अकाल मृत्यु योग

क्या जन्म कुंडली द्वारा अकाल-मृत्यु (एक्सीडेंट) योग का पता लगाया जा सकता है ? :-

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

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वस्तुत: मृत्यु एक ऐसा अटल सत्य है, जिसे कोई बदल नहीं सकता। कब, किस कारण से, मौत को गले लगाना होगा, यह कोई भी नहीं जानता। कुछ लोगों की असमय और अस्वाभाविक मृत्यु हो जाती है। ऐसी मौत को ही अकाल मृत्यु कहते हैं। प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या जातक की कुंडली के आधार पर अकाल मृत्यु के संबंध में जाना जा सकता है? इसका उत्तर है हां जाना तो जा सकता है, परंतु यह सरल बिल्कुल भी नहीं है, इसके लिए बहुत जटिल ज्योतिषीय गणनाओं का गुणा-भाग करना होता है, और इस के साथ-साथ ज्योतिषीय योगों का सामंजस्य बैठाना होता है। आगे की पंक्तियों में कुछ मान्य ग्रंथों से अकाल मृत्यु के योग लिख रहे हैं, परंतु ध्यान रहे केवल इन योगों को आधार मानकर अकाल मृत्यु की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, बल्कि इस के साथ साथ ज्योतिष के अन्य नियमों का मिलान होना भी आवश्यक है, तभी इन में से कोई योग घटित हो सकता है।

ज्योतिष शास्त्र के कुछ मान्य ग्रंथों में – वृहद्पराशर होराशास्त्र, जातक पारिजात, फल दीपिका इत्यादि के आयुर्दाय अध्याय में कुछ अपमृत्यु (अकाल मृत्यु) के योगों का वर्णन मिलता है :-

1- लग्नेश तथा मंगल की युति यदि लग्न कुंडली के छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो, जातक को शस्त्र से घाव होता है। इसी प्रकार का फल इन भावों में शनि और मंगल के होने से भी मिलता है।

2- यदि मंगल किसी जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव, सप्तम भाव अथवा अष्टम भाव में स्थित हो, और उस मंगल पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो, जातक की मृत्यु अग्नि से हो सकती है।

3- लग्न, द्वितीय भाव तथा बारहवें भाव में क्रूर ग्रहों की स्थिति हत्या का कारण बनती है।

4- दशम भाव की नवांश राशि का स्वामी राहु अथवा केतु के साथ स्थित हो तो, जातक की मृत्यु अस्वाभाविक होती है।

5- यदि जातक की कुंडली के लग्न में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि हो तो, दुर्घटना में मृत्यु होने की आशंका रहती है।

6- राहु-मंगल की युति अथवा दोनों का सम-सप्तक होकर एक-दूसरे से दृष्ट होना भी दुर्घटना का कारण हो सकता है।

7- षष्ठ भाव का स्वामी पापग्रह से युक्त होकर षष्ठ अथवा अष्टम भाव में हो तो, दुर्घटना होने का भय रहता है।

8- अष्टम भाव और लग्न भाव के स्वामी बलहीन हों और मंगल 6 घर के स्वामी के साथ बैठा हो तो, ये योग बनता है –

9- क्षीण चन्द्रमा 8वें भाव में हो तो भी यह योग बनता है, या लग्न में शनि हो, और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो, तथा उसके साथ सूर्य, चन्द्रमा, या सूर्य राहू हो तो भी यह योग बनता है..

ऐसे योंगों में मृत्यु के निम्न कारण होते हैं जैसे

शस्त्र से , 2- विष से, 3- फांसी लगाने से, 4- आग में जलने से, 5- पानी में डूबने से या 6- मोटर-वाहन की दुर्घटना से –

1- यदि जातक की कुंडली के लग्न में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि हो तो दुर्घटना में मृत्यु होने की आशंका रहती है।

2- राहु-मंगल की युति अथवा दोनों का सम-सप्तक होकर एक-दूसरे से दृष्ट होना भी दुर्घटना का कारण हो सकता है।

3- षष्ठ भाव का स्वामी पापग्रह से युक्त होकर षष्ठ अथवा अष्टम भाव में हो तो, दुर्घटना होने का भय रहता है।

4- लग्न, द्वितीय भाव तथा बारहवें भाव में क्रूर ग्रह की स्थिति हत्या का कारण बनती है।

5- दशम भाव की नवांश राशि का स्वामी राहु अथवा केतु के साथ स्थित हो तो, जातक की मृत्यु अस्वाभाविक होती है।

6- लग्नेश तथा मंगल की युति छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो, जातक को शस्त्र से घाव होता है। इसी प्रकार का फल इन भावों में शनि और मंगल के होने से मिलता है।

7- यदि मंगल जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव, सप्तम भाव अथवा अष्टम भाव में स्थित हो, और उस पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो, जातक की मृत्यु आग से हो सकती है।

विशेष :- कुंडली में अनेक अपमृत्यु योगों को भंग करने वाले योग भी साथ-साथ बन रहे होते हैं, इस लिये कुंडली का सभी दृष्टियों से विचार करना आवश्यक है।
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अपमृत्यु अथवा अल्पायु योगों का निवारण —

लग्नेश को मजबूत करें, उपाय के द्वारा और रत्नादि धारण अथवा रत्न दान के द्वारा, और इसके बाद भी यदि दुर्घटना होती है तो, महामृत्युंजय मंत्र का जाप या मृत्संजनी मंत्र का अनुष्ठान ही ऐसे जातक के जीवन रक्षा करता है।

क्या आप अल्पायु या अपमृत्यु योग का निवारण चाहते हैं तो, निम्न मंत्र का नित्य 11 बार जाप किया करें …

”अश्वत्थामा बलीर व्यासो हनुमानाश च विभिशाना कृपाचार्य च परशुरामम सप्तैता चिरंजीवानाम ”

1- अश्वत्थामा, 2 – राजा बलि, 3 – व्यास ऋषि, 4 – अंजनी नंदन श्री राम भक्त हनुमान, 5 – लंका के राजा विभीषण, 6 – महातपस्वी परशुराम, 7 – कृपाचार्य। ये सात नाम हैं जो अजर अमर हैं, और आज भी पृथ्वी पर विराजमान हैं।

अभेद्य महामृत्युंजय कवच : — जब जन्म कुंडली में मृत्यु का योग न हो लेकिन फिर भी व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो इसे अकाल मृत्यु कहा जाता है। हर समय किसी अनहोनी का डर लगा रहता है। इन्हीं कारणों से बचाव के लिए मां भगवती ने भगवान शिव से पूछा कि प्रभू अकाल मृत्यु से रक्षा करने और सभी प्रकार के अशुभों से रक्षा का कोई उपाय बताइए। तब भगवान शिव ने महामृत्युंजय कवच के बारे में बताया। महामृत्युंजय कवच को धारण करके मनुष्य सभी प्रकार के अशुभों से बच सकता है, और अकाल मृत्यु को भी टाल सकता है।

अकाल मृत्यु का भय नाश करता है, महामृत्युंजयग्रहों के द्वारा पिड़ीत आम जन मानस को मुक्ति सरलता से मिल सकती है। सोमवार के व्रत में भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की जाती है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार सोमवार के व्रत तीन तरह के होते हैं। सोमवार, सोलह सोमवार और सौम्य प्रदोष। इस व्रत को सावन माह में आरंभ करना शुभ माना जाता है।

सावन में शिव-शंकर की पूजा :-
सावन के महीने में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरूआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, शमीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भाँग और श्रीफल महादेव को चढ़ाया जाता है।

क्यों किया जाता है महादेव का अभिषेक ? –
महादेव का अभिषेक करने के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है कि, समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने के बाद जब महादेव इस विष का पान करते हैं तो वह मूर्छित हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं, और उन्हें होश में लाने के लिए निकट में जो चीजें उपलब्ध होती हैं, उनसे महादेव को स्नान कराने लगते हैं। इसके बाद से ही जल से लेकर तमाम उन चीजों से महादेव का अभिषेक किया जाता है।

‘मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये’

इसके पश्चात निम्न मंत्र से ध्यान करें-
‘ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥
ध्यान के पश्चात ‘ऊँ नम: शिवाय’ से शिवजी का तथा ‘ऊँ नम: शिवायै’ के अलावा जन साधारण को महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है । अत: शिव-पार्वती जी का षोडशोपचार पूजन कर राशियों के अनुसार दिये मंत्र से अलग-अलग प्रकार से पुष्प अर्पित करें।

राशियों के अनुसार क्या चढ़ावें भगवान शिव को..?-
भगवान शिव को भक्त प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और समीपत्र चढ़ाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 88 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक शमीपत्र का महत्व होता है।

मेष:- ॐ ह्रौं जूं स:, इस त्र्यक्षरी महामृत्युञ्जय मंत्र बोलते हुए 11 बेलपत्र चढ़ावें।

वृषभ:- ॐ शशीशेषराय नम:, इस मंत्र से 84 शमीपत्र चढ़ावें।

मिथुन:- ॐ महा कालेश्वराय नम:, (बेलपत्र 51)।

कर्क:- ॐ त्र्यम्बकाय नम:, (नील कमल 61)।

सिंह:- ॐ व्योमाय पाय्घर्याय नम:, (मंदार पुष्प 108)

कन्या:- ॐ नम: कैलाश वासिने नंदिकेश्वराय नम:, (शमी पत्र 41)

तुला:- ॐ शशिमौलिने नम:, (बेलपत्र 81)

वृश्चिक:- ॐ महाकालेश्वराय नम:, ( नील कमल 11 फूल)

धनु:- ॐ कपालिक भैरवाय नम:, (जंवाफूल कनेर 108)

मकर:- ॐ भव्याय मयोभवाय नम:, (गन्ना रस और बेल पत्र 108)

कुम्भ:- ॐ कृत्सनाय नम:, (शमी पत्र 108)

मीन:- ॐ पिंङगलाय नम: (बेलपत्र में पीला चंदन से राम नाम लिख कर 108)

सावन सोमवार व्रत नियमित रूप से करने पर भगवान शिव तथा देवी पार्वती की अनुकम्पा बनी रहती है।जीवन धन-धान्य से भर जाता है।

सभी अनिष्टों का भगवान शिव हरण कर भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं।

कुंडली में मृत्यु के प्रकार :-
हमारे प्राचीन ऋषि-महर्षियों ने ज्योतिष की गणना के आधार पर जीवन और मृत्यु के बारे में कुछ योग बताएं हैं, जसके आधार पर मृत्यु कैसे होगी किस प्रकार से होगी आइये देखते हैं-

लग्नेश के नवांश से मृत्यु का ज्ञान:- जन्म कुंडली में लग्न चक्र और नवांश को देखकर यह बताया जा सकता है की मृत्यु कैसे होगी ..

लग्नेश का नवांश मेष हो तो, पितदोष, पीलिया, ज्वर, जठराग्नि आदि से संबंधित बीमारी से मृत्यु होती है।

लग्नेश का नवांश वृष हो तो एपेंडिसाइटिस, शूल या दमा आदि से मृत्यु होती है।

लग्नेश का मिथुन नवांश हो तो, मेनिन्जाइटिस, सिर शूल, दमा आदि से मृत्यु होती है।

लग्नेश कर्क नवांश में हो तो, वात रोग से मृत्यु हो सकती है।

लग्नेश सिंह नवांश में हो तो, व्रण, हथियार या अम्ल से अथवा अफीम, नशा आदि के सेवन से मृत्यु होती है।

कन्या नवांश में लग्नेश के होने से बवासीर, मस्से आदि रोग से मृत्यु होती है।

तुला नवांश में लग्नेश के होने से घुटने तथा जोड़ों के दर्द अथवा किसी जानवर के आक्रमण चतुष्पद (पशु) के कारण मृत्यु होती है।

लग्नेश वृश्चिक नवांश में हो तो, संग्रहणी, यक्ष्मा आदि से मृत्यु होती है।

लग्नेश धनु नवांश में हो तो, विष ज्वर, गठिया आदि के कारण मृत्यु हो सकती है।

लग्नेश मकर नवांश में हो तो, अजीर्ण, अथवा, पेट की किसी अन्य व्याधि से मृत्यु हो सकती है।

लग्नेश कुंभ नवांश में हो तो, श्वास संबंधी रोग, क्षय, भीषण ताप, लू आदि से मृत्यु हो सकती है।

लग्नेश मीन नवांश में हो तो, धातु रोग, बवासीर, भगंदर, प्रमेह, गर्भाशय के कैंसर आदि से मृत्यु होती है।

हत्या एवं आत्महत्या के योग :-
शरीर के संवेदनशील तंत्र पर चंद्रमा का अधिकार होता है। कुंडली में चंद्रमा अगर शनि, मंगल, राहु-केतु, नेप्च्यून आदि ग्रहों के प्रभाव में हो तो, मन व्यग्रता का अनुभव करता है। दूषित ग्रहों के प्रभाव से मन में कृतघ्नता के भाव अंकुरित होते हैं, पाप की प्रवृत्ति पैदा होती है, और मनुष्य अपराध, आत्महत्या, हिंसक कर्म आदि की ओर उन्मुख हो जाता है। चंद्रमा की कलाओं में अस्थिरता के कारण आत्महत्या की घटनाएं अक्सर एकादशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा के आस-पास होती हैं। मनुष्य के शरीर में शारीरिक और मानसिक बल कार्य करते हैं। मनोबल की कमी के कारण मनुष्य का विवेक काम करना बंद कर देता है, और अवसाद में हार कर वह आत्महत्या जैसा पाप कर बैठता है।
आत्महत्या करने वालों में 60 प्रतिशत से अधिक लोग अवसाद या किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रस्त होते हैं।
आत्महत्या के कारण मृत्यु योग- जन्म कुंडली में निम्न स्थितियां हों तो जातक आत्महत्या की तरफ उन्मुख होता है।
लग्न व सप्तम स्थान में नीच ग्रह हो।

अष्टमेश पाप ग्रह शनि राहु से पीड़ित हो।

अष्टम स्थान के दोनों तरफ अर्थात् सप्तम व हो, उच्च या नीच राशिस्थ हो, अथवा मंगल व केतु की युति में हो।

सप्तमेश और सूर्य नीच भाव का हो, तथा राहु शनि से दृष्टि संबंध रखता हो।

लग्नेश व अष्टमेश का संबंध व्ययेश से हो।

मंगल व षष्ठेश की युति हो, तृतीयेश, शनि और मंगल अष्टम में हों।

अष्टमेश यदि जल तत्वीय हो तो जातक पानी में डूबकर और यदि अग्नि तत्वीय हो तो जल कर आत्महत्या करता है।

कर्क राशि का मंगल अष्टम भाव में हो तो जातक पानी में डूबकर आत्महत्या करता है।

हत्या या आत्महत्या के कारण होने वाली मृत्यु के अन्य योग:-

यदि मकर या कुंभ राशिस्थ चंद्र दो पापग्रहों के मध्य हो तो जातक की मृत्यु फांसी, आत्महत्या या अग्नि से होती है।

चतुर्थ भाव में सूर्य एवं मंगल तथा दशम भाव में शनि हो तो जातक की मृत्यु फांसी से होती है।

यदि अष्टम भाव में एक या अधिक अशुभ ग्रह हों तो जातक की मृत्यु हत्या, आत्महत्या, बीमारी या दुर्घटना के कारण होती है।

यदि अष्टम भाव में बुध और शनि स्थित हों तो जातक की मृत्यु फांसी से होती है।

यदि मंगल और सूर्य राशि परिवर्तन योग में हों और अष्टमेश से केंद्र में स्थित हों तो जातक को सरकार द्वारा मृत्यु दण्ड अर्थात् फांसी मिलती है।

शनि लग्न में हो और उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तथा सूर्य, राहु और क्षीण चंद्र युत हों तो जातक की गोली या छुरे से हत्या होती है।

यदि नवांश लग्न से सप्तमेश, राहु या केतु से युत हो तथा भाव 6, 8 या 12 में स्थित हो तो जातक की मृत्यु फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेने से होती है।

यदि चंद्र से पंचम या नवम राशि पर किसी अशुभ ग्रह की दृष्टि या उससे युति हो और अष्टम भाव अर्थात 22वें द्रेष्काण में सर्प, निगड़, पाश या आयुध द्रेष्काण का उदय हो रहा हो तो जातक फांसी लगाकर आत्महत्या करने से मृत्यु को प्राप्त होता है।

चौथे और दसवें या त्रिकोण भाव में अशुभ ग्रह स्थित हो या अष्टमेश लग्न में मंगल से युत हो तो जातक फांसी लगाकर आत्महत्या करता है।

दुर्घटना के कारण मृत्यु योग:-
जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ और दशम भाव में से किसी एक में सूर्य और दूसरे में मंगल हो, उसकी मृत्यु पत्थर से चोट लगने के कारण होती है।

यदि शनि, चंद्र और मंगल क्रमशः चतुर्थ, सप्तम और दशम भाव में हो तो, जातक की मृत्यु कुएं में गिरने से होती है।

सूर्य और चंद्रमा दोनों कन्या राशि में हों, और पाप ग्रह से दृष्ट हों तो, जातक की उसके घर में बंधुओं के सामने मृत्यु होती है।

यदि कोई द्विस्वभाव राशि लग्न में हो, और उस में सूर्य तथा चंद्र हों तो, जातक की मृत्यु जल में डूबने से होती है।

यदि चंद्रमा मेष या वृश्चिक राशि में दो पाप ग्रहों के मध्य स्थित हो तो जातक की मृत्यु शस्त्र या अग्नि दुर्घटना से होती है।

जिस जातक के जन्म लग्न से पंचम और नवम भावों में पाप ग्रह हों, और उन दोनों पर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो, उसकी मृत्यु बंधन से होती है।

जिस जातक के जन्मकाल में किसी पाप ग्रह से युत चंद्रमा कन्या राशि में स्थित हो, उसकी मृत्यु उसके घर की किसी स्त्री के कारण होती है।

जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ भाव में सूर्य या मंगल और दशम में शनि हो, उसकी मृत्यु चाकू से होती है।

यदि दशम भाव में क्षीण चंद्र, नवम में मंगल, लग्न में शनि और पंचम में सूर्य हो तो, जातक की मृत्यु अग्नि, धुआं, बंधन या काष्ठादि के प्रहार के कारण होती है।

जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ भाव में मंगल, सप्तम में सूर्य और दशम में शनि स्थित हो तो, उसकी मृत्यु शस्त्र या अग्नि दुर्घटना से होती है।

जिस जातक के जन्म लग्न से दशम भाव में सूर्य और चतुर्थ में मंगल स्थित हो, उसकी मृत्यु सवारी से गिरने से या वाहन दुर्घटना में होती है।

