विवाह और ज्योतिष

ज्योतिष शास्त्र में पति ओर पत्नी का महत्व :-

Dr.R.B.Dhawan

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विवाह मानव जीवन का एक प्रमुख संस्कार है। विवाह के बाद एक युवक ओर युवती को आजीवन एक साथ रहना होता है। शास्त्रों में पत्नी को “अर्द्धांगिनी” कहा गया है । पति का दुःख ओर सुख पत्नी का भी दु:ख, सुख होता है, क्यों की विवाह के बाद दोनों का भाग्य एक दूसरे से जुड जाता है। कई बार देखने में आया है कि, पति कि कुण्डली में राजयोग नहीं हो ओर पत्नी कि कुण्डली में राजयोग हो तो, पत्नी के राजयोग का सुख पति को मिलता है। पति कि कुण्डली में राजयोग हो ओर पत्नी कि कुण्डली में ना हो, तथा दरिद्रता के योग बने हुये हो तो, पति कि कुण्डली का राजयोग अपना प्रभाव नहीं दिखाता है। तथा विवाह के बाद व्यक्ति कि अवनति होने लगति लगति है । क्यों कि पत्नी “अर्द्धांगिनी” है ।

पति ओर पत्नी में प्रमुख स्थान पति का है । पत्नी के लिये पति ही परमेश्वर है, लेकिन पति के लिये पत्नी परमेश्वरी नहीं है। बल्कि घर की लक्ष्मी बनती है। पत्नी को गृहलक्ष्मी इसलिये ही कहा गया है । क्यों कि विवाह के बाद पत्नी का 100% भाग्य पति से ही जुड जाता है । ज्योतिष शास्त्र में अनेक स्थान पर “स्त्री सुख” के योग बताये गये हैं। लेकिन “पति सुख” नाम का कोई योग कहीं नहीं है । स्त्री का जब पुरूष के जीवन में प्रवेश होता है, तब पुरूष के जीवन में बहुत तेजी से आश्चर्यजनक परिवर्तन होते हैं, यह स्त्री दोस्त, प्रेमिका, ओर पत्नी इन तीन रूपों में पुरूष के भाग्य को प्रभावित करती है । लेकिन पुरूष का भाग्य पत्नी के भाग्य को प्रभावित नहीं करता है । क्यों कि पति को पत्नी कि प्राप्ति भाग्य से ही होती है । इस के पीछे पौराणिक सिद्धांत यह है कि, पत्नी पति को दान में मिलती है । शास्त्रों में पत्नी को गृहलक्ष्मी तो कहा है, लेकिन पुरूष को नारायण नहीं कहा गया। (वेसे तो यह सारा संसार ही नारायण स्वरूप है, परंतु यहाँ चर्चा केवल पति ओर पत्नी कि है) उपरोक्त बातों का सार यही है कि, पत्नी का भाग्य पति को प्रभावित करता है, लेकिन पति का भाग्य पत्नी को प्रभावित नहीं करता है। कन्या के भाग्य में अगर राजयोग है, ओर उसका विवाह किसी दरिद्र से भी कर दिया जाये तो, वह दरिद्र 100% पत्नी के राजयोग का सुख भोगेगा, क्यों कि वह पति के लिये लक्ष्मी बनकर आई है, और यदि पत्नी कि कुण्डली में दु:ख लिखा है तो, वह राजा के घर में जाकर भी सुख नहीं भोग पायेगी। हमने बहुत बार देखा है :–

1. कन्या कि सगाई लडके से होते ही लडके का भाग्योदय होते हुए देखा है ।
2. विवाह के 1-2 दिन बाद ही पति कि मृत्यु भी देखी है ।
3. कन्या कि सगाई लडके से होते ही लडके को राजकीय नौकरी मिलते भी देखा है ।
4. विवाह के बाद पति के पतन ओर उन्नति दोनों को देखा है ।
या तो पति कि लाइफ बन जाती है, या खराब हो जाती है ।
अगर दोनों कि कुण्डली में साधारण ही योग हों तो दोनों साधारण स्तर का जीवन व्यतीत करते हैं।

