कुबेर पूजन

धन त्रयोदशी तिथि पर किया जाता है- कुबेर पूजन।

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवलोक में वास करने वाले देवताओं के धनाध्यक्ष कुबेर हैं। कुबेर न केवल देवताओं के धनाध्यक्ष हैं, बल्कि समस्त यक्षों, गुह्यकों और किन्नरों, इन तीन देवयोनियों के अधिपति भी कहे गये हैं। ये नवनिधियों में पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और वर्चस् के स्वामी भी हैं। जब एक निधि भी अनन्त वैभवों को देने वाली मानी गयी है, और धनाध्यक्ष कुबेर तो गुप्त या प्रकट संसार के समस्त वैभवों के अधिष्ठाता देव हैं। यह देव उत्तर दिशा के अधिपति हैं, इसी लिये प्रायः सभी यज्ञ, पूजा उत्सवों तथा दस दिक्पालों के पूजन में उत्तर दिशा के अधिपति के रूप में कुबेर का पूजन होता है।

कुबेर कैसे बने धनाध्यक्ष ? :-
अधिकांश पुराण कथाओं के अनुसार पूर्वजन्म में कुबेर गुणनिधि नामक एक वेदज्ञ ब्राह्मण थे। उन्हें सभी शास्त्रों का ज्ञान था और सन्ध्या, देववंदन, पितृपूजन, अतिथि सेवा तथा सभी प्राणियों के प्रति सदा दया, सेवा एवं मैत्री का भाव रखते थे। वे बड़े धर्मात्मा थे, किंतु द्यूतकर्मियों की कुसंगति में पड़कर धीरे-धीरे अपनी सारी पैतृक सम्पत्ति गंवा बैठे थे। इतना ही नहीं, आदर्श आचरणों से भी च्युत हो गये थे। परंतु इनकी माता इनसे अत्यंत स्नेह करती थीं और इसी कारण वे इनके पिता से पुत्र के दुष्कर्मों की चर्चा न कर पाती थीं। एक दिन किसी अन्य माध्यम से उनके पिता को पता चला और उन्होंने गुणनिधि की माता से अपनी सम्पत्ति तथा पुत्र के विषय में पूछा तो पिता के कोपभय से गुणनिधि घर छोड़कर वन में चले गये। इधर-उधर भटकते हुये संध्या के समय वहां गुणनिधि को एक शिवालय दिखाई पड़ा। उस शिवालय में समीपवर्ती ग्राम के कुछ शिवभक्तों ने शिवरात्रिव्रत के लिए समस्त पूजन-सामग्री और नैवेद्यादि के साथ शिवाराधना का प्रबंध किया हुआ था। गुणनिधि भूखे तो थे ही, नैवेद्यादि देखकर उसकी भूख और तीव्र हो गयी। वह वहीं समीप में छुपकर उन भक्तों के सोने की प्रतीक्षा में उनके संपूर्ण क्रियाकलापों को बड़े ध्यान से देख रहे थे। रात्रि में उनके सो जाने पर जब एक कपड़े की बत्ती जलाकर पकवानों को लेकर भाग ही रहे थे कि उसका पैर एक सोये हुये पुजारी के पैर से टकरा गया और वह व्यक्ति चोर-चोर चिल्लाने लगा। गुणनिधि भागे जा रहे थे कि चोर-चोर की ध्वनि सुनकर नगर रक्षक ने उनके ऊपर बाण छोड़ा, जिससे उसी क्षण गुणनिधि के प्राण निकल गये। यमदूत जब उन्हेे लेकर जाने लगे तो भगवान् शंकर की आज्ञा से उनके गणों ने वहाँ पहुँचकर उन्हें यमदूतों से छुड़ा लिया और उन्हें कैलाशपुरी में ले आये। आशुतोष भगवान् शिव उनके अज्ञान में ही हो गये व्रतोपवास, रात्रि जागरण, पूजा-दर्शन तथा प्रकाश के निमित्त जलाये गये वस्त्रवर्तिका को आर्तिक्य मानकर उन पर पूर्ण प्रसन्न हो गये और उन्हें अपना शिवपद प्रदान किया। बहुत दिनों के पश्चात् वही गुणनिधि भगवान शंकर की कृपा से कलिंग नरेश होकर शिवाराधना करते रहे। पुनः पाद्मकल्प में वही गुणनिधि प्रजापति पुलस्त्य के पुत्र विश्रवामुनि की पत्नी और भारद्वाज मुनि की कन्या इडविडा (इलविला) के गर्भ से उत्पन्न हुये। विश्रवा के पुत्र होने से ये वैश्रवण कुबेर के नाम से प्रसिद्ध हुये तथा इडविडा के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण ऐडविड भी कहलाये। उत्तम कुल में उत्पन्न होने तथा जन्मान्तरीय शिवाराधना के अभ्यास योग के कारण वे बाल्यकाल से ही दिव्य तेज से सम्पन्न, सदाचारी एवं देवताओं के भक्त थे। उन्होंने दीर्घकाल तक ब्रह्माजी की तपस्या द्वारा आराधना की, इससे प्रसन्न होकर ब्रह्माजी देवताओं के साथ प्रकट हो गये और उन्होंने उसे लोकपाल पद, अक्षय निधियों का स्वामी, सूर्य के समान तेजस्वी पुष्पक विमान तथा देवपद प्रदान किया-

