नवरात्रि पूजा

नवरात्र पूजा और कलश स्थापना

Dr.R.B.Dhawan

(Top Best Astrologer in Delhi)

नवरात्र के 9 दिनों में नवदुर्गा की आराधना पूजा की जाती है। नवरात्र चाहे चैत्र के हों, या आषाढ़, अथवा आश्विन तथा माघ के हों, इन चार नवरात्रि (दो प्रत्यक्ष – चैत्र और आश्विन तथा दो गुप्त नवरात्र – आषाढ़ तथा माघ) महिनों में आते हैं। चैत्र नवरात्र के समय देवशयन तथा आश्विन नवरात्र के समय देव बोधन कहा गया है। आश्विन माह शुक्ल पक्ष में प्रथम 9 दिनों में पड़नें वाले नवरात्र शारदीय नवरात्रि भी कहलाते हैं। सभी नवरात्रि का अपना-अपना विशेष महत्व है। दुर्गा पूजा का वार्षिकोत्सव शारदीय नवरात्र में सम्पन्न किया जाता है। शास्त्रों में नवरात्र की विशेष महिमा बताई गई है। चैत्र और आश्विन मास शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तक (जो नवदुर्गा का समय है) यह समय साधना उपासना द्वारा शक्ति का संचय करने के लिए सबसे उत्तम समय है। नवरात्र नव शक्तियों से संयुक्त हैं, इस की एक-एक तिथि को एक-एक शक्ति के पूजन का विधान है। मार्कण्डेय पुराण में इन शक्तियों का नाम इस प्रकार बताया गया है :-

प्रथमं शैलपुत्रीति, द्वितीयं ब्रह्मचारिणी, तृतीयं चन्द्र-घण्टेति कुष्माणडेति चतुर्थकम् । पंचमम् स्कन्द मातेति, षष्ठं कात्यायनी तथा, सप्तम कालरात्रिति महागौरी चाष्टमम्।। नवमं सिद्धिदात्रिति नव दुर्गाः प्रर्कीर्तिताः।

सनातन मत के प्राचीन शास्त्रों के अनुसार दुर्गा देवी नौ रूपों में प्रकट हुई हैं। उन सब रूपों की अलग-अलग कथा इस प्रकार है :-
1. महाकाली- एक बार पूरा संसार प्रलय ग्रस्त हो गया था। चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देता था। उस समय ‘भगवान विष्णु’ की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ उस कमल में से ‘ब्रह्मा जी’ प्रकट हुए इसके अतिरिक्त भगवान नारायण के कानों से कुछ मैल भी निकला, उस मैल से कैटभ और मधु नाम के दो दैत्य उत्पन्न हुये। जब उन दोनों दैत्यों ने इधर-उधर देखा तो ब्रह्माजी के अलावा उन्हें कोई नहीं दिखाई दिया, तब ब्रह्माजी को देखकर वे दैत्य उनको मारने दौड़े। उस समय भयभीत ब्रह्माजी ने विष्णु भगवान की स्तुति की, स्तुति से विष्णु भगवान की आँखों में जो महामाया योग निद्रा के रूप में निवास करती थी वह लोप हो गई और विष्णु भगवान की नींद खुल गई उनके जागते ही दोनों दैत्य भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे और पांच हजार वर्ष तक युद्ध चलता रहा, अंत में भगवान विष्णु की रक्षा के लिए महामाया ने असुरों की बुद्धि को परिवर्तित कर दिया। जब असुरों तथा देवताओं का युद्ध हुआ, तब असुर विष्णु भगवान से बोले, ‘‘हम आपके युद्ध से प्रसन्न हैं, जो चाहो वर मांग लो’’ भगवान ने मौका पाया और कहने लगे, ‘‘यदि हमें वर देना है तो यह वर दो कि दैत्यों का नाष हो।’’ दैत्यों ने कहा ‘‘ऐसा ही होगा’’ ऐसा कहते ही दैत्यों का नाश हो गया। जिसने असुरों की बुद्धि को बदला था वह ‘महाकाली’ थीं।

