गरूड पुराण

क्या यमलोक अथवा परलोक का अस्तित्व है :-

Dr.R.B.Dhawan

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क्या पृथ्वी के बाहर भी कहीं जीवन का अस्तित्व है? क्या यमलोक अथवा परलोक का अस्तित्व है? क्या कोई दूसरी दुनियां है? मनुष्य के लिये सदा से ही यह खोज का विषय रहा है। इस विषय में क्या कहते हैं हमारे धर्मग्रन्थ- हमारे धर्म ग्रंथों गरूड़ पुराण में किसी-न-किसी रूप में सौरमण्डल के सभी ग्रहों पर जीवंतता का विवरण इस प्रकार मिलता है। पृथ्वी पर के जीवों का शरीर पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश) का बना है। और गहन अध्ययन करें तो ज्ञात होता है हमारा शरीर 24 तत्वों का है जिनमें पंचमहाभूत, पंच तन्मात्रा, पंच ज्ञानेन्द्रियाँ पंच कर्मेन्द्रियां तथा मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार का समावेश होता है। इस प्रकार मानव से भिन्न अन्य प्राणियों के शरीर में कुछ तत्वों का अभाव भी हो सकता है, परन्तु पंचमहाभूत का लोप नहीं हो सकता।

मानव शरीर चार प्रकार का होता है- 1. पार्थिव शरीर प्रथम है जिसे स्थूल शरीर भी कहते हैं। 2. दूसरे प्रकार का शरीर सूक्ष्म शरीर कहा जाता है। 3. लिंगम शरीर भी एक तीसरे प्रकार का शरीर है। 4. चौथे प्रकार का शरीर कारण शरीर कहलाता है। (स्थूल शरीर प्राणी की जीवित अवस्था है, शेष तीन शरीर स्थूल शरीर का त्याग करने पर प्राप्त होते हैं।) सूक्ष्म शरीर में पंच महाभूत नहीं होते, यह शरीर पारदर्शी होता है, इसकी छाया नहीं पड़ती। इस शरीर की आकृति ठीक स्थूल शरीर जैसी होती है, परन्तु पंच महाभूतों के न रहने के कारण यह हल्का होता है, तथा उसमें शक्ति बहुत अधिक होती है। उसमें संघटन एवं विघटन की प्रक्रिया अपने आप होती रहती है। भूत-प्रेत आदि की सूक्ष्म देह ही होती है। इन देह धारियों के लिये पृथ्वी जैसे ठोस ग्रहों पर निवास आवश्यक नहीं वे तो अंतरिक्ष में भी रह सकते हैं। जिन सूक्ष्म शरीर धारियों को पुनः पृथ्वी पर जन्म लेना है, वे ही पृथ्वी के निकट विचरण करते हैं। वे अंतरिक्ष में एक निश्चित सीमा से आगे नहीं जा पातेे। भूतकालिक संस्कारों के वशिभूत वे मानव जाति से सम्पर्क भी स्थापित करते हैं। किसी काया में प्रवेश की क्षमता भी उनके पास होती है।
लिंगम शरीर एक तीसरे प्रकार का शरीर है, इसमें मात्र तेरह तत्व मात्र होते हैं। इस शरीर मे केवल पंच कर्मेन्द्रियाँ, पंच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन, बुद्धि एवं अंहकार होता है। पंच महाभूत न होने के कारण यह शरीर भी स्थूल नहीं होता। तेरह तत्व का शरीर पितृवर्ग का होता है। इनका निवास चंद्रलोक में कहा गया है, जहाँ विज्ञान पहुँच चुका है। वहाँ मानव जीवन के कुछ चिन्ह नहीं मिले। स्पष्ट है कि तेरह तत्वों के शरीरधारी को देखने की क्षमता साधारण मनुष्य में नहीं होती, इसी लिये तो चंद्रलोक में मानव जीवन के चिन्ह नहीं मिले। चौथे प्रकार का शरीर कारण शरीर कहलाता है, इस शरीर की आकृति अंगूठे के आकार की मानी जाती है। वस्तुतः आत्मा को ही अंगूष्ठ आकार का कहा गया है, यद्यपि आत्मा एक प्रकाशपुंज है, उसका कोई स्वरूप नहीं होता, भला उसकी आकृति क्या हो सकती है? व्यक्तित्व बोध के कारण ही आत्मा को एक प्रकार का शरीर समझ लिया गया है। ऐसे ही जिन कारण शरीरों को फिर पार्थिव शरीर में नहीं लौटना होता, वे दूरस्थ लोक-लोकान्तरों का परिभ्रमण करते हुये अंत में परमधाम ‘सूर्यलोक’ की ओर प्रस्थान करता है, तथा आत्मा का परमात्मा में विलय हो जाता है।