तग्दच्छ बत धर्मज्ञ निधीशत्वमपाप्रुहि।।
शक्राम्बुपयमानां च चतुर्थस्त्वं भविष्यसि।
एतच्च पुष्पकं नाम विमानं सूर्यसंनिभम्।।
प्रतिगृण्हीष्व यानार्थं त्रिदशैः समतां व्रज।
वा. रा. उ. 3। 18-20

वर देकर ब्रह्मादि देवगण चले गये। तब कुबेर ने अपने पिता विश्रवा से हाथ जोड़कर कहा कि ‘भगवन् ब्रह्माजी ने सब कुछ तो मुझे प्रदान कर दिया, किंतु मेरे निवास का कोई स्थान नियत नहीं किया। अतः आप ही मेरे योग्य कोई ऐसा सुखद स्थान बतलाइये, जहां रहने से किसी भी प्राणी को कोई कष्ट न हो।’ इस पर उनके पिता विश्रवा ने दक्षिण समुद्रतट पर त्रिकूट नामक पर्वत पर स्थित विश्वकर्मा द्वारा निर्मित, देवराज इन्द्र की अमरावती के समान अद्वितीय लंका नगरी कुबेर को प्रदान की और कहा कि वह नगरी स्वर्णनिर्मित है और वहां कोई कष्ट, बाधा नहीं है। पिता की आज्ञा से कुबेर लंकाध्यक्ष होकर बड़ी प्रसन्नता के साथ वहां निवास करने लगे। कुबेर शंकरजी के परम भक्त थे। बाद में इन्होंने भगवान शंकर की विशेष रूप में आराधना की तथा भगवान शंकर की कृपा से उन्होंने उत्तर दिशा का आधिपत्य, अलकानाम की दिव्यपुरी, नन्दनवन के समान दिव्य उद्यानयुक्त चैत्ररथ नामक वन तथा एक दिव्य सभा प्राप्त की। साथ ही वे माता पार्वती के कृपापात्र और भगवान शंकर के घनिष्ठ मित्र भी बन गये। भगवान शंकर ने कहा-

तत्सखित्वं मया सौम्य रोचयस्व धनेश्वर।
तपसा निर्जितश्चैव सखा भव ममानघ।।

‘हे सौम्य धनेश्वर! अब तुम मेरे साथ मित्रता का संबंध स्थापित करो, यह संबंध तुम्हें रूचिकर लगना चाहिये। तुमने अपने तप से मुझे जीत लिया है, अतः मेरा मित्र बनकर (यहां अलकापुरी में) रहो।’