पत्नी अगर धन कमाने में सक्षम मिलति है तो, पत्नी का कमाया हुआ सारा धन पति के ही काम आता है । अगर पत्नी एकाधिकार जमाये तो रिश्ता खराब हो जायेगा । पति का स्वयं के धन से केवल पत्नी कि जरूरतों को पूरा करता है । पति के बिना पत्नी का कोई अस्तित्व नहीं है, लेकिन पत्नी के बिना पति पर कोई विशेष फर्क नहीं पडता है । क्यों कि प्राचीन समाज में विधवा स्त्री को हेय कि दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन विधुर पुरूष को दूसरा विवाह करने का अधिकार था । पत्नी के लिये पति ही परमेश्वर है, ओर जहाँ जहाँ पत्नी ने परमेश्वरी बनने का प्रयत्न अर्थात स्वयं को पति से श्रेष्ठ साबित करने का प्रयत्न किया है, उस स्थान कि सुख-शान्ति, चैन छिनकर उस कुल का विनाश हुआ है, ओर इसी प्रकार जब जब पति ने निर्दोष पत्नी पर अत्याचार किया है, तब तब पति कि दुर्गति होकर वह निर्धनता को प्राप्त हुआ है। तथा जिवित रहते हुए तथा मृत्यु के बाद ऐसा पति घोर नरक कि यातनाओं को भोगता है ।
नोट:– यह उपरोक्त्त विचार लेखक के अपने विचार नहीं हैं, यह पौराणिक विचार हैं।

मंगल और मांगलिक :-

वर या वधु किसी एक की कुंडली में मंगल का सप्तम में होना और दूसरे की कुंडली में 1,4,7,8 या 12 में से किसी एक में मंगल का नहीं होना पति या पत्नी के लिये हानिकारक माना जाता है, उसका कारण होता है कि पति या पत्नी के बीच की दूरिया केवल इसलिये हो जाती हैं क्योंकि पति या पत्नी के परिवार वाले जिसके अन्दर माता या पिता को यह मंगल जलन या गुस्सा देता है, और अक्सर पारिवारिक मामलों के कारण रिस्ते खराब हो जाते हैं, पति की कुंडली में सप्तम भाव मे मंगल होने से पति का झुकाव घर की बजाय बाहर वालो में अधिक होता है, पति के अन्दर अधिक गर्मी के कारण किसी भी प्रकार की जाने वाली बात को धधकते हुये अंगारे की तरह माना जाता है, जिससे पत्नी का ह्रदय बातों को सुनकर विदीर्ण होता है, कभी कभी तो वह मानसिक बीमारी की शिकार हो जाती है, उससे न तो पति को छोडा जा सकता है, और ना ही ग्रहण किया जा सकता है, पति की माता और पिता को अधिक परेशानी हो जाती है, माता को तो कितनी ही बुराइयां पत्नी के अन्दर दिखाई देने लगती है, वह बात बात में पत्नी को ताने मारने लगती है, और घर के अन्दर इतना गृहक्लेश बढ जाता है कि पिता के लिये असहनीय हो जाता है, पत्नी के परिवार वाले सम्पूर्ण जिन्दगी के लिये पत्नी को अपने साथ ले जाते है। पति की दूसरी शादी होती है, और दूसरी शादी का सम्बन्ध अक्सर कुंडली के बारहवें भाव से होने के कारण बारहवें से सप्तम् ‘षष्ठ’ शत्रु भाव होने के कारण दूसरी पत्नी का परिवार पति के लिये चुनौती भरा हो जाता है, और पति के लिये दूसरी पत्नी के परिजनों के द्वारा किये जाने वाले व्यवहार के कारण वह धीरे धीरे अपने कार्यों से अपने व्यवहार से पत्नी से दूरियां बनाना शुरु कर देता है, और एक दिन ऐसा आता है कि, दूसरी पत्नी पति पर उसी तरह से शासन करने लगती है जिस प्रकार से एक नौकर से मालिक व्यवहार करता है, जब भी कोई बात होती है तो पत्नी अपने बच्चों के द्वारा पति को प्रताडित करवाती है, पति को मजबूरी से मंगल की उम्र निकल जाने के कारण सब कुछ सुनना पडता है। यह एक साधारण फलित है। जातक सुख के पीछे भाग दौड़ करता रहता है, ओर सुख आगे आगे भागता रहता है, दोनों का संग ही नही हो पाता, ओर जिन्दगी के सारे मुकाम बीत जाते हैं फिर जातक बुढ़ापे जैसे रोगो की लपेट में आपने आप को जकड़े हुये बेबस ओर लाचार महसूस करते पाया जाता है।