2. महालक्ष्मी- एक समय में महिषासुर नाम का दैत्य हुआ। उसने पृथ्वी और पाताल पर अपना अधिकार जमा लिया। तो देवता भी उस युद्ध में पराजित होकर भागने लगे। वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उस दैत्य से बचने के लिए भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। देवताओं की स्तुति से भगवान विष्णु और शंकर जी प्रसन्न हुए, तब उनके शरीर से एक तेज निकला, जिसने महालक्ष्मी जी का रूप धारण किया। इन्हीं महालक्ष्मी जी ने महिषासुर को युद्ध में मारकर देवताओं के कष्ट को दूर किया।

3. चामुण्डा- एक समय था जब शुम्भ-निषुम्भ नाम के दो दैत्य बहुत बलशाली हुए थे, उनसे युद्ध में देवता हार मान गए जब देवताओं ने देखा कि अब युद्ध नहीं जीता जा सकता तब वह स्वर्ग छोड़कर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे उस समय भगवान विष्णु के शरीर से एक ज्योति प्रकट हुई जो कि ‘महासरस्वती’ या ‘चामुण्डा’ थी। महासरस्वती अत्यन्त रूपवान थी, उनका रूप देख कर दैत्य मुग्ध हो गए और अपनी इच्छा प्रकट करने के लिए अपना दूत उस देवी के पास भेजा, उस दूत को देवी ने वापिस कर दिया। इसके पश्चात् बाद उन दोनों ने अपने सेनापति धूम्राक्ष को सेना सहित भेजा, जो देवी द्वारा सेना सहित मार दिया गया और फिर चण्ड-मुण्ड लड़ने आए और वह भी मार दिए गये इसके पश्चात् रक्तबीज आया जिसके रक्त की बूँद जमीन पर गिरने से एक और रक्तबीज पैदा होता था, उसे भी देवी ने मार दिया। अन्त में शुम्भ-निषुम्भ स्वयं लड़ने आये और देवी के हाथों मारे गए। सभी देवता दैत्यों की मृत्यु से प्रसन्न हुए।

4. योगमाया – जब कंस ने वासुदेव-देवकी के छः पुत्रों का वध कर दिया था और सातवें गर्भ में शेषनाग बलराम जी आये, जो रोहिणी के गर्भ में प्रविष्ट होकर प्रकट हुए। तब आठवाँ जन्म श्री कृष्ण जी का हुआ। साथ ही साथ गोकुल में यशोदा जी के गर्भ में योगमाया का जन्म हुआ जो वासुदेव जी के द्वारा कृष्ण के बदले मथुरा लाई गई। जब कंस ने कन्या स्वरूप उस योगमाया को मारने के लिए पटकना चाहा, तब वह हाथ से छूट आकाश में चली गई आकाश में जाकर उसने देवी का रूप धारण कर लिया। आगे चलकर इसी योगमाया ने श्री कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बन कर कंस, चाणूर आदि शक्तिशाली असुरों का संहार करवाया।

5. रक्त दन्तिका – एक बार वैप्रचित्ति नाम के असुर ने बहुत से कुकर्म करके देव तथा मानवों को आतंकित कर दिया। देवताओं और पृथ्वी की प्रार्थना पर उस समय दुर्गा देवी ने रक्तदन्तिका नाम से अवतार लिया और वैप्रचित्ति आदि असुरों का मान मर्दन कर डाला। यह देवी असुरों को मारकर उनका रक्तपान किया करती थी, इस कारण से इनका नाम ‘‘रक्तदन्तिका’’ हुआ।

6. शाकुम्भरी देवी – एक समय पृथ्वी पर लगातार सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, जिसके के कारण चारों ओर हा-हाकार मच गयी, सभी जीव भूख और प्यास से व्याकुल हो मरने लगे। उस समय मुनियों ने मिलकर देवी भगवती की उपासना की, तब जगदम्बा ने ‘‘शाकुम्भरी’’ नाम से स्त्री रूप में अवतार लिया और उनकी कृपा से जल की वर्षा हुई जिससे पृथ्वी के समस्त जीवों को नया जीवन प्राप्त हुआ।