पुराणों में कुबेर सभा का वर्णन:-
महाभारत, सभापर्व के 10वें अध्याय में राजाधिराज कुबेर की सभा का विस्तार से वर्णन है। तदनुसार उस सभा का विस्तार सौ योजन लम्बा और सत्तर योजन चौड़ा है। उसमें चन्द्रमा की शीतल श्वेतवर्ण की आभा उदित होती रहती है। इस सभा को कुबेर ने अपनी दीर्घ तपस्या के बलपर प्राप्त किया था। यह वैश्रवणी अथवा कौबेरी नाम की सभा कैलास के पार्श्रवभाग में स्थित है। इसमें अनेक दिव्य सुवर्णमय प्रासाद बने हुए हैं।
बीच-बीच में मणिजड़ित स्वर्णस्तम्भ बने हैं, जिसके मध्य में मणिमयमण्डित चित्र-विचित्र दिव्य सिंहासन पर ज्वलित कुण्डलमण्डित और दिव्य आभरणों से अलंकृत महाराज कुबेर सुशोभित रहते हैं। देवगण, यक्ष, गुह्यक, किन्नर तथा ऋषि-मुनि एवं दिव्य अप्सरायें उनकी महिमा का गान करते हुये वहाँ स्थित रहती हैं। इस सभा के चारों ओर मंदार, पारिजात और सौगन्धिक वृक्षों के उद्यान तथा उपवन हैं, जहां से सुगन्धित, सुखद शीतल, मंद हवा सभामंडप में प्रविष्ट होती रहती है। देवता, गंधर्व और अप्सरा के गण संगीत एवं नृत्य आदि से सभा को सुशोभित करते रहते हैं। इनकी सभा में रम्भा, चित्रसेना, मिश्रकेशी, घृताची, पुजिंकस्थला तथा उर्वशी आदि दिव्य अप्सरा नृत्य-गीत के द्वारा इनकी सेवा में तत्पर रहती हैं। यह सभा सदा ही नृत्य-वाद्य आदि से निनादित रहती है, कभी शून्य नहीं होती। कुबेर के सेवकों में मणिभद्र, श्वेतभद्र, प्रद्योत, कुस्तुम्बुरु, हंसचूड, विभीषण, पुष्पानन तथा पिंगलक आदि मुख्य सेवक हैं। राज्यश्री के रूप में साक्षात् महालक्ष्मी भी वहां नित्य निवास करती हैं। महाराज कुबेर के पुत्र मणिग्रीव और नलकूबर भी वहां स्थित होकर अपने पिता की उपासना करते हैं। साथ ही अनेक ब्रह्मर्षि, देवर्षि, राजर्षि भी महात्मा वैश्रवण की उपासना में रत रहते हैं।

गंधर्वों में तुम्बुरु, पर्वत, शैलूष, विश्वावसु, हाहा, हूहू, चित्रसेन तथा अनेक विद्याधर आदि भी अपने दिव्य गीतों द्वारा महाराज वैश्रवण की महिमा का गान करते रहते हैं। हिमवान्, पारियात्र, विन्ध्यादि पर्वत सेवा में प्रस्तुत रहते हैं तथा सभी देवयोनियाँ और शंख, पद्म आदि निधियां भी मूर्तिमान् रूप धारण कर उनकी सभा में नित्य उपस्थित रहती हैं। उमापति भगवान शिव भी महाराज कुबेर के अभिन्न मित्र होने के कारण त्रिशूल धारण किये हुये भगवती पार्वती के साथ वहां सुशोभित रहते हैं। इस प्रकार महाराज वैश्रवण की सभा ब्रह्मा तथा सभी लोकपाल की सभा से अति विचित्र एवं दिव्य है। राजाधिराज कुबेर इस सभा में स्थित होकर अपने वैभव का दान करते रहते हैं।

धनकुबेर और धन त्रयोदशी :-

धन त्रयोदशी तथा दीपावली के दिन धनाधिपति कुबेर के साथ साथ महालक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। देवताओं के धनाध्यक्ष महाराज कुबेर राजाओं के भी अधिपति हैं, क्योकि सभी निधियों, धनों के स्वामी यही देव हैं, अतः सभी प्रकार की निधियों या सुख, वैभव तथा वर्चस्व की कामना की पूर्ति, फल की वृष्टि करने में वैश्रवण कुबेर समर्थ हैं। सारांश में कहा जा सकता है कि धनाध्यक्ष कुबेर की साधना ध्यान करने से मनुष्य का दुःख-दारिद्रय दूर होता है और अनन्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। सनातन धर्म में गहरा विश्वास रखने वालों का अटल विश्वास है कि शिव के अभिन्न मित्र होने से कुबेर अपने भक्त की सभी विपत्तियों से रक्षा करते हैं, और उनकी कृपा से साधक में आध्यात्मिक ज्ञान-वैराग्य आदि के साथ-साथ उदारता, सौम्यता, शांति तथा तृप्ति आदि सात्त्विक गुण भी स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाते हैं।

राजाधिराज कुबेर की साधना-
महाराज वैश्रवण कुबेर की उपासना से संबंधित मंत्र, यंत्र, ध्यान एवं उपासना आदि की सारी प्रक्रियायें श्रीविद्यार्णव, मंत्रमहार्णव, मंत्रमहोदधि, श्रीतत्त्वनिधि तथा विष्णुधर्मोत्तरादि पुराणों में विस्तार से निर्दिष्ट हैं। तदनुसार इनके अष्टाक्षर, षोडशाक्षर तथा पंचत्रिंशदक्षरात्मक छोटे-बड़े अनेक मंत्र प्राप्त होते हैं। मंत्रों के अलग-अलग ध्यान भी निर्दिष्ट हैं। मंत्र साधना में गहन रूची रखने वाले साधक उपरोक्त ग्रन्थों का अवलोकन करें। यहाँ पाठकों के लिये धनाध्यक्ष कुबेर की एक सहज व सरल साधना पद्धति दी जा रही है। यह साधना धनत्रयोदशी के दिन की जानी चाहिये यदि कोई साधक इस साधना को दीपावली की रात्रि में करना चाहे तो उस महापर्व पर भी यह साधना कर सकते हैं। अथवा दोनो ही दिन (धनत्रयोदशी तथा दीपावली) यह साधना सम्पन्न की जा सकती है।