अब कुछ विवाह विलंब के योग :-

1. सप्तमेश वक्री होकर बैठा हो एंव मंगल आठवें भाव में हो तो विवाह विलंब के योग बनते हैं, इस योग में जन्मे जातक का विवाह प्राय: अति विलंब से ही संभव है, अर्थात् विवाह योग्य आयु निकल जाने के बाद ही वैवाहिक कार्य सम्पत्र होता है।

2. लग्न, सांतवां भाव, सप्तमेश व शक्र स्थिर राशि- वृष, सिंह वृश्चिक और कुंभ में स्थित हो तथा चंद्रमा चार राशि- मेष, कर्क, तुला और मकर में हो तो यह योग बनता है। ऐसे जातक का विवाह भी अति विलंब से ही सम्पत्र होता है। यदि उपरोक्त योग का कहीं भी शनि से संबंध बन जाए तो जीवन के पचासवें वसंत व्ययतीत होने के बाद ही जातक का वैवाहिक संयोग बनते हैं।

3. सप्तमेश सप्तम भाव से यदि छठें, आठवें एंव बारहवे स्थान पर हो तो भी विवाह विलंब के योग निर्मित होते है। इस योग में जन्मे जातक का विवाह भी अति विलंब से ही संभव हो पाता है। अर्थात् विवाह योग्य आयु निकल जाने के बाद ही वैवाहिक संयोग निर्मित होते है।

4. सप्तमेश यदि शनि से युक्त होकर बैठा हो या शनि शुक्र के साथ हो या शुक्र द्वारा दृष्ट हो तो यह योग निर्मित होता है। इस योग में जन्मे जातक का विवाह भी पर्याप्त विलंब से संभव होता है। अर्थात विवाह योग्य आयु व्ययतीत होने के बाद ही वैवाहिक संयोग निर्मित होते है।

5. यदि शुक लग्न से चौथे स्थान में तथा चंद्रमा छठे, आठवें और बारहवें स्थान में हो तो यह योग निर्मित होता है। इस योग में जन्मे जातक का विवाह भी पर्याप्त विलंब से ही संभव होता है। अर्थात् विवाह योग्य आयु निकल के बाद ही वैवाहिक कार्य संभव होता है।

6. राहु और शुक्र लग्न में तथ मंगल सातवें स्थान में हो तो यह येाग बनता है। इस योग में जन्मे जातक का विवाह भी विलंब से सम्पत्र होता है। अर्थात् विवाह योग्य आयु निकल के बाद ही जातक वैवाहिक डोर में बंधते हैं।

