कालसर्प योग

कुंडली में कालसर्प योग का क्या प्रभाव होता है? कालसर्प योग जातक पर किस प्रकार अपना शुभ या अशुभ प्रभाव डालता है ? :-

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant), best top astrologer in india, best top astrologer in delhi

विविध धर्मग्रन्थों एवं शास्त्रों में सर्पदोषों का वर्णन मिलता है। वर्तमान में प्राचीन एवं नवीन ज्योतिषाचार्यों के मध्य कालसर्प योग के विषय में मन्त्रणा प्रारम्भ हो चुकी है। यदि हम प्राचीन ग्रन्थ मानसागरी, बृहज्जातक तथा बृहत्पाराशर होराशास्त्र का अवलोकन करें तो यह सिद्ध हो जाता है कि इन ग्रन्थों में कालसर्पयोग अथवा सर्पयोग का उल्लेख किया गया है।

भारतीय संस्कृति में नागों का विशेष महत्व है। प्राचीन काल से ही नागपूजा की जाती रही है। नागपंचमी का पर्व पूरे देश में पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन प्रत्येक गृहस्थ घर के प्रवेशद्वार पर नाग की आकृति बनाकर पूजन करता है। इस दिन नागदर्शन को अत्यन्त शुभ माना जाता है। इन्हें शक्ति एवं सूर्य का अवतार माना गया है। मानव-सभ्यता के प्रारम्भ से ही नागों के प्रति विशेष भय की भावना रही है। भारत के प्रत्येक क्षेत्र में भगवान् आशुतोष के पूजन का विधान होता है। नाग भगवान् शिव के गले का हार हैं।

सप्ताह के सात दिनों के नाम किसी-न-किसी ग्रह के ऊपर रखे गये हैं, किंतु राहु केतु के नाम पर कोई नाम नहीं रखा गया; क्योंकि इन्हें छायाग्रह माना जाता है। इसलिये इनका प्रभाव भी परोक्ष रूप से पड़ता है। राहु का स्वभाव शनिवत् एवं केतु का मंगलवत् माना जाता है। एक शरीर के भागों में राहु को सिर एवं केतु को धड़ मानने पर सिर में विचार-शक्ति होती है, किंतु शरीर न होने पर यह स्वयं क्रिया करने में असमर्थ होता है। राहु जिस भाव में होता है, उसके भावेश, उस भाव में स्थित ग्रह या जहाँ दृष्टि डालता है उस राशि, राशीश एवं उस भाव में स्थित ग्रह को अपनी विचारशक्ति से प्रभावित कर क्रिया करने को प्रेरित करता है। केतु जिस भाव में बैठता है उस राशि, उसके भावेश, केतु पर दृष्टिपात करने वाले ग्रह के प्रभाव में क्रिया करता है। केतु को मंगल के समान मान लेने पर उसका प्रभाव मंगल के समान विध्वंसकारी हो जाता है। अपनी महादशा एवं अन्तर्दशा में व्यक्ति के कर्म को भ्रमित कर सुख-समृद्धि का हृास करता है।

राहु की महादशा बाधाकारक होती है। यहाँ विचारणीय यह है कि राहु सम्बन्धित ग्रह के माध्यम से बुद्धि को प्रभावित करता है, एवं केतु सम्बन्धित ग्रह के प्रभाव में आकर उस ग्रह के अनुिसार कार्य करवाता है।

राहु के सम्बन्ध में एक बात अवश्य विचारणीय है कि राहु जिस ग्रह के सम्पर्क में हो, उसके अंश राहु से कम होने पर राहु प्रभावी रहेगा, जबकि राहु के अंश कम होने पर उस ग्रह का प्रभाव अधिक होगा एवं राहु निस्तेज हो जायगा, उस स्थिति में कालसर्प योग का प्रभाव भी न्यूनतम रहेगा। कालसर्प योग राहु से केतु एवं केतु से राहु की ओर बनता है। यहाँ विचारणीय यह है कि राहु से केतु की ओर बननेवला योग निष्प्रभावी होता है। यह कहना उपयुक्त होता है कि केतु से राहु की ओर बननेवाले योग को कालसर्प की संज्ञा देना उपयुक्त नहीं होगा।

वैज्ञानिक रूप से यदि कालसर्प योग की व्याख्या करें तो जन्मांग-चक्र में राहु-केतु की स्थिति हमेशा आमने-सामने की होती है। जब अन्य सभी ग्रह इनके मध्य अर्थात् प्रभावक्षेत्र में आ जाते हैं, तब वे अपना प्रभाव त्यागकर राहु केतु के चुम्बकीय क्षेत्र से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते एवं राहु-केतु के गुण-दोषों का प्रभाव पड़ना इन ग्रहों पर अवश्यम्भावी हो जाता है।

राहु-केतु हमेशा वक्रगति से चलते हैं। इनमें वाम गोलार्ध एवं दक्षिण गोलार्ध दो स्थितियाँ बनती हैं। राहु का बायाँ भाग काल कहलाता है। इसीलिये राहु से केतु की ओर बननेवाला योग ही कालसर्प योग की श्रेणी में आता है। केतु से राहु की ओर बनने वाले योग को अनेक आचार्यों ने कालसर्प योग नहीं माना है। इतना अवश्य है कि कालसर्प योग का निर्माण किसी-न-किसी पूर्वजन्मकृत दोष अथवा पितृदोष के कारण बनाता है।

निम्न चक्रद्वारा कालसर्प योग को स्पष्टतः समझा जा सकता है-

उदित गोलार्ध कालसर्प योग कुंडली

अनुदित गोलार्ध कालसर्प योग कुंडली

उदित गोलार्ध कालसर्प योग जन्म से ही प्रभावी हो जाता है, जबकि अनुदित का प्रभाव गोचर में ग्रह के राहु के प्रभाव में आने पर होता है। अतः उदित का प्रभाव अधिक भयावह होता देखा गया है।