7. श्री दुर्गा जी – एक समय धरती पर दुर्गम नाम का राक्षस हुआ, उसके अत्याचार से पृथ्वी ही नहीं, स्वर्ग और पाताल के निवासी भी भयभीत रहते थे। ऐसे समय भगवान की शक्ति ने दुर्गा या दुर्गसेनी के नाम से अवतार लिया और दुर्गम राक्षस को मारकर ब्राह्मणों और भक्तों की रक्षा की। दुर्गम राक्षस को मारने के कारण ही इनका नाम ‘‘दुर्गा देवी’’ प्रसिद्ध हुआ।

8. भ्रामरी देवी – एक बार महा अत्याचारी अरूण नाम का एक असुर पैदा हुआ, उसने स्वर्ग में जाकर उपद्रव करना शुरू कर दिया, देवताओं की पत्नियों का सतीत्व नष्ट करने की कुचेष्टा करने लगा, अपने सतीत्व की रक्षा के लिए देव-पत्नियों ने भौरों का रूप धारण कर लिया और दुर्गा देवी की प्रार्थना करने लगीं। देव पत्नियों को दुःखी देखकर माँ दुर्गा ने ‘‘भ्रामरी’’ का रूप धारण कर उन असुरों का उनकी सेना सहित संहार किया और देव-पत्नियों के सतीत्व की रक्षा की।

9. चण्डिका देवी – एक बार पृथ्वी पर चण्ड-मुण्ड नाम के दो राक्षस पैदा हुए, वे दोनों इतने बलवान थे कि पृथ्वी पर अपना राज्य फैला, देवताओं को हराकर स्वर्ग पर भी अपना अधिकार जमा लिया। तब देवता बहुत दुःखी हुए और देवी की स्तुति करने लगे, देवी ‘‘चण्डिका’’ के रूप में अवतरित हुई और चण्ड-मुण्ड नामक राक्षसों को मारकर संसार का दुःख दूर किया। देवताओं का स्वर्ग पुनः उन्हें प्राप्त हुआ। इस प्रकार चारों और प्रसन्नता का वातावरण छा गया।

नवरात्र की महिमा :-
चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक नवरात्र व्रत होता है। नवरात्र मुख्य रूप से दो होते हैं- वासन्तिक और शारदीय। वासन्तिक में विष्णु की उपासना की प्राधानता रहती है, और शारदीय में शक्ति की उपासना का। वस्तुतः दोनों नवरात्र मुख्य एवं व्यापक हैं, और दोनों में दोनों की उपासना उचित है। इस उपासना में वर्ण, जाति का वैशिष्ट्य अपेक्षित नहीं है, अतः सभी वर्ण एवं जाति के लोग अपने इष्टदेव की उपासना करते हैं। देवी की उपासना व्यापक है। दुर्गा पूजक प्रतिपदा से नवमी तक व्रत रहते हैं। कुछ लोग अन्न त्याग देते हैं। कुछ एक भुक्त रहकर शक्ति उपासना करते हैं। कुछ ‘श्री दुर्गा सप्तशती’ का सकाम या निष्काम भाव से पाठ करते हैं। संयत रहकर पाठ करना आवश्यक है, अतः यम-नियम का पालन करते हुए भगवती दुर्गा की आराधना या पाठ करना चाहिये। नवरात्र व्रत का अनुष्ठान करने वाले जितने संयत, नियमित, अन्तर्बाह्य शुद्धि रखेंगे उतनी ही मात्रा में उन्हें सफलता मिलेगी, यह निःसंदिग्ध है।

प्रतिपदा से नवरात्र प्रारम्भ होता है। प्रारम्भ करते समय यदि चित्रा और वैधृतियोग हो तो उनकी समाप्ति होने के बाद व्रत प्रारम्भ करना चाहिये, परंतु देवी का आवाह्न, स्थापन और विसर्जन-ये तीनों प्रातःकाल में होने चाहिये। अतः यदि चित्रा, वैधृति अधिक समय तक हों तो उसी दिन अभिजित् मुहूर्त (दिन के आठवें मुहूर्त यानी दोपहर के एक घड़ी पहले से एक घड़ी बाद तक के समय) में आरम्भ करना चाहिये।