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धनवान बनाने वाले योग

क्या आपकी कुण्डली में महाधनी बनने के योग है?-

Dr.R.B.Dhawan

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हालांकि पैसा ही सब कुछ नहीं होता, परंतु आज का समय शुक्र प्रधान समय है, इस कारण आज के समय में पैसे के बिना इज्जत नहीं मिलती, पैसा है तो रिश्तेदार तो रिश्तेदार दुश्मन भी मित्र बन जाते हैं। रिश्तेदार कुछ अधिक अपनापन दिखाते हैं। वर्तमान में आर्थिक युग का दौर चल रहा है। धन के बगैर इस भौतिक काल में जीवन की आवश्यकता से अधिक भी बढ गई हैं, इंसान का गुजारा बिना धन के करना असम्भव है। महान सन्त कबीर दास जी ने क्या खूब कहा है। सांई इतना दीजिये जामे कुटम्ब समाय, मैं भी भूखन न रहॅू महमान भी भूखा न जाये। कबीर दास जैसे महान सन्त ने जीवन में धन की आवश्यकता को सीमित रखने का सुझाव दिया है, तो फिर आम आदमी क्यों नहीं संत वचन को स्वीकार करता। आज हर इंसान की आवश्यकतायें बढ गई हैं, धर में ऐशो-आराम की हर वस्तु चाहिए, इस लिए बेचारा बिना अर्थ के अपने जीवन की नैय्या को पार भला कैसे लगा पायेगा ?

आज के भौतिक युग में प्रत्येक मनुष्य की आकांक्षा रहती है कि वह अपने जीवन में अधिक से अधिक धन दौलत कमा कर ऐशो-आराम से अपना जीवन व्यतीत कर सकें। किन्तु सबके नसीब में ऐसा होता नहीं है। कर्म करके दो वक्त की रोटी का जुगाड़ किया जा सकता पर लजीज व्यजंनो का स्वाद चखने के लिए भाग्य का प्रबल होना जरूरी है।

आइये हम आपको बताते हैं कि ज्योतिष शास्त्र इस विषय में क्या कहता है। क्या आपकी जन्मकुंडली में कुछ ऐसे ग्रहयोग हैं? जो आपको विपुल धनवान बना सकते हैं। जन्मकुंडली में दूसरा भाव पैतृक धन और संचित धन का स्थान होता है। तथा बृहस्पति धन का कारक ग्रह है। इसके अतिरिक्त पंचम, नवम, चतुर्थ, दशम और एकादश भाव भी धन प्राप्ति के योगों की सूचना देते हैं। प्रथम, पंचम, नवम, चतुर्थ, दशम और सप्तम भाव की भूमिका भी धन प्राप्ति में महत्वपूर्ण होती है। दूसरा भाव यानि पैतृक या संचित धन का भाव इस मामले में प्रमुख भूमिका निभाता है, अर्थात इस भाव की भूमिका विशेष होती है। वैसे तो विभिन्न प्रकार के योग जैसे राजयोग, गजकेसरी योग, पांच महापुरूष, चक्रवर्ती योग आदि में लक्ष्मी की विशेष कृपा या विपुल धन प्राप्त होने के संकेत मिलते ही हैं। लेकिन आधुनिक युग में उच्च पदों पर आसीन होने से भी ये योग फलीभूत होते हैं, लक्ष्मी प्राप्ति या महाधनी योग किस प्रकार जन्मकुंडली में बनते हैं? आईये देखें :-

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि निम्न प्रकार के सम्बन्ध धनेश, नवमेश, लग्नेश, पंचमेश और दशमेश आदि के मध्य बनें तो, जातक महाधनी कहा जा सकता है।

1- लग्न और लग्नेश द्वारा धन योग :- यदि लग्नेश धन भाव में और धनेश लग्न भाव में स्थित हो तो, यह योग विपुल धन योग का निर्माण करता है। इसी प्रकार से लग्नेश की लाभ भाव में स्थिति या लाभेश का धन भाव, लग्न या लग्नेश से किसी भी प्रकार का सबंध जातक को अधिक मात्रा में धन दिलाता है। लेकिन शर्त यह है कि इन भावों यो भावेशों पर नीच या शत्रु ग्रहों की दृष्टि नहीं पड़ती हो। ऐसा होने से योग खण्डित हो सकता है।