इस वर्ष धन त्रयोदशी 5 नवम्बर 2018 तथा दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है। यह साधना स्थिर लग्न में ही सम्पन्न की जाती है। क्योंकि स्थिर लग्न में जिस कार्य को किया जाता है वह स्थिरता को प्राप्त होता है, और लक्ष्मी को तो सभी स्थिर ही रखना चाहते हैं। अतः यह साधना तो अवश्य स्थिर लग्न में ही करनी चाहिये। ‘स्थिर लग्न’ इन दिनों में वृष तथा सिंह लग्न ही पढ रही हैं। वृषभ लग्न 5 नवम्बर 2018 धनत्रयोदशी के दिन सांयकाल 18 बजकर 05 मिनट से रात्रि 20 बजकर 00 मिनट तक रहेगी। तथा सिंह लग्न मध्य रात्रि में ठीक 24 बजकर 35 मिनट से 02 बजकर 52 मिनट तक रहेगी।

साधना पद्धति:- धनत्रयोदशी की रात्रि में उत्तर दिशा की ओर मुख करके पुरूष साधक पीले वस्त्र तथा महिलायें पीली साड़ी पहनकर बैठें सामने एक लकड़ी के पटरे पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाकर उस पर शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण प्राण प्रतिष्ठित श्री कुबेर यंत्र स्थापित करें, और साथ ही शुद्ध घी का दीपक जलाकर पंचोपचार पूजा करें मिठाई का भोग लगावें तथा विनियोगादि क्रिया करके 11 माला सप्तमुखी रूद्राक्ष की माला से कुबेर मंत्र का जप करें। जप सम्पूर्ण होने पर प्रसादरूप में मिठाई का परिजनों को वितरण करें और फिर रात्रि में उसी पूजा स्थल में ही निद्रा विश्राम करें। प्रातः शेष फूलादि सामग्री जल में विसर्जित कर दें तथा ‘शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण तथा प्राणप्रतिष्ठित श्री कुबेर यंत्र’ को पीले आसन सहित अपनी तिजोरी कैश बाॅक्स या अलमारी अथवा संदूक में रख दें। तथा रूद्राक्ष की जप माला को गले में धारण करें।

सम्पन्नता के लिये कुबेर मंत्र-
यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय स्वाहा।

वैसे तो इस मंत्र की जप संख्या एक लक्ष (एक लाख) कही गयी है। परंतु धन त्रयोदशी की रात्रि में जितना हो सके विधि-विधान से इस मंत्र का जप करना ही पर्याप्त होता है। मंत्र का जप सम्पन्न होने पर तिल एवं शुद्ध घी से दशांश हवन करना चाहिये। यह साधना कार्तिक कृष्ण 13 अर्थात् धन त्रयोदशी पर की जाती है, पूरे भारतवर्ष के लोग धन त्रयोदशी के दिन धनाधिपति कुबेर के साथ महालक्ष्मी तथा आरोग्य प्रदान करने वाले देव धनवंतरि की पूजा-आराधना एवं साधना करते हैं, और सुख संपदा के अभिलाषी तो इस दिन कुछ विशेष प्रयोग सम्पन्न करते हैं जिससे कि अगले पूरे वर्ष तक घर के सभी सदस्य प्रसन्न व निरोगी रहें, और उनके घर में श्रीलक्ष्मी का निवास और प्रसन्नता बनी रहे।