किसी जन्मांग में कालसर्प योग का निर्धारण अत्यन्त सावधानी से करना चाहिये। केवल राहु-केतु के मध्य ग्रहों का होना ही प्रर्याप्त नहीं है। यहाँ अनेक ऐसे बिन्दु हैं, जिनका ध्यान न रखें तो हमारी दिशा एवं जातक की दशा खराब होने में अधिक समय नहीं लगेगा। सर्वप्रथम यह देखें कि कालसर्प योग किस भाव से किस भावतक है एवं ग्रह का भाव कया है उस भाव में ग्रहों की क्या स्थति बन रही है? ग्रहों की युति का क्या प्रभाव पड़ रहा है। यदि राहु के साथ किसी अन्य ग्रह की युति है तो यहाँ यह भी देखना है कि युति वाले ग्रह का बल राहु से कम है या अधिक। ऐसी स्थिति है तो राहु का न केवल प्रभाव कम होगा, अपितु कालसर्प योग भंग भी हो सकता है। यही स्थिति किसी ग्रह के राहु-केतु की पकड़ से बाहर निकले पर भी हो सकती है। अतः कालसर्प का निर्धारण सतही स्तर के विश्लेषण द्वारा करना चाहिए। यह योग जातक के लिये अत्यन्त ही दुःखदायी हो सकता है।
यहाँ पर एक बात और कहने योग्य है कि कालसर्प हमेशा कष्टकारक ही नहीं होते। कभी-कभी तो ये इतने अधिक अनुकूल होते हैं कि व्यक्ति को विश्वास्तर पर न केवल प्रसिद्ध बनाते हैं। अपितु सम्पत्ति, वैभव, नाम प्रसिद्धि के देनेवाले भी बन जाते हैं। आप विश्व के महापुरूषों के जन्मांगों का अध्ययन करें तो पायेंगे कि उनकी कुण्डली में कालसर्प योग होने के बाद भी वे प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचे। इतना अवश्यक है कि उनके जीवन का कोई-न-कोई पक्ष ऐसा अवश्य रहा है जो अपूर्णता का प्रतीक बन गया हो। कालसर्प योग से डरने या भयाक्रान्त होने की आवश्यकता बिलकुल भी नहीं है। जन्मकुण्डली में अनेक शुभ योग जैसे पंचमहापुरूष योग, बुधादित्य योग आदि बनते हैं, जिनके कारण कालसर्प योग का प्रभाव अत्यधिक नहीं होकर अल्पकालिक होता है। यदि आप विश्व के सफलतम व्यक्तियों के जीवन का अध्ययन करें तो निश्चित ही यह पायेंगे कि उनकी कुण्डली के कालसर्प योग ने ही उन्हें इस उच्चतम शिखर पर पहुँचाया।

किसी जातक की कुण्डली में कालसर्प योग है तो यह मानकर चलिये कि परिवार के अन्य सदस्यों के जन्मांग में भी यह योग देखने को मिलेगा; क्योंकि यह अनुबन्धित ऋण है, जो हमें पूर्वजों से मिलता है, एवं इससे परिवार के सभी सदस्य किसी-न-किसी रूप में प्रभावित होते हैं। इसे ही पितृदोष का नाम दिया जाता है। कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि ज्योतिषाचार्य द्वारा व्यक्ति इतना डरा दिया गया है कि वह ठीक ढंग से सोने भी नहीं पाता, जबकि कुंडली में कालसर्प योग था ही नहीं, या आंशिक प्रभाव पड़ रहा था, जिसका सहज निदान किया जा सकता था। अतः कालसर्प योग का निर्णय किसी योग्य एवं अनुभवी ज्योतिषी से कराकर उसका निदान करा लेना चाहिये।

आज समाज में ऐसे भी विद्वान ज्योतिषाचार्य हैं, जो अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर सही सलाह दे रहे हैं। इस लिये अनुभवहीन ज्योतिषियों को कुंडली दिखाने से बचने का प्रयास करना चाहिये।

कालसर्प योग के प्रकार :-
ज्योतिष में 12 राशियाँ हैं। इनके आधार पर 12 लग्न होते हैं, और इनके विविध योगों के आधार पर कुल 288 प्रकार के कालसर्प योग निर्मित हो सकते हैं। प्रमुख रूप से भाव के आधार पर कालसर्प योग 12 प्रकार के होते हैं, जिसके मान एवं प्रभाव निम्नानुसार हैं-

1- अनन्त कालसर्प योग- लग्न से सप्तम भाव तक बननेवाले इस योग को अनन्त कालसर्प योग कहा जाता है। इस योग के कारण जातक को मानसिक अशान्ति, जीवन की अस्थिरता, कपटबुद्धि, प्रतिष्ठाहानि, वैवाहिक जीवन का दुःखमय होना इत्यादि प्रभाव देखने को मिलते हैं। जातक को आगे बढ़ने के लिये काफी संघर्ष करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति निरन्तर मानसिक रूप से अशान्त रहता है।

2- कुलिक कालसर्प योग- द्वितीय स्थान से अष्टम स्थान तक पड़नेवाले इस योग के कारण जातक का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। जीवन में आर्थिक पक्ष को लेकर अत्यन्त संघर्ष करना पड़ता है। जातक कर्कश वाणी से युक्त होता है, साथ ही वह पारिवारिक विरोध एवं अपयशका भागी भी बनता है। योग की तीव्रता के कारण विवाह में विलम्ब के साथ विच्छेदतक भी होता रहता है।

3- वासुकि कालसर्प योग- यह योग तृतीय से नवमतक बनता है। पारिवारिक विरोध, भाई-बहनों से मनमुटाव, मित्रों से धोखा, भाग्य की प्रतिकूलता, व्यावसाय या नौकरी में रूकावटें, धर्म के प्रति नास्तिकता, कानूनी रूकावटें आदि बातें देखने को मिलती हैं। जातक धन अवश्य कमाता है, किंतु कोई-न-कोई बदनामी उसके साथ जुड़ी ही रहती है। उसे यश पद, प्रतिष्ठा पाने के लिये संघर्ष करना ही पड़ता है।

