Parad Shivling

पारद शिवलिंग का सम्बंध कुण्डलिनी शक्ति से है। कुण्डलिनी शक्ति वह सूक्ष्म ऊर्जा है, जो मूलाधार से आरम्भ होकर मेरूदण्ड मार्ग से होते हुये सहस्त्रासार तक प्रवाहित होती है, इस सूक्ष्म विद्युत धारा के निरंतर प्रवाहित होने से मस्तिष्क के सुप्त कोष (सहस्त्रासार चक्र) जाग्रत होने लगता है। जिस प्रकार शरीर में यह उपलब्धि यौगिक अभ्यास से प्राप्त होती है। इसी प्रकार बाहरी प्रभाव मानव मन पर होता है, मानव मन को तो वातावरण में प्रवाहित होने वाली ऊर्जा ही प्रभावित करती है। पारद का एक विलक्ष्ण गुण है कि थोड़़ी सी गर्मी पाकर ऊपर को उठने लगता है, इसी लिये तो पारद को शिव का वीर्य कहा गया है, क्यों की शिव का योग सर्वोपरि योग है, शिव में ही वीर्य को ऊधर्वगामी करने की शक्ति है। क्योंकि अधोगामी वीर्य कुण्डलिनी जागरण में बहुत बडी बाधा है। पारद शिवलिंग के समक्ष सिद्ध आसन लगाकर बैठना और ध्यान लगाने से शीघ्र कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होकर मनुष्य मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है।

लेखक विख्यात ज्योतिषाचार्य— Dr.R.B.Dhawan

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