यदि लग्न से सप्तम भाव में मंगल और लग्न में शनि, सूर्य एवं चंद्र हों उसकी मृत्यु मशीन आदि से होती है।

यदि मंगल, शनि और चंद्रमा क्रम से तुला, मेष और मकर या कुंभ में स्थित हों तो, जातक की मृत्यु विष्ठा में गिरने से होती है।

मंगल और सूर्य सप्तम भाव में, शनि अष्टम में और क्षीण चंद्र में स्थित हो तो, उसकी मृत्यु पक्षी के कारण होती है।

यदि लग्न में सूर्य, पंचम में मंगल, अष्टम में शनि और नवम में क्षीण चंद्र हो तो जातक की मृत्यु पर्वत के शिखर या दीवार से गिरने अथवा वज्रपात से होती है।

सूर्य, शनि, चंद्र और मंगल लग्न से अष्टमस्थ या त्रिकोणस्थ हों तो, वज्र या शूल के कारण अथवा दीवार से टकराकर या मोटर दुर्घटना से जातक की मृत्यु होती है।

चंद्रमा लग्न में, गुरु द्वादश भाव में हो, कोई पाप ग्रह चतुर्थ में और सूर्य अष्टम में निर्बल हो तो जातक की मृत्यु किसी दुर्घटना से होती है।

यदि दशम भाव का स्वामी नवांशपति शनि से युत होकर भाव 6, 8 या 12 में स्थित हो तो, जातक की मृत्यु विष भक्षण से होती है।

यदि चंद्र या गुरु जल राशि (कर्क, वृश्चिक या मीन) में अष्टम भाव में स्थित हो, और साथ में राहु हो तथा उसे पाप ग्रह देखता हो तो सर्पदंश से मृत्यु होती है।

यदि लग्न में शनि, सप्तम में राहु और क्षीण चंद्रमा तथा कन्या में शुक्र हो तो, जातक की शस्त्राघात से मृत्यु होती है।

यदि अष्टम भाव तथा अष्टमेश से सूर्य, मंगल और केतु की युति हो अथवा दोनों पर उक्त तीनों ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक की मृत्यु अग्नि दुर्घटना से होती है।

यदि शनि और चंद्र भाव 4, 6, 8 या 12 में हो तथा अष्टमेश अष्टम भाव में दो पाप ग्रहों से घिरा हो तो, जातक की मृत्यु नदी या समुद्र में डूबने से होती है।

लग्नेश, अष्टमेश और सप्तमेश यदि एक साथ बैठे हों तो जातक की मृत्यु स्त्री के साथ होती है।

यदि कर्क या सिंह राशिस्थ चंद्रमा सप्तम या अष्टम भाव में हो और राहु से युत हो तो, मृत्यु पशु के आक्रमण के कारण होती है।

दशम भाव में सूर्य और चतुर्थ में मंगल स्थित हो तो, वाहन के टकराने से मृत्यु होती है।

अष्टमेश एवं द्वादशेश में भाव परिवर्तन हो, तथा इन पर मंगल की दृष्टि हो तो, जातक की अकाल मृत्यु होती है।

षष्ठ, अष्टम अथवा द्वादश भाव में चंद्रमा, शनि एवं राहु हों तो, जातक की मृत्यु अस्वाभाविक तरीके से होती है।

लग्नेश एवं अष्टमेश बलहीन हों, तथा मंगल षष्ठेश के साथ हो तो, जातक की मृत्यु कष्टदायक होती है।

चंद्रमा, मंगल एवं शनि अष्टमस्थ हों तो, मृत्यु शस्त्र से होती है।

षष्ठ भाव में लग्नेश एवं अष्टमेश हों, तथा षष्ठेश मंगल से दृष्ट हो तो, जातक की मृत्यु शत्रु द्वारा या शस्त्राघात से होती है।

लग्नेश और अष्टमेश अष्टम भाव में हों, तथा पाप ग्रहों से युत दृष्ट हों तो, जातक की मृत्यु प्रायः दुर्घटना के कारण होती है।

चतुर्थेश, षष्ठेश एवं अष्टमेश में संबंध हो तो, जातक की मृत्यु वाहन दुर्घटना में होती है।

अष्टमस्थ केतु 25 वें वर्ष में भयंकर कष्ट अर्थात् मृत्युतुल्य कष्ट देता है।

यदि अष्टम भाव में चंद्रमा, मंगल, और शनि हों तो, जातक की मृत्यु हथियार से होती है।

यदि द्वादश भाव में मंगल, और अष्टम भाव में शनि हो तो, भी जातक की मृत्यु हथियार द्वारा होती है।

यदि षष्ठ भाव में मंगल हो तो, भी जातक की मृत्यु हथियार से होती है।

यदि राहु चतुर्थेश के साथ षष्ठ भाव में हो तो, मृत्यु डकैती या चोरी के समय उग्र आवेग के कारण होती है।

यदि चंद्रमा मेष या वृश्चिक राशि में पापकर्तरी योग में हो तो, जातक जलने से या हथियार के प्रहार से मृत्यु को प्राप्त होता है।

यदि अष्टम भाव में चंद्रमा, दशम में मंगल, चतुर्थ में शनि और लग्न में सूर्य हो तो, मृत्यु कुंद वस्तु से होती है।

यदि सप्तम भाव में मंगल और लग्न में चंद्र तथा शनि हों तो, मृत्यु संताप के कारण या विचार गोष्ठी कारण होती है।

यदि लग्नेश और अष्टमेश कमजोर हों और मंगल षष्ठेश से युत हो तो, मृत्यु युद्ध में होती है।

यदि नवांश लग्न से सप्तमेश, शनि से युत हो, या भाव 6, 8 या 12 में हो तो मृत्यु जहर खाने से होती है।

यदि चंद्रमा और शनि अष्टम भाव में हो और मंगल चतुर्थ में हो, या सूर्य सप्तम में अथवा चंद और बुध षष्ठ भाव में हो तो, जातक की मृत्यु जहर खाने से होती है।

यदि शुक्र मेष राशि में, सूर्य लग्न में, और चंद्रमा सप्तम भाव में अशुभ ग्रह से युत हो तो, स्त्री के कारण मृत्यु होती है।

यदि लग्न स्थित मीन राशि में सूर्य, चंद्रमा और अशुभ ग्रह हों तथा, अष्टम भाव में भी अशुभ ग्रह हों तो, दुष्ट स्त्री के कारण मृत्यु होती है।

विभिन्न दुर्घटना योग:-
लग्नेश और अष्टमेश दोनों अष्टम में हो, अष्टमेश पर लाभेश की दृष्टि हो, (क्योंकि लाभेश षष्ठ से षष्ठम भाव का स्वामी होता है)।

द्वितीयेश, चतुर्थेश और षष्ठेश का परस्पर संबंध हो।

मंगल, शनि और राहु भाव 2, 4 अथवा 6 में हों।

तृतीयेश क्रूर हो तो, परिवार के किसी सदस्य से तथा चतुर्थेश क्रूर हो तो, जनता से आघात होता है।

अष्टमेश पर मंगल का प्रभाव हो, तो जातक गोली का शिकार होता है।

अगर शनि की दृष्टि अष्टमेश पर हो, और लग्नेश भी वहीं हो तो, गाड़ी, जीप, मोटर या ट्राॅली से दुर्घटना हो सकती है।

बीमारी के कारण मृत्यु योग:-
जिस जातक के जन्मकाल में शनि कर्क में एवं चंद्रमा मकर में बैठा हो, अर्थात् देानों ही ग्रहों में राशि परिवर्तन हो, उसकी मृत्यु जलोदर रोग से या जल में डूबने से होती है।

यदि कन्या राशि में चंद्रमा दो पाप ग्रहों के मध्य स्थित हो तो, जातक की मृत्यु रक्त विकार या क्षय रोग से होती है।

यदि शनि द्वितीय भाव में और मंगल दशम में हों तो, मृत्यु शरीर में कीड़े पड़ने से होती है।

जिस जातक के जन्मकाल में क्षीण चंद्रमा बलवान मंगल से दृष्ट हो, और शनि लग्न से अष्टम भाव में स्थित हो तो, उसकी मृत्यु गुप्त रोग या शरीर में कीड़े पड़ने से या शस्त्र से या अग्नि से होती है।

अष्टम भाव में पाप ग्रह स्थित हो तो, मृत्यु अत्यंत कष्टकारी होती है। इसी भाव में शुभ ग्रह स्थित हो, और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो, गुप्त रोग या नेत्ररोग की पीड़ा से मृत्यु होती है।

क्षीण चंद्र अष्टमस्थ हो, और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो, इस स्थिति में भी उक्त रोगों से मृत्यु होती है।

यदि अष्टम भाव में शनि एवं राहु हो तो, मृत्यु पुराने रोग के कारण होती है।

यदि अष्टम भाव में चंद्रमा हो, और साथ में मंगल, शनि या राहु हो तो, जातक की मृत्यु मिरगी से होती है।

यदि अष्टम भाव में मंगल हो, और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो, मृत्यु सर्जरी या गुप्त रोग अथवा आंख की बीमारी के कारण होती है।

यदि बुध और शुक्र अष्टम भाव में हो तो, जातक की मृत्यु नींद में होती है।

यदि मंगल लग्नेश हो (यदि मंगल नवांशेश हो) और लग्न में सूर्य और राहु तथा सिंह राशि में बुध और क्षीण चंद्रमा स्थित हों तो, जातक की मृत्यु पेट के आपरेशन के कारण होती है।

जब लग्नेश या सप्तमेश, द्वितीयेश और चतुर्थेश से युत हो तो, अपच के कारण मृत्यु होती है।

यदि बुध सिंह राशि में अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो, जातक की मृत्यु बुखार से होती है।

यदि अष्टमस्थ शुक्र अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो, मृत्यु गठिया या मधुमेह के कारण होती है।

यदि बृहस्पति अष्टम भाव में जलीय राशि में हो तो, मृत्यु फेफड़े की बीमारी के कारण होती है।

यदि राहु अष्टम भाव में अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो, मृत्यु चेचक, घाव, सांप के काटने, गिरने या पितृदोष से मृत्यु होती है।

यदि मंगल षष्ठ भाव में सूर्य से दृष्ट हो तो, मृत्यु हैजे से होती है।

यदि मंगल और शनि अष्टम भाव में स्थित हों तो धमनी में खराबी के कारण मृत्यु होती है।

नवम भाव में बुध और शुक्र हों तो, हृदय रोग से मृत्यु होती है।

यदि चंद्र कन्या राशि में अशुभ ग्रहों के घेरे में हो तो, मृत्यु रक्त की कमी के कारण होती है।

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रोग और ज्योतिष

आयुर्वेद के अनुसार कुछ जटिल रोग पूर्वजन्मों के दोष के कारण शरीर के लिए कष्टकारी होते हैं –

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आयुर्वेद और ज्योतिष शास्त्र का चोली-दामन का संबंध रहा है, पूर्वकाल में हर वैद्य आयुर्वेद के साथ ग्रह-नक्षत्रों का भी अच्छा खासा ज्ञान रखता था। औषधि किस मुहूर्त में ग्रहण करनी है, और किस नक्षत्र में रोगी को सेवन करना आरम्भ करनी है? रोग किस नक्षत्र में आरम्भ हुआ है, वह साध्य होगा या असाध्य अथवा कष्ट साध्य होगा, इस का अच्छा-खासा ज्ञान वैद्य को होता था। वात-पित्त-कफ तीनों प्रकृतियों के साथ ग्रहों का सम्बन्ध, शरीरांगों में राशियों एवं ग्रहों का विनिवेश, बालारिष्ट, आयु आदि विषयों का ज्योतिषीय विश्लेषण, रोग की स्थिति में महत्वपूर्ण उपाय प्राप्त करने के लिए मंत्र-अनुष्ठान व दान अथवा रत्न धारण, यह सब औषधियों के सहायक अंग हैं। ज्योतिष में रोगों का वर्गीकरण, लक्षण (ग्रहयोग) तथा ज्योतिष शास्त्र ग्रहों की प्रकृति, धातु, रस, अंग, अवयव, स्थान, बल एवं अन्यान्य विशेषताओं के आधार पर रोगों का निर्णय करता है, तथा निदान के ज्योतिषीय उपाय भी इस शास्त्र में बताये गये हैं। ज्योतिष शास्त्र ही एक ऐसा शास्त्र है, जिसकी सहायता से भविष्य में होने वाले किसी भी रोग की सूचना प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार रोग का पूर्व ज्ञान प्राप्त कर तथा उसके लिये ग्रहोपचार द्वारा अथवा सावधान रहकर मनुष्य उस रोग के कष्ट से किसी सीमा तक सुरक्षित रह सकता है।

ब्रह्माण्ड और मानव शरीर की समानता पर पुराणों व अन्य धर्मग्रन्थों में व्यापक विचार हुआ है। जो ब्रह्माण्ड में है, वह मानव शरीर में भी है। ब्रह्माण्ड को समझने का श्रेष्ठ साधन मानव शरीर ही है। वैज्ञानिको ने भी सावययी-सादृश्यता के सिद्धांत को इसी आधार पर निर्मित किया है। मानव शरीर व संपूर्ण समाज को एक दूसरे का प्रतिबिंब माना गया है। आज का मानव सौर मंडल को भली-भांति जानता है, इसी सौरमंडल में व्याप्त पंचतत्वों को प्रकृति ने मानव निर्माण हेतु पृथ्वी को प्रदान किया है। मानव शरीर जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु व आकाश तत्व से निर्मित हुआ है। ज्योतिष ने सौरमंडल के ग्रहों, राशियों तथा नक्षत्रों में इन तत्वों का साक्षात्कार कर प्राकृतिक सिद्धांतो को समझा है।
ज्योतिष का फलित भाग इन ग्रह, नक्षत्रों व राशियों के मानव शरीर पर पढ़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करता है, जो पंचतत्व इन ग्रह नक्षत्र व राशियों में हैं। वही मानव शरीर में भी हैं, तो निश्चित ही इनका मानव शरीर पर गहरा प्रभाव होगा ही।
वैदिक ज्योतिष ने सात ग्रहों को प्राथमिकता दी है। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि। राहु व केतु छाया ग्रह हैं। पाश्चात्य ज्योतिष जगत में युरेनस, नेप्चयुन व प्लुटो का भी महत्व है। ज्योतिष ने पंचतत्वों में प्रधानता के आधार पर ग्रहों में इन तत्वों को अनुभव किया है, सूर्य व मंगल अग्नि तत्व प्रधान ग्रह हैं। अग्नि तत्व शरीर की ऊर्जा व जीने की शक्ति का कारक है। अग्नि तत्व की कमी शरीर के विकास को अवरूद्ध कर रोगों से लड़ने की शक्ति को कम करती है। शुक्र व चंद्रमा जल तत्व प्रधान ग्रह हैं, शरीर में व्याप्त जल पर चंद्रमा का आधिपत्य है। शरीर में स्थित जल शरीर का पोषण करता है। जल तत्व की कमी आलस्य या तनाव उत्पन्न कर, शरीर की संचार व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालती है। जल व मन दोनो की प्रकृति चंचल है, इसलिये चंद्रमा को मन का कारकत्व भी प्रदान किया गया है। उदाहारणार्थ देखें:- शुक्राणु जो तरल में ही जीवित रहते हैं, और यह सृष्टि के निर्माण में व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शुक्र काम जीवन का कारक है, यही कारण है कि, शुक्र के अस्त होने पर विवाह के मुहुर्त नहीें निकाले जाते। बृहस्पति व राहु आकाश तत्व से सम्बंध रखते हैं। यह व्यक्ति के पर्यावरण व आध्यात्मिक जीवन से सीधा सम्बंध रखते हैं। बुध पृथ्वी तत्व का कारक ग्रह है। यह बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति शरीर को देता है। इस तत्व की कमी बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति पर विपरीत असर डालती है। शनि वायु तत्व प्रधान ग्रह है। शरीर में व्याप्त वायु तत्व पर इसका पूर्ण आधिपत्य है। केतु को मंगल की तरह माना गया है।
मानव जीवन के कुछ गुण मूल प्रकृति के रूप में भी मौजूद होते हैं। प्रत्येक मनुष्य में प्राकृतिक रूप से आत्मा, मन, वाँणी, ज्ञान, काम, व दुखः विद्यमान होते हैं। यह उसके जन्म समय की ग्रहस्थिति पर निर्भर करता है, कि किस मानव में इनकी प्रबलता कितनी है? विशेष रूप से प्रथम दो तत्वों को छोड़कर क्योंकि आत्मा से ही शरीर है। यह सूर्य का अधिकार क्षेत्र है। मन चंद्रमा का, बल मंगल का, वाँणी बुध का, ज्ञान बृहस्पति का, काम शुक्र व दुखः पर शनि का आधिपत्य है। आधुनिक मनोविज्ञान मानव की चार मूल प्रवृत्तियाँ मानता है- भय, भूख, यौन व सुरक्षा। भय पर शनि व केतु का आधिपत्य है। भूख पर सूर्य व बृहस्पति का, यौन पर शुक्र तथा सुरक्षा पर चंद्र व मंगल का। मानव शरीर के विभिन्न धातु तत्वों का भी बह्माण्ड के ग्रहों से सीधा सम्बंध है। शरीर की हड्ढियों पर सूर्य, रक्त की तरलता पर चंद्रमा, शरीर के माँस व गर्मी पर मंगल, त्वचा पर बुध, चर्बी पर बृहस्पति, वीर्य पर शुक्र तथा स्नायुमंडल पर शनि का अधिपत्य है। राहु एवं केतु चेतना से सम्बंधित ग्रह हैं। शरीर क्रिया-विज्ञान के अनुसार मानव शरीर त्रिदोष से पीड़ित होता है, जो विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होते हैं। वात-पित्त-कफ, सूर्य, मंगल, पित्त, चंद्रमा व शुक्र कफ, शनि वायु तथा बुध त्रिदोष; यह प्रतीकात्मक हैं। नेत्र व्यक्ति को अच्छा या बुरा देखने व समझने का शक्तिशाली माध्यम है। आंतरिक व बाह्य रहस्यों को देखने में नेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्राचीन ज्योतिष के सभी सिद्धांत योगियों व ऋषियोें ने सिर्फ नेत्रों से देखकर व योगमार्ग से अनुभव करके बनाये हैं। बिना कोई वैज्ञानिक यंत्रों की सहायता से यह अपने आप में आंतरिक व बाह्य रहस्यों में ज्योतिष के महत्व को स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त हैं। सूर्य व चंद्रमा साक्षी हैं, अतः ज्योतिष के विज्ञान या सत्य होने में कोई संदेह नही है।