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नवरात्रि पूजा

नवरात्र पूजा और कलश स्थापना

Dr.R.B.Dhawan

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नवरात्र के 9 दिनों में नवदुर्गा की आराधना पूजा की जाती है। नवरात्र चाहे चैत्र के हों, या आषाढ़, अथवा आश्विन तथा माघ के हों, इन चार नवरात्रि (दो प्रत्यक्ष – चैत्र और आश्विन तथा दो गुप्त नवरात्र – आषाढ़ तथा माघ) महिनों में आते हैं। चैत्र नवरात्र के समय देवशयन तथा आश्विन नवरात्र के समय देव बोधन कहा गया है। आश्विन माह शुक्ल पक्ष में प्रथम 9 दिनों में पड़नें वाले नवरात्र शारदीय नवरात्रि भी कहलाते हैं। सभी नवरात्रि का अपना-अपना विशेष महत्व है। दुर्गा पूजा का वार्षिकोत्सव शारदीय नवरात्र में सम्पन्न किया जाता है। शास्त्रों में नवरात्र की विशेष महिमा बताई गई है। चैत्र और आश्विन मास शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तक (जो नवदुर्गा का समय है) यह समय साधना उपासना द्वारा शक्ति का संचय करने के लिए सबसे उत्तम समय है। नवरात्र नव शक्तियों से संयुक्त हैं, इस की एक-एक तिथि को एक-एक शक्ति के पूजन का विधान है। मार्कण्डेय पुराण में इन शक्तियों का नाम इस प्रकार बताया गया है :-

प्रथमं शैलपुत्रीति, द्वितीयं ब्रह्मचारिणी, तृतीयं चन्द्र-घण्टेति कुष्माणडेति चतुर्थकम् । पंचमम् स्कन्द मातेति, षष्ठं कात्यायनी तथा, सप्तम कालरात्रिति महागौरी चाष्टमम्।। नवमं सिद्धिदात्रिति नव दुर्गाः प्रर्कीर्तिताः।

सनातन मत के प्राचीन शास्त्रों के अनुसार दुर्गा देवी नौ रूपों में प्रकट हुई हैं। उन सब रूपों की अलग-अलग कथा इस प्रकार है :-
1. महाकाली- एक बार पूरा संसार प्रलय ग्रस्त हो गया था। चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देता था। उस समय ‘भगवान विष्णु’ की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ उस कमल में से ‘ब्रह्मा जी’ प्रकट हुए इसके अतिरिक्त भगवान नारायण के कानों से कुछ मैल भी निकला, उस मैल से कैटभ और मधु नाम के दो दैत्य उत्पन्न हुये। जब उन दोनों दैत्यों ने इधर-उधर देखा तो ब्रह्माजी के अलावा उन्हें कोई नहीं दिखाई दिया, तब ब्रह्माजी को देखकर वे दैत्य उनको मारने दौड़े। उस समय भयभीत ब्रह्माजी ने विष्णु भगवान की स्तुति की, स्तुति से विष्णु भगवान की आँखों में जो महामाया योग निद्रा के रूप में निवास करती थी वह लोप हो गई और विष्णु भगवान की नींद खुल गई उनके जागते ही दोनों दैत्य भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे और पांच हजार वर्ष तक युद्ध चलता रहा, अंत में भगवान विष्णु की रक्षा के लिए महामाया ने असुरों की बुद्धि को परिवर्तित कर दिया। जब असुरों तथा देवताओं का युद्ध हुआ, तब असुर विष्णु भगवान से बोले, ‘‘हम आपके युद्ध से प्रसन्न हैं, जो चाहो वर मांग लो’’ भगवान ने मौका पाया और कहने लगे, ‘‘यदि हमें वर देना है तो यह वर दो कि दैत्यों का नाष हो।’’ दैत्यों ने कहा ‘‘ऐसा ही होगा’’ ऐसा कहते ही दैत्यों का नाश हो गया। जिसने असुरों की बुद्धि को बदला था वह ‘महाकाली’ थीं।

2. महालक्ष्मी- एक समय में महिषासुर नाम का दैत्य हुआ। उसने पृथ्वी और पाताल पर अपना अधिकार जमा लिया। तो देवता भी उस युद्ध में पराजित होकर भागने लगे। वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उस दैत्य से बचने के लिए भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। देवताओं की स्तुति से भगवान विष्णु और शंकर जी प्रसन्न हुए, तब उनके शरीर से एक तेज निकला, जिसने महालक्ष्मी जी का रूप धारण किया। इन्हीं महालक्ष्मी जी ने महिषासुर को युद्ध में मारकर देवताओं के कष्ट को दूर किया।