श्री मद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध के इक्कीसवें अध्याय में सूर्य के रथ और उसकी गति का वर्णन आया है। इसमें श्लोक 12 में सूर्य के रथ की गति एक मुहूर्त में चौतिस लाख आठ सौ योजन लिखा है। पुनः श्लोक 19 मे लिखा है कि, सूर्य भूमण्डल के नौ करोड़ इक्यावन लाख योजन लम्बे घेरे को प्रत्येक क्षण में दो हजार दो योजन की गति से पार करते हैं। पृथ्वी से सूर्य की दूरी विज्ञानविद् जितना मानते हैं, उसकी पुष्टि इस श्लोक से हो जाती है। बाईसवें अध्याय मे भिन्न-भिन्न ग्रहों की स्थिति एवं गति का वर्णन है, जिसमें क्रमशः चंद्रमा, शुक्र, बुध, मंगल, बृहस्पति तथा शनि का वर्णन आया है। भागवत पुराण में चंद्रमा को ग्रह माना गया है, तथा इन्हें सर्वमय कहा गया है। इस अध्याय के आठवें श्लोक में चंद्रमा को सूर्य किरणों से दो लाख योजन ऊपर बतलाया गया है।
ज्योतिष विज्ञान में सूर्य आत्मकारक कहा गया है। चंद्रमा को मन का कारक अमृतमय ग्रह कहा गया है। तथा बृहस्पति ग्रह को ज्ञान एवं जीवकारक कहा गया है। इसी प्रकार शनि को न्यायकर्ता, मृत्यु एवं आयु का कारक ग्रह कहा गया है। शनि के कारकत्व से ऐसा लगता है कि वह यमराज एवं धर्मराज दोनों के कारकत्व रखते हैं। जहाँ तक दूरी का प्रसंग है, और भागवत पुराण में जो विवरण है, उससे वर्तमान सभी ग्रह मृतिका-पिण्ड सिद्ध होते हैं। क्योंकि इन सभी ग्रहों पर सूर्य किरणों की पहुँच है। साथ ही प्रत्येक ग्रह में मात्र दो लाख योजन का अन्तर बताया गया है। जबकि शनि की दूरी 15 करोड़ 38 लाख मील सूर्य से बताई गई है। ग्रहों की पारस्परिक दूरी में भागवत पुराण का विवरण अस्पष्ट है तथा सूर्य किरणों से ऊपर होने का अर्थ भी स्पष्ट नहीं है। किन्तु ग्रहों का क्रमिक स्थान युतियुक्त है।

गरूड़ पुराण में प्रेत कर्म एवं मृत्यु का विवरण मिलता है- देहावसान के बाद स्थूल शरीर छूट जाने पर जीव कुछ क्षण के लिये कारण शरीर में निवास करता है, इस का कारण यह है कि- एक से लेकर दो क्षण तक मृत्यु के पूर्व प्रत्येक प्राणी को सर्वात्म दृष्टि प्राप्त हो जाती है। (एक क्षण चार मिनट का होता है।) सर्वात्म दृष्टि में माया-मोह का बंधन नहीं रह जाता। इसी अवस्था में स्थूल शरीर से कारण शरीर में जीव का वहिर्गमन होता है, परंतु यह परिर्वतन अस्थायी होता है। कारण शरीर की गति प्रकाश की गति जैसी होती है, इसलिये शरीर छूटते ही दो मुहूर्त में जीव यमलोक पहुंच जाता है। एक मुहूर्त 48 मिनट का होता है। इस तरह यमलोक जाने में 96 मिनट लगते हैं। इस अवधि में प्रकाश की गति से 96 करोड़ मील की दूरी तय हो सकती है। इस तथ्य के अनुसार मृत्यु के बाद जीव शनि लोक में जाता है, क्योंकि शनि की दूरी 95 करोड़ 38 लाख मील है। गरूड़ पुराण का कथन है कि दो मुहूर्त में जीव यमराज के पास जाता है, वहाँ एक मुहूर्त में उसके कर्म-अकर्म की छानबीन होती है, तथा पुनः दो मुहूर्त में वह अपने मृत-शरीर के पास वापिस भेज दिया जाता है। किन्तु उसे स्थूल शरीर में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं होती। तब एकबार फिर से वह सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करता है।