2- धन भाव या धनेश द्वारा धन योग : – यदि धनेश लाभ स्थान में हो, और लाभेश धन भाव में, यानि लाभेश धनेश का स्थान परिवर्तन योग हो, तो जातक महाधनी होता है। यदि धनेश या लाभेश केन्द्र में या त्रिकोण में मित्र भावस्थ हो, तथा उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो, जातक धनवान होगा। यदि दोनों ही केन्द्र स्थान या त्रिकोण में युति कर लें तो, यह अति शक्तिशाली महाधनी योग हो जाता है। इस योग वाला जातक धनेश या लाभेश की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर्दशा में बहुत धन कमाता है।

3- तृतीय भाव या भावेश द्वारा धन योग :- यदि कुंडली के तीसरे भाव का स्वामी लाभ घर में हो, या लाभेश और धनेश में स्थान परिवर्तन हो तो, जातक अपने पराक्रम से धन कमाता है। यह योग क्रूर ग्रहों के मध्य हो तो, अधिक शक्तिशाली माना जायेगा। इस योग में सौम्य ग्रह कम फलदायी होते हैं।

4- चतुर्थ भाव या भावेश द्वारा धन योग :- यदि कुंडली में चतुर्थेश और धनेश का स्थान परिवर्तन योग हो, या धनेश और सुखेश धन या सुख भाव में परस्पर युति बना रहें हो तो जातक बड़े-2 वाहन और भूमि का मालिक होता है। ऐसा जातक अपनी माता से विरासत में बहुत धन की प्राप्ति करता है।

5- पंचम भाव या पंचमेश द्वारा धन प्राप्ति :- कुंडली में पंचम भाव का स्वामी यदि धन, नवम अथवा लाभ भाव में हो तो भी जातक धनवान होता है। यदि पंचमेश, धनेश और नवमेश लाभ भाव में अथवा पंचमेश धनेश और लाभेश नवम भाव में अथवा पंचमेश, धनेश और नवम भाव में युत हो तो, जातक महाधनी होता है। यदि पंचमेश, धनेश, नवमेश और लाभेश चारों की युति हो तो, सशक्त महाधनी योग होता है। किन्तु यह योग बहुत कम कुंडलीयों में बनता है।

6- षष्ठ भाव और षष्ठेश द्वारा धन योग :- जन्मकुंडली का षष्ठेश लाभ या धन भाव में हो तो, शत्रु दमन द्वारा धन की प्राप्ति होती है। ऐसे योग में धनेश का षष्ठमस्थ होना शुभ नहीं होता है। यह योग कम कुंडलीयों में ही घटित होता है।

7- सप्तम और सप्तमेश द्वारा धन की प्राप्ति :- यदि कुंडली का सप्तमेश धन भावस्थ हो, या धनेश सप्तमस्थ हो, अथवा सप्तमेश नवमस्थ या लाभ भावस्थ हो तो, जातक ससुराल पक्ष से धन प्राप्त करता है। ऐसे जातको का विवाह के बाद भाग्योदय होता है। ऐसे जातक किसी धनकुबेर के दामाद बनते हैं।

8- नवम भाव और नवमेश द्वारा धन योग :- कुंडली का नवमेश यदि धन या लाभ भाव में हो, या धनेश नवमस्थ हो अथवा नवमेश और धनेश युक्त होकर द्वितीयस्थ, लाभस्थ, चतुर्थस्थ या नवमस्थ हो तो, जातक महाभाग्यशाली होते है। किसी भी कार्य में हाथ डालकर अपार धन प्राप्त कर सकता है। यह युति यदि भाग्य स्थान में बने तो योग और अधिक बलवान हो जायेगा।

9- दशम और दशमेश द्वारा धन योग :- कुंडली में धनेश और दशमेश का परिवर्तन, युति आदि होने से पर जातक पिता या राजा द्वारा या अपने कार्य विशेष द्वारा धन प्राप्त करता है। ऐसा जातक धनवान राजनेता होता है।

10- लाभ और लाभेश द्वारा धन योग :- जन्मकुंडली में लाभेश का धन भावस्थ, पंचमस्थ या नवमस्थ होना, या इन भावों के स्वामियों की केन्द्रों या त्रिकोण स्थानों में युति होने से जातक महाधनी होता है।