रोग निर्णय-
सूर्य- जब सूर्य रोगकारक ग्रह होता है, तब निम्नलिखित रोगों की संभावना होती है, या यह समझिये कि सूर्य निम्नलिखित रोग और क्लेशों का कारक है- पित्त, उष्ण ज्वर, शरीर में जलन रहना, अपस्मार (मिर्गी), हृदय रोग (हार्ट डिजीज), नेत्र रोग, नाभि से नीचे प्रदेश में या कोख में बीमारी, चर्मरोग, अस्थि श्रुति, शत्रुओं से भय, काष्ठ अग्नि, अस्त्र या विष से पीड़ा, स्त्री या पुत्रों से पीड़ा, चोर या चैपायों से भय, सर्प से भय, राजा, धर्मराज (यम) भगवान् भूतेश (रूद्र) से भय होता है।

चन्द्रमा- चन्द्रमा निम्नलिखित रोग या कष्ट उत्पन्न करता है- निद्रा रोग या तो नींद न आयेगी या बहुत नींद आयेगी, अथवा सोते सोते चलना इसे संन्यास रोग भी कहते हैं। आलस्य, कफवृद्धि, अतिसार (संग्रहणी), पिटक, कारबंकिल, शीतज्वर (ठंड देकर जो बुखार आता है) या ठंड के कारण जो बुखार हो। सींग वाले जानवर या जल में रहने वाले जानवर मगरमच्छ आदि से भय, मंदाग्नि (भूख न लगना), अरुचि (यह भी मन्दाग्नि का एक प्रकार है) जब जठराग्नि के मंद हो जाने से भूख नहीं लगती है तो, भोजन की इच्छा नहीं होती है। स्त्रियों से व्यथा, पीलिया, खून की खराबी, जल से भय, मन की थकावट, बाल ग्रह-दुर्गा-किन्नर-धर्मराज (यम) सर्प और यक्षिणी से भय होता है।

मंगल- जब मंगल रोग और क्लेश उत्पन्न करता है- तृष्णा (बहुत अधिक प्यास लगना) प्रकोप (वायु जनित या पित्त प्रकोप), पित्तज्वर, अग्नि, विष या शस्त्र से भय, कुष्ठ (कोढ़), नेत्र रोग, गुल्म (पेट में फोड़ा या एपिन्डिसाइटीज), अपस्मार (मिर्गी), मज्जा रोग (हड्डी के अन्दर मज्जा होती है, उसकी कमी से जो रोग हो जाते हैं), खुजली, चमड़ी में खुर्दरापन, देह-भंग (शरीर का कोई भाग टूट जाना), राजा, अग्नि और चोरों से भय, भाई, मित्र, पुत्रों से कलह, शत्रुओं से युद्ध, राक्षस, गन्धर्व घोर ग्रह से भय और शरीर के ऊपर के भाग में बीमारियाँ होती हैं।

बुध- बुध नीचे लिखे हुये रोग और कलेश उत्पन्न करता है- भ्रान्ति (बहम), सोचने में अव्यवस्था हो जाना, विचार में तर्क शक्ति का आभाव, व्यर्थ की चिंता से मन उलटा-पुलटा सोचने में लग जाना, मन में मिथ्या चिन्ता, बिना कारण भय, आशंका बनी रहे, जो बात यथार्थ हो उसको भूल कर गलत बात याद रहे या गलत धारणा हो जाती है, यह सब भ्रान्ति के लक्ष्ण हैं। दुर्वचन बोलना, नेत्र-रोग, गले का रोग, नासिका रोग, वात-पित्त-कफ इस त्रिदोष से उत्पन्न ज्वर, विष की बीमारी, चर्मरोग, पीलिया, दुःस्वप्न, खुजली, अग्नि में पड़ने का डर, (लोग जातक के साथ अपरुषता का व्यवहार करते हैं), श्रम (अधिक परिश्रम वाला काम करना पड़े), गन्धर्व आदि से उत्पन्न रोग। यह सब बुध के कारण होने वाले रोग हैं।

बृहस्पति- बृहस्पति के कारण जो रोग, क्लेश आदि होते हैं- गुल्म, पेट का फोड़ा-रसोली आदि का रोग, एपिन्डसाइटीज, अंतड़ियों का ज्वर (टायफाईड़), मूच्र्छा यह सब रोग कफ के दोष से होते हैं, क्योंकि कफ का अधिष्ठाता बृहस्पति है, कान के रोग, देव स्थान सम्बंधी पीड़ा अर्थात मंदिर आदि की जायदाद लेकर मुकद्दमेबाजी, ब्राह्मणों के शाप से कष्ट, किसी खजाने, ट्रस्ट या बैंक के मामलों के कारण कलह, या अदालती कार्रवाई, विद्याधर, यक्ष-किन्नर, देवता, सर्प आदि के द्वारा किया हुआ उपद्रव, अपने गुरुओं माननीयों तथा बड़ों के साथ किया हुआ अभद्र या अशिष्ट अव्यवहार या उनके प्रति कत्र्तव्य पालन न किया हो तो उस अपराध का दंड बृहस्पति की दशा, अन्तर्दशा में होता है, यह दैवी नियम हैं।

शुक्र- शुक्र ग्रह के कारण क्या रस-रक्त की कमी, ओजक्षय के कारण पीलापन, कफ और वायु के दोष से नेत्र रोग, प्रमेह, जननेन्द्रिय आदि में रोग, पेशाब करने में कठिनता या कष्ट (उपदंश, सुजाक आदि के कारण या प्रोस्टेट ग्लैण्ड बढ़ जाने की वजह से), वीर्य की कमी, संभोग में अक्षमता, अत्यंत संभोग के कारण शरीर में कमजोरी तथा चेहरे पर कान्ति हीनता, शोष (शरीर का सूखना), योगिनी, यक्षिणी एवं मातृगण से भय, शुक्र क्लेश कारक होने से मित्रों से मित्रता भी टूट जाती है।

रोग जो शनि के कारण उत्पन्न होते हैं- वात और कफ के द्वारा उत्पन्न रोग, टांग में दर्द या लंगड़ाना, अत्यधिक श्रम के कारण थकान, भ्रांति। कुक्षि (कांख के रोग), शरीर के भीतर बहुत उष्णता हो जाती है, नौकरों से कष्ट, नौकर नौकरी छोड़ कर चले जायें या धोखा या दगा दें, भार्या और पुत्र सम्बंधी विपत्ति, अपने शरीर के किसी भाग में चोट, हृदय ताप (मानसिक चिंता), पेड़ या पत्थर से चोट, पिशाच आदि की पीड़ा, आपत्ति।

राहु ग्रह के कारण होने वाले रोग- क्लेश, रोग व चिन्ता आदि- हृदय रोग, हृदय में ताप (जलन), कोढ़, दुर्मति, भ्रांति, विष के कारण उत्पन्न हुई बीमारियाँ, पैर में पीड़ा या चोट, स्त्री, पुत्र को कष्ट या उनके कारण कष्ट, सर्प और पिशाचों से भय।

केतु क्या कष्ट उत्पन्न करता है- ब्राह्मणों और क्षत्रियों से कलह के कारण कष्ट, शत्रुओं से भय।

गुलिक के कारण होने वाले कष्ट- गुलिक को ही मान्दि भी कहते हैं। गुलिक यदि छठे घर में हो या छठे ग्रह के स्वामी के साथ हो तो शरीर में पीड़ा, किसी स्वजन की मृत्यु और प्रेत से भय होता है।

रोगों के कुछ अन्य कारण हैं-
1. यदि चन्द्रमा और सूर्य बारहवें या दूसरे स्थान में हों, और उनको मंगल और शनि देखते हों तो, नेत्र रोग होता है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि यदि सूर्य, चन्द्र दोनों एक साथ या एक दूसरे के घर में हों, और उनको मंगल और शनि दोनों पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो, संभवतः उस आंख से दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जायेगा। दूसरा स्थान दाहिने नेत्र का है। इस कारण दाहिने नेत्र में रोग होगा। ऊपर जो योग बताया गया है, वह यदि बारहवें घर में होगा तो बायें नेत्र की दृष्टि नष्ट होगी। इसी प्रकार यदि सूर्य और चन्द्रमा इन दोनों में से कोई एक-दूसरे या बारहवें घर में बैठा हो, और उसको शनि या मंगल देखते हों तो, दूसरे में सूर्य या चन्द्र बैठने से दाहिने नेत्र का रोग होगा, और बारहवें घर में सूर्य या चन्द्र बैठने से और उसको मंगल या शनि के देखने से बायें नेत्र में रोग होगा। दूसरे और बारहवें घर को नेत्र स्थान कहते हैं। नेत्र स्थान में बैठे हुये सूर्य या चन्द्र को केवल मंगल या केवल शनि देखें तो थोड़ा कष्ट और यदि मंगल और शनि दोनों देखें तो, विशेष कष्ट समझाना चाहिये। यदि नेत्र स्थान में सूर्य, चन्द्र न भी बैठे हों अन्य पाप ग्रह बैठे हों या पाप ग्रह की दृष्टि भी हो तो भी नेत्र की दृष्टि में कमी हो जाती है।

2. यदि तीसरे और ग्यारहवें घर और बृहस्पति-मंगल शनि से युक्त या दृष्ट हों तो, कान का रोग होता है। तीसरे से दाहिने कान का विचार किया जाता है, ग्याहरवें से बांये कान का। सुनना (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन पांचो गुणों में से) शब्द से सम्बंध रखता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश यह पांच तत्त्व हैं। सूर्य और मंगल ग्रह का अग्नि तत्त्व, चन्द्रमा और शुक्र का जल तत्त्व, बुध का पृथ्वी तत्त्व, शनि का वायु तत्त्व और बृहस्पति का आकाश तत्त्व है। शब्दगुण का अधिष्ठाता आकाश तत्त्व है। आकाश तत्त्व बृहस्पति से संबंधित होने के कारण यह कहा गया है कि, यदि बृहस्पति, मंगल, शनि से (मंगल से या शनि से या शनि, मंगल दोनों से) पूर्ण दृष्टि से देखा जाता हो, या मंगल, शनि के साथ हो तो कान के रोग अथवा बहरापन होता है। यहाँ तारतम्य से यह विचार कर लेना चाहिये कि तृतीय और एकादश घर जितने निर्बल होंगे, और जितनी अधिक पाप दृष्टि इन दोनों पर पड़ेगी-या जितने अधिक पाप ग्रहों के साथ ये तथा बृहस्पति (शब्द गुण का अधिष्ठाता होने के कारण), होंगे उतना ही तीव्र (अधिक) कान का रोग होगा। मंगल पित्त प्रधान है, इसलिये मंगल की युति या दृष्टि पित्त के कारण या फोड़ा-फुंसी, रक्त स्राव आदि का रोग कान में करेगा। शनि वायु प्रधान है, इस कारण, शनि जब कान के रोग उत्पन्न करेगा तो वात के कारण। वात, पित्त, कफ यही तीन दोष आयुर्वेद के अनुसार त्रिदोष हैं। जिनके कुपित हो जाने से या असांमजस्य से शरीर में रोग होते हैं।

(3) मंगल पंचम में होने से उदर (पेट के विकार) करता है। इनमें से कोई भी उग्र ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु पंचम में होने से पेट में पीड़ा करता है, पांचवा स्थान पेट का है।

(4) शुक्र यदि सप्तम या अष्टम स्थान में हो तो वीर्य सम्बंधी प्रमेहादि या मूत्ररोग करता है।

(5) यदि षष्ठेश या अष्टमेश, सप्तम में या षष्ठेश अष्टम में हो तो, गुदा रोग होता है। सप्तम स्थान गुह्य जननेन्द्रिय प्रदेश, अष्टम गुदा का स्थान है। यहाँ पाप ग्रह बैठे हों, या दुःस्थान (छठे आठवें) के स्वामी बैठे हों, तो शरीर के उस भाग में रोग उत्पन्न करते हैं।
यदि छठे या आठवें घर में सूर्य हो तो, ज्वर (बुखार) का भय, यदि छठे या आठवें घर मंे मंगल या केतु हों तो व्रण (घाव, चोट, जख्म), छठे या आठवें घर में शुक्र हो तो, जननेन्द्रिय प्रदेश में रोग (उदाहरण के लिये मूत्र रोग, वीर्य रोग, सुजाक, आतशक आदि), यदि छठे या आठवें घर में बृहस्पति हो तो (यक्ष्मा, टी. बी. आदि), यदि छठे या आठवें शनि हो तो वात (वायु रोग), यदि छठे या आठवें मंगल राहु हों, या उस पर मंगल की दृष्टि हो तो पिटिका (अदीठ आदि फोड़ा या सामान्य फोड़ा), यदि छठे या आठवें घर में चन्द्रमा और शनि एक साथ हों तो गुल्म (तिल्ली के कारण तथा तिल्ली बढ़ जाने के कारण पेट में पसलियों के नीचे-दाहिनी ओर यकृत (जिगर) और बाँयी और प्लीहा (तिल्ली होती है), यदि कृष्ण पक्ष का क्षीण चन्द्रमा पाप ग्रह के साथ हो, और जिस राशि में छठे या आठवें हों तो, अम्बुर्द रोग (पेट या शरीर के अन्य भाग में पानी भर जाना, जलोदर) या क्षय (यक्ष्मा टी. बी.) का रोग होता है।जो ग्रह अष्टम में होते हैं, या अष्टम को देखते हैं, उनमें जो बलवान होता है, उस ग्रह के रोग से जातक की मृत्यु होती है। आठवाँ आयु का स्थान है। ऊपर बताया जा चुका है कि, कौन-सा ग्रह किस रोग का कारक है। यदि आठवें भाव में ग्रह हों, या ग्रह देखते हों, तब किस प्रकार के रोग से मृत्यु होगी यह ऊपर बताया गया है, परन्तु आठवें घर में कोई ग्रह न हो, और न कोई ग्रह आठवें घर को देखता हो; ऐसी स्थिति में किस रोग से मृत्यु होगी? आठवें घर के जो रोग बताये गये हैं, उनसे या आठवें घर का मालिक जिस राशि या भाव में बैठा हो, उसके दोष से, उदाहरण के लिये आठवें घर का मालिक पांचवे घर में हो तो, उदर (पेट के) रोग से, चैथे घर में बैठा हो तो, हृदय रोग से यदि अष्टमेश सूर्य या मंगल हो तो, पित्तज रोग से, शनि हो तो वात रोग से इत्यादि। जन्म लग्न (द्रेष्काण) से जो 22वां द्रेष्काण होता है, उसका स्वामी भी मृत्यु कारक होता है। ऊपर जो योग अष्टम भाव संबंधी बताये गये हैं कि, वह लागू न हों तो जन्म द्रेष्काण से जो 22वां दे्रष्काण हो उस 22वें द्रेष्काण का जो स्वामी हो, उस स्वामी के जो रोेग हों, उनमें से किसी रोग के कारण मृत्यु होती है। जो ग्रह आठवें घर में हो, या आठवें घर को देखते हैं, उन ग्रहों में जो बलवान हो, उसके रोग या दोष से मृत्यु होती है। यदि कोई ऐसा ग्रह न हो, तो अष्टम भाव में जो राशि हो उसके रोग के कारण मृत्यु होती है।

सूर्य- अग्नि, उष्ण ज्वर, पित्त या शस्त्र से मृत्यु करता है।

चन्द्रमा- विषूचिका (हैजा), जलोदर (इस रोग में हाथ, पैर या अन्य स्थान में पानी इकट्ठा हो जाता है) जल की बीमारियाँ (प्ल्यूरेसी या अन्य बीमारी जिसमें जल कहीं इकट्ठा हो जावे, यक्ष्मा, टी. बी. आदि रोगों से आयु समाप्त करता है।)

मंगल- जलने से (अग्नि प्रकोप, बिजली आदि भी इसी के अन्तर्गत आ जाती है), रक्त विकार या रक्त बहने से, क्षुद्र अभिचार (जादू, टोना, मारण आदि के अनुष्ठानों आदि) के कारण, मृत्यु करता है।

बुध- पाण्डु (पीलिया) या रक्त की कमी, भ्रांति (स्नायु संबंधी विकार) आदि रोगों से जातक के प्राण हरण करता है। रक्त का कम बनना जिससे ‘पाण्डु’ आदि रोग होते हैं, यकृत की खराबी इत्यादि।

बृहस्पति- कफ का अधिष्ठाता है, और कफ से मृत्यु करता है। इसमें विशेष कष्ट नहीं होता।

शुक्र- जब प्राण हरण करता है, तो इसमें कारण अति स्त्री प्रसंग, वीर्य की कमी से शरीर निस्तेज हो जाना होता है। धातुक्षय इत्यादि बीमारी का शिकार होना, मूत्र रोग, जननेन्द्रिय सम्बंधी रोग शुक्र के अन्तर्गत आते हैं।

शनि- सन्निपात, वातरोग (लकवा आदि के द्वारा) आदि से मृत्यु करता है।

राहु- कुष्ठ (कोढ से) या, आंत्रशोथ, फूड प्रोसेसिंग विष या जम्र्स (रोग कीटाणु) युक्त वस्तु खाने से, सर्प आदि विषैले जन्तुओं के काटने से, जिस रोग में शरीर पर ददोड़े, फुंसियाँ हो जाते हैं, उसमें मृत्यु करता है।

केतु- मृत्यु का कारण दुर्मरण होता है, दुर्मरण का अर्थ है, अपमृत्यु (जैसा आकस्मिक मोटर, रेल आदि से, मकान के गिरने से, कुचल जाने से, कोई कर दे, यह सब दुर्मरण के उदाहरण हैं)। शत्रुओं के विरोध से, कीड़ों या शरीर में किसी कीड़े या जन्तु काटने से सेप्टिक हो जाने या भोजन आदि के द्वारा विषाक्त कीटाणु शरीर में प्रवेश कर जायें। कुण्डली के आठवें घर से जो दोष या रोग सूचित हों, उनसे (इसमें आठवें घर का मालिक, आठवें, घर को जो देखते हैं, वे सभी आ जाते हैं, या आठवें घर का मालिक जिस नवांश में बैठा हो, उस नवांश राशि के रोग स्वाभाविक हैं-

मेष- पित्त के कारण ज्वर, उष्णता (गर्मी के कारण उत्पन्न रोग लू लगना आदि, जठाराग्नि, पेट में भोजन पचाने वाली जो अग्नि है) के रोग।

वृष- त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के उत्पात से, शस्त्र से, अग्नि से जलने के कारण।