उसी पुराण में पुनः कहा गया है कि षोड़श श्राद्ध (16 दिन में) के फलस्वरूप जीव को क्रमशः सूक्ष्म एवं छ माह के उपरांत लिंगम् शरीर प्राप्त होते हैं, तथा अन्त में पुनः कारण शरीर में आना होता है। यह प्रक्रिया इस प्रकार है- दसकर्म (10 दिन में) सूक्ष्म शरीर बनता है, 11वें दिन से जीव पुनः सूक्ष्म शरीर धारण कर पृथ्वी से बृहस्पति ग्रह तक यात्रा आरम्भ करता है। अर्थात् सूक्ष्म शरीर प्राप्त कर जीव दूसरी बार फिर से यमपुरी के लिये रवाना होता है। इस बार उसे वहाँ तक जाने में एक वर्ष लग जाता है। कारण स्पष्ट है। पहली बार जीव कारण शरीर में प्रकाश की गति से गया था, दूसरी बार वह सूक्ष्म शरीर में चलता है, और मार्ग में उसे अंतरिक्ष की अठारह सूक्ष्म पुरियां में विश्राम लेना पड़ता है। इस यात्रा के एक वर्ष में छः माह तक वह सूक्ष्म शरीर में होने के कारण मंदगति हो जाता है। इस शरीर से पहला ठहराव उसे 18 दिन के बाद ही सौम्यपुर में मिलता है। दूसरे पाँच ठहराव हैं- सौरोपुर नरेन्द्रभवन, गंधर्व, शैलागय तथा कौंचपुर। पृथ्वी से चलकर चंद्रमा, मंगल, एवं ग्रहगुच्छ तक पुरलोक में प्रवाहवायु के भेद से ये छः ठहराव नियत हैं। इन स्थानों पर जीव अपने पूर्वार्जित पुण्य कर्म का भोग करता है। ग्रह गुच्छ में कोई दो हजार छोटे-बड़े ग्रह पिण्ड हैं। इसकी तुलना वैतरणी नदी से की गई है। इनकी दूरी सूर्य से 31 करोड़ मील है। यहाँ तक जीव सूक्ष्म शरीर में जाता है। वैतरणी पार कर लेने पर उसे लिंगम् शरीर मिलता है। इस शरीर में वह बृहस्पति ग्रह तक जाता हैै बृहस्पति की दूरी 56 करोड़ मील है। बृहस्पति ग्रह से आगे बढ़ने पर पुनः जीव कारण शरीर में चला जाता है, वैतरणी के बाद बारह ठहराव इस प्रकार हैं- क्रूरपुर, विचित्र भवन, वहवापदपुर, दुःखपुर, नाना-क्रंदपुर, सुतप्त भवन, रौद्रपुर, पयोवर्षण, शीताड्य नगर, बहुभीतिपुर, धर्म भवन एवं संजीवनी नगर।
गरूड़ पुराण में जिस प्रकार यमलोक का वर्णन आया है। उसमें कहा गया है कि यमपुरी के बाहर एक विशाल घेरा है। यह घेरा शनि ग्रह के चारों और कोहरे की बैल्ट के रूप में दीखाई पड़ता है। सार रूप में यह संकेत मिलता है कि वहाँ के रहने वाले मात्र कारण शरीर में रहते हैं। कारण शरीर प्रकाश-पुंज भर होता है। इस तरह वहाँ की जीवंतता प्रकाश किरणों के रूप में हमें दृष्टिगत हो सकती है। गरूड़ पुराण के अनुसार आज विज्ञानविद् ग्रह स्थिति एवं गति का जैसा विवरण दे रहे हैं, वह ठीक सिद्ध हो जाता है। शरीर की भिन्नता के कारण वहाँ की जीवंतता में भी संदेह नहीं रह जाता मानव अपनी सीमित शक्ति के सहारे यदि उन जीवंतताओं को नहीं देख पाता तो उन्हें झुठलाया भी नहीं जा सकता। इस प्रकार गरूड़ पुराण में वर्णित जीव की मृत्योपरांत यमपुरी या परलोक यात्रा सत्य जान पड़ती है।