नोटः– इन सभी योगों में एक बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि ग्रहों की युति, स्थान परिवर्तन आदि स्थितियों में शुभ दृष्टि या मित्र दृष्टि हो तो, धनवान योग के फलित होने की सम्भावना प्रबल हो जाती है, साथ ही इन भावों या भावेशों का बलवान होना भी आवश्यक होता है। कई बार अनेक कुण्डलियों में उपर बतायें गये योग होने के उपरांत भी जातक का जीवन सामान्य होता है। ऐसा तभी होगा जब भाव या भावेश कमजोर होंगे, ग्रह बाल्यावस्था या मृतावस्था में होंगे या फिर पाप ग्रहों की दृष्टि से योग खण्डित होंगे।
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कुण्डली के राजयोग-

राजयोग उत्तरकालामृत में :-

Dr.R.B.Dhawan

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यदा मुश्तरी कर्कटे वा कमाने, अगर चश्मखोरा पड़े आयुखाने।
भला ज्योतिषी क्या लिखेगा पढ़ेगा, हुआ बालका बादशाही करेगा।।

उत्तरकालामृत ग्रन्थ में उल्लेखित यह ज्योतिषीय खोज अब्दुल रहीम खानखाना की कृति है, जो की मुगल काल के विद्वान थे। सैकड़ो वर्ष के उपरांत आज भी यह खोज सत्य ही प्रतीत होती है। इस ज्योतिषीय योग से स्पष्ट है कि यदि 2, 3, 5, 6, 8, 9 तथा 11, 12 में से किसी भी स्थान में बृहस्पति की स्थिति हो, और शुक्र 8वें स्थान में हो तो ऐसी ग्रह स्थिति में जन्म लेने वाला जातक चाहे साधारण परिवार में ही क्यों न जन्मा हो, वह राज्याधिकारी ही बनता है। यही कारण है कि कभी-कभी अत्यंत साधारण परिवार के बालकों में भी राजसिक लक्षण पायें जाते हैं, और वे किसी न किसी दिन राज्य के अधिकारी घोषित किये जाते हैं। विभिन्न योगों के अनुसार ही मनुष्य की चेष्टायें और क्रियायें विकसित होती हैं, इस विषय पर विभिन्न शास्त्रों का भी उल्लेख दर्शनीय है। सर्वप्रथम ज्योतिष शास्त्र को लीजिये उसमें राजयोग के लक्षण इस प्रकार बतलाये गये हैं।
जिस व्यक्ति के पैर की तर्जनी उंगली में तिल का चिन्ह हो वह पुरूष राज्य-वाहन का अधिकारी होता है। जिसके हाथ की उंगलियों के प्रथम पर्व ऊपर की ओर अधिक झुके हों, वह जनप्रिय तथा नेतृत्व करने वाला होता है। जिसके हाथ में चक्र, दण्ड एवं छत्र युक्त रेखायें हों, वह व्यक्ति निसंदेह राजा अथवा राजतुल्य होता है। जिसके मस्तिष्क में सीधी रेखायें और तिलादि का चिन्ह हो, वह राजा के समान ही सुख को प्राप्त करता है, और उसमें बैद्धिक कुशलता भी पर्याप्त मात्रा में होती है।
किन्तु वृहज्जातक के अनुसार राजयोग के बारह प्रकार होते हैं :-