4- शंखपाल कालसर्प योग- यह योग चतुर्थ से दशम भाव में निर्मित होता है। इसके प्रभाव से व्यवसाय, नौकरी, विद्याध्ययन इत्यादि पक्षों में रूकावटें आती हैं। घाटे का सामना करना पड़ता है। वाहन एवं भृत्यों (नौकर) तथा कर्मचारियों को लेकर कोई-न-कोई समस्या हमेशा बनी रहती है। आर्थिक स्थिति इतनी अधिक खराब हो जाती है कि दिवालिया होने तक की परिस्थितियाँ आ सकती है।

5-पग कालसर्प योग- पंचम से एकादश भाव में राहु-केतु होने से यह योग होता है। इसके कारण सन्तान सुख में कमी या सन्तान का दूर रहना अथवा विच्छेद तथा गुप्तरोगों से जूझना पड़ता है। असाध्यरोग हो सकते हैं, जिनकी चिकित्सा में अत्यधिक धन का अपव्यय होता है। दुर्घटना एवं हाथों में तकलीफ हो सकती है। मित्रों एवं पत्नी से विश्वासघात मिलता है। यदि सट्टा, लाटरी, जुआ की लत हो तो इसमें सर्वस्व स्वाहा होने में देर नहीं लगती। शिक्षा प्राप्ति में अनेक अवरोध आते हैं। जातक की शिक्षा भी अपूर्ण रह सकती है। जिस व्यक्ति पर सर्वाधिक विश्वास करेंगे, उसी से धोखा मिलता है। सुख में प्रयत्न करने पर भी इच्छित फल की प्राप्ति नहीं हो पाती। संघर्षपूर्ण जीवन बीतता है।

6-महापग कालसर्प योग- छह से बारह भाव के इस योग में पत्नी-विछोह, चरित्र की गिरावट, शत्रुओं से निरन्तर पराभव आदि बातें होती हैं। यात्राओं की अधिकता रहती है। आत्मबल की गिरावट देखने को मिल जाती है। प्रयत्न करने पर भी बीमारी से छुटकारा नहीं मिलता। गुप्त शत्रु निरन्तर षड्यन्त्र करते ही रहते हैं।

7- तक्षक कालसर्प योग- सप्तम से लग्न तक यह योग होता है। इसमें सर्वाधिक प्रभाव वैवाहिक जीवन एवं सम्पत्ति के स्थायित्व पर पड़ता है। जातक को शत्रुओं से हमेशा हानि मिलती है, और असाध्य रोगों से जूझना पड़ता है। पदोन्नति में निरन्तर अवरोध आते हैं। मानसिक परेशानी का कोई-न-कोई कारण उपस्थित होता रहता है।

8-कर्कोटक कालसर्प योग- अष्टम भाव से द्वितीय भाव तक कर्कोटक योग होता है। जातक रोग और दुर्घटना से कष्ट उठाता है, ऊपरी बाधाएँ भी आती हैं। अर्थहानि, व्यापार में नुकसान, नौकरी में परेशानी, अधिकारियों से मनमुटाव, पदावनति, मित्रों से हानि एवं साझेदारी में धोखा मिलता है। रोगों की अधिकता, शल्यक्रिया, जहर का प्रकोप एवं अकाल मृत्यु आदि योग बनते हैं।

9-शंखनाद/शंखचूड़/कालसर्प योग- यह योग नवम से तृतीय भाव तक निर्मित होता है। यह योग भाग्य को दूषित करता है। व्यापार में हानि एवं पारिवारिक तथा अधिकारियों से मनमुटाव कराता है, फलतःशासन से कार्यो में अवरोध होते हैं। जातक के सुख में कमी देखने को मिलती है।

10-पातक कालसर्प योग- दशम से चतुर्थ भाव तक यह योग होता है दश भाव से व्यवसाय की जानकारी मिलती है। सन्तान पक्ष को बीमारी भी होती है। दशम एवं चतुर्थ से माता-पिता का अध्ययन किया जाता है, अतः माता-पिता, दादा-दादी का वियोग राहु की महादशा/अन्तर्दशा में सम्भाव्य है।

11-विषाक्त/विषधर कालसर्प योग- राहु-केतु के एकादश-पंचम में स्थित होने पर इस योग से नेत्रपीडा, हृदयरोग, बन्धुविरोध, अनिद्रारोग आदि स्थितियाँ बनती हैं। जातक को जन्मस्थान से दूर रहने को बाध्य होना पड़ता है। किसी लम्बी बीमारी की सम्भावना रहती है।

12- शेषनाग कालसर्प योग- द्वादश से षष्ठ भाव के इस योग में जातक के गुप्त शत्रुओं की अधिकता तो होती ही है वे जातक को निरन्तर नुकसान भी पहुँचाते रहते हैं। जिन्दगी में बदनामी अधिक होती है। नेत्र की शल्यक्रिया करवानी पड़ सकती है। कोर्ट-कचहरी के मामलों में पराजय मिलती है।

कालसर्प योग के सामान्य लक्षण:-
कालसर्प योग से जो जातक प्रभावित होते हैं, उन्हें प्रायः स्पप्न में सर्प दिखायी देते हैं। जातक अपने कार्यो में अथक परिश्रम करने के बावजूद आशातीय सफलता प्राप्त नहीं कर पाता। हमेशा मानसिक तनाव से ग्रस्त रहता है, जिसके कारण सही निर्णय लेने में असमर्थ रहता है। अकारण लोगों से शत्रुता मिलती है। गुप्त शत्रु सक्रिय रहते हैं, जो कार्यो में अवरोध पैदा करते हैं। पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण हो जाता है। विवाह में विलम्ब या वैवाहिक जीवन के साथ विच्छेद तक की स्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं।