Dr.R.B.Dhawan

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प्रेमी-प्रेमिका और शुक्र

प्रेम और विलासिता का कारक शुक्र :-

Dr.R.B.Dhawan

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प्रेमी-प्रेमिका में झगडे क्यों होते हैं? आईये इसका कारण ज्योतिष शास्त्र से जानते हैं- किसी भी जन्मकुण्डली में प्रेमी का स्थान पाँचवां होता है, जातक का अपना स्थान प्रथम स्थान है। अच्छी रिलेशनशिप तभी रह सकती है, जब प्रथम स्थान के स्वामी ग्रह और कुण्डली से पाँचवे स्थान के स्वामी ग्रह मित्र होंगे। यह तो हुई साधारण बात, अब यह भी देखना होगा की जातक की रिलेशनशिप से किसी दूसरे का हाजमा तो खराब नहीं हो रहा ? :- (रिलेशनशिप से प्राब्लम) कहीं वह गुप्त दुश्मनी तो नहीं निभा रहा ? यह पता चलेगा जातक की कुण्डली के पंचमेश की सेहत देखने से! पंचमेश की सेहत खराब करने के लिये कुण्डली के षष्ठेश या अष्ठमेश जिम्मेदार हो सकते हैं, अर्थात् पंचमेश षष्ठ या अष्ठम में नहीं होना चाहिए, अथवा षष्ठेश या अष्ठमेश के साथ नहीं होना चाहिए, या फिर षष्ठेश या अष्ठमेश पंचम में नहीं होना चाहिए। यह तो हुई बड़ी वजह, इसके अतिरिक्त एेसा भी हो सकता है की जातक का कोई सगा सम्बंधी ही इस खेल को बिगाड़ने में लगा हो।

वैवाहिक सुख का कारक ग्रह शुक्र :-

आज का युग बहुत तेज गति से शुक्र प्रधान हो रहा है, बेशक ज्योतिष के विद्वानों को मेरी यह बात कुछ अटपटी सी लगेगी। परंतु तथ्य यही बताते हैं कि बढ़ी तेजी से यह युग बदल रहा है। पहले एक छोटा सा उदाहरण प्रस्तुत है- आज से 50-100 वर्ष पूर्व लोग या तो पैदल यात्रा करते थे या फिर पशुओं का अथवा पशुओं द्वारा चलित वाहनों का प्रयोग करते थे। अर्थात् गुरू (जीव प्रधान) वाहन का प्रयोग किया जाता था। जो आज धीरे-धीरे करके आरामदायक (शुक्र प्रधान) वाहन ने ले ली है। पशुओं से चलने वाले वाहनों की जगह अब स्वचालित लग्जरी वाहनों ने ले ली है। इस प्रकार प्राणीयों का प्रतीक गुरू शीण हो गया है। दूसरा उदाहरण- एक जमाना था जब बड़ी-बूढी अपनी बहुओं को आशिर्वाद देती थी- “दूधों नहाओ पूतों फलो” आज इसमें से दूधों नहाओ तो ठीक है, परंतु “पूतों फलो” भला किस नवविवाहिता को पसंद आती है? इस आशिर्वाद का पूतों फलो वाला भाग भी गुरू का विभाग है। जो नवविवाहिता बहुओं को पसंद नहीं, क्योंकि अधिक संतान के लिये आज इस वर्ग के विचार बदल गये हैं, यहाँ भी गुरू निर्बल प्रतीत होता है। तीसरा उदाहरण- विद्वान, आचार्य व गुरू जो अपने प्रवचन के द्वारा समाज को धर्म के मार्ग पर चलने के लिये दिशा दिखाने का कार्य करते थे, आज इन्हें सुनने का समय किसके पास है, यदि गलती से कहीं आमना-सामना हो भी जाये तो आज की नई पीढ़ी उनसे जान छुडाना चाहते हैं। इसी प्रकार वह अध्यापक जिनके चरण छूकर विद्यार्थी मान-सम्मान करते थे, आज वह कितनी दयनीय स्थिति में हैं? यह अध्यापक एेसे शिल्पकार हैं, जिनसे शिक्षा पाकर विद्यार्थीकाल अपने और देश के भाग्य का निर्माण करने की ताकत रखते हैं, परंतु जिस गुरू ने उन्हें इस योग्य बनाया है। उस गुरू की कितनी इज्जत हो रही है? किसी से छिपा नहीं। क्या यह गुरू का बल कम नहीं हो रहा? दूसरी ओर शिक्षा का आधुनिकीकरण करती शिक्षण संस्थायें (शुुक्र) फल-फूल रही हैं। एक उदाहरण और देता हूँ- बच्चे जवान हो जायें तो आज कितने एेसे माता-पिता हैं जिन्हें कन्या के लिये वर और बालक के लिये वधु ढूडने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। माता-पिता द्वारा पसंद युवक के लिये युवती, तथा कन्या के लिये वर (गुरू बल) के स्थान पर आजकल लव मेरिज (शुक्र बल) का प्रचलन अधिक हो चला है। आध्यात्मिकता, सहनशीलता, विवेक, बुद्धिमत्ता तथा अध्ययनशीलता (गुरू) की जगह आज सुंदरता, विलासिता और अश्लीलता (शुक्र) ने ले ली है। अब आप ही बतायें पूर्वकाल में विश्वगुरू कहलाने वाला हमारा भारत आने वाले कुच्छ ही वर्षों में क्या कहलायेगा ?