मिथुन- श्वास की बीमारी, दमा, उष्ण शूल (पित्त के कारण जो तीव्र दर्द होते हैं)।

कर्क- पागलपन, उन्माद, वात के कारण रोग, अरुचि (भोजन में अरुचि आदि लक्ष्ण वाले रोग, ऐनोरेक्सिया)।

सिंह- जंगली पशुओं के कारण, मृत्यु, ज्वर, स्फोट (फोड़ा) शत्रुओं के कारण।

कन्या- स्त्रियों के कारण, गुप्तरोग (मूत्रेन्द्रिय या जननेन्द्रिय सम्बंधी रोग), ऊपर से गिरने से।

तुला- मस्तिष्क ज्वर (ब्रेन फीवर) सन्निपात।

वृश्चिक- प्लीहा (तिल्ली) संग्रहणी, पाण्डु (पीलिया) रोग।

धनु- पेड़ के कारण (पेड़ से गिरने, या अपने ऊपर पेड़ गिर जाने से), जल लकड़ी के कारण (लकड़ी चीरते समय, या लकड़ी की चोट से), शस्त्र से।

मकर- शूल (पेट का दर्द, एपिण्डीसाइटिज आदि, पेट में फोड़ा, आदि, कोलिक दर्द) अरुचि, मंदाग्नि या बुद्धिभ्रम (नर्वस स्नायु मंडल की अव्यवस्था या रोग के कारण संयत विचार करने की शक्ति जब नष्ट हो जाती है) आदि से।

कुम्भ- खांसी, ज्वर, क्षय।

मीन- पानी से, पानी में डूबने से, जल रोगों से।
यदि आठवें घर का मालिक पापग्रह हो, और आठवें घर में पापग्रह बैठे भी हों (या एक भी पापग्रह अष्टम में हो) तो शस्त्र, अग्नि, व्याघ्र, सर्प आदि की पीड़ा होती है। यदि केन्द्र में बैठे हुये दो पाप ग्रह एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हों, तो सरकार की नाराजगी से, शस्त्र, विष, अग्नि आदि के कारण मृत्यु होती है।
यदि बारहवें घर का मालिक सौम्य ग्रह की राशि या सौम्य ग्रह के नवांश में हो, या सौम्य ग्रह के साथ बैठा हो, अथवा बारहवें घर में सौम्य ग्रह बैठा हो, और बारहवें घर का मालिक भी सौम्य ग्रह हो तो, मरते समय विशेष क्लेश या पीड़ा नहीं होती। यदि उसे उल्टा हो अर्थात बाहरवें घर का मालिक क्रूर ग्रह की राशि या क्रूर ग्रह के नवांश में बैठा हो या क्रूर ग्रह के साथ हो, अथवा बारहवें घर में क्रूर ग्रह बैठा हो, बारहवें घर को क्रूर देखते हों तो कष्ट, पीड़ा क्लेश के साथ मृत्यु होती है। कफ-वात-पित्त तीनों प्रकृतियों के साथ ग्रहों का सम्बन्ध, शरीरांगों में राशियों एवं ग्रहों का विनिवेश, बालारिष्ट, आयु आदि विषयों की प्राप्ति, रोग की स्थिति में महत्वपूर्ण उपाय प्राप्त हैं। ज्योतिष में रोगों का वर्गीकरण, लक्षण (ग्रहयोग) तथा ज्योतिष शास्त्र ग्रहों की प्रकृति, धातु, रस, अंग, अवयव, स्थान, बल एवं अन्यान्य विशेषताओं के आधार पर रोगों का निर्णय करता है, तथा निदान के ज्योतिषीय उपाय भी बताये गये हैं। लेख के अंत में यही कहना चाहूंगा कि ज्योतिष शास्त्र ही एक ऐसा शास्त्र है, जिसकी सहायता से भविष्य में होने वाले किसी भी रोग की सूचना प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार रोग का पूर्व ज्ञान प्राप्त कर तथा उसके लिये ग्रहोपचार द्वारा अथवा सावधान रहकर मनुष्य उस रोग के कष्ट से किसी सीमा तक बच सकता है।

मानव शरीर और ज्योतिष-
ब्रह्माण्ड और मानव शरीर की समानता पर पुराणों व अन्य धर्मग्रन्थों में व्यापक विचार हुआ है। जो ब्रह्माण्ड में है, वह मानव शरीर में भी है। ब्रह्माण्ड को समझने का श्रेष्ठ साधन मानव शरीर ही है। वैज्ञानिको ने भी सावययी-सादृश्यता के सिद्धांत को इसी आधार पर निर्मित किया है। मानव शरीर व संपूर्ण समाज को एक दूसरे का प्रतिबिंब माना गया है।

आज का मानव सौर मंडल को भली-भांति जानता है, इसी सौरमंडल में व्याप्त पंचतत्वों को प्रकृति ने मानव निर्माण हेतु पृथ्वी को प्रदान किया है। मानव शरीर जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु व आकाश तत्व से निर्मित हुआ है। ज्योतिष ने सौरमंडल के ग्रहों, राशियों तथा नक्षत्रों में इन तत्वों का साक्षात्कार कर प्राकृतिक सिद्धांतो को समझा है। ज्योतिष का फलित भाग इन ग्रह, नक्षत्रों व राशियों के मानव शरीर पर पढ़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करता है। जो पंचतत्व इन ग्रह नक्षत्र व राशियों में हैं। वही मानव शरीर में भी हैं, तो निश्चित ही इनका मानव शरीर पर गहरा प्रभाव होगा ही।

वैदिक ज्योतिष ने सात ग्रहों को प्राथमिकता दी है। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि। राहु व केतु छाया ग्रह हैं। पाश्चात्य ज्योतिष जगत में युरेनस, नेप्चयुन व प्लुटो का भी महत्व है। ज्योतिष ने पंचतत्वों में प्रधानता के आधार पर ग्रहों में इन तत्वों को अनुभव किया है, सूर्य व मंगल अग्नि तत्व प्रधान ग्रह हैं। अग्नि तत्व शरीर की ऊर्जा व जीने की शक्ति का कारक है। अग्नि तत्व की कमी शरीर के विकास को अवरूद्ध कर रोगों से लड़ने की शक्ति को कम करती है। शुक्र व चंद्रमा जल तत्व प्रधान ग्रह हैं। शरीर में व्याप्त जल पर चंद्रमा का आधिपत्य है। शरीर में स्थित जल शरीर का पोषण करता है। जल तत्व की कमी आलस्य या तनाव उत्पन्न कर, शरीर की संचार व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालती है। जल व मन दोनो की प्रकृति चंचल है, इसलिये चंद्रमा को मन का कारकत्व भी प्रदान किया गया है। उदाहारणार्थ देखें शुक्राणु जो तरल में ही जीवित रहते हैं, और यह सृष्टि के निर्माण में व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शुक्र काम जीवन का कारक है, यही कारण है कि, शुक्र के अस्त होने पर विवाह के मुहुर्त नहीें निकाले जाते। बृहस्पति व राहु आकाश तत्व से सम्बंध रखते हैं। यह व्यक्ति के पर्यावरण व आध्यात्मिक जीवन से सीधा सम्बंध रखते हैं। बुध पृथ्वी तत्व का कारक ग्रह है। यह बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति शरीर को देता है। इस तत्व की कमी बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति पर विपरीत असर डालती है। शनि वायु तत्व प्रधान ग्रह है। शरीर में व्याप्त वायु पर इसका पूर्ण आधिपत्य है। केतु को मंगल की तरह माना गया है।
मानव जीवन के कुछ गुण मूल प्रकृति के रूप में भी मौजूद होते हैं। प्रत्येक मनुष्य में प्राकृतिक रूप से आत्मा, मन, वाँणी, ज्ञान, काम, व दुखः विद्यमान होते हैं। यह उसके जन्म समय की ग्रहस्थिति पर निर्भर करता है, कि किस मानव में इनकी प्रबलता कितनी है? विशेष रूप से प्रथम दो तत्वों को छोड़कर क्योंकि आत्मा से ही शरीर है। यह सूर्य का अधिकार क्षेत्र है। मन चंद्रमा का, बल मंगल का, वाँणी बुध का, ज्ञान बृहस्पति का, काम शुक्र व दुखः पर शनि का आधिपत्य है।

आधुनिक मनोविज्ञान मानव की चार मूल प्रवृत्तियाँ मानता है- भय, भूख, यौन व सुरक्षा। भय पर शनि व केतु का आधिपत्य है। भूख पर सूर्य व बृहस्पति का, यौन पर शुक्र तथा सुरक्षा पर चंद्र व मंगल का। मानव शरीर के विभिन्न धातु तत्वों का भी बह्माण्ड के ग्रहों से सीधा सम्बंध है। शरीर की हड्ढियों पर सूर्य, रक्त की तरलता पर चंद्र्रमा, शरीर के माँस व गर्मी पर मंगल, त्वचा पर बुध, चर्बी पर बृहस्पति, वीर्य पर शुक्र तथा स्नायुमंडल पर शनि का अधिपत्य है। राहु एवं केतु चेतना से सम्बंधित ग्रह हंै। शरीर क्रिया-विज्ञान के अनुसार मानव शरीर त्रिदोष से पीड़ित होता है, जो विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होते हैं। वात, पित्त व कफ! सूर्य, मंगल, पित्त, चंद्रमा व शुक्र कफ, शनि वायु तथा बुध त्रिदोष; यह प्रतीकात्मक हैं। नेत्र व्यक्ति को अच्छा या बुरा देखने व समझने का शक्तिशाली माध्यम है। आंतरिक व बाह्य रहस्यों को देखने में नेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्राचीन ज्योतिष के सभी सिद्धांत योगियों व ऋषियोें ने सिर्फ नेत्रों से देखकर व योगमार्ग से अनुभव करके बनाये हैं। बिना कोई वैज्ञानिक यंत्रों की सहायता से यह अपने आप में आंतरिक व बाह्य रहस्यों में ज्योतिष के महत्व को स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त हैं। सूर्य व चंद्रमा साक्षी हैं, अतः ज्योतिष के विज्ञान या सत्य होने में कोई संदेह नही है।

यह थे, लेखक की पुस्तक :- “रोग एवं ज्योतिष” के कुछ अंश।

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संतान का योग

Dr.R.B.Dhawan

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“संतान होगी या नही?” इस विषय पर ज्योतिष शास्त्र में महर्षि पराशर ने बहुत स्टीक ग्रह गणना पद्धति प्रस्तुत की है। पुरुष के लिए “बीज स्फुट” और स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट”। हालांकि इस ग्रह गणना के परिणाम कोई अंतिम और निर्णायक नहीं हो सकते, किन्तु फिर भी, संतानोत्पत्ति के प्रश्न का उत्तर काफी हद तक स्पष्ट हो जाता है। वृहदपराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर कहते हैं- पुरूष का शुक्राणु (वीर्य) संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा अयोग्य! और यदि योग्य है, तो उत्तम है, या मध्यम श्रेणी का‌ है! इस प्रश्न का उत्तर बीज स्फुट गणना से देखना चाहिए-।

इसी प्रकार स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट” ग्रह गणना से अनुमान हो सकता है कि स्त्री का गर्भाशय संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा उत्तम या मध्यम है, या फिर अयोग्य है। महर्षि ने वृहद पराशर होरा शास्त्र में उल्लेख किया है कि जिस प्रकार उपजाऊ भूमि में उत्तम बीज बोया जाये तो अच्छी फसल होती है, मध्यम भूमि में उत्तम बीज से मध्यम श्रेणी की फसल होती है, और मध्यम भूमि में मध्यम श्रेणी का बीज परिणाम इसी अनुसार होता है। और इसी प्रकार बंजर भूमि में कितना ही उत्तम बीज बोने से परिणाम शून्य ही होता है। और मध्यम बीज से भी परिणाम शून्य होता है, इसी प्रकार स्त्री के गर्भाशय को महर्षि ने क्षेत्र बताते हुए कहा है कि, इस ज्योतिषीय गणना पद्धति से देखना चाहिए कि स्त्री का गर्भाशय स्वस्थ (गर्भ धारण योग्य) है या नहीं।

डाॅक्टर विभिन्न प्रकार कि जाँच करने के बाद भी जो नही बता पाते, वो ज्योतिषी चंद मिनटों मे गणना करके बता सकते हैं। दम्पत्ती के जीवन मे संतान होने या ना होने के विचार के लिये ज्योतिष मे पंचम भाव, पंचमेश, संतान कारक बृहस्पति आदि पर विचार करने के ज्योतिषीय नियम बताये गये हैं, किन्तु महर्षि पाराशर ने संतान के विषय में एक क्रान्तिकारी ज्योतिषीय सूत्र दिया है, सूत्र यह है- पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट कि गणना, तथा स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना करना। डाॅक्टर अनेक प्रकार कि जाँच करने के बाद भी यह ठीक से निर्णय नही कर पाते हैं कि समस्या पुरूष के शुक्राणुओं मे है, या स्त्री के गर्भाशय में। डाॅक्टर अनेक बार शारीरिक तौर पर पति-पत्नी को फिट बताते हैं, लेकिन फिर भी संतान के जन्म में बाधा उत्पन्न हो जाती है। लेकिन बीज स्फुट ओर क्षेत्र स्फुट कि गणना करके नि:संतान दंपत्ति को यह स्पष्ट रूप से बताया जा सकता है कि, रोग किसके शरीर में है।

क्या मेडिकल कि सहायता से संतान का जन्म हो सकेगा? बीज के वृक्ष बनने के लिये उसे उपजाऊ भूमि कि आवश्यकता होती है, अगर भूमि बंजर है तो बीज वृक्ष ना बन सकेगा। स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना गर्भ के ठीक भूमि कि तरह उपजाऊ, बंजर या मध्यम होने का पता लगाने जैसा है। अगर स्त्री कि जन्मकुंडली मे क्षेत्र स्फुट सही आता है ओर पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट मध्यम आता हो या सही नही आता है तो मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय वहाँ निःसंतान दंपत्ति कि सहायता कर सकते है। लेकिन क्षेत्र स्फुट के खराब होने पर मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय सहायक नही हो पाते है।

आज के समय मे चिकित्सा विज्ञान के साथ यदि ज्योतिष विज्ञान को जोड़कर कार्य किया जाये तो चिकित्सा विज्ञान ओर अधिक सरल बन सकेगा। कुंडली में संतानोत्पत्ति और संतान सुख के लिए विशेष तौर पर पंचम भाव से देखा जाता है, किंतु कुंडली विश्लेषण करते समय हमें बहुत से तथ्यों पर ध्यान देना बहुत ही आवश्यक है। संतान के सुख-दु:ख का विचार सप्तमेश, नवमेश, पंचमेश तथा गुरु से किया जाता है। नवम स्थान जातक का भाग्य स्थान भी है, और पंचम स्थान से पांचवा स्थान भी होता है, इस कारण भी नवमेश पर दृष्टि रखना बतलाया गया है। बृहस्पति संतान और पुत्र का कारक है, अतएव बृहस्पति पर दृष्टि रखना आवश्यक है।

इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पुराने शास्त्रों में एक मंत्र लिखा है, कारकों भावः नाशयः इसका अर्थ यह हुआ कि जिस भाव का जो कारक होता है, वह उस भाव में स्थित हो तो, उस भाव का नाश करता है। इसलिए गुरु यदि पंचम भाव में हो तो बहुत बार देखा गया है कि संतान संबंधी चिंता व कष्ट रहते हैं। लग्न, चंद्रमा और बृहस्पति से पंचम भाव यदि पाप ग्रहों से युत अथवा दृष्ट हो, शुभ ग्रहों से युति या दृष्ट ना हो तो तीनो पंचम भाव पापग्रहों के मध्य पापकर्तरी स्थित हो तथा उनके स्वामी त्रिक 6 8 12 वे भाव में स्थित हो तो, जातक संतानहीन होता है। फलित शास्त्र के सभी ग्रंथो में इसका उल्लेख मिलता है।

अनेक प्राचीन विज्ञजनों ने यह लिखा है कि, यदि पंचम भाव में वृषभ, सिंह, कन्या अथवा वृश्चिक राशि हो तो, अल्प संतति होती है, या दीर्घ अवधि के बाद संतान लाभ मिलता है। ज्योतिष में हर विषय पर बहुत ही विस्तृत और बहुत ही बड़ा साहित्य मिलता है, और अनेक प्रकार के उपाय या विधियां दी हुई हैं, लेकिन मुख्य तौर पर कुछ सूत्र हैं, जिनके आधार पर हम संतान योग को अच्छी तरह से पता लगा सकते हैं, इसमें सबसे बड़ा सूत्र है बीज स्फुट और क्षेत्र स्फुट। बीज स्फुट से तात्पर्य पुरुष की कुंडली के ग्रहो की स्तिथि से है। अगर कोई फसल बोई तो बीज हमको उत्तम चाहिए यदि बीज अच्छा नहीं होगा तो कभी भी फसल अच्छी नहीं होगी। इसी प्रकार क्षेत्र स्फुट मतलब हम खेत से भी समझ सकते हैं,‌ यदि खेत अच्छा नहीं होगा तो कितने भी अच्छे बीज बो देवें उसके अंदर फसल अच्छी नहीं होगी, अतः पुरुष की कुंडली में बीज स्फुट और स्त्री की कुंडली मे क्षेत्र स्फुट की गणना बतलाई गयी है, जिससे भी संतान योग का अंदाज लगाया जा सकता है।

बीज स्फुट की गणना में हम पुरुष की कुंडली में सूर्य गुरु और शुक्र के भोगांश को जोड़कर एक राशि निकालते हैं, यदि वह राशि विषम होगी और नवांश में भी उसकी विषम में स्थिति होगी तो बीज शुभ होगा, और साथ ही यदि एक सम और दूसरा विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों सम राशियां होगी तो, अशुभ फल होंगे, और बीज अशुभ होगा।
स्त्री की कुंडली में क्षेत्र स्फुट की गणना में हमें चंद्रमा मंगल और गुरु के भोगांशों को जोड़ना पड़ेगा, और भोगांशो को जोड़ने के बाद जो राशि आएगी वह राशि यदि सम होगी और नवमांश में भी उसकी सम स्थिति होगी तो, क्षेत्र स्फुट अच्छा होगा साथ ही एक सम व दूसरी विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों विषम हुई तो अशुभ फल होंगे व स्त्री सन्तान उत्पन्न करने में सक्षम नही होगी।