सर्वाधिक अनिष्टकारी समय- जातक के जीवन में सर्वाधिक अनिष्टकारी समय निम्न अवस्था में होता है-

1- राहु की महादशा, राहु की प्रत्यन्तर दशा में अथवा शनि, सूर्य तथा मंगल की अन्तर्दशा में।

2- जीवन के मध्यकाल लगभग 40से 45 वर्ष की आयु में।

3- ग्रह-गोचर में कुण्डली में जब-जब कालसर्प योग बनता हो।

उपर्युक्त अवस्थाओं में कालसर्प योग सर्वाधिक प्रभावकारी होता है एवं जातक को इस समय शारीरिक, मानसिक पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक, व्यावसायिक इत्यादि क्षेत्र में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

कालसर्प योग शान्ति के कुछ स्थान:-
1- कालहस्ती शिवमन्दिर, विरूपति।
2- त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग, नासिक।
3- त्रिवेणीसंगम, इलाहाबाद।
4- त्रियुगी नारायण मन्दिर, केदारनाथ।
5- त्रिनागेश्वर मन्दिर, जिला तंजौर।
6- सिद्धशक्तिपीठ, कालीपीठ, कलकत्ता।
7- भूतेश्वर महादेवमन्दिर नीमतल्लाघाट, कलकत्ता।
8- गरूड़-गोविन्द मन्दिर छटीकारा गाँव एवं गरूड़ेश्वर मन्दिर बडोदरा।
9- नागमन्दिर, जैतगाँव, मथुरा।
10- चामुण्डादेवी मन्दिर, हिमालय प्रदेश।
11- मनसादेवी मन्दिर, चण्डीगड़।
12- नागमन्दिर ग्वारीघाट, जबलपुर।
13- महाकालमन्दिर उज्जैन।

कालसर्प योग की शान्ति किसी पवित्र नदी तट, नदी संगम, नदी किनारे के श्मशान, नदी किनारे स्थित शिवमन्दिर अथवा किसी भी नाग मन्दिर में की जाती है। कभी-कभी देखने में आता है कि अनेक आचार्य यजमान के घरों (निवास)- में ही कालसर्प योग की शान्ति करवा देते हैं। ऐसा ठीक नहीं प्रतीत होता। रूद्राभिषेक तो घर में किया जा सकता है, किंतु कालसर्प योग की शान्ति निवास स्थल में नहीं करनी चाहिये।

राहुकृत पीड़ा के उपाय:-
यदि जन्मांग में राहु अशुभ स्थिति में हो तो उससे बचने के लिये कस्तूरी, तारपीन, गजदन्त भस्म, लोबान एवं चंदन का इत्र जल में मिलाकर स्नान करने से राहु की पीड़ा से शान्ति मिलती है। इसके लिये नक्षत्र, योग दिन, दिशा एवं समय का विशेष ध्यान रखना चाहिये। ऐसे जातक को गोमेद का दान करना चाहिये।

राहु शांति के लिए दान:-
राहु की पीड़ा के निवारण हेतु जातकों को निम्न वस्तुओं का दान बुधवार या शनिवार के दिन करना चाहिये-

1-सरसों का तेल, 2- सीसा (रांगा), 3- काला तिल, 4-कम्बल, 5-तलवार, 6-स्वर्ण, 7-नीला वस्त्र, 8- सूप, 9- गोमेद, 10-काले रंग का पुष्प, 11-अभ्रक, 12-दक्षिणा।

उपर्युक्त वस्तुओं का दान किसी शनि का दान लेने वाले को दें, अथवा किसी शिव मन्दिर, शनि मंदिर में रात्रिकाल में बुधवार या शनिवार को छोड़ दें।

कालसर्प योग शान्ति के अन्य उपाय:-
1- कालसर्प योग का सर्वमन्य शान्ति-उपाय रूद्राभिषेक है। श्रावण मास में अवश्य निर्यमित करें।

2- बहते जल में विधान सहित पूजन कर दूध से पूरितकर चाँदी के नाग-नागिन के जोड़े को प्रवाहित करें।

3- तीर्थराज प्रयाग में तर्पण एवं श्राद्धकर्म सम्पन्न करें।

4- कालसर्प योग में राहु की शान्ति का उपाय रात्रि के समय किया जाये। राहु के सभी पूजन शिव मन्दिर में रात्रि के समय या राहुकाल में करें।

5- राहु के हवन हेतु दूर्वा का उपयोग आवश्यक है। राहु के पूजन में धूप एवं अगरबत्ती का उपयोग न करें। इसके स्थान पर कपूर, चन्दन का इत्र उपयोग करें।

6- शिवलिंग पर मिसरी एवं दूध अर्पित करें। शिवताण्डवस्तोत्र का नियमित पाठ करें।

7- घर के पूजा स्थल में भगवान् श्रीकृष्ण की मोरपंखयुक्त मूर्ति का नियमित पूजन करें।

8- पंचाक्षर मंत्र का नियमित जप करें। नियमित मौली (कलावा) का दान करें, एवं बहते जल में कोयले प्रवाहित करते रहने से स्थायी शान्ति प्राप्त होती है।

9- मसूर की दाल एवं कुछ पैसे सफाई कर्मचारी को प्रातःकाल दें।

10- निम्न नवनागस्तोत्र के नौ पाठ प्रतिदिन करें-

अनन्तं वासुकिं शेषं पगनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
सायकांले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः।।

भावों के अनुसार कालसर्पयोग का निवारण :-
1- प्रथम भाव- गले में हमेशा चाँदी का चैकोर टुकड़ा धारण करें।

2- द्वितीय भाव- घर के उत्तर-पश्चिम-कोण में सफाईकर मिट्टी के बर्तन में पानी भर दें, प्रतिदिन पानी बदलें। बदले हुए पानी को चैराहे में डालें।