तीन ग्रह उच्च के होने पर जातक स्वकुलानुसार राजा (राजतुल्य) होता है। यदि उच्चवर्ती तीन पापग्रह हों तो, जातक क्रूर बुद्धि का राजा होता है, और शुभ ग्रह होने पर सद्बुद्धि युक्त। उच्चवर्ती पाप-ग्रहों से राजा की समानता करने वाला होता है, किन्तु राजा नहीं होता। मंगल, शनि, सूर्य और गुरू चारों अपनी-अपनी उच्च राशियों में हों, और कोई एक ग्रह लग्न में उच्चराशि का हो तो, चार प्रकार का राजयोग होता है। चन्द्रमा कर्क लग्न में हो, और मंगल, सूर्य तथा शनि और गुरू में से कोई भी दो ग्रह उच्च हों तो, भी राजयोग होता है। जैसे- मेष लग्न में सूर्य, कर्क में गुरू, तुला का शनि और मकर राशि में मंगल भी प्रबल राजयोग कारक होता है, कर्क लग्न से दूसरा, तुला से तीसरा, मकर से चौथा जो तीन ग्रह उच्च के हों, जैसे मेष में सूर्य, कर्क में गुरू, तुला में शनि तो भी राजयोग माना जाता है। शनि कुंभ में, सूर्य मेष में, बुध मिथुन में, सिंह का गुरू और वृश्चिक का मंगल तथा शनि सूर्य और चन्द्रमा में से एक ग्रह लग्न में हो तो भी पांच प्रकार का राजयोग माना जाता है।

सूर्य बुध कन्या में हो, तुला का शनि, वृष का चंद्रमा और तुला में शुक्र, मेष में मंगल तथा कर्क में बृहस्पति भी राजयोगप्रद ही माने जाते हैं। मंगल उच्च का सूर्य और चन्द्र धनु में और लग्न में मंगल के साथ यदि मकर का शनि भी हो तो, मनुष्य निश्चित ही राजा (राजतुल्य) होता है। शनि चन्द्रमा के साथ सप्तम में हो, और बृहस्पति धनु का हो, तथा सूर्य मेष राशि का हो, और लग्न में हो तो, भी मनुष्य राजा होता है। वृष का चन्द्रमा लग्न में हो, और सिंह का सूर्य तथा वृश्चिक का बृहस्पति और कुंभ का शनि हो तो, मनुष्य निश्चय ही राजा होता है। मकर का शनि, तीसरा चन्द्रमा, छठा मंगल, नवम् बुध, बारहवां बृहस्पति हो तो, मनुष्य अनेक सुंदर गुणों से युक्त राजा होता है। धनु का बृहस्पति चंद्रमा युक्त क्रमश: अपने-अपने उच्च राशिगत हों तो, जातक गुणावान राजा होता है। और मंगल मकर का और बुध शुक्र अपने-अपने उच्च में लग्न गत हों तो, जातक गुणावान राजा होता है। मंगल शनि पंचम गुरू और शुक्र चतुर्थ तथा कन्या लग्न में बुध हों तो, जातक गुणावान राजा होता है। मीन का चंद्रमा लग्न में हो, कुंभ का शनि, मकर का मंगल, सिंह का सूर्य जिसके जन्म कुण्डली में हों, वह जातक भूमि का पालन करने वाला गुणी राजा होता है। मेष का मंगल लग्न में, कर्क का बृहस्पति हो तो, जातक शक्तिशाली राजा होता है। कर्क लग्न में बृहस्पति और ग्याहरवें स्थान में वृष का चंद्रमा शुक्र, बुध और मेष का सूर्य दशम स्थान में होने से जातक पराक्रमी राजा होता है।

मकर लग्न में शनि, मेष लग्न में मंगल, कर्क का चन्द्र, सिंह का सूर्य, मिथुन का बुध और तुला का शुक्र होने से जातक यशस्वी व भूमिपति होता है। कन्या का बुध लग्न में और दशम शुक्र सप्तम् बृहस्पति तथा चन्द्रमा भी जातक राजा होता है। जितने भी राजयोग हैं, इनके अन्तर्गत जन्म पाने पर मनुष्य चाहे जिस जाति स्वभाव और वर्ण का क्यों न हो, वे राजा ही होता है। फिर राजवंश में जन्म प्राप्त करने वाले जातक तो चक्रवर्ती राजा तक हो सकते हैं। किन्तु अब कुछ इस प्रकार के योगों का वर्णन किया जा रहा है जिनमें केवल राजा का पुत्र ही राजा होता है, तथा अन्य जातियों के लोग राजा तुल्य होते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि राजा का पुत्र राजा ही हो, उसके लिये निम्नलिखित में से किसी एक का होना नितांत आवश्यक है, कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि राजवंश में जन्म पाने वाला जातक भी सामान्य व्यक्ति होता है, और सामान्य वंश और स्थिति में जन्म पाने वाला महान हो जाता है, उसका यही कारण है। यदि त्रिकोण में 3-4 ग्रह बलवान हों तो राजवंशीय राजा होते हैं। जब 5-6-7 भाव में ग्रह उच्च अथवा मूल त्रिकोण में हों तो, अन्य वंशीय जातक भी राजा होते हैं। मेष के सूर्य चंद्र लग्नस्थ हों और मंगल मकर का तथा शनि कुंभ का बृहस्पति धनु का हो तो, राजवंशीय राजा होता है।