प्रेम सम्बन्ध :-
अब देखते हैं, जन्म कुंडली मे कौन से एेसे योग होते हैं, जो प्रेम संबंध की सूचना देते हैं- कब ये शारीरिक सम्बन्ध स्तर पर भी होते है ? क्या कुण्डली में ऐसी स्थितियाँ भी है जो संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा तनाव भी देंगी ? क्या ये संबंध दुनियाँ से छिपे रह सकते है ? क्या प्रेम संबंधों में अलगाव (Break up) तो नही है ? क्या एक से अधिक भी प्रेम संबंध होंगे ? क्या प्रेम संबंध विवाह में परिणित होगें ? यह सब प्रश्न हैं आज के युवा वर्ग के।
भारतीय ज्योतिष पद्धति के द्वारा हम इन सभी स्थितियों को जन्म पत्रिका के माध्यम से देख सकते हैं ।और विश्लेषित भी कर सकते हैं, और उस समय विशेष की गणना भी कर सकते हैं । जब इनमे से कोई भी स्थिति हमारे जीवन मे घटित होगी ? आईये देखें जन्म पत्रिका में कौन सी स्थितियाँ बनाती है प्रेम संबंध ?- जन्म कुण्डली का पंचम भाव (5th house) हमारी कला कौशल के साथ प्रेम तथा भावनाओं का ओर दिल से किये गए कार्य का स्थान होता है । जन्म कुंडली मे चंद्रमा, शुक्र और मंगल प्रमुख ग्रह हैं, जो अपने आपसी सम्बन्धो के आधार पर व्यक्ति को एक विशेष आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करते हैं, तथा जातक को प्रेम करने को वशीभूत करते हैं। चंद्रमा मन का कारक है । जन्म पत्रिका में मजबूत चंद्रमा विचारों को शक्ति प्रदान करता है। मन में कल्पनाशीलता ओर भावनाएँ जगाता है, और जातक परम्पराओ को तोड़कर दुनिया की परवाह किये बगैर प्रेम के रास्ते पर आगे बढ़ता है, जब कुण्डली में चंद्रमा का संबध किसी भी प्रकार से शुक्र से होता है तो, व्यक्ति प्यार में कल्पनाओ की उड़ान भरता है, और शीघ्र ही विपरीत लिंग की तरफ आकर्षित हो जाता है।

जन्म कुंडली में मंगल + शुक्र का संबंध जब जन्म कुंडली में 1, 2, 3, 5, 7, 11,12 भावो में बनता है, तब व्यक्ति आकर्षण का केंद्र होता है, और साथ ही स्वयं भी विपरीत लिंग की ओर शीघ्र आकर्षित होता है।जन्म कुंडली में जब इन स्थितियों के साथ पंचम भाव तथा पमचमेश से संबंध बनाने वाले किसी भी ग्रह की अथवा चंद्रमा, शुक्र, मंगल से संबंधित दशाएँ अन्तरदशाएँ आती हैं तो, जातक प्रेम करता है ।