3- तृतीय भाव- अपने जन्मदिन पर गुड़, गेहूँ एवं ताँबे का दान करें।

4- चतुर्थ भाव- प्रतिदिन बहते हुए जल में दूध बहायें।

5- पंचम भाव- घर के ईशानकोण में सफेद हाथी की मूर्ति रखें।

6- षष्ट भाव- प्रत्येक माह की पंचमी तिथि को एक नारियल बहते हुए जल में प्रभावित करें।

7- सप्तम भाव- मिट्टी के बर्तन में दूध भरकर निर्जन स्थान में रख आयें।

8- अष्टम भाव- प्रतिदिन काली गाय को गुड़, रोटी, काले तिल एवं उड़द खिलायें।

9- नवम भाव- शिवरात्रि के दिन 18 नारियल सूर्योदय से सूर्यास्त तक 18 मन्दिरों में रखें। यदि 18 मन्दिर पास में न हों तो दुबारा उसी क्रम से मन्दिरों में दान कर सकते हैं।

10- दशम भाव- किसी महत्वपूर्ण कार्य को घर से जाते समय काली उड़द के दाने सिर से सात घुमाकर बिखेर दें।

11- एकादश भाव- प्रत्येक बुधवार को घर की सफाई कर कचरा बाहर फेंक दें। उस दिन फटा वस्त्र पहनें।

12- द्वादश भाव- प्रत्येक अमावास्या को काले कपड़े में काला तिल, दूध में भीगे जौ, नारियल एवं कोयला बाँधकर जल में बहायें।

शिवपंचाक्षर मंत्र एवं शिवपंचाक्षरस्तोत्र का नियमित जप करने एवं कालसर्प यंत्र नियमित पूजन, शिवलिंग तथा चित्र पर चंदन का इत्र लगाने से शान्ति प्राप्त होती है। लगातार 45 दिन का अनुष्ठान निश्चित शान्ति देता है। अनुष्ठान के समय अथवा मंत्र जप के दौरान केवल इत्र एवं कपूर का प्रयोग ही करें। अगरबत्ती के धुएँ एवं दीप से नागों को गर्माहट मिलती है, जिससे वे क्रोधित होते हैं, अतः इन वस्तुओं का उपयोग न करें।

शिवपंचाक्षरस्त्रोत्र :-
नागेन्द्रहराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय हेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नराय नमः शिवाय।।
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय।
चन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नमः शिवाय।।
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय।।
वसिष्ठकुम्भोभ्दवगौतमार्य – मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय।।
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
व्यियाय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय।।
पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।

शिवकृपा से कुछ भी अप्राप्य नहीं है। माँ नर्मदा का नाम-जप करते हुए शिवलिंग पर नर्मदाजल की निरन्तर धार छोड़ते हुए निम्न मंत्र का जप करने से कालसर्प दोष, पितृ दोष, शापित कुंडली के दोषों का पूर्णतः शमन सम्भव हो जाता है-

नर्मदायै नमः प्रातर्नर्मदायै नमो निशि।
नमोऽस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहि मां विषसर्पतः।।

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मानसिक रोग और ज्योतिष

मानसिक रोगों के ज्योतिषीय कारण :-

Dr.R.B.Dhawan

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जन्मकुंडली में शरीर के सभी अंगों का विचार तथा उनमें होने वाले रोगों या विकारों का विचार भिन्न-भिन्न भावों से किया जाता है। रोग तथा शरीर के अंगों के लिये लग्न कुण्डली में मस्तिष्क का विचार प्रथम स्थान से, बुद्धि का विचार पंचम भाव से तथा मनःस्थिति का विचार चन्द्रमा से किया जाता है। इस के अतिरिक्त शनि, बुध, शुक्र तथा सूर्य का मानसिक स्थिति को सामान्य बनाये रखने में विशेष योगदान है। शरीर क्रिया विज्ञान के अनुसार मानव शरीर में मस्तिष्क एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है। यह शरीर का केन्द्रीय कार्यालय है, यहीं से सभी संदेश व आदेश प्रसारित होकर शरीर में बडे़ से लेकर सूक्षमातिसूक्ष्म अंगों तक को भेजे जाते हैं।

मानव मस्तिष्क को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, एक वह जिसमें बुद्धि कार्य करती है, सोचने-विचारने, तर्क विश्लेषण और निर्णय करने की क्षमता इसी में है, इसी को अवचेतन मस्तिष्क कहते हैं। ज्योतिष मतानुसार इसका कारक ग्रह सूर्य है। विचारशील (अवचेतन) मस्तिष्क रात्रि में सो जाता है, विश्राम ले लेता है, अथवा कभी-कभी नशा या बेहोशी की दवा लेने से मूर्छाग्रस्त हो जाता है। अवचेतन मस्तिष्क के इसी भाग के विकार ग्रस्त होने से जातक मूर्ख, मंद बुद्धि और अनपढ़ अविकसित मस्तिष्क वाला व्यक्ति या तो सुख के साधन प्राप्त नहीं कर पाता, और यदि कमाता भी है तो, उसका समुचित उपयोग करके सुखी नहीं रह पाता। सभी वस्तुयें उसके लिये जान का जंजाल बन जाती हैं। एेसे जातक मंदबुद्धि तो कहलाते हैं, परंतु इनमें शरीर के लिये भूख, मल-त्याग, श्वास-प्रश्वास, रक्तसंचार, तथा पलकों का झपकना आदि क्रियायें सामान्य ढंग से होती हैं। मस्तिष्क की इस विकृति का शरीर के सामान्य क्रम संचालन पर बहुत ही कम असर पड़ता है। मस्तिष्क का दूसरा भाग वह है, जिसमें आदतें संग्रहित रहती हैं, और शरीर के क्रियाकलापों का निर्देश निर्धारण किया जाता है। हमारी नाड़ियों में रक्त बहता है, ह्रदय धड़कता है, फेफड़े श्वास-प्रश्वास क्रिया में संलग्न रहते हैं, मांसपेशीयां सिकुड़ती-फैलती हैं, पलकें झपकती-खुलती हैं, सोने-जागने का खाने-पीने और मल त्याग का क्रम स्वयं संचालित होता है। पर यह सब अनायास ही नहीं होता, इसके पीछे सक्रिय (चेतन) मस्तिष्क की शक्ति कार्य करती है, इसे ही हम “मन” कहते हैं। ज्योतिष मतानुसार इस मन का कारक ग्रह चंद्रमा है। उपरोक्त सभी शक्तियां मस्तिष्क (मन) के इसी भाग से मिलती हैं, उन्माद, आवेश आदि विकारों से ग्रसित भी यही होता है, डाक्टर इसी को निद्रित करके आप्रेशन करते हैं। किसी अंग विशेष में सुन्न करने की सूई लगाकर भी मस्तिष्क तक सूचना पहुँचाने वाले ज्ञान तन्तुओं को संज्ञाशून्य कर देते हैं, फलस्वरूप पीड़ा का अनुभव नहीं होता, और आप्रेशन कर लिया जाता है। पागलखानों में इसी चेतन मस्तिष्क का ही ईलाज होता है। अवचेतन की तो एक छोटी सी परत ही मानसिक अस्पतालों की पकड़ मे आई है, वे इसे प्रभावित करने में भी थोड़ा-बहुत सफल हुये हैं, किन्तु इसका अधिकांश भाग अभी भी डाक्टरों की समझ से परे है।

