्र है- ॐ नमः ॐ हनुमते नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ औं हस्फ्रें हसख्फ्रें। इस मंत्र से रूद्राक्ष को चैतन्य कर धारण करना चाहिये।
उपयोग- यह रूद्राक्ष भविष्य दर्शन, कल्पना शक्ति एवं ध्यान में सहायक है।

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शुभ और अशुभ ग्रह

गुरू या शुक्र अस्त होने पर मांगलिक कार्य वर्जित क्यों हो जाते हैं।

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

शुक्रे चास्तं गते जीवे चन्द्र वास्तमुपागते।
तेषां वृद्धि च बाल्ये च शुभकर्म भयप्रदम्।।

शुक्र नष्टे गुरौ सिंह गुर्वादित्ये मलिम्लुचे।
गृहकर्म व्रतों यात्रा मनसापि न चिन्तयेत।।

अर्थात्:- शुक्र चन्द्र गुरू के अस्त होने में व वृद्धत्वव बलात् में शुभ कार्य करने से भय ही मिलता है। इसी प्रकार सिंह राशि में गुरू का प्रभाव है।

सूर्य सिद्धान्त के अनुसार – सूर्येणास्तम्भन सह अर्थात सूर्य के साथ (निकट के अंशों में आने से) ग्रह अस्त होते हैं। अपनी-अपनी गति से भ्रमण करते हुये ग्रह जब सूर्य के सानिध्य में आते हैं, तब उनका सूर्यकिरणों में छिप जाने के कारण ग्रह दिखाई नहीं देते हैं। इसी को ग्रह का अस्त होना कहते हैं। और जब सूर्य से दूर हट कर दिखलाई देने लगते हैं, तब इसे उदय ग्रह कहा जाता है । ग्रहों का उदय अस्त होना , मनुष्य की दृष्टी से ओझल होना व्यक्त करता है। और गुरू, शुक्र का उदय अस्त होना मंगल कार्य के मुहूर्त की दृष्टी से विशेष महत्व रखता है।

सूर्य के दक्षिणायन होने पर (कर्क संक्रान्ति से धनु संक्रान्ति के अन्त तक) देव प्राण-प्रतिष्ठा, जलाशय-प्रतिष्ठा, विवाह-संस्कार, अग्निहोत्र, ग्रहप्रवेश, मुण्डन, राज्याभिषेक एवं व्रतबंध आदि मांगलिक कार्य वर्जित हैं, अर्थात् शुभकारी नहीं होते।

बाल्यावस्था, अस्तांगत एवं वृद्धावस्था में गुरू और शुक्र के जाने पर तथा केतु के उदय होने पर भी यह मांगलिक कार्य शुभ फल नहीं देते। इस का कारण है- सूर्य मण्डल में शुक्र अस्त हो जाता है, तो तेजहीन हो जाता है। इसी प्रकार गुरू भी तेजहीन हो जाता है। शुक्र या गुरु की ऐसी स्थिति में मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिये। क्योंकि शुक्र भोग कारक ग्रह होने से भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति में बाधक होता है, यह भोग प्रदाता ग्रह है, सांसारिक सुख का ग्रह है, एवं दैहिक भोगविलास और लग्ज़री वस्तुओं का विवाह उपरांत आभाव अच्छा नहीं। ऐसे में शुक्र ग्रह के अस्त होने से विवाहोपरांत मिलने वाले शुभ फल कैसे मिल सकते हैं ? भारतीय ज्योतिष में कन्या के विवाह के लिये गुरू की स्थिति देखी जाती है । गुरू के बलवान व शुभ होने पर कन्या को श्रेष्ठ पति सुख मिलता है। देव जागरण (देव प्रबोधिनी एकादशी) तुलसी विवाह से मांगलिक कार्य आरंभ हो जाते हैं।

अशुभ ग्रह :-

यदि कोई ग्रह
आपकी जन्म कुंडली में अशुभ स्थान
पर बैठकर प्रमोशन में बाधा बन रहा है तो आगे बताए
गए उपाय करने से आपकी समस्या का समाधान हो
सकता है।

ये उपाय इस प्रकार हैं-
1- यदि शनि आपके प्रमोशन में बाधा उत्पन्न कर रहा
है, तो एक बर्तन में तिल्ली का तेल लेकर उसमें
अपनी
परछाई देखकर दान कर दें।

2- यदि सूर्य के कारण बाधा हो तो प्रतिदिन पहली
रोटी गाय को दें यदि गाय काली या
पीली हो तो
और भी शुभ रहता है।

3- चन्द्र के कारण बाधा हो शिवलिंग पर कच्चे दूध में
गंगाजल मिलाकर अभिषेक करें।

4- मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण बाधा हो तो घर की
बुजुर्ग महिलाओं का सम्मान करें और चांदी
की अंगूठी
या कड़ा पहनें।

5- बुध ग्रह के कारण आपके प्रमोशन में बाधा उत्पन्न
हो रही हो तो किसी को चांदी
का आभूषण दान करें।

6- गुरु के प्रभाव के कारण तरक्की में बाधा उत्पन्न
हो रही हो तो रोज गाय को गुड़-चने खिलाएं।

7- यदि शुक्र ग्रह के कारण प्रमोशन रुका हो तो
माता-पिता व घर के अन्य बुजुर्ग लोगों की सेवा करें।
माता के पैर छूकर ही घर से बाहर निकलें।

8- राहु के प्रभाव के कारण बाधा आ रही हो तो
चींटियों को आटा डालें व आटे की गोलियां
बनाकर मछलियों को खिलाएं।

9- केतु का अशुभ प्रभाव हो तो रोज काले कुत्ते को
रोटी पर तेल लगाकर खिलाएं।
मेरे और लेख देखें:- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in,gurujiketotke.com, vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com पर भी।