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शनिदेव

शनि ग्रह हमेशा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं :-

Dr.R.B.Dhawan

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शनि ग्रह हमेशा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं होता। वह बुरे फलों के साथ-साथ अच्छा फल भी देता है। वास्तव में शनि के बारे में जितना भय और जितनी गलतफहमियां हैं उतना खराब वह है नहीं। काल पुरुष की जन्म कुण्डली में शनि कर्मेश दशम भाव का स्वामी एवं लाभेश एकादश भाव का स्वामी होकर स्थित है। कर्मेश होने के साथ-साथ लाभेश भी होने के कारण कर्म का फल है। नवम भाव भाग्य है। कर्म के फल को भाग्य भी कहते हैं। कर्म के व्यय होने पर भाग्य बनता है। कर्म का अगला भाव लाभ तथा कर्म का व्यय भाव भाग्य बनाता है। यदि कर्म अच्छा है तो भाग्य भी अच्छा होगा। यदि कर्म ही नहीं तो लाभ तथा भाग्य कहां से आएंगे। भाग्य भाव धर्म का भी है। अर्थात् कर्म को धर्म पर भी व्यय करें तो भाग्य जागृत होगा। शनि कर्मेश होने के कारण भाग्य विधाता भी है। वही एकादश भाव का स्वामी होकर कर्म फलों का लेखा-जोखा या वेलेन्स शीट के अनुसार न्याय करता है।

कुछ लोग शनि ग्रह को खोटा, बुरा, पापी ग्रह मानते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि भले को छोड़िए, खोटे ग्रह जप व दान। अर्थात पापी ग्रहों को ज्यादातर लोग पूजा, अर्चना, जप, तप से शांत करते हैं। उससे भयभीत व त्रस्त रहते हैं। जरा सा किसी को शनि के दुष्प्रभाव का ज्ञान होते ही वह शनि के दुष्प्रभाव के उपचार हेतु पूजा, अर्चना, जप, तप में लग जाता है। मेरे अनुभव के अनुसार शनि जब साढ़े साती से किसी को प्रभावित करता है तो उस को नया परिष्कृत रूप अपनी साढे़साती के बाद देता है। जितना उसको दंडित करता है। उससे ज्यादा देकर जाता है। अधिकतर शनि की साढ़े साती बरबाद हुए लोगों को जाते-जाते फिर से उन्हें धो-पोछकर चमकाकर जाती है। उनमें लगी जंग को छुड़ा जाती है। भले बुरे के भेद से शनि कोमल व कठोर भी है। शनि दोनों तरह के फल देता है। शनि ही इस भू मंडल का न्यायधीश है। शनि ग्रह को काल भैरव अर्थात् न्याय का स्वामी माना गया है। वह अपने दो सहयोगी ग्रहों राहु एवं केतु की सहायता से न्याय करता है। लेकिन जब जरूरत होती है तो सेनापति मंगल की भी सहायता लेता है। तब रक्तप्रद दंड का निधान करता है। तो सेनापति मंगल की सहायता से दंडित कर अंग-भंग करने का आदेश देता है

वैद्यनाथ के अनुसार- लग्नस्थ शनि का जातक कई व्याधियों से ग्रस्त होता है। उसका कोई ना कोई अंग अवश्य दोष युक्त होता है। जबकि स्वगृही या उच्च का शनि जातक को यश वैभव से संपन्न करता है। शनि शुभ संयोग युक्त हो तो जातक संकल्पवान स्वयं परिश्रमी, शनैः शनैः उन्नतिशील, पराक्रमी, विजयी तथा दृढ़ निश्चयी होता है। तथा अथक प्रयास से उच्च पद, सफलता अर्जित करता है। अशुभ संयोग से शनि नीच कर्मरत, वह स्वयं कार्य बिगाड़ता है। अविश्वासी, भयभीत, इर्शालु, अविवेकी, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाला बना देता है। दूरस्थ ग्रह शनि के प्रभाव से एकांत आलसी तथा उदासीन का स्वाभाविक लक्षण होता है।

अरूण सहिंता के अनुसार- सूर्य को विष्णु, चन्द्रमा को शिव, मंगल को हनुमान, स्वामी कार्तिकेय षडानन, बुध को दुर्गा, गुरु को ब्रह्मा, शुक्र को लक्ष्मी जी, शनि को भैरव या काल भैरव राहु को सरस्वती, गायत्री तथा केतु को गणेश माना गया है। ये देवता तथा देवियां ही जातक की कुण्डली में कर्माें के अनुसार राशियों और भावों में आकर शुभ व अशुभ फल प्रदान करते हैं। इसी प्रकार 28 नक्षत्र होते हैं।

नक्षत्रों के नाम :- 1. अश्विनी, 2. भरणी, 3. कृत्तिका, 4. मृगशिरा, 6. आद्र्रा, 7. पुनर्वसु, 8. पुष्य, 9. आश्लेषा, 10. मघा, 11. पूर्वफाल्गुनी, 12. उत्तरफाल्गुनी, 13. हस्त, 14. चित्रा, 15. स्वाति, 16. विशाखा, 17. अनुराधा, 18. ज्येष्ठा, 19. मूल, 20. पूर्वाषाढ़ा, 21. उत्तराषाढ़ा, 22. श्रवण, 23. धनिष्ठा, 24. शतभिषा, 25. पूर्वाभाद्रपद, 26. उत्तराभाद्रपद, 27. रेवती। 28. अभिजित। इन नक्षत्रों के देवता नक्षत्रों तथा ग्रह क्र. नक्षत्र न. स्वामी क्र. नक्षत्र न. स्वामी देवता :-

1. अश्विनी अ. कुमार केतु, 2. भरणी काल शुक्र, 3. कृतिका अग्नि सूर्य, 4. रोहिणी ब्रह्मा चन्द्रमा, 5. मृगशिरा चन्द्रमा मंगल, 6. आद्र्रा रूद्र राहु, 7. पुनर्वसु अदिति बृहस्पति, 8. पुष्य बृहस्पति शनि, 9. आश्लेषा सर्प बुध, 10. मघा पितर केतु, 11. पू.फा भग शुक्र, 12. उ.फा. अर्यमा सूर्य, 13. हस्त सूर्य चन्द्रमा, 14. चित्रा विश्वकर्मा मंगल, 15. स्वाती पवन राहु, 16. विशाखा शुक्राग्नि बृहस्पति, 17. अनुराधा मित्र शनि, 18. ज्येष्ठा इन्द्र बुध, 19. मूल निर्ऋति केतु, 20. पू.आ जल शुक्र, 21. उ.आ. विश्वेदेव सूर्य, 22. श्रवण विष्णु चन्द्रमा, 23. धनिष्ठा वसु मंगल, 24. शतभिषा वरूण राहु, 25. पू.भा. अजैकपाद बृहस्पति, 26. उ.भा. अहिर्बुध्न्य शनि, 27. रेवती पू.षा. बुध, 28. अभिजित ब्रह्मा केतु।

अपने नक्षत्रों में ग्रहों अर्थात् देवताओं के गोचर (आगमन) पर एक दूसरे को प्रभावित कर फल प्रदान करते है। भृगु संहिता के अनुसार- लगनस्थ शनि हो तो जातक शत्रु का नाश करने वाला, समृद्ध, धन धान्य पुत्र, स्थूल शरीर दूर दृष्टि वाला एवं वात से पीड़ित होता है। उच्चस्थ शनि जातक को प्रधान या नगर का मुखिया बनाता है। मकरस्थ या कुम्भस्त शनि जातक को पैतृक धन दौलत का वारिस बनाता है। वृहद पवन में वाला बताया है। यदि शनि मूल त्रिकोणस्थ हो तो जातक को राष्ट्र प्रमुख या प्रांत प्रमुख की प्रतिष्ठा प्रदान करता है। जातक पारिजात में दुर्बल शनि हो तो जातक दुष्कर्मों का फल भोगता है। श्वास रोग, शरीर पीड़ा, पार्श्व, पार्श्व पीड़ा, गुदृ विकार, हृदय ताप, कंपन, संधि रोग तथा वात विकार से पीड़ित होता है। कुछ राशियों में जयदेव ने अच्छा बताया है। धनु, मीन, मकर, तुला, कुम्भ, राशि का शनि पांडित्य, ऐश्वर्य तथा सुदर्शन शरीर, कामावेग एवं आलसी होता है।

वारहमिहिर के अनुसार- स्वगृही शनि,उच्च मीन, धनु, मकर, तुला, कुम्भ, राशि गत शनि श्रेष्ठ फल प्रदान करना है। ऐसे जातक ज्ञान शिरोमणि, सुदर्शन, अग्रणी, नरपति एवं समृद्ध होते हैं।

मानसागरी के अनुसार- मकर तथा कुम्भ राशि लग्न में जातक शत्रुहन्ता सिद्ध करता है। अन्य राशियों में विरल केशी, नीच कर्मी, वासना युक्त, धूर्त एवं आलसी होता है।

जातक पर शनि का प्रभाव- रूखे-सूखे बाल, लम्बे बड़े अंग, दांत तथा वृद्ध शरीर काला रंग का दिखता है। यह अशुभ ग्रह है। मंद गति ग्रह है। नैतिक पतन का द्योतक है। वायु संबंधी बीमारियों का प्रतिनिधि है। यह दुःख, निराशा तथा जुआ का प्रतीक है। गंदा स्थान, अंधेरा स्थान का कारक ग्रह है।

शनि से प्रभावित वस्तुएं- लोहा, काला, चना, भांग, तेल, नीलम, दाह संस्कार गृह, कब्रिस्तान, जेल, बिस्तरे पर लिटाएं रखना, पुरानी बीमारियां, लाइलाज बीमारियां, वृद्धावस्था का स्वामी है। शनि से प्रभावित शरीर के अंग- दांत, वात, कलाई, पेशियां, पीठ, पैर।

शनि से प्रभावित रोग- गुदा के रोग, व्रण, जख्म व जोड़ों का और पुराने दर्द, लाइलाज रोग, दांत, सांस, क्षय, वातज यह शुद्र वर्ण, वायु तत्व, नपुंसक तथा पश्चिमी स्वामी है।

जन्मकुण्डली में शनि के लग्न भाव से स्थित का फल-
1 लग्न (प्रथम) भावस्थ शनि मकर, कुम्भ तथा तुला का हो तो धनाढ्य, सुखी, धनु और मीन राशियों में हो तो अत्यंत धनवान और सम्मानित एवं अन्य राशियों का हो तो अशुभ होता है।

2 द्वितीय भावस्थ शनि हो तो जातक, कटुभाषी, साधुद्वेषी, मुखरोगी और कुम्भ या तुला का शनि हो तो धनी, लाभवान् एवं कुटुम्ब तथा भातृवियोगी होता है।

3 तृतीय भावस्थ शनि हो तो जातक शीघ्रकार्यकर्ता, सभाचतुर, चंचल, भाग्यवान, शत्रुहन्ता, निरोगी, विद्वान योग, मल्ल एवं विवेकी होता हैै।

4 चतुर्थ भावस्थ शनि हो तो जातक अपयशी, बलहीन, धूर्त, कपटी, शीघ्रकोपी, कृशदेही, उदासीन, वातपित्तयुक्त एवं भाग्यवान होता है।

5 पंचम भावस्थ शनि हो तो जातक आलसी, संतानयुक्त, चंचल, उदासीन, विद्वान, भ्रमणशील एवं वातरोगी होता है।

6 षष्ठ भावस्थ शनि जातक को बलवान, आचारहीन, व्रणी, जाति विरोधी, श्वास रोगी, कण्ठ रोगी, योगी, शत्रु हन्ता भोगी एवं कवि बनता है।

7 सप्तम भावस्थ शनि हो तो जातक क्रोधी, कामी, विलासी, अविवाहित रहने वाला, या दुःखी अविवाहित जीवन, धन सुख हीन, भ्रमणशील, नीचकर्मरत, स्त्रीभक्त होता है।

8 अष्टम भावस्थ शनि जातक को विद्वान स्थूल शरीर, उदार प्रकृति, कपटी, गुप्तरोगी, वाचाल, डरपोक, कुष्ठरोगी एवं धूर्त बनाता है।

9 नवम भावस्थ शनि हो तो जातक धर्मात्मा, साहसी, प्रवासी, कृशदेही, भीरू, भ्रातृहीन, शत्रुनाशक वात रोगी, भ्रमणशील एवं वाचाल होता है।

10 दशम भावस्थ शनि हो तो जातक विद्वान, ज्योतिषी, राजयोगी, न्यायी, नेता, धनवान, राजमान्य, उदरविकारी, अधिकारी, चतुर, भाग्यवान, परिश्रमी, निरूद्पयोगी एवं महात्वाकांक्षी होता है।

11 ग्यारहवें भावस्थ शनि हो तो जातक बलवान विद्वान, दीर्घायु, शिल्पी, सुखी, चंचल, क्रोधी, योगाभ्यासी, नीतिवान, परिश्रमी, व्यवसायी, पुत्रहीन, कन्याप्रज्ञ एवं रोगहीन होता है

12 बारहवें भावस्थ शनि हो तो जातक आलसी, दुष्ट, व्यसनी, अपस्मार, उन्माद रोगी, मातुल कष्टदायक, अविश्वासी एवं कटुभाषी होता है।

शनि की दशा आ गयी हैः-
प्रत्येक ग्रह का अपना-अपना अस्तित्व है। यहां शनि ग्रह के बारे में कहना चाहूंगा कि शनि ग्रह सर्वथा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं होता। शनि बुरे फलों के साथ-साथ अच्छे फल भी बहुत देता है। शनि के बारे में जितना भय या जितनी भ्रांतियां लोगों को हैं, उतना खराब वह नहीं है। शनि का नाम आते ही लोग ज्यादातर डरने लगते हैं-‘शनि की दशा आ गयी है’ या ‘शनि की साढे़साती’ लघु ढैय्या है। इस कारण कुछ लोग डर या वहम बैठा देते हैं, जिसकी वजह से साधारण व्यक्ति तरह-तरह से भ्रमित होकर परेशान हो उठता है। ग्रहों को शुभ व अशुभ भागों में बांटा जाता है। जब शुभ ग्रह राशि परिवर्तित करते हैं तो उस समय गोचर का चन्द्रमा जन्म चन्द्रमा से किस भाव में स्थित है उसके अनुसार गोचर के शुभाशुभ ग्रह का फल बतलाते हैं।
कई अन्य मत भी प्रचलित हैं जिससे गोचर के ग्रह या ‘शनि की साढ़ेसाती’ का शुभाशुभ फल निकालते हैं। दैवज्ञ श्री काटवे, का कहना है कि जब शनि चन्द्रमा से 13 अंश 20 कला पीछे होता है शनि की साढ़ेसाती उस समय आरम्भ होती है, तथा जब तक वह 13 अंश 20 कला आगे रहते हैं, तब तक रहती है। इस प्रकार जन्म चन्द्रमा के अंशों में से 13 अंश 20 कला घटाओ तथा 13 अंश 20 कला जोड़ो। इससे प्राप्त होने वाली चाप पर जब तक शनि रहता है शनि की साढ़ेसाती रहती है। इस प्रकार ग्रह की राशि परिवर्तन समय कोई महत्व नहीं रखता। इस 13 अंश 20 कला मूर्ति निर्णय पद्धति महत्वहीन हो जाती है। परन्तु लग्न, सप्तशलाका, तारा तथा अष्टक वर्ग से ग्रह को शुभाशुभ उत्तम है।

पाठकों को याद दिला दूं कि जिस जन्म कुण्डली में योग नहीं वह दशा अन्तर दशा नहीं दे सकती। इसलिए फल के लिए योग का होना आवश्यक होता है। माना कि जातक की जन्म कुण्डली में शादी का योग ही नहीं हो, तो दशान्तर दशा सप्तमेश की हो, या कारक ग्रह की, शादी नहीं हो सकती। इसलिए फल के लिए योग का होना आवश्यक है इसी प्रकार जो ग्रह की दशान्तरदशा नहीं दे सकती, वह उस फल को देता है। यदि दशान्तर दशा ही हो तो गोचर कितना भी शुभाशुभ हो, फल नहीं दे सकता। पहले दशान्तर दशा का होना आवश्यक है फिर गोचर उस फल को देता है। यदि महादशा, अंतरदशा ही नहीं तो गोचर कितना भी शुभाशुभ हो वह फल नहीं दे सकता। इसको इस प्रकार भी कहा जा सकता है।

सबसे पहले जातक के लिए फल होना चाहिए। दशा अन्तरदशा उस फल को संदेश वाहक, गोचर को देती है। संदेश वाहक, गोचर वह फल जातक को देता है। यदि दशान्तर दशा संदेश वाहक को फल नहीं देगी तो संदेश वाहक जातक को फल कहां से देगा? इसलिए क्रम निश्चित है, पहले फल होना चाहिए। (योग) दूसरे उन ग्रहों की दशान्तर दशा होनी चाहिए तब गोचर जातक को फल देता है। अन्यथा फल प्राप्त नहीं होता गोचर केवल सहायक है। गोचर के फल को प्रभावित करने वाले भिन्न-भिन्न पहलुओं का अध्ययन करने के बाद साढ़े साती का अध्ययन करते हैं। जन्म राशि से 12वें स्थान जन्म राशि पर एवं द्वितीय भाव पर जब शनि गोचर करता है उसे शनि की साढ़ेसाती कहते हैं। शनि एक राशि पर लगभग 2.5 वर्ष रहता है। इस प्रकार तीन राशियों पर 7.5 वर्ष हुए। इसलिए इसे साढ़ेसाती कहते हैं। साढ़ेसाती अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी। यह सब जन्मकुण्डली में चन्द्रमा तथा शनि की स्थिति तथा बल पर निर्भर करता है। लग्न, सप्तशलाका, तारा तथा अष्टक वर्ग के बल पर भी निर्भर करता है। परन्तु फिर भी यह मानसिक कष्ट कारक हो सकती है। जब शनि चन्द्रमा से 13 अंश 20 कला कम पर 12वें भाव में रहता है तो, शनि का प्रभाव आरंभ हो जाता है। यदि शनि वक्री हो जाए तो 7.5 वर्ष से भी ज्यादा समय तक तीनों राशियों पर रह सकता है।