यदि हम ज्योतिष की दृिष्टि से विचार करें तो मस्तिष्क (अवचेतन मस्तिष्क) Subconscious Mind का कारक ग्रह सूर्य है। जन्मकुण्डली में सूर्य तथा प्रथम स्थान पीड़ित हो तो, उस जातक में किसी हद तक गहरी सोच का आभाव होता है, अथवा वह गम्भीर प्रकृति का होता है, तथा मन (चेतन मस्तिष्क) Conscious Mind का कारक ग्रह चन्द्रमा है। ऐसा जातक मनमुखी होता है, जो भी मन में आता है वैसा ही करने लगता है। मन में आता है तो, नाचने लगता है, मन करता है तो गाने लगता है, परंतु उस समय की जरूरत क्या है? इसकी उसे फिक्र नहीं होती। विचित्र बाते करना, किसी एक ओर ध्यान जाने पर उसी प्रकार के कार्य करने लगता है। यह सब मनमुखी जातक के लक्षण हैं, ऐसे जातक की कुंडली में चन्द्रमा तथा कुण्डली के चतुर्थ व पंचम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है। इस के अलावा बुध विद्या देने वाला, गुरू ज्ञान देने वाला, तथा शनि वैराग्य देने वाले ग्रह हैं। किसी भी जातक की कुंडली में नवम् भाग्य का, तृतीय बल और पराक्रम का, एकादश लाभ का तथा सप्तम भाव वैवाहिक सुख के विचारणीय भाव होते हैं। यह सब ग्रहस्थितियाँ मन व मस्तिष्क पर किसी न किसी प्रकार से अपना प्रभाव ड़ालती हैं। आगे की पंक्तियों में मैं उन्माद (विक्षिप्त अवस्था) का कुंडली में कैसे विचार किया जाता है? यह बताऊँगा, जिससे ज्योतिष के विद्यार्थी लाभान्वित होंगे।

1. कुण्डली (Horoscope) में पंचम, नवम, लग्न व लाभ स्थान में से किसी भी एक स्थान पर पापयुक्त सूर्य, मंगल, शनि, पापी बुध अथवा राहु-केतु के साथ क्षीण चन्द्रमा जो की मन (चेतन मस्तिष्क) Conscious Mind का कारक है, की स्थिति पंचम अर्थात् बुद्धि के स्थान पर होकर शिक्षा के मामले में अल्पबुद्धि (Unintelligent) बनाती है। यही चन्द्रमा यदि किसी पापग्रह से दृष्ट अथवा युक्त होकर लग्न में हो तो, गहरी समझ वाला नहीं होता, और यदि यह नवम में हो तो, बार-बार भाग्य में रूकावटें होने से जातक विक्षिप्त अवस्था में आ जाता है। यही चन्द्रमा एकादश मे होने पर अनेक प्रकार के आरोप तथा उलझनों के कारण उन्माद ग्रस्त हो सकता है।

2. जन्मकुण्डली (Horoscope) में क्षीण चन्द्रमा और बुध का योग हो तो, जातक अल्पबुद्धि (Unintelligent) वाला होता है, इस योग में दो मुख्य तत्व क्षीण चन्द्रमा और बुध का योग अल्पबुद्धि (Unintlligent) बनाता है। चन्द्रमा जो की मन (चेतन मस्तिष्क) Conscious Mind का कारक है, यदि क्षीण होगा तो, वह जातक की सतत् सोच को दूषित करता है, तथा क्षीण बुध जो की बौद्धिक ज्ञान की कमी कर जातक को गहरी सोच वाला नहीं बनने देता। कुण्डली में यह सब विचार एक कुशल ज्योतिषी (Intelligent Astrologer) ही कर सकता है।