3. चामुण्डा- एक समय था जब शुम्भ-निषुम्भ नाम के दो दैत्य बहुत बलशाली हुए थे, उनसे युद्ध में देवता हार मान गए जब देवताओं ने देखा कि अब युद्ध नहीं जीता जा सकता तब वह स्वर्ग छोड़कर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे उस समय भगवान विष्णु के शरीर से एक ज्योति प्रकट हुई जो कि ‘महासरस्वती’ या ‘चामुण्डा’ थी। महासरस्वती अत्यन्त रूपवान थी, उनका रूप देख कर दैत्य मुग्ध हो गए और अपनी इच्छा प्रकट करने के लिए अपना दूत उस देवी के पास भेजा, उस दूत को देवी ने वापिस कर दिया। इसके पश्चात् बाद उन दोनों ने अपने सेनापति धूम्राक्ष को सेना सहित भेजा, जो देवी द्वारा सेना सहित मार दिया गया और फिर चण्ड-मुण्ड लड़ने आए और वह भी मार दिए गये इसके पश्चात् रक्तबीज आया जिसके रक्त की बूँद जमीन पर गिरने से एक और रक्तबीज पैदा होता था, उसे भी देवी ने मार दिया। अन्त में शुम्भ-निषुम्भ स्वयं लड़ने आये और देवी के हाथों मारे गए। सभी देवता दैत्यों की मृत्यु से प्रसन्न हुए।

4. योगमाया – जब कंस ने वासुदेव-देवकी के छः पुत्रों का वध कर दिया था और सातवें गर्भ में शेषनाग बलराम जी आये, जो रोहिणी के गर्भ में प्रविष्ट होकर प्रकट हुए। तब आठवाँ जन्म श्री कृष्ण जी का हुआ। साथ ही साथ गोकुल में यशोदा जी के गर्भ में योगमाया का जन्म हुआ जो वासुदेव जी के द्वारा कृष्ण के बदले मथुरा लाई गई। जब कंस ने कन्या स्वरूप उस योगमाया को मारने के लिए पटकना चाहा, तब वह हाथ से छूट आकाश में चली गई आकाश में जाकर उसने देवी का रूप धारण कर लिया। आगे चलकर इसी योगमाया ने श्री कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बन कर कंस, चाणूर आदि शक्तिशाली असुरों का संहार करवाया।

5. रक्त दन्तिका – एक बार वैप्रचित्ति नाम के असुर ने बहुत से कुकर्म करके देव तथा मानवों को आतंकित कर दिया। देवताओं और पृथ्वी की प्रार्थना पर उस समय दुर्गा देवी ने रक्तदन्तिका नाम से अवतार लिया और वैप्रचित्ति आदि असुरों का मान मर्दन कर डाला। यह देवी असुरों को मारकर उनका रक्तपान किया करती थी, इस कारण से इनका नाम ‘‘रक्तदन्तिका’’ हुआ।

6. शाकुम्भरी देवी – एक समय पृथ्वी पर लगातार सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, जिसके के कारण चारों ओर हा-हाकार मच गयी, सभी जीव भूख और प्यास से व्याकुल हो मरने लगे। उस समय मुनियों ने मिलकर देवी भगवती की उपासना की, तब जगदम्बा ने ‘‘शाकुम्भरी’’ नाम से स्त्री रूप में अवतार लिया और उनकी कृपा से जल की वर्षा हुई जिससे पृथ्वी के समस्त जीवों को नया जीवन प्राप्त हुआ।

7. श्री दुर्गा जी – एक समय धरती पर दुर्गम नाम का राक्षस हुआ, उसके अत्याचार से पृथ्वी ही नहीं, स्वर्ग और पाताल के निवासी भी भयभीत रहते थे। ऐसे समय भगवान की शक्ति ने दुर्गा या दुर्गसेनी के नाम से अवतार लिया और दुर्गम राक्षस को मारकर ब्राह्मणों और भक्तों की रक्षा की। दुर्गम राक्षस को मारने के कारण ही इनका नाम ‘‘दुर्गा देवी’’ प्रसिद्ध हुआ।

8. भ्रामरी देवी – एक बार महा अत्याचारी अरूण नाम का एक असुर पैदा हुआ, उसने स्वर्ग में जाकर उपद्रव करना शुरू कर दिया, देवताओं की पत्नियों का सतीत्व नष्ट करने की कुचेष्टा करने लगा, अपने सतीत्व की रक्षा के लिए देव-पत्नियों ने भौरों का रूप धारण कर लिया और दुर्गा देवी की प्रार्थना करने लगीं। देव पत्नियों को दुःखी देखकर माँ दुर्गा ने ‘‘भ्रामरी’’ का रूप धारण कर उन असुरों का उनकी सेना सहित संहार किया और देव-पत्नियों के सतीत्व की रक्षा की।