आरम्भिक कर्तव्य- आरम्भ में पवित्र स्थान की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूँ बोयें। फिर उनके ऊपर अपनी शक्ति के अनुसार बनवाये गये सोने, ताँबे आदि अथवा मिट्टी के कलश को विधिपूर्वक स्थापित करें। कलश के ऊपर सोना, चाँदी, ताँबा, मृत्तिका, पाषाण अथवा चित्रमयी मूर्ति की प्रतिष्ठा करें। मूर्ति यदि कच्ची मिट्टी, कागज या सिंदूर आदि से बनी हो और स्नानादि से उसमें विकृति होने की आशंका हो तो उसके ऊपर शीशा लगा दें। मूर्ति न हो तो कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके दोनों पार्शवों में त्रिशूल बनाकर दुर्गाजी का चित्र पुस्तक तथा शालिग्राम को विराजित कर विष्णु पूजन करें।

नवरात्र व्रत के आरम्भ में स्वस्तिवाचन-शान्ति पाठ करके संकल्प करें और तब सर्वप्रथम गणपति की पूजा कर मातृका, लोकपाल नवग्रह एवं वरूण का सविधि पूजन करें। फिर प्रधान मूर्ति का षोडशोपचार पूजन करना चाहिये। अपने इष्टदेव-राम, कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण या भगवती दुर्गादेवी आदि की मूर्ति ही प्रधानमूर्ति कही जाती है। पूजन वेद-विधि या सम्प्रदाय-निर्दिष्ट विधि से होना चाहिये। दुर्गा देवी की आराधना अनुष्ठान में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन तथा मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत निहित ‘श्रीदुर्गा सप्तशती’ का पाठ मुख्य अनुष्ठेय कर्तव्य है।

पाठ विधि:-

‘श्रीदुर्गासप्तशती’ पुस्तक का – नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्।।

इस मंत्र से पंचोपचार पूजन कर यथाविधि पाठ करें, देवी व्रत में कुमारी-पूजन परम आवश्यक माना गया है। सामर्थ्य हो तो, नवरात्र भर प्रतिदिन, अन्यथा समाप्ति के दिन सौ कुमारियों के चरण धोकर उन्हें देवीरूप मानकर गंध-पुष्पादि से अर्चन कर आदर के साथ यथारूचि मिष्टान्न भोजन कराना चाहिये एवं वस्त्रादि से सत्कृत करना चाहिये।

शास्त्रों में वर्णित है कि एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य की, दो की पूजा से भोग और मोक्ष की, तीन की अर्चना से धर्म, अर्थ, काम-त्रिवर्ग की, चार की अर्चना से राज्य पद की, पाँच की पूजा से विद्या की, छः की पूजा से षट्कर्म सिद्धि की, सात की पूजा से राज्य की, आठ की अचर्ना से सम्पदा की और नौ कुमारी कन्याओं की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।

कुमारी-पूजन में दस वर्ष तक की कन्याओं का अर्चन विहित है। दस वर्ष से ऊपर की आयु वाली कन्या का पूजन वर्जित किया गया है। दो वर्ष की कन्या कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्तिनी, चार वर्ष की कल्याणी, पाँच वर्ष की रोहिणी, छः वर्ष की काली, सात वर्ष की चण्डिका, आठ वर्ष की शाम्भवी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष वाली सुभद्रा-स्वरूपा होती है।

दुर्गा-पूजा में प्रतिदिन का वैशिष्ट्य रहना चाहिये। प्रतिपदा को केश संस्कारक द्रव्य – आँवला, सुगन्धित तैल आदि केश प्रसाधन संभार, द्वितीया को बाल बाँधने-गूँथने वाले रेशमी सूत, फीते आदि, तृतीया को सिंदूर और दर्पण आदि, चतुर्थी को मधुपर्क, तिलक और नेत्राजंन, पंचमी को अंगराग-चंदनादि एवं आभूषण, षष्ठी को पुष्प तथा पुष्पमालादि समर्पित करें। सप्तमी को गृह मध्य पूजा, अष्टमी को उपवास पूर्वक पूजन, नवमी को महापूजा और कुमारी पूजा करें। दशमी को पूजन के अनन्तर पाठकर्ता की पूजा कर दक्षिणा दें एवं आरती के बाद विसर्जन करें। श्रवण-नक्षत्र में विसर्जनांग पूजन प्रशस्त कहा गया है। दशमांश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण-भोजन कराकर व्रत की समाप्ति करें।

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