जिनका दीर्घ जीवन है उनके जीवन में 3 बार साढे़साती आती है। पहले फेरे में कुछ बुरा फल देती है, परन्तु आक्रमण बड़े वेग से होता है। दूसरे फेरे में वेग तो कम हो जाता है परन्तु फिर भी कष्ट तो मिलता ही है, परन्तु इतना हानिकारक नहीं होता तथा कुछ शुभ फल भी प्राप्त होता है। परन्तु तीसरे पर्याय में जातक की मृत्यु हो जाती है। बहुत कम भाग्यवान जातक ही इस तीसरे फेरे को झेल पाते हैं। साढे़साती में साधारणतया हम यह देखते हैं कि शनि किस राशि से गोचर कर रहा है। उस राशि के स्वामी से उसका कैसा संबंध है। यदि उसका संबंध मित्रता का है तो अशुभ फल नहीं होता। वैसा तो यह संबंध पंचधा मैत्री से देखना चाहिए। परन्तु पंचधा मैत्री तो कुण्डली के अनुसार बनेगी। समझाने के लिए हम लिखते हैं मित्र राशि की रााशि से गोचर कर रहा है। माना कि शनि गोचर कर रहा है। मेष राशि से प्रथम 2.5 वर्ष मीन, जिसका स्वामी बृहस्पति है तथा शनि के गुरु के साथ सम नैसर्गिक संबंध हैं तो प्रथम 2.5 वर्ष सम होंगे। द्वितीय 2.5 वर्ष मेष, जिसमें चन्द्रमा स्थित हैं उसका स्वामी मंगल है जो शनि का शत्रु है। अर्थात द्वितीय ढैय्या अशुभ। तीसरी ढैय्या में शनि वृष राशि मे गोचर करेगा। वृष के स्वामी शुक्र को शनि मित्र समझता है, इसलिए तीसरे ढैय्या शुभ अथात् मेष राशि वालों के लिए केवल दूसरे ढैय्या अशुभ हुई इस प्रकार इसको इस तालिका में लिख सकते हैं।
कुछ विशेष नियमः-

1 जन्म कुण्डली में 6, 8, 12 भाव में शनि गोचर में अशुभ ग्रह से दृष्ट या युक्त हो तो अशुभ फल प्राप्त होता है।

2 जन्म चन्द्रमा यदि 2 या 12 भाव में अशुभ ग्रह से युक्त हो तो शनि की साढे़साती अशुभ होती है।

3 जन्म चन्द्रमा निर्बल हो तथा अशुभ भाव में स्थित हो तो शनि की साढे़साती अशुभ होती है।

4 जन्म चन्द्रमा से 2 या 12वें भाव में शुभ ग्रह हो तथा शुभ दृष्ट हो तो शनि की साढे़साती शुभ फल देती है।

5 जन्म चन्द्रमा शनि से युक्त हो, मंगल से दृष्ट न हो, तो साढे़ साती शुभ फल देती है।

6 जन्म कुण्डली में चन्द्रमा की स्थिति युत तथा दृष्टि साढे़साती शुभ फल देती है।

अष्टम शनि का ढैय्या- जब शनि चन्द्रमा से चतुर्थ भाव में जाता है तो चन्द्रमा को दशम दृष्टि से देखता है। उस समय पर भी चन्द्रमा शनि से पीड़ित हो। तो फल चन्द्र, शनि, लग्न, तारा, सप्तशलाका, दशान्तरदशा पर निर्भर करता है। इसको कष्टक शनि भी कहते हैं। इसी प्रकार शनि जब जन्म चन्द्रमा से अष्टम भाव में गोचर करता है तो शुभाशुभ फल देता है। शुभाशुभ फल का निर्णय अष्टक वर्ग, तथा तारा, दशान्तर दशा ही करेगी। यदि सर्वाष्टक वर्ग में 28 से ज्यादा शुभ बिन्दु हों तो शनि का उस भाव में गोचर, जातक को कष्ट न देकर आकस्मिक अच्छा फल देता है। कहावत है कि भले-भले को छोड़िये, खोटे ग्रह जप ध्यान वाली। बुरे दिन किसी को पूछ कर नहीं आते, जब समय अनुकूल रहता है। तब व्यक्ति प्रसन्न रहता है, परन्तु बुरा समय आने पर वह चारों ओर हाथ-पैर मारता है। येनकेन प्रकारेण अपनी स्थिति सुधरने के लिए हर संभव-असंभव प्रयास करता है। दान-दक्षिण, पूजा-पाठ, जप-तप, यंत्र-तंत्र-मंत्र करता है। साधु संन्यासी, ज्योतिषी, तांत्रिक, कोई भी हो, वह उन सब तक जा पहुंचता है। खेद! ग्रहों में शनि-मंगल-राहु पर प्रायः दोष दिया जाता है तो शनि की साढ़ेसाती को सुनकर सब का हृदय कांप उठता है। शनि, अकस्मात, कुप्रभाव देने वाला ग्रह है। अतः भय सहज स्वभाविक है। यह समय मृत्यु, रोग, भिन्न-भिन्न कष्ट, व्यवसाय हानि अपमान धोखा द्वेष, ईर्ष्या का माना जाता है।

कम श्रम अधिक लाभ, भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति, ऐश्वर्य लाभ, दीर्घायु होने व स्वस्थ रहने विघ्न-बाधाओं को नाश करने, ग्रह-शांति, कलह से मुक्ति, ईश-भक्ति, कुटुम्ब-वृद्धि, योग्य संतान उत्पन्न होने, संघर्ष से मुक्ति जैसी इच्छाएं मानव मात्र की सदैव से रही हैं। वह निरन्तर इसके लिए प्रयत्नशील रहता है। इस प्रकार शनि मानव जीवन हेतु अत्यंत ही पीड़ाकारक ग्रह है। हम चाहें तो शनि की पीड़ादायक दृष्टि से छुटकारा पा सकते हैं। कुछ तंत्र-मंत्र एवं टोटकों का उपयोग करें। शनि पीड़ितों को पुराने कम्बल या पुराने लोहे का दान, काला तिल दान, उडद दान करना चाहिए। लोहे का प्रयोग ज्यादा करना चाहिए।

शनैश्चर ग्रह की पूजन विधिः-
नवग्रहों में शनि देवता को सूर्य का पुत्र कहा जाता है। शनि देव विशाल शरीर तथा बड़े-बड़े नेत्रों वाले, कृष्ण वर्ण वाले हैं। शनि देव की साढ़े साती सभी के जीवन को प्रभावित करती है। जीवन की तीसरी साढ़े साती को पार करना बहुत भाग्य वाले को ही नसीब होता है। आरोग्य प्राप्ति, सुख शांति एवं समृद्धि के लिए शनि देव की पूजा करने से अशुभ प्रभाव नष्ट हो जाता है। शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से 21 शनिवार या कार्य पूर्ति न होने तक व्रत करें। गणेश पूजन करने के उपरान्त शनि देव का अवाह्न करना चाहिए। शनि देव की पूजा काले या नीले पुष्प से करें। शनि यंत्र की स्थापना कर शनि के मंत्रों व बीज मंत्रों से पूजन कर, शनि गायत्री मंत्र, शनि कवच व स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। अपनी श्रद्धा व सामर्थ के अनुसार काला वस्त्र, तिल, तेल, काली उड़द व स्वर्ण का दान करें। अाठ मुखी रूद्राक्ष धारण करें, पूजन करने के बाद काले उड़द की खिचड़ी भोजन एक बार करना चाहिए।
शनि ग्रह पीड़ा निवारक यंत्र :-

ध्यान मंत्र-
ऊँ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रहम्।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि श्नैश्चरम्।।

जप- ॐ शं श्नैश्चरायः नमः।
अथवा – ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः श्नैश्चराय नमः

जप संख्या – 23000

जप माला – रूद्राक्ष।

आसन – काला कम्बल।

दीपक – तिल के तेल का दीपक जलाएं।

जल पात्र – दीपक के साथ स्टील का जलपात्र रखें।

जप के लिए दिशा – पश्चिम की ओर मुख करके बैठें।

हवन करें- शमी की लकड़ी से ।

धारण करें – बिछुआ की जड़।

लाल किताब से शनि के उपचारः-

जिसके जन्मांग में चतुर्थ स्थान में शनि हो ऐसा जातक काले सांप को दूध पिलाये। भैंसे को चारा डालें। मजदूरों को भोजन खिलायें। आर्थिक अड़चन हमेशा रहती हो तो थोड़ा दूध कुएं में डालें। चतुर्थ स्थान में शनि हो तो ऐसा जातक रात को दूध न पिये दूध विषाक्त होकर शनि के द्वारा अधिक कष्ट पहुंचाता है

षष्ठ स्थान में शनि गुरु दोनों हों तो नारियल पानी में बहायें। ऐसी ग्रह स्थिति 28 वर्ष की उमर से पूर्व ही जातक का विवाह करायें। और 48 उम्र तक मकान न बनायें। संतति होने में बाधा हो तो काले सांप को दूध पिलायें और पूजा करें।

सप्तम स्थान में शनि हो, ऐसा जातक यदि मद्यपान करे तो यह मद्यपान तुरन्त बंद कर दें, अन्यथा उसका सर्वनाश कोई रोक नहीं सकता। कम से कम तीन सौ ग्राम हल्दी चालू कुएं में गुरुवार को डालें।

अष्टम स्थान में शनि हो एवं द्वितीय स्थान में अन्य कोई ग्रह न हो तो, जातक ब्याज का धंधा, कारखाना, छापाखाना, प्रिंटिंग प्रेस, तेल का व्यापार, लोहे की चीजों का व्यापार, वकालत, चमड़ा, पेट्रोल, आॅयल, मोबाइल, ग्रीस बेचने का व्यापार चुने। व्यापार से पूर्व एक मिट्टी के मटके में राई का तेल भरकर काले कपड़े से मुंह बंद करके तालाब या नदी में प्रवाहित करें। उसके बाद कृष्ण पक्ष के मध्य रात्रि में व्यवसाय का शुभ आरंभ करें। काफी धन मिलेगा।

एकादश स्थान में शनि एवं सप्तम स्थान में शुक्र हो तो ऐसा जातक बहुत ही भाग्यवान होता है। किसी भी कार्यारम्भ के पूर्व पानी से भरा घड़ा दान करें। हर शनिवार को पानी में काली हल्दी डाल कर उस पानी से स्नान करें।

जन्म कुण्डली में शनि शुभ हो, या अधिक शुभ हो तो घर में लोहे का फर्नीचर इस्तेमाल करें। भोजन में काला नमक एवं काली मिर्च का प्रयोग करें आखों में काजल या सुरमा डालें

अनिष्ट शनि की पीड़ा दूर करने के लिए एवं शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या का कष्ट निवारण के लिए भोजन के पूर्व भोजन में सब चीजें थोड़ी-थोड़ी अलग निकाल कर कौआ को खिलाओ

अनिष्ट शनि की पीड़ा दूर करने के लिए राई या तिल का तेल दान करें। शनि संतान की दृष्टि से बाधक होता हो तो, गर्भपात होता है तो, ऐसी स्त्री भोजन की थाली में से भोजन के पूर्व सब चीजें थोड़ी-थोड़ी अलग निकाल कर काले कुत्ते को खिलाये।

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गर्भाधान मुहूर्त

गर्भाधान और आधान लग्न :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

जातक शास्त्र में जन्म लग्न को शुद्ध करने के लिये कुछ ज्योतिषीय योगों का उल्लेख मिलता है। जब किसी जातक का लग्न संधिकाल में हो और निर्णय करना कठिन हो, कि किस लग्न को स्वीकार किया जाये, तब लग्न को शुद्ध करने के लिये इन योगों की सहायता ली जा सकती है अथवा इन योगों की सहायता से किसी हद तक लग्न को शुद्धरूप में प्राप्त किया जा सकता है। यहां जातक ग्रन्थों से आधान लग्न के कुछ चुने हुये योग प्रस्तुत हैं, जिनकी सहायता से विद्वान ज्योतिषाचार्य लग्न निर्णय कर सकते हैं। आधान ज्ञान- प्रति मास मंगल और चन्द्रमा की राशि स्थिति के योग से स्त्रियों को ऋतु-धर्म हुआ करता है। जिस समय चन्द्रमा स्त्री जातिका की राशि से नेष्ट स्थान में हो, और शुभ पुरूष ग्रह (बृहस्पति) से देखा जाता हो, तथा पुरुष की राशि से दृष्ट-उपचय स्थान में हो, और बृहस्पति से दृष्ट हो तो, उस स्त्री को पुरूष का संयोग प्राप्त होगा। आधान लग्न से सप्तम भाव पर पाप ग्रह का योग या दृष्टि हो तो, रोषपूर्वक और शुभ ग्रह का योग एवं दृष्टि हो तो प्रसन्नतापूर्वक पति-पत्नी का संयोग होता है। आधान काल में जिस द्वादशांश में चन्द्रमा हो, उससे उतनी ही संख्या की अगली राशि में चन्द्रमा के जाने पर बालक का जन्म होता है। आधान काल में शुक्र, रवि, चन्द्रमा और मंगल अपने-अपने नवमांश में हों गुरू, लग्न अथवा केन्द्र या त्रिकोण में हों तो वीर्यवान पुरुष को निश्चय ही सन्तान प्राप्त होती है। यदि मंगल और शनि सूर्य से सप्तम भाव में हो तो, वे पुरुष के लिये तथा चन्द्रमा से सप्तम में हों तो स्त्री के लिये रोगप्रद होते हैं।

सूर्य से 12, 2 में शनि और मंगल हों तो, पुरुष के लिये और चन्द्रमा से 12-2 में ये दोनों हों तो, स्त्री के लिये घातक योग होता है, अथवा इन शनि, मंगल में से एक युत और अन्य से दृष्ट रवि हो तो, वह पुरुष के लिये और चन्द्रमा यदि एक से युत तथा अन्य से दृष्ट हो तो, स्त्री के लिये घातक होता है। दिन में गर्भाधान हो तो, शुक्र मातृग्रह और सूर्य पितृग्रह होते हैं। रात्रि में गर्भाधान हो तो, चन्द्रमा मातृग्रह और शनि पितृग्रह होते हैं। पितृग्रह यदि विषम राशियों में हो तो, पिता के लिये और मातृग्रह सम राशि में हो तो, माता के लिये शुभ कारक होता है। यदि पापग्रह बारहवें भाव में स्थित होकर पापग्रहों से देखा जाता हो, और शुभ ग्रहों से न देखा जाता हो, अथवा लग्न में शनि हो, तथा उस पर क्षीण चन्द्रमा और मंगल की दृष्टि हो, तो उस समय गर्भाधान होने से स्त्री का मरण होता है। लग्न और चन्द्रमा दोनों या उनमें से एक भी दो पापग्रहों के बीच में हो तो गर्भाधान होने पर स्त्री गर्भ के सहित मृत्यु को प्राप्त होती है।

लग्न अथवा चन्द्रमा से चतुर्थ स्थान में पापग्रह हो, मंगल अष्टम भाव में हो, अथवा लग्न से 4-12वें स्थान में मंगल और शनि हों, तथा चन्द्रमा क्षीण हो तो, गर्भवती स्त्री का मरण होता है। गर्भाधान काल में मास का स्वामी अस्त हो, तो गर्भपात होता है, इसलिये इस प्रकार के लग्न को गर्भाधान हेतु त्याग देना चाहिये। आधान कालिक लग्न या चन्द्रमा के साथ अथवा इन दोनों से 5-6-7-4-10वें स्थान में सब शुभ ग्रह हों, और 3-6-10वें भाव में सब पापग्रह हों तथा लग्न और चन्द्रमा पर सूर्य की दृष्टि हो तो, गर्भ सुखी रहता है। रवि, गुरू, चन्द्रमा, और लग्न-ये विषम राशि एवं नवमांश में हों, अथवा रवि और गुरू विषम राशि में स्थित हों तो, पुत्र का जन्म होता है, अथवा नपुंसक का जन्म होता है। शुक्र और चन्द्रमा सम राशि में हो तथा बुध मंगल लग्न और बृहस्पति विषम राशि में स्थित होकर पुरुष ग्रह से देखे जाते हों, अथवा लग्न एवं चन्द्रमा समराशि में हो या पूर्वोक्त बुध, मंगल लग्न एवं गुरू सम राशियों में हों तो यमल (जुड़वी सन्तान) को जन्म देने वाले होते हैं। उक्त सभी ग्रह यदि सम राशि और सम नवमांश में हों, अथवा मंगल चन्द्रमा और शुक्र ये समराशि में हों तो, विद्वजनों को कन्या का जन्म समझना चाहिये। ये सब द्विस्वभाव राशि में हों, और बुध से देखे जाते हों, तो अपने-अपने पक्ष के यमल (जुड़वी सन्तान) केे जन्म कारक होते हैं, अर्थात् पुरुष ग्रह दो पुत्रों के और स्त्री ग्रह दो कन्याओं के जन्मदाता होते हैं। यदि दोनों प्रकार के ग्रह हों तो, एक पुत्र और एक कन्या का जन्म समझना चाहिये। लग्न में विषम (3-5 आदि) स्थानों में स्थित शनि भी पुत्र जन्म का कारक होता है। क्रमशः विषम एवं समराशि में स्थित रवि और चन्द्रमा अथवा बुध और शनि एक दूसरे को देखते हों, अथवा सम राशिस्थ सूर्य को विषम राशिस्थ लग्न एवं चन्द्रमा पर मंगल की दृष्टि हो, अथवा चन्द्रमा समराशि और लग्न विषम राशि में स्थित हो, तथा उन पर मंगल की दृष्टि हो अथवा लग्न चन्द्रमा और शुक्र ये तीनों पुरुष राशियों के नवमांश में हों तो, इन सब योगों में नपुंसक का जन्म होता है।

शुक्र और चन्द्रमा सम राशि में हो तथा बुध मंगल लग्न और बृहस्पति विषम राशि में स्थित होकर पुरुष ग्रह से देखे जाते हों, अथवा लग्न एवं चन्द्रमा समराशि में हो या पूर्वोक्त बुध, मंगल लग्न एवं गुरू सम राशियों में हों तो, यमल (जुड़वी) सन्तान को जन्म देने वाले होते हैं। यदि बुध अपने (मिथुन या कन्या के) नवमांश में स्थित होकर द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह और लग्न को देखता हो तो, गर्भ में तीन सन्तान की स्थिति समझनी चाहिये। उनमें से दो तो बुध नवमांश के सदृश होंगे और एक लग्नांश के सदृश्य। यदि बुध और लग्न दोनाें तुल्य नवमांश में हों तो, तीनों सन्तानों को एक-सा ही समझना चाहिये। यदि धनु राशि का अंतिम नवांश लग्न हो, उसी अंश में बली ग्रह स्थित हों, और बलवान बुध या शनि से देखे जाते हों तो गर्भ में बहुत (तीन से अधिक) सन्तानों की स्थिति समझनी चाहिये। या पूर्वोक्त बुध, मंगल लग्न एवं गुरू सम राशियों में हों तो यमल (जुड़वी) सन्तान को जन्म देने वाले होते हैं।