9. चण्डिका देवी – एक बार पृथ्वी पर चण्ड-मुण्ड नाम के दो राक्षस पैदा हुए, वे दोनों इतने बलवान थे कि पृथ्वी पर अपना राज्य फैला, देवताओं को हराकर स्वर्ग पर भी अपना अधिकार जमा लिया। तब देवता बहुत दुःखी हुए और देवी की स्तुति करने लगे, देवी ‘‘चण्डिका’’ के रूप में अवतरित हुई और चण्ड-मुण्ड नामक राक्षसों को मारकर संसार का दुःख दूर किया। देवताओं का स्वर्ग पुनः उन्हें प्राप्त हुआ। इस प्रकार चारों और प्रसन्नता का वातावरण छा गया।

नवरात्र की महिमा :-
चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक नवरात्र व्रत होता है। नवरात्र मुख्य रूप से दो होते हैं- वासन्तिक और शारदीय। वासन्तिक में विष्णु की उपासना की प्राधानता रहती है, और शारदीय में शक्ति की उपासना का। वस्तुतः दोनों नवरात्र मुख्य एवं व्यापक हैं, और दोनों में दोनों की उपासना उचित है। इस उपासना में वर्ण, जाति का वैशिष्ट्य अपेक्षित नहीं है, अतः सभी वर्ण एवं जाति के लोग अपने इष्टदेव की उपासना करते हैं। देवी की उपासना व्यापक है। दुर्गा पूजक प्रतिपदा से नवमी तक व्रत रहते हैं। कुछ लोग अन्न त्याग देते हैं। कुछ एक भुक्त रहकर शक्ति उपासना करते हैं। कुछ ‘श्री दुर्गा सप्तशती’ का सकाम या निष्काम भाव से पाठ करते हैं। संयत रहकर पाठ करना आवश्यक है, अतः यम-नियम का पालन करते हुए भगवती दुर्गा की आराधना या पाठ करना चाहिये। नवरात्र व्रत का अनुष्ठान करने वाले जितने संयत, नियमित, अन्तर्बाह्य शुद्धि रखेंगे उतनी ही मात्रा में उन्हें सफलता मिलेगी, यह निःसंदिग्ध है।

प्रतिपदा से नवरात्र प्रारम्भ होता है। प्रारम्भ करते समय यदि चित्रा और वैधृतियोग हो तो उनकी समाप्ति होने के बाद व्रत प्रारम्भ करना चाहिये, परंतु देवी का आवाह्न, स्थापन और विसर्जन-ये तीनों प्रातःकाल में होने चाहिये। अतः यदि चित्रा, वैधृति अधिक समय तक हों तो उसी दिन अभिजित् मुहूर्त (दिन के आठवें मुहूर्त यानी दोपहर के एक घड़ी पहले से एक घड़ी बाद तक के समय) में आरम्भ करना चाहिये।

आरम्भिक कर्तव्य- आरम्भ में पवित्र स्थान की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूँ बोयें। फिर उनके ऊपर अपनी शक्ति के अनुसार बनवाये गये सोने, ताँबे आदि अथवा मिट्टी के कलश को विधिपूर्वक स्थापित करें। कलश के ऊपर सोना, चाँदी, ताँबा, मृत्तिका, पाषाण अथवा चित्रमयी मूर्ति की प्रतिष्ठा करें। मूर्ति यदि कच्ची मिट्टी, कागज या सिंदूर आदि से बनी हो और स्नानादि से उसमें विकृति होने की आशंका हो तो उसके ऊपर शीशा लगा दें। मूर्ति न हो तो कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके दोनों पार्शवों में त्रिशूल बनाकर दुर्गाजी का चित्र पुस्तक तथा शालिग्राम को विराजित कर विष्णु पूजन करें।

नवरात्र व्रत के आरम्भ में स्वस्तिवाचन-शान्ति पाठ करके संकल्प करें और तब सर्वप्रथम गणपति की पूजा कर मातृका, लोकपाल नवग्रह एवं वरूण का सविधि पूजन करें। फिर प्रधान मूर्ति का षोडशोपचार पूजन करना चाहिये। अपने इष्टदेव-राम, कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण या भगवती दुर्गादेवी आदि की मूर्ति ही प्रधानमूर्ति कही जाती है। पूजन वेद-विधि या सम्प्रदाय-निर्दिष्ट विधि से होना चाहिये। दुर्गा देवी की आराधना अनुष्ठान में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन तथा मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत निहित ‘श्रीदुर्गा सप्तशती’ का पाठ मुख्य अनुष्ठेय कर्तव्य है।

पाठ विधि:-

‘श्रीदुर्गासप्तशती’ पुस्तक का – नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्।।