3. कुण्डली (Horoscope) के व्यय भाव में शनि युक्त क्षीण चन्द्रमा हो तो, व्यय स्थान में राहु तथा पाप युक्त चन्द्रमा हो, और अष्ठम में शुभ ग्रह हों तो, यह दोनो योग क्षीण तथा पापयुक्त चन्द्रमा को उन्माद का कारण बताते हैं। व्यय जो की कुण्डली में सैक्स का स्थान है, वहाँ वैराग्य कारक शनि की स्थिति क्षीण चन्द्रमा के साथ हो तो, पति या पत्नी के साथ सैक्स में असंतोष के कारण दुःखी होकर मानसिक रोगी हो जाता है। राहु तथा पापयुक्त चन्द्रमा की स्थिति भी एेसा ही योग बनाती है, परंतु यहां अंतर इतना होता है कि राहु के कारण जातक या जातिका स्वयं ही कामरोग से पीड़ित होकर जीवनसाथी से विमुख हो जाता है। ज्योतिष के विद्वानों (Intelligent Astrologer) ने इस प्रकार के पागलपन या उन्माद के अनेक ज्योतिषीय योगों का वर्णन अपने ग्रन्थों में किया है, ज्योतिष के विद्यार्थीयों (Students Of Astrology) को ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। इस प्रकार के योगों में मुख्य तत्व सूर्य अथवा चन्द्रमा अवश्य पीड़ित पाये जाते हैं। ज्योतिष के विद्यार्थीयों (Students Of Astrology) को विशेष ध्यान यह भी रखना चाहिए कि जातक की जनमकुंडली (Horoscope) में शनि के साथ सूर्य का सम्बंध होने से राज्याधिकारी के क्रोध से प्रमाद रोग का भय होता है, एवं वे दोनों ग्रह मंगल से युक्त हों तो, पित्तजन्य उन्माद का भय होता है।

ज्योतिषीय चिकित्सा (Madical Astrology) का नियम है कि, कालपुरुष के शरीर का कारक ग्रह सूर्य है, इस लिये सूर्य पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव दैहिक व्याधियाँ अर्थात् अधिभौतिक दुःख देता है। इस पर पाप प्रभाव मनुष्य को प्रेत, पितर आदि के द्वारा प्रदत्त व्याधियों के साथ-साथ पापी और क्रूर ग्रहों का उत्पीड़न, मानसिक व दीर्घकालिक व्याधियाें का जनक होता है। प्रेत-पितरों से जनित व्याधियों को असेव कहा जाता है। यह व्याधियाँ मनोचिकित्सक के कार्य क्षेत्र में आती हैं, ज्योतिषीय चिकित्सा (Madical Astrology) के द्वारा भी इसका उपचार सम्भव है, परंतु एलोपैथी चिकित्सा द्वारा 80 प्रतीशत रोगियों में मनोचिकित्सा असफल पाई गई है, इन रोगों का उपचार दो प्रकार से क्रमिक रूप से होता है। तंत्र और साथ-साथ आयुर्वैदिक औषधियों के द्वारा, प्रेतों या पितरों का प्रभाव पुच्छ भूत स्वरूप होता है। मुख्य 70 प्रतीशत प्रभाव को “क्लीं” मंत्र के सिद्ध तांत्रिक हटा देते हैं, और शेष 30 प्रतीशत का आयुर्वेदाचार्य अपने उपचार से ठीक कर देते हैं। इसमें इतना स्पष्ट है कि, इस प्रकार के रोगों के आरम्भ होने से पूर्व इनकी पहचान के लिये एकमात्र ज्योतिषीय चिकित्सा (Madical Astrology) ही कारगर सिद्ध हुई है। रोग आरम्भ होने के बाद सम्मोहन क्रिया Reiki या ईष्टमंत्र भी कारगक सिद्ध होते हैं, परंतु ध्यान रहे- प्रेत आवेशित व्यक्ति को स्वंय ईष्ट की पूजा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि आवेशित व्यक्ति की अपनी पूजा-अर्चना प्रेत को और भी शक्तिशाली बना देती है।

ग्रहों में चन्द्रमा मानसिक शक्ति से सम्बन्धित ग्रह है, चन्द्रमा और सूर्य मिलकर ही मंत्र साधक को संजीवनी शक्ति प्रदान करते हैं। संजीवनी साधना में सूर्य बीज “ह्रां” और चन्द्र बीज “वं” का समावेश होता है। स्वास्थ्य के लिये दोनों ग्रहों का पापी ग्रहों (राहु-केतु और शनि) के प्रभाव से बचा रहना आवश्यक है। मन के कारकत्व के अलावा चन्द्रमा को गले, छाती और ह्रदय का कारकत्व भी प्राप्त है। वृश्चिक राशि स्थित (नीच चन्द्रमा) का सम्बंध सूर्य से हो जैसे- सूर्य वृश्चिक राशि में या वृष राशि में तथा चन्द्रमा पर शनि और मंगल की पूर्ण दृष्टि हो तो, राजयक्ष्मा (tuberculosis) होने का पूरा भय रहता है।

यदि चन्द्रमा मंगल से सम्बंध बनाये या उस पर मंगल की सातवीं या आठवीं दृष्टि हो तो, जीवन में जीवन में अनेक दुर्घटनाओं का दुःख जातक को झेलना पड़ता है, ऐसे जातक को अनेक बीमारियां घेरे रहती हैं, उसका दाम्पत्य जीवन भी दुःख से भरा होता है। जातक को अनेक रूकावटों और अड़चनों का सामना अपने जीवन में करना पड़ता है। वराहमिहर ने एेसे जातक के लिये कहा है- चन्द के साथ यदि मंगल का संयोग हो जाये तो, जातक औरतों का व्यापारी होता है, या वे अपनी पत्नी के अन्य से सैक्स सम्बंधों के प्रति बेपरवाह होता है, घर के बर्तनों तक को बेच देता है, यह जातक अपनी माता के प्रति भी नीचता का व्यवहार करता है। चन्द्र-शनि का कुण्डली में साथ होना दुःख व विपत्ति का कारण बनता है, यह योग सन्यास या वैराग्य दायक भी होता है, परंतु यही योग वैराग्य होने पर दैव सानिध्य भी दिलाता है, अर्थात् जातक को अड़चनों में से गुजार कर वैरागी बना देता है, चन्द्र-शनि की युति हो, और मंगल की दृष्टि उन पर हो तो जातक राजयक्ष्मा रोग से पीड़ित होता है। एेसे जातक को सूखा रोग भी हो सकता है। छटे भाव में चंद्रमा पर रक्त सम्बंधी त्वचा रोग या पागलपन की बीमारी हो सकती है। ऐसे जातक को रति-जनित रोग सिफलिस या एड्स हो सकते हैं। यदि शनि-चन्द्र की युति सातवें भाव में हो तो, विवाह में बाधायें आती हैं, विवाह यदि होता भी है तो, दाम्पत्य जीवन दुःखमय होता है, न तो जीवन-साथी साथ ही रहता है, न ही संतान होती है, यदि विवाह सुख होता है तो वृद्ध या वृद्धा साथी से। यह योग सातवें भाव में कर्क या वृष राशि में होने पर निष्फल होता है, अर्थात् वृष या कर्क का चन्द्रमा जातक का बचाव कर देता है, इसके लिये मकर या वृश्चिक राशि लग्न में होनी चाहिए।