जब पंचम भाव अथवा पंचमेश का शुभ संबंध केंद्र त्रिकोण से अथवा एकादश भाव (11th house) से शुभ भावों में होता है तो, ये सच्चा ओर आदर्श प्रेम संबध होता है । यदि इन संबंधों में द्वादश भाव भी सम्मलित हो जाता है तो, ये प्रेम शारीरिक स्तर पर भी प्रकट हो जाता है। जब इन सम्बन्धो में द्वादश भाव के साथ अष्टम भाव या अष्टमेश सम्मलित होता है तोे, संबंधों में बदनामी, लोकनिंदा, तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है । जब प्रेम संबंधों में सप्तम भाव अथवा सप्तमेश का समावेश होता है तो, ये संबंध अन्य स्थितियों के सकारात्मक होने पर प्रेम विवाह में परिणित हो जाते हैं। शुभ गुरु और शनि प्रेम संबंधों ओर विवाह की स्थितियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां तक कि इनसे गुरु का सबंध कभी भी प्रेम संबंधों को दुनियां के समक्ष उजागर तक नही होने देता ।

सभी वर्ग कुंडलियों, अष्टक वर्ग, ग्रहो के किसी विशेष बल, कुण्डली में बने विशेष संबंधों ओर योगायोगों का, संबंधित शुभ अशुभ दशाओं अन्तरदशाओं, संबंधित शुभ अशुभ गोचर का गहन अध्ययन तथा विश्लेशण करने के बाद ही कहा जा सकता है कि – प्रेम संबधो का कोई दर्दनाक अंत होगा या ये संबंध विवाह के रूप में जीवन को महकाएँगे! जन्म कुंडली मे जैसा दिखता है वैसा कभी नही होता, और जो होता है वह तो बहुत ही गहराई में ही छिपा है, जिसे देख पाना गहन कुण्डली विश्लेषण से ही संभव होता है। कुछ आसान, आवश्यक तथा सही समय पर किये गए सही उपाय, कुछ जन्म पत्रिका के अनुसार सकारात्मक ग्रहों का सहयोग, और कुछ सही मार्ग का चयन और सही दिशा में किया गया परिश्रम। सुखी और खुशियों से भरा जीवन दे सकते हैं।

एक निश्चित आयु में प्रत्येक युवक अथवा युवती की उत्कृट इच्छा रहती है कि उसे अपने मनोनुकूल सुंदर जीवन साथी मिले। एेसे हार्दिक तथा प्रबल आकर्षण का मूल श्रोत संगीत, आदर्षवादिता, कला-क्रीड़ा-सौंदर्य एवं शारीरिक विधान तथा प्रसाधन में ही अंतर्निहित है। उत्तरोत्तर परिवर्तनीय सभ्यता संस्कृति के कारण हमारे देश में भी पाश्चात्य देशों की तरह परिवार की सम्मति अथवा स्वीकृति का महत्व समाप्त होता जा रहा है, युवक व युवतियों का दृष्टिकोण इस प्रसंग में दिनानुदिन लोचपूर्ण तथा उदार होता जा रहा है, अतः स्वजातीय विवाह arenge marriage की अपेक्षा अंतर्जातीय विवाह love marriage की ओर इनका रूझान होता जा रहा है। ज्योतिष शास्त्र की दृिष्टि से देखें तो ज्ञात होता है कि ज्योतिष भी इन बंधनों को नही मानता। इसका मूल कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन ग्रहों के मूलभूत सिद्धांतों पर निर्भर है। अतएव युवक-युवतीयों अथवा नर-नारियों के प्रेम विवाह Love marriage की भावी संभावनाओं का निरूपण प्रस्तुत करना मेरी इस पुस्तक “विवाह एवं दाम्पत्य सुख” का एक उद्देश्य है। विवाह एवं दाम्पत्य सुख (Marriage & Happy Married Life) हाल ही में प्रकाशित हुई नयी पुस्तक है। इस पुस्तक में विवाह सुख के योग, विवाह में क्यों विलम्ब marriage delay होता है? विवाह के लिये तथा विवाहित दम्पतियों के गृहस्थ सुख में बाधाओं का निवारण marriage Life problems and solutions बताया गया है। अभी तक मेरी 10 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन सभी की जानकारी http://www.shukracharya.com पर उपलब्ध है।

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