गर्भ मासों के अधिपति:- शुक्र, मंगल, बृहस्पति, सूर्य, चन्द्रमा, शनि, बुध, आधान-लग्नेश, सूर्य, और चन्द्रमा ये गर्भाधान काल से लेकर प्रसव पर्यन्त दस मासों के क्रमशः स्वामी हैं। आधान समय में जो ग्रह बलवान या निर्बल होता है, उसके मास में उसी प्रकार शुभ या अशुभ फल होता है। बुध त्रिकोण (5-6) में हो, और अन्य ग्रह निर्बल हो तो गर्भस्थ शिशु के दो मुख, चार पैर, और चार हाथ होते हैं। चन्द्रमा वृष में और अन्य सब पाप ग्रह राशि संधि में हों तो, बालक गूंगा होता है। यदि उक्त ग्रहों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, और हाथ से रहित रहता है तो, वह बालक अधिक दिनों में बोलता है। मंगल और शनि यदि बुध की राशि नवमांश में हों तो शिशु गर्भ में ही दांत से युक्त होता है। चन्द्रमा कर्क राशि में होकर लग्न में हो, तथा उस पर शनि और मंगल की दृष्टि हो तो, गर्भस्थ शिशु कुबड़ा होता है। मीन राशि लग्न में हो, और उस पर शनि, चन्द्रमा, तथा मंगल की दृष्टि हो तो, गर्भ का बालक पंगु होता है।

पापग्रह और चन्द्रमा राशि संधि में हों, और उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो, गर्भस्थ शिशु जड़-बुद्धि (मूर्ख) होता है। मकर का अन्तिम अंश लग्न मे हो, और उस पर शनि चन्द्रमा तथा सूर्य की दृष्टि हो तो, गर्भ का बच्चा वामन (बौना) होता है। पंचम तथा नवम लग्न के द्रेष्काण में पापग्रह हो तो, जातक क्रमशः पैर, मस्तक और हाथ से रहित रहता है। गर्भाधान के समय यदि सिंह लग्न में सूर्य और चन्द्रमा हों, तथा उन पर शनि और मंगल की दृष्टि हो तो, शिशु नेत्रहीन अथवा नेत्रविकार से युक्त होता है। यदि शुभ और पापग्रह दोनों की दृष्टि हो तो आंख में फूला होती है। यदि लग्न से बाहरवें भाव में चन्द्रमा हो तो, बालक के वाम नेत्र, सूर्य हो तो दक्षिण नेत्र में कष्ट होता है। अशुभ योगों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो, उन योगों के फल परिवर्तित होकर सम हो जाते हैं।

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प्रेमी-प्रेमिका और शुक्र

प्रेम और विलासिता का कारक शुक्र :-

Dr.R.B.Dhawan

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प्रेमी-प्रेमिका में झगडे क्यों होते हैं? आईये इसका कारण ज्योतिष शास्त्र से जानते हैं- किसी भी जन्मकुण्डली में प्रेमी का स्थान पाँचवां होता है, जातक का अपना स्थान प्रथम स्थान है। अच्छी रिलेशनशिप तभी रह सकती है, जब प्रथम स्थान के स्वामी ग्रह और कुण्डली से पाँचवे स्थान के स्वामी ग्रह मित्र होंगे। यह तो हुई साधारण बात, अब यह भी देखना होगा की जातक की रिलेशनशिप से किसी दूसरे का हाजमा तो खराब नहीं हो रहा ? :- (रिलेशनशिप से प्राब्लम) कहीं वह गुप्त दुश्मनी तो नहीं निभा रहा ? यह पता चलेगा जातक की कुण्डली के पंचमेश की सेहत देखने से! पंचमेश की सेहत खराब करने के लिये कुण्डली के षष्ठेश या अष्ठमेश जिम्मेदार हो सकते हैं, अर्थात् पंचमेश षष्ठ या अष्ठम में नहीं होना चाहिए, अथवा षष्ठेश या अष्ठमेश के साथ नहीं होना चाहिए, या फिर षष्ठेश या अष्ठमेश पंचम में नहीं होना चाहिए। यह तो हुई बड़ी वजह, इसके अतिरिक्त एेसा भी हो सकता है की जातक का कोई सगा सम्बंधी ही इस खेल को बिगाड़ने में लगा हो।

वैवाहिक सुख का कारक ग्रह शुक्र :-

आज का युग बहुत तेज गति से शुक्र प्रधान हो रहा है, बेशक ज्योतिष के विद्वानों को मेरी यह बात कुछ अटपटी सी लगेगी। परंतु तथ्य यही बताते हैं कि बढ़ी तेजी से यह युग बदल रहा है। पहले एक छोटा सा उदाहरण प्रस्तुत है- आज से 50-100 वर्ष पूर्व लोग या तो पैदल यात्रा करते थे या फिर पशुओं का अथवा पशुओं द्वारा चलित वाहनों का प्रयोग करते थे। अर्थात् गुरू (जीव प्रधान) वाहन का प्रयोग किया जाता था। जो आज धीरे-धीरे करके आरामदायक (शुक्र प्रधान) वाहन ने ले ली है। पशुओं से चलने वाले वाहनों की जगह अब स्वचालित लग्जरी वाहनों ने ले ली है। इस प्रकार प्राणीयों का प्रतीक गुरू शीण हो गया है। दूसरा उदाहरण- एक जमाना था जब बड़ी-बूढी अपनी बहुओं को आशिर्वाद देती थी- “दूधों नहाओ पूतों फलो” आज इसमें से दूधों नहाओ तो ठीक है, परंतु “पूतों फलो” भला किस नवविवाहिता को पसंद आती है? इस आशिर्वाद का पूतों फलो वाला भाग भी गुरू का विभाग है। जो नवविवाहिता बहुओं को पसंद नहीं, क्योंकि अधिक संतान के लिये आज इस वर्ग के विचार बदल गये हैं, यहाँ भी गुरू निर्बल प्रतीत होता है। तीसरा उदाहरण- विद्वान, आचार्य व गुरू जो अपने प्रवचन के द्वारा समाज को धर्म के मार्ग पर चलने के लिये दिशा दिखाने का कार्य करते थे, आज इन्हें सुनने का समय किसके पास है, यदि गलती से कहीं आमना-सामना हो भी जाये तो आज की नई पीढ़ी उनसे जान छुडाना चाहते हैं। इसी प्रकार वह अध्यापक जिनके चरण छूकर विद्यार्थी मान-सम्मान करते थे, आज वह कितनी दयनीय स्थिति में हैं? यह अध्यापक एेसे शिल्पकार हैं, जिनसे शिक्षा पाकर विद्यार्थीकाल अपने और देश के भाग्य का निर्माण करने की ताकत रखते हैं, परंतु जिस गुरू ने उन्हें इस योग्य बनाया है। उस गुरू की कितनी इज्जत हो रही है? किसी से छिपा नहीं। क्या यह गुरू का बल कम नहीं हो रहा? दूसरी ओर शिक्षा का आधुनिकीकरण करती शिक्षण संस्थायें (शुुक्र) फल-फूल रही हैं। एक उदाहरण और देता हूँ- बच्चे जवान हो जायें तो आज कितने एेसे माता-पिता हैं जिन्हें कन्या के लिये वर और बालक के लिये वधु ढूडने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। माता-पिता द्वारा पसंद युवक के लिये युवती, तथा कन्या के लिये वर (गुरू बल) के स्थान पर आजकल लव मेरिज (शुक्र बल) का प्रचलन अधिक हो चला है। आध्यात्मिकता, सहनशीलता, विवेक, बुद्धिमत्ता तथा अध्ययनशीलता (गुरू) की जगह आज सुंदरता, विलासिता और अश्लीलता (शुक्र) ने ले ली है। अब आप ही बतायें पूर्वकाल में विश्वगुरू कहलाने वाला हमारा भारत आने वाले कुच्छ ही वर्षों में क्या कहलायेगा ?

प्रेम सम्बन्ध :-
अब देखते हैं, जन्म कुंडली मे कौन से एेसे योग होते हैं, जो प्रेम संबंध की सूचना देते हैं- कब ये शारीरिक सम्बन्ध स्तर पर भी होते है ? क्या कुण्डली में ऐसी स्थितियाँ भी है जो संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा तनाव भी देंगी ? क्या ये संबंध दुनियाँ से छिपे रह सकते है ? क्या प्रेम संबंधों में अलगाव (Break up) तो नही है ? क्या एक से अधिक भी प्रेम संबंध होंगे ? क्या प्रेम संबंध विवाह में परिणित होगें ? यह सब प्रश्न हैं आज के युवा वर्ग के।
भारतीय ज्योतिष पद्धति के द्वारा हम इन सभी स्थितियों को जन्म पत्रिका के माध्यम से देख सकते हैं ।और विश्लेषित भी कर सकते हैं, और उस समय विशेष की गणना भी कर सकते हैं । जब इनमे से कोई भी स्थिति हमारे जीवन मे घटित होगी ? आईये देखें जन्म पत्रिका में कौन सी स्थितियाँ बनाती है प्रेम संबंध ?- जन्म कुण्डली का पंचम भाव (5th house) हमारी कला कौशल के साथ प्रेम तथा भावनाओं का ओर दिल से किये गए कार्य का स्थान होता है । जन्म कुंडली मे चंद्रमा, शुक्र और मंगल प्रमुख ग्रह हैं, जो अपने आपसी सम्बन्धो के आधार पर व्यक्ति को एक विशेष आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करते हैं, तथा जातक को प्रेम करने को वशीभूत करते हैं। चंद्रमा मन का कारक है । जन्म पत्रिका में मजबूत चंद्रमा विचारों को शक्ति प्रदान करता है। मन में कल्पनाशीलता ओर भावनाएँ जगाता है, और जातक परम्पराओ को तोड़कर दुनिया की परवाह किये बगैर प्रेम के रास्ते पर आगे बढ़ता है, जब कुण्डली में चंद्रमा का संबध किसी भी प्रकार से शुक्र से होता है तो, व्यक्ति प्यार में कल्पनाओ की उड़ान भरता है, और शीघ्र ही विपरीत लिंग की तरफ आकर्षित हो जाता है।

जन्म कुंडली में मंगल + शुक्र का संबंध जब जन्म कुंडली में 1, 2, 3, 5, 7, 11,12 भावो में बनता है, तब व्यक्ति आकर्षण का केंद्र होता है, और साथ ही स्वयं भी विपरीत लिंग की ओर शीघ्र आकर्षित होता है।जन्म कुंडली में जब इन स्थितियों के साथ पंचम भाव तथा पमचमेश से संबंध बनाने वाले किसी भी ग्रह की अथवा चंद्रमा, शुक्र, मंगल से संबंधित दशाएँ अन्तरदशाएँ आती हैं तो, जातक प्रेम करता है ।

जब पंचम भाव अथवा पंचमेश का शुभ संबंध केंद्र त्रिकोण से अथवा एकादश भाव (11th house) से शुभ भावों में होता है तो, ये सच्चा ओर आदर्श प्रेम संबध होता है । यदि इन संबंधों में द्वादश भाव भी सम्मलित हो जाता है तो, ये प्रेम शारीरिक स्तर पर भी प्रकट हो जाता है। जब इन सम्बन्धो में द्वादश भाव के साथ अष्टम भाव या अष्टमेश सम्मलित होता है तोे, संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा, तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है । जब प्रेम संबंधों में सप्तम भाव अथवा सप्तमेश का समावेश होता है तो, ये संबंध अन्य स्थितियों के सकारात्मक होने पर प्रेम विवाह में परिणित हो जाते हैं। शुभ गुरु और शनि प्रेम संबंधों ओर विवाह की स्थितियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां तक कि इनसे गुरु का सबंध कभी भी प्रेम संबंधों को दुनियां के समक्ष उजागर तक नही होने देता ।

सभी वर्ग कुंडलियों, अष्टक वर्ग, ग्रहो के किसी विशेष बल, कुण्डली में बने विशेष संबंधों ओर योगायोगों का, संबंधित शुभ अशुभ दशाओं अन्तरदशाओं, संबंधित शुभ अशुभ गोचर का गहन अध्ययन तथा विश्लेशण करने के बाद ही कहा जा सकता है कि – प्रेम संबधो का कोई दर्दनाक अंत होगा या ये संबंध विवाह के रूप में जीवन को महकाएँगे! जन्म कुंडली मे जैसा दिखता है वैसा कभी नही होता, और जो होता है वह तो बहुत ही गहराई में ही छिपा है, जिसे देख पाना गहन कुण्डली विश्लेषण से ही संभव होता है। कुछ आसान, आवश्यक तथा सही समय पर किये गए सही उपाय, कुछ जन्म पत्रिका के अनुसार सकारात्मक ग्रहों का सहयोग, और कुछ सही मार्ग का चयन और सही दिशा में किया गया परिश्रम। सुखी और खुशियों से भरा जीवन दे सकते हैं।

एक निश्चित आयु में प्रत्येक युवक अथवा युवती की उत्कृट इच्छा रहती है कि उसे अपने मनोनुकूल सुंदर जीवन साथी मिले। एेसे हार्दिक तथा प्रबल आकर्षण का मूल श्रोत संगीत, आदर्षवादिता, कला-क्रीड़ा-सौंदर्य एवं शारीरिक विधान तथा प्रसाधन में ही अंतर्निहित है। उत्तरोत्तर परिवर्तनीय सभ्यता संस्कृति के कारण हमारे देश में भी पाश्चात्य देशों की तरह परिवार की सम्मति अथवा स्वीकृति का महत्व समाप्त होता जा रहा है, युवक व युवतियों का दृष्टिकोण इस प्रसंग में दिनानुदिन लोचपूर्ण तथा उदार होता जा रहा है, अतः स्वजातीय विवाह arenge marriage की अपेक्षा अंतर्जातीय विवाह love marriage की ओर इनका रूझान होता जा रहा है। ज्योतिष शास्त्र की दृिष्टि से देखें तो ज्ञात होता है कि ज्योतिष भी इन बंधनों को नही मानता। इसका मूल कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन ग्रहों के मूलभूत सिद्धांतों पर निर्भर है। अतएव युवक-युवतीयों अथवा नर-नारियों के प्रेम विवाह Love marriage की भावी संभावनाओं का निरूपण प्रस्तुत करना मेरी इस पुस्तक “विवाह एवं दाम्पत्य सुख” का एक उद्देश्य है। विवाह एवं दाम्पत्य सुख (Marriage & Happy Married Life) हाल ही में प्रकाशित हुई नयी पुस्तक है। इस पुस्तक में विवाह सुख के योग, विवाह में क्यों विलम्ब marriage delay होता है? विवाह के लिये तथा विवाहित दम्पतियों के गृहस्थ सुख में बाधाओं का निवारण marriage Life problems and solutions बताया गया है। अभी तक मेरी 10 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन सभी की जानकारी http://www.shukracharya.com पर उपलब्ध है।

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ब्राह्मण से ही पूजा-पाठ क्यों कराएं ?

ब्राह्मण के लक्षण क्या हैं ?

Dr.R.B.Dhawan

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भीष्म पितामह पुलस्त्य से कुछ प्रश्न करते हैं –

१. ब्राह्मण के लक्षण क्या हैं ? :-
उत्तर :- जो‌ विद्वान ब्रह्मतत्व को जानते-समझते हैं, वह ब्राह्मण हैं। जो यम-नियम में आबद्ध है, जिसमें निरंतर उपासना व त्यागवृत्ति, सात्त्विकता एवं उदारता के गुण हैं, जो ईश्वरतत्त्व के सर्वाधिक निकट है, वह ब्राह्मण हैं। जो धर्मशास्त्र व कर्मकांड के ज्ञाता एवं अधिकारी विद्वान हैं, वह ब्राह्मण है। परंपरागत मान्यता अनुसार पूजा-पाठ करने का अधिकार उन्हें ही प्राप्त है, जो एेसे विद्वान ब्राह्मण है।

प्रश्न २:- ब्राह्मण को देवता क्यों कहा गया है ? –

उत्तर:-

दैवाधीनं जगत्सर्वं, मंत्राधीनं देवता।

ते मंत्रा विप्रं जानंति, तस्मात् ब्राह्मणदेवताः।।

यह सारा संसार विविध देवों के अधीन है। देवता मंत्रों के आधीन हैं। उन मंत्रों के प्रयोग-उच्चारण व रहस्य को विप्र भली-भांति जानते हैं, इसलिये ब्राह्मण स्वयं देवता तुल्य होते हैं।

प्रश्न ३:- ब्राह्मणों को लोक-व्यवहार में अधिक सम्मान क्यों प्राप्त है ? –

उत्तर:- निरंतर प्रार्थना, धर्मानुष्ठान व धर्मोपदेश कर के जो सम्मानित होता है, ऐसे ब्राह्मण का सम्मान परंपरागत लोक-व्यवहार में सदा सर्वत्र होता आया है।

प्रश्न ४:- यज्ञाग्नि में तिल-जव इत्यादि खाद्य पदार्थ क्यों हव्य किये जाते हैं ?