यदि शुक्र 2, 7 राशि का चतुर्थ भाव में और नवम स्थान में चंद्रमा हो और सभी ग्रह 3,1,11 भाव में ही हों तो, ऐसा जातक राजवंशीय राजा होता है। बलवान बुध लग्न में और बलवान शुक्र तथा बृहस्पति नवम स्थान में हो और शेष ग्रह 4, 2, 3, 6, 10, 11 भाव में ही हों तो, ऐसा राजपुत्र धर्मात्मा और धनी-मानी राजा होता है। यदि वृष का चंद्रमा लग्न में हो और मिथुन का बृहस्पति, तुला का शनि और मीन राशि में अन्य रवि, मंगल, बुध तथा शुक्र ग्रह हों तो, राजपुत्र अत्यंत धनी होता है। दशम चन्द्रमा, ग्याहरवां शनि, लग्न का गुरू, दूसरा बुध और मंगल, से राजपुत्र राजा ही होेता है। किंतु यदि मंगल शनि लग्न में चतुर्थ चंद्रमा और सप्तम बृहस्पति, नवम, शुक्र, दशम सूर्य, ग्यारहवें बुध हो तो, भी यही फल होता है। चतुर्थ में सूर्य और शुक्र होने से राजपुत्र राजा ही होेता है। किंतु यदि मंगल शनि लग्न में चतुर्थ चंद्रमा और सप्तम बृहस्पति, नवम, शुक्र, दशम सूर्य, ग्यारहवें बुध हो तो, भी यही फल होता है। एक बात सबसे अधिक ध्यान देने की यह है कि राजयोग का निर्माण करने वाले समस्त ग्रहों में से जो ग्रह दशम तथा लग्न में स्थित हों तो, उनकी अन्तर्दशा में राज्य लाभ होगा जब दोनों स्थानों में ग्रह हों तो, उनसे भी अधिक शक्तिशाली राज्य लाभ होगा, उसके अन्तर्दशा में जो लग्न, दशम में अनेक ग्रह हों तो, उनमें जो सर्वाेत्तम बली हो, उसके प्रभाव के द्वारा ही राज्य का लाभ हो सकेगा। बलवान ग्रह द्वारा प्राप्त हुआ राज्य भी छिद्र दशा द्वारा समाप्त हो जाता है। यह जन्म कालिक शत्रु या नीच राशिगत ग्रह की अन्तर्दशा छिद्र दशा कहलाती है। जो राज्य को समाप्त करती है, अथवा बाधायें उपस्थित करती है। यदि बृहस्पति, शुक्र और बुध की राशियां 4, 12, 6, 2, 3, 6 लग्न में हों, और सातवां शनि तथा दशम सूर्य हो तो, भी मनुष्य धन रहित होकर भी भाग्यवान होता है, और अच्छे साधन उसके लिये सदा उपलब्ध होते हैं। यदि केन्द्रगत ग्रह पाप राशि में हों, और सौम्य राशियों में पापग्रह होें तो, ऐसा मनुष्य चोरों का राजा होता है। इस प्रकार से विभिन्न राजयोगों के होने पर मनुष्य सुख और ऐश्वर्य का भोग करता।

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