आठवें भाव का क्षीण चन्द्र यदि उच्च के शनि द्वारा देखा जाता हो, तो जातक को पागलपन या मिरगी का रोग होता है, शीण चन्द्र शनि के साथ हो, और उस पर मंगल की दृष्टि हो तो, जातक की मृत्यु बवासीर, पागलपन, आपरेशन या चोट के कारण होती है। चीरफाड़ का होना निश्चित है, या खुंखार जानवर के द्वारा भी मृत्यु हो सकती है। बारहवें भाव में चन्द्र-शनि की युति पागलपन का कारण बनती है। प्रायः मानसिक रोगों का कारक 5, 6, 8 या 12 भाव का चन्द्रमा शनि और मंगल के प्रभाव में आकर हो जाता है।

जन्मकुण्डली Horoscope में बुध का सम्बंध दांतों, श्वांसनली, फेफड़ों और कटि प्रदेश से है। बुध पर शनि और मंगल का प्रभाव निमोनिया (पसली चलने का रोग) श्वांस का रोग, बुध-मंगल की युति पर सूर्य और शनि का प्रभाव ज्वर और आंतों के रोग देता है। नजला-जुकाम भी बुध पर पापी ग्रहों के प्रभाव से होता है। बुध जब शनि क्षेत्रीय हो, या राहु के प्रभाव में हो, अर्थात् बुध पर पाप प्रभाव वाणी सम्बंधी रोग तथा हकलाहट देता है, बुध के पापी हो जाने पर बुद्धि जड़ हो जाती है। बुध पर क्रूर और पापी ग्रहों का प्रभाव जेल यात्रा करवा देता है। क्रूर एवं पापी ग्रहों का प्रभाव बुध पर होने से नपुंसकता या दिल के दौरे पड़ सकते हैं, शर्त यह है कि, बुध पर बृहस्पति की दृष्टि नहीं होनी चाहिए। ऐसा असर अधिक होता है, जब बुध तीसरे या छटे भाव में हो, और पाप प्रभाव इस पर पड़ रहा हो, मेष, कर्क या मकर लग्न वाले जातकों के लिये पाप प्रभाव वाला बुध अति दुःख दायक होता है। अपने शत्रु मंगल की राशियों (मेष व वृश्चिक) का पाप प्रभाव युक्त बुध क्रमशः मानसिक रोग और जननेन्द्रियों के रोग देने वाला होता है। पाप प्रभाव युक्त बुध यदि सिंह राशि में हो तो, टायफाईड जैसे रोग देता हेै। शनि से दृष्ट होने पर मकर-कुम्भ का बुध हकलाहट देता है। क्षीण चन्द्र और बुध की युति बांझपन देती है। मंगल के प्रभाव क्षेत्र में शनि की दृष्टि या युति बुध पर होने पर जब मंगल का प्रभाव बुध पर हो तो, हिस्टीरिया रोग हो सकता है, परंतु इसके लिये बुध पर राहु का प्रभाव भी होना चाहिए।

जन्मकुंडली Horoscope के लग्न, चौथे या पाँचवें भाव का बुध यदि मंगल और शनि के साथ हो तो, बांध्यत्व देता है। यदि बुध, शनि, मंगल की युति पर राहु का प्रभाव पड़े तो, गठियावात के रोग होते हैं। दाम्पत्य दुःख और अंग-भंग देने वाला हो सकता है, यदि यह ग्रह सातवें भाव में हो। आठवें भावस्थ पापी बुध चर्म और मानसिक रोग देता है।

बुध का सम्बंध बौद्धिकता से है, विज्ञानमय कोष से सम्बंधित पूर्वजन्मों के कर्मों का फल बुध से प्राप्त होता है। जब बुध नवम् भाव धनु राशि या गुरू से होता है, तो यह योग पितृऋण का परिचायक है। पिछली पीढ़ियों के पापकर्मों का फल वर्तमान पीढ़ी में इस ग्रहयोग से पता चलता है। इस का असर प्रायः जातक की वृद्धावस्था में दिखाई देता है। जब ग्रहजनित रोग परिलक्षित न हों, और जातक उलझनों परेशानियों में फंसा हो, तथा एेसे रोग सामने आ रहे हों, जो कुण्डली Horoscope में दिखाई न देते हों, उस समय कुण्डली में पितृऋण की खोज करनी चाहिए। पितृऋण का सम्बंध पूर्वजों के पापों से होता है, ये पाप पूर्वजों से विरासत में प्राप्त होते है। इस विषय में साधारण ज्योतिषी या कम्प्यूटर की बनी कुण्डली कोई सहायता नहीं कर सकते। इसी लिये ज्योतिष के माध्यम से जातक को कोई लाभ नहीं हो पाता, और अधिकतर रोग अबाधित रह जाते हैं। पितृऋण Pitrarin बृहस्पति के कारकत्व में आते हैं, और इसका सम्बंध विज्ञानमय कोश से होता है। पूर्वजन्म या पितृऋण Pitrarin सम्बंधित दोषों को मिटाने की क्षमता केवल भगवान शिव में है, और उनके बताये उपाय पितृऋण Pitrarin से पूर्णतः छुटकारा दिला सकते है।

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