उत्तर:- आज के प्रत्यक्षवादी युग के व्यक्ति हवन में घी-तिल-जव आदि की आहुतियों को, अग्नि में व्यर्थ फूंक देने की जंगली प्रथा ही समझते हैं । प्रत्यक्षवादियों की धारणा वैसी ही भ्रमपूर्ण है जैसी कि किसान को कीमती अन्न खेत की मिट्टी में डालते हुये देखकर कृषि सिद्धांत से अपरिचित व्यक्ति की हो सकती है। प्रत्यक्षवादी को किसान की चेष्टा भले ही मूर्खतापूर्ण लगती हो, पर बुद्धिमान कृषक को विश्वास होता है, कि खेत की मिट्टी में विधिपूर्वक मिलाया हुआ उसका प्रत्येक अन्नकण शतसहस्र-गुणित होकर उसे पुनः प्राप्त होगा। यही बात यज्ञ के संबंध में समझनी चाहिये। जिस प्रकार मिट्टी में मिला अन्न-कण शत से सहस्र गुणित हो जाता है, उसी प्रकार अग्नि से मिला पदार्थ लक्ष-गुणित हो जाता है। किसान का यज्ञ पार्थिव और ज्ञानियों का यज्ञ तैजस् कहलाता है। कृषि दोनों है, एक आधिभौतिक तो दूसरी आधिदैविक। एक का फल है- स्वल्पकालीन अनाजों के ढेर से तृप्ति, तो दूसरे का फल देवताओं के प्रसाद से अनन्तकालीन तृप्ति। यज्ञ में ‘द्रव्य’ को विधिवत अग्नि में होम कर उसे सूक्ष्म रूप में परिणित किया जाता है। अग्नि में डाली हुई वस्तु का स्थूलांश भस्म रूप में पृथ्वी पर ही फैल जाता है।स्थूल सूक्ष्म उभय-मिश्रित भाग धूम्र बनकर अंतरिक्ष में व्याप्त हो जाता है, जो अंततोगत्वा मेघरूप’ में परिणित होकर द्यूलोकस्थ देवगण को परितृप्त करता है। ‘स्थूल-सूक्ष्मवाद’ सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक अंश अबाध गति से अपने अंशी तक पहुंचकर ही रहता है। जल कहीं भी हो, उसका प्रवाह आखिरकार अपने उद्गमस्थल समुद्र में पहुंचें बिना दम नहीं लेता। यह वैज्ञानिक सूत्र स्वतः ही प्रमाणित करता है कि, अग्नि में फूंके गये पदार्थ की सत्ता समाप्त नहीं होती।

मनुस्मृति, अध्याय 3/76 में भी एक महत्वपूर्ण सूत्र है :-

‘अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यग् आदित्यं उपष्ठिते’

अग्नि में विधिवत डाली हुई आहुति, सूर्य में उपस्थित होती है।

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 14-15 में भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि चक्र व यज्ञ के बारे में कहते हैं- संसार के संपूर्ण प्राणी अन्न (खाद्य पदार्थ) से उत्पन्न होते हैं।

अग्नि की उत्पत्ति वृष्टि से होती है और वृष्टि यज्ञ से होती है, और यज्ञ (वेद) विहित कार्यों से उत्पन्न होने वाला है।

उत्तम ब्राम्हण की महिमा-

ॐ जन्मना ब्राम्हणो, ज्ञेय:संस्कारैर्द्विज उच्चते।

विद्यया याति विप्रत्वं, त्रिभि:श्रोत्रिय लक्षणम्।।

ब्राम्हण के बालक को जन्म से ही ब्राम्हण समझना चाहिए। संस्कारों से “द्विज” संज्ञा होती है, तथा विद्याध्ययन से “विप्र” नाम धारण करता है। जो वेद, मन्त्र तथा पुराण से शुद्ध होकर तीर्थस्नान के कारण और भी पवित्र हो गया है, वह ब्राम्हण परम पूजनीय माना गया है।

ॐ पुराणकथको नित्यं, धर्माख्यानस्य सन्तति:।

अस्यैव दर्शनान्नित्यं, अश्वमेधादिजं फलम्।।

जिसके हृदय में गुरु, देवता, माता-पिता और अतिथि के प्रति भक्ति है। जो दूसरों को भी भक्तिमार्ग पर अग्रसर करता है, जो सदा पुराणों की कथा करता और धर्म का प्रचार करता है, ऐसे ब्राम्हण के दर्शन से ही अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

पितामह भीष्म जी ने पुलस्त्य जी से फिर पूछा–

गुरुवर! मनुष्य को देवत्व, सुख, राज्य, धन, यश, विजय, भोग, आरोग्य, आयु, विद्या, लक्ष्मी, पुत्र, बन्धुवर्ग एवं सब प्रकार के मंगल की प्राप्ति कैसे हो सकती है? यह बताने की कृपा करें।

पुलस्त्यजी ने कहा–

राजन! इस पृथ्वी पर ब्राह्मण सदा ही विद्या आदि गुणों से युक्त और श्रीसम्पन्न होता है। इसी कारण तीनों लोकों और प्रत्येक युग में विप्रदेव (ब्राम्हण) नित्य पवित्र माने गये हैं।

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नक्षत्र और वनस्पति

नक्षत्रों के लिए निर्धारित पेड़ पौधे :-

Dr.R.B.Dhawan

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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक नक्षत्र के वृक्षों का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। उपाय की दृष्टि से जो जातक अपने जन्म नक्षत्र के वृक्षों या पौधों को रोपित करता है, अथवा सींचता है, या उनका भरण पोषण करता है, उसकी आयु के साथ ऐश्वर्य व धन धान्य में भी वृद्धि होती है। ज्योतिष शास्त्र में 27 नक्षत्रों के जो वृक्ष बताए गये है, उसके अनुसार अश्वनी नक्षत्र के लिए कुचला का वृक्ष, भरणी नक्षत्र के लिए आंवला, कृतिका के लिए गूलर व स्वर्णशीरी, मृगशिरा के लिए खैर, आर्द्रा नक्षत्र का वृक्ष बहेडा, रोहणी के लिए जामुन व तुलसी बताया गया है । इसी प्रकार पुनर्वसु नक्षत्र के लिए बांस, पुष्य नक्षत्र के लिए पीपल, अश्लेशा के लिए नागकेसर, मघा के लिए बड़, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के लिए ढाक (पलास) का वृक्ष, तथा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के लिए रूद्राक्ष या पाकर लगाना उपयोगी माना जाता है। 13 वें स्थान के नक्षत्र हस्त में जन्में व्यक्ति रीठा व पाढ का वृक्ष, चित्रा नक्षत्र वाले बेल नारियल, स्वाती के लिए अर्जुन का वृक्ष, विशाखा नक्षत्र के लिए भटकटैया, अनुराधा नक्षत्र के लिए बकुल या मौलश्री, ज्येष्ठा नक्षत्र के लिए चीड़ या देवदारू व लोध का वृक्ष लगा सकते है। इसी प्रकार मूल नक्षत्र के लिए साल का वृक्ष, पूर्वाषाढ़ा के लिए अशोक या जलवेंत, उत्तराषाढा नक्षत्र के लिए कटहल या फालसा लगायें। श्रवण के लिए आक लगाये, धनिष्ठा नक्षत्र के लिए शमी लगाएं, शतभिषा नक्षत्र के लिए कदम्ब, पूर्वा भाद्रापदा नक्षत्र के लिए आम लगायें, उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र के लिए नीम तथा रेवती नक्षत्र के लिए महुआ का वृक्ष लगाना लाभकारी होता है।
इस प्रकार सरल उपाय करके एक तरफ जहां हम पर्यावरण संरक्षण में सहायता करेंगे वहीं हम भौतिक, अध्यात्मिक तथा परलौकिक लाभ प्राप्त करने के लिए वृक्षारोपण कर अपने तथा समाज व देश के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे होंगे।

नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़-पौधे :-

1. अश्विनी – कुचला

2. भरणी– आंवला

3. कृतिका – गूलर

4. रोहिणी – जामुन

5. मृगशिरा – खैर

6. आर्द्रा– शीशम

7. पुनर्वसु – बांस

8. पुष्य – पीपल

9. अश्लेषा – नागकेसर

10. मघा – वट

11. पूर्वाफाल्गुनी – पलास

12. उत्तराफाल्गुनी – पाकड़

13. हस्त – रीठा

14. चित्रा – बेल

15. स्वाती- अर्जुन

16 विशाखा – भटकटैया

17. अनुराधा – मौलसरी

18. ज्येष्ठा – चीड़

19. मूल – साल

20. पूर्वाषाढ़ा – अशोक

21. उत्तराषाढ़ – फालसा

22. श्रवण – मदार

23. धनिष्ठा – शमी

24. शतभिषा – कदम्ब

25. पूर्वभाद्रपद– आम

26. उत्तराभाद्रपद – नीम

27. रेवती – महुआ

बारह राशि के पेड़-पौधे :-

मेष – आंवला

वृष – जामुन

मिथुन – शीशम

कर्क – नागकेश्वर

सिंह – पलास

कन्या – रीठा

तुला – अर्जुन

वृश्चिक – मौलसरी

धनु – जलवेतस

मकर – अकोल

कुंभ – कदम्ब

मीन – नीम

ग्रहों के पेड़ -पौधे :-

सूर्य – अकोल

चन्द्रमा – पलास

मंगल – खैर

बुद्ध – चिरचिरी

गुरु – पीपल

शुक्र – गुलड़

शनि – शमी

राहु – दुर्वा

केतु – कुश

ग्रह, राशि, नक्षत्र के लिए निर्धारित पेड़ पौधे का प्रयोग करने से अंतश्चेतना में सकारात्मक सोच का संचार होता है, तत्पश्चात हमारी मनोकामनायें शनै शनै पूरी होती है ।

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कुण्डली के राजयोग-

राजयोग उत्तरकालामृत में :-

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यदा मुश्तरी कर्कटे वा कमाने, अगर चश्मखोरा पड़े आयुखाने।
भला ज्योतिषी क्या लिखेगा पढ़ेगा, हुआ बालका बादशाही करेगा।।

उत्तरकालामृत ग्रन्थ में उल्लेखित यह ज्योतिषीय खोज अब्दुल रहीम खानखाना की कृति है, जो की मुगल काल के विद्वान थे। सैकड़ो वर्ष के उपरांत आज भी यह खोज सत्य ही प्रतीत होती है। इस ज्योतिषीय योग से स्पष्ट है कि यदि 2, 3, 5, 6, 8, 9 तथा 11, 12 में से किसी भी स्थान में बृहस्पति की स्थिति हो, और शुक्र 8वें स्थान में हो तो ऐसी ग्रह स्थिति में जन्म लेने वाला जातक चाहे साधारण परिवार में ही क्यों न जन्मा हो, वह राज्याधिकारी ही बनता है। यही कारण है कि कभी-कभी अत्यंत साधारण परिवार के बालकों में भी राजसिक लक्षण पायें जाते हैं, और वे किसी न किसी दिन राज्य के अधिकारी घोषित किये जाते हैं। विभिन्न योगों के अनुसार ही मनुष्य की चेष्टायें और क्रियायें विकसित होती हैं, इस विषय पर विभिन्न शास्त्रों का भी उल्लेख दर्शनीय है। सर्वप्रथम ज्योतिष शास्त्र को लीजिये उसमें राजयोग के लक्षण इस प्रकार बतलाये गये हैं।
जिस व्यक्ति के पैर की तर्जनी उंगली में तिल का चिन्ह हो वह पुरूष राज्य-वाहन का अधिकारी होता है। जिसके हाथ की उंगलियों के प्रथम पर्व ऊपर की ओर अधिक झुके हों, वह जनप्रिय तथा नेतृत्व करने वाला होता है। जिसके हाथ में चक्र, दण्ड एवं छत्र युक्त रेखायें हों, वह व्यक्ति निसंदेह राजा अथवा राजतुल्य होता है। जिसके मस्तिष्क में सीधी रेखायें और तिलादि का चिन्ह हो, वह राजा के समान ही सुख को प्राप्त करता है, और उसमें बैद्धिक कुशलता भी पर्याप्त मात्रा में होती है।
किन्तु वृहज्जातक के अनुसार राजयोग के बारह प्रकार होते हैं :-

तीन ग्रह उच्च के होने पर जातक स्वकुलानुसार राजा (राजतुल्य) होता है। यदि उच्चवर्ती तीन पापग्रह हों तो, जातक क्रूर बुद्धि का राजा होता है, और शुभ ग्रह होने पर सद्बुद्धि युक्त। उच्चवर्ती पाप-ग्रहों से राजा की समानता करने वाला होता है, किन्तु राजा नहीं होता। मंगल, शनि, सूर्य और गुरू चारों अपनी-अपनी उच्च राशियों में हों, और कोई एक ग्रह लग्न में उच्चराशि का हो तो, चार प्रकार का राजयोग होता है। चन्द्रमा कर्क लग्न में हो, और मंगल, सूर्य तथा शनि और गुरू में से कोई भी दो ग्रह उच्च हों तो, भी राजयोग होता है। जैसे- मेष लग्न में सूर्य, कर्क में गुरू, तुला का शनि और मकर राशि में मंगल भी प्रबल राजयोग कारक होता है, कर्क लग्न से दूसरा, तुला से तीसरा, मकर से चौथा जो तीन ग्रह उच्च के हों, जैसे मेष में सूर्य, कर्क में गुरू, तुला में शनि तो भी राजयोग माना जाता है। शनि कुंभ में, सूर्य मेष में, बुध मिथुन में, सिंह का गुरू और वृश्चिक का मंगल तथा शनि सूर्य और चन्द्रमा में से एक ग्रह लग्न में हो तो भी पांच प्रकार का राजयोग माना जाता है।

सूर्य बुध कन्या में हो, तुला का शनि, वृष का चंद्रमा और तुला में शुक्र, मेष में मंगल तथा कर्क में बृहस्पति भी राजयोगप्रद ही माने जाते हैं। मंगल उच्च का सूर्य और चन्द्र धनु में और लग्न में मंगल के साथ यदि मकर का शनि भी हो तो, मनुष्य निश्चित ही राजा (राजतुल्य) होता है। शनि चन्द्रमा के साथ सप्तम में हो, और बृहस्पति धनु का हो, तथा सूर्य मेष राशि का हो, और लग्न में हो तो, भी मनुष्य राजा होता है। वृष का चन्द्रमा लग्न में हो, और सिंह का सूर्य तथा वृश्चिक का बृहस्पति और कुंभ का शनि हो तो, मनुष्य निश्चय ही राजा होता है। मकर का शनि, तीसरा चन्द्रमा, छठा मंगल, नवम् बुध, बारहवां बृहस्पति हो तो, मनुष्य अनेक सुंदर गुणों से युक्त राजा होता है। धनु का बृहस्पति चंद्रमा युक्त क्रमश: अपने-अपने उच्च राशिगत हों तो, जातक गुणावान राजा होता है। और मंगल मकर का और बुध शुक्र अपने-अपने उच्च में लग्न गत हों तो, जातक गुणावान राजा होता है। मंगल शनि पंचम गुरू और शुक्र चतुर्थ तथा कन्या लग्न में बुध हों तो, जातक गुणावान राजा होता है। मीन का चंद्रमा लग्न में हो, कुंभ का शनि, मकर का मंगल, सिंह का सूर्य जिसके जन्म कुण्डली में हों, वह जातक भूमि का पालन करने वाला गुणी राजा होता है। मेष का मंगल लग्न में, कर्क का बृहस्पति हो तो, जातक शक्तिशाली राजा होता है। कर्क लग्न में बृहस्पति और ग्याहरवें स्थान में वृष का चंद्रमा शुक्र, बुध और मेष का सूर्य दशम स्थान में होने से जातक पराक्रमी राजा होता है।

मकर लग्न में शनि, मेष लग्न में मंगल, कर्क का चन्द्र, सिंह का सूर्य, मिथुन का बुध और तुला का शुक्र होने से जातक यशस्वी व भूमिपति होता है। कन्या का बुध लग्न में और दशम शुक्र सप्तम् बृहस्पति तथा चन्द्रमा भी जातक राजा होता है। जितने भी राजयोग हैं, इनके अन्तर्गत जन्म पाने पर मनुष्य चाहे जिस जाति स्वभाव और वर्ण का क्यों न हो, वे राजा ही होता है। फिर राजवंश में जन्म प्राप्त करने वाले जातक तो चक्रवर्ती राजा तक हो सकते हैं। किन्तु अब कुछ इस प्रकार के योगों का वर्णन किया जा रहा है जिनमें केवल राजा का पुत्र ही राजा होता है, तथा अन्य जातियों के लोग राजा तुल्य होते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि राजा का पुत्र राजा ही हो, उसके लिये निम्नलिखित में से किसी एक का होना नितांत आवश्यक है, कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि राजवंश में जन्म पाने वाला जातक भी सामान्य व्यक्ति होता है, और सामान्य वंश और स्थिति में जन्म पाने वाला महान हो जाता है, उसका यही कारण है। यदि त्रिकोण में 3-4 ग्रह बलवान हों तो राजवंशीय राजा होते हैं। जब 5-6-7 भाव में ग्रह उच्च अथवा मूल त्रिकोण में हों तो, अन्य वंशीय जातक भी राजा होते हैं। मेष के सूर्य चंद्र लग्नस्थ हों और मंगल मकर का तथा शनि कुंभ का बृहस्पति धनु का हो तो, राजवंशीय राजा होता है।

यदि शुक्र 2, 7 राशि का चतुर्थ भाव में और नवम स्थान में चंद्रमा हो और सभी ग्रह 3,1,11 भाव में ही हों तो, ऐसा जातक राजवंशीय राजा होता है। बलवान बुध लग्न में और बलवान शुक्र तथा बृहस्पति नवम स्थान में हो और शेष ग्रह 4, 2, 3, 6, 10, 11 भाव में ही हों तो, ऐसा राजपुत्र धर्मात्मा और धनी-मानी राजा होता है। यदि वृष का चंद्रमा लग्न में हो और मिथुन का बृहस्पति, तुला का शनि और मीन राशि में अन्य रवि, मंगल, बुध तथा शुक्र ग्रह हों तो, राजपुत्र अत्यंत धनी होता है। दशम चन्द्रमा, ग्याहरवां शनि, लग्न का गुरू, दूसरा बुध और मंगल, से राजपुत्र राजा ही होेता है। किंतु यदि मंगल शनि लग्न में चतुर्थ चंद्रमा और सप्तम बृहस्पति, नवम, शुक्र, दशम सूर्य, ग्यारहवें बुध हो तो, भी यही फल होता है। चतुर्थ में सूर्य और शुक्र होने से राजपुत्र राजा ही होेता है। किंतु यदि मंगल शनि लग्न में चतुर्थ चंद्रमा और सप्तम बृहस्पति, नवम, शुक्र, दशम सूर्य, ग्यारहवें बुध हो तो, भी यही फल होता है। एक बात सबसे अधिक ध्यान देने की यह है कि राजयोग का निर्माण करने वाले समस्त ग्रहों में से जो ग्रह दशम तथा लग्न में स्थित हों तो, उनकी अन्तर्दशा में राज्य लाभ होगा जब दोनों स्थानों में ग्रह हों तो, उनसे भी अधिक शक्तिशाली राज्य लाभ होगा, उसके अन्तर्दशा में जो लग्न, दशम में अनेक ग्रह हों तो, उनमें जो सर्वाेत्तम बली हो, उसके प्रभाव के द्वारा ही राज्य का लाभ हो सकेगा। बलवान ग्रह द्वारा प्राप्त हुआ राज्य भी छिद्र दशा द्वारा समाप्त हो जाता है। यह जन्म कालिक शत्रु या नीच राशिगत ग्रह की अन्तर्दशा छिद्र दशा कहलाती है। जो राज्य को समाप्त करती है, अथवा बाधायें उपस्थित करती है। यदि बृहस्पति, शुक्र और बुध की राशियां 4, 12, 6, 2, 3, 6 लग्न में हों, और सातवां शनि तथा दशम सूर्य हो तो, भी मनुष्य धन रहित होकर भी भाग्यवान होता है, और अच्छे साधन उसके लिये सदा उपलब्ध होते हैं। यदि केन्द्रगत ग्रह पाप राशि में हों, और सौम्य राशियों में पापग्रह होें तो, ऐसा मनुष्य चोरों का राजा होता है। इस प्रकार से विभिन्न राजयोगों के होने पर मनुष्य सुख और ऐश्वर्य का भोग करता।

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