इस मंत्र से पंचोपचार पूजन कर यथाविधि पाठ करें, देवी व्रत में कुमारी-पूजन परम आवश्यक माना गया है। सामर्थ्य हो तो, नवरात्र भर प्रतिदिन, अन्यथा समाप्ति के दिन सौ कुमारियों के चरण धोकर उन्हें देवीरूप मानकर गंध-पुष्पादि से अर्चन कर आदर के साथ यथारूचि मिष्टान्न भोजन कराना चाहिये एवं वस्त्रादि से सत्कृत करना चाहिये।

शास्त्रों में वर्णित है कि एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य की, दो की पूजा से भोग और मोक्ष की, तीन की अर्चना से धर्म, अर्थ, काम-त्रिवर्ग की, चार की अर्चना से राज्य पद की, पाँच की पूजा से विद्या की, छः की पूजा से षट्कर्म सिद्धि की, सात की पूजा से राज्य की, आठ की अचर्ना से सम्पदा की और नौ कुमारी कन्याओं की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।

कुमारी-पूजन में दस वर्ष तक की कन्याओं का अर्चन विहित है। दस वर्ष से ऊपर की आयु वाली कन्या का पूजन वर्जित किया गया है। दो वर्ष की कन्या कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्तिनी, चार वर्ष की कल्याणी, पाँच वर्ष की रोहिणी, छः वर्ष की काली, सात वर्ष की चण्डिका, आठ वर्ष की शाम्भवी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष वाली सुभद्रा-स्वरूपा होती है।

दुर्गा-पूजा में प्रतिदिन का वैशिष्ट्य रहना चाहिये। प्रतिपदा को केश संस्कारक द्रव्य – आँवला, सुगन्धित तैल आदि केश प्रसाधन संभार, द्वितीया को बाल बाँधने-गूँथने वाले रेशमी सूत, फीते आदि, तृतीया को सिंदूर और दर्पण आदि, चतुर्थी को मधुपर्क, तिलक और नेत्राजंन, पंचमी को अंगराग-चंदनादि एवं आभूषण, षष्ठी को पुष्प तथा पुष्पमालादि समर्पित करें। सप्तमी को गृह मध्य पूजा, अष्टमी को उपवास पूर्वक पूजन, नवमी को महापूजा और कुमारी पूजा करें। दशमी को पूजन के अनन्तर पाठकर्ता की पूजा कर दक्षिणा दें एवं आरती के बाद विसर्जन करें। श्रवण-नक्षत्र में विसर्जनांग पूजन प्रशस्त कहा गया है। दशमांश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण-भोजन कराकर व्रत की समाप्ति करें।

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दीपावली मुहूर्त 2018

Dr.R.B.Dhawan

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कार्तिक मास kartik की अमावस्या amavasya की रात्रि प्रदोषकाल, स्थिर लग्न में अथवा महानिशीथ काल, mahanishith kaal स्थिर लग्न में अनुकूल चौघडिया के समय गणेश सहित देवी महालक्ष्मी-महाकाली-महासरस्वती की पूजा-आराधना diwali Pooja करने से यह देवीयां भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं।

इस वर्ष दीपावली depawli pooja (Laxmi Pooja) का पर्व 19 अक्तूबर 2017 बृहस्पतिवार के दिन होगा। दिल्ली की समय गणना अनुसार इस दिन अमावस्या रात्रि 24:44 तक रहेगी, चित्रा नक्षत्र 07:28 से आरंभ होगा, वृष (स्थिर लग्न) 19:11 से 21:06 तक रहेगी। निशीथ काल nishith kaal 20:20 से 22:54 तक, प्रदोष काल pradosh kaal 17:46 से 20:20 तक रहेगा। दीपावली की शाम प्रदोष काल में स्नान के उपरांत वस्त्राभूषण धारण करके धर्मस्थल पर श्रद्धापूर्वक दीपदान करके शुभ मुहूर्त अनुकूल चौघडिया में अपने निवास स्थान पर श्री गणेश सहित देवी महालक्ष्मी महाकाली महासरस्वती और कुबेर की पूजा diwali pooja करनी चाहिए।

महालक्ष्मी mahalxmi Pooja पूजन विशेष मुहूर्त : (1). सायं 19 : 11 से 20 : 20 तक। (2). रात्रि 20 : 20 से 20 : 59 तक। यह दोनों मुहूर्त वृष लग्न के हैं।

विशेष Diwali muhurt 2017, मध्य रात्रि महानिशीथ काल सिंह लग्न : 25 : 39 से 25 : 48 तक है।

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